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	<title>मुनिश्री विबोधसागरजी महाराज &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>गुरुओं का सान्निध्य पुण्यशाली जीवों को ही मिलता है : मुनिश्री विलोकसागरजी का धौलपुर में भव्य मंगल प्रवेश हुआ गूंजे जयकारे </title>
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		<pubDate>Tue, 25 Nov 2025 11:46:40 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जब तक श्रावक हैं, तभी तक श्रमण परंपरा कायम हैं। जब श्रावक ही नहीं होगें, तो श्रमण परंपरा स्वतः समाप्त हो जाएगी। दिगंबर साधुओं की परंपरा को जारी रखने में श्रावकों का ही योगदान है। यह उद्गार मुनिश्री विलोकसागरजी ने धर्मसभा को में व्यक्त किए। धौलपुर से पढ़िए, मनोज जैन नायक की यह खबर&#8230; धौलपुर। [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>जब तक श्रावक हैं, तभी तक श्रमण परंपरा कायम हैं। जब श्रावक ही नहीं होगें, तो श्रमण परंपरा स्वतः समाप्त हो जाएगी। दिगंबर साधुओं की परंपरा को जारी रखने में श्रावकों का ही योगदान है। यह उद्गार मुनिश्री विलोकसागरजी ने धर्मसभा को में व्यक्त किए। <span style="color: #ff0000">धौलपुर से पढ़िए, मनोज जैन नायक की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>धौलपुर</strong>। जब तक श्रावक हैं, तभी तक श्रमण परंपरा कायम हैं। जब श्रावक ही नहीं होगें, तो श्रमण परंपरा स्वतः समाप्त हो जाएगी। दिगंबर साधुओं की परंपरा को जारी रखने में श्रावकों का ही योगदान है। यह उद्गार मुनिश्री विलोकसागरजी ने धर्मसभा को में व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि प्रभु के दर्शन और गुरुओं का सान्निध्य पुण्यशाली जीवों को ही मिलता है। जिनका पुण्य क्षीर्ण होता है, उनको न प्रभु के दर्शन मिलते हैं और न ही गुरुओं का सान्निध्य मिलता है। अपने समाज में ही, आपके आसपास अनेकों ऐसे लोग भी होंगे, जो कभी मंदिर भी नहीं जाते होंगे और यदि उनको यह मालूम पड़ जाए कि आज महाराज जी आ रहे हैं तो वे कोई न कोई बहाना बनाकर रफूचक्कर हो जाते हैं। मुनिश्री ने कहा कि हे भव्य आत्माओं, अनेकों जन्मों के पुण्य कर्म से आपको मानव पर्याय में जन्म मिला है, वो भी जैन कुल में। इसे यू ही बर्बाद मत करो।</p>
<p><strong>साधुओं की साधना में सहयोगी बनें </strong></p>
<p>जब भी आपको मौका मिले, अवसर मिले तब तुरंत प्रभु के दर्शन कर लो, उनकी पूजा भक्ति कर लो। जब भी आपको दिगंबर साधुओं का सान्निध्य मिले या जब भी कोई दिगंबर साधु आपके नगर में प्रवेश करे तो आपका कर्तव्य है कि उनकी संयम की साधना में सहयोगी बनें। साधुओं के आगमन पर ऐसी व्यवस्था करें कि उन्हें अपनी साधना करने में कोई परेशानी अथवा व्यवधान न हो। उनके आहार, विहार, निहार, स्वाध्याय एवं सामयिक आदि के लिए उचित प्रबंध करें। यही श्रावकों का परम कर्तव्य है।</p>
<p><strong>गाजे-बाजे के साथ शोभायात्रा निकाली </strong></p>
<p>धौलपुर नगर में मंगलवार को आचार्यश्री विद्यासागर महाराज, आचार्यश्री आर्जवसागरजी महाराज के शिष्य मुनिश्री विलोकसागरजी एवं मुनिश्री विबोधसागरजी महाराज का नगरागमन हुआ। मुरैना से पद विहार करते हुएमुनिश्री ने प्रातःकालीन बेला में प्रवेश किया। धौलपुर जैन समाज के लोगों ने नगर सीमा पर पहुंचकर युगल मुनिराजों की भव्य अगवानी की। उन्हें गाजे-बाजे के साथ भव्य शोभायात्रा के रूप में नगर भ्रमण कराते हुए जैन मंदिर ले जाया गया। मुनि श्री 1008 आदिनाथ दिगंबर जैन मंदिर में विराजमान हैं।</p>
<p><strong>इनकी मौजूदगी रही खास </strong></p>
<p>गुरुदेव के भव्य मंगल प्रवेश पर मुरैना से बृजेश जैन दादा, राकेश जैन, सुनील जैन विशेष रूप से उपस्थित थे। धौलपुर जैन समाज के अध्यक्ष धनेश जैन, महामंत्री अमित जैन, धर्मशाला अध्यक्ष पवन जैन, अजय जैन, बनवारीलाल जैन ,नवाब रवि जैन, पवन जैन जवाहर नगर, पवन जैन कोषाध्यक्ष, अमित जैन, मानिक चंद, गुड्डा जैन प्रेस वाले, दीपेंद्र जैन, कमलकिशोर जैन आदि मौजूद रहे।</p>
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		<title>गुरु आशीष के बिना संसार सागर से मुक्ति संभव नहीं : मुरैना में भक्तों ने युगल मुनिराजों का 7वां दीक्षा दिवस मनाया </title>
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		<pubDate>Sat, 11 Oct 2025 13:03:55 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जीवन में गुरु के महत्व और आवश्यकता को नकारा नहीं जा सकता । आध्यात्मिक क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए एक सच्चे गुरु का होना अति आवश्यक है। गुरु ही हमें अच्छे बुरे की पहचान कराते हुए आध्यात्म मार्ग पर चलने की प्रेरणा देते हैं। यह उद्गार मुनिश्री विलोकसागरजी महाराज ने अपने 7वें मुनि दीक्षा [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>जीवन में गुरु के महत्व और आवश्यकता को नकारा नहीं जा सकता । आध्यात्मिक क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए एक सच्चे गुरु का होना अति आवश्यक है। गुरु ही हमें अच्छे बुरे की पहचान कराते हुए आध्यात्म मार्ग पर चलने की प्रेरणा देते हैं। यह उद्गार मुनिश्री विलोकसागरजी महाराज ने अपने 7वें मुनि दीक्षा दिवस पर बड़े जैन मंदिर में धर्मसभा में व्यक्त किए। <span style="color: #ff0000">मुरैना से पढ़िए, मनोज जैन नायक की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>मुरैना।</strong> जीवन में गुरु के महत्व और आवश्यकता को नकारा नहीं जा सकता । आध्यात्मिक क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए एक सच्चे गुरु का होना अति आवश्यक है। गुरु ही हमें अच्छे बुरे की पहचान कराते हुए आध्यात्म मार्ग पर चलने की प्रेरणा देते हैं। यह उद्गार मुनिश्री विलोकसागरजी महाराज ने अपने 7वें मुनि दीक्षा दिवस पर बड़े जैन मंदिर में धर्मसभा में व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि आध्यात्मिक राह पर चलने वाले व्यक्तियों के लिए एक सच्चे और अनुभवी गुरु का मार्गदर्शन आवश्यक है, जो उन्हें ज्ञान प्राप्त करने और व्यक्तिगत तथा आध्यात्मिक विकास में मदद करता है। गुरु का सान्निध्य और ज्ञान शिष्य को असीमित क्षमता से परिचित कराता है और उसे अपने भीतर छिपे सामर्थ्य को पहचानने में मदद करता है। आध्यात्मिक गुरु एक ऐसा व्यक्तित्व होता है, जो भक्ति, संयम, अध्यात्म, विश्वास और ज्ञान में शिष्यों का मार्गदर्शन करता है। वह अपने शिष्यों को आध्यात्मिक और संस्कारित विकास की ओर ले जाता है। गुरु अपने ज्ञान और अनुभव के माध्यम से शिष्यों को सांसारिक जीवन के भ्रम और संशय से बाहर निकालते हुए आध्यात्मिक ज्ञान प्रदान करते हैं और कृतज्ञता और शांति का भाव जगाते हैं। आध्यात्मिक गुरु वह होते हैं, जो स्वयं के कल्याण के साथ प्राणी मात्र के कल्याण की भावना रखते हैं।</p>
<p><strong>गुरु शब्दों से ज़्यादा अपने आचरण से सिखाता है</strong><br />
गुरु जीवन के गहन सत्यों और नियमों को समझाते हैं, जिससे शिष्य के मन को प्रबुद्धता एवं एकाग्रता प्राप्त होती है। गुरु की उपस्थिति में सुकून और शांति का अनुभव होता है। एक सच्चा गुरु शब्दों से ज़्यादा अपने आचरण से सिखाता है, जिससे शिष्यों को प्रेरणा मिलती है। आध्यात्मिक गुरु की पहचान एक सच्चा गुरु भौतिकता, क्रोध, मान, माया और लोभ जैसी सांसारिक भावनाओं से दूर रहकर स्वयं का और अन्य लोगों का कल्याण करते हैं।</p>
<p><strong>गुरु मानसिक और आध्यात्मिक विकास में भी मार्गदर्शन करते हैं</strong><br />
अपने सातवें संयम दीक्षा दिवस के अवसर पर मुनिश्री विबोधसागरजी महाराज ने गुरु के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि जीवन में गुरु का महत्व अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि गुरु ज्ञान और नैतिकता का मार्ग प्रशस्त करते हैं, चरित्र का निर्माण करते हैं और जीवन में सही दिशा दिखाते हैं। गुरु न केवल शैक्षिक प्रगति में बल्कि नैतिक, मानसिक और आध्यात्मिक विकास में भी मार्गदर्शन करते हैं। जिससे शिष्यों जीवन की कठिनाइयों का सामना करने और अपनी क्षमता का पूरा उपयोग करने में सक्षम होता है। गुरु के बिना जीवन दिशाहीन हो सकता है, क्योंकि वे ज्ञान रूपी अमृत से शिष्य को सिंचित कर उसे चरित्रवान और समर्थ बनाते हैं। बिना गुरु के संयम के मार्ग पर चलना असंभव है, क्योंकि संयम की साधना करना तलवार की धार पर चलने जैसा है।</p>
<p><strong>गुरु सत्य, अहिंसा और संयम जैसे नैतिक मूल्यों का आदर्श होते हैं </strong><br />
एक गुरु ही हैं, जो अपने ज्ञान, अनुभव और आचरण के द्वारा अपने शिष्यों, अनुयायियों को इस संसार के जन्म मृत्यु के चक्र से मुक्त कराकर मोक्ष मार्ग पर बढ़ने का मार्ग प्रशस्त करते हैं। गुरु न केवल विद्या का, बल्कि सत्य, अहिंसा और संयम जैसे नैतिक मूल्यों का भी आदर्श होते हैं। वे शिष्य को आध्यात्मिक उन्नति के मार्ग पर ले जाते हैं।</p>
<p><strong>7वें संयम दीक्षा दिवस पर हुए विभिन्न आयोजन</strong><br />
श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन पंचायती बड़ा मंदिर में चातुर्मासरत आचार्यश्री आर्जवसागरजी महाराज के शिष्य मुनिश्री विलोकसागरजी एवं मुनिश्री विबोधसागरजी महाराज का 7वां संयम दीक्षा दिवस समारोह विभिन्न कार्यक्रमों के साथ मनाया गया। इस अवसर पर प्रातः अभिषेक, शांतिधारा एवं श्री जिनेन्द्र प्रभु का पूजन किया गया। इस अवसर पर कैलाशचंद राकेशकुमार जैन एवं एडवोकेट दिनेशचंद जैन वरैया परिवार ने युगल मुनिराजों का पाद प्रक्षालन किया। अन्य लोगों ने चित्र अनावरण, दीप प्रज्वलन के पश्चात पूज्यश्री को जिनवाणी भेंट की। उपस्थित सभी श्रावक श्राविकाओं, बालिका मंडल, महिला मंडल ने अष्टदृव्य से युगल मुनिराजों का पूजन करते हुए अर्घ्य समर्पित किए। भजन गायक एवं संगीतकार अरिहंत म्यूजिकल ग्रुप ने भक्तिमय भजनों की प्रस्तुति दी।</p>
<p><strong>ब्रह्मचारी भैयाजी, बहनें एवं गुरुभक्त रहे उपस्थित</strong><br />
समारोह का संचालन ब्रह्मचारी नवीन भैयाजी जबलपुर ने किया। संयम दीक्षा दिवस के पावन अवसर पर ब्रह्मचारी संजय भैयाजी बम्होरी, राहुल भैयाजी, ब्रह्मचारी बहिन लवली दीदी, देशना दीदी, विशाला दीदी ललितपुर, टीटू जैन, राकेश जैन दिल्ली एवं ललितपुर के गुरुभक्तों सहित सैकड़ों की संख्या में श्रावक श्राविकाएं उपस्थित थे।</p>
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		<title>अपने-अपने कर्मों का फल सबको मिलता है कुछ इस भव में तो कुछ परभव में: मुनिश्री विलोकसागर जी महाराज ने कर्म गति की महत्ता पर दिया जोर </title>
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		<pubDate>Mon, 29 Sep 2025 09:46:27 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[मुनिश्री विलोकसागरजी महाराज ने बड़े जैन मंदिर में धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि सांसारिक प्राणी को अपने कर्मों के परिणामों से डरना चाहिए। भले ही वह ईश्वर से न डरे लेकिन, कर्मों से बचकर रहना चाहिए। मुरैना से पढ़िए, मनोज जैन नायक की यह खबर&#8230; मुरैना। मुनिश्री विलोकसागरजी महाराज ने बड़े जैन मंदिर [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>मुनिश्री विलोकसागरजी महाराज ने बड़े जैन मंदिर में धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि सांसारिक प्राणी को अपने कर्मों के परिणामों से डरना चाहिए। भले ही वह ईश्वर से न डरे लेकिन, कर्मों से बचकर रहना चाहिए। <span style="color: #ff0000">मुरैना से पढ़िए, मनोज जैन नायक की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>मुरैना।</strong> मुनिश्री विलोकसागरजी महाराज ने बड़े जैन मंदिर में धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि सांसारिक प्राणी को अपने कर्मों के परिणामों से डरना चाहिए। भले ही वह ईश्वर से न डरे लेकिन, कर्मों से बचकर रहना चाहिए। कहते है कि भगवान बहुत दयालु हैं और माफ़ कर सकते हैं, लेकिन कर्मों के फल अवश्य मिलते हैं और वे किसी को भी माफ नहीं करते। मुनिश्री ने कहा कि व्यक्ति जैसे कर्म करता है, उसे उसी प्रकार के परिणामों की प्राप्ति होती है। अच्छे कर्मों से अच्छे और बुरे कर्मों से बुरे परिणामों की प्राप्ति होती है। जैन दर्शन के अनुसार कर्म एक जटिल सिद्धांत है और इन कर्मों के बंधन से मुक्त होने के लिए जप तप भक्ति पूजन के साथ आचरण की शुद्धता और आत्म-नियंत्रण आवश्यक है। जैन दर्शन का कर्म सिद्धांत बताता है कि सभी जीव कर्मों से बंधे हैं जो सूक्ष्म भौतिक कणों के रूप में होते हैं और आत्मा से जुड़ते हैं। जिससे जीव का भविष्य निर्धारित होता है।</p>
<p><strong><img fetchpriority="high" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-91301" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/09/IMG-20250929-WA0036.jpg" alt="" width="1600" height="1200" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/09/IMG-20250929-WA0036.jpg 1600w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/09/IMG-20250929-WA0036-300x225.jpg 300w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/09/IMG-20250929-WA0036-1024x768.jpg 1024w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/09/IMG-20250929-WA0036-768x576.jpg 768w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/09/IMG-20250929-WA0036-1536x1152.jpg 1536w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/09/IMG-20250929-WA0036-74x55.jpg 74w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/09/IMG-20250929-WA0036-111x83.jpg 111w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/09/IMG-20250929-WA0036-215x161.jpg 215w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/09/IMG-20250929-WA0036-990x743.jpg 990w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/09/IMG-20250929-WA0036-1320x990.jpg 1320w" sizes="(max-width: 1600px) 100vw, 1600px" /> जैन धर्म में कर्म सिद्धांत ईश्वर पर आधारित नहीं</strong></p>
<p>इन कर्मों के प्रभाव से ही जीवन में सुख-दुख, जन्म और शरीर का स्वरूप तय होता है। इस बंधन से मुक्ति के लिए जैन दर्शन तीन रत्नों सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चरित्र का पालन करने के सिद्धांत पर बल देता है। जिसके माध्यम से कर्मों का क्षय करके आत्मा मोक्ष मार्ग की ओर गमन करती है। जैन धर्म में कर्म सिद्धांत ईश्वर पर आधारित न होकर व्यक्तिगत उत्तरदायित्व पर बल देता है। आत्मा अपने कर्मों के बंधन से स्वयं ही मुक्त हो सकती है और तपस्या, नैतिक आचरण और अहिंसा का पालन और संयम के मार्ग पर चलते हुए कर्मों का क्षय किया जा सकता है।</p>
<p><strong>मुनिश्री विबोधसागर ने समझाया कर्म सिद्धांत</strong></p>
<p>धर्म सभा में जैन संत मुनिश्री विबोधसागरजी महाराज ने कर्म सिद्धांत को समझाते हुए बताया कि कर्मफल वह सिद्धांत है। जिसके अनुसार किए गए हर कर्म का फल अवश्य मिलता है। अच्छे कर्मों का अच्छा फल और बुरे कर्मों का बुरा फल मिलता है। निश्चित नहीं है कि कर्मों का फल कब मिलेगा लेकिन, मिलेगा जरूर। कुछ कर्मों का परिणाम तुरंत मिल जाता है कुछ का अगले जन्म में या भविष्य में कभी भी मिल सकता है। सभी धर्मों में कर्म फल की व्याख्या की गई है। मनुष्य अपने कर्मों से बच नहीं सकता और प्रकृति का यह एक अटल नियम है कि जैसा कर्म वैसा फल मिलता है। जैन दर्शन के अनुसार, कर्म आठ प्रकार के होते हैं जो आत्मा को संसार में बांधते हैं. ये कर्म ज्ञानावरणीय, दर्शनावरणीय, वेदनीय, मोहनीय, आयुकर्म, नामकर्म, गोत्रकर्म और अन्तरायकर्म हैं ये सूक्ष्म भौतिक कण (पुद्गल) हैं जो आत्मा से जुड़कर विभिन्न अनुभवों और परिस्थितियों का कारण बनते हैं और आत्मा को मोक्ष प्राप्त होने तक जन्म-मरण के चक्र में फंसाए रखते हैं।</p>
<p><strong>कर्म सिद्धांत प्रकृति का अटल सत्य</strong></p>
<p>युगल मुनिराजों ने बताया कि कर्म का फल, कर्मफल सिद्धांत का एक हिस्सा है। जिसका अर्थ है कि व्यक्ति को अपने किए गए कर्मों के अनुसार ही फल या परिणाम मिलता है। अच्छे कर्म सुख और समृद्धि लाते हैं, जबकि बुरे कर्म दुख और कष्ट का कारण बनते हैं। यह प्रकृति का एक अटल नियम है। मनुष्य अपने द्वारा किए गए कर्मों का फल, चाहे वह अच्छा हो या बुरा, उसे निश्चित रूप से भोगना ही पड़ता है। यह प्रकृति का एक अटल और स्थायी नियम है। जिससे कोई भी बच नहीं सकता। अच्छे कर्म सुख, शांति, यश और मान- सम्मान प्रदान करते हैं जबकि, बुरे कर्म दुख, दरिद्रता और अपमान का कारण बनते हैं। कर्मों का फल मिलने के लिए एक सही समय और संयोग का बनना ज़रूरी होता है। कर्मफल का प्रभाव केवल इसी जन्म तक सीमित नहीं रहता है बल्कि यह अगले जन्मों तक भी पहुंच सकता है। अपने भविष्य और परिणामों को बेहतर बनाने के लिए व्यक्ति को हमेशा अपने वर्तमान कर्मों पर ध्यान देना चाहिए और अच्छे कर्म करने का प्रयास करना चाहिए।</p>
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		<title>मुक्ति तभी संभव जब अंतरंग के विकार हों नष्ट :  पर्यूषण पर्व के चौथे दिन उत्तम शौच धर्म पर हुआ व्याख्यान </title>
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		<pubDate>Mon, 01 Sep 2025 07:58:15 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[पर्यूषण पर्व में उत्तम क्षमा, उत्तम मार्दव, उत्तम आर्ज़व धर्म के बाद चौथे दिन बड़े जैन मंदिर में मुनिश्री विलोकसागरजी महाराज एवं मुनिश्री विबोधसागरजी महाराज ने उत्तम शौच धर्म पर व्याख्यान दिया। पढ़िए, यह खबर&#8230; पर्यूषण पर्व में उत्तम क्षमा, उत्तम मार्दव, उत्तम आर्ज़व धर्म के बाद चौथे दिन बड़े जैन मंदिर में मुनिश्री विलोकसागरजी [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>पर्यूषण पर्व में उत्तम क्षमा, उत्तम मार्दव, उत्तम आर्ज़व धर्म के बाद चौथे दिन बड़े जैन मंदिर में मुनिश्री विलोकसागरजी महाराज एवं मुनिश्री विबोधसागरजी महाराज ने उत्तम शौच धर्म पर व्याख्यान दिया। <span style="color: #ff0000">पढ़िए, यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p>पर्यूषण पर्व में उत्तम क्षमा, उत्तम मार्दव, उत्तम आर्ज़व धर्म के बाद चौथे दिन बड़े जैन मंदिर में मुनिश्री विलोकसागरजी महाराज एवं मुनिश्री विबोधसागरजी महाराज ने उत्तम शौच धर्म पर व्याख्यान दिया। उन्होंने कहा कि कि कषाय जीव के लिए बहुत हानिकारक है। लोभ कषाय जीव के लिए बहुत खतरनाक है। लोभ कषाय करने से जीव को नरक तिरंच आदि गतियों में कई भवो तक चक्कर लगाने पड़ते हैं । आज तक जितने भी जीव इस संसार से पार हुए हैं उन सभी जीवों को लोभ को छोड़कर के उत्तम शौच धर्म को अपनाना पड़ा है। जैन दर्शन में उत्तम शौच धर्म एक महत्वपूर्ण अवधारणा है, जिसका अर्थ है पवित्रता या शुचिता। यह न केवल शारीरिक स्वच्छता को दर्शाता है, बल्कि आंतरिक शुचिता, यानी मन, वचन और कर्म की शुद्धता पर भी जोर देता है। मन में लोभ, मोह, क्रोध, माया, और ईर्ष्या जैसी भावनाओं को कम करना या त्यागना ही उत्तम शौच धर्म है।</p>
<p><strong>दसलक्षण विधान में नीरज शास्त्री ने किया मंत्रोचार</strong></p>
<p>बड़े जैन मंदिर में चल रहे दस दिवसीय दसलक्षण विधान में सांगानेर से पधारे हुए विद्वत नीरज जैन शास्त्री ने मंत्रोचारण करते हुए सभी क्रियाएं सम्पन्न कराईं। रात्रिकालीन शास्त्र सभा के दौरान नीरज जैन शास्त्री ने कहा कि कषाय जीव के पतन का कारण है। कषाय ही जीव को दुर्गति में भटकाता है। कषाय के कारण ही जीव त्रियंच नरक आदि गतियों में जाता है। कषाय में सबसे भयंकर लोभ कषाय होती है। जब व्यक्ति का लाभ बढ़ता है तो साथ में उसका लोभ भी बढ़ता है । लोभ कषाय बहुत भयंकर होती है। लोभ के कारण जीव दुर्गातियों में जाता है ।</p>
<p><strong>तीर्थंकर पुष्पदंत भगवान का मोक्ष कल्याणक</strong></p>
<p>दसलक्षण पर्व के दौरान रविवार को मुनिश्री विलोकसागरजी एवं मुनिश्री विबोधसागरजी महाराज के पावन सान्निध्य में जैन धर्मावलंबियों द्वारा भगवान पुष्पदंत स्वामी का मोक्ष कल्याणक मनाया गया। सभी श्रावकों ने भगवान पुष्पदंत स्वामी का जलाभिषेक, शांतिधारा कर अष्टदृव्य से पूजन किया। तत्पश्चात निर्वाण कांड का वाचन करते हुए मोक्ष लक्ष्मी की कामना के साथ जिनेंद्र प्रभु के श्री चरणों में निर्वाण लाड़ू अर्पित किया। इस अवसर पर प्रथम स्वर्ण कलशाभिषेक राजकुमार, पुनीतकुमार जैन, प्रथम शांतिधारा राजेश कुमार, पंकज जैन मेडिकल एवं द्वितीय शांतिधारा राजेशकुमार, विपुलकुमार विपुल मोक्ष जैन को करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। मोक्ष कल्याणक पर सर्वप्रथम लाड़ू अर्पित करने का सौभाग्य डालचंद जैन को प्राप्त हुआ। सभी भक्तों ने अत्यंत ही श्रद्धा एवं भक्ति के साथ निर्वाण लाड़ू अर्पित किया।</p>
<p><strong>सभी जिनालयों में पर्यूषण पर्व की धूम</strong></p>
<p>नगर के सभी जिनालयों में पर्यूषण पर्व की धूम मची हुई है। श्रीचंद्रप्रभु चैत्यालय मंदिर, आदिनाथ चैत्यालय गंज एवं लोहिया बाजार जैन मंदिरों में विशेष पूजा अर्चना की गई। आज नसियाजी जैन मंदिर में प्रथम अभिषेक एवं शांतिधारा सुरेशचंद चंद्रप्रकाश राजकुमार जैन द्वारा एवं द्वितीय शांतिधारा नीलेशकुमार विदित जैन द्वारा की गई। सभी भक्तों ने विशेष मंत्रों का वाचन करते हुए भगवान पुष्पदंत मोक्ष कल्याणक के अवसर पर मोक्षलक्ष्मी की कामना के साथ श्री जिनेंद्र प्रभु के चरणों में निर्वाण लाड़ू अर्पित किया।</p>
<p><strong>मन की कषायों को छोड़ना होगा</strong></p>
<p>चार मित्र एक स्थान पर जा रहे थे, अंधेरा हो गया था । रास्ते में नदी मिली, नदी के पास नाव भी दिखी। चारों मित्र नाव में सवार हो गए। चारों मित्रों ने अपने अपने हाथों में पतवार सम्हाली और नाव को खेने लगे। चारों मित्र ये सोचकर कि रात भर नाव को चलाते रहे कि हम सही रास्ते पर चल रहे हैं और सुबह होने तक अपनी मंजिल पर पहुंच जाएंगे लेकिन, जैसे ही सुबह हुई, उजाला हुआ तो उन्होंने देखा कि हम तो नदी के उसी किनारे पर खड़े हैं, जहां से यात्रा प्रारंभ की थी। उन सभी को भारी आश्चर्य हुआ कि रातभर नाव चलाने के बाद भी हम वहीं के वहीं खड़े हैं। तब एक मित्र ने देखा कि नाव तो अपने खूंटे पर एक रस्सी से बंधी है, रस्सी की गांठ को तो हमने खोला ही नहीं हैं। यही हाल हमारा है, हम सब खूब भगवान की भक्ति करते हैं, पूजन करते हैं लेकिन, अंदर के विकारों को, अंदर की बुराइयों को, अंदर की कषायों को नहीं छोड़ते। इसी कारण हम संसार में भटकते रहते हैं और मुक्ति प्राप्त नहीं कर पाते। हमें अपने अंदर की बुराइयों को, कषायों को त्यागना होगा, तभी इस संसार से मुक्ति संभव है।</p>
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		<title>स्वयं के बांधे कर्मों का फल स्वयं को ही भोगना है: मुनिश्री विलोकसागर जी ने कथनी-करनी में भेद समझाया  </title>
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		<pubDate>Wed, 20 Aug 2025 11:56:21 +0000</pubDate>
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<p><strong>जैनाचार्यश्री आर्जवसागरजी महाराज के शिष्य मुनिश्री विलोकसागरजी एवं मुनिश्री विबोधसागरजी महाराज के आध्यात्मिक वर्षायोग में प्रतिदिन प्रवचनों के माध्यम से अमृतवर्षा हो रही है। बुधवार को धर्मसभा में मुनिश्री विलोकसागरजी महाराज ने कुंद-कुंद स्वामी द्वारा रचित सैद्धांतिक ग्रंथ समयसार की वाचना करते हुए कथनी-करनी के संदर्भ में बताया। <span style="color: #ff0000">मुरैना से पढ़िए मनोज जैन की , यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>मुरैना।</strong> जैनाचार्यश्री आर्जवसागरजी महाराज के शिष्य मुनिश्री विलोकसागरजी एवं मुनिश्री विबोधसागरजी महाराज के आध्यात्मिक वर्षायोग में प्रतिदिन प्रवचनों के माध्यम से अमृतवर्षा हो रही है। बुधवार को धर्मसभा में मुनिश्री विलोकसागरजी महाराज ने कुंद-कुंद स्वामी द्वारा रचित सैद्धांतिक ग्रंथ समयसार की वाचना करते हुए कथनी-करनी के संदर्भ में बताया। दुनिया में छह द्रव्य जीव पुदगल धर्म अधर्म आकाश और काल के बारे में समझाते हुए कहा कि जीव और पुदगल का संयोग जब होता है तब कर्म बंध होता है। शेष चार द्रव्य धर्म, अधर्म, आकाश और काल तो अपने आप में रहते हैं। जो भी कर्म बंध होता है वह जीव और पुदगल के संयोग से ही होता है। जो भी शुभ अशुभ फल होता है, जो भी बंध होता है वह हमारे स्वयं के द्वारा ही होता है। जब हम कूलर या एसी की हवा खाते हैं तो उसका बिल किसे भरना पड़ेगा, हमें ही तो भरना पड़ेगा, हमें ही तो चुकाना पड़ेगा।</p>
<p><strong>भेद विज्ञान को समझ लेंगे, तब हमारे वस्त्र स्वयं ही छूट जाएंगे</strong></p>
<p>इसी प्रकार हम जिस प्रकार की सांसारिक क्रियाओं में लिप्त रहते हैं तो उनके द्वारा बांधे गए कर्माें का फल हमको ही भोगना पड़ेगा। कोई दूसरा हमारा अच्छा या बुरा नहीं कर सकता। यदि हम अधर्म के कामों में, पाप कर्मों में लिप्त रहेंगे तो परमात्मा भी हमारे दुःखों को हमारे कष्टों को दूर नहीं कर सकता। हमें स्वयं को इसके लिए पुरुषार्थ करना होगा, हमें ही जागृत होना पड़ेगा। जब हम जागृत हो जाएंगे, भेद विज्ञान को समझ लेंगे, तब हमारे वस्त्र स्वयं ही छूट जाएंगे। हम स्वयं ही संसार से विरक्त हो जाएंगे। वस्त्र उतारे नहीं जाते, स्वयं ही उतर जाते हैं। त्याग विरक्ति तो अंतरंग से आती है। जब सच्चाई का ज्ञान हो जाता है, जब स्व और पर का भेद समझ आ जाता है, तब मन संसार से विरक्त होकर जीव मोक्ष मार्गी हो जाता है।</p>
<p><strong>जैन दर्शन में कर्मों के बंधन से मुक्त होना ही मुख्य लक्ष्य</strong></p>
<p>जैन धर्म में, जीव और पुद्गल दो अलग-अलग द्रव्य हैं जो इस ब्रह्मांड का निर्माण करते हैं। जीव चेतन तत्व है, जबकि पुद्गल जड़ (निर्जीव) पदार्थ है। जीव को आत्मा भी कहा जाता है, जो शाश्वत और चेतन तत्व है। यह सुख-दुःख का अनुभव करता है और कर्मों के बंधन में बंधा होता है। जैन धर्म का मुख्य लक्ष्य जीव को कर्मों के बंधन से मुक्त कराना है, जिससे मोक्ष की प्राप्ति हो सके। पुद्गल जड़ (निर्जीव) पदार्थ है, जो विभिन्न रूपों में मौजूद है। यह दिखाई देने वाला, स्पर्श करने योग्य और परिवर्तनशील है। पुद्गल में वर्ण (रंग), गंध (गंध), रस (स्वाद) और स्पर्श (स्पर्श) गुण होते हैं। शरीर, मन, वचन और सांसें सभी पुद्गल से बनी हैं। जैन धर्म में, पुद्गल को कर्मों के रूप में भी माना जाता है जो आत्मा के साथ बंधते हैं।</p>
<p><strong>जैन दर्शन में जन्म मृत्यु के चक्र से मुक्त होना ही मुख्य ध्येय</strong></p>
<p>जैन धर्म के अनुसार, जीव और पुद्गल अनादि काल से एक दूसरे से बंधे हुए हैं। जीव पुद्गल के साथ मिलकर संसार में जन्म-मरण के चक्र में फंसा रहता है। जीव को कर्मों के बंधन से मुक्त कराने के लिए, उसे पुद्गल से अलग होना होगा, यानी कर्मों से छुटकारा पाना होगा। पुद्गल से मुक्ति पाने के लिए, जीव को सम्यक ज्ञान, सम्यक दर्शन और सम्यक चारित्र का पालन करना होता है। जैन धर्म में जीव और पुद्गल दो अलग-अलग तत्व हैं, लेकिन वे एक दूसरे से जुड़े हुए हैं और एक दूसरे को प्रभावित करते हैं। जीव को कर्मों के बंधन से मुक्त कराने के लिए, उसे पुद्गल से अलग होना होगा, जो जैन धर्म का मुख्य लक्ष्य है।</p>
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		<title>मुनिश्री विलोक सागर ने किए केशलोच सिर, दाढ़ी मूंछों के बाल हाथों से उखाड़े : केशलोच के समय भक्तों ने महामंत्र नमोकार का जाप श्री जिनेंद्र प्रभु की स्तुति की  </title>
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		<pubDate>Fri, 01 Aug 2025 10:25:08 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जैन संतों साध्वियों की चर्या बहुत ही कठिन और कष्ट साध्य है। यहां तक कि वे अपने सिर, दाढ़ी, मूंछों के वालों को भी हाथ से उखाड़कर फैंकते हैं। नगर में चातुर्मासरत मुनिश्री विलोकसागरजी एवं मुनिश्री विबोधसागरजी महाराज प्रतिदिन बड़े जैन मंदिर में धर्मसभा के दौरान प्रवचनों और कक्षाओं के माध्यम से धर्मप्रभावना कर रहे [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>जैन संतों साध्वियों की चर्या बहुत ही कठिन और कष्ट साध्य है। यहां तक कि वे अपने सिर, दाढ़ी, मूंछों के वालों को भी हाथ से उखाड़कर फैंकते हैं। नगर में चातुर्मासरत मुनिश्री विलोकसागरजी एवं मुनिश्री विबोधसागरजी महाराज प्रतिदिन बड़े जैन मंदिर में धर्मसभा के दौरान प्रवचनों और कक्षाओं के माध्यम से धर्मप्रभावना कर रहे हैं। शुक्रवार को प्रातःकालीन वेला में मुनिश्री विलोकसागरजी महाराज ने केशलोच किए। <span style="color: #ff0000">मुरैना से पढ़िए, मनोज जैन नायक की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong>मुरैना।</strong> जैन संतों साध्वियों की चर्या बहुत ही कठिन और कष्ट साध्य है। यहां तक कि वे अपने सिर, दाढ़ी, मूंछों के वालों को भी हाथ से उखाड़कर फैंकते हैं। नगर में चातुर्मासरत मुनिश्री विलोकसागरजी एवं मुनिश्री विबोधसागरजी महाराज प्रतिदिन बड़े जैन मंदिर में धर्मसभा के दौरान प्रवचनों और कक्षाओं के माध्यम से धर्मप्रभावना कर रहे हैं। शुक्रवार को प्रातःकालीन वेला में मुनिश्री विलोकसागरजी महाराज ने केशलोच किए। केशलोच जैन संतों के चर्या का एक हिस्सा है। वे अपने सिर, दाढ़ी, मूंछ के बाल निकालने के लिए किसी भी प्रकार के उपकरण कैंची, उस्तरा या ब्लैड आदि का उपयोग नहीं करते हैं, बल्कि वे उन वालों को प्रत्येक 45 दिनों अथवा दो माह के अंतराल में अपने हाथों से उखाड़कर साफ करते हैं। बालों को हाथों से उखाड़कर फैंकने की क्रिया को ही केशलोच कहा जाता है। यह उनके तपोबल का ही परिणाम है कि वे इस कठिन कार्य को करने पर भी तनिक विचलित नहीं होते। केशलोच की क्रिया जैन साधु की सबसे कठिन क्रियाओं में मानी जाती है। कभी-कभी केशलोच करते समय बालों के उंगलियों से फिसलने एवं खून के रिसने की भी आशंका रहती है, इसके लिए साधुगण शुद्ध राख का उपयोग करते हैं।</p>
<p><strong>जैन मुनि समस्त परिग्रह से रहित होते हैं       </strong></p>
<p>इस अवसर पर मुनिश्री विबोधसागर महाराज ने बताया कि जैन मुनि समस्त परिग्रह से रहित होते हैं तथा अपने पास केवल एक मयूर पंख से बनी पीछी रखते है। अतः बालों को हटाने के लिए वे उस्तरा, कैंची आदि अपने पास नहीं रख सकते और ना ही इनका प्रयोग कर सकते। जैन मुनि स्वावलंबी होते है और उनकी चर्या सिंह के समान होती है। इस लिए बाल हटाने के लिए किसी का सहारा भी नही लेते। इस लिए वे अपने हाथों से बालों को नोंच कर उखाड़ते हैं। इस क्रिया को केश लोंच कहते हैं। वैसे केशलोच परिषह सहन करने के लिए भी जरूरी होता है। दिगंबर मुनि महाव्रती होते हैं और 22 परिषह को सहज ही सहन करते हैं तथा 28 मूल गुणों का पालन करते हैं जिसमे हाथों से केशलोच करना एक आवश्यक क्रिया है और चूंकि केशलोच करने से भी अनेक परजीवी छोटे जीवों की विराधना होती है, जिसके प्राश्चियत स्वरूप मुनि उस दिन निराहार रह कर उपवास भी रखते हैं। अतः दिगंबर मुनि अहिंसा की जीवंत छवि होते हं,ै जिनसे किसी भी जीव को किसी तरह का कोई भय नही रहता है। मुनि स्वयं भी अभय होते हैं और दूसरों को भी अभय ही प्रदान करते हैं। जिस समय मुनिश्री विलोक सागर महाराज शांत मुद्रा में मधुर मुस्कान के साथ केशलोच कर रहे थे उस समय प्रकाशचंद साहुला, अनूप भंडारी, मनोज जैन नायक, बृजेश जैन दादा, सुनील जैन, दीपक जैन एवं अन्य साधर्मी बंधु मुनिश्री के समक्ष महामंत्र नमोकार का जाप एवं श्री जिनेंद्र प्रभु की स्तुति कर रहे थे।</p>
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		<title>पूर्ण श्रद्धा भक्ति से भगवान पार्श्वनाथ जी का मोक्ष कल्याणक 31 को मनाया जाएगा: मुनिराजों के सानिध्य में चढ़ाया जाएगा निर्वाण लाड़ू </title>
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		<pubDate>Mon, 28 Jul 2025 05:58:09 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ स्वामी का मोक्ष कल्याणक महोत्सव 31 जुलाई को विभिन्न धार्मिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रमों के साथ पूर्ण श्रद्धा और भक्ति भाव से मनाया जाएगा। इस पावन अवसर पर जैन धर्मावलंबी निर्वाण लाड़ू समर्पित करेंगे। मुरैना से पढ़िए, मनोज जैन की यह खबर&#8230; मुरैना। जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर भगवान [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ स्वामी का मोक्ष कल्याणक महोत्सव 31 जुलाई को विभिन्न धार्मिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रमों के साथ पूर्ण श्रद्धा और भक्ति भाव से मनाया जाएगा। इस पावन अवसर पर जैन धर्मावलंबी निर्वाण लाड़ू समर्पित करेंगे। <span style="color: #ff0000">मुरैना से पढ़िए, मनोज जैन की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong>मुरैना।</strong> जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ स्वामी का मोक्ष कल्याणक महोत्सव 31 जुलाई को विभिन्न धार्मिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रमों के साथ पूर्ण श्रद्धा और भक्ति भाव से मनाया जाएगा। इस पावन अवसर पर जैन धर्मावलंबी निर्वाण लाड़ू समर्पित करेंगे। विद्वत नवनीत जैन शास्त्री ने बताया कि नगर में चातुर्मासरत मुनिराजश्री विलोकसागरजी महाराज एवं मुनिश्री विबोधसागरजी महाराज के पावन सानिध्य एवं प्रतिष्ठाचार्य पंडित पवन शास्त्री दीवान के निर्देशन में जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ का मोक्ष कल्याणक महोत्सव मोक्ष सप्तमी पर 31 जुलाई को बड़े जैन मंदिर में मनाया जाएगा।</p>
<p>इस पावन अवसर पर प्रातःकालीन वेला में मूल नायक भगवान पार्श्वनाथ जी का स्वर्ण कलशों से महामस्तकाभिषेक किया जाएगा। साथ ही गुरुदेव के श्रीमुख से उच्चारित विशेष मंत्रों के साथ शांतिधारा एवं अष्टद्रव्य से पूजन होगा। इस अवसर पर स्थानीय विद्वानों के साथ संघस्थ ब्रह्मचारी संजय भैयाजी बम्होरी एवं राहुल भैयाजी गंज बासौदा विशेष रूप से उपस्थित रहेंगे। प्रातः 8.30 बजे मुनिश्री के प्रवचन होगें। ठीक 9.30 बजे मोक्ष कल्याणक पर्व पर चिंतामणि भगवान पार्श्वनाथ स्वामी के श्री चरणों में निर्वाण लाड़ू समर्पित किया जाएगा।</p>
<p><strong>सामूहिक रूप से चढ़ाया जाएगा निर्वाण लाडू </strong></p>
<p>कार्यक्रम से पूर्व नगर के सभी जैन मंदिरों से भक्तगण निर्वाण लाड़ू लेकर श्रद्धा और भक्ति के उल्लास के साथ बड़े जैन मंदिर जी आएंगे और मुनिराजों के पावन सानिध्य में सामूहिक निर्वाण लाड़ू श्री पार्श्वनाथ भगवान को अर्पित कर मोक्ष लक्ष्मी की कामना करेंगे। इस अवसर पर लाड़ू सजाओ प्रतियोगिता भी होगी। सभी लोग अपने घर से लाड़ू सजाकर लाएंगे।, जिसका लाड़ू सबसे सुंदर होगा, उनको क्रमशः प्रथम, द्वितीय एवं तृतीय पुरस्कार प्रदान किए जाएंगे। कार्यक्रम के मध्य जैन मिलन बालिका मंडल एवं नन्हे-मुन्ने बच्चों द्वारा भक्ति गीत एवं नृत्य प्रस्तुत किए जाएंगे।</p>
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		<title>हे! स्वामी नमोस्तु, नमोस्तु, नमोस्तु से गूंजा जैन मंदिर : जैन मिलन बालिका मंडल ने मुनिराजों को दिया आहारदान </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 27 Jul 2025 11:41:21 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[हरियाली तीज पर बड़े जैन मंदिर में उत्सव जैसा माहौल था। जैन मिलन बालिका मंडल की 50 से अधिक बालिकाएं युगल मुनिराजों को आहार दान देने के लिए दृढ़ संकल्प और नवधा भक्ति के साथ हाथों में मांगलिक वस्तुए जैसे कलश, श्रीफल, बादाम, सुपाड़ी, लौंग आदि लेकर पढ़गाहन के लिए तैयार थीं। मुरैना से पढ़िए, [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>हरियाली तीज पर बड़े जैन मंदिर में उत्सव जैसा माहौल था। जैन मिलन बालिका मंडल की 50 से अधिक बालिकाएं युगल मुनिराजों को आहार दान देने के लिए दृढ़ संकल्प और नवधा भक्ति के साथ हाथों में मांगलिक वस्तुए जैसे कलश, श्रीफल, बादाम, सुपाड़ी, लौंग आदि लेकर पढ़गाहन के लिए तैयार थीं। <span style="color: #ff0000">मुरैना से पढ़िए, मनोज जैन की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>मुरैना।</strong> हरियाली तीज पर बड़े जैन मंदिर में उत्सव जैसा माहौल था। जैन मिलन बालिका मंडल की 50 से अधिक बालिकाएं युगल मुनिराजों को आहार दान देने के लिए दृढ़ संकल्प और नवधा भक्ति के साथ हाथों में मांगलिक वस्तुए जैसे कलश, श्रीफल, बादाम, सुपाड़ी, लौंग आदि लेकर पढ़गाहन के लिए तैयार थीं। आचार्य आर्जवसागरजी महाराज के शिष्य चातुर्मासरत मुनि श्री विलोकसागरजी महाराज एवं मुनिश्री विबोधसागरजी महाराज शुद्धि के बाद श्री जिनेंद्र प्रभु की वंदना कर संकल्प पूर्वक आहारचर्या के लिए निकले तो संपूर्ण मंदिर प्रांगण हे स्वामी नमोस्तु, नमोस्तु, नमोस्तु, अत्रो अत्रो अत्रो, तिष्ठो तिष्ठो तिष्ठो के स्वर से गुंजायमान हो उठा।</p>
<p>दृश्य था युगल मुनिराजों को आहारचर्या हेतु पढ़गाहन का। जैन मिलन बालिका मंडल की सभी बालिकाएं सामूहिक रूप में मुनिश्री को आहारचर्या के लिए आमंत्रित कर रही थीं बालिकाओं के लिए भी आज का दिन पुण्यशाली था। यही वजह रही कि दोनों मुनिराजों की विधि मिल गई और दोनों युगल मुनिराजों का पढ़गाहन उनके चौके में हुआ। सभी ने मिलकर महामंत्र णमोकार का पाठ करते हुए गुरुदेवों की तीन परिक्रमा की और बोला कि हे स्वामी मन शुद्धि, वचन शुद्धि, काया शुद्धि, आहार जल शुद्ध है, भोजनशाला में प्रवेश कीजिए।</p>
<p>सभी बालिकाएं पूर्ण श्रद्धा एवं नवधा भक्ति के साथ युगल मुनिराजों को आहार के लिए भोजनशाला में ले गईं। गुरुदेव के भोजनशाला में प्रवेश के बाद अष्टद्रव्य से पूजनादि के पश्चात सभी ने अत्यंत ही आत्मीयता, शुद्ध मन से दोनों मुनिराजों को आहार कराया। युगल मुनिराजों का निरंतराय आहार होने पर सभी बालिकाओं के चेहरों पर एक अलग तरह की चमक दिखाई दे रही थी।</p>
<p><strong>युगल मुनिराजों ने बालिकाओं को दिलाए संकल्प</strong></p>
<p>आहारचर्या के बाद युगल मुनिराजों ने जैन सिद्धांतों के अनुसार बालिकाओं को कुछ संकल्प भी दिलाएं। उन्होंने कहा कि आज के बाद आप सभी नित्य देव दर्शन करेंगे। अपने माता पिता की पसंद से ही शादी करेंगे। शादी से पूर्व पूर्ण रूप से ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करेंगे। सदैव मुनिराजों और आर्यिकाओं को आहारदान एवं वैयावृति करेंगे। साथ ही उन्होंने कहा कि वर्तमान में मानव जीवन बहुत ही संघर्षमय हो गया है।आपको जीवन में कितनी भी परेशानियां आएं, कभी घबराना नहीं।परेशानियों से डरना नहीं, उनका डटकर मुकाबला करना। आत्महत्या जैसा विचार कभी भी मन में न आने देना, क्योंकि संघर्ष का नाम ही जीवन है। सभी बालिकाओं ने युगल मुनिराजों की बातों को ध्यानपूर्वक सुना और उन्हें वचन दिया कि हे गुरुदेव हम भगवान महावीर स्वामी के अनुयायी होकर जैन दर्शन को अंगीकार करते हैं। आपके द्वारा आज दिलाए गए संकल्पों को सदैव पालन करेंगे।</p>
<p><strong>दिगंबर जैन संतों की आहारचर्या</strong></p>
<p>जैन मुनि की आहारचर्या बहुत कठोर होती है, जिसे ‘सिंह वृत्ति’ कहा जाता है। वे 24 घंटे में विधि मिलने पर एक बार ही अन्न जल ग्रहण करते हैं। इसमें जैन साधु एक ही स्थान पर खड़े होकर, दोनों हाथों को मिलाकर अंजुली बनाते हैं और उसी में भोजन करते हैं। यदि अंजुली में भोजन के साथ कोई जीव जंतु, बाल, अपवित्र पदार्थ या कोई जीव आ जाए तो वे भोजन लेना बंद कर देते हैं और अपने हाथ छोड़ देते हैं, फिर पानी भी नहीं पीते। इस क्रिया को अन्तराय बोला जाता है। इसके बाद वे दूसरे दिन ही आहारचर्या के लिए जाते हैं।</p>
<p><strong>जैन धर्म में क्या है आहारदान</strong></p>
<p>जैन धर्म में आहार दान को बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। यह दान, मुनियों, आर्यिकाओं और तपस्वियों को दिया जाता है। जैन दर्शन में आहारदान एक महत्वपूर्ण और पवित्र क्रिया है। यह अहिंसा, अपरिग्रह, और पुण्य प्राप्ति के सिद्धांतों पर आधारित है। जैन धर्म में आहार दान का पालन करके व्यक्ति न केवल अपने कर्मों को शुद्ध करता है, बल्कि वह दूसरों के जीवन में भी सुख और शांति लाता है।</p>
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