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	<title>मुनिश्री सुधासागर &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>इस वर्ष भगवान महावीर जयंती 31 को नहीं 30 मार्च को : मुनिश्री सुधासागर एवं मुनि श्री प्रमाणसागर ने दिया मार्गदर्शन </title>
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		<pubDate>Fri, 27 Feb 2026 07:45:46 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी का जन्म कल्याणक महोत्सव प्रति वर्ष चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि को मनाया जाता है। इस वर्ष तिथि भ्रम की स्थिति के कारण सरकारी कैलेंडर में 31 मार्च की महावीर जयंती घोषित कर 31 मार्च को ही अवकाश घोषित किया गया। इस साल 30 [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी का जन्म कल्याणक महोत्सव प्रति वर्ष चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि को मनाया जाता है। इस वर्ष तिथि भ्रम की स्थिति के कारण सरकारी कैलेंडर में 31 मार्च की महावीर जयंती घोषित कर 31 मार्च को ही अवकाश घोषित किया गया। इस साल 30 मार्च को जयंती मनाई जाएगी। <span style="color: #ff0000">मुरैना से पढ़िए, मनोज जैन नायक की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>मुरैना।</strong> जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी का जन्म कल्याणक महोत्सव प्रति वर्ष चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि को मनाया जाता है। इस वर्ष तिथि भ्रम की स्थिति के कारण सरकारी कैलेंडर में 31 मार्च की महावीर जयंती घोषित कर 31 मार्च को ही अवकाश घोषित किया गया है, लेकिन जैन परंपराओं, जैन पंचांग एवं जैन कैलेंडरों के अनुसार महावीर जन्म कल्याणक महोत्सव सोमवार 30 मार्च को ही मनाया जाएगा। संपूर्ण विश्व में मनाया जाने वाला भगवान महावीर जन्म कल्याणक महोत्सव के संदर्भ में तिथि भ्रम के कारण महावीर भगवान के अनुयायियों में भ्रम की स्थिति बनी हुई है कि जन्म कल्याणक महोत्सव 30 को मनाया जाएगा या 31 मार्च को मनाया जाएगा।</p>
<p>भगवान महावीर स्वामी जन्म कल्याणक महोत्सव के संदर्भ में जिज्ञासा समाधान में पूछे गए सवाल पर मुनि पुंगव श्री सुधासागर जी महाराज ने तिथि भ्रम के संदर्भ में मार्गदर्शन देते हुए बताया कि इस वर्ष महावीर जयंती सोमवार 30 मार्च को मनाई जाएगी। भगवान महावीर स्वामी का जन्म चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि को हुआ था। यह तिथि इस वर्ष 30 मार्च को प्रातः 7 बजे से शुरू हो रही है और इसका समापन 31 मार्च को प्रातः 7 बजे के लगभग होगा। उसके बाद चौदस तिथि लग जाएगी। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार उदयातिथि मानी जाती है यानि कि सूर्याेदय के समय जो तिथि होती है, पूरे दिन वही तिथि मानी जाती है। इस मान से 30 मार्च को तेरस तिथि नहीं है। 31 मार्च को सूर्याेदय के समय तेरस है, लेकिन वह केवल सुबह 7 बजे तक है और महावीर कल्याणक के कार्यक्रम सुबह 7 बजे तक हो नहीं सकते, सभी आयोजन 7 बजे के बाद ही होना संभव होगा। 30 मार्च को सूर्याेदय के बाद प्रातः 7 बजे तेरस है और पूरे दिन रहेगी। इसलिए सोमवार 30 मार्च को ही भगवान महावीर स्वामी जन्म कल्याणक महोत्सव मनाया जाना चाहिए। मुनिश्री प्रमाणसागरजी महाराज ने भी बताया कि इस वर्ष तिथि भ्रम के कारण भगवान महावीर स्वामी जन्म कल्याणक के संदर्भ में संशय बना हुआ है। 31 मार्च को तेरस तिथि केवल प्रातः 7 बजे तक है, उसके बाद चौदस तिथि लग जाएगी लेकिन, सोमवार 30 मार्च को प्रातः 7 बजे से पूरे दिन तेरस तिथि विद्यमान रहेगी। इसलिए हम सभी को एक जुटता के साथ जैन परम्पराओं, जैन ज्योतिष एवं जैन कैलेंडर के अनुसार संपूर्ण विश्व में भगवान महावीर जन्मकल्याणक महोत्सव 31 को न मनाकर सोमवार 30 मार्च को ही मनाया जाना चाहिए।</p>
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		<title>इस वर्ष भगवान महावीर जयंती 31 को नहीं 30 मार्च को : मुनिश्री सुधासागर एवं मुनि श्री प्रमाणसागर ने दिया मार्गदर्शन </title>
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		<pubDate>Mon, 23 Feb 2026 13:43:29 +0000</pubDate>
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<p><strong>जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी का जन्म कल्याणक महोत्सव प्रति वर्ष चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि को मनाया जाता है। इस वर्ष तिथि भ्रम की स्थिति के कारण सरकारी कैलेंडर में 31 मार्च की महावीर जयंती घोषित कर 31 मार्च को ही अवकाश घोषित किया गया। इस साल 30 मार्च को जयंती मनाई जाएगी। <span style="color: #ff0000">मुरैना से पढ़िए, मनोज जैन नायक की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>मुरैना।</strong> जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी का जन्म कल्याणक महोत्सव प्रति वर्ष चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि को मनाया जाता है। इस वर्ष तिथि भ्रम की स्थिति के कारण सरकारी कैलेंडर में 31 मार्च की महावीर जयंती घोषित कर 31 मार्च को ही अवकाश घोषित किया गया है, लेकिन जैन परंपराओं, जैन पंचांग एवं जैन कैलेंडरों के अनुसार महावीर जन्म कल्याणक महोत्सव सोमवार 30 मार्च को ही मनाया जाएगा। संपूर्ण विश्व में मनाया जाने वाला भगवान महावीर जन्म कल्याणक महोत्सव के संदर्भ में तिथि भ्रम के कारण महावीर भगवान के अनुयायियों में भ्रम की स्थिति बनी हुई है कि जन्म कल्याणक महोत्सव 30 को मनाया जाएगा या 31 मार्च को मनाया जाएगा।</p>
<p>भगवान महावीर स्वामी जन्म कल्याणक महोत्सव के संदर्भ में जिज्ञासा समाधान में पूछे गए सवाल पर मुनि पुंगव श्री सुधासागर जी महाराज ने तिथि भ्रम के संदर्भ में मार्गदर्शन देते हुए बताया कि इस वर्ष महावीर जयंती सोमवार 30 मार्च को मनाई जाएगी। भगवान महावीर स्वामी का जन्म चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि को हुआ था। यह तिथि इस वर्ष 30 मार्च को प्रातः 7 बजे से शुरू हो रही है और इसका समापन 31 मार्च को प्रातः 7 बजे के लगभग होगा। उसके बाद चौदस तिथि लग जाएगी। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार उदयातिथि मानी जाती है यानि कि सूर्याेदय के समय जो तिथि होती है, पूरे दिन वही तिथि मानी जाती है। इस मान से 30 मार्च को तेरस तिथि नहीं है। 31 मार्च को सूर्याेदय के समय तेरस है, लेकिन वह केवल सुबह 7 बजे तक है और महावीर कल्याणक के कार्यक्रम सुबह 7 बजे तक हो नहीं सकते, सभी आयोजन 7 बजे के बाद ही होना संभव होगा। 30 मार्च को सूर्याेदय के बाद प्रातः 7 बजे तेरस है और पूरे दिन रहेगी। इसलिए सोमवार 30 मार्च को ही भगवान महावीर स्वामी जन्म कल्याणक महोत्सव मनाया जाना चाहिए। मुनिश्री प्रमाणसागरजी महाराज ने भी बताया कि इस वर्ष तिथि भ्रम के कारण भगवान महावीर स्वामी जन्म कल्याणक के संदर्भ में संशय बना हुआ है। 31 मार्च को तेरस तिथि केवल प्रातः 7 बजे तक है, उसके बाद चौदस तिथि लग जाएगी लेकिन, सोमवार 30 मार्च को प्रातः 7 बजे से पूरे दिन तेरस तिथि विद्यमान रहेगी। इसलिए हम सभी को एक जुटता के साथ जैन परम्पराओं, जैन ज्योतिष एवं जैन कैलेंडर के अनुसार संपूर्ण विश्व में भगवान महावीर जन्मकल्याणक महोत्सव 31 को न मनाकर सोमवार 30 मार्च को ही मनाया जाना चाहिए।</p>
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		<title>सौ गुण एक दुर्गुण ढांक देगा : निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी के प्रवचन से मिल रही श्रद्धालुओं को आत्मिक ऊर्जा </title>
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		<pubDate>Mon, 28 Apr 2025 17:03:04 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[मुनि श्री सुधासागर जी के प्रवचन में सामंजस्य, समानता, सुधारवाद आदि के बारे में श्रद्धालुओं ज्ञान मिला। सोमवार को मुनि श्री ने गोसलपुर में इन्हीं बातों का जिक्र कर मार्गदर्शन प्रदान किया। गोसलपुर से पढ़िए, राजीव सिंघई की यह खबर&#8230; गोसलपुर (मप्र)। मुनि श्री सुधासागर जी ने सोमवार को अपने प्रवचन में कहा कि समाजवाद, [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>मुनि श्री सुधासागर जी के प्रवचन में सामंजस्य, समानता, सुधारवाद आदि के बारे में श्रद्धालुओं ज्ञान मिला। सोमवार को मुनि श्री ने गोसलपुर में इन्हीं बातों का जिक्र कर मार्गदर्शन प्रदान किया। <span style="color: #ff0000">गोसलपुर से पढ़िए, राजीव सिंघई की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>गोसलपुर (मप्र)।</strong> मुनि श्री सुधासागर जी ने सोमवार को अपने प्रवचन में कहा कि समाजवाद, प्रजातंत्र, सामान्य दृष्टि, एक रुपता, ये सारे के सारे जितने व्यवहार में सुनने में अच्छे लगते है लेकिन, उपलब्धि में कुछ भी काम मे नहीं आता। यदि सामांजस्य या समानता रखना है तो हमसे जो बड़े है उनकी समानता करने का प्रयास करें। आज के सुधारवादी का सिद्धान्त है कि वे अमीरों की आलोचना करते हैं कि तुम गरीबों की मैचिंग करो। पुण्यहीनों को लेकर चलो, पुण्यहीनों को झुककर चलो, ये जो सिद्धान्त है सुधारवादियों का, यह स्व पर घाती है, इसे जैन दर्शन ने अच्छा नहीं कहा। पीछे चलने वाले के अनुसार यदि हमें अपनी गति मंद करनी पड़े तो पीछे वाले को तो शाम हो ही जाएगी। जो आगे वाला दिन में पहुंचने वाला था उसको भी रात हो जाएगी। पूज्य कुन्दकुन्द स्वामी ने प्रवचनसार ग्रंथ में अष्टपाहुड में कहा कि तुम शिथिलाचारी साधु को देखकर शिथिलाचार का साथ मत दे देना, गुणहीन की संगति मत करना, गुणहीन मत हो जाना। यहाँ तक कहा जो गुणहीन की संगति करता है, वो गुणवान होकर भी गुणहीन कहलाता है। दूध भी यदि शराब की दुकान पर खड़े होकर पियोगे तो बदनामी ही होनी है। तुम कितने पवित्र, पावन बनें रहो, यदि पुण्यहीन, पापी, शिथिलाचारी की संगति में रहोगे तो आप पर लांछन आएगा ही, आपका साथी गलत है तो लोग आपको भी गलत समझेंगे, इसलिए कितने शक्तिमान, ज्ञानवान बन जाओ, हमेशा संगति गुणहीन की नहीं करना।</p>
<p><strong>राग में इतने अंधे मत हो कि विवेक खो दो</strong></p>
<p>एक व्यक्ति को इज्जत बनाने के लिए सारी जिंदगी लग जाये लेकिन, इज्जत बिगाड़ने के लिए एक सेकेंड काफी होता है। सौ गुण एक दुर्गुण ढांक देगा। अच्छाई में इतनी ताकत नहीं है कि वो बुराई को ढांक दे। गुण में इतनी ताकत नहीं है कि वह अवगुणों को ढांक दे लेकिन बुराईयों में जरूर इतनी ताकत है कि वे तुम्हारी अच्छाईयों को ढांक सकती है। राग में इतने अंधे मत हो जाओ कि तुम विवेक खो दो और स्वयं का जीवन खत्म कर दो।</p>
<p><strong>एक पाप करता है, दूसरा पापी हो जाता है</strong></p>
<p>बस यही से धर्म की शुरुआत होती है कि जब लोग राग में इतने डूब जाते है कि सामने वाले को डूबता देखकर स्वयं डूब जाते है, एक पाप करता है, दूसरा पापी हो जाता है। एक झगड़ा करता है तो उसके बदले में दूसरा भी झगड़ा करने लग जाता है और तुम लोग उस झगड़े के पक्ष में खड़े हो जाते हो। आपका बेटा झगड़ा करके आया है और सामने वाला उस पर आरोप लगाने आये तो तुम बेटे के पक्ष में खड़े हो जाओगे, ये भी जानने की चेष्टा नहीं करोगे कि आखिर गलती है किसकी, तुम्हे तो मोह जागेगा, बस यही तुम्हारी बहुत बड़ी मूर्खता है।</p>
<p><strong>50% घर उजड़ने से बच जाएंगे</strong></p>
<p>जो माता-पिता अपनी बिटिया के पक्ष में, मोह में इतने अंधे हो जाते है कि बिटिया की गलती या स्वरूप को जाने बिना बिटिया के मोह में जाकर ससुराल वालों को भला बुरा कहते है। उस बिटिया की जिंदगी बर्बाद हो जाती है, वो बिटिया तुम्हारे गले पड़ जाती है, वो डायवोर्स दे देते है। 90% दाम्पत्य जीवन आपकी बहु के पीहर वाले तोड़ते है। यदि उसी समय माँ- बाप कह दे, नहीं गलती तेरी है, तो 50% झगड़े वही खत्म हो जाएंगे। सुसराल वाले कहेंगे मत डाँटो बिटिया को, ये मेरी बहु है, हो गयी होगी गलती, कोई बात नहीं। 50% घर उजड़ने से बच जाएंगे, हर व्यक्ति अपनों को डांटे, उधर ससुराल पक्ष का ससुर बहु को न डांटे, अपने बेटे को झापड़ लगाए।</p>
<p><strong>तीर्थंकर या गणधर बन जाओगे</strong></p>
<p>माहौल जितना कषाय में बढ़ रहा था, उतना ही प्रेम में बदल जाएगा। परायों को डाँटोंगे तो कषायें बढ़ेगी। जब भी तुमसे या किसी से गलती हो जाये, हमारी गलती है या अपनों की गलती है बस। दूसरे की या दूसरों की गलती हो ही नहीं सकती। ऐसे दुश्मन जो बन रहे हो न, तीर्थंकर या गणधर बन जाओगे। जब जब तुम्हें अपने आप को अपराधी घोषित करने का या सजा मांगने का भाव आवे, समझ लेना तुम बहुत महान हो, बहुत जल्दी भगवान बनने वाले हो। मेरी गलती, मुझे प्रायश्चित मिलें, समझ लेना अच्छे दिन शुरू होने वाले है। यदि तुम्हारी गलती है तो सीधे स्वीकार करों कि मुझे सजा दी जाये और यदि तुम्हारी गलती नहीं है फिर भी गलती सामने खड़े हो जाते हो, उसके बाबजूद भी तुम्हारे अच्छे दिन शुरू हो जायेंगे, इसी का नाम है सतयुग, इसी का नाम है स्वर्ग, इसी का नाम है मोक्ष सांसारिक दृष्टि से</p>
<p><strong>गुणहीन से सामंजस्य नहीं</strong></p>
<p>पति रात में खा रहा है तो तुम भी रात में खाने लग जाओं, उसकी मजबूरी हो सकती है, मात्र राग से, ये रात में खाते है तो मुझे भी रात में खाना पड़ेगा, ये है मिथ्यात्व, ये है तुम्हारी मूर्खता कि वो पाप कर रहा है तो तुम भी पाप में लिप्त हो जाओ। वहाँ तुम कह देना- सब में एक हूँ लेकिन, धर्म मे, गलत कार्य में एक नहीं हो सकती। जब जब हम दूसरे को नहीं तार सकते हैं तो स्वयं तरने का प्रयास करो, हम दूसरे को धर्म मार्ग पर नहीं लगा सकते हैं तो स्वयं धर्ममार्ग को छोड़ने का प्रयास मत करो। पुण्यहीन, गुणहीन से सामंजस्य नहीं।</p>
<p><strong>कमजोर पर दया जरूर करना</strong></p>
<p>कमजोर से दोस्ती मत करना, कमजोर पर दया जरूर करना। जो धन में, ज्ञान में, चारित्र में, इज्जत में, आचार विचार में बराबर हो तो दोस्ती उससे करना। रिश्तेदार उससे बनाना जो तुम्हारी बराबरी का हो, दोनों का कुल एक हो, जाति, धर्म, आचार विचार, भगवान, गुरु, णमोकार मंत्र एक हो, जाओ मैं आशीर्वाद देता हूँ, तुम्हारा संबंध खुश रहे।</p>
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		<title>नमोस्तु पर भरोसा करना हमारी सबसे बड़ी सिद्धि : मुनिश्री सुधासागर जी की धर्मसभ में ज्ञान और कर्म की सीख </title>
		<link>https://www.shreephaljainnews.com/believing_lin_namoastu_is_our_greatest_achievement/</link>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 14 Apr 2025 08:48:49 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[मुनि सुधासागर जी महाराज बहोरीबंद अतिशय क्षेत्र में धर्मसभा को संबोधित कर रहे हैं। उन्होंने कर्म, ज्ञान और धर्म की राह पर चलने का संदेश दिया। बहोरीबंद से पढ़िए राजीव सिंघई की यह खबर&#8230; बहोरीबंद। मुनि श्री सुधासागर जी ने बहोरीबंद अतिशय क्षेत्र में विराजित होकर धर्मसभा में कहा कि नियत धारा में हमें नहीं [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>मुनि सुधासागर जी महाराज बहोरीबंद अतिशय क्षेत्र में धर्मसभा को संबोधित कर रहे हैं। उन्होंने कर्म, ज्ञान और धर्म की राह पर चलने का संदेश दिया। <span style="color: #ff0000">बहोरीबंद से पढ़िए राजीव सिंघई की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>बहोरीबंद</strong>। मुनि श्री सुधासागर जी ने बहोरीबंद अतिशय क्षेत्र में विराजित होकर धर्मसभा में कहा कि नियत धारा में हमें नहीं बहना है। हमारी खुद की जिंदगी को हमें नियत करना है क्योंकि हम कर्म चेतना वाले है, हम अवचेतन दशा में नहीं है, आज वह ऐसी कर्म चेतना अपने जीवन को ज्ञान चेतना की तरफ ले जाएगी, जहाँ पर करने को कुछ नहीं होगा। नियत उस समय के लिए है, जब कार्य पूरा हो जाये, जब पुरुषार्थ थक जाये। नियत सामने आना चाहिए लेकिन नियत का अर्थ है कि जब हमारे सारे पुरुषार्थ थक जाए, जब हमारे परिणाम आकुल व्याकुल हो जाए, जब हम किंकिर्तव्यविमूढ़ हो जायें, उस समय नियतवाद शान्ति के लिए कहना पड़ता है कि ऐसा ही होना था, ऐसा हो गया, ये मात्र मरहम पट्टी है, सिद्धान्त नहीं। नियत्ता इस दुनिया का कोई नहीं है, भगवान के हाथ मे भी दुनिया मे कुछ भी नहीं है, वे किसी चीज को नियत नहीं कर पाते, इसलिए जैनाचार्यो ने एक खोज की- कर्म चेतना की।</p>
<p><strong>हमारी तुम्हारी जिंदगी कर्म चेतना पर आश्रित है</strong></p>
<p>कर्मफल चेतना ज्यादा कठिन नहीं है, कोई पुरुषार्थ नहीं करना, आप कुछ भी नहीं करेंगे तो भी कर्म आपको फल देगा। ज्ञान चेतना में जीने वाले लोग सिद्धालय में बैठे हैं, उनकों कुछ नहीं। हमारी तुम्हारी जिंदगी कर्म चेतना पर आश्रित है, कर्म चेतना कभी नियत नहीं होती। कर्म चेतना कभी किस्मत का आलंबन नहीं लेती, किस्मत कर्म चेतना वाले का आलंबन लेती है। कर्म चेतना वाला निमित्त के अनुसार नहीं चलता, निमित्त को अपने अनुसार चलाता है। किस्मत के अनुसार अपनी जिंदगी नहीं ढालता, किस्मत को अपने अनुसार बनाता है। दो प्रकार की स्थितियाँ जीते हैं लोग- एक निमित्त के आधीन होकर या निमित्त की कठपुतली बनकर जीते है लोग, वो कर्म भी हो सकता है, नौ कर्म भी। अच्छा निमित्त मिले तो आप अच्छे हो जाते हैं और बुरा निमित्त मिले तो बुरे।</p>
<p><strong>दुनिया की कोई ताकत तुम्हारा अमंगल नहीं कर सकती</strong></p>
<p>जब जब हमें फीलिंग हो कि हमारा कर्म ठीक नहीं है, हमें कर्म के अनुसार जिंदगी जीना पड़ रही है, समझ लेना आप औदायिक भाव में चले गए, आपकी जिंदगी का सबसे बड़ा अपशगुन है ये। तुम बहुत कार्य करने में समर्थ हो लेकिन जैसे ही तुम्हारे मन में ये भाव आ जाए कि होना तो वही है जो निश्चित है, समझ लेना उस समय तुम्हारी शक्ति इतनी क्षय हो जाती है, जैसी किसी गाड़ी में से हवा निकल जाती है। होगा तो वही जो निश्चित है, किसी भी कार्य को करते समय ये परिणाम अपनी जिंदगी में मत आने देना। बस इतना सा भाव कार्य करते समय आ जाए कि वही होगा मैं जो करना चाहता हूँ, वही जियूँगा जो मैं आज जीना चाहता हूँ, वही सोचूँगा जो मैं आज सोचना चाहता हूँ, वही देखूँगा जो मैं आज देखना चाहता हूँ, यदि प्रथम क्षण में कार्य करते समय तुम्हारे अंदर ये परिणाम आ जाये, जाओ दुनिया की कोई ताकत तुम्हारा अमंगल नहीं कर सकती।</p>
<p><strong>कांटों को कुचलते हुए चले जाओगे</strong></p>
<p>तुमने खुद अपना मंगलाचरण कर लिया। उस प्रथम क्षण को पकड़ना, चाहे व्यापार करना, चाहे सुबह उठना। कभी सुबह उठते ही समय एकदम पहला क्षण आज वही जिंदगी होगी जो मैं जीना चाहता हूँ। आप देखना पग पग पर तुम बढ़ते जाओगे, अंधेरा दूर होता जाएगा। तुम कांटों को कुचलते हुए चले जाओगे, कोई कांटा तुम्हें रोक नहीं पाएगा क्योंकि तुम्हारी जिंदगी का सबसे बड़ा शगुन- कर्म चेतना का अर्थात अंदर से सहज भाव, हमारे पुरुषार्थ से नहीं।</p>
<p><strong>ये नमोस्तु है कर्म चेतना</strong></p>
<p>भगवान पर भरोसा करना हमारा सबसे बड़ा अमंगल है और नमोस्तु पर भरोसा करना हमारी सबसे बड़ी सिद्धि है। पूज्य समन्तभद्र महाराज को भगवान पर भरोसा नहीं था, भगवान पर भरोसा होता तो सात भगवान की स्तुति कर चुके, एक भगवान नहीं आए। तब समन्तभद्र भगवान ने जैसे ही चन्द्रप्रभ भगवान की स्तुति करते हुए नमोस्तु किया, वो पाषाण फटा और चन्द्रप्रभ भगवान प्रकट हो गए, ये नमोस्तु है कर्म चेतना। भगवान व किस्मत के भरोसे बैठना, अपने जीवन का नाश करना है, तुम्हें अपने नमोस्तु पर कितना विश्वास है, यदि तुम्हारा नमोस्तु चोखा है तो झुकाओ, मस्तक तुम जो चाहोगे, वही होगा। तुम्हारा काम नहीं हो रहा है इसका अर्थ है तुम्हारा नमोस्तु खोटा है।</p>
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		<title>दान देने का अर्थ है तुम्हें अमीर बनने की सिद्धि करानाः मुनिश्री सुधासागर जी के प्रवचनों से बढ़ रही धर्म प्रभावना  </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 28 Jan 2025 09:55:22 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज इन दिनों कटनी की ओर विहार कर रहे हैं। वे जहां भी विश्राम करते हैं वहां धर्मसभा को संबोधित अवश्य करते हैं। उनके प्रवचनों में जीवन-दर्शन के साथ जैन दर्शन का समावेश होता है। उनके प्रबोधन सुनकर धर्मावलंबी जैन समाज पुण्य अर्जित कर धर्म प्रभावना का लाभ लेते हैं। [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज इन दिनों कटनी की ओर विहार कर रहे हैं। वे जहां भी विश्राम करते हैं वहां धर्मसभा को संबोधित अवश्य करते हैं। उनके प्रवचनों में जीवन-दर्शन के साथ जैन दर्शन का समावेश होता है। उनके प्रबोधन सुनकर धर्मावलंबी जैन समाज पुण्य अर्जित कर धर्म प्रभावना का लाभ लेते हैं। <span style="color: #ff0000">पढ़िए सागर से राजीव सिंघई की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>सागर।</strong> मुनिश्री सुधासागर जी महाराज धर्म सभा को संबोधित करते हुए कहते हैं कि लोग सोचते हैं कि समय बदलता है और समय बदलता है तो सबकुछ बदल जाता है। ऐसी लोगों की धारणा है लेकिन, जब शास्त्रों में देखा कि समय काल द्रव्य की परिणति है वह कभी बदलता ही नहीं है, वह तो मात्र गतिशील है। समय एक शुद्ध काल द्रव्य है। शुद्ध में कभी परिवर्तन नहीं होता, एक समान रूप से उत्पाद, व्यय होता रहता है, हीनाधिक कभी नहीं होता। कभी अच्छा समय, कभी बुरा समय, कभी खाने का समय, कभी उठने का समय, कभी सोने का समय, कभी प्रवचन का समय, ये जो समय के आरोप हैं, ये हमारे मन को बहुत हतोत्साहित करते हैं और व्यक्ति वहां किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाता है कि मेरा समय अच्छा क्यों नहीं आ रहा है और व्यक्ति ये सोच नहीं पाता कि समय कभी अच्छाऋबुरा होता ही नहीं है।</p>
<p><strong>जितनी बाधाएं हैं सब अंदर की बाधाएं हैं</strong></p>
<p>घड़ी के पूरे 12 घंटों में कोई भी नंबर, अशुभ नहीं है और कोई भी घंटा शुभ नहीं है। वो तो घड़ी गतिमान होती है, चलती रहती है, शुभ-अशुभ की कल्पनाएं शुद्ध द्रव्यों में नहीं होती। व्यक्ति स्वयं गलती करता है तो अब ये गलती किसपे थोपूं तो लोग कहते हैं कि मेरा अच्छा समय नहीं चल रहा है या कोई ऊपरी बाधा है। बंधुओं न समय की बाधा है, न ऊपर की बाधा है, जितनी बाधाएं हैं सब अंदर की बाधाएं हैं। जब-जब अपनी जिंदगी में यह बात आती है कि समय अच्छा नहीं है।</p>
<p><strong>दोनों द्रव्य बिगड़ जाए तो नरकों की सैर करा दें</strong></p>
<p>समय आएगा तो सब कुछ ठीक हो जाएगा। उन व्यक्तियों का कभी अच्छा समय नहीं आना क्योंकि, समय में अच्छे बुरे की कल्पना है ही नहीं। मात्र दो द्रव्यों में अच्छे बुरे की कल्पना होती है जीव और पुद्गल, यही स्वभाव और विभाव में परिणमन करते हैं। दोनों द्रव्य यदि मिल जाए तो सारे जन्नत की सैर करा दें और दोनों द्रव्य बिगड़ जाए तो नरकों की सैर करा दें।</p>
<p><strong>कभी पुद्गल से बैर नहीं करना</strong></p>
<p>जितना भी तुम्हारा कभी कोई कुछ बिगाड़ेगा तो पुद्गल द्रव्य बिगाड़ेगा और पुद्गल को भी बिगड़ेगा तो कोई न कोई जीव द्रव्य बिगाडे़गा। जीव ही पुद्गल की दुर्दशा करता है फिर पुद्गल भी बदला लेता है कि तूने मुझे सताया है तो मैं तुझे सुखी नहीं रहने दूंगा। इसलिए हमें विचार करना है कि संसार में रहना है तो कभी पुद्गल से बैर नहीं करना क्योंकि, पुद्गल बहुत खतरनाक होता है वह जड़ है, इसलिए जब व्रत दिया गया 12 व्रतों में तो परिग्रह परिमाण व्रत दिया गया। परिग्रह परिमाण व्रत में सबसे ज्यादा वस्तुएं पुद्गल हैं।</p>
<p><strong>सज्जनों से पहले दुर्जनों की पूजा किया करो</strong></p>
<p>अचेतन का परिमाण करो, अचेतन का अनर्थदंड मत करो अन्यथा ये अचेतन हमारे लिए असाता कर्म के रूप में आकर हमें दुःखी करता है, इसलिए वास्तु में कहा तुम पुद्गल का मात्र उपभोग ही मत करना, पुद्गल को मात्र अपने जीवन की उपयोगिता की वस्तु मत बनाना। कुछ थोड़ा बहुत पुद्गलों को पूछते भी रहा करो और कहा है कि सज्जनों से पहले दुर्जनों की पूजा किया करो। मकान बनाते हो आप लोग तो पूरा मकान आपके उपयोग के लिए है लेकिन, वास्तु कहता है कि एक थोड़ा सा स्थान पूजा के लिए बना देना, जिससे पुद्गल नाराज न हो जाए अन्यथा यही मकान तुम्हें मिटा देगा।</p>
<p><strong>कोई भी सूत्र होते हैं, मल्टी पर्पज होते हैं</strong></p>
<p>वैष्णव दर्शन में तो सारे पुद्गलों को देवता का रूप दिया लेकिन, जैन दर्शन ने देवता का रूप तो नहीं दिया। बार-बार कहा कि पुद्गल का अनादर नहीं करना। दूसरे रूप में उन्होंने कहा कि तुम जल का उपयोग करते हो, जल तुम्हें बर्बाद कर देगा क्योंकि, जल कहता है कि मैं शुद्ध था और तुमने मुझे उपयोग करके गंदा कर दिया। इसलिए जैन दर्शन ने दूसरा निकाला कि यदि तुम जल का उपयोग करते हो तो जल को नाराज मत करना नहीं तुझे यह जल तुम्हें बूंद-बंद पानी को तरसा देगा तो फिर क्या करें, तुम जल का उपयोग करके गंदा बनाते हो। 24 घंटे में जल को थोड़ा सा गंधोदक बना दिया करो। अग्नि का तुम उपयोग करते हो, कहीं यह अग्नि तुम्हे अभिशाप न दे दे। इसलिए पूजा में थोड़ा सा दीप जला दिया करो। इसी प्रकार से तुम वनस्पति का प्रयोग करते हो। उसके बिना जी नहीं सकते, थोड़ा मुट्ठी भर चावल अर्घ्य का चढ़ा दिया करो। पूरी पृथ्वी का उपयोग करते हो, मकान बनाते हो, पैरों से रौंदते हो तो भारतीय दर्शन कहते हैं कि अपने गांव के छोटे से पृथ्वी के टुकड़े पर मंदिर बना दिया करो। कोई भी सूत्र होते हैं, मल्टी पर्पज होते हैं।</p>
<p><strong>नैतिकता रहित व्यक्ति से संसार बिगड़ जाता है</strong></p>
<p>किसी भी वस्तु के दो पहलू सोचना चाहिए-एक सिद्धांतिक और एक नैतिक। सैद्धांतिक तो अपन सबको मालूम है कि परंपरा से मोक्ष के कारण है लेकिन, एक नैतिक होता है। मैं नैतिक संबंधों की बात कर रहा हूं कि पृथ्वी या जल के साथ तुम्हारा नैतिक संबंध अच्छा है या बुरा। नैतिक संबंध का अर्थ होता है कि कोई हमारे काम आया है तो हमें भी उसके काम आना चाहिए। किसी ने हमारे जीवन में सुख दिया है तो हम भी उसके लिए सुख दें। किसी ने हमारे लिए ऊंचाइयां दी हैं तो हम भी किसी के रूप में उसके लिए ऊंचाइयां देंगे। यदि नैतिकता से व्यक्ति रहित हो जाता है तो संसार बिगड़ जाता है और सिद्धांत से रहित हो जाता है तो परमार्थ बिगड़ जाता है। दान देने का अर्थ यह नहीं है कि तुम्हारा पैसा खर्च कराना, दान देने का अर्थ है कि तुम्हें अमीर बनने की सिद्धि कराना। दान को शास्त्रों में कभी खर्चे में नहीं लिया, बीज में लिया। धर्म का कार्य कभी भी भार मानकर नहीं, सौभाग्य मानकर करना।</p>
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		<title>जिंदगी की शाम होने से पहले हमें थैंक्स कहना: मुनिश्री सुधासागर जी ने नए साल के प्र्र्र्र्र्र्रथम दिवस पर प्रवचन के माध्यम से किया उपदेशित </title>
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		<pubDate>Thu, 02 Jan 2025 12:50:56 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[सागर में विराजित मुनिश्री सुधासागर जी महाराज ने नए साल के प्रथम दिन स्थानीय दिगंबर जैन जिनालय में उपस्थित जैन समाज के गुरु भक्तों को संबोधित करते हुए जीवन के कई सूत्रों के बारे में बताया। उन्होंने अपने प्रवचनों के माध्यम से समय का सदुपयोग और जीवन को संयमपूर्ण जीने की कलाओं के बारे में [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>सागर में विराजित मुनिश्री सुधासागर जी महाराज ने नए साल के प्रथम दिन स्थानीय दिगंबर जैन जिनालय में उपस्थित जैन समाज के गुरु भक्तों को संबोधित करते हुए जीवन के कई सूत्रों के बारे में बताया। उन्होंने अपने प्रवचनों के माध्यम से समय का सदुपयोग और जीवन को संयमपूर्ण जीने की कलाओं के बारे में बताया। <span style="color: #ff0000">पढ़िए सागर से राजीव सिंघई मोनू की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>सागर।</strong> व्यक्ति सुबह उठता है, अधूरा रहता है, कुछ करने का मन रहता है लेकिन, दिन भर में कुछ ऐसा करना चाहिए कि शाम होने के पहले उसको अनुभव में आ जाए कि मैं पूर्ण हो गया हूं। मैंने जो सोचा था वह सब कुछ मैंने कर लिया और उसका अंत समय विश्राम दिशा में होना चाहिए। महीना खत्म होने के पहले हमें एक दिन पहले से ही अपने माह की पूर्णता का अनुभव होना चाहिए। इस माह में जो सोचा था वह सब कुछ हो गया। ऐसे ही ये वर्ष खत्म होने से पहले हमें अपने आप में पूर्णता का अनुभव करना है और 31 तारीख सुरक्षित रखना है। जितने कार्य हुए दूसरों ने हम पर उपकार किए, उनको हमें थैंक्स कहना है। हमें अपनी जिंदगी को थैंक्स कहना है कि हे जिंदगी! हे आयु! हे कर्म! तुझे बहुत-बहुत शुक्रिया, जो तूने मुझे 1 साल पूर्ण करने का मौका दिया।</p>
<p><strong>सबसे क्षमा मांगकर संबंध पूर्ण करें</strong></p>
<p>ऐसे ही जब जिंदगी की शाम हो, शाम होने के पहले हमें थैंक्स कहना है। शास्त्रों में है जिसे कहते हैं समाधि, सब कुछ क्षमा करके सबसे क्षमा मांग कर, सारे संबंधों को पूर्णता का रूप देकर मरना है। जो हमारी जिंदगी में आया वह भी अहो भाग्यशाली मान रहा है और मेरी जिंदगी में जो आया है, मैं भी भाग्यशाली हूं। कितनी उपकारी है प्रकृति, हर दिन के बाद रात करती है क्योंकि, दिन को फिर पुनः मुहूर्त करती है।</p>
<p><strong>प्रातःकाल नहीं होता तो मंगल बेला नहीं होती</strong></p>
<p>वहीं सूर्य तुम्हे मुहूर्त देने आया था, तुम कर पाए या नहीं कर पाए, रात भर प्रकृति अंधेरे में रहकर के उसी सूर्य को प्रातःकाल निकालकर के तुम्हें फिर मंगलाचरण का सौभाग्य देती है। यदि रात नहीं होती तो प्रातःकाल नहीं होता और प्रातःकाल नहीं होता तो मंगल बेला नहीं होती।</p>
<p><strong>बे-लिबास आए थे हम दुनिया में</strong></p>
<p>प्रकृति ने कितने मौके दिए हमें, 2024 तुम्हें पुराना लगने लगा। लो मैं नए साल के रूप में एक साल और देता हूं, तुम्हें अपनी जिंदगी बोर लगने लगी, लो मैं परिवर्तन करके पुनः एक नया जीवन देता हूं लेकिन, हम ऐसे कितने जीवन निकाल पाएंगे। कितनी बार हमें प्रकृति मौका देगी। बे-लिबास आए थे हम दुनिया में, एक कफ़न के लिए इतनी बड़ी जिंदगी निकाल दी। ये साल भी शुरुआत हुई है।</p>
<p><strong>सबका आशीर्वाद लेते हुए जन्मे थे</strong></p>
<p>इस बार कुछ ऐसा संकल्प करना है, कुछ ऐसा करने का मन बनाना है कि ये कह सके इसने दानव से इंसान बनने में जिंदगी गुजार दी। मैंने इंसान से भगवान बनने में जिंदगी गुजार दी। क्या कभी किया कि अपूज्य बनकर जन्मे थे, पूज्य बनकर मरोगे, सबसे छोटे बनकर जन्मे थे, सबसे बड़े होकर मरोगे, सबका आशीर्वाद लेते हुए जन्मे थे, सबको आशीर्वाद देते हुए मरोगे क्या यह तुम्हारी जिंदगी का सफर हुआ। हमेशा नारी की जिंदगी में ऐसी कोई स्थिति न आए, जहां असुरक्षित हो तो नारियों को हमेशा वहां दान देना चाहिए। जहां देव, शास्त्र और गुरु की सुरक्षा हो और वो काम महिलाओं को ही करना चाहिए। सुरक्षा दिवाली पुरुषों को नहीं महिलाओं को ही बनाना चाहिए। इसलिए कि जो तीर्थ की सुरक्षा करेंगे, उसकी जिंदगी भर सुरक्षा रहेगी।</p>
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		<title>जो व्यक्ति स्वयं की नजरों में गिर जाए, वो कभी उठ नहीं सकताः मुनिश्री सुधासागर जी महाराज ने समझाया समयसार का महत्व </title>
		<link>https://www.shreephaljainnews.com/munishree_sudhasagar_ji_maharaj_explained_the_importance_of_samaysaar/</link>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 30 Dec 2024 09:51:52 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[मुनिश्री सुधासागर जी महाराज अपने प्रवचनों में जैन समाज को हर दिन जीवन मूल्यों, कर्तव्यों और धर्म के प्रति सद्भावना रखने के संदेष दिए जा रहे हैं। सागर में विराचित मुनिश्री यहां हर रोज प्रवचनों के माध्यम से अपनी बात कह रहे हैं। इसका लाभ श्रद्धालुजन बहुत खूब ले रहे हैं। मुनिश्री ने रविवार को [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>मुनिश्री सुधासागर जी महाराज अपने प्रवचनों में जैन समाज को हर दिन जीवन मूल्यों, कर्तव्यों और धर्म के प्रति सद्भावना रखने के संदेष दिए जा रहे हैं। सागर में विराचित मुनिश्री यहां हर रोज प्रवचनों के माध्यम से अपनी बात कह रहे हैं। इसका लाभ श्रद्धालुजन बहुत खूब ले रहे हैं। मुनिश्री ने रविवार को श्रावकों को समयसार का महत्व समझाया। <span style="color: #ff0000">सागर से पढ़िए राजीव सिंघई यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>सागर।</strong> सबसे पहले व्यक्ति को अपना स्वयं का मूल्यांकन करना चाहिए कि मैं कितना मूल्यवान हूं। एक नीति है कि जो व्यक्ति दुनिया की नजरों में गिर जाए उसको उठाया जा सकता है लेकिन, जो व्यक्ति स्वयं की नजरों में गिर जाए वो कभी उठ नहीं सकता। ऐसा कोई कार्य नहीं करना है, जिससे तुम खुद अपनी नजरों में गिर जाओ, तुम खुद किसी से हाथ मिलाने या किसी के साथ बैठने लायक न रहो। मैं अब इस दुनिया में जीने लायक नहीं हूं, ऐसा परिणाम जिस कार्य को करने के बाद आए। सबसे पहले अपनी जिंदगी को ऐसा कार्य करने से बचाना। सोच लेना तुम अपनी जिंदगी में जो करने जा रहे हो, क्या वो करने के बाद तुम किसी के साथ आंख मिला सकोगे? मत करो धर्म से मोह लेकिन, स्वयं की जिंदगी से तो मोह करो। यह तुम तभी कर पाओगे जब तुम समझोगे कि तुम्हारी जिंदगी तुम्हारी दृष्टि में कितनी मूल्यवान है, इसी का नाम समयसार है।</p>
<p><strong>ज्ञान गुण ज्यादा ताकतवर है</strong></p>
<p>पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश, काल की शक्ति सबको एक तरफ रख दिया जाए और जीव द्रव्य की अकेले ज्ञान गुण को एक तरफ रख दिया तो ज्ञान गुण उससे भी ज्यादा ताकतवर है। अकेले एक गुण की बात कर रहे, अभी दर्शन गुण बाकी है। ज्ञान गुण ही हमारा जब प्रकट होता है तो ये सारा तीन लोक एक तारे के समान टिमटिमाता है। यानी ज्ञान इतना बड़ा है कि ऐसे तीन लोक अनंत आ जाए तो भी वह जानने में शक्ति रखता है, ऐसा अनमोल है मेरा ज्ञान, एक गुण अनमोल है।</p>
<p><strong>एक हिम्मत ही है- मैं अनमोल हूं</strong></p>
<p>समयसार पढ़ने का सबसे बड़ा फायदा है कि हमें अपनी खुद की जिंदगी अनमोल लगने लग जाती है। तुम अपनी संपदा का मूल्यांकन करके कहते हो कि हम लखपति, करोड़पति है और हमने समयसार पढ़ने के बाद जाना कि हम त्रिलोकपति हैं तभी तो समयसार पढ़ने वाला आध्यात्मी सब कुछ मिटा देता है लेकिन आत्मा को नहीं मिटने देता। मुनिराज कैसे उखाड़ देते है केशलोच, कैसे रह जाते हैं गर्मी के दिनों में एक टाइम भोजन पानी में, किस हिम्मत के बल पर अंतराय कर देते हैं, कुछ नही एक ही मात्र हिम्मत है- मैं अनमोल हूं। मैं दो रोटियों में अपनी आत्मा नहीं बेचूंगा।</p>
<p><strong>सावधानी जरूरी है&#8230;</strong></p>
<p>तुम्हारे घर में यदि चोर घुस जाए और बहुत सारे लोग हो तो तुम अच्छे से नींद लेना और हो सके तो खर्राटे लेना चालू कर देना, धन तो चला जाएगा लेकिन, जिंदगी बच जाएगी और यदि चाबी मांगने तुम्हें जगा ले तो तुरंत उसको चाबी बता देना, तू जिसके लिए आया है जा नहीं तो वह मारेगा, पीटेगा प्राण भी ले सकता है, वहां कोई तुम्हारी सुनने वाला नहीं है, तुम अकेले हो परिवार हो और वह खूंखार है।</p>
<p><strong>तुम्हारा पूजन है शुद्ध समयसार</strong></p>
<p>तुम्हारा जो पूजन है, शुद्ध समयसार है, बल्कि समयसार पढ़ना थ्योरी है ओर प्रैक्टिकल है। कहने में आ रहा है कि मैं भगवान के दर्शन कर रहा हूं सत्य ये है कि मैं अपनी आत्मा का दर्शन कर रहा हूं। आर्ष परंपरा वह दर्पण है, जिसमें तुम्हारे चेहरे के दाग दिखते हैं, जिनको अपने दाग बुरे लगते है वह दर्पण से दूर हट जाए, दर्पण तो दाग दिखायेगा, साधु वही है जो तुम्हारे चेहरे के दाग दिखायेगा। जब कोई तुम्हारे दोष निकाले तो तुम्हे ऐसा लगे कि मेरे अहोभाग्य है कि कम से कम इसने मेरी बुराई तो बताई ये ज्ञानी का लक्षण है, जाओ एक न एक दिन तुम्हारे दोष निकल जाएंगे और यदि लगे कि तुमने मेरे दोष क्यों निकाले, समझना अभी तुम्हारा संसार में बहुत भटकना है, यही तुम्हारे विनाश का कारण है।</p>
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		<title>पुण्य का उपभोग नहीं, उपयोग करना चाहिएः  मुनिश्री सुधासागर जी की सभा में बरस रहे अमृत वचन </title>
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		<pubDate>Sun, 29 Dec 2024 12:50:19 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[मुनिश्री सुधासागर जी इन दिनों सागर में अपने अमृत वचनों के सागर से श्रद्धालुओं को कृतार्थ कर रहे हैं। उनके प्रवचनों के सारत्व जानकर जैन समाज अपनी जीवन चर्या को श्रेष्ठ बनाने के लिए संकल्पित हो रहे हैं। पढ़िए सागर से राजीव सिंघई की यह खबर&#8230; सागर। निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज ने यहां [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>मुनिश्री सुधासागर जी इन दिनों सागर में अपने अमृत वचनों के सागर से श्रद्धालुओं को कृतार्थ कर रहे हैं। उनके प्रवचनों के सारत्व जानकर जैन समाज अपनी जीवन चर्या को श्रेष्ठ बनाने के लिए संकल्पित हो रहे हैं। <span style="color: #ff0000">पढ़िए सागर से राजीव सिंघई की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>सागर।</strong> निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज ने यहां धर्मसभा को संबोधित किया। उनके प्रवचन सुनने के लिए बड़ी संख्या में लोग धर्मसभा में जमा होते हैं। वे उनके प्रबोधन और प्रेरक वचनों से धर्म लाभ भी ले रहे हैं। मुनिश्री सुधासागर जी महाराज ने धर्मसभा में कहा कि जब व्यक्ति को स्वयं की शक्तियों का आभास हो जाता है तो उसको धीरे-धीरे स्वावलंबी होना चाहिए और जब हमारे पास शक्ति है तो हमें परावलंबी होने का विचार भी करना हमारी शक्तियों को नष्ट करता है। यदि हम अपनी शक्ति का उपयोग नहीं करेंगे तो वह शक्ति समाप्त हो जाती है।</p>
<p><strong>भोजन का अपमान न करें</strong><br />
आपके टिफिन में भोजन है और उसी समय आपको सामने वाला भी कह रहा है कि आइये भोजन कर लीजिए या तुम्हें भोजन मिल रहा है फ्री का या पैसे से तो इन दोनों में से कौन सा भोजन करने का मन तुम्हारा पहले होगा। बनाते समय तुमने संकल्प किया था कि मैं अपने भोजन करने के लिए बना रहा हूं और उसमें एनर्जी स्थापित हुई थी और तुमने उसका अपमान किया है। उस समय यह स्थिति बन जाएगी कि एक दिन तुम्हें भूख तो लगेगी लेकिन, भोजन नहीं होगा, पराया तो होगा ही नहीं क्योंकि, तुमने खा लिया और स्वयं का भी जो तुमने बचा लिया है, वह भी नकारात्मक हो जाएगा क्योंकि, तुमने पर वस्तु को ग्रहण करने का भाव किया।</p>
<p><strong>एक कदम बिना सहारे के चलो</strong><br />
अपनी शक्ति को पहचानों, हमें सोचने की, देखने की शक्ति मिली है,उस शक्ति का उपयोग करो। तुम्हारी जितनी ताकत है, एक कदम की ताकत है तो एक कदम बिना सहारे के चलो। हमारे लिए जितना देखने की ताकत है अपनी आंखों से देखो और जब हम अपनी शक्तियों का उपयोग करेंगे तो हमारी शक्ति बढ़ेगी। पुण्य का उपभोग नहीं, उपयोग करो। धन का उपभोग नहीं उपयोग करो, उपभोग में हम वस्तु का विनाश कर देते हैं और उपयोग में हम वस्तुओं का विकास कर देते हैं। जैसे-जैसे हम उपभोग की तरह बढ़ते जाएंगे, हमारी खुद की शक्तियां समाप्त हो जाएगी।</p>
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		<title>अच्छे कार्य में कभी ना मत बोलनाः मुनि श्री सुधासागर जी महाराज के प्रवचनों में मिलती है जीवन जीने की कला </title>
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		<pubDate>Tue, 24 Dec 2024 10:44:00 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[मुनिश्री सुधासागर जी महाराज सागर में विराजित हैं। उनके प्रवचन हजारों हजार लोगों को धर्म लाभ पहुंचा रहे हैं। रोज हो रहे प्रवचनों में ऐसी धर्म की प्रभावना बह रही है कि श्रद्धालुजन उससे सराबोर हो रहे हैं। मुनिश्री के प्रबोधनों को सुनकर सभी गदगद हो रहे हैं। पढ़िए सागर से राजीव सिंघई की यह [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>मुनिश्री सुधासागर जी महाराज सागर में विराजित हैं। उनके प्रवचन हजारों हजार लोगों को धर्म लाभ पहुंचा रहे हैं। रोज हो रहे प्रवचनों में ऐसी धर्म की प्रभावना बह रही है कि श्रद्धालुजन उससे सराबोर हो रहे हैं। मुनिश्री के प्रबोधनों को सुनकर सभी गदगद हो रहे हैं। <span style="color: #ff0000">पढ़िए सागर से राजीव सिंघई की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>सागर।</strong> निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज यहां विराजित होकर नित्य ही अपने प्रवचनों के माध्यम से धर्म की प्रभावना को बढ़ा रहे हैं। मुनिश्री के प्रेरक प्रवचनों को सुनने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालुजन उपस्थित हो रहे हैं और उनके प्रबोधन का धर्म लाभ ले रहे हैं। मुनिश्री ने अपने प्रवचन के दौरान कहा कि जो चीज सबकी होती है उस पर अपना कोई अधिकार नहीं होता और जो वस्तु सबकी होती है उसमें कोई आनंद नहीं आता। जैसे ये पृथ्वी किसकी है, सबकी है तो तुम्हें कोई आनंद नहीं आता लेकिन, एक छोटा सा भी प्लाट है तो उसमें भी आनंद आता है। सागर में पानी है लेकिन, तुम्हें आनंद अपने गिलास के पानी का है। प्रकाश आकाश में होता है लेकिन, जब तक तुम्हारे आंगन में न हो तो संसार को कभी हम अपना बना नहीं सकते और अपना बनाए बिना आनंद आ ही नहीं सकता क्योंकि, प्रकृति है जो कभी किसी की नहीं होती।</p>
<p><strong>सारी सृष्टि को पृथ्वी रूप मानकर चलना होगा</strong></p>
<p>तुम्हारे पास दो नंबर की कमाई से एक लाख रुपए आया है। वह तुम किसको देने का भाव करोगे। मां या पत्नी को, पत्नी को न, क्योंकि मां के चार बेटे हैं तो वह चारों बेटों में बराबर बांट देगी लाख रुपया। मां से झूठ बोलने की अपेक्षा भगवान से प्रार्थना करो कि भगवन मुझे लाख रुपए चोरी करने का भाव न आए, ऐसी ताकत दो कि मैं 4 लाख कमाकर मां को दूं, बस अपनी सोच को बदलना है। तुम भाव तो करो कि भगवान अभी ऐसी मजबूरी मत ला देना कि मैं अपनी मां से, अपने भाई से धोखा करूं और ससुराल में पैसा जमा करूं नहीं, मुझे इतनी शक्ति दो कि मैं अपनी जरूरत का भी कमाऊं, साथ में भाइयों को कमाकर दूं। व्यक्तिगत चाहिए है तुम्हंे, मैं सारी सृष्टि से तुम्हारा प्लाट दिलवाऊंगा लेकिन, सारी सृष्टि को पृथ्वी रूप मानकर चलना पड़ेगा।</p>
<p><strong>सदैव देने का भाव रखना चाहिए</strong></p>
<p>ऐसे ही धर्म क्षेत्र में करने का मन है, नहीं साहब, मैं नहीं कर पाऊंगा मेरी शक्ति नहीं है। तुम्हारे पास 5 लाख रुपए रखा है और कमेटी कह रही है कि ये 15 लाख का कार्य कर लो, तो आपको ये नहीं बोलना है कि मेरी कड़की चल रही है। अभी व्यवस्था नहीं हो पा रही है, ये शब्द प्रयोग मत करो क्योंकि कड़की होती तो 5 भी नहीं होता उस 5 को मत छुपाओ। यदि हमने 5 को छुपाकर कड़की बोल दिया तो हमने भगवान से, गुरु से, धर्म से धोखा कर दिया। स्पष्ट बोलो कि बस भगवन एक शक्ति दे दे कि 5 तो मुझे चाहिए ही, वह खर्च नहीं कर सकता, वो तो बचाकर रखे हैं, बस प्रभु 20 का इंतजाम हो जाए तो 5 मेरा ज्यो का त्यों बच जाए और 15 मंदिर में दे दूं और ये भावना है विकासवाद, ऐसा पॉजिटिव सोचेंगे तो 20 का भी रास्ता निकलेगा और जो कुछ भी दिख रहा है वो 20 तक पुण्य करने की ताकत बढ़ेगी, पुण्य बढ़ेगा।</p>
<p><strong>मिथ्यादर्शन खत्म होकर सम्यकदृष्टि की कोटि में आ जाएंगे</strong></p>
<p>अच्छे कार्य में न मत बोलना, ये मत बोलना कि मैं असमर्थ हूं, ये कहना कि करना तो है लेकिन, जिस दिन आ जाएगा उस दिन करुंगा। यदि तुम पहले से ही कट कर रहे हो तो फिर तुम्हारी नकारात्मक शक्ति बढ़ेगी, तुम बिल्कुल असमर्थ सही में होते जाओगे। संसार के किसी भी कार्य की तुम भावना मत करना कि मैं इतना भोजन करुं, भूख लगेगी तो खाऊंगा कोई आपत्ति नहीं, इतना मात्र करने से आप मिथ्यादर्शन खत्म हो के सम्यकदृष्टि की कोटि में आ जाओगे। भावना करने से आप एक दिन उस भावना को पूरी करने में समर्थ हो जाओगे।</p>
<p><strong>सकारात्मक सोच पुण्य कमाने का जरिया</strong></p>
<p>ऐसा नियम करो जब तक मेरे नहाने का लोटा उठता रहेगा, तब तक मैं अभिषेक का कलश उठाता रहूंगा, हो सकता है इस नियम से तुम सदा नहाने लायक बने रहोगे क्योंकि, तुम्हारा नियम है कि जब तक मैं नहाता रहूंगा तब तक मैं अभिषेक करता रहूंगा। जब तक मैं मुंह में रोटी का ग्रास देता रहूंगा, तब तक तेरा अर्घ्य भी चढ़ता रहेगा। शायद इस नियम से रोटी का ग्रास उठाने की ताकत बनी रहे। जब तक मैं दुकान जा रहा हूं। तब तक मैं मंदिर भी जाता रहूंगा, शायद इस बहाने पैरों में पैरालिसिस न हो। जब तक मैं संसार के लिए कमा रहा हूं तब तक मैं कुछ परमार्थ के लिए भी कमाता रहूं, जब तक मेरा धंधा चल रहा है तब तक मैं दान भी देता रहूंगा, शायद इस नियम से तुम्हारा धंधा चलता रहे, ये है पुण्य कमाने का तरीका।</p>
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		<title>मुनिश्री सुधासागर जी महाराज का पिच्छिका परिवर्तन समारोह रविवार कोः भव्य आयोजन के बीच होगा सागर में धर्म समागम </title>
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		<pubDate>Fri, 20 Dec 2024 10:38:40 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[सागर में विराजित मुनिश्री सुधासागर जी के यहां की जनता प्रवचनों का आनंद तो ले ही रही है। अब उनके संयम उत्सव की भी साक्षी बनेगी। रविवार को मुनिश्री ससंघ पिच्छिका परिवर्तन करेंगे। पढ़िए यह खबर&#8230; सागर। श्रमण संस्कृति के महामहिम समाधिष्ठ संत आचार्य विद्यासागर जी महामुनि राज के निर्यापक मुनिपुगंव श्री सुधासागर जी महाराज [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>सागर में विराजित मुनिश्री सुधासागर जी के यहां की जनता प्रवचनों का आनंद तो ले ही रही है। अब उनके संयम उत्सव की भी साक्षी बनेगी। रविवार को मुनिश्री ससंघ पिच्छिका परिवर्तन करेंगे। <span style="color: #ff0000">पढ़िए यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>सागर।</strong> श्रमण संस्कृति के महामहिम समाधिष्ठ संत आचार्य विद्यासागर जी महामुनि राज के निर्यापक मुनिपुगंव श्री सुधासागर जी महाराज का संयम महोत्सव का आगाज हो गया है। धर्म समाज प्रचारक राजेश जैन दद्दू ने बताया कि रविवार दोपहर</p>
<p>22 दिसंबर को मुनिश्री सुधासागर जी महाराज पिच्छिका परिवर्तन करेंगे। मुनि श्री सुधासागर जी का संसघ पिच्छिका परिवर्तन होगा।</p>
<p><strong>दोपहर 1 बजे से आरंभ होगा समारोह</strong></p>
<p>आचार्य श्री समयसागर जी महाराज के आज्ञानुवर्ती निर्यापक श्रमण मुनि श्री सुधासागर जी महाराज ससंघ का पिच्छिका परिवर्तन महोत्सव दोपहर 1 बजे से प्रारंभ होगा। सागर हृदयस्थल तीन बत्ती चौराहा पर संयम उपकरण का परिवर्तन महोत्सव के साक्षी बनने का सुअवसर है। आप सभी अवश्य पधारें। ‘नमोस्तु शासन जयवंत हो’</p>
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