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	<title>मुनि शुद्ध सागर &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<description>ताज़ा खबरे हिन्दी में</description>
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	<title>मुनि शुद्ध सागर &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<item>
		<title>मनुष्य भव चौरासी लाख योनियों में सबसे उत्कृष्टः मुनि श्री शुद्धसागर जी</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 02 Aug 2022 01:30:05 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[समाचार]]></category>
		<category><![CDATA[shreephal]]></category>
		<category><![CDATA[चातुर्मास]]></category>
		<category><![CDATA[न्यूज़ श्रीफल]]></category>
		<category><![CDATA[मुनि शुद्ध सागर]]></category>
		<category><![CDATA[रावतभाटा]]></category>
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					<description><![CDATA[हमारी क्या कामना है नोटों की गड्डी या धर्म? रावतभाटा (चितौड़गढ़)। श्रमण मुनि श्री शुद्धसागर जी महाराज व क्षुल्लक श्री अकंप सागर जी महाराज का भव्य मंगल चातुर्मास धर्मनगरी रावतभाटा चितौड़गढ़ में चल रहा है। मुनि श्री ने सभा को संबोधित करते हुए कहा है कि हमारा मनुष्य भव चौरासी लाख योनियों में सबसे उत्कृष्ट [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>हमारी क्या कामना है नोटों की गड्डी या धर्म?</strong></p>
<p><strong>रावतभाटा (चितौड़गढ़)।</strong> श्रमण मुनि श्री शुद्धसागर जी महाराज व क्षुल्लक श्री अकंप सागर जी महाराज का भव्य मंगल चातुर्मास धर्मनगरी रावतभाटा चितौड़गढ़ में चल रहा है। मुनि श्री ने सभा को संबोधित करते हुए कहा है कि हमारा मनुष्य भव चौरासी लाख योनियों में सबसे उत्कृष्ट है, लेकिन इसकी आयु बहुत ही अल्प है। इस अल्प समय में जो समझ जाए वह अपने भवों का नाश कर सकता है। हमने अनेक भवो में जो दुख, कष्ट, वेदना सही है, यदि वो हमारे सामने आ जाए तो हम कभी पाप नहीं करे। इस मनुष्य भव में आकर हम फूल गए हैं और फूलकर भूल रहे हैं।<br />
मुनि श्री ने कहा कि मनुष्य भव ही एक ऐसा भव होता है जिसमें हम यदि अपना लक्ष्य बना लें तो मोक्ष या ऊर्ध्व गति को प्राप्त कर सकते हैं। यदि मनुष्य भव छूट जाए तो फ़िर ऐसा कोई भव नहीं है जिसमें हम अपना कल्याण कर सकें। अर्थात हमें अपने आप को पहचानने की जरूरत ह । जब हम संसार में आए थे, तब भी कुछ नहीं लाए थे और जब इस संसार से जाएंगे तब भी कुछ नहीं ले जाएंगे। फिर भी हमारे मोहनीय कर्म का उदय ऐसा है कि हम इसे स्वीकारने को तैयार नहीं हैं।<br />
मुनि श्री ने श्रोताओं से कहा कि वस्तु व्यवस्था को स्वीकार करने से ही सम्यक दर्शन संभव होगा। हम यह जानते हैं कि हम साथ ना कुछ लाए थे, ना ले जाएंगे फिर भी हमारा कर्म का उदय इतना हावी हो रहा है कि हम दूसरों को देखकर हर कार्य को कर रहे हैं। मुनि श्री कहते हैं कि अपना कल्याण करने के लिए हमें अपनी परिणीती, स्थान व सोच को बदलना होगा। इसे बदले बिना तीन काल में भी कल्याण संभव नहीं है। हम भगवान की मूर्ति के आगे हाथ जोड़कर कहते हैं कि हे भगवान ,मेरा कल्याण हो जाए तो उससे कल्याण होना वाला नहीं है। लेकिन हम निज भगवन से यदि कहें तो हमारा कल्याण अवश्य ही हो जाएगा। मनुष्य संसार से मात्र अपने कर्मों को ही लेकर जाता है। फिर भी विचारा नोटों की गड्डी के पीछे लगा है और इसके लिए अशुभ कर्म करता है।<br />
मुनि श्री ने अंत में कहा कि मनुष्य भव कमाई की दुकान है। जैसा इस भव में कमाया जा सकता है, अन्य किसी भव में नहीं कमाया जा सकता है। हम यह हमारा निर्णय है कि हमारी क्या कामना है नोटों की गड्डी या धर्म? जो कर्म हम कर रहे हैं उसे भोगना ही पड़ेगा। हम लोगों से तो झूठ बोल सकते हैं मगर कर्म से नहीं बोल सकते हैं।</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>धर्मात्मा पाप से डरता है, पापी से नहींः मुनि श्री शुद्ध सागर जी</title>
		<link>https://www.shreephaljainnews.com/dharmaatma-paap-se-nahin-paapee-se-darata-hai-muni-shree-shuddh-saagar-jee/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 01 Aug 2022 01:30:35 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[समाचार]]></category>
		<category><![CDATA[मुनि शुद्ध सागर]]></category>
		<category><![CDATA[रावतभाटा चातुर्मास]]></category>
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					<description><![CDATA[तीर्थंकर भगवान की देशना स्याद्वाद वाणी का उपदेश खुद को बदलना होगा, दूसरों को बदलने से हमें कुछ नहीं मिलेगा रावतभाटा (चितौड़गढ़)। मुनि श्री शुद्ध सागर जी महाराज का अमृतमय वर्षायोग धर्म नगरी रावतभाटा चितौड़गढ़ में चल रहा है। मुनि श्री संघ श्री 1008 पारसनाथ दिगम्बर जैन मंदिर, नया बाज़ार, रावतभाटा में विराजमान हैं। प्रातःकाल [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<ul>
<li><strong>तीर्थंकर भगवान की देशना स्याद्वाद वाणी का उपदेश</strong></li>
<li><strong>खुद को बदलना होगा, दूसरों को बदलने से हमें कुछ नहीं मिलेगा</strong></li>
</ul>
<p><strong>रावतभाटा (चितौड़गढ़)।</strong> मुनि श्री शुद्ध सागर जी महाराज का अमृतमय वर्षायोग धर्म नगरी रावतभाटा चितौड़गढ़ में चल रहा है। मुनि श्री संघ श्री 1008 पारसनाथ दिगम्बर जैन मंदिर, नया बाज़ार, रावतभाटा में विराजमान हैं। प्रातःकाल उन्होंने श्रावकों को तीर्थंकर भगवान की देशना स्याद्वाद वाणी का उपदेश देते हुए कहा कि धर्म करने के लिए हमें स्वयं को बदलना होगा। हमारे अंदर धर्म की जो राय बनी है, उसे टटोलना होगा। मुनिश्री कहते हैं कि जब बिना बदले रोटी नहीं बन पाती है तो हम &#8220;धर्मात्मा&#8221; केसे बन सकते हैं। आत्मा में कोई बदलाव नहीं आता है, वह नरक, तिर्यंच, निगोद संसार सभी जगह समान है। संसार में दो प्रकार के लोग होते हैं- कुछ पापात्मा व कुछ पुण्यात्मा। दोनों की आत्मा वहीं होती है उसमें कोई बदलाव नहीं आता है। मात्र अंतर इतना होता है कि धर्मात्मा जो होता है, उसे बदलना पड़ता है।</p>
<p>मुनि श्री ने अपने प्रवचन में आगे कहा कि मात्र मंदिर जाने से, अभिषेक, पूजन करने से हम धर्मात्मा नहीं बनते हैं। हमें अपने आचार, विचार सब बदलना होगा तभी हम धर्मात्मा बन सकते हैं। मुनि श्री ने श्रोताओं से कहा कि धर्मात्मा जो होता है, वह पाप से डरता है। पाप करने से डरता है परन्तु वह &#8220;पापी&#8221; से नहीं डरता है। हमें यह विचारने की जरूरत है कि हम पाप से डरते हैं या पापी से? यदि हम पाप से डरते हैं तो हम धर्मात्मा हो सकते है लेकिन जो पापी से डरता है वह तीन काल में भी धर्मात्मा होने वाला है नहीं।</p>
<p><strong>पापी से घृणा करना ही पाप</strong></p>
<p>मुनि श्री कहते हैं कि पापी से घृणा करना ही पाप है। पाप से घृणा करने वाला, पापी से घृणा कर ही नहीं सकता है।</p>
<p>अपने आप से राग करना तथा दूसरों से घृणा करना यही पाप होता है। मुनि श्री कहते हैं कि बिना बदले संसार में कोई कार्य संभव नहीं होता है । कार्य की परिभाषा देते हुए मुनि श्री कहते है कि वस्तु का बदल जाना ही कार्य है।<br />
मुनिश्री कहते हैं हे जीव, तू सोचता है कि मैं धर्म करूं और तू बदलना भी नहीं चाहता है तो तेरा धर्म केसे होगा? जितना जितना हम खुद को बदलेंगे, उतना हमारा धर्म अग्रसर होगा। संसारी जीव की यही धारणा होती है कि मैं दूसरों को बदलूं, वह यह कभी नहीं सोचता कि में स्वयं को बदलूं। दूसरों को बदलने से हमें कुछ नहीं मिलेगा। हे जीव, यदि तू स्वयं को बदलेगा तो तेरा कल्याण होगा और तू उतना ही धर्मात्मा होगा।<br />
मुनि श्री ने अंत में श्रावकों से कहा कि हे जीव, यदि तुझे संसार में ही रहना है तो तू धर्म कर ही क्यूं रहा है। बाहर से तो तू धर्मात्मा कहला रहा है और अंदर से तेरे धर्म के भाव ही नहीं है तो उससे भी तू मात्र पाप का ही बंध कर रहा है। धर्म और विवेक का सहवर्तीपना संबंध है। जहां विवेक होगा, वहां धर्म होगा और जहां विवेक नहीं होगा, वहां धर्म किंचित मात्र भी नहीं हो सकता है। मुनि श्री ने बताया, सुख-दुख दोनों हमारे कर्म का निमित होता है।</p>
<p>प्रवचन में रावतभाटा के पुरुष, महिला, बालक , बालिकाएं व गुरु भक्त उपस्थित थे।</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>पर हिंसा से तो सभी बच सकते है लेकिन स्वयं की हिंसा से बचने का सोचते तक नहीं &#8211; मुनि श्री शुद्ध सागर जी</title>
		<link>https://www.shreephaljainnews.com/par-hinsa-se-to-sabhee-bach-sakate-hai-lekin-svayan-kee-hinsa-se-bachane-ka-sochate-tak-nahin-muni-shree-shuddh-saagar-jee/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 29 Jul 2022 13:46:54 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[समाचार]]></category>
		<category><![CDATA[shreephal news]]></category>
		<category><![CDATA[चातुर्मास]]></category>
		<category><![CDATA[मुनि शुद्ध सागर]]></category>
		<category><![CDATA[श्रीफल न्यूज]]></category>
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					<description><![CDATA[&#160; रावतभाटा।  अक्सर देखते है कि हमारे संस्कार किसी जीव का अहित होने से रोकते है, हम सोचते है कि हमसे किसी का बुरा न हो, या हम कोई बुरा काम न कर बैठे पर यह कभी नहीं सोचते कि हम अपने कर्मों से अपना अहित तो नहीं कर रहे है। ऐसी ही स्थिति को [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>&nbsp;</p>
<p><strong>रावतभाटा। </strong> अक्सर देखते है कि हमारे संस्कार किसी जीव का अहित होने से रोकते है, हम सोचते है कि हमसे किसी का बुरा न हो, या हम कोई बुरा काम न कर बैठे पर यह कभी नहीं सोचते कि हम अपने कर्मों से अपना अहित तो नहीं कर रहे है। ऐसी ही स्थिति को श्रावकों के सामने जिनवाणी का उपदेश देते हुए श्रमण मुनि श्री शुध्द सागर जी महाराज ने रखा। मुनिश्री का अमृतमय वर्षायोग धर्म नगरी रावतभाटा में चल रहा है। जहां प्रातः कालीन प्रवचन कि बेला में मुनि श्री ने कहा कि व्यक्ति हमेशा यह सोचता है कि मेरे द्वारा किसी का घात न हो जाए परन्तु वह यह कभी नहीं सोचता कि मेरे द्वारा मेरा ही घात न हो जाए।अर्थात मेरे द्वारा जो कर्म का बंध चल रहा है वहीं मेरे द्वारा मेरा घात है। वहीं मेरे निज की हिंसा है। मुनि श्री कहते है कि पर हिंसा से तो सभी बच सकते है लेकिन निज की हिंसा से बचने का हम सोचते भी नहीं है। पर की हिंसा छोड़ने से नरक मार्ग दूर हो जाएगा, तिर्यंच मार्ग भी दूर हो जाएगा,अशुभ गति भी नहीं मिलेगी लेकिन इससे मोक्ष भी नहीं मिलेगा। जब तक हमारे अंदर स्व हिंसा व पर हिंसा का भाव होगा तब तक हम मोक्ष नहीं पा सकते। पर की हिंसा छोड़ना व्यक्ति का लक्ष्य है परन्तु निज की हिंसा छोड़ने का कोई लक्ष्य नहीं है।</p>
<p>धर्म वही जो पर को छोड़कर निज की ओर ले जाए<br />
मुनि श्री कहते है कि संसार में लोगों ने ऐसा सोच लिया है कि धर्म क्षेत्र में जाने से, धार्मिक कार्यक्रम करने से धर्म हो जाता है लेकिन ऐसा किंचित मात्र भी नहीं है। धर्म वहीं होता है जो हमें पर को छोड़कर निज की ओर ले जाए। साथ ही मुनिश्री ने कहा कि हमें सच्चे देव को पूजना है कुदेव को पूजने पर हमें मिथ्यात्व का बंध होता है। यदि हम अपने मन में यह सोच लें कि एक दिन सबको जाना है अर्थात् संसार का नियम है जो आया है वह जाएगा लेकिन हम सही में इस बात को समझ ले तो हमारी परिणीती ही बदल जाएगी।<br />
अंत में मुनि श्री ने सम्यक दृष्टि जीव के लक्षण बताते हुए कहा कि सम्यक् दृष्टि जीव, अन्याय,अनीति को छोड़कर संसार में रहेगा परन्तु संसार से विरक्त होकर।<br />
वह घर में तो रहेगा लेकिन उसके अंदर घर नहीं रहेगा। वह इस प्रकार रहेगा जिस प्रकार तालाब में कमल रहता है।</p>
<p>प्रवचन के दौरान रावतभाटा श्री समाज के श्रावक, श्राविका,बालक, बालिकाएं व गुरु भक्त उपस्थित रहे।</p>
<p><span style="color: #008000;"><strong><a style="color: #008000;" href="https://chat.whatsapp.com/Crte6WvfMtU3xFE5MO7Xy0">ऐसी रोचक खबरों के लिए हमारे वॉट्स ऐप ग्रुप से जुडने के लिए क्लिक करें ।</a></strong></span></p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>वंदन करते समय कुटिल भाव न रहेंः मुनि श्री शुद्ध सागर जी</title>
		<link>https://www.shreephaljainnews.com/vandan-karate-samay-kutil-bhaav-na-rahenh-shree-shuddh-saagar-jee/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 27 Jul 2022 12:53:19 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[समाचार]]></category>
		<category><![CDATA[shreephal news]]></category>
		<category><![CDATA[मुनि शुद्ध सागर]]></category>
		<category><![CDATA[रावतभाटा]]></category>
		<category><![CDATA[श्रीफल न्यूज]]></category>
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					<description><![CDATA[आगम को जानना आसान, पर स्वीकारना कठिन धर्मसभा को जिनवाणी का ज्ञान करवाया श्रमण मुनि ने रावतभाटा। मुनि श्री शुद्ध सागर जी महाराज का अमृतमय वर्षायोग धर्म नगरी रावतभाटा, चितौड़गढ़ में हो रहा है। प्रातःकाल प्रवचन की बेला में श्रमण मुनि श्री शुद्ध सागर जी महाराज ने धर्मसभा को जिनवाणी का ज्ञान करवाते हुए बताया [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<ul>
<li><strong>आगम को जानना आसान, पर स्वीकारना कठिन</strong></li>
<li><strong>धर्मसभा को जिनवाणी का ज्ञान करवाया श्रमण मुनि ने</strong></li>
</ul>
<p><strong>रावतभाटा।</strong> मुनि श्री शुद्ध सागर जी महाराज का अमृतमय वर्षायोग धर्म नगरी रावतभाटा, चितौड़गढ़ में हो रहा है। प्रातःकाल प्रवचन की बेला में श्रमण मुनि श्री शुद्ध सागर जी महाराज ने धर्मसभा को जिनवाणी का ज्ञान करवाते हुए बताया कि जीव संसार में रहते हुए भी बंध से डरता है तथा वह इस बंध को छोड़कर निर्बंध होना चाहता है। बंध को छोड़ने के लिए वह वंदन करने जाता है परन्तु वह वहां भी बंध करके आता है।</p>
<p>महाराज श्री ने बताया कि व्यक्ति के भावों में ऐसी कुटिलता होती है कि जब वह वंदन भी करता है तो उन्हीं कुटिल (मान- माया) भाव के साथ ही करता है। व्यक्ति चाहता है कि सबकुछ उसके मन का हो। जबतक उसके मन का होता है, तब उसके लिए भगवन सब कुछ होता है परन्तु जबसे उसके मन का नहीं होता, उसके लिए भगवन भी झूठा हो जाता है। परन्तु &#8220;हे जीव, संसार में सबसे बड़ा झूठा व्यक्ति स्वयं है।&#8221; व्यक्ति को अपने परिनमन को सुधारने की आवश्कता है, इसमें भगवन को दोषी ठहराना उचित नहीं है।<br />
मुनि श्री आगे कहते हैं कि जहां हमारे मन की होगी, वहां कल्याण नहीं होगा। जहां मन की नहीं होगी, वहीं हमारा कल्याण संभव है।</p>
<p>धर्मसभा में श्रोताओं को जन्म &#8211; मरण के बारे में समझाते हुए मुनि श्री कहते हैं कि जिस प्रकार विष्ठा के एक कीड़े को भी अपना जीवन प्रिय होता है, उसी प्रकार प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन से स्नेह होता है परन्तु संसार में व्यक्ति का स्वयं का कुछ नहीं होता है, वह तो केवल उसके नाममात्र का होता है। संसार का सबसे बड़ा झूठ यह है कि घर मेरा है, व्यक्ति अपने घर में कई परेशानियों को झेलता है फिर भी वह इससे दूर होना नहीं चाहता है, यह उसके बंध का कारण होता है।</p>
<p>सम्यकदृष्टि व मिथ्यादृष्टि जीव का लक्षण बताते हुए मुनि श्री कहते हैं कि मात्र भगवन का अभिषेक करने या महाराज जी को आहार देने से सम्यक दर्शन नहीं होता है। वस्तु को वस्तुतत्व नहीं स्वीकारोगे तब तक सम्यक दर्शन संभव नहीं है। घर में दुख है, बंधन है, यह बात समझे बिना सम्यक दर्शन संभव नहीं होता है।<br />
मुनि श्री ने सभा में श्रोताओं से कहा कि आगम को जानना आसान है परन्तु उसे मानना/स्वीकारना कठिन होता है।</p>
<p>कुतर्क करने वालों की संसार में कमी नहीं<br />
मुनि श्री ने कहा कि कुतर्क करने वालों की संसार में कमी नहीं है। व्यक्ति अपने जीवन में निज घर को भूल कर, पर घर में घुस रहा है यह उसके मिथ्या उदय का कारण है। मनुष्य का स्वभाव ज्ञान दर्शन होता है। स्वभाव को स्वीकारना होता है, उसमे तर्क नहीं लगाना होता है। मुनि श्री ने बताया कि मिथ्यादृष्टि जीव की बुद्धि मिथ्या मार्ग पर ही चलती है। उसकी बुद्धि तीनों काल में भी सम्यक मार्ग पर नहीं चलने वाली है। प्रत्येक व्यक्ति अपने भाग्य से ही सब पाता है और खोता है। यदि उसके भाग्य में होगा तो उसे प्राप्त होगा और यदि उसके भाग्य में नहीं होगा तो आया हुआ चला जाएगा। पर की और जाना व निज को भूलना यही मिथ्या ज्ञान होता है। कुतर्क लगाने वाला व्यक्ति कभी नहीं सुधरेगा इसलिए हमें खराब वस्तु को त्यागकर अच्छे को स्वीकारना प्रारम्भ करना होगा यही हमारे लिए कल्याण का मार्ग है।</p>
<p>इस धर्मसभा में रावतभाटा समाज के पुरुष, महिला, बालक,बालिकाएं व गुरुभक्त उपस्थित थे।</p>
<p><span style="color: #008000;"><a style="color: #008000;" href="https://chat.whatsapp.com/Crte6WvfMtU3xFE5MO7Xy0">ऐसी रोचक खबरों के लिए हमारे वॉट्स ऐप ग्रुप से जुडने के लिए क्लिक करें ।</a></span></p>
<p>&nbsp;</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>ऐसे विचार, जो जिनवाणी से मेल नहीं रखते, उससे कल्याण नहीं</title>
		<link>https://www.shreephaljainnews.com/aise-vichaar-jo-jinavaanee-se-mel-nahin-rakhate-usase-kalyaan-nahin/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 26 Jul 2022 15:34:35 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[समाचार]]></category>
		<category><![CDATA[shreephal news]]></category>
		<category><![CDATA[मुनि शुद्ध सागर]]></category>
		<category><![CDATA[रावतभाटा चातुर्मास]]></category>
		<category><![CDATA[श्रीफल न्यूज]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://www.shreephaljainnews.com/?p=25706</guid>

					<description><![CDATA[श्रमण मुनि श्री शुद्धसागर जी महाराज के उद्गार अमृतचंद स्वामी द्वारा रचित पुरुषार्थ सिद्धि उपाय ग्रंथ का स्वाध्याय जारी न्यूज़ सौजन्य- इशिता जैन रावतभाटा (चितौड़गढ़)। श्रमण मुनि श्री शुद्धसागर जी महाराज जी संसघ का मंगलमय चातुर्मास रावतभाटा, चितौड़गढ़ में चल रहा है। मुनि श्री संघ श्री 1008 पारसनाथ दिगम्बर जैन मंदिर, नया बाजार रावतभाटा में [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<ul>
<li style="text-align: left;"><strong>श्रमण मुनि श्री शुद्धसागर जी महाराज के उद्गार</strong></li>
<li style="text-align: left;"><strong>अमृतचंद स्वामी द्वारा रचित पुरुषार्थ सिद्धि उपाय ग्रंथ का स्वाध्याय जारी</strong></li>
</ul>
<p><span style="color: #ff0000;">न्यूज़ सौजन्य- इशिता जैन</span></p>
<p><strong>रावतभाटा (चितौड़गढ़)।</strong> श्रमण मुनि श्री शुद्धसागर जी महाराज जी संसघ का मंगलमय चातुर्मास रावतभाटा, चितौड़गढ़ में चल रहा है। मुनि श्री संघ श्री 1008 पारसनाथ दिगम्बर जैन मंदिर, नया बाजार रावतभाटा में विराजमान हैं। मुनि श्री द्वारा आचार्य अमृतचंद स्वामी द्वारा रचित पुरुषार्थ सिद्धि उपाय ग्रंथ की स्वाध्याय करवाया जा रहा है।</p>
<p>मुनि श्री शुद्धसागर जी महाराज ने सभा को संबोधित करते हुए कहा कि हे जीव हमारी सोच, विचार, मान्यता सभी समिचित हैं जिसे हमने दूसरों से उधार लिया है और वही हम कर रहे हैं। मनुष्य की ऐसी कई धारणाएं हैं जो तीर्थंकर की देशना अर्थात जिनवाणी से बिल्कुल अलग होती हैं। ऐसे विचार, जो जिनवाणी से बिल्कुल ही नहीं मिलते हों, उससे हमारा कल्याण बिल्कुल ही संभव नहीं है। मुनि श्री ने श्रोताओं को समझाते हुए कहा कि जिस प्रकार कुएं का पानी शुद्ध होता है, उसमें अनेक गुण होते हैं परन्तु यदि उसमें थोड़ा सा विष डाल दिया जाए तो उस पानी के सारे गुण समाप्त हो जाते हैं। उसी प्रकार जीव धर्म को जानता नहीं है फिर भी वह तन- मन &#8211; धन से धर्म के प्रति समर्पित है तो वह धर्म को जाने बिना अपनी अहिंसा से धर्म के विपरीत ही कार्य करता है। धर्म सभा को संबोधित करते हुए गुरुवर ने कहा कि जहां धर्म होता है, वहां अहिंसा का पालन होता है और जहां जहां अधर्म होता है वहां हिंसा का पालन होता है।</p>
<p>जैनियों के लक्षण बताते हुए मुनि श्री ने कहा कि जैनी कभी भी बिना छना जल नहीं पीता है क्योंकि ग्रन्थों और वैज्ञानिक दोनों तरीके से यह प्रमाणित हो चुका है कि पानी की एक बूंद में असंख्यात जीव होते हैं।</p>
<p>उन्होंने कहा कि यदि हम दूसरों को देखकर धर्म करते हैं तो ना तो हमारा धर्म बचता है ना ही धर्म करने वाला। इस प्रकार मुनि श्री कहते हैं कि हमें अपने भावों को शुद्ध रखना चाहिए तथा तीर्थंकर की देशना अर्थात जिनवाणी सुनकर दूसरों का नहीं, बल्कि निज का कल्याण करना चाहिए। मुनि श्री ने बताया कि महावीर की अहिंसा अत्यंत सूक्ष्म है। उसका इतनी आसानी से पालन नहीं किया जा सकता है।</p>
<p>धर्मसभा में रावतभाटा श्री समाज के पुरुष वर्ग,महिला वर्ग, बालक- बालिकाएं उपस्थित थे।</p>
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<p>&nbsp;</p>
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