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	<title>मुनि श्री प्रमाणसागरजी &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>मुनि श्री प्रमाणसागरजी का राहतगढ़ में मंगल प्रवेश: समाज बंधुओं ने की भव्य मंगल अगवानी लगाए जयकारे  </title>
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		<pubDate>Sun, 23 Nov 2025 14:06:46 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[नगर में 27 नवंवर से 2 दिसंबर तक पाषाण से परमात्मा बनाने का विशेष आयोजन श्री 1008जिनबिंब पंच कल्याणक प्रतिष्ठा महा महोत्सव के लिए शंका समाधान प्रणेता मुनि श्री प्रमाण सागरजी महाराज एवं मुनि श्री संधानसागरजी महाराज ससंघ के सानिध्य में मंगल प्रवेश प्रातःकालीन बेला में हुआ। राहतगढ़ से पढ़िए, राजीव सिंघई मोनू की यह [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>नगर में 27 नवंवर से 2 दिसंबर तक पाषाण से परमात्मा बनाने का विशेष आयोजन श्री 1008जिनबिंब पंच कल्याणक प्रतिष्ठा महा महोत्सव के लिए शंका समाधान प्रणेता मुनि श्री प्रमाण सागरजी महाराज एवं मुनि श्री संधानसागरजी महाराज ससंघ के सानिध्य में मंगल प्रवेश प्रातःकालीन बेला में हुआ। <span style="color: #ff0000">राहतगढ़ से पढ़िए, राजीव सिंघई मोनू की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>राहतगढ़ (सागर)।</strong> नगर में 27 नवंवर से 2 दिसंबर तक पाषाण से परमात्मा बनाने का विशेष आयोजन श्री 1008जिनबिंब पंच कल्याणक प्रतिष्ठा महा महोत्सव के लिए शंका समाधान प्रणेता मुनि श्री प्रमाण सागरजी महाराज एवं मुनि श्री संधानसागरजी महाराज ससंघ के सानिध्य में मंगल प्रवेश प्रातःकालीन बेला में हुआ। मुनि संघ के प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया मुनि संघ की मंगल अगवानी के अवसर पर सकल दिगंबर जैन समाज राहतगढ़ एवं मंगल विहार करा रहे भोपाल, विदिशा तथा आसपास के नगरों से सैकड़ों की संख्या में श्रद्धालुओं ने मुनिसंघ की मंगल अगवानी की। इस अवसर पर मुनि श्री ने कहा कि हमारे जीवन में छोटी-छोटी बातों का बहूत गहरा प्रभाव पड़ता है। हम जिस वातावरण और जिन लोगों के साथ रहते हैं, जिनके साथ हमारा रोज का उठना बैठना है तो हमारा व्यवहार भी ठीक वैसा ही बन जाता है।</p>
<p><strong><img fetchpriority="high" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-95098" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/11/IMG-20251123-WA0023.jpg" alt="" width="1600" height="1066" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/11/IMG-20251123-WA0023.jpg 1600w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/11/IMG-20251123-WA0023-300x200.jpg 300w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/11/IMG-20251123-WA0023-1024x682.jpg 1024w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/11/IMG-20251123-WA0023-768x512.jpg 768w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/11/IMG-20251123-WA0023-1536x1023.jpg 1536w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/11/IMG-20251123-WA0023-414x276.jpg 414w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/11/IMG-20251123-WA0023-470x313.jpg 470w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/11/IMG-20251123-WA0023-640x426.jpg 640w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/11/IMG-20251123-WA0023-130x86.jpg 130w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/11/IMG-20251123-WA0023-187x124.jpg 187w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/11/IMG-20251123-WA0023-990x660.jpg 990w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/11/IMG-20251123-WA0023-1320x879.jpg 1320w" sizes="(max-width: 1600px) 100vw, 1600px" />मुनिश्री ने अच्छी संगति में रहने की प्रेरणा दी</strong></p>
<p>मुनि श्री ने एक पुरानी युक्ति सुनाते हुए कहा कि जैसी संगत वैसी रंगत। कुरल काव्य में लिखा है कि पानी का गुण बदल जाता है तथा जैसी मिट्टी में रहता है वैसा रंग हो जाता है। उसी प्रकार मनुष्य के स्वभाव में संगति का व्यापक प्रभाव होता है। इसलिए हमारी संस्कृति ने हमेशा अच्छी संगति में रहने की प्रेरणा देते हुए कहा कि अच्छे लोगों की संगति में रहोगे तो तुम्हारा जीवन भी अच्छा बनेगा। मुनि श्री ने संगति के प्रभाव पर चर्चा करते हुए कहा कि जैसे गुलाब की क्यारी में रहने वाली मिट्टी में भी सुगंध आ जाती है तो नाली के किनारे रहने वाली मिट्टी में दुर्गंध आती है।</p>
<p><strong>दुःसंगति से बचो सुःसंगति में रहो न रहो</strong></p>
<p>मुनि श्री ने कहा कि हम जैसे माहौल में रहते हैं। हमारा व्यवहार भी उस पर निर्भर करता है। इसीलिए हमेशा अच्छी संगति में रहने की प्रेरणा दी जाती है। आचार्य गुरुदेव एक नया दृष्टिकोण प्रकट कर कह रहे हैं कि दुःसंगति से बचो सुःसंगति में रहो न रहो। मुनि श्री ने कहा कि तुम अच्छो की संगति न कर पाओ तो कोई बात नहीं है लेकिन, बुरे की संगति से बचो क्योंकि, उससे तुम्हारा जीवन निश्चय ही बुरा बनेगा। उन्होंने कहा कि सत्संगति रखने वाला व्यक्ति अपने जीवन का उत्कर्ष कर सकता है, लेकिन दुःसंगति में फंसे व्यक्ति का पतन अवश्यंभावी है। प्रायः व्यक्ति अपनी संगति को अच्छी ही मानता है लेकिन, आपके मानने से संगति अच्छी नहीं हो सकती तो ऐसी कौन सी संगती है जो सुसंगति कहलाती है?</p>
<p><strong>बुद्धिमान की संगति में रहोगे तो तुम्हारा ज्ञान भी विकसित होगा</strong></p>
<p>मुनि श्री ने कहा कि जिससे हमें अच्छी प्रेरणा, अच्छी बातें सीखने को मिले। जिससे हमारी आदतें तथा हमारा चरित्र अच्छा बने और हम आगे बढ़ सकें, ऐसी संगति सुसंगति है। इसके विपरीत जो हमारे आचार विचार को भ्रष्ट करें हमारे चरित्र का पतन कराए वह दुःसंगति है। गुरुदेव कहते है कि ऐसी दुःसंगति से बचो। चुनाव हमेशा अच्छे की करो। मुनि श्री ने कहा कि लोग तर्क देते है कि हम ठीक हैं तो दुनिया हमारा क्या बिगाड़ लेगी तो मुनि कहते हैं कि काजल की कोठरी में जाओगे तो कहीं न कहीं दाग लग ही जाएगा। आत्मा का निमित्त और नैमित्तिक संबंध है जो आंतरिक रूप से मजबूत है उनको बचाव की आवशकता नहीं है लेकिन, जो आंतरिक रुप से कमजोर होते हैं उनका मन बहूत चंचल होता है तथा वह छोटे छोटे निमित्तों से प्रभावित हो जाते है। ऐसी स्थिति में बचाव करने की जरुरत है। मुनि श्री ने कहा कि शास्त्रों में हम मुनियों को भी अच्छी संगति में रहने की प्रेरणा दी गई है। हमेशा अपने से अधिक बुद्धिमान की संगति में रहोगे तो तुम्हारा ज्ञान भी विकसित होगा।</p>
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		<title>सांसारिक प्राणिओं में शुभ और अशुभ परिणाम निरंतर होते रहते हैं: 1 नवंबर को भगवान का मस्तकाभिषेक होगा  </title>
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		<pubDate>Thu, 30 Oct 2025 12:11:44 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जिन सिद्ध परमात्मा की हम लोग आज आराधना कर रहे हैं। वह भी कभी संसार चक्र में ही फंसे हुए थे। उन्होंने इस संसार चक्र को भेदा और सिद्धचक्र में अपना स्थान बना लिया। यह उदगार मुनि श्री प्रमाणसागरजी ने अष्टान्हिका महापर्व के तहत व्यक्त किए। भोपाल से पढ़िए, यह खबर&#8230; भोपाल। जिन सिद्ध परमात्मा [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>जिन सिद्ध परमात्मा की हम लोग आज आराधना कर रहे हैं। वह भी कभी संसार चक्र में ही फंसे हुए थे। उन्होंने इस संसार चक्र को भेदा और सिद्धचक्र में अपना स्थान बना लिया। यह उदगार मुनि श्री प्रमाणसागरजी ने अष्टान्हिका महापर्व के तहत व्यक्त किए। <span style="color: #ff0000">भोपाल से पढ़िए, यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>भोपाल।</strong> जिन सिद्ध परमात्मा की हम लोग आज आराधना कर रहे हैं। वह भी कभी संसार चक्र में ही फंसे हुए थे। उन्होंने इस संसार चक्र को भेदा और सिद्धचक्र में अपना स्थान बना लिया। यह उदगार मुनि श्री प्रमाणसागरजी महाराज ने अष्टान्हिका महापर्व के तहत व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि सांसारिक प्राणिओं में शुभ और अशुभ परिणाम निरंतर होते रहते हैं। उन परिणामों से ही कर्मबंध होकर नए-नए शरीर की प्राप्ति होती रहती है तथा मन विषयों में रमकर राग द्वेष की उत्पत्ति करता है। जिससे जन्म मरण का यह चक्र निरंतर चलता रहता है। प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया कि 31 अक्टूबर को दोपहर 1.30 बजे से एमए सिटी (मेनिट) महाविधालय में युवा शक्ति को आत्म जाग्रति की ओर दिशा बोध कराते हुए संबोधन होगा।</p>
<p>जिससे वह अपने भविष्य को तय कर सकें तथा मुनिश्री का 3 बजे मंगल विहार श्री नेमीनाथ दिगंबर जैन झिरनो मंदिर की ओर होगा तथा सांयकालीन शंका समाधान एवं रात्रि विश्राम होकर 1 नवंबर शनिवार को भगवान का मस्तकाभिषेक एवं शांतिधारा तथा श्री गणधर वलय विधान होगा एवं आहार चर्या होगी।</p>
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		<title>अहिंसा और सहअस्तित्व की भावना से ही हिंसा मिटाई जा सकती है : मुनि श्री प्रमाणसागर जी ने पद्मपुराण के अंशों का वाचन कर दी मंगल देशना  </title>
		<link>https://www.shreephaljainnews.com/violence_can_be_eradicated_only_through_the_spirit_of_non_violence_and_co-existence/</link>
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		<pubDate>Thu, 02 Oct 2025 13:15:28 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[अधर्म पर धर्म की,असत्य पर सत्य की, बुराई पर अच्छाई की, पाप पर पुण्य की,अत्याचार पर सदाचार की, अज्ञान पर ज्ञान की विजय का प्रतीक है यह दशहरा। यह उदगार मुनि श्री प्रमाणसागरजी महाराज ने प्रातः प्रवचन सभा में व्यक्त किए। अवधपुरी भोपाल से पढ़िए, यह खबर&#8230; अवधपुरी (भोपाल)। अधर्म पर धर्म की,असत्य पर सत्य [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>अधर्म पर धर्म की,असत्य पर सत्य की, बुराई पर अच्छाई की, पाप पर पुण्य की,अत्याचार पर सदाचार की, अज्ञान पर ज्ञान की विजय का प्रतीक है यह दशहरा। यह उदगार मुनि श्री प्रमाणसागरजी महाराज ने प्रातः प्रवचन सभा में व्यक्त किए। <span style="color: #ff0000">अवधपुरी भोपाल से पढ़िए, यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>अवधपुरी (भोपाल)।</strong> अधर्म पर धर्म की,असत्य पर सत्य की, बुराई पर अच्छाई की, पाप पर पुण्य की,अत्याचार पर सदाचार की, अज्ञान पर ज्ञान की विजय का प्रतीक है यह दशहरा। यह उदगार मुनि श्री प्रमाणसागरजी महाराज ने प्रातः प्रवचन सभा में व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि जब-जब हमारी आत्मा किसी अन्य पर मुग्ध होती है तो वह विवेक (अंतरात्मा) की बात को सुना अनसुना कर अविवेक की ओर चल देती है। मुनि श्री ने जैन रामायण पद्ममपुराण के अंशों को सुनाते हुए सीता हरण के दृश्यों को प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि श्रीराम जानते थे कि मृग सोने का नहीं होता फिर भी जब बार-बार सीताजी ने कहा कि जाओ उस स्वर्ण मृग को लेकर आओ तो रामजी उस स्वर्ण मृग को लेने उसके पीछे जाना पड़ा और जंगल में जाते ही वह मायावी मृग गायब हो गया। वही माया के माध्यम से लक्ष्मण बचाओ की आवाज सुनकर सीता जी ने लक्ष्मण को भी उधर ही भेज दिया, आगे की कथा आप सभी जानते हैं।</p>
<p><strong>अपने अंदर के सोए हुए आत्मराम को जगाओ </strong></p>
<p>मुनि श्री ने कहा कि जब-जब मर्यादा की लक्ष्मण रेखा से सीता बाहर गई है। उनका अपहरण ही हुआ है। आज हर व्यक्ति अपनी सीमाओं को लांघ रहा है और अपने अंदर की सीता (शांति) का हरण कर रहा है। उन्होंने आध्यात्मिकता के पक्ष को जगाते हुए कहा कि अपने अंदर के आत्म राम को जगाने का उद्यम कर, तभी तेरे अंदर के रावण का अंत हो पाएगा तथा जीवन में परिवर्तन आएगा। मुनि श्री ने कहा अभी तो हर व्यक्ति के अंदर का राम सोया पड़ा है तथा वह उनकी सीता( शांति) का हरण हो रहा है। जाओ और अपने अंदर के सोए हुए आत्मराम को जगाओ तभी आपकी सीता(शांति) वापस मिलेगी। मुनि श्री ने कहा कि आजकल लोग नाम तो राम का लेते हैं और काम रावण के करते हैं तो बताओ काम कैसे बनें? उन्होंने कहा कि अपने अंदर की चेतना को जगाए बिना जीवन का कल्याण नहीं हो सकता। जैसे प्रकृति में दो पक्ष होते है शुक्ल पक्ष और कृष्णपक्ष। श्रीराम धर्म नीति और मर्यादा के प्रतीक होकर शुक्ल पक्ष के रूप में हो जो क्रमशः हमारी आत्मा का गुणात्मक विकास कर पूर्णिमा की पूर्ण कलाओं से युक्त होकर चेतना को परिपूर्णता प्रदान करते हैं। वहीं रावण अधर्म, अनीति, और अमर्यादा तथा अन्याय का घोतक है, जो कृष्ण पक्ष का प्रतीक होकर हमारी चेतना को कलुषित कर अंत में हमारे जीवन को कलंकित कर देता है।</p>
<p><strong> हिंसा रावण का ही रौद्र रूप है </strong></p>
<p>मुनि श्री ने कहा कि आज 2 अक्टूबर का दिन है और विश्व में अहिंसा दिवस के रूप में मनाते हुए महात्मा गांधी को याद किया जाता है। उन्होंने कहा कि हिंसा रावण का ही रौद्र रूप है। आज के दिन हम सभी को हिंसा मिटाने के लिए अहिंसा और सहअस्तित्व की भावना को जगाने का प्रयास करना होगा तभी हम संसार को हिंसा मुक्त कर सकते है। प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया 4 अक्टूबर शनिवार से बहुप्रतीक्षित श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान प्रारंभ होने जा रहा है जिसमें 1024 अर्घ्य समर्पित करते हुए सिद्ध प्रभु की आराधना की जाएगी।</p>
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		<title>जो अकड़ता है वह उखड़ता है, जो झुकता है वह टिकता है: मुनि श्री प्रमाणसागरजी ने दशलक्षण पर्व पर उत्तम मार्दव धर्म के बारे में विस्तार से बताया  </title>
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		<pubDate>Fri, 29 Aug 2025 13:20:14 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[अवधपुरी भोपाल में विराजित मुनि श्री प्रमाणसागरजी ने दशलक्षण पर्व पर उत्तम मार्दव धर्म के बारे श्रावकों और गुरु भक्तों को मंगल वचनों से उपकृत किया। यहां पर्वाधिराज पर्युषण के अवसर पर दसलक्षण पर्व पर उत्तम मार्दव धर्म की उन्होंने सविस्तार व्याख्या की। अवधपुरी भोपाल से पढ़िए, अविनाश जैन की यह खबर&#8230;  अवधपुरी भोपाल। अवधपुरी [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>अवधपुरी भोपाल में विराजित मुनि श्री प्रमाणसागरजी ने दशलक्षण पर्व पर उत्तम मार्दव धर्म के बारे श्रावकों और गुरु भक्तों को मंगल वचनों से उपकृत किया। यहां पर्वाधिराज पर्युषण के अवसर पर दसलक्षण पर्व पर उत्तम मार्दव धर्म की उन्होंने सविस्तार व्याख्या की। <span style="color: #ff0000">अवधपुरी भोपाल से पढ़िए, अविनाश जैन की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong> अवधपुरी भोपाल</strong>। अवधपुरी भोपाल में विराजित मुनि श्री प्रमाणसागरजी ने दशलक्षण पर्व पर उत्तम मार्दव धर्म के बारे श्रावकों और गुरु भक्तों को मंगल वचनों से उपकृत किया। यहां पर्वाधिराज पर्युषण के अवसर पर दसलक्षण पर्व पर उत्तम मार्दव धर्म की उन्होंने सविस्तार व्याख्या की। मुनिश्री ने कहा कि नदी में पूर आया और जब पानी उतरा तो तट पर खड़े लोगों ने देखा इस पूर में तट पर लगे बड़े-बड़े पेड़ तो उखड़ गये लेकिन, छोटी छोटी लतायें सुरक्षित थी तो एक बच्चे ने जिज्ञासा से पूछा दादाजी- बड़े-बड़े पेड़ तो उखड़ गये लेकिन, यह छोटी छोटी लतायें कैसे सुरक्षित रह गई? तो दादाजी ने जो जवाब में कहा कि जो बड़े थे। वह अकड़ में खड़े थे। वह उखड़ गये और जो छोटे थे वह पानी के बहाव के साथ झुक गये और वह सुरक्षित नजर आ रहे है। मुनि श्री ने आज के संदर्भ में चार बातें बताते हुए कहा कि झुको, मिलो,सुनो, सहो ‘जो झुकता है वह टिकता है’ झुकना सीखो नम्रता को अपने जीवन का आदर्श बनाओ।</p>
<p><strong>बर्फ को एडजेस्ट करने के लिये कूटना पड़ता है</strong></p>
<p>उन्होंने अहंकारी की विशेषता बताते हुये कहा कि वह टूटने को, दुःखी होने को राजी होता है लेकिन, झुकने को तैयार नहीं होता। संत कहते है कि जीवन मिला है, जीवन में सब कुछ हमारे अनुसार नहीं चलेगा। कुछ बातें हमारे मन की होती है तो कुछ बातें अपने मन की बनाना पड़ती है। जो अड़े रहते है और खड़े रहते वह उखड़ जाते है जो एडजेस्ट करके चलते हैं। वही जीवन की ऊंचाइयों को प्राप्त करते हैं। मुनि श्री ने पानी और बर्फ का उदाहरण देते हुये कहा कि पानी जिस बर्तन में डालो एडजेस्ट हो जाता है जबकि, बर्फ को एडजेस्ट करने के लिये कूटना पड़ता है। संत कहते है कि पानी बन जाओ सभी जगह स्थान बना लोगे। बर्फ जैसा जीवन बनाओगे तो कूटना पड़ेगा।</p>
<p><strong>जो स्वयं झुकेगा वह दूसरों को भी झुका पाएगा </strong></p>
<p>मुनि श्री ने कहा कि जो झुकेगा वह दूसरों को भी झुका पाएगा। अहंकार में डूबा मनूष्य न तो खुद का भला कर पाता है न दूसरे का। जैसे पेड़ जितना फलदार होता है उसकी शाखाएँ उतनी झुकी होती है। मुनि श्री ने कहा कि अकड़ मुर्दे की पहचान हुआ करती है। झुकता वही है जिसमें जान है। अपने जीवन को जीवंत बनाना चाहते हो तो मार्दव धर्म को अपनाओ और झुकना सीखो। मुनि श्री ने कहा कि अपना अपना इगो छोड़ो। उन्होंने कहा कि पति-पत्नी में अनबन हो गई। गुस्से में पत्नी ने कह दिया मैं अपने मायके जा रही हूं। पति अपने काम पर निकल गया और पत्नी को समझ आई और मायके न जाकर अपने घर वापस आ गई। सांयकाल पति भी घर आ गया दोनों आमने-सामने है लेकिन, दोनों बोलने को तैयार नहीं। उनका तीन साल का बच्चा था। उसने मंदिर में गुरु के मुख से एक गीत सुना था वह उसे याद था उसके बोल थे ‘रुक मत प्राणी झुकजा, जीवन सुखी बन जाएगा’ वह बार-बार कभी मां की तरफ तो पिता की तरफ मुख करके सुनाता रहा। दोनों को हंसी आई और दोनों एक साथ बोल पड़े गलती हमारी थी और क्षमा मांगी। पति ने कहा मैं तुम्हें लेने तुम्हारे घर गया था तो मालूम पड़ा कि तुम तो वहां गई ही नहीं तो पत्नी ने कहा कि आपके जाने के बाद मुझे अपनी गलती का अहसास हुआ और मैं कहीं नहीं गई। पतिदेव आप मुझे क्षमा करें। मुनि श्री ने कहा कि दोनों एक-दूसरे के सामने झुक गये तो परिवार टिक गया। यदि एक-दूसरे के सामने झुकने को तैयार नहीं होते मामला गड़बड़ा जाता। मुनि श्री ने कहा कि हर व्यक्ति में कुछ न कुछ गुण अवश्य होते हैं। उनकी अच्छाइयों को देखो। बड़प्पन तभी है जब दूसरों को मान देना शुरु करो तथा कथित ऐसे बड़े आदमी मत बनो कि तुम्हारे घर कोई गरीब आदमी न आए। उन्होंने कहा कि बड़ा आदमी वह नहीं कि उसके बड़े ठाट हों। बड़ा आदमी तो वह है जिसके पास आने वाला कोई अपने आपको छोटा महसूस न करे।</p>
<p><strong>अभिनय से नही, अभिव्यक्ति से जिओ’</strong></p>
<p>प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया कि प्रातःकाल 5. 25 से भगवान का अभिषेक एवं शांतिधारा संपन्न हुई। मुनि श्री ने भावनायोग के माध्यम से सहजता और सरल बनने का मार्ग समझाया। आगामी दिवस उत्तम आर्जव धर्म का है। जिसमें बाहरी चमक दमक छल कपट को छोड़कर सीधी सरल और निष्कपट वृति का मार्ग बताया जाएगा। ‘अभिनय से नही, अभिव्यक्ति से जिओ’। स्वार्थ पूर्ण व्यवहार से आत्म विश्वास घटता है। अविश्वास बढ़ता है संबंध खोखले होते हैं। तनाव और मानसिक विकार बढ़ते हैं इस बारे में मुनि श्री मार्गदर्शन देंगे। संस्कार शिविर में गुरुकुलम् के सभी 180 बच्चे भी अपना अध्यन के साथ संस्कार भी ग्रहण कर रहे हैं सभी बच्चों का मोबाइल का त्याग है एवं हजारों की संख्या में पधारे शिवारार्थिओं का भी प्रातः 5 से 11 बजे पूजा समाप्ति तक मोबाइल का त्याग रहता है। मुनि श्री के उदबोधन से कई लोगों ने आजीवन तो कुछ लोगों ने समय सीमा के साथ गुटका तम्बाकू एवं बाजार की वस्तुओं तथा रात्रि में चारों प्रकार के आहार का त्याग के साथ एकासन एवं निर्जला उपवास तक कर रहे हैं।</p>
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