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	<title>माधोराजपुरा &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>साध्वी श्री ज्ञानमति माताजी का 70 वां आर्यिका दीक्षा दिवस : आचार्यश्री वीरसागर जी से वैशाख कृष्णा द्वितीया को ली थी दीक्षा </title>
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		<pubDate>Mon, 14 Apr 2025 13:14:15 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ससंघ अयोध्या (उप्र) में विराजमान हैं। साध्वी श्री ज्ञानमती माताजी के 70 वांआर्यिका दीक्षा दिवस पर वैशाख कृष्णा द्वितीया को है। जो इस बार 14 अप्रैल को है। अयोध्या से पढिए यह खबर&#8230; अयोध्या। गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ससंघ अयोध्या (उप्र) में विराजमान हैं। साध्वी श्री ज्ञानमती माताजी के 70 वांआर्यिका दीक्षा [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ससंघ अयोध्या (उप्र) में विराजमान हैं। साध्वी श्री ज्ञानमती माताजी के 70 वांआर्यिका दीक्षा दिवस पर वैशाख कृष्णा द्वितीया को है। जो इस बार 14 अप्रैल को है। <span style="color: #ff0000">अयोध्या से पढिए यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>अयोध्या।</strong> गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ससंघ अयोध्या (उप्र) में विराजमान हैं। साध्वी श्री ज्ञानमती माताजी के 70 वांआर्यिका दीक्षा दिवस पर पूज्य माताजी के चरणों में वंदामी। सन् 1934 की शरदपूर्णिमा के शुभ दिन जब चन्द्रमा की शुभ्र छटा सम्पूर्ण धरा को अपने आवेश में समेटे थे। तब उप्र के बाराबंकी जनपद के ग्राम टिकेतनगर में बाबू छोटेलाल जैन के घर एक कन्या का जन्म हुआ। कौन जानता था कि माँ मोहिनी की यह कन्या एक दिन जगत माता बनकर अपने ज्ञान के प्रकाश से सम्पूर्ण विश्व को आलोकित करेगी। पद्मनंदि पंचविंशतिका के स्वाध्याय के कारण बचपन से ही विकसित वैराग्य के बीज 1952 में शरदपूर्णिमा के दिन ही प्रस्फुटित हुए। जब बाराबंकी में आपने आचार्य श्री देशभूषण जी महाराज से सप्तम प्रतिमा (ब्रह्मचर्य) के व्रत अंगीकार किए। 1953 में चैत्र कृष्णा एकम को श्री महावीर जी में आपने आचार्य श्री देशभूषण जी से क्षुल्लिका दीक्षा ग्रहण कर ‘वीरमति’ नाम प्राप्त किया।</p>
<p>व्रत एवं नियमों का कठोरता से पालन करते हुए आप अपनी संज्ञा ‘वीरमति’ को तो सार्थक कर ही रही थीं किन्तु आपको मात्र क्षुल्लिका के व्रतों से संतोष कहां। 19 वर्ष की यौवनावस्था में क्षुल्लिका के व्रतों का कठोरता से पालन करने के साथ ही आप निरन्तर वैराग्य के भावों को विकसित करती रहीं</p>
<p><strong>प्रतिभा का आकलन कर इन्हें ‘ज्ञानमति’ नाम मिला</strong></p>
<p>आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज की आज्ञा से उनके ही पट्टशिष्य आचार्यश्री वीरसागर जी से वैशाख कृष्णा द्वितीया को 1956 ईसवी माधोराजपुरा की पवित्र भूमि में आर्यिका के व्रतों को अंगीकार कर ‘ज्ञानमति’ की सार्थक संज्ञा प्राप्त की।अखिल भारतवर्षीय दिगंबर जैन युवा परिषद, कोल्हापुर) के कार्याध्यक्ष अभिषेक पाटील ने बताया कि धन्य हैं वे भविष्य दृष्टा आचार्य श्री वीरसागर जी, जिन्होंने अपनी दिव्य दृष्टि से इनकी प्रतिभा का आकलन कर इन्हें ‘ज्ञानमति’ नाम दिया।</p>
<p><strong>आचार्य श्री शांतिसागरजी के तीन बार किए दर्शन</strong></p>
<p>आचार्य श्री शांतिसागर महाराज जी के साक्षात तीन बार दर्शन करने वाली साध्वी गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमति माताजी जैनशासन के वर्तमान व्योम पर छिटके नक्षत्रों में दैदीप्यमान सूर्य की भाँति अपनी प्रकाश-रश्मियों को प्रकीर्णित कर रहीं गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमति माताजी जिन्होंने आचार्य श्री शांतिसागर महाराज जी के तीन बार दर्शन किए हैं। नीरा (महाराष्ट्र ) में सन् 1954 में, बारामती (महा.) में सन् 1955 में, कुंथलगिरि सिद्धक्षेत्र (महा.) में सन् 1955 में सल्लेखना के समय। सन् 1955 में आचार्य श्री शांतिसागर महाराज जी ने कुंथलगिरि में देशभूषण-कुलभूषण जी की प्रतिमा के समक्ष 12 वर्ष की सल्लेखना ली थी। ज्ञानमति माताजी उस समय क्षुल्लिका अवस्था में वीरमती माताजी थीं। कुंथलगिरि में एक माह आचार्यश्री के श्रीचरणों में रहीं। क्षुल्लिकावस्था में आचार्य श्री की प्रत्यक्ष सल्लेखना तो देखी ही है। साथ ही उनके श्रीमुख से अनेक अनुभव वाक्य भी प्राप्त किए हैं।</p>
<p><strong>वैशाख कृष्ण दूज को ली दीक्षा</strong></p>
<p>ज्ञानमति माताजी (क्षुल्लिका वीरमति) ने आचार्य श्री शांतिसागर महाराज जी से आर्यिका दीक्षा की याचना की थी किन्तु, आचार्य श्री ने कहा था कि मैंने सल्लेखना ले ली है और अब दीक्षा देने का त्याग कर दिया है। तुम मेरे शिष्य वीरसागर से आर्यिका दीक्षा लेना। अत: चारित्र चक्रवर्ती आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज के आदेशानुसार उन्होंने 1956 की वैशाख कृष्ण दूज को माधोराजपुरा (जयपुर-राजस्थान) में आचार्य श्री शांतिसागर जी के प्रथम शिष्य पट्टाचार्य आचार्य श्री वीरसागर जी महाराज से आर्यिका दीक्षा (महिलाओं के लिए दीक्षा की सर्वोच्च अवस्था) ली और आर्यिका ज्ञानमति बन गईं। नाम के अनुसार सारे विश्व में एक विराट साहित्य कि श्रृंखला का सृजन किया। जो कि न भूतो न भविष्यति।</p>
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		<title>चकवाड़ा में आचार्य वसुनंदी जी महाराज ससंघ का मंगल प्रवेश : महिलाओं ने मंगल कलशों से भव्य अगवानी की </title>
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		<pubDate>Wed, 02 Apr 2025 18:12:58 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[चकवाड़ा में आचार्य वसुनंदी जी महाराज ससंघ का मंगलवार देर शाम भव्य मंगल प्रवेश हुआ। धर्म गुणामृत के ट्रस्टियों सहित सकल जैन समाज चकवाड़ा ने बैंडबाजों के साथ जयकारे लगाते हुए मुनि संघ का भव्य मंगल प्रवेश कराया। समाजजनों ने पाद प्रक्षालन किया। फागी से पढ़िए राजाबाबू गोधा की खबर&#8230; फागी। धर्म गुणामृत ट्रस्ट गुणस्थली [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>चकवाड़ा में आचार्य वसुनंदी जी महाराज ससंघ का मंगलवार देर शाम भव्य मंगल प्रवेश हुआ। धर्म गुणामृत के ट्रस्टियों सहित सकल जैन समाज चकवाड़ा ने बैंडबाजों के साथ जयकारे लगाते हुए मुनि संघ का भव्य मंगल प्रवेश कराया। समाजजनों ने पाद प्रक्षालन किया। <span style="color: #ff0000">फागी से पढ़िए राजाबाबू गोधा की खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>फागी।</strong> धर्म गुणामृत ट्रस्ट गुणस्थली चकवाड़ा में आचार्य वसुनंदी जी महाराज ससंघ का मंगलवार देर शाम भव्य मंगल प्रवेश हुआ। गुणस्थली चकवाडा के प्रवक्ता जयकुमार गंगवाल एवं एडवोकेट विनोद जैन ने बताया कि यह संघ बाडा पदमपुरा, शिवदासपुरा, माधोराजपुरा, फागी होता हुआ चकवाड़ा ग्राम की सीमा पर पहुंचा। जहां धर्म गुणामृत ट्रस्ट के ट्रस्टियों सहित सकल जैन समाज चकवाड़ा ने बैंडबाजों के द्वारा जयकारों के साथ मुनि संघ का भव्य मंगल प्रवेश कराया। महिलाओं ने मंगल कलशों से भव्य अगवानी कर पाद प्रक्षालन करने के बाद आरती कर संत भवन में ठहराया। मुनि संघ की भव्य आहारचर्या होने के बाद संघ ने मोजमाबाद के लिए मंगल विहार किया।</p>
<p><strong>यह समाजजन मौजूद थे</strong></p>
<p>जैन महासभा के प्रतिनिधि राजाबाबू गोधा ने बताया कि इस अवसर पर एडवोकेट विनोद कुमार जैन, जयकुमार गंगवाल, महेंद्रकुमार कासलीवाल, हरकचंद गंगवाल, टीकमचंद गंगवाल सहित सभी श्रावक श्राविकाएं मौजूद थे।</p>
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		<title>आचार्यश्री शांति सागरजी का प्रतिरूप हैं 90 वर्षीय ज्ञानमती माताजी-आर्यिकाश्री चन्दनामती माताजीः जैन धर्म कीे पताका फहराने का संदेश दे रही है </title>
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		<pubDate>Mon, 24 Feb 2025 13:15:11 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[मेरा परम सौभाग्य है कि ऐसे चारित्र्य चक्रवर्ती आचार्यश्री शांति सागरजी महाराज का वर्तमान में आचार्य पदारोहण का शताब्दी वर्ष चल रहा है। उन्हें समडोली, महाराष्ट्र में आचार्य पद पर समाज ने प्रतिस्थापित किया था। वे बीसवीं शताब्दी में प्रथम आचार्य के रूप में इस धरती पर हम सबके लिए दिगदिगन्त बने थे। आज भी [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>मेरा परम सौभाग्य है कि ऐसे चारित्र्य चक्रवर्ती आचार्यश्री शांति सागरजी महाराज का वर्तमान में आचार्य पदारोहण का शताब्दी वर्ष चल रहा है। उन्हें समडोली, महाराष्ट्र में आचार्य पद पर समाज ने प्रतिस्थापित किया था। वे बीसवीं शताब्दी में प्रथम आचार्य के रूप में इस धरती पर हम सबके लिए दिगदिगन्त बने थे। आज भी उन आचार्य महाराज की सारी बातें चाहे हमने दर्शन न किये हो, लेकिन ऐसा लगता है कि हमने भी महाराज के साक्षात दर्शन ही कर लिए। <span style="color: #ff0000">पढ़िए कोल्हापूर, महाराष्ट्र से अभिषेक अशोक पाटील की यह पूरी खबर&#8230; </span></strong></p>
<hr />
<p><strong>कोल्हापूर।</strong> आचार्यश्री शांति सागरजी महाराज के बारे में हम क्या ही कह सकते हैं। सन 1924 में उन्हें समडोली महाराष्ट्र में आचार्य पद पर समाज ने प्रतिस्थापित किया था। पूज्य गणिनी प्रमुखश्री ज्ञानमती माताजी के मुख से जब हम सुनते हैं। तो ऐसा लगता है कि हमने भी आचार्यश्री शांति सागर महाराज के साक्षात दर्शन ही कर लिए। पूज्य गणिनी श्री ज्ञानमती माताजी के रूप में आज हमें शांति सागरजी का दर्शन परिलक्षित होता है। क्योंकि उन्होंने अपने जीवन में अपने गुरुणां गुरु प्रथमाचार्य चारित्र चक्रवर्ती महाराज के हर आदेश को हर संदेश को, हर उनकी बातों को, अपने जीवन में अंगीकार किया है। आज वे उन्हीं शांति सागरजी महाराज के प्रथम पट्टशिष्य आचार्यश्री वीर सागरजी महाराज से दीक्षित होकर सन 1956 में माधोराजपुरा (राज.) में इनकी दीक्षा हुई।</p>
<p><strong>जैन धर्म कीे पताका फहराने का संदेश दे रही है</strong></p>
<p>आज भी हम सबको विगत 72 साल से लगातार जैन धर्म के पताका फहराने का संदेश, आदेश और आशीर्वाद दे रही है। ऐसी पूज्य माताजी आज 91 वर्ष की हो रही है। जिन्होंने आचार्य शांति सागरजी महाराज के साक्षात संदेशों को उनके साक्षात दिग्दर्शन को पूरे विश्व में गुंजायमान किया है। पूज्य माताजी का कोई भी प्रवचन ऐसा नहीं होता है। जब वे शांति सागरजी महाराज के बारे में कोई विषय, कोई बात, ना बताए या उनकी जय-जयकार ना करें।</p>
<p><strong>ऐसे शिष्यों का मिलना भी बहुत अनूठा </strong></p>
<p>आज ऐसे शिष्यों का मिलना भी बहुत अनूठा है। जो अपने गुरु के भी गुरु, गुरुणां गुरु, गुरु और समस्त गुरु परम्परा को आज इस प्रकार से प्रभावित, प्रसारित करती हैं, की पूरे देश में हम सब एक आदर्श गुरु परंपरा को प्राप्त करते हैं। आचार्य शांति सागरजी महाराज हमारी पूरी जैन समाज के आदर्श हैं। पूरी संत समुदाय के आदर्श हैं। उनकी ही बातों को उनके ही बताए मार्ग को पालन करते हुए आज हमारे दिगंबर जैन समाज के सारे संत समुदाय, आर्यिका माताएं, दिगंबर मुनि सभी लोग उनके बतायें मार्ग पर मूलाचार ग्रंथ में बताई बातों का पालन कर रहे हैं। ऐसे आचार्य शांति सागरजी महाराज के प्रति हमारा शत-शत नमन हैं।</p>
<p><strong>नाम, चर्या, उनके संदेश दिगदिगंत रहे </strong></p>
<p>उनके आचार्य पदारोहण शताब्दी वर्ष की यह मिसाल हम सबके लिए बहोत अच्छी कायम हो। हमारे लिए सबके लिए अमर बन जाए। ऐसी मंगल प्रार्थनाओं के साथ में आचार्यश्री शांति सागरजी आज भी पूजे जायें। आने वाले हजारो साल तक भी उनका नाम दिगदिगंत रहे, उनकी चर्या दिगदिगंत रहे, उनके संदेश दिगदिगंत रहे और आने वाली पीढ़ी भी आचार्यश्री शांति सागरजी के बतायें संदेशो और मार्ग पर चलते हुये जैन धर्म की पताका को फैराती रहे और दीक्षा लेकर के मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करती रहे ऐसी मंगल भावना हैं।</p>
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