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	<title>मुनिश्री विबोधसागरजी &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<title>मुनिश्री विबोधसागरजी &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>सिद्धचक्र महामंडल विधान में 19 नवंबर को 512 अर्घ्य समर्पित होंगे: मुनिश्री ने कहा किसी की आस्था सम्यक पर तो किसी की मिथ्यात्व पर होती है  </title>
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		<pubDate>Tue, 18 Nov 2025 10:06:23 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जैन समाज के आराध्य मुनिश्री विलोकसागरजी महाराज ने शहर के बड़े जैन मंदिर में सिद्धचक्र महामंडल विधान के दौरान धर्मसभा में कहा कि आस्था और विश्वास पर ही संसार की सभी व्यवस्थाएं चल रही हैं। सभी की आस्था कहीं ना कहीं तो होती ही है।  मुरैना से पढ़िए, मनोज जैन नायक की यह खबर&#8230; मुरैना। [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>जैन समाज के आराध्य मुनिश्री विलोकसागरजी महाराज ने शहर के बड़े जैन मंदिर में सिद्धचक्र महामंडल विधान के दौरान धर्मसभा में कहा कि आस्था और विश्वास पर ही संसार की सभी व्यवस्थाएं चल रही हैं। सभी की आस्था कहीं ना कहीं तो होती ही है।  <span style="color: #ff0000">मुरैना से पढ़िए, मनोज जैन नायक की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>मुरैना।</strong> जैन समाज के आराध्य मुनिश्री विलोकसागरजी महाराज ने शहर के बड़े जैन मंदिर में सिद्धचक्र महामंडल विधान के दौरान धर्मसभा में कहा कि आस्था और विश्वास पर ही संसार की सभी व्यवस्थाएं चल रही हैं। सभी की आस्था कहीं ना कहीं तो होती ही है। अंतर इतना है कि मिथ्यात्व पर होती है या सम्यक पर होती है। विश्वास तो करना ही पड़ता है। कुदेव पर कर लें, चाहे सच्चे देव पर कर लें। वस्तु के सही स्वरूप पर कर लें या विपरीत स्वरूप पर कर लें। वस्तु के सही स्वरूप पर विश्वास करने वाला व्यक्ति सम्यक दृष्टि होता है। विपरीत पर विश्वास करने वाला व्यक्ति मिथ्या दृष्टि होता है।</p>
<p><strong>मार्ग सब जानते हैं लेकिन&#8230;</strong></p>
<p>अध्यात्म में क्रिया का महत्व कम तथा श्रद्धा का महत्व अधिक होता है। आपकी श्रद्धा और आपका विश्वास कैसा है, वह कौन है। सम्यक दर्शन का कार्य सच्चाई से जोड़ना है। वह आभास दिलाता है और सत्य को पहचानता है। मार्ग सब जानते हैं लेकिन, मार्ग सच्चा है या झूठा यह कोई नहीं जानता। इस अवसर पर मुनिश्री विबोधसागरजी ने कहा कि राग को बढ़ाने से राग बढ़ता है। मोबाइल तो सबके पास है, खाली बैठे हैं तो रील आदि देखने लगते हैं। फिर थोड़ी देर बाद दोबारा देखने का मन हो गया तो राग बढ़ गया। इन सभी कारणों से हम आध्यात्म से दूर हो रहे हैं। हमें राग को बढ़ाना नहीं है, कम करना है। राग कम होगा तभी हम आध्यात्म से जुड़ पाएंगे और इस संसार के जन्म मृत्य के मोह जाल से निकलकर सिद्ध शिला की ओर बढ़ेंगे।</p>
<p><strong>आठ दिवसीय अनुष्ठान में पूजा भक्ति आराधना का समागम</strong></p>
<p>आठ दिवसीय सिद्धों की आराधना में मंगलवार को 256 अर्घ्य समर्पित किए गए। बड़े जैन मंदिर में 8 दिवसीय सिद्धों की आराधना के भक्ति मय अनुष्ठान में प्रतिष्ठाचार्य पंडित राजेंद्र शास्त्री मंगरोनी ने विधान की पूजन कराते हुए एक-एक श्लोक का अर्थ समझाया। सिद्धों की आराधना करते हुए बुधवार को पांचवे दिन 512 अर्घ्य समर्पित किए जाएंगे। विधान पूजन से पूर्व भगवान वासपूज्य स्वामी का जलाभिषेक, शांतिधारा एवं पूजन किया गया। आचार्यश्री विद्यासागरजी एवं आचार्यश्री आर्जवसागरजी के चित्र का अनावरण किया गया। साथ ही दीप प्रज्वलन किया गया। मुनिराजों को शास्त्र भेंट श्रावक-श्रेष्ठियों ने किए।</p>
<p><strong>श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान का महत्व </strong></p>
<p>प्रतिष्ठाचार्य पंडित राजेंद्र शास्त्री मंगरोनी ने बताया कि सिद्धचक्र विधान कराने से कोढ़ नामक बीमारी ठीक हुई थी। श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान सर्व प्रथम मैना सुंदरी ने किया था। मैना सुंदरी के पति श्रीपाल को कोढ़ की बीमारी थी। दिगंबर जैन मुनिराज ने मैना सुंदरी को बताया कि यदि तुम अपने पति का कोढ़ ठीक करना चाहती हो तो भक्ति एवं श्रद्धा के साथ श्री सिद्धचक्र विधान करो। मुनिराज के बताए अनुसार मैना सुंदरी ने विधान किया। विधान के दौरान श्री जिनेंद्र प्रभु का अभिषेक कोढ़ पर लगाया तो उसके पति का कोढ़ ठीक हो गया। तभी से श्री सिद्ध चक्र विधान का महत्व बढ़ गया और सभी लोग इस विधान को करने के लिए लालायित रहते हैं।</p>
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		<title>मुनिश्री विलोकसागरजी का 11 को होगा सिहोनिया में मंगल आगमन : मुनिराज अतिशयकारी भगवान शांतिनाथजी, कुंथनाथजी, अरहनाथजी के दर्शन करेंगे </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 09 Nov 2025 13:24:47 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[दिगंबर जैन मुनिराजों का जैन तीर्थ अतिशय क्षेत्र सिहोनिया में 11 नवंबर को प्रातः भव्य मंगल आगमन होने जा रहा है। आचार्यश्री विद्यासागरजी महाराज, आचार्यश्री आर्जवसागर जी महाराज के शिष्य मुनिश्री विलोकसागरजी एवं मुनिश्री विबोधसागरजी महाराज का मंगल विहार 10 नवंबर को दोपहर पोरसा से होगा। मुरैना से पढ़िए, मनोज जैन नायक की यह खबर&#8230; [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>दिगंबर जैन मुनिराजों का जैन तीर्थ अतिशय क्षेत्र सिहोनिया में 11 नवंबर को प्रातः भव्य मंगल आगमन होने जा रहा है। आचार्यश्री विद्यासागरजी महाराज, आचार्यश्री आर्जवसागर जी महाराज के शिष्य मुनिश्री विलोकसागरजी एवं मुनिश्री विबोधसागरजी महाराज का मंगल विहार 10 नवंबर को दोपहर पोरसा से होगा। <span style="color: #ff0000">मुरैना से पढ़िए, मनोज जैन नायक की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>मुरैना।</strong> दिगंबर जैन मुनिराजों का जैन तीर्थ अतिशय क्षेत्र सिहोनिया में 11 नवंबर को प्रातः भव्य मंगल आगमन होने जा रहा है। आचार्यश्री विद्यासागरजी महाराज, आचार्यश्री आर्जवसागर जी महाराज के शिष्य मुनिश्री विलोकसागरजी एवं मुनिश्री विबोधसागरजी महाराज का मंगल विहार 10 नवंबर को दोपहर पोरसा से मुरैना की ओर होगा। युगल मुनिराज जैन तीर्थ सिहोनियाजी की वंदना करते हुए मुरैना की ओर पद विहार करेंगे। युगल मुनिराजों का 31 अक्टूबर को पोरसा मंगल आगमन हुआ था। उनके पावन सान्निध्य में 8 दिवसीय धार्मिक अनुष्ठान संपन्न हुआ और काफी धर्म प्रभावना हुई। मुनिराज सोमवार 10 नवंबर को आहारचर्या एवं सामायिक के बाद दोपहर को पोरसा से जैन तीर्थ सिहोनिया के लिए मंगल विहार करेंगे। रात्रि विश्राम ग्राम मानपुर में होने की संभावना है। श्री शांतिनाथ दिगम्बर जैन अतिशय क्षेत्र सिहोनिया में युगल मुनिराजों का मंगलवार 11 नवंबर को प्रातः कालीन बेला में भव्य मंगल आगमन होगा।</p>
<p>बताया जाता है कि युगल मुनिराज प्रथमवार भू-गर्भ से प्राप्त अतिशयकारी भगवान शांतिनाथजी, कुंथनाथजी एवं अरहनाथजी के दर्शन करेंगे। मंगलवार को आहारचर्या सिहोनिया जी में ही होगी। दोपहर को सामयिक के पश्चात पुनः मुरैना की ओर विहार होगा। रात्रि विश्राम ग्राम मिरघान में कोठी पर होने की संभावना है। बुधवार 12 नवंबर की आहारचर्या चौहान साहब के मकान पर ग्राम खेरा में एवं रात्रि विश्राम मुड़ियाखेड़ा/बड़ोखर के आसपास होने की संभावना है।</p>
<p><strong>मुरैना में 13 नवंबर को प्रातः होगा मंगल प्रवेश</strong></p>
<p>मुनिश्री विलोकसागरजी एवं मुनिश्री विबोधसागरजी महाराज का 13 नवंबर को प्रातः मुरैना नगर में भव्य मंगल प्रवेश होगा। मुनिश्री के सान्निध्य में पुण्यार्जक परिवार कैलाशचंद राकेशकुमार जैन के सौजन्य से मुरैना के श्री पार्श्वनाथ बड़ा जैन मंदिर में 8 दिवसीय धार्मिक अनुष्ठान 14 से 21 नवंबर तक होने जा रहा है। इस अनुष्ठान को सान्निध्य प्रदान करने के लिए युगल मुनिराजों का पुनः मुरैना आगमन हो रहा है।</p>
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		<title>जैन मित्र मंडल ने दिया युगल मुनिराजों को आहार : नवधा भक्ति से मुनिराज का किया पढ़गाहन  </title>
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		<pubDate>Wed, 22 Oct 2025 13:19:50 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[दिगम्बर निर्ग्रन्थ संत युगल मुनिराजों को जैन मित्र मंडल ने आहार देकर सातिशय पुण्य का अर्जन किया। जैन समाज की सेवाभावी संस्था जैन मित्र मंडल सदैव ही धार्मिक, सामाजिक एवं परोपकारी कार्यों में अग्रणी रहती है। मुरैना से पढ़िए, मनोज जैन की यह खबर&#8230; मुरैना। दिगम्बर निर्ग्रन्थ संत युगल मुनिराजों को जैन मित्र मंडल ने [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>दिगम्बर निर्ग्रन्थ संत युगल मुनिराजों को जैन मित्र मंडल ने आहार देकर सातिशय पुण्य का अर्जन किया। जैन समाज की सेवाभावी संस्था जैन मित्र मंडल सदैव ही धार्मिक, सामाजिक एवं परोपकारी कार्यों में अग्रणी रहती है। <span style="color: #ff0000">मुरैना से पढ़िए, मनोज जैन की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>मुरैना।</strong> दिगम्बर निर्ग्रन्थ संत युगल मुनिराजों को जैन मित्र मंडल ने आहार देकर सातिशय पुण्य का अर्जन किया। जैन समाज की सेवाभावी संस्था जैन मित्र मंडल सदैव ही धार्मिक, सामाजिक एवं परोपकारी कार्यों में अग्रणी रहती है। मित्र मंडल का मुख्य उद्देश्य श्रद्धा, भक्ति और समर्पण के साथ समाजोत्थान के कार्यों में बढ़चढ़ कर भाग लेना है। इस मंडल ने अल्पकाल में ही नगर एवं समाज में अपनी एक अलग पहचान बनाई है। जैन मित्र मंडल के मुख्य संयोजक सतेंद्र जैन शिक्षक ने बताया कि नगर के बड़े जैन मंदिर में वर्षाकाल के चार माह में आचार्य श्री आर्जवसागरजी महाराज के शिष्य मुनिश्री विलोकसागरजी, मुनिश्री विबोधसागरजी महाराज निरंतर धर्मोपदेशों के माध्यम से आमजन को संयम के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। सिद्धांत ग्रन्थ समयसार एवं रणयसार की वाचना एवं व्याख्या कर वे स्वयं तो आत्मकल्याण कर ही रहे हैं साथ ही अन्य लोगों को भी भगवान महावीर स्वामी के बताए मार्ग पर चलने का संदेश देकर संयम साधना का मार्ग प्रशस्त कर रहे हैं। वर्तमान समय में ऐसे निर्ग्रन्थ साधुओं का सान्निध्य मिलना बहुत ही कठिन साध्य है। जैन मित्र मण्डल परिवार के राजकुमार जैन &#8220;राजू&#8221; के संयोजकत्व में सदस्यों ने युगल मुनिराजों को आहार देने का निश्चय किया ।</p>
<p>विगत दिवस इस कार्य को अंजाम देने का समय भी आया और जैन मित्र मण्डल को नवधा भक्ति के साथ युगल मुनिराजों का पढ़गाहन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ । सभी सदस्य सोला के वस्त्रों में हे स्वामी नमोस्तु नमोस्तु नमोस्तु, मन शुद्धि, वचन शुद्धि, काया शुद्धि बोलकर नवधा भक्ति के साथ मुनिश्री विलोकसागरजी महाराज का पढ़गाहन कर चौके में ले गए और श्रद्धा, भक्ति के साथ निरंतराय आहार कराया। पूज्य मुनिराज के निरंतराय आहार के बाद सभी लोगों ने मिलकर उन्हें पिच्छिका प्रदान की। पूज्य मुनिराज ने सभी को धर्मवृद्धि का शुभाशीष प्रदान किया। दिगम्बर जैन संत युगल मुनिराजों के पढ़गाहन एवं आहारचर्या के पावन अवसर पर अतिशय क्षेत्र टिकटोली के अध्यक्ष राजेंद्र भंडारी, पूर्व मंत्री धर्मेंद्र जैन एडवोकेट, मुख्य संयोजक सतेंद्र जैन शिक्षक, पवन जैन पोरसा वाले, संयोजक राजकुमार राजू, प्रवक्ता योगेश जैन आलेश, सोनू ज्ञानतीर्थ, अतुल वरेया, सुनील जैन, मनेंद्र जैन रानू, डॉ मनोज जैन, अनिल जैन, बनवारी जैन, विमल जैन सहित महिलाओं एवं बालिकाओं ने मुख्य रूप से सहभागिता प्रदान की।</p>
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		<title>भगवान महावीर का मोक्ष कल्याणक 21 को: जैन मित्र मंडल ने घर-घर पहुंचाए केवल्य लक्ष्मी पूजन पत्रक </title>
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		<pubDate>Fri, 17 Oct 2025 13:28:59 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जैन धर्म के 24 वें तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी का 2552 वां मोक्ष कल्याणक महोत्सव मंगलवार 21 अक्टूबर को विभिन्न धार्मिक कार्यक्रमों के साथ भक्ति भाव एवं हर्षाेल्लास पूर्वक मनाया जाएगा। इस अवसर पर नगर के सभी जिनालयों में निर्वाण लाडू चढ़ाया जाएगा। मुरैना से पढ़िए, मनोज जैन नायक की यह खबर&#8230; मुरैना। जैन धर्म [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>जैन धर्म के 24 वें तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी का 2552 वां मोक्ष कल्याणक महोत्सव मंगलवार 21 अक्टूबर को विभिन्न धार्मिक कार्यक्रमों के साथ भक्ति भाव एवं हर्षाेल्लास पूर्वक मनाया जाएगा। इस अवसर पर नगर के सभी जिनालयों में निर्वाण लाडू चढ़ाया जाएगा। <span style="color: #ff0000">मुरैना से पढ़िए, मनोज जैन नायक की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>मुरैना।</strong> जैन धर्म के 24 वें तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी का 2552 वां मोक्ष कल्याणक महोत्सव मंगलवार 21 अक्टूबर को विभिन्न धार्मिक कार्यक्रमों के साथ भक्ति भाव एवं हर्षाेल्लास पूर्वक मनाया जाएगा। इस अवसर पर नगर के सभी जिनालयों में निर्वाण लाडू चढ़ाया जाएगा। इस अवसर पर नगर में विराजमान आचार्यश्री आर्जवसागरजी महाराज के शिष्य मुनिश्री विलोकसागरजी एवं मुनिश्री विबोधसागरजी महाराज के पावन सान्निध्य में बड़े जैन मंदिर में मुख्य आयोजन होगा तथा शहर के अन्य जैन जिनालयों में भी पूजा अर्चना के विशेष आयोजन होंगे। जैन धर्म के अंतिम एवं 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी मोक्ष कल्याणक के पावन अवसर पर पूज्य युगल मुनिराजों के सान्निध्य में प्रातः 7 बजे भगवान महावीर स्वामी का सामूहिक रूप से स्वर्ण कलशों द्वारा जलाभिषेक एवं चांदी की झारियों द्वारा शांतिधारा की जाएगी। संगीत की मधुर धुन पर श्रद्धा एवं भक्ति के साथ अष्टदृव्य से महावीर स्वामी का पूजन होगा।</p>
<p>तत्पश्चात श्री भगवान महावीर स्वामी के श्री चरणों में मोक्ष लक्ष्मी की कामना के साथ निर्वाण लाडू अर्पित किया जाएगा। इस पावन अवसर पर पूज्य युगल मुनिराजों द्वारा भगवान महावीर स्वामी के व्यक्तित्व पर व्याख्यान दिया जाएगा। पुण्यार्जक परिवारों को वर्षायोग कलश वितरित किए जाएंगे। शाम को महाआरती, गुरुभक्ति, शास्त्र सभा एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम होंगे।</p>
<p><strong>भगवान महावीर स्वामी का जीवन परिचय</strong></p>
<p>आज से 2624 वर्ष पूर्व भगवान महावीर स्वामी का जन्म बिहार के कुंडलपर ग्राम में राजा सिद्धार्थ और रानी त्रिशला के यहाँ हुआ था, जिनका बचपन का नाम वर्धमान था। 30 वर्ष की अल्प आयु में उन्होंने परिवार सांसारिक जीवन, सुख और राज-पाट त्याग कर जैनेश्वरी दीक्षा लेकर 12 वर्षों तक कठोर तपस्या की। 42 वर्ष की आयु में उन्हें केवल ज्ञान की प्राप्ति हुई और वे जिन (इंद्रियों को जीतने वाले) कहलाए। उन्होंने अपना शेष जीवन जैन धर्म के सिद्धांतों के प्रचार-प्रसार में व्यतीत किया और 72 वर्ष की आयु में 2552 वर्ष पूर्व बिहार के नालंदा जिले में पावापुरी से कार्तिक कृष्ण अमावस्या को निर्वाण प्राप्त किया था। पावापुरी में एक जल मंदिर है, जो उनके अंतिम संस्कार स्थल के रूप में जाना जाता है।</p>
<p><strong>जैन समाज निर्वाण दिवस के उपलक्ष्य में मनाता है दीपावली</strong></p>
<p>जैन धर्मावलंबी दीपावली का त्योहार भगवान महावीर के निर्वाण के उपलक्ष्य में श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाते हैं, इस दिन महावीर स्वमीर ने जन्म मृत्यु के चक्र से मुक्त होकर मोक्ष प्राप्त किया था। कार्तिक कृष्ण अमावस्या के दिन उन्हें पूर्ण ज्ञान और मुक्ति (मोक्ष) की प्राप्ति हुई थी। जैन धर्मग्रंथों में इसे दीपालिका कहा गया है, जिसका अर्थ है शरीर से निकलने वाला प्रकाश, और इस दिन को भगवान महावीर के प्रथम शिष्य गौतम गणधर को केवल ज्ञान की प्राप्ति के रूप में भी मनाया जाता है। जैन समाज में दिवाली मुख्य रूप से भगवान महावीर के निर्वाण दिवस के रूप में मनाई जाती है।</p>
<p><strong><img fetchpriority="high" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-92604" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/10/IMG-20251017-WA0039.jpg" alt="" width="844" height="1280" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/10/IMG-20251017-WA0039.jpg 844w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/10/IMG-20251017-WA0039-198x300.jpg 198w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/10/IMG-20251017-WA0039-675x1024.jpg 675w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/10/IMG-20251017-WA0039-768x1165.jpg 768w" sizes="(max-width: 844px) 100vw, 844px" />जैन मित्र मंडल ने बांटे पूजन पत्रक</strong></p>
<p>जैन समाज की सेवा भावी संस्था जैन मित्र मंडल ने भगवान महावीर स्वामी के मोक्ष कल्याणक के अवसर पर समवशरण (केवल्य लक्ष्मी) पूजन पत्रक को घर-घर पहुंचाने का अनुकरणीय कार्य किया है। जैन मित्र मंडल के सदस्यों ने युगल मुनिराजों के आशीर्वाद से पूजन पत्रक की एक हजार बहुरंगीन प्रतियां प्रिंट कराकर जैन समाज के प्रत्येक परिवार को पूजन हेतु प्रदान की। मित्र मंडल के इस पुनीत कार्य की सभी ने प्रशंसा एवं सराहना की।</p>
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		<title>विषम परिस्थितियों में समता भाव रखना भी बड़ी तपस्या: मुनिश्री विलोकसागर जी ने ‘समयसार’ ग्रंथ की वाचना कर बताए जीवन के रहस्य  </title>
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		<pubDate>Wed, 15 Oct 2025 13:35:58 +0000</pubDate>
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<p><strong>मुनिश्री विलोकसागरजी महाराज ने बड़े जैन मंदिर में सिद्धांत ग्रंथ ‘समयसार’ की व्याख्या करते हुए कहा कि विपरीत परिस्थितियों में मन की स्थिति को अनुकूल रखना भी एक साधना है। पूजा पाठ भक्ति अनुष्ठान व्रत उपवास तो कोई भी कर सकता है और करता भी है। <span style="color: #ff0000">मुरैना से पढ़िए, मनोज जैन नायक की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong>मुरैना।</strong> मुनिश्री विलोकसागरजी महाराज ने बड़े जैन मंदिर में सिद्धांत ग्रंथ ‘समयसार’ की व्याख्या करते हुए कहा कि विपरीत परिस्थितियों में मन की स्थिति को अनुकूल रखना भी एक साधना है। पूजा पाठ भक्ति अनुष्ठान व्रत उपवास तो कोई भी कर सकता है और करता भी है। वर्तमान में सांसारिक प्राणी इन्हीं सब को धर्म और तपस्या समझ रहा है लेकिन, सबसे बड़ी तपस्या मन को काबू में रखना है। विषम परिस्थितियों में समता भाव रखना ही सबसे बड़ी तपस्या है। अधिकांशतः प्राणी पाप कर्मों में लिप्त रहता है, दूसरों की निंदा करता है, दूसरों के खोट देखता है, दूसरों का बुरा सोचता है। बुरा सोचते-सोचते वह अच्छे कार्यों से दूर होता चला जाता है। भौतिकवादी चकाचौध में मनुष्य ने पाप कर्मों से डरना छोड़ दिया है लेकिन, यही कर्म जब उदय में आते हैं तो करोड़पति को खाकपति बनने में देर नहीं लगती। कर्मों की मार मनुष्य का कचूमर निकाल देती है।</p>
<p>इसलिए हमें बुरे कर्मों से डरना चाहिए, उनका पूर्णतः त्याग करना चाहिए। हमारे परिणाम बुरे है तो कर्म बुरे फल देगा और आपके परिणाम अच्छे हैं तो कर्म अच्छे फल देगा। कर्म की मार को सभी को झेलना होगा। जिसका भाग्य ही दुर्भाग्य में बदल गया हो उसे कोई क्या मारेगा, उसे तो उसके कर्म ही मारेंगे। मनुष्य अपने अवगुणों को नजरअंदाज करते हुए दूसरों के अवगुणों को देखता है, दूसरों के भावों को देखता है। हमें जो भी परिणाम मिलेगे अपने भावों की परिणीति से मिलेंगे। किसी अन्य के भावों की परिणीति से हमारा कल्याण होने वाला नहीं है। स्वयं के कर्मों को सुधारने से ही इस संसार सागर से मुक्ति मिल सकती है।</p>
<p><strong>जैन धर्म कर्म सिद्धांत पर आधारित है </strong></p>
<p>कर्म सिद्धांत की व्याख्या करते हुए मुनिश्री विबोधसागरजी ने बताया कि जैन दर्शन कर्म सिद्धांत पर आधारित है। कर्म सिद्धांत एक ऐसा सिद्धांत है जो कहता है कि हर व्यक्ति अपने कर्मों (अच्छे या बुरे) के फलों के लिए स्वयं जिम्मेदार है, और इन कर्मों का प्रभाव वर्तमान और भविष्य में उसके जीवन को निर्धारित करता है। इसका मतलब है कि अच्छे कर्म अच्छे परिणाम लाते हैं, जबकि बुरे कर्म दुख का कारण बनते हैं। यह एक ष्जैसा बोओगे वैसा काटोगेष् का सिद्धांत है। जैन धर्म के अनुसार, आत्मा के कर्मों का फल केवल आत्मा को ही भोगना पड़ता है। कोई भी तंत्र मंत्र गुरु भगवान, किसी को उसके कर्मों के फल से नहीं बचा सकता। स्वयं ही कर्मों की निर्जरा करके आत्मा को कर्मों के बंधनों से मुक्त होना पड़ता है। जब तक तेरे पुण्य का, बीता नहीं करार, अवगुण तेरे माफ हैं, चाहे करो हजार। पूर्वाचार्यों ने कहा है कि जब तक मनुष्य के पुण्य कर्मों का उदय चल रहा है, तब तक वह खूब मौज मस्ती करले, सभी सुखों को भोग ले, खूब अनीति, अनाचार और पाप करले, सभी माफ हैं, लेकिन जब पाप कर्मों का उदय आएगा तो तेरा बेड़ा गर्क हो जाएगा। इसीलिए अच्छे समय में भी हमें अच्छे कर्म ही करना चाहिए, ताकि जीवन में, भविष्य में दुखों का सामना न करना पड़े।</p>
<p><strong>कर्मों के अनुरूप ही मिलता है फल</strong></p>
<p>कर्म का फल मुख्य रूप से ईश्वर ही देता है, क्योंकि वही सबसे न्यायप्रिय और सर्वशक्तिमान है। ईश्वर भी अपनी मर्जी से कुछ नहीं करता। वह भी आपको कर्मों के फलस्वरूप ही परिणाम देता है। ईश्वर ही कर्मों का अंतिम और सबसे सच्चा फलदाता है क्योंकि, वह सभी के कर्मों का पल-पल का लेखा जोखा रखता है। वह अदृश्य शक्ति, वह सर्व शक्तिमान बिना किसी भेदभाव व बिना किसी पक्षपात के सभी को उनके कर्मों के अनुरूप उचित फल देता है। अपने अच्छे, बुरे भावों और विचारों से ही जीवन शांत-अशांत और सुख, दुःख का कारण बनता है। परिणामों का खेल बड़ा विचित्र है, क्योंकि स्वर्ग, नरक से लेकर मोक्ष तक की स्थिति में भी परिणामों का प्रतिफल ही एकमात्र कारण है।</p>
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		<title>मुनिश्री विलोकसागर जी ने कहा ईश्वर न किसी को सुख देते हैं, न दुख देते हैं: 7 अक्टूबर को पाठशाला के बच्चे होंगे सम्मानित </title>
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		<pubDate>Mon, 06 Oct 2025 14:03:09 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[भगवान न किसी का अच्छा करते हैं, न किसी का बुरा करते हैं। भगवान न किसी को सुख देते हैं, न किसी को दुख देते हैं। यह सब तो प्राणी मात्र के कर्मों पर निर्भर करता है। प्राणी जैसे कर्म करेगा उसी के फलस्वरूप उसे परिणामों की प्राप्ति होगी। यह बात मुनिश्री विलोकसागर जी ने [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>भगवान न किसी का अच्छा करते हैं, न किसी का बुरा करते हैं। भगवान न किसी को सुख देते हैं, न किसी को दुख देते हैं। यह सब तो प्राणी मात्र के कर्मों पर निर्भर करता है। प्राणी जैसे कर्म करेगा उसी के फलस्वरूप उसे परिणामों की प्राप्ति होगी। यह बात मुनिश्री विलोकसागर जी ने कही। <span style="color: #ff0000">मुरैना से पढ़िए, मनोज जैन नायक की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>मुरैना।</strong> भगवान न किसी का अच्छा करते हैं, न किसी का बुरा करते हैं। भगवान न किसी को सुख देते हैं, न किसी को दुख देते हैं। यह सब तो प्राणी मात्र के कर्मों पर निर्भर करता है। प्राणी जैसे कर्म करेगा उसी के फलस्वरूप उसे परिणामों की प्राप्ति होगी। जैसे जंगलों में या अन्य स्थानों पर वनस्पति स्वतः उग आती है, फल और फूल बिना किसी प्रयास या प्रेरणा के ही अपने निर्धारित समय पर वृक्षों में लग जाते हैं, उसी प्रकार प्राणी मात्र के द्वारा किये हुए अच्छे और बुरे कर्म भी अपने समय पर जीवन में स्वतः ही फल देने आते रहते हैं। कर्म फल देगें, ये तो निश्चित है, लेकिन कब देगें, ये किसी को नहीं मालूम। अहिंसा जैन धर्म का मूल सिद्धान्त है। इसे बड़ी सख्ती से पालन किया जाता है खानपान आचार नियम में विशेष रुप से देखा जा सकता है। जैन दर्शन में कण-कण स्वतंत्र है इस सृष्टि का या किसी जीव का कोई कर्ताधर्ता नही है।</p>
<p>सभी जीव अपने अपने कर्मों का फल भोगते हैं। जैन दर्शन में भगवान न कर्ता और न ही भोक्ता माने जाते हैं। जैन दर्शन मे सृष्टिकर्ता को कोई स्थान नहीं दिया गया है। जैन धर्म में अनेक शासन देवी-देवता हैं पर उनकी आराधना को कोई विशेष महत्व नहीं दिया जाता। जैन धर्म में तीर्थंकरों जिन्हें जिनदेव, जिनेंद्र या वीतराग भगवान कहा जाता है। इनकी आराधना का ही विशेष महत्व है। इन्हीं तीर्थंकरों का अनुसरण कर आत्मबोध, ज्ञान और तन और मन पर विजय पाने का प्रयास किया जाता है।</p>
<p><strong> पाठशाला के बच्चों को कल मिलेंगे पुरस्कार</strong></p>
<p>बड़े जैन मंदिर में विराजमान मुनिश्री विलोकसगरजी एवं मुनिश्री विबोधसागरजी महाराज के पावन सान्निध्य में शरद पूर्णिमा के अवसर पर मंगलवार 7 अक्टूबर को श्री विद्यासागर सर्वाेदय पाठशाला के बच्चों को परीक्षा परिणामों के अनुरूप पुरस्कार देकर सम्मानित किया जाएगा। शरद पूर्णिमा के दिन ही आचार्यश्री विद्यासागर महाराज का अवतरण हुआ था। इस मांगलिक अवसर पर प्रातःकालीन बेला में श्री जिनेंद्र प्रभु का अभिषेक, शांतिधारा एवं नित्यमह पूजन किया जाएगा। प्रातः 7 बजे आचार्यश्री विद्यासागरजी महाराज का अष्टदृव्य से पूजन किया जाएगा। प्रातः 9 बजे युगल मुनिराजों के प्रवचन होंगे। शाम को सांस्कृतिक कार्यक्रम, प्रश्नमंच एवं महाआरती का आयोजन होगा। पाठशाला के सभी बच्चों को उनकी वार्षिक परीक्षा के परिणामों के अनुसार पुरस्कार देकर सम्मानित किया जाएगा। विद्यासागर सर्वाेदय पाठशाला परिवार ने कार्यक्रम में पाठशाला के सभी बच्चों सहित साधर्मी बंधु, माता बहनें उपस्थित रहेंगी।</p>
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		<title>मुरैना में पंच परमेष्ठि प्रश्नोत्तरी पुरस्कार वितरण और णमोकार महामंत्र लेखन कार्यक्रम : आज शाम 6:00 बजे बड़े जैन मंदिर में पुरस्कार वितरण और 7 से 15 अक्टूबर तक महामंत्र जमा होंगे </title>
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		<pubDate>Sun, 05 Oct 2025 11:26:55 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[मुरैना में पंच परमेष्ठि प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिता के प्रतिभागियों का पुरस्कार वितरण आज शाम 6:00 बजे बड़े जैन मंदिर जी में पूज्य युगल मुनिराजों के पावन सान्निध्य में किया जाएगा। 7 से 15 अक्टूबर तक णमोकार महामंत्र लेखन की पुस्तिकाएं जमा की जाएंगी। पढ़िए मनोज जैन नायक की रिपोर्ट… मुरैना। पंच परमेष्ठि प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिता के प्रतियोगियों [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>मुरैना में पंच परमेष्ठि प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिता के प्रतिभागियों का पुरस्कार वितरण आज शाम 6:00 बजे बड़े जैन मंदिर जी में पूज्य युगल मुनिराजों के पावन सान्निध्य में किया जाएगा। 7 से 15 अक्टूबर तक णमोकार महामंत्र लेखन की पुस्तिकाएं जमा की जाएंगी। <span style="color: #ff0000">पढ़िए मनोज जैन नायक की रिपोर्ट…</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>मुरैना।</strong> पंच परमेष्ठि प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिता के प्रतियोगियों का सम्मान एवं उपहार वितरण समारोह का आयोजन आज होने जा रहा है । आमजन में धर्म के प्रति जागरूकता लाने के उद्देश्य से परम पूज्य गुरुदेव मुनिश्री विलोकसागरजी एवं मुनिश्री विबोधसागरजी महाराज के पावन सान्निध्य में विगत दिनों पंच परमेष्ठी प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिता का आयोजन किया गया था। इस प्रतियोगिता में लगभग 200 से अधिक श्रावक श्राविकाओं ने भाग लिया। आज परीक्षा परिणाम एवं पुरस्कार वितरण कार्यक्रम शाम 6:00 बजे से बड़े जैन मंदिर जी में आयोजित किया जा रहा है।</p>
<p>प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिता के संयोजक डॉक्टर मनोज जैन एवं विमल जैन बबलू ने बताया कि पंच परमेष्ठि प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिता को तीन ग्रुपों में विभाजित किया गया था। ग्रुप ए में 8 वर्ष से 18 वर्ष तक, बी ग्रुप में 19 से 30 वर्ष तक एवं सी ग्रुप में 31 वर्ष से 90 वर्ष तक के प्रतियोगियों को रखा गया था। सभी ग्रुपों में अलग अलग प्रथम, द्वितीय, तृतीय एवं सांत्वना पुरस्कार प्रदान किए जाएंगे ।</p>
<p><strong>सभी प्रतियोगियों को सम्मानित किया जाएगा</strong></p>
<p>आज शाम को पूज्य युगल मुनिराजों के पावन सान्निध्य में प्रतियोगिता का परिणाम घोषित कर पुरस्कार वितरित किए जाएंगे। इस बार ग्रुप ए में 50 अंकों से अधिक अंक, ग्रुप बी एवं सी में 80 अंक से अधिक अंक प्राप्त करने वाले सभी प्रतियोगीयों को पुरस्कार देकर सम्मानित किया जाएगा। पुण्यार्जक परिवार यतिनकुमार संजय रेखा जैन नगर पालिका परिवार, लख्मीचंद लालजीराम जैन बानमोर के सौजन्य से सभी प्रतियोगियों को सम्मानित किया जाएगा। इस अवसर पर प्रश्नोत्तरी प्रदाता परिवार मुन्नीदेवी, डॉक्टर मनोज अभिलाषा जैन, प्रतियोगिता के सभी सहयोगियों सहित अन्य लोगों का भी बहुमान किया जाएगा।</p>
<p><strong>णमोकार महामंत्र लेखन 7 से 15 अक्टूबर तक जमा होंगे</strong></p>
<p>नगर में चातुर्मासरत मुनिश्री विलोकसागरजी महाराज एवं मुनिश्री विबोधसागरजी महाराज के पावन सान्निध्य में विगत दो माह से महामंत्र णमोकार मंत्र के लेखन का कार्य वृहद गति से चल रहा है । महामंत्र लेखन की सभी पुस्तिकाएं 7 अक्टूबर से 15 अक्टूबर तक बड़े जैन मंदिर जी में जमा की जाएगी। सभी पुस्तिकाओं का परीक्षण करने के पश्चात उत्कृष्ट लेखन करने वाले सभी श्रावक श्राविकाओं का एक भव्य समारोह में बहुमान किया जाएगा ।</p>
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		<title>क्षमावाणी स्नेह मिलन समारोह का पोस्टर विमोचित : जैन मित्र मण्डल मुरैना द्वारा 21 सितम्बर को होगा आयोजन </title>
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		<pubDate>Sun, 14 Sep 2025 05:04:23 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[मुरैना में जैन मित्र मण्डल द्वारा सामूहिक क्षमावाणी स्नेह मिलन समारोह का आयोजन 21 सितम्बर को श्री नसियाजी जैन मंदिर में होगा। कार्यक्रम का पोस्टर मुनिश्री विलोकसागरजी और मुनिश्री विबोधसागरजी महाराज के सान्निध्य में विमोचित किया गया। पढ़िए मनोज जैन की रिपोर्ट… मुरैना। सामाजिक सौहार्द और समरसता के उद्देश्य से जैन मित्र मण्डल मुरैना द्वारा [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>मुरैना में जैन मित्र मण्डल द्वारा सामूहिक क्षमावाणी स्नेह मिलन समारोह का आयोजन 21 सितम्बर को श्री नसियाजी जैन मंदिर में होगा। कार्यक्रम का पोस्टर मुनिश्री विलोकसागरजी और मुनिश्री विबोधसागरजी महाराज के सान्निध्य में विमोचित किया गया। <span style="color: #ff0000">पढ़िए मनोज जैन की रिपोर्ट…</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>मुरैना।</strong> सामाजिक सौहार्द और समरसता के उद्देश्य से जैन मित्र मण्डल मुरैना द्वारा रविवार 21 सितम्बर को श्री नसियाजी जैन मंदिर में सामूहिक क्षमावाणी स्नेह मिलन समारोह का आयोजन किया जा रहा है। मुख्य संयोजक सतेंद्र जैन ने बताया कि इस अवसर पर श्रीजी का वार्षिक कलशाभिषेक, सामूहिक क्षमावाणी, नगर के बुजुर्ग व्यक्तियों का सम्मान और सामूहिक वात्सल्य भोज होगा। साथ ही लकी ड्रॉ के माध्यम से उपहार भी वितरित किए जाएंगे।</p>
<p>कार्यक्रम का पोस्टर श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन पंचायती मंदिर में विराजमान पूज्य मुनिश्री विलोकसागरजी और मुनिश्री विबोधसागरजी महाराज के पावन सान्निध्य में विमोचित किया गया। इस अवसर पर मित्र मण्डल के सदस्यों ने भगवान पार्श्वनाथ के श्रीचरणों में श्रीफल अर्पित कर कार्यक्रम पत्रिका प्रस्तुत की। तत्पश्चात मुनिराजों के समक्ष कार्यक्रम की रूपरेखा प्रस्तुत कर उनका मंगल आशीर्वाद प्राप्त किया गया। मुख्य संयोजक मनोज जैन नायक ने बताया कि यह आयोजन नगर में भाईचारे और आत्मीयता का वातावरण बनाने वाला होगा। क्षमावाणी पर्व पर समाजबंधु एक-दूसरे से क्षमा याचना कर संबंधों में नवीनता लाएंगे। बुजुर्गों का सम्मान और सामूहिक भोजन कार्यक्रम समाज में एकता और संस्कारों की परंपरा को मजबूती देगा।</p>
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		<title>अंतरंग के भावों के अनुरूप ही कर्मफल की होती है प्राप्ति: मुनिश्री विलोकसागर जी के सानिध्य में प्रतियोगियों का बहुमान </title>
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		<pubDate>Thu, 11 Sep 2025 11:36:22 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[यदि हमारे हृदय में करुणा का भाव नहीं हैं तो आपकी पूजा भक्ति कभी भी सफल नहीं हो सकती। यह उद्गार नगर में चातुर्मासरत जैन संत मुनिश्री विलोकसागरजी महाराज ने बड़े जैन मंदिर में धर्मसभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए। मुरैना से पढिए, मनोज जैन नायक की यह खबर&#8230; मुरैना। प्राणी मात्र के हृदय [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>यदि हमारे हृदय में करुणा का भाव नहीं हैं तो आपकी पूजा भक्ति कभी भी सफल नहीं हो सकती। यह उद्गार नगर में चातुर्मासरत जैन संत मुनिश्री विलोकसागरजी महाराज ने बड़े जैन मंदिर में धर्मसभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए। <span style="color: #ff0000">मुरैना से पढिए, मनोज जैन नायक की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>मुरैना।</strong> प्राणी मात्र के हृदय में अहिंसा, परोपकार और जीवदया की भावना होनी चाहिए। हम किसी भी धर्म को मानने वाले हों, किसी भी इष्ट की पूजा भक्ति आराधना करते हों, किसी भी गुरु की वाणी का श्रवण करते हों, यदि हमारे हृदय में करुणा का भाव नहीं हैं तो आपकी पूजा भक्ति कभी भी सफल नहीं हो सकती। यह उद्गार नगर में चातुर्मासरत जैन संत मुनिश्री विलोकसागरजी महाराज ने बड़े जैन मंदिर में धर्मसभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि वर्तमान में सांसारिक प्राणी पूजा भक्ति साधना उपासना तो बहुत करता है। धर्मात्मा बनने की चाहत में अपने आप को आदर्शवादी निरूपित करता है लेकिन, मन की कुंठाओं का शमन नहीं करता। जैन दर्शन में बाहरी दिखावे को महत्व नहीं दिया जाता। जैन धर्म भावना प्रधान धर्म है। जैसी जिसकी भावना होगी। उसी के फलस्वरूप उसे परिणामों की प्राप्ति होगी लेकिन, आजकल अधिकांशतः लोग पूजा-पाठ, धार्मिक अनुष्ठान तो करते हैं लेकिन, मन की मलीनता को दूर नहीं करते। यही कारण है कि हमें अपनी पूजा भक्ति के सार्थक परिणाम प्राप्त नहीं होते है। हमें सदैव अपने इष्ट के बताए हुए, अपने गुरु की आज्ञा का पालन करते हुए उनके बताए हुए मार्ग पर चलना चाहिए।</p>
<p><strong>प्रतियोगिता के प्रतिभागियों का हुआ बहुमान</strong></p>
<p>प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिता के संयोजक डॉ. मनोज जैन, विमल जैन बबलू ने बताया कि मुनिश्री विलोकसागरजी एवं मुनिश्री विबोधसागरजी महाराज के आशीर्वाद और सान्निध्य में तीन-तीन बार तीर्थंकर प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिता रखी गई। विगत दिवस तृतीय प्रतियोगिता के प्रतियोगियों का सम्मान किया गया। प्रतियोगिता को उम्र के हिसाब से तीन श्रेणियों में विभाजित किया गया। इस बार ए श्रेणी में 50 से अधिक, बी एवं सी श्रेणी में 80 से अधिक अंक प्राप्त करने वाले सभी प्रतियोगियों का बहुमान किया गया। ग्रुप ए में आर्जब बवलेश जैन ने 92, श्रेणी बी में साक्षी नरेश जैन ने 93, श्रेणी सी में वयोवृद्ध राजकुमार वरैया ने सर्वाधिक 97 अंक प्राप्त किए। श्रावक श्रेष्ठी यतींद्रकुमार, संजय रेखा जैन, मुरैना के सौजन्य से सभी प्रतियोगियों को पुरस्कार देकर सम्मानित किया गया। आयोजन समिति की ओर से पुरस्कार सौजन्यकर्ता परिवार का बहुमान किया गया।</p>
<p><strong> श्री नसियाजी जिनालय में वार्षिक कलशाभिषेक 21 को</strong></p>
<p>विगत वर्षों की भांति इस वर्ष भी फाटक बाहर स्थित श्री महावीर दिगंबर जैन नसियाजी मंदिर में वार्षिक कलशाभिषेक रविवार 21 सितंबर को किया जा रहा है। इसी दिन नसियाजी जिनालय में जैन मित्र मंडल द्वारा आयोजित सामूहिक क्षमावाणी स्नेह मिलन समारोह एवं श्रद्धेय बुजुर्ग व्यक्तियों का सम्मान समारोह भी होने जा रहा है। मुनिराजों के पावन सान्निध्य में शाम को श्री जिनेन्द्र प्रभु के कलशाभिषेक होंगे। आयोजन में लगभग 2 हजार व्यक्तियों के सम्मिलित होने की संभावना के मद्देनजर सभी तैयारियों को अंतिम रूप दिया जा रहा है।</p>
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		<title>मुनिश्री विबोधसागर ने कहा जैन दर्शन में त्रिरत्न ही सर्वाेपरि : बड़े जैन मंदिर में मधुर प्रवचन से हो रही धर्म प्रभावना  </title>
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		<pubDate>Tue, 19 Aug 2025 15:20:12 +0000</pubDate>
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<p><strong>श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन पंचायती बड़ा मंदिर में जैन संतों के आध्यात्मिक मंगल वर्षायोग में प्रतिदिन चल रही मधुर प्रवचनों की श्रृंखला में आचार्यश्री आर्जवसागरजी महाराज के शिष्य मुनिश्री विबोधसागरजी महाराज ने मंगलवार को अपने भक्तों से कहा कि कहा कि जैन धर्म त्रिरत्नों पर आधारित है। <span style="color: #ff0000">मुरैना से पढ़िए, मनोज जैन नायक की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>मुरैना।</strong> श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन पंचायती बड़ा मंदिर में जैन संतों के आध्यात्मिक मंगल वर्षायोग में प्रतिदिन चल रही मधुर प्रवचनों की श्रृंखला में आचार्यश्री आर्जवसागरजी महाराज के शिष्य मुनिश्री विबोधसागरजी महाराज ने मंगलवार को अपने भक्तों से कहा कि कहा कि जैन धर्म त्रिरत्नों पर आधारित है। इन तीन रत्नों के बिना जैन धर्म की कल्पना भी नहीं की जा सकती। सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चरित्र, यानि कि सच्चा विश्वास, सच्चा ज्ञान और सच्चा आचरण। जैन धर्म में ये तीनों मोक्ष प्राप्त करने के मार्ग में आवश्यक माने जाते हैं। सम्यक दर्शन का अर्थ है, सच्चे सिद्धांतों में विश्वास रखना, सच्चे देव, शास्त्र और गुरुओं में श्रद्धा रखना। यह जैन दर्शन के मूल सिद्धांतों में विश्वास है। सम्यक ज्ञान का अर्थ है, सही ज्ञान प्राप्त करना, जो वस्तुओं और परिस्थितियों को उनके यथार्थ रूप में समझता है। यह ज्ञान जैन धर्म के सिद्धांतों और दर्शन को समझने से प्राप्त होता है।</p>
<p><strong>जैन दर्शन अनेकांतवाद और कर्म फल के सिद्धांतों पर केंद्रित </strong></p>
<p>सम्यक चारित्र का अर्थ है, सही आचरण करना, जो अहिंसा, सत्य, अस्तेय, अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य जैसे व्रतों का पालन करके प्राप्त होता है। यह जैन धर्म के नैतिक नियमों का पालन है। इन तीनों रत्नों का पालन करके, हम अपनी आत्मा को शुद्ध करते हैं और मोक्ष की प्राप्ति के मार्ग पर आगे बढ़ते हैं। जैन दर्शन एक प्राचीन भारतीय दर्शन है, जो अहिंसा, अनेकांतवाद और कर्म-फल के सिद्धांतों पर केंद्रित है। इसका मुख्य लक्ष्य आत्मा को जन्म, मृत्यु और पुनर्जन्म के चक्र से मुक्ति दिलाना है। जैन धर्म में, ‘आत्मा’ (जीव) को शाश्वत माना जाता है और उसका पुनर्जन्म होता है। कर्म (क्रिया) का आत्मा पर प्रभाव पड़ता है और अच्छे कर्मों से मोक्ष प्राप्त किया जा सकता है। जैन धर्म कर्म सिद्धांत पर आधारित है। आप जैसे कर्म करोगे, उसी के अनुसार सुख-दुःख का अनुभव करोगे। जैन धर्म में ईश्वर को ब्रह्मांड का निर्माता या शासक नहीं माना जाता, बल्कि एक ऐसी आत्मा माना जाता है जिसने अपने सभी कर्मों को नष्ट कर दिया है और पूर्ण ज्ञान और आनंद प्राप्त कर लिया है।</p>
<p><strong>आस्थावान सदा ही अपनी गति में रहता है</strong></p>
<p>आस्था का मतलब है किसी व्यक्ति, वस्तु, या विचार में दृढ़ विश्वास रखना, चाहे उसके लिए कोई ठोस प्रमाण हो या न हो। यह एक गहरा विश्वास है जो किसी के जीवन, व्यवहार और दृष्टिकोण को प्रभावित करता है। आस्था मे गति है, जीवन में जितनी भी हमारी क्रिया-प्रक्रिया है वे सब हमारी आस्था पर टिकी हुई हैं। जहां हमारी आस्था होती है वहां कितनी भी परेशानियां हों, कितने भी संकट हो, परंतु आस्थावान व्यक्ति उन संकटों से डरता नहीं है। आस्थावान सदा ही अपनी गति में रहता है और आस्था जिस पर है, उसको देखकर संपूर्ण मार्ग के संकट को वह भूल जाता है। आस्था में सुख मिलता है, अनास्था में दुःख की प्राप्ति होती है आस्था में ही अपनापन मिलता है। प्राणी मात्र के प्रति अपने आपको आस्थावान बना लो तो आपका कल्याण मार्ग प्रशस्त हो सकता है।</p>
<p><strong>किसी भी कथन को निश्चित दृष्टिकोण से ही सत्य माना जा सकता है  </strong></p>
<p>जैन दर्शन में आस्था अथवा श्रद्धा का अर्थ ‘सम्यक दर्शन’ यानि कि सही दृष्टिकोण से है। सम्यक दर्शन में दृढ़ विश्वास रखना। यह विश्वास, ‘सम्यक ज्ञान’ (सही ज्ञान) और ‘सम्यक चरित्र’ (सही आचरण) के साथ मिलकर, मोक्ष (जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्ति) की ओर ले जाता है। जैन धर्म में आस्था के कुछ मुख्य पहलू हैं। अहिंसा-किसी भी प्राणी मात्र को नुकसान या कष्ट न पहुंचाना, यह जैन धर्म का मूल आधार है। सत्य-झूठ न बोलना और सत्य के मार्ग पर चलना। अस्तेय- चोरी न करना। अपरिग्रह-भौतिक संपत्ति और इच्छाओं के प्रति आसक्ति न रखना। ब्रह्मचर्य-इंद्रिय सुखों से दूर रहना। अनेकांतवाद-यह मानना कि सत्य एक ही नहीं है, बल्कि कई दृष्टिकोणों से देखा जा सकता है। स्यादवाद-यह मानना कि हमारा ज्ञान सीमित है और किसी भी कथन को एक निश्चित दृष्टिकोण से ही सत्य माना जा सकता है।</p>
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