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	<title>मुनिश्री विलोकसागर जी &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<title>मुनिश्री विलोकसागर जी &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>गुरुओं का सान्निध्य पुण्यशाली जीवों को ही मिलता है : मुनिश्री विलोकसागरजी का धौलपुर में भव्य मंगल प्रवेश हुआ गूंजे जयकारे </title>
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		<pubDate>Tue, 25 Nov 2025 11:46:40 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जब तक श्रावक हैं, तभी तक श्रमण परंपरा कायम हैं। जब श्रावक ही नहीं होगें, तो श्रमण परंपरा स्वतः समाप्त हो जाएगी। दिगंबर साधुओं की परंपरा को जारी रखने में श्रावकों का ही योगदान है। यह उद्गार मुनिश्री विलोकसागरजी ने धर्मसभा को में व्यक्त किए। धौलपुर से पढ़िए, मनोज जैन नायक की यह खबर&#8230; धौलपुर। [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>जब तक श्रावक हैं, तभी तक श्रमण परंपरा कायम हैं। जब श्रावक ही नहीं होगें, तो श्रमण परंपरा स्वतः समाप्त हो जाएगी। दिगंबर साधुओं की परंपरा को जारी रखने में श्रावकों का ही योगदान है। यह उद्गार मुनिश्री विलोकसागरजी ने धर्मसभा को में व्यक्त किए। <span style="color: #ff0000">धौलपुर से पढ़िए, मनोज जैन नायक की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>धौलपुर</strong>। जब तक श्रावक हैं, तभी तक श्रमण परंपरा कायम हैं। जब श्रावक ही नहीं होगें, तो श्रमण परंपरा स्वतः समाप्त हो जाएगी। दिगंबर साधुओं की परंपरा को जारी रखने में श्रावकों का ही योगदान है। यह उद्गार मुनिश्री विलोकसागरजी ने धर्मसभा को में व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि प्रभु के दर्शन और गुरुओं का सान्निध्य पुण्यशाली जीवों को ही मिलता है। जिनका पुण्य क्षीर्ण होता है, उनको न प्रभु के दर्शन मिलते हैं और न ही गुरुओं का सान्निध्य मिलता है। अपने समाज में ही, आपके आसपास अनेकों ऐसे लोग भी होंगे, जो कभी मंदिर भी नहीं जाते होंगे और यदि उनको यह मालूम पड़ जाए कि आज महाराज जी आ रहे हैं तो वे कोई न कोई बहाना बनाकर रफूचक्कर हो जाते हैं। मुनिश्री ने कहा कि हे भव्य आत्माओं, अनेकों जन्मों के पुण्य कर्म से आपको मानव पर्याय में जन्म मिला है, वो भी जैन कुल में। इसे यू ही बर्बाद मत करो।</p>
<p><strong>साधुओं की साधना में सहयोगी बनें </strong></p>
<p>जब भी आपको मौका मिले, अवसर मिले तब तुरंत प्रभु के दर्शन कर लो, उनकी पूजा भक्ति कर लो। जब भी आपको दिगंबर साधुओं का सान्निध्य मिले या जब भी कोई दिगंबर साधु आपके नगर में प्रवेश करे तो आपका कर्तव्य है कि उनकी संयम की साधना में सहयोगी बनें। साधुओं के आगमन पर ऐसी व्यवस्था करें कि उन्हें अपनी साधना करने में कोई परेशानी अथवा व्यवधान न हो। उनके आहार, विहार, निहार, स्वाध्याय एवं सामयिक आदि के लिए उचित प्रबंध करें। यही श्रावकों का परम कर्तव्य है।</p>
<p><strong>गाजे-बाजे के साथ शोभायात्रा निकाली </strong></p>
<p>धौलपुर नगर में मंगलवार को आचार्यश्री विद्यासागर महाराज, आचार्यश्री आर्जवसागरजी महाराज के शिष्य मुनिश्री विलोकसागरजी एवं मुनिश्री विबोधसागरजी महाराज का नगरागमन हुआ। मुरैना से पद विहार करते हुएमुनिश्री ने प्रातःकालीन बेला में प्रवेश किया। धौलपुर जैन समाज के लोगों ने नगर सीमा पर पहुंचकर युगल मुनिराजों की भव्य अगवानी की। उन्हें गाजे-बाजे के साथ भव्य शोभायात्रा के रूप में नगर भ्रमण कराते हुए जैन मंदिर ले जाया गया। मुनि श्री 1008 आदिनाथ दिगंबर जैन मंदिर में विराजमान हैं।</p>
<p><strong>इनकी मौजूदगी रही खास </strong></p>
<p>गुरुदेव के भव्य मंगल प्रवेश पर मुरैना से बृजेश जैन दादा, राकेश जैन, सुनील जैन विशेष रूप से उपस्थित थे। धौलपुर जैन समाज के अध्यक्ष धनेश जैन, महामंत्री अमित जैन, धर्मशाला अध्यक्ष पवन जैन, अजय जैन, बनवारीलाल जैन ,नवाब रवि जैन, पवन जैन जवाहर नगर, पवन जैन कोषाध्यक्ष, अमित जैन, मानिक चंद, गुड्डा जैन प्रेस वाले, दीपेंद्र जैन, कमलकिशोर जैन आदि मौजूद रहे।</p>
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		<title>तीर्थों की वंदना से आत्मबल और तपोबल में वृद्धि: मुनिश्री विलोकसागर जी का 12 नवंबर की शाम मुरैना में भव्य मंगल प्रवेश </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 11 Nov 2025 10:11:53 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[मुनिश्री विलोकसागरजी ने अतिशय क्षेत्र सिहोनियाजी तीर्थ में तीर्थ वंदना के महत्व पर प्रकाश डाला। मुनिश्री ने कहा कि तीर्थों की वंदना करने से मनुष्यों को आध्यात्मिक मार्ग पर चलने की प्रेरणा तो मिलती ही है। मुरैना से पढ़िए, मनोज जैन नायक की यह खबर&#8230; मुरैना। मुनिश्री विलोकसागरजी ने अतिशय क्षेत्र सिहोनियाजी तीर्थ में तीर्थ [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>मुनिश्री विलोकसागरजी ने अतिशय क्षेत्र सिहोनियाजी तीर्थ में तीर्थ वंदना के महत्व पर प्रकाश डाला। मुनिश्री ने कहा कि तीर्थों की वंदना करने से मनुष्यों को आध्यात्मिक मार्ग पर चलने की प्रेरणा तो मिलती ही है। <span style="color: #ff0000">मुरैना से पढ़िए, मनोज जैन नायक की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>मुरैना।</strong> मुनिश्री विलोकसागरजी ने अतिशय क्षेत्र सिहोनियाजी तीर्थ में तीर्थ वंदना के महत्व पर प्रकाश डाला। मुनिश्री ने कहा कि तीर्थों की वंदना करने से मनुष्यों को आध्यात्मिक मार्ग पर चलने की प्रेरणा तो मिलती ही है। साथ ही उसके आत्मबल में वृद्धि भी होती है। जैन दर्शन में तीर्थ यात्रा का महत्व आत्म-खोज, आध्यात्मिक विकास और ज्ञान प्राप्ति से जुड़ा है। यह यात्रा भक्तों को तीर्थंकरों की शिक्षाओं से जोड़ती है और उन्हें जीवन के सत्यों पर ध्यान केंद्रित करने का अवसर देती है। मुनिश्री ने कहा कि इन तीर्थ स्थलों पर जाकर, जैन अनुयायी शांति, संयम और मोक्ष का अनुभव करते हैं। जिससे उनके जीवन में पुण्य और शांति आती है। तीर्थयात्रा भक्तों को आत्म-खोज और आध्यात्मिक प्रगति के लिए प्रेरित करती है। यह तीर्थयात्राएं ज्ञान प्राप्त करने, ध्यान केंद्रित करने और आंतरिक शांति पाने का अवसर देती हैं। मुनिश्री आगे कहते हैं कि तीर्थयात्रा के माध्यम से भक्त तीर्थंकरों की शिक्षाओं और उनके जीवन से जुड़ते हैं। दान, संयम और क्षमा जैसे गुणों का पालन करते हुए तीर्थयात्रा कर्मों के बोझ को कम करने में मदद करती है।</p>
<p>धर्म, काम और मोक्ष इन तीनो की प्राप्ति में तीर्थ यात्राएं मददगार होती हैं। मानव का तीर्थयात्रा करने का उद्देश्य भी अलग-अलग होता है। सात्विक एवं संयमी मनुष्य अपने तपोबल में वृद्धि करने एवं मोक्ष प्राप्ती के लिए तीर्थ यात्रा करते हैं और सात्विक तथा राजसी प्रवृत्ति के मनुष्य शान शौकत और मनोरंजन के लिए तीर्थ यात्रा करते हैं। अधिकांशतः मनुष्य धर्म के लिए तीर्थ यात्रा करते है। सांसारिक प्राणियों को समय समय पर तीर्थ वंदना करते रहना चाहिए। जब भी आप तीर्थ वंदना पर जाएं, मन वचन काया की शुद्धि के साथ ही तीर्थ वंदना करें। तभी आपको सार्थक परिणामों की प्राप्ति होगी।</p>
<p><strong>तीर्थ वंदना से मिलती है संयम की प्रेरणा </strong></p>
<p>इस अवसर मुनिश्री विबोधसागर महाराज ने बताया कि तीर्थ यात्रा करने से हमारा ज्ञान बढ़ता है, हम अपनी संस्कृति और रिवाजों से परिचित होते हैं। प्राचीन तीर्थ स्थलों पर जाने से पौराणिक ज्ञान बढ़ता है। अपने ईष्ट एवं महापुरुषों से जुड़ी कथाएं और परंपराएं मालूम होती हैं। प्राचीन संस्कृति को जानने का मौका मिलता है। तीर्थ जैसे पवित्र स्थलों की यात्रा त्याग, आत्मा की शुद्धि और आत्म-शुद्धि के शिखर तक पहुंचने के लिए अपनी आत्मा की गहराई में झांकने के लिए प्रेरित करती है।</p>
<p><strong>युगल मुनिराजों ने किए भगवान शांतिनाथ के दर्शन</strong></p>
<p>युगल मुनिराज पोरसा से पद विहार करते हुए जैन तीर्थ अतिशय क्षेत्र सिहोनियाजी पहुंचकर भूगर्भ से प्राप्त अतिशयकारी भगवान शांतिनाथजी, कुंथनाथजी, अरहनाथजी के दर्शन के साथ ही क्षेत्र के अन्य जिनालयों के दर्शन किए। उन्होंने सिहोनियाजी को अलौकिक एवं अदभुत तीर्थ बताते हुए संयम की साधना के लिए सर्वाेत्तम स्थान बताया।</p>
<p>अतिशय क्षेत्र कमेटी के अध्यक्ष टिल्लू जैन। उपाध्यक्ष नीलेश जैन, महामंत्री विवेक जैन, कोषाध्यक्ष रवि जैन, संजय जैन, मुकेश जैन, संजीव जैन, पिंटू जैन अम्बाह, बृजेश जैन दादा, सुनील जैन, राकेश जैन मुरैना ने विहार में सम्मिलित होकर गुरुदेव के क्षेत्र पर मंगल आगमन पर पाद प्रक्षालन कर भव्य अगवानी की।</p>
<p><strong>12 नवंबर की शाम मुरैना में होगा भव्य मंगल प्रवेश</strong></p>
<p>युगल मुनिराजों का आज रात्रि विश्राम ग्राम मिरघान में हो रहा है। बुधवार 12 नवंबर की आहारचर्या ग्राम खेरा में होगी और सामयिक के पश्चात बड़े जैन मंदिर मुरैना के लिए पद विहार होगा। दोपहर को नगर सीमा से युगल मुनिराजों को बैंडबाजों के साथ भव्य शोभायात्रा के रूप में शाम को मुरैना नगर प्रवेश कराया जाएगा।</p>
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		<title>भव्य पिच्छिका परिवर्तन एवं णमोकार मंत्र लेखन पुरस्कार वितरण 26 को : मुनिश्री विलोकसागर जी ने कहा-मंत्रों की साधना के लिए तन-मन और शरीर की शुद्धि आवश्यक  </title>
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		<pubDate>Thu, 23 Oct 2025 13:25:58 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[सभी धर्मों में मंत्रों के जप को प्राथमिकता दी गई है। अध्यात्म में मंत्रों का विशेष महत्व बताया गया है। मंत्रों के जाप से मन को शांति, आत्मबल में वृद्धि, पापों का क्षय, ईश्वर से साक्षात्कार एवं संयम पथ पर चलने की प्रेरणा मिलती है। यह बात मुनिश्री विलोकसागर जी ने कही। मुरैना से पढ़िए, [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>सभी धर्मों में मंत्रों के जप को प्राथमिकता दी गई है। अध्यात्म में मंत्रों का विशेष महत्व बताया गया है। मंत्रों के जाप से मन को शांति, आत्मबल में वृद्धि, पापों का क्षय, ईश्वर से साक्षात्कार एवं संयम पथ पर चलने की प्रेरणा मिलती है। यह बात मुनिश्री विलोकसागर जी ने कही। <span style="color: #ff0000">मुरैना से पढ़िए, मनोज जैन नायक की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>मुरैना।</strong> सभी धर्मों में मंत्रों के जप को प्राथमिकता दी गई है। अध्यात्म में मंत्रों का विशेष महत्व बताया गया है। मंत्रों के जाप से मन को शांति, आत्मबल में वृद्धि, पापों का क्षय, ईश्वर से साक्षात्कार एवं संयम पथ पर चलने की प्रेरणा मिलती है। मंत्र जप एक आध्यात्मिक अभ्यास है। जिसका उद्देश्य मानसिक शांति, एकाग्रता और भगवान का आशीर्वाद प्राप्त करना है। मंत्रों के सार्थक परिणाम प्राप्त करने के लिए तन-मन और शरीर की शुद्धि आवश्यक होना चाहिए। शांत और स्वच्छ स्थान पर एकाग्र होकर प्रतिदिन एक निश्चित संख्या में मंत्रों का जाप करना ही श्रेष्ठ होता है। मुनिश्री विलोकसागरजी महाराज ने बड़े जैन मंदिर में धर्मसभा में यह बात कही। उन्होंने कहा कि जैन दर्शन में णमोकार मंत्र सबसे महत्वपूर्ण मंत्र है।</p>
<p>इस अनादिनिधन मंत्र में किसी व्यक्ति विशेष को नमस्कार नहीं किया गया है, बल्कि उनके गुणों को नमस्कार किया गया है। इस महामंत्र में अरिहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय और इस संसार के समस्त साधुओं को नमस्कार किया गया है। इस मंत्र के जप से सभी प्रकार के पापों का क्षय होता है। इस मंत्र को सभी मंगलों में पहला मंगल माना जाता है। मुनिश्री ने कहा कि इस मंत्र का नियमित जाप मन को शांति देता है, तनाव और चिंता दूर करता है और मोक्ष की प्राप्ति में सहायक होता है। प्रत्येक मांगलिक कार्य की शुरुआत में सबसे पहले णमोकार मंत्र का ही स्मरण करना चाहिए। श्रद्धा, भक्ति एवं शुद्धता के साथ मंत्रों के जाप एवं लेखन से सभी कार्य निर्विघ्न सम्पन्न होते है, अलौकिक सुखों की प्राप्ति होती है और पुण्य का संचय होता है।</p>
<p><strong> णमोकार महामंत्र लेखन पुरस्कार वितरण 26 को होगा</strong></p>
<p>विद्वत नवनीत शास्त्री एवं अक्षय जैन इंजीनियर ने बताया कि मुनिश्री विलोकसागरजी महाराज एवं मुनिश्री विबोधसागरजी महाराज की प्रेरणा एवं सानिध्य में णमोकार मंत्र लेखन का कार्य विगत दो माह से चल रहा था। उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले सभी लोगों को पुरस्कार वितरण 26 अक्टूबर को दोपहर 2 से बड़े जैन मंदिर में किया जाएगा। णमोकार लेखन की पुस्तिकाएं जमा हो चुकी हैं। जिसमें सर्वाधिक 64000, 60014, 52500, 49772, 35000 बार णमोकार मंत्र लिखा गया है। 25000 णमोकार मंत्र लिखने वाले 9 लोग, 21000 से अधिक बार छह लोग, 15000 से अधिक बार 22 लोगों ने महामंत्र का लेखन किया है। इसी तरह 11000 से अधिक बार 56 लोगों ने लिखकर करीबन 24 लाख 27 हजार बार णमोकार मंत्र लिखकर एक कीर्तिमान स्थापित किया है। इसी क्रम में 150 लोगों ने 11000 से कम बार णमोकार मंत्र लिखे हैं। इस प्रतियोगिता में प्रथम स्थान पाने वाले को रेफ्रिजरेटर, द्वितीय स्थान पाने वाले को वॉशिंग मशीन, तृतीय स्थान पाने वाले को आटा चक्की, चतुर्थ स्थान पाने वाले को मिक्सर एवं पंचम स्थान एवं अन्य सभी प्रतियोगियों को पुरस्कृत किया जाएगा पूजा के बर्तन आदि पुरस्कारों से सम्मानित किया जाएगा।</p>
<p>इस णमोकार मंत्र प्रतियोगिता में पुण्यार्जक परिवार गंगाविशन, अशोककुमार, कैलाशचंद, सूर्यनारायण, प्रेम नारायण, शिवनारायण, बलराम जैन, प्रद्युम्न जैन, अनिल जैन, बबली जैन, मदन मोहन जैन, अखिलेश जैन, सोनू जैन इंजीनियर, रविंद्र जैन, प्रवीन जैन जौरा के सौजन्य से पुरस्कार वितरित किए जाएंगे। पुरस्कार वितरण के समय प्रतियोगियों का उपस्थित रहना आवश्यक है अन्यथा वे पुरस्कारों से वंचित हो सकते हैं।</p>
<p><strong>25 को विधान एवं 26 को पिच्छिका परिवर्तन</strong></p>
<p>वर्षायोग समिति के मुख्य संयोजक राजेंद्र जैन दयेरी वाले ने बताया कि पिच्छिका परिवर्तन समारोह से पूर्व 25 अक्टूबर को प्रातः श्री मुनिसुवृतनाथ विधान होगा। 26 अक्टूबर को प्रातः श्री भक्तामर विधान होगा और दोपहर 1 बजे से मुनिराज श्री विलोक सागर एवं मुनिश्री विबोधसागरजी महाराज का भव्य पिच्छिका परिवर्तन समारोह होगा। कार्यक्रम के समापन पर सभी के लिए वात्सल्य भोज की व्यवस्था रखी गई है।</p>
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		<title>गुरुकृपा शिष्य समर्पण से दूर होता है अज्ञान : मुनिश्री विलोकसागर जी के सान्निध्य में संयम दीक्षा दिवस पर हो रहे विशेष कार्यक्रम  </title>
		<link>https://www.shreephaljainnews.com/ignorance_is_dispelled_by_the_grace_of_the_guru_and_the_disciples_surrender/</link>
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		<pubDate>Fri, 10 Oct 2025 11:18:51 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[भौतिकता की चकाचौंध में लोगों ने गुरुओं का सान्निध्य व सत्संग से दूरी बना ली है। जहां कुछ परमेश्वर को ही गुरु मानते हैं तो कुछ आत्म-ज्ञान या तत्वदर्शी संतों को सच्चा गुरु मानते हैं। यह उद्गार मुनिश्री विलोकसागरजी महाराज ने उपकार दिवस के अवसर पर बड़े जैन मंदिर में धर्मसभा में व्यक्त किए। मुरैना [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>भौतिकता की चकाचौंध में लोगों ने गुरुओं का सान्निध्य व सत्संग से दूरी बना ली है। जहां कुछ परमेश्वर को ही गुरु मानते हैं तो कुछ आत्म-ज्ञान या तत्वदर्शी संतों को सच्चा गुरु मानते हैं। यह उद्गार मुनिश्री विलोकसागरजी महाराज ने उपकार दिवस के अवसर पर बड़े जैन मंदिर में धर्मसभा में व्यक्त किए। <span style="color: #ff0000">मुरैना से पढ़िए, मनोज जैन नायक की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>मुरैना।</strong> संसार में प्राणी भोग विलास में लिप्त होकर गुरु परम्परा को भूलते जा रहे हैं। भौतिकता की चकाचौंध में लोगों ने गुरुओं का सान्निध्य व सत्संग से दूरी बना ली है। जहां कुछ परमेश्वर को ही गुरु मानते हैं तो कुछ आत्म-ज्ञान या तत्वदर्शी संतों को सच्चा गुरु मानते हैं। यह उद्गार मुनिश्री विलोकसागरजी महाराज ने उपकार दिवस के अवसर पर बड़े जैन मंदिर में धर्मसभा में व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि सच्चा गुरु वह होता है, जो शास्त्रों के अनुरूप ज्ञान दे। स्वयं को ईश्वर से एकाकार अनुभव करे। अहंकार से मुक्त हो और शिष्यों को मोक्ष या परम सत्य की ओर ले जाए। गुरु अपने शिष्य को अज्ञान से ज्ञान की ओर ले जाकर आत्मबोध कराते हैं, आध्यात्मिक विकास कराते हैं, और जीवन के उच्चतम आदर्शों से जोड़ते हैं। आचार्यश्री ने कहा कि गुरु की कृपा और शिष्य के समर्पण से अज्ञान का अंधकार दूर होता है और प्रकाश की ओर अग्रसर होता है। गुरु का उपकार शिष्य को जीवन में सुख, सौभाग्य, और ऐश्वर्य दिलाता है तथा त्याग की भावना से जोड़ता हुआ मोक्ष मार्ग प्रशस्त करता है।</p>
<p><strong>गुरु की महिमा अतुलनीय </strong></p>
<p>गुरु की महिमा अपरंपार और अतुलनीय है, क्योंकि वे केवल ज्ञान ही नहीं देते, बल्कि अज्ञानता के अंधकार से निकालकर ज्ञान और भक्ति के प्रकाश की ओर ले जाते हैं। गुरु को भगवान का रूप माना गया है। गुरु वह पारस है जो शिष्य को अपने समान महान बना लेता है। गुरु के उपकार को कभी भुलाया नहीं जा सकता। शिष्यों का भी कर्तव्य है कि वे गुरु का सदैव गुणगान करें और साथ ही उनके बताए हुए सद मार्ग पर चलते हुए इस संसार सागर के जन्म मृत्यु को तजकर मोक्ष मार्ग की ओर गमन करें।</p>
<p><strong>आत्मा के वास्तविक पथप्रदर्शक हैं गुरु</strong></p>
<p>उपकार दिवस के पावन अवसर पर मुनिश्री विबोधसागरजी महाराज ने कहा कि जैन दर्शन में गुरु का अत्यधिक महत्व है, क्योंकि गुरु ही शिष्य को अज्ञानता से ज्ञान की ओर ले जाते हैं और आत्मा की मुक्ति के मार्ग पर मार्गदर्शन करते हैं। गुरु,जो अरिहंत, आचार्य, उपाध्याय और साधु होते हैं। वे आत्मा के वास्तविक पथप्रदर्शक हैं जो आध्यात्मिक ज्ञान और मोक्ष प्राप्ति में सहायक होते हैं। गुरु के सान्निध्य से आत्म-अनुशासन और आध्यात्मिक विकास को बढ़ावा मिलता है।</p>
<p><strong>अंधकार को दूर कर ज्ञान का प्रकाश भरते है गुरु</strong></p>
<p>गुरु को अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाला कहा जाता है, क्योंकि वे शिष्यों के अज्ञानता रूपी अंधकार को दूर कर ज्ञान का प्रकाश भरते हैं। गुरु एक मार्गदर्शक का कार्य करते हैं, जो शिष्य को सही दिशा दिखाकर मंजिल तक पहुँचाते हैं। गुरु के सान्निध्य में ही शिष्य तीर्थंकरों की शिक्षाओं का पालन कर मुक्ति प्राप्त करता है। गुरु का सान्निध्य संयम मार्ग पर चलने में सहायक होता हैं।</p>
<p><strong>आचार्य छत्तीसी विधान का हुआ आयोजन</strong></p>
<p>बड़े जैन मंदिर में चातुर्मासरत मुनिश्री विलोकसागरजी एवं मुनिश्री विबोधसागरजी महाराज के संयम दीक्षा दिवस के अवसर पर बड़े जैन मंदिर में आचार्य छत्तीसी विधान किया गया। विधान में साधर्मी बंधुओं, माता वहनों ने बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया। सभी लोगों ने अष्टदृव्य से पूजन करते हुए अर्घ्य समर्पित किए। रात्रि को बालिका मंडल एवं नन्हें मुन्ने बच्चों द्वारा सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया गया। बच्चों की इस प्रस्तुति की उपस्थित सभी लोगों ने सराहना एवं प्रशंसा की। गुरु भक्ति एवं महाआरती का आयोजन किया गया। गुरु भक्ति के आयोजन में सभी लोगों ने संगीतमय भजनों के साथ भक्तिमय नृत्य प्रस्तुत किए।</p>
<p><strong>11 अक्टूबर को संयम दीक्षा दिवस पर होगे आयोजन’</strong></p>
<p>11 अक्टूबर को मुनिश्री विलोकसागरजी एवं मुनिश्री विबोधसागरजी महाराज का संयम दीक्षा दिवस हर्षाेल्लास पूर्वक मनाया जाएगा। इस अवसर पर प्रातः जिनेन्द्र प्रभु का अभिषेक, शांतिधारा एवं अष्टदृव्य से संगीतमय पूजन किया जाएगा। युगल मुनिराजों के मुखारविंद से उच्चारित शांतिधारा होगी। चित्र अनावरण, दीप प्रज्वलन, शास्त्र भेट, पाद प्रक्षालन, प्रवचन सभा एवं पढ़गाहन होगा। शाम को विलोकसागर बालिका मण्डल द्वारा राग से वैराग्य की ओर नाट्य प्रस्तुत किया जाएगा। अन्य सांस्कृतिक कार्यक्रम, प्रश्नमंच, गुरु भक्ति, महाआरती सहित अनेकों आयोजन होंगे।</p>
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		<title>मुनिश्री विलोकसागर जी ने कहा ईश्वर न किसी को सुख देते हैं, न दुख देते हैं: 7 अक्टूबर को पाठशाला के बच्चे होंगे सम्मानित </title>
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		<pubDate>Mon, 06 Oct 2025 14:03:09 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[भगवान न किसी का अच्छा करते हैं, न किसी का बुरा करते हैं। भगवान न किसी को सुख देते हैं, न किसी को दुख देते हैं। यह सब तो प्राणी मात्र के कर्मों पर निर्भर करता है। प्राणी जैसे कर्म करेगा उसी के फलस्वरूप उसे परिणामों की प्राप्ति होगी। यह बात मुनिश्री विलोकसागर जी ने [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>भगवान न किसी का अच्छा करते हैं, न किसी का बुरा करते हैं। भगवान न किसी को सुख देते हैं, न किसी को दुख देते हैं। यह सब तो प्राणी मात्र के कर्मों पर निर्भर करता है। प्राणी जैसे कर्म करेगा उसी के फलस्वरूप उसे परिणामों की प्राप्ति होगी। यह बात मुनिश्री विलोकसागर जी ने कही। <span style="color: #ff0000">मुरैना से पढ़िए, मनोज जैन नायक की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>मुरैना।</strong> भगवान न किसी का अच्छा करते हैं, न किसी का बुरा करते हैं। भगवान न किसी को सुख देते हैं, न किसी को दुख देते हैं। यह सब तो प्राणी मात्र के कर्मों पर निर्भर करता है। प्राणी जैसे कर्म करेगा उसी के फलस्वरूप उसे परिणामों की प्राप्ति होगी। जैसे जंगलों में या अन्य स्थानों पर वनस्पति स्वतः उग आती है, फल और फूल बिना किसी प्रयास या प्रेरणा के ही अपने निर्धारित समय पर वृक्षों में लग जाते हैं, उसी प्रकार प्राणी मात्र के द्वारा किये हुए अच्छे और बुरे कर्म भी अपने समय पर जीवन में स्वतः ही फल देने आते रहते हैं। कर्म फल देगें, ये तो निश्चित है, लेकिन कब देगें, ये किसी को नहीं मालूम। अहिंसा जैन धर्म का मूल सिद्धान्त है। इसे बड़ी सख्ती से पालन किया जाता है खानपान आचार नियम में विशेष रुप से देखा जा सकता है। जैन दर्शन में कण-कण स्वतंत्र है इस सृष्टि का या किसी जीव का कोई कर्ताधर्ता नही है।</p>
<p>सभी जीव अपने अपने कर्मों का फल भोगते हैं। जैन दर्शन में भगवान न कर्ता और न ही भोक्ता माने जाते हैं। जैन दर्शन मे सृष्टिकर्ता को कोई स्थान नहीं दिया गया है। जैन धर्म में अनेक शासन देवी-देवता हैं पर उनकी आराधना को कोई विशेष महत्व नहीं दिया जाता। जैन धर्म में तीर्थंकरों जिन्हें जिनदेव, जिनेंद्र या वीतराग भगवान कहा जाता है। इनकी आराधना का ही विशेष महत्व है। इन्हीं तीर्थंकरों का अनुसरण कर आत्मबोध, ज्ञान और तन और मन पर विजय पाने का प्रयास किया जाता है।</p>
<p><strong> पाठशाला के बच्चों को कल मिलेंगे पुरस्कार</strong></p>
<p>बड़े जैन मंदिर में विराजमान मुनिश्री विलोकसगरजी एवं मुनिश्री विबोधसागरजी महाराज के पावन सान्निध्य में शरद पूर्णिमा के अवसर पर मंगलवार 7 अक्टूबर को श्री विद्यासागर सर्वाेदय पाठशाला के बच्चों को परीक्षा परिणामों के अनुरूप पुरस्कार देकर सम्मानित किया जाएगा। शरद पूर्णिमा के दिन ही आचार्यश्री विद्यासागर महाराज का अवतरण हुआ था। इस मांगलिक अवसर पर प्रातःकालीन बेला में श्री जिनेंद्र प्रभु का अभिषेक, शांतिधारा एवं नित्यमह पूजन किया जाएगा। प्रातः 7 बजे आचार्यश्री विद्यासागरजी महाराज का अष्टदृव्य से पूजन किया जाएगा। प्रातः 9 बजे युगल मुनिराजों के प्रवचन होंगे। शाम को सांस्कृतिक कार्यक्रम, प्रश्नमंच एवं महाआरती का आयोजन होगा। पाठशाला के सभी बच्चों को उनकी वार्षिक परीक्षा के परिणामों के अनुसार पुरस्कार देकर सम्मानित किया जाएगा। विद्यासागर सर्वाेदय पाठशाला परिवार ने कार्यक्रम में पाठशाला के सभी बच्चों सहित साधर्मी बंधु, माता बहनें उपस्थित रहेंगी।</p>
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		<title>अंतरंग के भावों के अनुरूप ही कर्मफल की होती है प्राप्ति: मुनिश्री विलोकसागर जी के सानिध्य में प्रतियोगियों का बहुमान </title>
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		<pubDate>Thu, 11 Sep 2025 11:36:22 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[यदि हमारे हृदय में करुणा का भाव नहीं हैं तो आपकी पूजा भक्ति कभी भी सफल नहीं हो सकती। यह उद्गार नगर में चातुर्मासरत जैन संत मुनिश्री विलोकसागरजी महाराज ने बड़े जैन मंदिर में धर्मसभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए। मुरैना से पढिए, मनोज जैन नायक की यह खबर&#8230; मुरैना। प्राणी मात्र के हृदय [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>यदि हमारे हृदय में करुणा का भाव नहीं हैं तो आपकी पूजा भक्ति कभी भी सफल नहीं हो सकती। यह उद्गार नगर में चातुर्मासरत जैन संत मुनिश्री विलोकसागरजी महाराज ने बड़े जैन मंदिर में धर्मसभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए। <span style="color: #ff0000">मुरैना से पढिए, मनोज जैन नायक की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>मुरैना।</strong> प्राणी मात्र के हृदय में अहिंसा, परोपकार और जीवदया की भावना होनी चाहिए। हम किसी भी धर्म को मानने वाले हों, किसी भी इष्ट की पूजा भक्ति आराधना करते हों, किसी भी गुरु की वाणी का श्रवण करते हों, यदि हमारे हृदय में करुणा का भाव नहीं हैं तो आपकी पूजा भक्ति कभी भी सफल नहीं हो सकती। यह उद्गार नगर में चातुर्मासरत जैन संत मुनिश्री विलोकसागरजी महाराज ने बड़े जैन मंदिर में धर्मसभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि वर्तमान में सांसारिक प्राणी पूजा भक्ति साधना उपासना तो बहुत करता है। धर्मात्मा बनने की चाहत में अपने आप को आदर्शवादी निरूपित करता है लेकिन, मन की कुंठाओं का शमन नहीं करता। जैन दर्शन में बाहरी दिखावे को महत्व नहीं दिया जाता। जैन धर्म भावना प्रधान धर्म है। जैसी जिसकी भावना होगी। उसी के फलस्वरूप उसे परिणामों की प्राप्ति होगी लेकिन, आजकल अधिकांशतः लोग पूजा-पाठ, धार्मिक अनुष्ठान तो करते हैं लेकिन, मन की मलीनता को दूर नहीं करते। यही कारण है कि हमें अपनी पूजा भक्ति के सार्थक परिणाम प्राप्त नहीं होते है। हमें सदैव अपने इष्ट के बताए हुए, अपने गुरु की आज्ञा का पालन करते हुए उनके बताए हुए मार्ग पर चलना चाहिए।</p>
<p><strong>प्रतियोगिता के प्रतिभागियों का हुआ बहुमान</strong></p>
<p>प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिता के संयोजक डॉ. मनोज जैन, विमल जैन बबलू ने बताया कि मुनिश्री विलोकसागरजी एवं मुनिश्री विबोधसागरजी महाराज के आशीर्वाद और सान्निध्य में तीन-तीन बार तीर्थंकर प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिता रखी गई। विगत दिवस तृतीय प्रतियोगिता के प्रतियोगियों का सम्मान किया गया। प्रतियोगिता को उम्र के हिसाब से तीन श्रेणियों में विभाजित किया गया। इस बार ए श्रेणी में 50 से अधिक, बी एवं सी श्रेणी में 80 से अधिक अंक प्राप्त करने वाले सभी प्रतियोगियों का बहुमान किया गया। ग्रुप ए में आर्जब बवलेश जैन ने 92, श्रेणी बी में साक्षी नरेश जैन ने 93, श्रेणी सी में वयोवृद्ध राजकुमार वरैया ने सर्वाधिक 97 अंक प्राप्त किए। श्रावक श्रेष्ठी यतींद्रकुमार, संजय रेखा जैन, मुरैना के सौजन्य से सभी प्रतियोगियों को पुरस्कार देकर सम्मानित किया गया। आयोजन समिति की ओर से पुरस्कार सौजन्यकर्ता परिवार का बहुमान किया गया।</p>
<p><strong> श्री नसियाजी जिनालय में वार्षिक कलशाभिषेक 21 को</strong></p>
<p>विगत वर्षों की भांति इस वर्ष भी फाटक बाहर स्थित श्री महावीर दिगंबर जैन नसियाजी मंदिर में वार्षिक कलशाभिषेक रविवार 21 सितंबर को किया जा रहा है। इसी दिन नसियाजी जिनालय में जैन मित्र मंडल द्वारा आयोजित सामूहिक क्षमावाणी स्नेह मिलन समारोह एवं श्रद्धेय बुजुर्ग व्यक्तियों का सम्मान समारोह भी होने जा रहा है। मुनिराजों के पावन सान्निध्य में शाम को श्री जिनेन्द्र प्रभु के कलशाभिषेक होंगे। आयोजन में लगभग 2 हजार व्यक्तियों के सम्मिलित होने की संभावना के मद्देनजर सभी तैयारियों को अंतिम रूप दिया जा रहा है।</p>
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		<title>आज होगा तीर्थंकर प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिता का पुरस्कार वितरण : एक सैकड़ा से अधिक प्रतियोगी होंगे सम्मानित </title>
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		<pubDate>Tue, 09 Sep 2025 13:25:59 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[मुरैना में आज शाम बड़े जैन मंदिर में तीर्थंकर प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिता के पुरस्कार वितरण का आयोजन होगा। इस प्रतियोगिता में 250 से अधिक प्रतिभागियों ने भाग लिया था, जिनमें उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वालों को सम्मानित किया जाएगा। पढ़िए मनोज जैन नायक की ख़ास रिपोर्ट… मुरैना में आज शाम 6 बजे बड़े जैन मंदिर में तीर्थंकर [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>मुरैना में आज शाम बड़े जैन मंदिर में तीर्थंकर प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिता के पुरस्कार वितरण का आयोजन होगा। इस प्रतियोगिता में 250 से अधिक प्रतिभागियों ने भाग लिया था, जिनमें उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वालों को सम्मानित किया जाएगा। <span style="color: #ff0000">पढ़िए मनोज जैन नायक की ख़ास रिपोर्ट…</span></strong></p>
<hr />
<p>मुरैना में आज शाम 6 बजे बड़े जैन मंदिर में तीर्थंकर प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिता के पुरस्कार वितरण का आयोजन होगा। इस प्रतियोगिता का उद्देश्य समाज को तीर्थंकरों और महापुरुषों के जीवन चरित्र से अवगत कराना तथा धर्म के प्रति जागरूक करना है।</p>
<p>संयोजक डॉ. मनोज जैन एवं विमल जैन बबलू ने जानकारी दी कि इस प्रतियोगिता का आयोजन पूज्य मुनिश्री विलोकसागर जी और मुनिश्री विबोधसागर जी महाराज की प्रेरणा और आशीर्वाद से किया जा रहा है। प्रतियोगिता में करीब 250 प्रतिभागियों ने भाग लिया था जिन्हें उम्र के आधार पर तीन ग्रुपों में विभाजित किया गया था।</p>
<p>ग्रुप ए में 50 या उससे अधिक अंक, ग्रुप बी और सी में 80 या अधिक अंक प्राप्त करने वाले प्रतिभागियों को सम्मानित किया जाएगा। सभी योग्य प्रतियोगियों को सोशल मीडिया के माध्यम से सूचना दे दी गई है। पुरस्कार वितरण का सौजन्य श्रावक श्रेष्ठि यतीन्द्र कुमार संजय रेखा जैन मुरैना एवं लखमीचंद लालजीराम जैन बानमौर द्वारा किया जा रहा है। संयोजक नवनीत शास्त्री, डॉ. मनोज जैन और विमल जैन बबलू ने सभी प्रतियोगियों से समय पर उपस्थिति की अपील की है।</p>
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		<title>मुनिश्री विलोकसागर जी ने कहा मोह त्यागे बिना आत्मानुभूति संभव नहीं : 28 अगस्त से 6 सितंबर तक मनाया जाएगा पर्युषण पर्व </title>
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		<pubDate>Mon, 18 Aug 2025 11:40:30 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[मुरैना में आध्यात्मिक वर्षायोग 2025 के तहत श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन पंचायती बड़ा जैन मंदिर में चातुर्मासरत आचार्यश्री आर्जवसागरजी महाराज के शिष्य युगल मुनिराज श्री विलोकसागरजी एवं मुनिश्री विबोधसागरजी महाराज ने आचार्यश्री कुंद-कुंद स्वामी द्वारा रचित ग्रंथ समयसार की वाचना की। मुरैना से पढ़िए, मनोज जैन नायक की यह खबर&#8230; मुरैना। नगर के आध्यात्मिक वर्षायोग [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>मुरैना में आध्यात्मिक वर्षायोग 2025 के तहत श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन पंचायती बड़ा जैन मंदिर में चातुर्मासरत आचार्यश्री आर्जवसागरजी महाराज के शिष्य युगल मुनिराज श्री विलोकसागरजी एवं मुनिश्री विबोधसागरजी महाराज ने आचार्यश्री कुंद-कुंद स्वामी द्वारा रचित ग्रंथ समयसार की वाचना की। <span style="color: #ff0000">मुरैना से पढ़िए, मनोज जैन नायक की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>मुरैना।</strong> नगर के आध्यात्मिक वर्षायोग 2025 के तहत श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन पंचायती बड़ा जैन मंदिर में चातुर्मासरत आचार्यश्री आर्जवसागरजी महाराज के शिष्य युगल मुनिराज श्री विलोकसागरजी एवं मुनिश्री विबोधसागरजी महाराज ने आचार्यश्री कुंद-कुंद स्वामी द्वारा रचित ग्रंथ समयसार की वाचना की। इसमें उन्होंने बताया कि मोह रूपी मदिरा शराब से भी ज्यादा नशीली होती है। शराब अथवा किसी भी अन्य व्यसन का नशा तो कुछ देर में या कुछ समय में उतर जाता है और नशा उतरते ही व्यक्ति को सच्चाई का अनुभव होने लगता है। वो व्यक्ति यथार्थ से अवगत हो जाता है। किंतु मोह रूपी मदिरा के नशे में व्यक्ति अपनी आत्मा को ही भूल जाता है। वह अपने मूल स्वरूप से भटक जाता है।</p>
<p>ऐसा व्यक्ति चार गति चौरासी लाख योनियों में भ्रमण करता रहता है। मोह के वशीभूत हमारी आश िक्तबढ़ती जाती है। यह मेरा है, यह मैंने किया है, धन के प्रति, परिवार के प्रति, जमीन जायदाद के प्रति, पद के प्रति आशक्ति बढ़ती जाती है। जिस कारण जीव का संसार भ्रमण बढ़ जाता है। जिस दिन हम यह चिंतन कर लेंगे कि आत्मा का कुछ नहीं हैं, आत्मा तो स्वतंत्र है, आत्मा तो अजर-अमर है, शेष सभी वस्तुएं नाशवान हैं, पुदग़ल वस्तुएं तो नष्ट होना हैं। इनकी आशक्ति ही हमारे दुखों का कारण हैं। अतः हमें राग द्वेषों को त्यागकर आत्मा का चिंतन करना चाहिए।</p>
<p><strong>मोक्ष मार्ग के लिए आशक्ति त्यागना होगी</strong></p>
<p>पूज्यश्री ने कहा कि यह मोहनीय कर्म सबसे जटिल है। यह सबसे अधिक समय तक आत्मा से जुड़ जाता है। अतः हमें विषयों के प्रति, पर पदार्थ के प्रति, संसार के प्रति आशक्ति कम करते हुए मोक्ष मार्ग पर आगे बढ़ते रहने का प्रयास करते रहना चाहिए। जब तक हम मोह के मायाजाल में फंसे रहेंगे, तब तक इस संसार के जन्म मृत्यु के जाल से मुक्त नहीं हो सकते। मोह को त्यागे बिना आत्मानुभूति हो ही नहीं सकती। मोक्ष मार्ग पर बढ़ने के लिए मोह का त्यागना ही होगा।</p>
<p><strong>24 अगस्त को होगी तृतीय तीर्थंकर प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिता</strong></p>
<p>बड़ा मंदिर कमेटी के ऑडिटर एवं प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिता के संयोजक डॉ. मनोज जैन एवं विमल जैन बबलू ने बताया कि मुनिराजश्री विलोकसागरजी एवं मुनिश्री विबोधसागरजी महाराज के पावन सान्निध्य में भूत, भविष्य एवं वर्तमान के 24 तीर्थंकरों के जीवन चरित्र एवं व्यक्तित्व व कृतित्व पर आधारित तृतीय प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिता रविवार 24 अगस्त को शाम 6 बजे से 7 बजे तक होगी। जिसमें 8 से 90 वर्ष तक के साधर्मी बंधु भाग ले सकते हैं। प्रतिभागिता में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले सभी प्रतियोगियों को पुरस्कार देकर बहुमान किया जाएगा।</p>
<p><strong>पर्वराज पर्युषण 28 अगस्त से</strong></p>
<p>वरिष्ठ समाजसेवी अनूप जैन भंडारी ने बताया कि जैन धर्मावलंबियों का सबसे बड़ा पर्व पर्युषण पर्व 28 अगस्त से 6 सितंबर तक संयम की साधना के साथ, विभिन्न धार्मिक आयोजनों के साथ मनाए जाएंगे। ये पर्व 10 दिन मनाया जाता है, इसलिए इन्हें दसलक्षण पर्व भी कहा जाता है। यह पर्व पंचमी से लेकर अन्नत चौदस तक चलते हैं। इन पर्वों का जैन समुदाय में अत्यधिक महत्व होता है। पर्वों के दस दिनों में सभी साधर्मी पूजन, भक्ति, व्रत, उपवास, स्वाध्याय आदि करते हुए जाने-अनजाने में हुए पापों को नष्ट करने के लिए संयम की साधना करते हैं। जैन दर्शन में धर्म के दस लक्षण बताए गए हैं, उत्तम क्षमा, उत्तम मार्दव, उत्तम आर्जव, उत्तम सत्य, उत्तम शोच, उत्तम संयम, उत्तम तप, उत्तम त्याग, उत्तम आकिंचन, उत्तम ब्रह्मचर्य। प्रतिदिन एक-एक लक्षण की व्याख्यान सहित पूजन होता है। इन 10 दिनों में सभी लोग पूर्णतः सादगी के साथ संयम के मार्ग पर चलते हुए श्री जिनेंद्र प्रभु के बताए मार्ग पर चलते हुए अपने पापों को नष्ट करने का प्रयास करते हैं।</p>
<p><strong>जैन मंदिर में वह रही है ज्ञान की गंगा</strong></p>
<p>बड़े जैन मंदिर में प्रतिदिन ज्ञान की गंगा वह रही है। युगल जैन मुनिराजश्री विलोकसागरजी एवं मुनिश्री विबोधसागरजी महाराज प्रतिदिन अपनी अमृत वाणी से प्रवचनों के माध्यम से मानव को संयम के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दे रहे हैं। धार्मिक कक्षाओं के माध्यम से लोगों को जैन संस्कृति एवं जैन सिद्धांतों का अध्ययन कराया जाता है। योग की कक्षाओं के माध्यम से योग की शिक्षा भी दी जाती है। बच्चों को भक्तामर एवं छहढाला का ज्ञान कराया जाता है। वर्षायोग के चार माह में प्रत्येक व्यक्ति कुछ न कुछ सीखने की ललक के साथ युगल मुनिराजों के चरण सान्निध्य में रहकर जीवन जीने की कला के साथ साथ संयम के मार्ग पर चलने की साधना कर रहा है।</p>
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		<title>10 जुलाई तक होगी सिद्धों की आराधना : मुनिश्री के सानिध्य में श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान आरंभ  </title>
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		<pubDate>Thu, 03 Jul 2025 13:03:38 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान एवं विश्व शांति महायज्ञ का 8 दिवसीय आयोजन का शुभारंभ गुरुवार को हुआ। प्रातः पूज्य युगल मुनिराजों के पावन सान्निध्य में श्री जिनेंद्र प्रभु का अभिषेक, शांतिधारा एवं पूजन किया गया। मुरैना से पढ़िए, मनोज जैन की यह खबर&#8230; मुरैना। श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान एवं विश्व शांति महायज्ञ का 8 दिवसीय [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान एवं विश्व शांति महायज्ञ का 8 दिवसीय आयोजन का शुभारंभ गुरुवार को हुआ। प्रातः पूज्य युगल मुनिराजों के पावन सान्निध्य में श्री जिनेंद्र प्रभु का अभिषेक, शांतिधारा एवं पूजन किया गया। <span style="color: #ff0000">मुरैना से पढ़िए, मनोज जैन की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>मुरैना।</strong> श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान एवं विश्व शांति महायज्ञ का 8 दिवसीय आयोजन का शुभारंभ गुरुवार को हुआ। प्रातः पूज्य युगल मुनिराजों के पावन सान्निध्य में श्री जिनेंद्र प्रभु का अभिषेक, शांतिधारा एवं पूजन किया गया। प्रतिष्ठाचार्य बाल ब्रह्मचारी संजय भैयाजी (मुरैना वाले) ने मंडप, विधान मांडना, पांडाल एवं सभी पात्रों की शुद्धि का कार्यक्रम मंत्रोचारण के साथ संपन्न कराया। 3 जुलाई से 10 जुलाई तक निरंतर 8 दिन सिद्धों की पूजा भक्ति करते हुए अर्घ्य समर्पित किए जाएंगे।</p>
<p><strong>पुण्य आपको मन की शांति और अपार वैभव देता है</strong></p>
<p>सांसारिक प्राणी मोह माया के चक्कर में अपना पूरा जीवन व्यर्थ ही बर्बाद कर देता है। वह धन का संचय तो करता है लेकिन पुण्य का संचय नहीं करता। धन केवल आपको इस भव में सांसारिक सुख तो दे सकता है लेकिन, पुण्य आपको मन की शांति और अपार वैभव देता है। यह उद्गार मुनिश्री विलोकसागर जी ने यहां धर्मसभा में व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि हम सभी जीवन की वास्तविकता को जानकर भी गलतफहमी में जी रहे है। सारी जिंदगी सपनों की दुनिया में जीते हुए जो कुछ हम जुटाते हैं वो सब यही धरा रह जाना है। चक्रवर्ती सम्राटों के पास अपार वैभव था, लेकिन जब उन्हें वैराग्य हुआ तो सारा वैभव उन्होंने एक क्षण में त्याग दिया। हम और आप मोह माया में पढ़े हुए हैं।</p>
<p><strong>पुण्य का संचय हो और आपका परलोक भी सुधरेगा</strong></p>
<p>मुनिश्री ने कहा कि आपका मस्तिष्क व्यवस्थित है तो आपको सारा संसार व्यवस्थित लगेगा। ज्ञान की बातें हम सब स्वीकार करते हैं पर उसे अंगीकार नहीं करते। जीवन की वास्तविकता को यदि हम श्रद्धा से स्वीकार करले, धर्म के सिद्धांतों को अंगीकार कर लें तो परिणति ही बदल जाएगी। हम सब को पता है कि अंतिम समय आने पर हम सबकुछ छोड़कर जाना है, कुछ भी साथ लेकर नहीं जाएंगे। फिर भी हम दिन रात कुछ न कुछ जोड़ने में ही लगे रहते है। बच्चों को उनके पाप पुण्य के अनुसार जो होगा वहीं मिलेगा, हमारा उनके लिए जोड़ना कुछ काम नहीं आएगा। आप धन का कितना भी संचय कर लें, लेकिन जब इस संसार से विदा होने का समय आएगा तब सब यहीं रखा रह जाएगा, केवल आपके अच्छे-बुरे कर्म ही साथ जाएंगे। हे! भव्य प्राणी अपनी इस चंचला लक्ष्मी का उपयोग अच्छे कार्यों में करो, प्रभु की भक्ति करो, ताकि पुण्य का संचय हो और आपका परलोक भी सुधरेगा।</p>
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		<title>संसार में कोई भक्ति में मग्न है, कोई भोगों में लिप्त: 3 से 10 जुलाई तक होगी सिद्धों की आराधना </title>
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		<pubDate>Wed, 25 Jun 2025 15:34:31 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[प्राणियों में विरले ही ऐसे भव्य जीव होते हैं, जिनके मन में स्व कल्याण की भावना पनपती है। ऐसे भव्य जीव जिनके मन में अपने जीवन के लक्ष्य को प्राप्त करने का भाव उत्पन्न हुआ है। संसार का भ्रमण करते करते वह थक चुका है। मुनिश्री विलोकसागर जी के प्रवचनों का लाभ ले रहे हैं [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>प्राणियों में विरले ही ऐसे भव्य जीव होते हैं, जिनके मन में स्व कल्याण की भावना पनपती है। ऐसे भव्य जीव जिनके मन में अपने जीवन के लक्ष्य को प्राप्त करने का भाव उत्पन्न हुआ है। संसार का भ्रमण करते करते वह थक चुका है। मुनिश्री विलोकसागर जी के प्रवचनों का लाभ ले रहे हैं मुरैनावासी। <span style="color: #ff0000">मुरैना से पढ़िए, मनोज जैन नायक की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>मुरैना।</strong> प्राणियों में विरले ही ऐसे भव्य जीव होते हैं, जिनके मन में स्व कल्याण की भावना पनपती है। ऐसे भव्य जीव जिनके मन में अपने जीवन के लक्ष्य को प्राप्त करने का भाव उत्पन्न हुआ है। संसार का भ्रमण करते करते वह थक चुका है। चार गति और चौरासी लाख योनियों में घूमते-घूमते वह परेशान हो चुका है। इस असार संसार के जन्म मृत्यु के चक्रव्यूह से निकलने के लिए वह झटपटा रहा है। उसे अपने जीवन के लक्ष्य को को प्राप्त करना है। जब ऐसा भाव या विचार जिस भव्य जीव के मन में जागृत हो जाता है। वही भव्य जीव नर से नारायण बनने की साधना प्रारंभ कर देता है। ऐसी भव्य आत्मा के लिए संसार अभिशाप नहीं वरदान बन जाता है। यह उद्गार मुनिश्री विलोक सागर जी ने बड़े जैन मंदिर में धर्म सभा में व्यक्त किए।</p>
<p>उन्होंने कहा कि संसार और समय तो सभी जीवों के लिए एक समान होता है। संसार में ही भगवान है और संसार में ही शैतान है। संसार में रहते हुए एक व्यक्ति भगवान की भक्ति, पूजा पाठ और आराधना कर रहा है वहीं दूसरी ओर एक व्यक्ति दुराचार, अत्याचार करते हुए पापकर्मों का आश्रव कर रहा है। कोई भोगों में लिप्त है, कोई भक्ति में मग्न है। कोई विषय वासना में रत है तो कोई संयम की साधना करते हुए वैराग्य पथ की ओर अग्रसर है। हे! भव्य आत्माओं हमारे भाव, हमारे मन की दृढ़ इच्छा शक्ति ही हमें उन्नति का मार्ग दे सकती है और हमारे अनुचित भाव ही हमें पतन की ओर ले जा सकते हैं। हमें यह सुनिश्चित करना है कि जाना किस मार्ग पर है। हम अच्छे मार्ग पर चलने का प्रयास तो कर ही सकता हैं। गुरुदेव ने कहा कि आज से करोड़ों वर्ष पूर्व भगवान ऋषभदेव ने ‘ऋषि बनो या कृषि करो’ का उपदेश दिया था। उन्होंने कहा था कि पूज्य बनो या पूज्य महापुरुषों की आराधना करो। पूज्य महापुरुषों की आराधना करते-करते आप भी एक दिन पूज्य बन जाओगे।</p>
<p>इसीलिए हमें अपने इष्ट के, अपने गुरुओं के, पूज्य महापुरुषों के उपदेश आवश्यक रूप से श्रमण करना चाहिए। उन्हें अपना आदर्श मानकर उनके बताए हुए मार्ग पर चलना चाहिए। संतों का उपदेश, संतों की प्रेरणा, संतों की चर्या हमें सन्मार्ग बताती है और सही मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है। जब हम सन्मार्ग की ओर अग्रसर होंगे तो हमारा मोक्ष मार्ग प्रशस्त होगा। अंत में यही सब कार्य मोक्ष महल सिद्धालय तक ले जाने में सहायक बनते हैं।</p>
<p><strong>सिद्धचक्र विधान एवं विश्व शांति महायज्ञ का होगा आयोजन</strong></p>
<p>सभी साधर्मी बंधुओं की भावना के अनुरूप् युगल मुनिराजों के सानिध्य में 8 दिवसीय सिद्धों की आराधना जुलाई माह के प्रथम सप्ताह में होने जा रहा है। विधान के मुख्य संयोजक अनूप जैन भंडारी ने बताया कि जैन दर्शन में सिद्धचक्र विधान का अत्यधिक महत्व है। सभी विधानों में इस विधान को सर्वश्रेष्ठ विधान बताया गया है। इसीलिए सिद्धचक्र विधान को विधानों का राजा कहा जाता है। जैन कुल में जन्म लेने वाला प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवनकाल में कम से कम एक बार श्री सिद्धचक्र विधान को करने की अभिलाषा रखता है। इस बार जुलाई माह की अष्टानिका पर्व में सकल जैन समाज मुरैना की ओर से विधान होने जा रहा है। श्री 1008 सिद्धचक्र महामंडल विधान एवं विश्व शांति महायज्ञ का आयोजन 3 से 10 जुलाई तक बड़े जैन मंदिर मुरैना में होने जा रहा है। इस विधान के तहत निरंतर 8 दिन सिद्ध परमेष्ठि की आराधना, पूजा, भक्ति करते हुए अर्घ समर्पित किए जाएंगे। अंतिम दिन 11 जुलाई को विश्व शांति एवं कल्याण की भावना के साथ महायज्ञ किया जाएगा। तत्पश्चात श्री जिनेंद्र प्रभु की भव्य एवं विशाल रथ यात्रा निकाली जाएगी।</p>
<p><strong>णमोकार महामंत्र लेखन प्रतियोगिता होगी</strong></p>
<p>मुनिराजों के पावन सानिध्य सभी बंधुओं एवं माता बहनों के लिए महामंत्र णमोकार लेखन प्रतियोगिता का आयोजन किया गया है। जो सबसे अधिक संख्या में महामंत्र का लेखन करेगा। उन सभी को प्रथम, द्वितीय, तृतीय एवं सांत्वना पुरस्कारों से सम्मानित किया जाएगा।</p>
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