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	<title>मुनि श्रीसंधानसागरजी महाराज &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<description>ताज़ा खबरे हिन्दी में</description>
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		<title>भोग आकांक्षा की चाहत जीवन को बर्बाद करती है : मुनि श्री प्रमाणसागर जी ने श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान के दौरान प्रकट किए प्रभावी विचार  </title>
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		<pubDate>Wed, 08 Oct 2025 12:42:17 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जैसे-जैसे श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान का क्रम आगे बढ़ रहा है। वैसे-वैसे भगवान की भक्ति और अर्घ्य उत्तरोत्तर बढ़ते जा रहे हैं। विधान के पांचवे दिवस 128 अर्घ्य चढ़ाए गए। तथा गुरुवार को 256 अर्घ्य चढ़ाए जाएंगे। भोपाल से पढ़िए, अविनाश जैन विद्यावाणी की यह खबर&#8230; भोपाल (अवधपुरी)। जैसे-जैसे श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान का क्रम [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>जैसे-जैसे श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान का क्रम आगे बढ़ रहा है। वैसे-वैसे भगवान की भक्ति और अर्घ्य उत्तरोत्तर बढ़ते जा रहे हैं। विधान के पांचवे दिवस 128 अर्घ्य चढ़ाए गए। तथा गुरुवार को 256 अर्घ्य चढ़ाए जाएंगे। <span style="color: #ff0000">भोपाल से पढ़िए, अविनाश जैन विद्यावाणी की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>भोपाल (अवधपुरी)।</strong> जैसे-जैसे श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान का क्रम आगे बढ़ रहा है। वैसे-वैसे भगवान की भक्ति और अर्घ्य उत्तरोत्तर बढ़ते जा रहे हैं। विधान के पांचवे दिवस 128 अर्घ्य चढ़ाए गए। तथा गुरुवार को 256 अर्घ्य चढ़ाए जाएंगे। इसी प्रकार 512 तथा भगवान के सहस्त्र नाम के साथ 1024 अर्घ्य समर्पित होकर रविवार को विधान का समापन होगा। इस अवसर पर मुनि श्री प्रमाणसागर महाराज ने कहा कि जिसके हृदय में सम्यक्त्व का प्रकाश उदघाटित होता है वह तो मौका देखता है और भगवान की भक्ति में रम जाता है। उन्होंने सम्यक दृष्टि, धर्मी और अधर्मी तीनों में अंतर स्पस्ट करते हुए कहा कि धर्मी धर्म के लिये मौका देखता है, जबकि अधर्मी आए हुए मौका को छोड़ता है। एक सम्यक् दृष्टि संसार में कर्तव्य भाव से रहता लेकिन, उसमें रमता नहीं। भोगों से उदासीन होकर देव शास्त्र और गुरु की शरण को स्वीकार करते हुए एक ही भावना भाता है कि हे प्रभु में दुनिया में कहीं भी रहूं मेरी दृष्टि आपके चरणों की ओर रहे।</p>
<p><strong>जिसके</strong> अंदर विवेक नहीं है वह पूतना रूपी पंचेन्द्रिय की वासना से ग्रस्त</p>
<p>उन्होंने महाभारत का उदाहरण देते हुए कहा कि पूतना ने नंदगांव के बच्चों को आकर्षित करने के लिए अपना आकृषण स्वरुप बनाया। जिससे बच्चे आकृषित होकर उसके आंचल में दुग्धपान करने हेतु चले गए और वह सभी मूर्क्षा को प्राप्त हुए लेकिन, बाल रूप के श्रीकृष्ण पूतना के उन मनोभावों को समझ गये और उन्होंने पूतना का ही काम तमाम कर दिया। इस दृष्टि से जब में तत्व का चिंतन करता हूं तो पाता हूं कि जिसके अंदर विवेक नहीं है। वह पूतना रूपी पंचेन्द्रिय की वासना से आकर्षित भोग आकांक्षा को ही अपनी शरण मान लेता है तथा वह अपने जीवन का सर्वनाश करता है तथा जिसके अंदर विवेक रूपी श्रीकृष्ण प्रकट हो जाते हैं। वह भोग आकांक्षा रूपी पूतना को नष्ट कर संसार से पार हो जाता है।</p>
<p><strong>भगवान</strong> के प्रति उमड़ने वाली भक्ति ही सम्यक् दर्शन का हेतु</p>
<p>मुनि श्री ने कहा कि विषयों में रमने वाले लोग बहुत हैं लेकिन, विषयों से हटकर भगवान की भक्ति करने वाले लोग विरले होते हैं। उन्होंने कहा कि दुनिया का आकर्षण बहुत तीव्र होता है,जो हमें विषय भोगों की ओर आकर्षित करता है, लेकिन जिन्हें परम पुण्य का शुभ संयोग मिलता है। वह अपने एक एक पल को भगवान की भक्ति में लगाता है। आचार्य कुंद कुंद कहते है कि अरिहंत भगवान के प्रति उमड़ने वाली भक्ति ही सम्यक् दर्शन का हेतु है। यदि वह भक्ति आपके अंदर प्रकट हो गई तो समझना बेड़ा पार हो गया। इस अवसर पर मुनि श्रीसंधानसागरजी महाराज सहित क्षुल्लक श्री आदर सागर जी, क्षुल्लक श्री समादरसागर जी, क्षुल्लक श्री चिद्रूप सागर जी, क्षुल्लक श्री स्वरुप सागर, क्षुल्लक श्री सुभग सागर महाराज सहित समस्त संघस्थ ब्रह्मचारी उपस्थित थे। कार्यक्रम का संचालन विधानाचार्य ब्र.अशोकभैया ब्र.अभयभैया ने किया एवं विधान में सहयोग अमित वास्तु इंदौर एवं पंडित सुदर्शन पिंडरई ने किया।</p>
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