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	<title>मुनिश्री विलोकसागरजी महाराज &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<title>मुनिश्री विलोकसागरजी महाराज &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>सिद्धचक्र महामंडल विधान में 19 नवंबर को 512 अर्घ्य समर्पित होंगे: मुनिश्री ने कहा किसी की आस्था सम्यक पर तो किसी की मिथ्यात्व पर होती है  </title>
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		<pubDate>Tue, 18 Nov 2025 10:06:23 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जैन समाज के आराध्य मुनिश्री विलोकसागरजी महाराज ने शहर के बड़े जैन मंदिर में सिद्धचक्र महामंडल विधान के दौरान धर्मसभा में कहा कि आस्था और विश्वास पर ही संसार की सभी व्यवस्थाएं चल रही हैं। सभी की आस्था कहीं ना कहीं तो होती ही है।  मुरैना से पढ़िए, मनोज जैन नायक की यह खबर&#8230; मुरैना। [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>जैन समाज के आराध्य मुनिश्री विलोकसागरजी महाराज ने शहर के बड़े जैन मंदिर में सिद्धचक्र महामंडल विधान के दौरान धर्मसभा में कहा कि आस्था और विश्वास पर ही संसार की सभी व्यवस्थाएं चल रही हैं। सभी की आस्था कहीं ना कहीं तो होती ही है।  <span style="color: #ff0000">मुरैना से पढ़िए, मनोज जैन नायक की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>मुरैना।</strong> जैन समाज के आराध्य मुनिश्री विलोकसागरजी महाराज ने शहर के बड़े जैन मंदिर में सिद्धचक्र महामंडल विधान के दौरान धर्मसभा में कहा कि आस्था और विश्वास पर ही संसार की सभी व्यवस्थाएं चल रही हैं। सभी की आस्था कहीं ना कहीं तो होती ही है। अंतर इतना है कि मिथ्यात्व पर होती है या सम्यक पर होती है। विश्वास तो करना ही पड़ता है। कुदेव पर कर लें, चाहे सच्चे देव पर कर लें। वस्तु के सही स्वरूप पर कर लें या विपरीत स्वरूप पर कर लें। वस्तु के सही स्वरूप पर विश्वास करने वाला व्यक्ति सम्यक दृष्टि होता है। विपरीत पर विश्वास करने वाला व्यक्ति मिथ्या दृष्टि होता है।</p>
<p><strong>मार्ग सब जानते हैं लेकिन&#8230;</strong></p>
<p>अध्यात्म में क्रिया का महत्व कम तथा श्रद्धा का महत्व अधिक होता है। आपकी श्रद्धा और आपका विश्वास कैसा है, वह कौन है। सम्यक दर्शन का कार्य सच्चाई से जोड़ना है। वह आभास दिलाता है और सत्य को पहचानता है। मार्ग सब जानते हैं लेकिन, मार्ग सच्चा है या झूठा यह कोई नहीं जानता। इस अवसर पर मुनिश्री विबोधसागरजी ने कहा कि राग को बढ़ाने से राग बढ़ता है। मोबाइल तो सबके पास है, खाली बैठे हैं तो रील आदि देखने लगते हैं। फिर थोड़ी देर बाद दोबारा देखने का मन हो गया तो राग बढ़ गया। इन सभी कारणों से हम आध्यात्म से दूर हो रहे हैं। हमें राग को बढ़ाना नहीं है, कम करना है। राग कम होगा तभी हम आध्यात्म से जुड़ पाएंगे और इस संसार के जन्म मृत्य के मोह जाल से निकलकर सिद्ध शिला की ओर बढ़ेंगे।</p>
<p><strong>आठ दिवसीय अनुष्ठान में पूजा भक्ति आराधना का समागम</strong></p>
<p>आठ दिवसीय सिद्धों की आराधना में मंगलवार को 256 अर्घ्य समर्पित किए गए। बड़े जैन मंदिर में 8 दिवसीय सिद्धों की आराधना के भक्ति मय अनुष्ठान में प्रतिष्ठाचार्य पंडित राजेंद्र शास्त्री मंगरोनी ने विधान की पूजन कराते हुए एक-एक श्लोक का अर्थ समझाया। सिद्धों की आराधना करते हुए बुधवार को पांचवे दिन 512 अर्घ्य समर्पित किए जाएंगे। विधान पूजन से पूर्व भगवान वासपूज्य स्वामी का जलाभिषेक, शांतिधारा एवं पूजन किया गया। आचार्यश्री विद्यासागरजी एवं आचार्यश्री आर्जवसागरजी के चित्र का अनावरण किया गया। साथ ही दीप प्रज्वलन किया गया। मुनिराजों को शास्त्र भेंट श्रावक-श्रेष्ठियों ने किए।</p>
<p><strong>श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान का महत्व </strong></p>
<p>प्रतिष्ठाचार्य पंडित राजेंद्र शास्त्री मंगरोनी ने बताया कि सिद्धचक्र विधान कराने से कोढ़ नामक बीमारी ठीक हुई थी। श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान सर्व प्रथम मैना सुंदरी ने किया था। मैना सुंदरी के पति श्रीपाल को कोढ़ की बीमारी थी। दिगंबर जैन मुनिराज ने मैना सुंदरी को बताया कि यदि तुम अपने पति का कोढ़ ठीक करना चाहती हो तो भक्ति एवं श्रद्धा के साथ श्री सिद्धचक्र विधान करो। मुनिराज के बताए अनुसार मैना सुंदरी ने विधान किया। विधान के दौरान श्री जिनेंद्र प्रभु का अभिषेक कोढ़ पर लगाया तो उसके पति का कोढ़ ठीक हो गया। तभी से श्री सिद्ध चक्र विधान का महत्व बढ़ गया और सभी लोग इस विधान को करने के लिए लालायित रहते हैं।</p>
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		<title>हम ऐसे कर्म करें जिससे मनुष्य जन्म लेना सार्थक हो : सिद्ध परमेष्ठियों की भक्ति मय पूजन के साथ समर्पित होंगे 256 अर्घ्य  </title>
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		<pubDate>Mon, 17 Nov 2025 11:54:00 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[सिद्धों की आराधना पूजा भक्ति उपासना के अनुष्ठान के अवसर पर बड़े जैन मंदिर में मुनिश्री विलोकसागरजी महाराज ने धर्मसभा में कहा कि पुण्योदय से ही हम सभी को मनुष्य पर्याय में जन्म मिला है। जब हमें मनुष्य पर्याय मिली है तो हमें ऐसे कर्म करना चाहिए, जिससे हमारा मनुष्य जन्म लेना सार्थक हो जाए। [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>सिद्धों की आराधना पूजा भक्ति उपासना के अनुष्ठान के अवसर पर बड़े जैन मंदिर में मुनिश्री विलोकसागरजी महाराज ने धर्मसभा में कहा कि पुण्योदय से ही हम सभी को मनुष्य पर्याय में जन्म मिला है। जब हमें मनुष्य पर्याय मिली है तो हमें ऐसे कर्म करना चाहिए, जिससे हमारा मनुष्य जन्म लेना सार्थक हो जाए। <span style="color: #ff0000">मुरैना से पढ़िए, मनोज जैन नायक की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>मुरैना।</strong> सिद्धों की आराधना पूजा भक्ति उपासना के अनुष्ठान के अवसर पर बड़े जैन मंदिर में मुनिश्री विलोकसागरजी महाराज ने धर्मसभा में कहा कि पुण्योदय से ही हम सभी को मनुष्य पर्याय में जन्म मिला है। जब हमें मनुष्य पर्याय मिली है तो हमें ऐसे कर्म करना चाहिए, जिससे हमारा मनुष्य जन्म लेना सार्थक हो जाए। अच्छे कर्म करोगे तो सुखद परिणाम मिलेगे, बुरे कर्म करोगे तो दुखद परिणाम मिलेंगे। जैन दर्शन के अनुसार मनुष्य के तीन मित्र उसके कर्म, परिवार और धन हैं। कर्म सबसे सच्चा और स्थायी मित्र है। जीवन भर किए गए कर्म ही मृत्यु के बाद आत्मा के साथ जाते हैं। परिवार और प्रियजन केवल जीवन भर साथ देते हैं और मृत्यु के बाद, श्मशान तक ही मित्र बने रहते हैं। मृत्यु के साथ उनकी मित्रता का अंत हो जाता है। धन भी एक क्षणिक मित्र है। श्वासों की लय समाप्त होते ही धन से बनी मित्रता समाप्त हो जाती है। व्यक्ति के कर्म जीवन के हर मोड़ पर उसका साथ देते हैं। अच्छे कर्म व्यक्ति को अच्छे परिणाम देते हैं, जबकि बुरे कर्म उसकी दुर्गति का कारण बनते हैं। इसीलिए धर्म को, मनुष्य के कर्मों को ही सच्चा मित्र कहा गया है। वे हर समय जन्मजन्मांतर तक उसके साथ रहते हैं।</p>
<p><strong>जन्म जन्मांतर के पाप नष्ट हो जाते हैं</strong></p>
<p>प्रतिष्ठाचार्य पंडित राजेंद्र शास्त्री मंगरोनी ने मंत्रोच्चारण के साथ अभिषेक, शांतिधारा के पश्चात विधानकर्ताओं को संबोधित करते हुए कहा कि श्रद्धाभक्ति के साथ विधि विधान एवं शुद्धि सहित सिद्धों की अर्चना करने से जन्म जन्मांतर के पाप नष्ट हो जाते हैं। विधान के पांचवें दिन मंगलवार को 256 अर्घ्य समर्पित किए जाएंगे। पुण्य कर्मों के कारण ही हम सभी धार्मिक अनुष्ठान करने का पावन अवसर प्राप्त होता है। इस पवित्र मौके का हमें पूरा लाभ लेना चाहिए। विधान के चतुर्थ दिन संगीत की मधुर धुन पर पूजा भक्ति करते हुए सभी इंद्र-इंद्राणियों ने अष्टदृव्य अर्घ्य के साथ 128 श्रीफल समर्पित किए। सिद्धों की आराधना करते हुए कुबेर इंद्र ने भक्तिमय भजनों पर भक्ति नृत्य प्रस्तुत करते हुए रत्नों की वर्षा की। विधान की पूजन से पूर्व सौधर्म इंद्र के साथ अन्य सभी इन्द्रो ने श्री जी की प्रतिमा का अभिषेक, शांतिधारा एवं नित्यमह पूजन कर संपूर्ण वातावरण को भक्तिमय बना दिया। विधानाचार्य पंडित राजेंद्र शास्त्री मंगरोनी ने मंत्रोच्चारण करते हुए सभी क्रियाओं को सम्पन्न कराया।</p>
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		<title>साधु संत अपने एक-एक पल का सदुपयोग करते हैं : 8 दिवसीय श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान में रविवार को 64 अर्घ्य होंगे समर्पित  </title>
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		<pubDate>Sat, 15 Nov 2025 11:39:06 +0000</pubDate>
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<p><strong>आठ दिवसीय धार्मिक अनुष्ठान के दूसरे दिवस मुनिश्री विलोकसागरजी महाराज ने बड़े जैन मंदिर में धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि जो समय का सदुपयोग करते हैं, वो इतिहास रचते हैं और जो समय का दुरपयोग करते हैं, वे मानव पर्याय को यूं हीं बर्बाद करते हैं। <span style="color: #ff0000">मुरैना से पढ़िए, मनोज जैन नायक की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>मुरैना</strong>। आठ दिवसीय धार्मिक अनुष्ठान के दूसरे दिवस मुनिश्री विलोकसागरजी महाराज ने बड़े जैन मंदिर में धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि जो समय का सदुपयोग करते हैं, वो इतिहास रचते हैं और जो समय का दुरपयोग करते हैं, वे मानव पर्याय को यूं हीं बर्बाद करते हैं। साधु संत अपने एक-एक पल का सदुपयोग करते हैं, वे चलते-फिरते, उठते-बैठते, सोते-जागते यानि कि प्रतिपल, हर समय प्रभु का स्मरण, प्रभु की स्तुति और मंत्रों का जप करते हुए संयम की साधना में लीन रहते हैं। सांसारिक प्राणियों को भी अपनी व्यस्तम जिंदगी में समय का सदउपयोग करना चाहिए। जैन धर्म में समय का उपयोग मुख्य रूप से सामायिक, दैनिक जीवन में मौन और स्वाध्याय के माध्यम से बताया गया है। सामायिक में धर्म-ध्यान, आत्म-चिंतन और संसार की नश्वरता पर विचार किया जाता है। सांसारिक प्राणीयो द्वारा व्यस्त दिनचर्या में भी, जैसे मॉर्निंग वॉक या यात्रा के दौरान, मौन रहकर, प्रभु का स्मरण करते हुए णमोकार मंत्र आदि का जाप करके समय का सदुपयोग किया जा सकता है। सामायिक एक प्रतिदिन की जाने वाली धार्मिक क्रिया है। जिसमें समतापूर्वक शांत होकर धर्म-ध्यान किया जाता है, जो कि गृहस्थ और साधु दोनों के लिए अनिवार्य है। जैन धर्म में समय का सदुपयोग आत्म-शुद्धि और मोक्ष प्राप्ति की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। सामायिक जैसी क्रियाएं व्यक्ति को धार्मिक जीवन के करीब लाती हैं और उसे आध्यात्मिक प्रगति में मदद करती हैं।</p>
<p><strong> आचार्यश्री ज्ञानसागरजी महाराज का 5 वां समाधि दिवस</strong></p>
<p>मुरैना में जन्में सराकोद्धारक आचार्यश्री ज्ञानसागर जी महाराज की 5वीं समाधि स्मृति दिवस पर मुनिश्री विलोकसागरजी महाराज ने कहा कि आचार्य ज्ञानसागरजी महाराज ने जैनेश्वरी दीक्षा लेकर जीवनपर्यंत भगवान महावीर स्वामी द्वारा प्रतिपादित सत्य, अहिंसा, जीवदया, शाकाहार और जियो और जीने दो के सिद्धांतों का प्रचार-प्रसार करते हुए प्राणी मात्र को संयम और सादगी के साथ जीवन जीने के लिए प्रेरित किया। जैन सिद्धांतों से भटके हुए सराक बंधुओं को धर्म की मूलधारा में शामिल करने का कारण वे सराकोद्धारक के नाम से संपूर्ण भारत में प्रसिद्ध हुए। पूज्य श्री की प्रेरणा से अनेकों मंदिरों, धर्मशालाओं, तीर्थों, संस्थाओं का निर्माण हुआ। आचार्यश्री ज्ञानसागर जी ने मुरैना को जैन तीर्थ के रूप में ‘ज्ञानतीर्थ’ जैसी अनुपम कृति प्रदान की। आज भले ही पूज्यश्री हमारे बीच शारीरिक रूप से मौजूद नहीं हैं, लेकिन उनके उपदेश, उनकी शिक्षाएं, उनके द्वारा दिए गए संस्कार उन्हें सदैव सदैव हमारे हृदय में जीवंत बनाए रखेंगे। हम सभी को चाहिए कि एकजुटता के साथ उनके द्वारा छोड़े गए कार्यों को पूर्ण करते हुए उनके द्वारा बताए गए मार्ग पर चलने का प्रयास करें। यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।</p>
<p><strong> विधान में रविवार को 64 अर्घ्य होगे समर्पित</strong></p>
<p>प्रतिष्ठाचार्य पंडित राजेंद्र शास्त्री मंगरोनी ने बताया कि 8 दिवसीय श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान में रविवार को तृतीय दिन सिद्धों की आराधना, पूजा, भक्ति, उपासना, स्तुति करते हुए इंद्र इंद्राणियों ने अष्टद्रव्य के साथ 64 अर्घ्य समर्पित किए जाएंगे। प्रारंभ में जिनेंद्र प्रभु का अभिषेक, शांतिधारा, नित्यमह पूजन के बाद पुण्यार्जक परिवार कैलाशचंद राकेशकुमार जैन पूणारावत परिवार ने मंचासीन मुनिश्री विलोकसागरजी महाराज के पाद प्रक्षालन करते हुए उन्हें शास्त्र भेंट किए। धर्मसभा के मध्य सराकोद्धारक आचार्यश्री ज्ञानसागरजी महाराज के चित्र का अनावरण कर दीप प्रज्वलित किया गया। भक्तिरस में सरोवर सभी लोग सिद्ध परमेष्ठियों का गुणगान कर रहे थे।</p>
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		<title>विषम परिस्थितियों में समता भाव रखना भी बड़ी तपस्या: मुनिश्री विलोकसागर जी ने ‘समयसार’ ग्रंथ की वाचना कर बताए जीवन के रहस्य  </title>
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		<pubDate>Wed, 15 Oct 2025 13:35:58 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[मुनिश्री विलोकसागरजी महाराज ने बड़े जैन मंदिर में सिद्धांत ग्रंथ ‘समयसार’ की व्याख्या करते हुए कहा कि विपरीत परिस्थितियों में मन की स्थिति को अनुकूल रखना भी एक साधना है। पूजा पाठ भक्ति अनुष्ठान व्रत उपवास तो कोई भी कर सकता है और करता भी है। मुरैना से पढ़िए, मनोज जैन नायक की यह खबर&#8230; [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>मुनिश्री विलोकसागरजी महाराज ने बड़े जैन मंदिर में सिद्धांत ग्रंथ ‘समयसार’ की व्याख्या करते हुए कहा कि विपरीत परिस्थितियों में मन की स्थिति को अनुकूल रखना भी एक साधना है। पूजा पाठ भक्ति अनुष्ठान व्रत उपवास तो कोई भी कर सकता है और करता भी है। <span style="color: #ff0000">मुरैना से पढ़िए, मनोज जैन नायक की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong>मुरैना।</strong> मुनिश्री विलोकसागरजी महाराज ने बड़े जैन मंदिर में सिद्धांत ग्रंथ ‘समयसार’ की व्याख्या करते हुए कहा कि विपरीत परिस्थितियों में मन की स्थिति को अनुकूल रखना भी एक साधना है। पूजा पाठ भक्ति अनुष्ठान व्रत उपवास तो कोई भी कर सकता है और करता भी है। वर्तमान में सांसारिक प्राणी इन्हीं सब को धर्म और तपस्या समझ रहा है लेकिन, सबसे बड़ी तपस्या मन को काबू में रखना है। विषम परिस्थितियों में समता भाव रखना ही सबसे बड़ी तपस्या है। अधिकांशतः प्राणी पाप कर्मों में लिप्त रहता है, दूसरों की निंदा करता है, दूसरों के खोट देखता है, दूसरों का बुरा सोचता है। बुरा सोचते-सोचते वह अच्छे कार्यों से दूर होता चला जाता है। भौतिकवादी चकाचौध में मनुष्य ने पाप कर्मों से डरना छोड़ दिया है लेकिन, यही कर्म जब उदय में आते हैं तो करोड़पति को खाकपति बनने में देर नहीं लगती। कर्मों की मार मनुष्य का कचूमर निकाल देती है।</p>
<p>इसलिए हमें बुरे कर्मों से डरना चाहिए, उनका पूर्णतः त्याग करना चाहिए। हमारे परिणाम बुरे है तो कर्म बुरे फल देगा और आपके परिणाम अच्छे हैं तो कर्म अच्छे फल देगा। कर्म की मार को सभी को झेलना होगा। जिसका भाग्य ही दुर्भाग्य में बदल गया हो उसे कोई क्या मारेगा, उसे तो उसके कर्म ही मारेंगे। मनुष्य अपने अवगुणों को नजरअंदाज करते हुए दूसरों के अवगुणों को देखता है, दूसरों के भावों को देखता है। हमें जो भी परिणाम मिलेगे अपने भावों की परिणीति से मिलेंगे। किसी अन्य के भावों की परिणीति से हमारा कल्याण होने वाला नहीं है। स्वयं के कर्मों को सुधारने से ही इस संसार सागर से मुक्ति मिल सकती है।</p>
<p><strong>जैन धर्म कर्म सिद्धांत पर आधारित है </strong></p>
<p>कर्म सिद्धांत की व्याख्या करते हुए मुनिश्री विबोधसागरजी ने बताया कि जैन दर्शन कर्म सिद्धांत पर आधारित है। कर्म सिद्धांत एक ऐसा सिद्धांत है जो कहता है कि हर व्यक्ति अपने कर्मों (अच्छे या बुरे) के फलों के लिए स्वयं जिम्मेदार है, और इन कर्मों का प्रभाव वर्तमान और भविष्य में उसके जीवन को निर्धारित करता है। इसका मतलब है कि अच्छे कर्म अच्छे परिणाम लाते हैं, जबकि बुरे कर्म दुख का कारण बनते हैं। यह एक ष्जैसा बोओगे वैसा काटोगेष् का सिद्धांत है। जैन धर्म के अनुसार, आत्मा के कर्मों का फल केवल आत्मा को ही भोगना पड़ता है। कोई भी तंत्र मंत्र गुरु भगवान, किसी को उसके कर्मों के फल से नहीं बचा सकता। स्वयं ही कर्मों की निर्जरा करके आत्मा को कर्मों के बंधनों से मुक्त होना पड़ता है। जब तक तेरे पुण्य का, बीता नहीं करार, अवगुण तेरे माफ हैं, चाहे करो हजार। पूर्वाचार्यों ने कहा है कि जब तक मनुष्य के पुण्य कर्मों का उदय चल रहा है, तब तक वह खूब मौज मस्ती करले, सभी सुखों को भोग ले, खूब अनीति, अनाचार और पाप करले, सभी माफ हैं, लेकिन जब पाप कर्मों का उदय आएगा तो तेरा बेड़ा गर्क हो जाएगा। इसीलिए अच्छे समय में भी हमें अच्छे कर्म ही करना चाहिए, ताकि जीवन में, भविष्य में दुखों का सामना न करना पड़े।</p>
<p><strong>कर्मों के अनुरूप ही मिलता है फल</strong></p>
<p>कर्म का फल मुख्य रूप से ईश्वर ही देता है, क्योंकि वही सबसे न्यायप्रिय और सर्वशक्तिमान है। ईश्वर भी अपनी मर्जी से कुछ नहीं करता। वह भी आपको कर्मों के फलस्वरूप ही परिणाम देता है। ईश्वर ही कर्मों का अंतिम और सबसे सच्चा फलदाता है क्योंकि, वह सभी के कर्मों का पल-पल का लेखा जोखा रखता है। वह अदृश्य शक्ति, वह सर्व शक्तिमान बिना किसी भेदभाव व बिना किसी पक्षपात के सभी को उनके कर्मों के अनुरूप उचित फल देता है। अपने अच्छे, बुरे भावों और विचारों से ही जीवन शांत-अशांत और सुख, दुःख का कारण बनता है। परिणामों का खेल बड़ा विचित्र है, क्योंकि स्वर्ग, नरक से लेकर मोक्ष तक की स्थिति में भी परिणामों का प्रतिफल ही एकमात्र कारण है।</p>
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		<title>गुरु आशीष के बिना संसार सागर से मुक्ति संभव नहीं : मुरैना में भक्तों ने युगल मुनिराजों का 7वां दीक्षा दिवस मनाया </title>
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		<pubDate>Sat, 11 Oct 2025 13:03:55 +0000</pubDate>
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<p><strong>जीवन में गुरु के महत्व और आवश्यकता को नकारा नहीं जा सकता । आध्यात्मिक क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए एक सच्चे गुरु का होना अति आवश्यक है। गुरु ही हमें अच्छे बुरे की पहचान कराते हुए आध्यात्म मार्ग पर चलने की प्रेरणा देते हैं। यह उद्गार मुनिश्री विलोकसागरजी महाराज ने अपने 7वें मुनि दीक्षा दिवस पर बड़े जैन मंदिर में धर्मसभा में व्यक्त किए। <span style="color: #ff0000">मुरैना से पढ़िए, मनोज जैन नायक की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong>मुरैना।</strong> जीवन में गुरु के महत्व और आवश्यकता को नकारा नहीं जा सकता । आध्यात्मिक क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए एक सच्चे गुरु का होना अति आवश्यक है। गुरु ही हमें अच्छे बुरे की पहचान कराते हुए आध्यात्म मार्ग पर चलने की प्रेरणा देते हैं। यह उद्गार मुनिश्री विलोकसागरजी महाराज ने अपने 7वें मुनि दीक्षा दिवस पर बड़े जैन मंदिर में धर्मसभा में व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि आध्यात्मिक राह पर चलने वाले व्यक्तियों के लिए एक सच्चे और अनुभवी गुरु का मार्गदर्शन आवश्यक है, जो उन्हें ज्ञान प्राप्त करने और व्यक्तिगत तथा आध्यात्मिक विकास में मदद करता है। गुरु का सान्निध्य और ज्ञान शिष्य को असीमित क्षमता से परिचित कराता है और उसे अपने भीतर छिपे सामर्थ्य को पहचानने में मदद करता है। आध्यात्मिक गुरु एक ऐसा व्यक्तित्व होता है, जो भक्ति, संयम, अध्यात्म, विश्वास और ज्ञान में शिष्यों का मार्गदर्शन करता है। वह अपने शिष्यों को आध्यात्मिक और संस्कारित विकास की ओर ले जाता है। गुरु अपने ज्ञान और अनुभव के माध्यम से शिष्यों को सांसारिक जीवन के भ्रम और संशय से बाहर निकालते हुए आध्यात्मिक ज्ञान प्रदान करते हैं और कृतज्ञता और शांति का भाव जगाते हैं। आध्यात्मिक गुरु वह होते हैं, जो स्वयं के कल्याण के साथ प्राणी मात्र के कल्याण की भावना रखते हैं।</p>
<p><strong>गुरु शब्दों से ज़्यादा अपने आचरण से सिखाता है</strong><br />
गुरु जीवन के गहन सत्यों और नियमों को समझाते हैं, जिससे शिष्य के मन को प्रबुद्धता एवं एकाग्रता प्राप्त होती है। गुरु की उपस्थिति में सुकून और शांति का अनुभव होता है। एक सच्चा गुरु शब्दों से ज़्यादा अपने आचरण से सिखाता है, जिससे शिष्यों को प्रेरणा मिलती है। आध्यात्मिक गुरु की पहचान एक सच्चा गुरु भौतिकता, क्रोध, मान, माया और लोभ जैसी सांसारिक भावनाओं से दूर रहकर स्वयं का और अन्य लोगों का कल्याण करते हैं।</p>
<p><strong>गुरु मानसिक और आध्यात्मिक विकास में भी मार्गदर्शन करते हैं</strong><br />
अपने सातवें संयम दीक्षा दिवस के अवसर पर मुनिश्री विबोधसागरजी महाराज ने गुरु के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि जीवन में गुरु का महत्व अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि गुरु ज्ञान और नैतिकता का मार्ग प्रशस्त करते हैं, चरित्र का निर्माण करते हैं और जीवन में सही दिशा दिखाते हैं। गुरु न केवल शैक्षिक प्रगति में बल्कि नैतिक, मानसिक और आध्यात्मिक विकास में भी मार्गदर्शन करते हैं। जिससे शिष्यों जीवन की कठिनाइयों का सामना करने और अपनी क्षमता का पूरा उपयोग करने में सक्षम होता है। गुरु के बिना जीवन दिशाहीन हो सकता है, क्योंकि वे ज्ञान रूपी अमृत से शिष्य को सिंचित कर उसे चरित्रवान और समर्थ बनाते हैं। बिना गुरु के संयम के मार्ग पर चलना असंभव है, क्योंकि संयम की साधना करना तलवार की धार पर चलने जैसा है।</p>
<p><strong>गुरु सत्य, अहिंसा और संयम जैसे नैतिक मूल्यों का आदर्श होते हैं </strong><br />
एक गुरु ही हैं, जो अपने ज्ञान, अनुभव और आचरण के द्वारा अपने शिष्यों, अनुयायियों को इस संसार के जन्म मृत्यु के चक्र से मुक्त कराकर मोक्ष मार्ग पर बढ़ने का मार्ग प्रशस्त करते हैं। गुरु न केवल विद्या का, बल्कि सत्य, अहिंसा और संयम जैसे नैतिक मूल्यों का भी आदर्श होते हैं। वे शिष्य को आध्यात्मिक उन्नति के मार्ग पर ले जाते हैं।</p>
<p><strong>7वें संयम दीक्षा दिवस पर हुए विभिन्न आयोजन</strong><br />
श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन पंचायती बड़ा मंदिर में चातुर्मासरत आचार्यश्री आर्जवसागरजी महाराज के शिष्य मुनिश्री विलोकसागरजी एवं मुनिश्री विबोधसागरजी महाराज का 7वां संयम दीक्षा दिवस समारोह विभिन्न कार्यक्रमों के साथ मनाया गया। इस अवसर पर प्रातः अभिषेक, शांतिधारा एवं श्री जिनेन्द्र प्रभु का पूजन किया गया। इस अवसर पर कैलाशचंद राकेशकुमार जैन एवं एडवोकेट दिनेशचंद जैन वरैया परिवार ने युगल मुनिराजों का पाद प्रक्षालन किया। अन्य लोगों ने चित्र अनावरण, दीप प्रज्वलन के पश्चात पूज्यश्री को जिनवाणी भेंट की। उपस्थित सभी श्रावक श्राविकाओं, बालिका मंडल, महिला मंडल ने अष्टदृव्य से युगल मुनिराजों का पूजन करते हुए अर्घ्य समर्पित किए। भजन गायक एवं संगीतकार अरिहंत म्यूजिकल ग्रुप ने भक्तिमय भजनों की प्रस्तुति दी।</p>
<p><strong>ब्रह्मचारी भैयाजी, बहनें एवं गुरुभक्त रहे उपस्थित</strong><br />
समारोह का संचालन ब्रह्मचारी नवीन भैयाजी जबलपुर ने किया। संयम दीक्षा दिवस के पावन अवसर पर ब्रह्मचारी संजय भैयाजी बम्होरी, राहुल भैयाजी, ब्रह्मचारी बहिन लवली दीदी, देशना दीदी, विशाला दीदी ललितपुर, टीटू जैन, राकेश जैन दिल्ली एवं ललितपुर के गुरुभक्तों सहित सैकड़ों की संख्या में श्रावक श्राविकाएं उपस्थित थे।</p>
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		<title>मुनिश्री विलोकसागर जी ने कहा आचार्यश्री के उपकारों को भुलाया नहीं जा सकता: युगों-युगों तक आचार्यश्री विद्यासागर जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व को याद करेंगे </title>
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		<pubDate>Tue, 07 Oct 2025 11:37:02 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आचार्य विद्यासागरजी महाराज भले ही आज शारीरिक रूप से हमारे बीच मौजूद नहीं हैं लेकिन, उनके द्वारा दिए गए संस्कार, उपदेश, शिक्षाएं हमारे हृदय पटल पर अंकित हैं। यह उद्गार शरद पूर्णिमा के अवसर पर आचार्य श्री विद्यासागर अवतरण दिवस पर मुनिश्री विलोकसागरजी महाराज ने बड़े जैन मंदिर में धर्म सभा को संबोधित करते हुए [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>आचार्य विद्यासागरजी महाराज भले ही आज शारीरिक रूप से हमारे बीच मौजूद नहीं हैं लेकिन, उनके द्वारा दिए गए संस्कार, उपदेश, शिक्षाएं हमारे हृदय पटल पर अंकित हैं। यह उद्गार शरद पूर्णिमा के अवसर पर आचार्य श्री विद्यासागर अवतरण दिवस पर मुनिश्री विलोकसागरजी महाराज ने बड़े जैन मंदिर में धर्म सभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए। <span style="color: #ff0000">मुरैना से पढ़िए, मनोज जैन नायक की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong>मुरैना।</strong> संपूर्ण विश्व को सत्य, अहिंसा, शाकाहार, जीवदया, परोपकार और जियो और जीने दो का संदेश देने वाले युग पुरुष, संत शिरोमणि समाधिस्थ आचार्य विद्यासागरजी महाराज भले ही आज शारीरिक रूप से हमारे बीच मौजूद नहीं हैं लेकिन, उनके द्वारा दिए गए संस्कार, उपदेश, शिक्षाएं हमारे हृदय पटल पर अंकित हैं। यह उद्गार शरद पूर्णिमा के अवसर पर आचार्य श्री विद्यासागर अवतरण दिवस पर मुनिश्री विलोकसागरजी महाराज ने बड़े जैन मंदिर में धर्म सभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि आज हम सभी ऐसे युग पुरुष को याद कर रहे हैं। जिन्होंने जीते जी कभी भी अपना अवतरण दिवस नहीं मनाया, न हीं किसी अन्य को मनाने की स्वीकृति प्रदान की। गुरुदेव ने सदैव ही विदेशी वस्तुओं को त्यागने एवं स्वदेशी को अपनाने का संदेश दिया। आपने अपने जीवन काल में लाखों लोगों से मांसाहार का त्याग करवाकर शाकाहार से जोड़ा। साथ ही सैकड़ों श्रावक श्राविकाओं को जैन दर्शन से जोड़कर जैनेश्वरी दीक्षा देकर संयम पथ की ओर अग्रसर किया। पूज्य गुरुदेव के उपकार को हम सभी न कभी भूल सकते हैं, न कभी उनके उपकार को चुका सकते हैं। आने वाले समय में युगों-युगों तक आचार्यश्री विद्यासागर जी महाराज के व्यक्तित्व एवं कृतित्व को याद किया जाता रहेगा।</p>
<p><strong>शिष्यों को भी पूर्व घोषणा के बिना ही दीक्षा के लिए करते थे तैयार </strong></p>
<p>इस अवसर पर मुनिश्री विबोधसागर महाराज ने बताया कि आचार्यश्री विद्यासागरजी का बाह्य व्यक्तित्व भी उतना ही मनोरम था। जितना अंतरंग, तपस्या में वे वज्र से कठोर थे, पर उनके मुक्त हास्य और सौम्य मुखमुद्रा से कुसुम की कोमलता झलकती थी। वे आचार्य कुन्दकुन्द और समन्तभद्र की परम्परा को आगे ले जाने वाले आचार्य थे तथा यशोलिप्सा से अलिप्त व शोर-शराबे से कोसों दूर रहते थे। शहरों से दूर तीर्थों में एकान्त स्थलों पर चातुर्मास करते थे। आयोजन व आडम्बर से दूर रहने के कारण प्रस्थान की दिशा और समय की घोषणा भी नहीं करते थे। वे अपने दीक्षार्थी शिष्यों को भी पूर्व घोषणा के बिना ही दीक्षा हेतु तैयार करते थे। हाथी, घोड़े, पालकी व बैंडबाजों की चकाचौंध से अलग सादे समारोह में दीक्षा का आयोजन करते थे।</p>
<p><strong><img fetchpriority="high" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-91968" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/10/IMG-20251007-WA0015.jpg" alt="" width="1599" height="899" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/10/IMG-20251007-WA0015.jpg 1599w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/10/IMG-20251007-WA0015-300x168.jpg 300w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/10/IMG-20251007-WA0015-1024x576.jpg 1024w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/10/IMG-20251007-WA0015-768x432.jpg 768w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/10/IMG-20251007-WA0015-1536x864.jpg 1536w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/10/IMG-20251007-WA0015-990x557.jpg 990w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/10/IMG-20251007-WA0015-1320x742.jpg 1320w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/10/IMG-20251007-WA0015-470x264.jpg 470w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/10/IMG-20251007-WA0015-640x360.jpg 640w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/10/IMG-20251007-WA0015-215x120.jpg 215w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/10/IMG-20251007-WA0015-414x232.jpg 414w" sizes="(max-width: 1599px) 100vw, 1599px" />परम पूज्य गुरुदेव आचार्यश्री विद्यासागरजी महाराज</strong></p>
<p>जैनाचार्य विद्यासागरजी का जन्म कर्नाटक के बेलगाँव जिले के गाँव चिक्कोड़ी में आश्विन शुक्ल पूर्णिमा (शरद पूर्णिमा), संवत् 2003 को हुआ था। मल्लप्पाजी अष्टगे तथा माता अष्टगे के आँगन में जन्मे विद्याधर (घर का नाम पीलू) को आचार्य श्रेष्ठ ज्ञानसागरजी महाराज का शिष्यत्व पाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था। राजस्थान की ऐतिहासिक नगरी अजमेर में आषाढ़ सुदी पंचमी विक्रम संवत् 2025 को लगभग 22 वर्ष की आयु में संयम धर्म के परिपालन हेतु उन्होंने पिच्छी कमंडल धारण करके मुनि दीक्षा धारण की थी। नसीराबाद (अजमेर) में आचार्यश्री ज्ञानसागरजी ने शिष्य विद्यासागर को अपने करकमलों से मृगसर कृष्णा द्वितीय संवत् 2029 को संस्कारित करके अपने आचार्य पद से विभूषित कर दिया और फिर आचार्यश्री विद्यासागरजी के निर्देशन में समाधिमरण हेतु संल्लेखना ग्रहण कर ली। आचार्यश्री की प्रेरणा से उनके परिवार के छः सदस्यों ने भी जैन साधु के योग्य संन्यास ग्रहण किया। उनके माता-पिता के अतिरिक्त दो छोटी बहनों व दो छोटे भाइयों ने भी आर्यिका एवं मुनिदीक्षा धारण की।</p>
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		<title>मुक्ति तभी संभव जब अंतरंग के विकार हों नष्ट :  पर्यूषण पर्व के चौथे दिन उत्तम शौच धर्म पर हुआ व्याख्यान </title>
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		<pubDate>Mon, 01 Sep 2025 07:58:15 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[पर्यूषण पर्व में उत्तम क्षमा, उत्तम मार्दव, उत्तम आर्ज़व धर्म के बाद चौथे दिन बड़े जैन मंदिर में मुनिश्री विलोकसागरजी महाराज एवं मुनिश्री विबोधसागरजी महाराज ने उत्तम शौच धर्म पर व्याख्यान दिया। पढ़िए, यह खबर&#8230; पर्यूषण पर्व में उत्तम क्षमा, उत्तम मार्दव, उत्तम आर्ज़व धर्म के बाद चौथे दिन बड़े जैन मंदिर में मुनिश्री विलोकसागरजी [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>पर्यूषण पर्व में उत्तम क्षमा, उत्तम मार्दव, उत्तम आर्ज़व धर्म के बाद चौथे दिन बड़े जैन मंदिर में मुनिश्री विलोकसागरजी महाराज एवं मुनिश्री विबोधसागरजी महाराज ने उत्तम शौच धर्म पर व्याख्यान दिया। <span style="color: #ff0000">पढ़िए, यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p>पर्यूषण पर्व में उत्तम क्षमा, उत्तम मार्दव, उत्तम आर्ज़व धर्म के बाद चौथे दिन बड़े जैन मंदिर में मुनिश्री विलोकसागरजी महाराज एवं मुनिश्री विबोधसागरजी महाराज ने उत्तम शौच धर्म पर व्याख्यान दिया। उन्होंने कहा कि कि कषाय जीव के लिए बहुत हानिकारक है। लोभ कषाय जीव के लिए बहुत खतरनाक है। लोभ कषाय करने से जीव को नरक तिरंच आदि गतियों में कई भवो तक चक्कर लगाने पड़ते हैं । आज तक जितने भी जीव इस संसार से पार हुए हैं उन सभी जीवों को लोभ को छोड़कर के उत्तम शौच धर्म को अपनाना पड़ा है। जैन दर्शन में उत्तम शौच धर्म एक महत्वपूर्ण अवधारणा है, जिसका अर्थ है पवित्रता या शुचिता। यह न केवल शारीरिक स्वच्छता को दर्शाता है, बल्कि आंतरिक शुचिता, यानी मन, वचन और कर्म की शुद्धता पर भी जोर देता है। मन में लोभ, मोह, क्रोध, माया, और ईर्ष्या जैसी भावनाओं को कम करना या त्यागना ही उत्तम शौच धर्म है।</p>
<p><strong>दसलक्षण विधान में नीरज शास्त्री ने किया मंत्रोचार</strong></p>
<p>बड़े जैन मंदिर में चल रहे दस दिवसीय दसलक्षण विधान में सांगानेर से पधारे हुए विद्वत नीरज जैन शास्त्री ने मंत्रोचारण करते हुए सभी क्रियाएं सम्पन्न कराईं। रात्रिकालीन शास्त्र सभा के दौरान नीरज जैन शास्त्री ने कहा कि कषाय जीव के पतन का कारण है। कषाय ही जीव को दुर्गति में भटकाता है। कषाय के कारण ही जीव त्रियंच नरक आदि गतियों में जाता है। कषाय में सबसे भयंकर लोभ कषाय होती है। जब व्यक्ति का लाभ बढ़ता है तो साथ में उसका लोभ भी बढ़ता है । लोभ कषाय बहुत भयंकर होती है। लोभ के कारण जीव दुर्गातियों में जाता है ।</p>
<p><strong>तीर्थंकर पुष्पदंत भगवान का मोक्ष कल्याणक</strong></p>
<p>दसलक्षण पर्व के दौरान रविवार को मुनिश्री विलोकसागरजी एवं मुनिश्री विबोधसागरजी महाराज के पावन सान्निध्य में जैन धर्मावलंबियों द्वारा भगवान पुष्पदंत स्वामी का मोक्ष कल्याणक मनाया गया। सभी श्रावकों ने भगवान पुष्पदंत स्वामी का जलाभिषेक, शांतिधारा कर अष्टदृव्य से पूजन किया। तत्पश्चात निर्वाण कांड का वाचन करते हुए मोक्ष लक्ष्मी की कामना के साथ जिनेंद्र प्रभु के श्री चरणों में निर्वाण लाड़ू अर्पित किया। इस अवसर पर प्रथम स्वर्ण कलशाभिषेक राजकुमार, पुनीतकुमार जैन, प्रथम शांतिधारा राजेश कुमार, पंकज जैन मेडिकल एवं द्वितीय शांतिधारा राजेशकुमार, विपुलकुमार विपुल मोक्ष जैन को करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। मोक्ष कल्याणक पर सर्वप्रथम लाड़ू अर्पित करने का सौभाग्य डालचंद जैन को प्राप्त हुआ। सभी भक्तों ने अत्यंत ही श्रद्धा एवं भक्ति के साथ निर्वाण लाड़ू अर्पित किया।</p>
<p><strong>सभी जिनालयों में पर्यूषण पर्व की धूम</strong></p>
<p>नगर के सभी जिनालयों में पर्यूषण पर्व की धूम मची हुई है। श्रीचंद्रप्रभु चैत्यालय मंदिर, आदिनाथ चैत्यालय गंज एवं लोहिया बाजार जैन मंदिरों में विशेष पूजा अर्चना की गई। आज नसियाजी जैन मंदिर में प्रथम अभिषेक एवं शांतिधारा सुरेशचंद चंद्रप्रकाश राजकुमार जैन द्वारा एवं द्वितीय शांतिधारा नीलेशकुमार विदित जैन द्वारा की गई। सभी भक्तों ने विशेष मंत्रों का वाचन करते हुए भगवान पुष्पदंत मोक्ष कल्याणक के अवसर पर मोक्षलक्ष्मी की कामना के साथ श्री जिनेंद्र प्रभु के चरणों में निर्वाण लाड़ू अर्पित किया।</p>
<p><strong>मन की कषायों को छोड़ना होगा</strong></p>
<p>चार मित्र एक स्थान पर जा रहे थे, अंधेरा हो गया था । रास्ते में नदी मिली, नदी के पास नाव भी दिखी। चारों मित्र नाव में सवार हो गए। चारों मित्रों ने अपने अपने हाथों में पतवार सम्हाली और नाव को खेने लगे। चारों मित्र ये सोचकर कि रात भर नाव को चलाते रहे कि हम सही रास्ते पर चल रहे हैं और सुबह होने तक अपनी मंजिल पर पहुंच जाएंगे लेकिन, जैसे ही सुबह हुई, उजाला हुआ तो उन्होंने देखा कि हम तो नदी के उसी किनारे पर खड़े हैं, जहां से यात्रा प्रारंभ की थी। उन सभी को भारी आश्चर्य हुआ कि रातभर नाव चलाने के बाद भी हम वहीं के वहीं खड़े हैं। तब एक मित्र ने देखा कि नाव तो अपने खूंटे पर एक रस्सी से बंधी है, रस्सी की गांठ को तो हमने खोला ही नहीं हैं। यही हाल हमारा है, हम सब खूब भगवान की भक्ति करते हैं, पूजन करते हैं लेकिन, अंदर के विकारों को, अंदर की बुराइयों को, अंदर की कषायों को नहीं छोड़ते। इसी कारण हम संसार में भटकते रहते हैं और मुक्ति प्राप्त नहीं कर पाते। हमें अपने अंदर की बुराइयों को, कषायों को त्यागना होगा, तभी इस संसार से मुक्ति संभव है।</p>
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		<title>स्वाध्याय मुक्ति के द्वार तक पहुंचाने में सहायक : मुनिराज श्रावकों को करा रहे हैं स्वाध्याय </title>
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		<pubDate>Mon, 14 Jul 2025 04:36:08 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[मुनिश्री विलोकसागर महाराजजी ने बड़े जैन मंदिर में धर्मसभा में स्वाध्याय के बारे में बता रहे हैं। नित्य सुबह ग्रंथों के माध्यम से महत्व समझा रहे हैं। रविवार को भी मुनि श्री ने श्रावकों को प्रबोधन दिया। मुरैना से पढ़िए, मनोज जैन की यह खबर&#8230; मुरैना। भौतिकवादी आधुनिक युग में श्रावक स्वाध्याय से दूर होते [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>मुनिश्री विलोकसागर महाराजजी ने बड़े जैन मंदिर में धर्मसभा में स्वाध्याय के बारे में बता रहे हैं। नित्य सुबह ग्रंथों के माध्यम से महत्व समझा रहे हैं। रविवार को भी मुनि श्री ने श्रावकों को प्रबोधन दिया। <span style="color: #ff0000">मुरैना से पढ़िए, मनोज जैन की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>मुरैना।</strong> भौतिकवादी आधुनिक युग में श्रावक स्वाध्याय से दूर होते जा रहे हैं जबकि, स्वाध्याय श्रावक के लिए परम आवश्यक है। स्वाध्याय जीवन के विकास की एक अनिवार्य आवश्यकता होते हुए संयम की साधना में सहायक होता है। यह उद्गार मुनिश्री विलोकसागर महाराज ने बड़े जैन मंदिर में धर्मसभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि स्वाध्याय से मिलने वाला ज्ञान सुरक्षित रहता है तथा श्रावक के ज्ञानकोष में निरंतर वृद्धि होती रहती है। मानव जीवन में सुख की वृद्धि स्वाध्याय से ही होती है। अतः कहा जा सकता है कि स्वाध्याय एक ऐसी साधना है, जो साधक को मुक्ति के द्वार तक पहुंचा देता है।</p>
<p><strong>कर्मों के बंधन से मुक्त होने में मदद करता है</strong></p>
<p>मुनिश्री ने कहा कि स्वाध्याय आत्म-शुद्धि का एक महत्वपूर्ण साधन है। यह व्यक्ति को अपने कुविचारों और दुर्गुणों को दूर करने में मदद करता है, जिससे वह शुद्ध और पवित्र बनता है। जैन धर्म में स्वाध्याय को मोक्ष प्राप्त करने के मार्ग में एक महत्वपूर्ण कदम माना जाता है। यह श्रावक को कर्मों के बंधन से मुक्त होने में मदद करता है। स्वाध्याय व्यक्ति को मिथ्या विचारों और दुराग्रहों से छुटकारा पाने में मदद करता है। मुनिश्री ने कहा कि जैन धर्म में स्वाध्याय करना श्रावकों के लिए बहुत महत्वपूर्ण बताया गया है क्योंकि, यह ज्ञान, सम्यक् ज्ञान, सदाचार और आत्म-शुद्धि की प्राप्ति का एक महत्वपूर्ण साधन है। स्वाध्याय के माध्यम से व्यक्ति अपने कुविचारों को दूर कर सकता है। सही और गलत का ज्ञान प्राप्त कर सकता है और जीवन को बेहतर ढंग से जीने की प्रेरणा पा सकता है।</p>
<p><strong>स्वाध्याय व्यक्ति को सदाचारी बनाता है</strong></p>
<p>स्वाध्याय ज्ञान का भंडार है और इसके माध्यम से व्यक्ति नए-नए ज्ञान प्राप्त कर सकता है। यह ज्ञान, चाहे वह सांसारिक हो या आध्यात्मिक जीवन को बेहतर बनाने में मदद करता है। स्वाध्याय सही और गलत का भेद करने में मदद करता है। यह व्यक्ति को सही मार्ग पर चलने और गलत आदतों से दूर रहने के लिए प्रेरित करता है। स्वाध्याय व्यक्ति को सदाचारी बनाता है। यह उसे अच्छे कर्म करने और बुरे कर्मों से बचने के लिए प्रेरित करता है। स्वाध्याय व्यक्ति को जीवन जीने की कला सिखाता है, जिससे वह जीवन को बेहतर ढंग से जी सकता है ।</p>
<p><strong>आत्मा को निर्मल रखने के लिए</strong></p>
<p>स्वाध्याय व्यक्ति के आध्यात्मिक विकास में मदद करता है। यह उसे आत्म-साक्षात्कार और आत्म-ज्ञान की ओर ले जाता है। स्वाध्याय जैन धर्म का एक अनिवार्य हिस्सा है, जो ज्ञान, सदाचार, आत्म-शुद्धि और मोक्ष की प्राप्ति में मदद करता है। इसलिए श्रावकों को ज्ञान प्राप्ति के लिए, आत्मा को निर्मल रखने के लिए, संयम की साधना के लिए, यहां तक कि मोक्ष प्राप्ति के लिए सदैव पूर्वाचार्यों द्वारा रचित ग्रंथों का अपनी योग्यता के अनुसार सदैव स्वाध्याय करते रहना चाहिए।</p>
<p><strong>इस तरह हो रहा है स्वाध्याय</strong></p>
<p>मुनिश्री विलोक सागर महाराज प्रतिदिन प्रातः 8 से 9 बजे तक समयसार ग्रन्थ, 9 से 9.45 बजे तक रयणसार ग्रन्थ की कथाओं के माध्यम से श्रावकों को स्वाध्याय करा रहे हैं। शाम के समय मुनिश्री विबोधसागरजी महाराज विशेष कक्षाएं लेकर बच्चों को छहढाला एवं भक्तामर का अध्ययन करा रहे हैं। मुनिराज ने बहुत से नन्हे मुन्ने बच्चों को संस्कृत भक्तामर के अनेकों श्लोकों को कंठस्थ करा दिया है।</p>
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		<title>सिद्धचक्र विधान में भक्ति और आनंद की वर्षा: प्रवचनों में मिल रहा धर्म उपदेश और ज्ञान का प्रसाद </title>
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		<pubDate>Mon, 07 Jul 2025 14:38:36 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[धर्मनगरी मुरैना में आठ दिवसीय श्री सिद्धचक्र विधान जारी है। इसमें भक्तिरस की वर्षा हो रही है। विधान के मुख्य पात्र अपने विशेष परिधान के साथ हिस्सा बने हुए हैं। मुनिराज के संघस्थ ब्रह्मचारी संजय भैयाजी बम्होरी वाले पूर्ण तन्मयता के साथ विधान संपन्न करवा रहे हैं। सोमवार को 128 अर्घ्य अर्पित हुए। वहीं मंगलवार [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>धर्मनगरी मुरैना में आठ दिवसीय श्री सिद्धचक्र विधान जारी है। इसमें भक्तिरस की वर्षा हो रही है। विधान के मुख्य पात्र अपने विशेष परिधान के साथ हिस्सा बने हुए हैं। मुनिराज के संघस्थ ब्रह्मचारी संजय भैयाजी बम्होरी वाले पूर्ण तन्मयता के साथ विधान संपन्न करवा रहे हैं। सोमवार को 128 अर्घ्य अर्पित हुए। वहीं मंगलवार को 256 अर्घ्य समर्पित किए जाएंगे। <span style="color: #ff0000">मुरैना से पढ़िए, मनोज जैन की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>मुरैना।</strong> नगर में आठ दिवसीय श्री सिद्धचक्र विधान में भक्तिरस की वर्षा हो रही है। विधान के मुख्य पात्र अपने विशेष परिधान के साथ चांदी के हार, मुकुट एवं अन्य अलंकरणों से सुसज्जित होकर विधान का हिस्सा बने हुए हैं। मुनिराज के संघस्थ ब्रह्मचारी संजय भैयाजी बम्होरी वाले पूर्ण तन्मयता के साथ विधान में सहभागिता प्रदान कर रहे हैं। सोमवार को 128 अर्घ्य चढ़ाए गए। वहीं मंगलवार को 256 अर्घ्य समर्पित किए जाएंगे। इस अवसर पर मुनिश्री विलोकसागरजी महाराज ने बड़े जैन मंदिर में श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान के पांचवे दिन धर्मसभा को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि हम सभी श्री सिद्धचक्र विधान के अंतर्गत निरंतर सिद्धों की आराधना कर रहे हैं। विधान में पांचवे दिन हमने पूजन करते हुए जो अर्घ्य समर्पित किए हैं, वो अपने अंदर बैठे मान कषायों को दूर करने के लिए किए हैं। जब हम भगवान की पूजन भक्ति करते हैं, तब हमारे अंदर मान कषाय नहीं होना चाहिए। मान कषाय से बचने के लिए ही भगवान की पूजा, अर्चना, आराधना, भक्ति की जाती है। उन्होंने कहा कि मान कषाय ही हमें चार गति और चौरासी लाख योनियों में भ्रमण कराता है और इस असार संसार से मुक्त नहीं होने देता, हमारे अंदर दिव्य शक्ति को जागृत नहीं होने देता, हमें परमात्मा नहीं बनने देता।</p>
<p><strong>भक्ति द्वारा हमें अपनी मान कषायों को तोड़ना है</strong></p>
<p>मुनिश्री विलोकसागर जी ने कहा कि इन मान कषायों के कारण ही हम दिन रात पाप कर्मों में लिप्त रहते हैं। यदि हमारे जीवन में मृदुता, सरलता आ जाए तो इस संसार में हमारा कोई शत्रु या दुश्मन नहीं होगा, हमारा किसी से बैर नहीं होगा। हम जब भी इष्ट की जिनेंद्र प्रभु की आराधना, पूजा भक्ति करते हैं तब हमारा चिंतन होना चाहिए कि हे भगवन, जो दिव्य शक्ति आपके अंदर विराजमान है, वो मेरे अंदर भी प्रगट हो। हम निरंतर पूजा भक्ति आराधना करते हुए इष्ट की प्रतिमाओं को घिसते रहते हैं लेकिन, अपने अंदर के मान कषाय को नहीं छोड़ते। भक्ति द्वारा हमें अपनी मान कषायों को तोड़ना है लेकिन, हम जाप मालाओं को तोड़ते रह जाते हैं। हमें प्रभु कृपा से जो मिला वह पर्याप्त था लेकिन, कषाय के कारण हमें संतुष्टि नहीं हुई।</p>
<p><strong>जीवन का सही उपयोग करें, अपने लक्ष्य को प्राप्त करें </strong></p>
<p>मुनिश्री ने कहा कि तन की भूख तो आसानी से बुझ जाती है लेकिन मन की भूख, कषाय की भूख नहीं बुझ सकती। जिस प्रकार श्मशान की आग शरीर को जला देती है, उसी प्रकार कषाय की आग, वासना की आग, क्रोध की आग, हमारे ज्ञान और विवेक को जला देती है, हमें विवेक शून्य कर देती है। कषाय के कारण ही हम प्रभु और गुरुओं से दूर हो जाते है। अपने इष्ट की श्री जिनेंद्र प्रभु की पूजा भक्ति आराधना हमें कषायों से बचाने में सहायक होती है। अतः हे! भव्य आत्माओं हमें भक्ति पूर्वक पूजन, विधान, धार्मिक अनुष्ठानों के माध्यम से इन कषायों से बचकर जीवन का सही उपयोग कर अपने लक्ष्य को प्राप्त करना चाहिए।</p>
<p><strong>सिद्धों की आराधना में मंगलवार को 256 अर्घ्य होंगे समर्पित </strong></p>
<p>प्रतिष्ठाचार्य बाल ब्रह्मचारी संजय भैयाजी (मुरैना वाले) ने पूज्य मुनिश्री द्वारा दिए गए उद्वोधन के संदर्भ में बताया कि व्यक्ति को दूसरे की नहीं अपनी ही कषाय बर्बाद करती है। व्यक्ति अपने ही स्वभाव के कारण बर्बाद होता है। उसकी कषाय उसे मृत्यु तक पहुंचने में सहायक हो जाती हैं। भगवान ने उन सभी कषायों को छोड़कर के अपनी आत्मा का अनुसरण किया और सम्यक पथ पर चलते हुए मोक्ष को प्राप्त किया। सोमवार को 128 अर्घ्य चढ़ाते हुए यही भावना की गई कि हम भी अपने आपसी बैर विरोध को छोड़कर कषायों को कम करते हुए अपने जीवन का कल्याण करें। यह जीव 108 प्रकार से कर्मों का आश्रव किया करता है। भगवान उन सब से रहित, परम शुद्ध आत्म को प्राप्त हो गए हैं। ऐसे उन सिद्धों की आराधना की गई। मंगलवार को सिद्धों की आराधना करते हुए 256 अर्घ्य समर्पित किए जाएंगे।</p>
<p><strong>विधान में हो रही है भक्तिरस की वर्षा</strong></p>
<p>सिद्धचक्र विधान में यहां नित भक्ति रस बरस रहा है। इसका लाभ धर्मानुरागी जनता ले रही है। विधानाचार्य ब्रह्मचारी अजय भैयाजी (ज्ञापन तमूरा वाले) दमोह अपने बुंदेलखंडी जैन भजनों से सभी को नृत्य करने पर मजबूर कर रहे हैं। साथ में भजन गायक एवं संगीतकार हर्ष जैन एंड कंपनी भोपाल अपनी संगीत लहरियों से सभी को मंत्रमुग्ध करते हैं। यहां सुबह 6.30 बजे से विधान की क्रियाएं प्रारंभ हो जाती हैं और निरंतर 10-11 बजे तक विधान का पूजन, अर्घ्य आदि का कार्यक्रम चलता है। शाम को गुरुभक्ति के समय महा आरती का आयोजन होता है। महाआरती के पुण्यार्जक घोड़ा बग्घी में सवार होकर ढोल तासे की धुन पर नृत्य करते हुए अपने निज निवास से सैकड़ों बंधुओं के साथ मंदिर में आरती का सुसज्जित थाल लेकर आते हैं और श्री जिनेंद्र प्रभु एवं पूज्य गुरुदेव की भक्ति के साथ संगीतमय महाआरती करते हैं।</p>
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