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	<title>मुनिश्री विलोक सागर महाराज &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>पुण्य और पाप से ही संसार में होती है सुख दुख की प्राप्ति : मुनिश्री विलोकसागर जी के प्रवचनों में सुख दुःख पर चर्चा  </title>
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		<pubDate>Thu, 25 Sep 2025 04:31:13 +0000</pubDate>
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<p><strong>बड़े जैन मंदिर में धर्म सभा के दौरान मुनिश्री विलोक सागर महाराज ने कहा कि सांसारिक जीवन में सुख और दुख का चक्र घूमता रहता है। जब हमारे अच्छे कर्म उदय में आते हैं तो सुखों की अनुभूति होती है और जब बुरे कर्म उदय में आते हैं तब दुखों की अनुभूति होती है। <span style="color: #ff0000">मुरैना से पढ़िए, मनोज जैन नायक की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong> मुरैना।</strong> बड़े जैन मंदिर में धर्म सभा के दौरान मुनिश्री विलोक सागर महाराज ने कहा कि सांसारिक जीवन में सुख और दुख का चक्र घूमता रहता है। जब हमारे अच्छे कर्म उदय में आते हैं तो सुखों की अनुभूति होती है और जब बुरे कर्म उदय में आते हैं तब दुखों की अनुभूति होती है। पुण्य से अच्छे कर्म बनते हैं और पाप से बुरे कर्मों का बंध होता है। कहने का मतलब यह है कि अच्छे कार्यों को पुण्य और बुरे कार्यों को पाप कहा जाता है। जैन दर्शन के अनुसार, पुण्य अच्छे कर्मों को कहते हैं जो सुख लाते हैं और आत्मा को पवित्र करते हैं, जबकि पाप बुरे कर्मों को कहते हैं जो दुख का कारण बनते हैं और आत्मा को अपवित्र करते हैं। पापों में मुख्य रूप से पाँच अणुव्रत का उल्लंघन आता है, जैसे हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील और परिग्रह। पुण्य के लिए दान, सेवा और धर्म का पालन करना महत्वपूर्ण है। जैन धर्म का लक्ष्य मोक्ष प्राप्त करना है। जिसमें पुण्य और पाप दोनों से ऊपर उठना होता है, क्योंकि ये दोनों ही आत्मा को संसार चक्र में बाँधते हैं। पुण्य वह है जो आत्मा को पवित्र करता है और सुख का कारण बनता है। दूसरों की सहायता करना, दान देना, सेवा करना और धर्म के सिद्धांतों का पालन करना शामिल है । भूखे को अन्न देना, प्यासे को पानी पिलाना, जरूरतमंदों को वस्त्र देना, या सभी जीवों के लिए मंगल कामना करना, परोपकारी कार्य करना भी पुण्य ही कहलाता है। पाप आत्मा को अपवित्र करता है और दुख का कारण बनता है। जैन दर्शन में हिंसा करना, झूठ बोलना, चोरी करना, ब्रह्मचर्य का पालन न करना, आवश्यकता से अधिक संचय करना पाप की श्रेणी में आते हैं। पुण्य और पाप दोनों ही कर्म हैं जो आत्मा से बंधे होते हैं। जैन धर्म का अंतिम लक्ष्य मोक्ष प्राप्त करना है, जो संसार के जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति दिलाता है। पुण्य और पाप के फल को भोगने के बाद ही आत्मा मोक्ष तक पहुँच पाती है। पुण्य को आत्मा की शुद्धि का माध्यम माना जाता है, जिससे अंततः मोक्ष प्राप्त होता है।</p>
<p><strong>आपके एक-एक पल का हिसाब लिखा जा रहा है</strong></p>
<p>धर्मसभा में मुनिश्री विबोधसागर महाराज’ ने कहा कि सांसारिक प्राणी बहुत होशियार और चालाक है। जब वह पुण्य करता है तो समझता है कि भगवान सब देख रहे हैं, लेकिन जब पाप करता है तो वह समझता है कि भगवान तो है ही नहीं, कोई कुछ नहीं देख रहा लेकिन मनुष्य यही भूल करता है। संसार में आपके पुण्य और पाप के अनुसार ही आपको सुख दुख की अनुभूति होती है। ऊपर वाले के यहां आपके एक-एक पल का हिसाब लिखा जा रहा है, जो आपको चुकाना ही होगा। उसमें कोई और सम्मिलित नहीं होगा, सिर्फ आप ही चुकता करोंगे, आप ही भुगतेंगे। इस लिए हे भव्य आत्माओं, मनुष्य जन्म मिला है तो अच्छे कर्म करिए, बुरे कर्मों का त्याग करिए । अच्छा सोचिए, अच्छा करिए, आपका सब मंगल मंगल होगा । बुरा सोचेंगे, बुरा करोगे तो आपका भी अमंगल अमंगल ही होगा।</p>
<p><strong> शुक्रवार को होगी प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिता</strong></p>
<p>प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिता के संयोजक डॉक्टर मनोज जैन एवं विमल जैन बबलू द्वारा प्रदत्त जानकारी के अनुसार परम पूज्य मुनिश्री विलोकसागर जी महाराज एवं मुनिश्री विबोध सागर जी महाराज के पावन सान्निध्य में ज्ञान वर्धक पंच परमेष्ठी प्रतियोगिता का आयोजन 26 सितंबर शुक्रवार को शाम 6 बजे से पंचायती बड़ा जैन मंदिर मुरैना में किया जा रहा है। इस प्रतियोगिता का रिजल्ट एवं पुरस्कार वितरण कार्यक्रम 6 अक्टूबर 2025 शाम 6रू00 बजे से बड़े जैन मंदिर जी में होगा। इस प्रतियोगिता में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले सभी प्रतियोगियों को पुण्यार्जक परिवार यतीन्द्रकुमार संजय रेखा जैन श्रीमती रेखा जैन नगर पालिका परिवार एवं लख्मीचंद लालजी राम जैन बामोर के सौजन्यवसे सम्मानित किया जाएगा। प्रश्नोत्तरी प्रदाता पुण्यार्जक परिवार मुन्नीदेवी, डॉ-मनोज अभिलाषा जैन हैं।</p>
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		<title>योग और ध्यान भारत की प्राचीन साधना: योग दिवस पर मुनिराज ने करवाया धर्मावलंबियों को अभ्यास  </title>
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		<pubDate>Sat, 21 Jun 2025 16:20:33 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[सर्वप्रथम योग की शिक्षा आदि ब्रह्मा आदिनाथ भगवान ने दी थी। स्वयं आदिनाथ स्वामी ने योग धारण कर केवलज्ञान की प्राप्ति की थी। योग और ध्यान भारत की सबसे प्राचीन साधना हैं। ध्यान और साधना द्वारा अनेकों ऋषि मुनियों, तपस्वियों ने अलौकिक ज्ञान एवं रिद्धियों की प्राप्ति की है। यह उद्गार मुनिश्री विलोक सागर महाराज [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>सर्वप्रथम योग की शिक्षा आदि ब्रह्मा आदिनाथ भगवान ने दी थी। स्वयं आदिनाथ स्वामी ने योग धारण कर केवलज्ञान की प्राप्ति की थी। योग और ध्यान भारत की सबसे प्राचीन साधना हैं। ध्यान और साधना द्वारा अनेकों ऋषि मुनियों, तपस्वियों ने अलौकिक ज्ञान एवं रिद्धियों की प्राप्ति की है। यह उद्गार मुनिश्री विलोक सागर महाराज ने ज्ञानतीर्थ जिनालय में योग दिवस के अवसर पर योगाभ्यास कर रहे साधर्मी बंधुओं को संबोधित करते हुए व्यक्त किए। <span style="color: #ff0000">मुरैना से पढ़िए, मनोज जैन नायक की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>मुरैना।</strong> सर्वप्रथम योग की शिक्षा आदि ब्रह्मा आदिनाथ भगवान ने दी थी। स्वयं आदिनाथ स्वामी ने योग धारण कर केवलज्ञान की प्राप्ति की थी। योग और ध्यान भारत की सबसे प्राचीन साधना हैं। ध्यान और साधना द्वारा अनेकों ऋषि मुनियों, तपस्वियों ने अलौकिक ज्ञान एवं रिद्धियों की प्राप्ति की है। यह उद्गार मुनिश्री विलोक सागर महाराज ने ज्ञानतीर्थ जिनालय में योग दिवस के अवसर पर योगाभ्यास कर रहे साधर्मी बंधुओं को संबोधित करते हुए व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि मुख्य रूप से योग के चार बिंदु होते हैं। ध्यान, प्रणायाम, प्रतिक्रमण और सामायिक, योग एवं ध्यान मन वचन काय द्वारा स्वस्थ मन से सकारात्मक सोच के साथ करना चाहिए। नकारात्मक सोच के साथ कभी भी योग व ध्यान नहीं करना चाहिए। प्रसन्नचित होकर मन वचन काय की एकाग्रता से किया गया योग हमें निरोग व स्वस्थ रखता है, हमारा मनोबल बढ़ाता है, मन को शांति प्रदान करता है। मुनिश्री ने कहा कि हमें प्रतिदिन प्रातःकालीन वेला में कुछ समय आवश्यक रूप से योग एवं ध्यान करना चाहिए। यदि हम नियमित रूप से योग करेंगे तो हमें डॉक्टरों के पास नहीं जाना पड़ेगा और न ही दवाओं पर पैसा खर्च करना पड़ेगा। उन्होंने बताया कि योग के साथ ही प्रभु का, अपने इष्ट का ध्यान अवश्य करें, प्रभु से प्रार्थना करें कि हे भगवन इस संसार के सभी जीव सुखी रहें, स्वस्थ रहें। सभी प्राणियों का जीवन मंगलमय हो।</p>
<p>मुनिराज ने योग की महिमा को समझाते हुए कहा कि पहला सुख निरोगी काया। यदि आप स्वस्थ हैं, आपको कोई बीमारी नहीं हैं तो आप सबसे सुखी व्यक्ति हैं। निरोगी रहने के लिए नित्य नियम से योग एवं ध्यान करना चाहिए। प्राचीन समय में योग और ध्यान का अधिक प्रचलन था। वर्तमान में लोग योग और ध्यान जैसी साधना से विमुख होते जा रहें हैं। मुनिश्री विलोकसागर एवं मुनिश्री विबोधसागर महाराज का मंगल आगमन ज्ञानतीर्थ पर हुआ। महिलाओं ने रंगोली बनाकर, सिर पर मंगल कलश रखकर एवं साधर्मी बंधुओं ने युगल मुनिराजों का पाद प्रक्षालन व आरती उतारकर भव्य अगवानी की</p>
<p><strong>ज्ञानतीर्थ का प्राकृतिक वातावरण मन को मोह लेता है</strong></p>
<p>पूज्य गुरुदेव ने ज्ञानतीर्थ क्षेत्र को मनमोहनी बताया। उन्होंने कहा कि ज्ञानतीर्थ का शांतप्रिय वातावरण साधना के लिए अति उत्तम स्थान है। यहां का प्राकृतिक वातावरण मन को मोह लेता है। ऐसा स्थान साधना और ध्यान के लिए सर्वाेत्तम है। मुख्य सड़क मार्ग पर होने के कारण आम लोगों को भी दर्शनलाभ सुगमता से उपलब्ध होते हैं।</p>
<p><strong>योग, ध्यान सहित हुए अनेकों आयोजन</strong></p>
<p>पूज्य युगल मुनिराजों के पावन सान्निध्य में एबी रोड हाइवे पर स्थित ज्ञानतीर्थ जिनालय में विभिन्न कार्यक्रम किए गए गए। मुनिश्री ने अंतराष्ट्रीय योग दिवस के अवसर पर उपस्थित सभी बंधुओं, माता बहनों को योगाभ्यास एवं ध्यान कराया। श्री जिनेंद्र प्रभु के कलशाभिषेक, शांतिधारा एवं अष्टदृव्य से पूजन किया गया।</p>
<p><strong>23 जून को होगा बड़े जैन मंदिर में भव्य मंगल आगमन</strong></p>
<p>मुनिराज 23 जून को ज्ञानतीर्थ जिनालय से बड़ा जैन मंदिर मुरैना के लिए पद विहार करेंगे। गाजे-बाजे के साथ भव्य शोभायात्रा के रूप में मुनिराजों को नगर भ्रमण कराते हुए बड़े जैन मंदिर में प्रवेश कराया जाएगा। स्थान स्थान पर मुनिराजों की आरती, पाद प्रक्षालन किया जाएगा। साधर्मी महिलाएं मंदिर जी के मुख्यद्वार पर रंगोली सजाकर, सिर पर कलश धारण कर एवं पुरुष वर्ग पाद प्रक्षालन कर मुनिसंघ की भव्य अगवानी करेंगे।</p>
<p><strong>20 जुलाई को होगी चातुर्मास मंगल कलश स्थापना</strong></p>
<p>मुनिराजों का मंगल वर्षायोग 2025 मुरैना के श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन पंचायती बड़ा मंदिर में होने जा रहा है। वर्षायोग मंगल कलश स्थापना पर 20 जुलाई को विशाल समारोह होगा, जिसमें गुरुदेव के भक्तों द्वारा मंगल कलशों की स्थापना की जाएगी। इस समारोह में सम्पूर्ण भारत वर्ष से सैकड़ों की संख्या में गुरुभक्त साधर्मी बंधुओं के उपस्थित होने की संभावना को देखते हुए सभी तैयारियों को अंतिम रूप दिया जा रहा है।</p>
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		<title>धर्मसभा में दिए प्रवचन : धर्म जड़ नहीं, चेतन तत्व है — मुनिश्री विलोक सागर </title>
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		<pubDate>Mon, 19 May 2025 06:45:37 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[धर्म की रक्षा करना, उसके सिद्धांतों और संयम के मार्ग पर चलने वालों का सहयोग करना ही सच्चा धर्म है। धर्म किसी जड़ वस्तु का नाम नहीं, बल्कि चेतना का स्वरूप है। उक्त विचार दिगंबर जैन संत मुनिश्री विलोक सागर महाराज ने स्थानीय बड़े जैन मंदिर में आयोजित धर्मसभा में व्यक्त किए। पढ़िए मनोज जैन [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>धर्म की रक्षा करना, उसके सिद्धांतों और संयम के मार्ग पर चलने वालों का सहयोग करना ही सच्चा धर्म है। धर्म किसी जड़ वस्तु का नाम नहीं, बल्कि चेतना का स्वरूप है। उक्त विचार दिगंबर जैन संत मुनिश्री विलोक सागर महाराज ने स्थानीय बड़े जैन मंदिर में आयोजित धर्मसभा में व्यक्त किए। <span style="color: #ff0000">पढ़िए मनोज जैन नायक की यह रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>मुरैना।</strong> &#8220;धर्म की रक्षा करना, उसके सिद्धांतों और संयम के मार्ग पर चलने वालों का सहयोग करना ही सच्चा धर्म है। धर्म किसी जड़ वस्तु का नाम नहीं, बल्कि चेतना का स्वरूप है।&#8221; उक्त विचार दिगंबर जैन संत मुनिश्री विलोक सागर महाराज ने स्थानीय बड़े जैन मंदिर में आयोजित धर्मसभा में व्यक्त किए। मुनिश्री ने कहा कि यदि समाज में कोई गंदगी पनप रही है, तो कहीं न कहीं हम सभी उसके लिए जिम्मेदार हैं। यदि हमने अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से पालन किया होता, तो शायद वह विकृति जन्म नहीं लेती। उन्होंने जोर देकर कहा कि &#8220;गलत का विरोध न करना, गलत का समर्थन करना है। समय रहते हमें अन्याय और अधर्म का प्रतिरोध करना चाहिए।&#8221; मुनिश्री ने धर्म को परिभाषित करते हुए कहा कि यदि कोई व्यक्ति संयम का कोई नियम लेता है, तो उसके पालन में समाज को सहयोग करना चाहिए। जब हम किसी के सहायक बनते हैं, तभी समय आने पर कोई हमारा भी सहायक बनता है। &#8220;दुर्भाग्यवश, हम संयमी व्यक्ति की निंदा तो करने लगते हैं, पर उसकी साधना में सहायक नहीं बनते।&#8221;</p>
<p><strong>परिणाम शुद्ध हों, तभी हिंसा का दोष नहीं</strong></p>
<p>मुनिश्री ने कहा कि यदि किसी कार्य को पूर्ण सावधानी से किया जा रहा हो और अनजाने में कोई हिंसा हो जाए, तो उसका दोष उस व्यक्ति को नहीं लगता। उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा, “यदि आप मंदिर में बैठकर पूजन कर रहे हैं, लेकिन आपका मन भटक रहा है और विकारों से भर गया है, तो आप अहिंसक नहीं माने जाएंगे। भावों की शुद्धि अनिवार्य है।”</p>
<p><strong>शुद्ध भावों से ही जीवन में मंगल संभव</strong></p>
<p>अपने प्रवचन में उन्होंने स्पष्ट किया कि भावों की विशुद्धता से ही जीवन में मंगल संभव है। यदि भाव अशुद्ध हैं, तो अमंगल भी हो सकता है। &#8220;अपने इष्ट और गुरु के दर्शन तभी फलदायी होंगे जब आपके भाव पवित्र हों,&#8221; उन्होंने कहा। उन्होंने संयमी साधकों की उपासना और साधना में सहयोग करने को परम धर्म और कर्तव्य बताया।</p>
<p><strong>भावों की परिणति का उदाहरण</strong></p>
<p>एक प्रेरणादायक कथा के माध्यम से मुनिश्री ने भावों की शक्ति का महत्व बताया। एक गांव में मंदिर के पुजारी और एक वेश्या, दोनों एक-दूसरे की वादनाओं को सुनते थे। पुजारी वेश्या के घुंघरुओं की झंकार से आकर्षित होकर सोचता कि वह भी उसके नृत्य का आनंद लेता, जबकि वेश्या मंदिर की घंटियों को सुनकर आत्मग्लानि से भर जाती और प्रभु भक्ति की कामना करती।</p>
<p>“भावों की परिणति यह हुई कि पुजारी मरणोपरांत नरकगामी हुआ और वेश्या स्वर्गगामी,” मुनिश्री ने बताया। इस कथा के माध्यम से उन्होंने समझाया कि कर्म से अधिक महत्वपूर्ण है—भावों की शुद्धता।</p>
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		<title>समता भाव से कर्मों के दंड को सहन करें : मुनिश्री विलोकसागर ने कर्मों के फल के बारे में समझाया </title>
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		<pubDate>Tue, 13 May 2025 05:16:21 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[मुनिश्री विलोक सागर महाराज ने बड़े जैन मंदिर में धर्मसभा को संबोधित किया। धर्मसभा में बड़ी संख्या में समाजजन, श्रद्धालु मौजूद रहे। 22 मई को तीर्थंकर भगवान महावीर प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिता होगी। मुरैना से पढ़िए, मनोज जैन नायक की यह खबर&#8230; मुरैना। कर्म का जब उदय आता है, तब हम साधुत्व हो जाते है और जब [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>मुनिश्री विलोक सागर महाराज ने बड़े जैन मंदिर में धर्मसभा को संबोधित किया। धर्मसभा में बड़ी संख्या में समाजजन, श्रद्धालु मौजूद रहे। 22 मई को तीर्थंकर भगवान महावीर प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिता होगी। मुरैना से <span style="color: #ff0000">पढ़िए, मनोज जैन नायक की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong>मुरैना।</strong> कर्म का जब उदय आता है, तब हम साधुत्व हो जाते है और जब कर्म बंध करते हो तब सो जाते हो। कर्म बंध भोगने की अवस्था में चीखते चिल्लाते हो। जो हो गया, सो हो गया। अब चीखने चिल्लाने से क्या फायदा। कर्म बंध को समता के साथ सहन कर लो। यह उद्गार मुनिश्री विलोक सागर महाराज ने बड़े जैन मंदिर में धर्मसभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि समता के साथ सहन करने से कर्म पुनः नहीं सताएंगे। समता के साथ सहन करने से कर्मों की निर्जरा हो जाती है। यदि हमने कर्मों को समता के साथ सहन नहीं किया। किसी दूसरे पर उसका दोषारोपण किया तो कर्म पुनः आकर हमें सताएंगे, परेशान करेंगे। इसलिए हमें सांसारिक जीवन में समता और सरलता रखनी चाहिए, ताकि हमारे जीवन में कर्मों की निर्जरा हो सके और हम शांति के साथ, सुखमय जीवन जी सकें।</p>
<p><strong>अच्छे कर्म करोगे, सुख और शांति की होगी अनुभूति</strong></p>
<p>मुनिश्री ने कर्म सिद्धांत को समझाते हुए बताया कि कर्म कभी पीछा नहीं छोड़ते। वे सदैव हमारे साथ चलते हैं। प्राणी जैसे कर्म करता है, उसी अनुरूप उसे परिणामों की प्राप्ति होती है। आप अच्छे कर्म करोगे तो आपको सुख और शांति की अनुभूति होगी। खोटे कर्म करोगे तो दु:ख और अशांति की अनुभति होगी। इसीलिए हमें अपने हृदय में अपने इष्ट को धारणकर पूजा पाठ ध्यान में लीन रहकर सात्विक जीवन जीना चाहिए। यदि आपने अपने इष्ट को हृदय में धारण नहीं किया, पूजन तप ध्यान नहीं किया, सत्कार्य नहीं किए तो आपका जीवन दु:खमय होने से कोई नहीं रोक सकता।</p>
<p><strong>22 मई को होगी महावीर प्रश्नोत्तरी</strong><br />
तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व से आमजन को परिचित कराने के उद्देश्य से बड़े जैन मंदिर में 22 मई को शाम 6.45 से 7.45 तक तीर्थंकर भगवान महावीर प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिता का आयोजन किया गया है। इस प्रतियोगिता में जैन-अजैन कोई भी व्यक्ति भाग ले सकता है। युगल मुनिराजों की प्रेरणा एवं पावन सानिध्य में होने जा रही प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिता भगवान महावीर के जीवन चरित्र से संबंधित होगी। जिसमें 150 प्रश्न पूछे जाएंगे। प्रतियोगिता में सम्मिलित होने वाले सभी बंधुओं, माता बहनों को भगवान महावीर से संबंधित 150 प्रश्नोत्तरी का पेपर, उत्तर सहित पहले ही वितरित किया जा रहा है। सभी प्रतियोगी घर पर तैयारी करें और 22 मई को बड़े जैन मंदिर में प्रतियोगिता में सम्मिलित हों। प्रतियोगिता के बाद उत्कृष्ट प्रतियोगियों को प्रथम, द्वितीय, तृतीय एवं सांत्वना पुरस्कार प्रदान किए जाएंगे।</p>
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