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	<title>महाशांति धारा &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<description>ताज़ा खबरे हिन्दी में</description>
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	<title>महाशांति धारा &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>महान आत्माएं निंदा भी करते हैं तो बहुत संभलकर: मुनि श्री सुधासागरजी महाराज के सान्निध्य में नवीन वेदी पर हुई जगत कल्याण की कामना के लिए महाशांति धारा </title>
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		<pubDate>Fri, 03 Oct 2025 13:54:29 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[महान आत्माएं निंदा करते हुए भी सुधारने का भाव रखता है क्योंकि, निंदा का उद्देश्य कभी किसी को नीचे गिरना नहीं होता वल्कि उसे पुनः अपने मार्ग में स्थित करना होता है और होना ही चाहिए। यह उद्गार सुभाषगंज मैदान में चल रहे स्नातक सम्मेलन में मुनि पुगंव श्री सुधासागरजी महाराज ने व्यक्त किए। अशोकनगर [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>महान आत्माएं निंदा करते हुए भी सुधारने का भाव रखता है क्योंकि, निंदा का उद्देश्य कभी किसी को नीचे गिरना नहीं होता वल्कि उसे पुनः अपने मार्ग में स्थित करना होता है और होना ही चाहिए। यह उद्गार सुभाषगंज मैदान में चल रहे स्नातक सम्मेलन में मुनि पुगंव श्री सुधासागरजी महाराज ने व्यक्त किए। <span style="color: #ff0000">अशोकनगर से पढ़िए, राजीव सिंघई की यह खबर..</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>अशोकनगर।</strong> महान आत्माएं निंदा भी करते हैं तो भी बहुत संभालकर और बहुत अच्छी भाषा में करते हैं निंदा कोई बुरी चीज नहीं है महान आत्माएं निंदा करते हुए भी सुधारने का भाव रखता है क्योंकि, निंदा का उद्देश्य कभी किसी को नीचे गिरना नहीं होता वल्कि उसे पुनः अपने मार्ग में स्थित करना होता है और होना ही चाहिए। यह उद्गार सुभाषगंज मैदान में चल रहे स्नातक सम्मेलन में मुनि पुगंव श्री सुधासागरजी महाराज ने व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि यदि निंदा का उद्देश्य किसी को मार्ग से भटकाना मार्ग से ही बेदखल करना हो गया तो वह कभी सुधर नहीं पाएगा।</p>
<p>शुद्ध भाव नहीं शुद्ध भोजन करना अनिवार्य कहा गया है। इसमें भी देने वाला शुद्ध हो और जिस स्थान पर भोजन दिया जा रहा है। जहां बन रहा है, वह भी शुद्ध होने का उल्लेख किया गया। ये सब चीजें तो अनादि अनंत से चल आ रही है इसलिए तो कहा गया है जैसा खावें अन्य वैसा होवे मन। अन्न से मन को जोड़ा गया है। मन की शुद्धि के लिए भी भोजन की शुद्धि अनिवार्य है।</p>
<p><strong>नवीन वेदी पर भगवान विराजते ही हुईं महा शांतिधारा</strong></p>
<p>आचार्य श्री विद्यासागर भवन में नवीन भव्य वेदी पर मुनिश्री सुधासागरजी महाराज ससंघ के साथ एवं प्रतिष्ठाचार्य प्रदीप भैया के कुशल निर्देशन में गंज मंदिर से भगवान का श्री विहार हुआ और प्रतिष्ठाचार्य प्रदीप भैया के मंत्रोच्चार के बीच भगवान को नवीन वेदी पर विराजमान किया गया। इस दौरान आज जगत कल्याण की कामना के लिए महा शांतिधारा की गई। जिसका सौभाग्य रिषभ कुमार, सिद्धार्थ कुमार सोगानी, जैन समाज कोषाध्यक्ष सुनील अखाई, मंत्री विजय धुर्रा देवेंद्र कुमार, पवनकुमार धुर्रा, बावा मेडिकल परिवार के साथ अन्य प्रमुखजनों को मिला। इस दौरान सैकड़ों भक्तों ने भगवान के अभिषेक का सौभाग्य प्राप्त किया। इस दौरान जैन समाज अध्यक्ष राकेश कांसल, महामंत्री राकेश अमरोद, कोषाध्यक्ष सुनील अखाई, उपाध्यक्ष अजित बरोदिया, प्रदीप तारई राजेंद्र अमन, मंत्री शैलेंद्र श्रागर, मंत्री विजय धुर्रा, मंत्री संजीव भारल्लिय, मीडिया प्रभारी अरविंद कचनार ऑडिटर संजय के टी थूवोनजी अध्यक्ष अशोक जैन, टींगू मिल, महामंत्री मनोज भैसरवास सहित अन्य प्रमुख जन विशेष रूप से उपस्थित थे।</p>
<p><strong>खुले अधिवेशन में युवा मनीषियों रखेंगे अपने विचार</strong></p>
<p>इस दौरान जैन समाज के मंत्री विजय धुर्रा ने कहा कि हम सब भारत वर्ष से पधारे युवा मनीषियों को सुन रहे हैं। इनके शोध परख लेखों को सुनकर सभी का मन गदगद हो रहा है। कल हम सब इन युवा मनीषियों को खुले अधिवेशन में सुन सकेंगे और इनके अंदर जो आने वाली चुनौतियां हैं। उनके समाधान का भाव है, उसे देखेंगे साथ ही श्री दिगंबर जैन पंचायत कमेटी द्वारा सभी युवा विद्वानों और विदुषियों का बहुमान किया जाएगा। कई दौरान ये मनीषी अपने वर्षों तक किए गए गहन चिंतन मनन को मुनि पुंगव श्रीसुधासागर जी महाराज के सानिध्य में रखेंगे। ये गौरव भी हमारे नगर को मिलने जा रहा है।</p>
<p><strong>मन के भटकाव को रोकने के लिए ध्यान किया जाता है </strong></p>
<p>उन्होंने कहा कि धर्म ध्यान के साथ ही आर्त ध्यान और रौद्र को भी ध्यान में लिया गया। वैसे आरत ध्यान, रोद्र ध्यान को अच्छा नहीं माना जा सकता। ज्ञान और ध्यान का प्रसंग है ज्ञान के साथ ध्यान किया जाता है तो वह परिणाम देता है। उन्होंने कहा कि धनको ही धनी नहीं कहा जा सकता। धनी धन के बिना भी हो सकता है। धन का नाम धनी ज्ञान के बिना ज्ञाता नहीं है। ध्यान चारित्र की पर्याय है ज्ञान नहीं है आनंद लेने वाला ज्ञान है या ज्ञानी छहडाला कार ने ज्ञानी के छिन माह विषय शब्द आया है। इस प्रकार ये आध्यात्मिक गुित्थयां कहलाती है। आध्यात्मिक एक पानक है सम्यक दर्शन ज्ञान चारित्र को ध्यान कहा गया है इसमें मात्र आनंद की अनुभूति होती है परम पूज्य आचार्य श्री कुंद कुंद स्वामी द्वारा विरचित श्री अष्टपाहुड जी ग्रान्थ मन के भटकाव को रोकने के लिए ध्यान किया जाता है योग जो हो रहें हैं वह मन को एकाग्र कराने का मार्ग है ध्यानाभाष है ध्यान अलग चीज नहीं है व्यक्ति को अनैतिकता से बचाने के लिए कोई कार्य करता है तो ठीक है।</p>
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