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	<title>महामंत्र &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<description>ताज़ा खबरे हिन्दी में</description>
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	<title>महामंत्र &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>84 लाख मंत्रों का महामंत्र &#039;णमोकार महामंत्र : आचार्य श्री विशुद्धसागर जी ने बताई महामंत्र की महत्ता </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 23 Mar 2025 16:09:59 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आचार्य श्री विशुद्धसागर जी ने पंचकल्याणक में अपने प्रवचन में कहा कि 9 अप्रैल को महामंत्र णमोकार का पाठ पूरे विश्व में गूंजेगा। आचार्य श्री ने णमोकार मंत्र की महत्ता बताई। जलाना से पढ़िए अभिषेक पाटिल की यह खबर&#8230; जालना। आचार्य विशुद्धसागर जी महाराज अपने गुरु आचार्य श्री विरागसागर जी की समाधि स्थली जालना पहुंचे [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>आचार्य श्री विशुद्धसागर जी ने पंचकल्याणक में अपने प्रवचन में कहा कि 9 अप्रैल को महामंत्र णमोकार का पाठ पूरे विश्व में गूंजेगा। आचार्य श्री ने णमोकार मंत्र की महत्ता बताई। <span style="color: #ff0000">जलाना से पढ़िए अभिषेक पाटिल की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>जालना।</strong> आचार्य विशुद्धसागर जी महाराज अपने गुरु आचार्य श्री विरागसागर जी की समाधि स्थली जालना पहुंचे तो भावुक हो गए। आचार्य श्री विशुद्धसागर जी ने पंचकल्याणक में अपने प्रवचन में कहा कि 9 अप्रैल को महामंत्र णमोकार का पाठ पूरे विश्व में गूंजेगा।</p>
<p>जालना धर्मसभा में आचार्य भगवन श्री विशुद्ध सागर जी ने कहा कि 84 लाख मंत्रों का महामंत्र &#8216;णमोकार महामंत्र&#8217; है। णमोकार महामंत्र से 84 लाख मंत्रों की उत्पत्ति हुई है। देवों में महान देव अरहंत देव होते हैं। ज्ञान में महान केवलज्ञान है। गुरु में महान गुरु निर्ग्रन्थ गुरु हैं। शास्त्रों में महानशास्त्र सिद्धांत शास्त्र है। उसी प्रकार मंत्रों में महान मंत्र णमोकार मंत्र है।</p>
<p>णमो अरिहंताणं, णमो सिद्धाणं, णमो आइरियाणं। णमो उवज्झायाणं, णमो लोए सव्वसाहूणं।।</p>
<p>णमोकार मंत्र प्राकृत भाषा का मंत्र है। प्राकृत में इसे णमोकार मंत्र कहते हैं। संस्कृत में इसे नमस्कार मंत्र कहते हैं। हिन्दी में इसी का अपभ्रंश नाम नवकार मंत्र है। इस मंत्र के अनेक नाम हैं। इनमें प्रमुख हैं-पंच नमस्कार मंत्र, महामंत्र, अपराजित मंत्र, मूलमंत्र, मंत्रराज, अनादिनिधन मंत्र, मंगल मंत्र आदि।</p>
<p><strong>इनका संक्षिप्त विवरण निम्न प्रकार है</strong></p>
<p>(1) पंच नमस्कार मंत्र:-</p>
<p>जो परम पद (मोक्ष) प्राप्त कर चुके हैं अथवा उस मार्ग पर अग्रसर हैं, ऐसे पांच परमेष्ठियों को इस मंत्र में नमस्कार किया गया है, अत: इसे पंच नमस्कार मंत्र कहते हैं।</p>
<p>(2) महामंत्र अपराजित मंत्र:-</p>
<p>तीनों लोकों में इस मंत्र के समान कोई मंत्र नहीं है। आचार्य उमास्वामी ने णमोकार मंत्र स्तोत्र में कहा है कि तराजू के एक पलड़े में णमोकार मंत्र और दूसरे में तीन लोक रख दें तो णमोकार मंत्र वाला पलड़ा ही भारी रहेगा। अत: इसे महामंत्र अथवा अपराजित मंत्र भी कहते हैं।</p>
<p>(3) मूलमंत्र-मंत्रराज:-</p>
<p>यह मंत्र संसार के सभी मंत्रों का जनक (मूल) है। इससे 84 लाख मंत्रों की उत्पत्ति हुई है। अत: इसे मूल मंत्र अथवा मंत्रराज भी कहते हैं।</p>
<p>(4) अनादि निधन मंत्र:-</p>
<p>पांचों परमेष्ठी अनंत काल से होते आ रहे हैं और भविष्य में भी अनन्त काल तक होते रहेंगे। इस प्रकार इनका आदि भी नहीं है और अंत भी नहीं है। इस मंत्र को किसी ने बनाया नहीं है और न यह कभी नष्ट होगा। अतः यह अनादि-निधन मंत्र कहलाता है। वर्तमान काल की अपेक्षा से आचार्य भूतबलि और पुष्पदन्त ने इस मंत्र को जैनधर्म के महान् ग्रन्थ ‘षट्खण्डागम’ में सर्व प्रथम प्राकृत भाषा में लिपिबद्ध किया।</p>
<p>(5) मंगल मंत्र:-</p>
<p>यह मंत्र पापों का नाश करने वाला व मंगल करने वाला है।</p>
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		<title>आओ जानें णमोकार मंत्र के महत्त्व को</title>
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		<dc:creator><![CDATA[संपादक]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 07 Jul 2022 23:30:31 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[आलेख]]></category>
		<category><![CDATA[जैन न्यूज]]></category>
		<category><![CDATA[जैन मंत्र]]></category>
		<category><![CDATA[णमोकार मंत्र]]></category>
		<category><![CDATA[महामंत्र]]></category>
		<category><![CDATA[मुनि पूज्य सागर]]></category>
		<category><![CDATA[श्रीफल न्यूज]]></category>
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					<description><![CDATA[&#160; णमो अरिहंताणं, णमो सिद्धाणं, णमो आयरियाणं, णमो उवज्झायाणं, णमो लोए सव्व साहूण आलेख- अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज णमोकार मंत्र में विशिष्ट शुद्ध आत्मा को नमस्कार किया गया है । जिन्होनें अपने जीवन में अहिंसा को उतार लिया है तथा जिनकी सभी क्रिया अहिंसक है । यह आत्माएँ जैन संस्कृति की साक्षात प्रतिमा हैुं [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>&nbsp;</p>
<p style="text-align: center;"><span style="color: #b39f9f;"><strong>णमो अरिहंताणं,</strong></span><br />
<span style="color: #ff0000;"><strong>णमो सिद्धाणं,</strong></span><br />
<span style="color: #ffcc00;"><strong>णमो आयरियाणं,</strong></span><br />
<span style="color: #0000ff;"><strong>णमो उवज्झायाणं,</strong></span><br />
<span style="color: #000000;"><strong>णमो लोए सव्व साहूण</strong></span></p>
<p style="text-align: center;"><span style="color: #008080;">आलेख- अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज</span></p>
<p>णमोकार मंत्र में विशिष्ट शुद्ध आत्मा को नमस्कार किया गया है । जिन्होनें अपने जीवन में अहिंसा को उतार लिया है तथा जिनकी सभी क्रिया अहिंसक है । यह आत्माएँ जैन संस्कृति की साक्षात प्रतिमा हैुं । नमस्कार करने से हमारा जीवन आर्दश मय बन जाता है। शुद्ध आत्माओं का आर्दश सामने रखने से तथा शुद्धात्माओं के आर्दश का स्मरण,चिंतन और मनन करने से शुद्धत्व की प्राप्ति होती है,जीवन पूर्ण अहिंसक बनता है । अरिहंत,सिद्ध पूर्ण अहिंसक व परमात्मा बन गए है, आचार्य,उपाध्याय,साधु अहिंसक व परमात्मा बनने की प्रकिया है । ये पाँचो ही प्राणीमात्र के लिए उपकारी है । अपने जीवन में संयम,तपश्चरण द्वारा समस्त प्रणाओं का हित करते हैं। इस मंत्र के माध्यम से तप और त्याग के मार्ग में आगे बढने की प्रेरणा मिलती है । तथा अहिंसा,अपरिग्रह को आचारण में उतारने की शिक्षा,विश्वबन्धुत्व और आत्मकल्याण की कामना उत्पन्न होती है । ये पाँचों आत्माएँ परम पद में स्थित है इसलिए इन्हें परमेष्ठी कहते हैं।</p>
<p>संसार में प्राणी मात्र शारीयिक,मानसिक,आर्थिक और अगंतुक दु:खोँ से दु खी है,इन दु:खों से बचने के लिए जैन धर्म में एक मास्टर चाँबी है जिसे णमोकार मंत्र के नाम से सब जानते हैं। णमोकार मंत्र को मास्टर चाँबी इसलिए कहते हैं क्यों की णमोकार मंत्र रुपी चाँबी से संसार के समस्त दु:खो को नाश किया जा सकाता है । णमोकार मंत्र में सम्पूर्णी द्वादशांक गर्भित है । णमोकार मंत्र चमत्कारी मंत्र है क्यों की इस मंत्र के ध्यान,स्मरण,पाठ,साधना और जाप से प्राणी मात्र दु:ख में भी सुख का अनुभव करने लग जाता है तथा वह कार्य भी सफलता हो जाता है जिसमें वह बार-बार असफलता हो रहा है । संसार,स्वर्ग और मोक्ष के सुख णमोकार मंत्र के स्मरण से प्राप्त किया जाता है । मनुष्य के जीवन में णमोकार मंत्र का उपयोग उसके जन्म से लेकर मोक्ष जाने तक की हर क्रिया में सर्व प्रथम किया जाता है । प्रतिदिन श्रद्धा से जाप करने वाले मनुष्य को दु:ख कभी आ ही नही सकता है । जितने भी मंत्र,ऋद्धि मंत्र व यंत्र है वह सब णमोकार मंत्र से ही निकले या बने है ।</p>
<ul>
<li>बीमार व्यक्ति का इलाज डाँ. करता है दु:ख रुपी बीमारी का इलाज करने के लिए णमोकार मंत्र डाँ के समान है ।</li>
<li>जिस प्रकार हाथ की अंजुली में पानी अधिक देर तक नही रखा जा सकता है उसी प्रकार णमोकार मंत्र की आराधना करने वाला जीव पापमल से अधिक समय तक नही घिरा रह सकता है ।</li>
<li>युद्ध में व्यक्ति अपनी प्राणों की रक्षा के लिए मजबुत लोहे का कवच अपने हाथों में रखता है उसी प्रकार संसार रुपी दावानल वन में कर्मो रुपी प्राणीयों से बचने के मनुष्य को अपने मन में णमोकर मंत्र को रखना चाहिए क्योकि णमोकार मंत्र कवच के समान है ।</li>
<li>कल्पवृक्ष से जो माँगे वह मिलता है,उसी प्रकार णमोकार मंत्र का जाप करने वाले को सब कुछ मिल जाता है ।</li>
</ul>
<p><span style="color: #ff6600;"><strong>पर्यायवाची नाम</strong></span><br />
महामंत्र,बीज मंत्र,अनादि मंत्र,नमस्कार मंत्र,नवकार मंत्र,मूल मंत्र,पंच मंगल,अपराजित मंत्र,मंत्रराज,पंचपरमेष्ठी मंत्र,पंच पद मंत्र,शाश्वत मंत्र,अनादि निधन मंत्र,सर्वविघ्ननाशक मंत्र,सनातन मंत्र व मंगल सूत्र आदि नाम णमोकार मंत्र के हि है ।</p>
<p><span style="color: #ff6600;"><strong>नमस्कार</strong></span><br />
णमोकार मंत्र में अरिहंत,सिद्ध,आचार्य,उपाध्याय और साधु इन पाँच परमेष्ठी को नमस्कार किया गया है । अरिहंत और सिद्ध परमेष्ठी को देव संज्ञा और आचार्य,उपाध्याय और साधु को गुरु संज्ञा दी गई है । वर्तमान में पाँचो परमेष्ठी में से आचार्य,उपाध्याय,साधु परमेष्ठी के हमेँ साक्षात दर्शन हो सकते हैं। वर्तमान में अरिहंत,सिद्ध परमेष्ठी के साक्षात दर्शन नही हो सकते हैं,उनकी प्रतिमा के दर्शन मन्दिर चैत्याल आदि में कर सकते हैं।</p>
<p><span style="color: #ff6600;"><strong>इतिहास</strong></span><br />
णमोकार मंत्र प्राकृत भाषा में लिखा गया है । णमोकार मंत्र अनादि निधन मंत्र है,इसका सर्व प्रथम लिपिबद्ध उल्लेख षटखंडागम ग्रंथ में मंगलाचरण के रुप में मिलता है । षटखंडागम ग्रंथ के रचिता आचार्य पुष्पदंत भूतबली है । णमोकार मंत्र में 58 मात्राऐं,35 अक्षर,30 व्यंजन,34 स्वर 5 सामन्य पद,11 विशेष पद हैं । णमोकार मंत्र 84 लाख मंत्रो का जन्मदाता है । णमोकार मंत्र को 18432 प्रकार से बोल व लिख सकते हैं।</p>
<p><span style="color: #ff6600;"><strong>महत्व</strong></span><br />
<em>एसो पंच णमोक्कारो,सव्वपावप्पणासणो ।</em><br />
<em>मंगलाणं च सव्वेसिं,पढमं होई (हवइ) मंगलं ।</em></p>
<p><strong>अर्थ</strong>&#8211; यह पंच नमस्कार महामंत्र सर्व पापो का नाश करनेवाला है । सबके लिए मंगलमय है,तथा सभी मंगलों में प्रथम मंगल है ।</p>
<p><span style="color: #ff6600;"><strong>संकट मोचन</strong></span><br />
<em>संग्राम-सागर-क्रीन्द्र-भुजंग-सिहं, दुर्व्याधि-वह्नि-रिपु-बन्धनसम्भवानि ।</em><br />
<em>चौर-ग्रह-भ्रम-निशाचरशाकिनीनां,नश्यंति पंचपरमेष्ठीपदैर्भयानि ॥</em><br />
<em>(पंचनमस्कारस्तोत्रम् आचार्य उमास्वामी)</em></p>
<p>संग्राम,सागर,हाथी,सर्प,सिंह,दुष्ट व्याधियां,अग्नि,शत्रु और बन्धन से उत्पन्न होने वाले,चोर,ग्रहपीडाजन्य,भ्रमसम्भूत,निशाचर और शाकिनियों के द्वारा उत्पन्न भय पंच परमेष्ठी पदों के स्मरण से नष्ट हो जाते हैं।</p>
<p><span style="color: #ff6600;"><strong>अनुकल परिस्थिति</strong></span><br />
<em>इन्दुर्दिवाकरतया रविरिन्दुरुप: पातालमम्बरमिला सुरलोक एव ।</em><br />
<em>किं जल्पितेन बहुना भुवनत्रये1पि, यन्नाम तन्न विषमं च समं च न स्यात् ॥ (पंचनमस्कारस्तोत्रम् आचार्य उमास्वामी)</em></p>
<p>णमोकार मंत्र के प्रभाव से इच्छा करने पर चन्द्रमा सूर्यरुप में,सूर्य चन्द्ररुप में,पाताल आकाश रुप में,पृथ्वी स्वर्गरुप में परिणत हो सकते हैं । अधिक कहने से क्या? तीनोँ लोक मेँ ऐसी कोई वस्तु नहीं है,जो णमोकार मंत्र के साधक के लिए सम चाहने पर सम और विषम चाहने पर विषम न हो जाये ।</p>
<p><span style="color: #ff6600;"><strong>तीन लोक में श्रेष्ट</strong></span><br />
<em>मंत्र संसारसारं त्रिजगदनुपमं सर्वपापारिमंत्रं संसारोच्छेदमंत्रं विषमविषहरं कर्मनिर्मूलमंत्रम्</em><br />
<em>मंत्रं सिद्धिप्रदानं शिवसुखजननं केवलज्ञानमंत्रं मंत्रं श्रीजैनमंत्रं जप जप जपितं जन्मनिर्वामंत्रम् (मंगलमंत्र णमोकार एक अनुचिंतन)</em></p>
<p><strong>अर्थ</strong>&#8211; णमोकार मंत्र संसार में सारभूत है,तीनों लोकों में इसकी तुलना के योग्य दूसरा कोई मंत्र नहीं है,समस्त पापों का यह शत्रु है, संसार का उच्छेद करने वाला है,भयंकर विष को हर लेता है,कर्मों को जड मूल से नष्ट कर देता है,इसी से सिद्धि-मुक्ति का दाता है,मोक्ष सुख का और केवज्ञान को उत्पन्न करने वाला है। अत: इस मंत्र को बार-बार जपो,क्योंकि यह जन्म-परम्परा को समाप्त कर देता हैं ।</p>
<p><span style="color: #ff6600;"><strong>हल पल साथ</strong></span><br />
<em>अपवित्र: पवित्रो वा, सुस्थितो दु:स्थितो1पि वा ।</em><br />
<em>ध्यायेत्पंच-नमस्कारं,सर्वपापै: प्रमुच्यते ॥1॥</em><br />
<em>अपवित्र: पवित्रो वा सर्वावस्थां गतो1पि वा ।</em><br />
<em>य: स्मरेत्परमात्मानं स बाह्राभ्यंतरे शुचि: ॥2॥</em><br />
<em>अपराजित-मंत्रो1यं, सर्व-विघ्न-विनाशन: ।</em><br />
<em>मंगलेषु च सर्वेषु,प्रथमं मंगलं मत: ॥3॥</em><br />
<em>विघ्नौघा: प्रलयं यांति,शाकिनी-भूत-पन्नगा:।</em><br />
<em>विषं निर्विषतां याति, स्तूयमाने जिनेश्वरे । (ज्ञानपीठ पुंजाजलि)</em></p>
<p><strong>अर्थ</strong>&#8211; पवित्र हो या अपवित्र,अच्छी स्थिति में हो या बुरी स्थिति में,पंच-नमस्कार मंत्र का ध्यान करने से सब पाप छूट जाते हैं । पवित्र हो या अपवित्र, किसी भी दशा में हो, जो पंच परमेष्ठी (परमात्मा) का स्मरण करता है वह बाह्य और अभ्यंतर से पवित्र होता है । यह नमस्कार मंत्र अपराजित मंत्र है । यह सभी विघ्नों को नष्ट करनेवाला है एवं सर्व मंगलों में यह पहला मंगल है । विघ्नों के समूह नष्ट हो जाते हैं एवं शाकिनी,डाकिनी,भूत,पिशाच,सर्प आदि का भय नहीं रहता और भयंकर हलाहल-विष भी अपना असर त्याग देते हैं।</p>
<p><span style="color: #ff6600;"><strong>अंतिम समय सुनने का फल</strong></span><br />
<em>कृत्वा पाप सहस्त्राणि हत्वा जंतुशतानि अमुं मंत्रं समाराध्य तिर्यंचि1पि दिवं गता: ॥ ज्ञानार्वण ॥</em></p>
<p><strong>भार्वाथ</strong>&#8211; तिर्यंच पशु-पक्षी, जो मांसाहारी,क्रूरू हैं जैसे सर्प,सिन्हादि,जीवन में सहस्त्रों प्रकार के पाप करते हैं । ये अनेक प्रणीयों की हिंसा करते हैं,मांसाहारी होते हैं तथा इनमें क्रोध,मान,माया और लोभ कषायों की तीव्रता होती है,फिर भी अंतिम समय में किसी दयालु द्वारा णमोकार मंत्र का श्रवण करने मात्र से उस निंघ तिर्यंच पर्याय का त्याग कर स्वर्ग में देव गति को प्राप्त होते हैं।</p>
<p><span style="color: #ff6600;"><strong>जिनवाणी का सार</strong></span><br />
<em>जिणसासणस्य साये चउदसपुव्वाणं समुद्धारो ।</em><br />
<em>जस्य मणे णमोकाये संसारो तस्य किं कुणादि ॥</em><br />
<em>वि.(आइरिय वसुणदि तच्चतियारो)</em></p>
<p>जो सम्पूर्ण जिनशासन का सार,चौदह पूर्वों का भी निचोड है,ऐसा णमोकार मंत्र जिसके हदय में सदा रहता है,यह संसार उसका क्या बिगाड सकता है ?</p>
<p><span style="color: #ff6600;"><strong>तिर्यंच गति से देव गति</strong></span><br />
<em>मरणक्षणलब्धेन येन श्वा देवा1जनि ।</em><br />
<em>पंचमंत्रपदं जप्यमिदं केन न धीमता ॥ (क्षत्रचूडामणि)</em></p>
<p>मरणोन्मुख (कुत्ते को )जीवधर स्वामी ने करुणावश णमोकार मंत्र सुनाया था,इस मंत्र के प्रभाव से वह पापाचारी श्वान देवता के रुप में उत्पन्न हुआ । अत: सिद्ध है कि मंत्र आत्मविशुद्धि का बहुत बडा कारण है ।</p>
<p>कहानी</p>
<p style="text-align: center;"><span style="color: #000000;"><strong>बैल से सुग्रीव</strong> </span></p>
<blockquote><p>भरत क्षेत्र के अयोध्या नगरी में राजा राम व लक्ष्मण राज्य करते थें,उस समय की बात है महेन्द्र उद्यान में सकलभूषण केवली मुनिराज का आगमन हुआ अब यह बात राजा राम को पता चली तो वह अपने परिवार व मित्रों के साथ सकलभूषण केवली के दर्शन करने निकले,उद्यान में जाकर कर मुनिराज को नमस्कार कर उनकी पूजा व वन्दना कर मुनिराज के मुखार्विन्द से उपदेश सुना उसके बाद विभीषण ने मुनिराज से सुग्रीव राम का किस कारण से इतना स्नेही व वात्सल्य बना तब केवली बोले इस भरत क्षेत्र में श्रेष्ठपुर नामक नगर में छत्रछाय नाम का राजा राज्य करता था,उसकी पत्नी का नाम श्रीदत्ता था,इसी नगर में पद्मरुचि नाम का सेठ रहता था वह धर्मात्मा व सम्यग्दृष्टि था वह एक दिन मन्दिर से पूजा व आराधना कर आ रहा था तो उसने रास्ते में देखा की दो बैल आपस में लड रहे थे जिसमें एक बैल नीचे गिर गया वह मरणोन्मुख आवस्था में था उस समय पद्मरुचि सेठ में बैल के कान में पंचनमस्कार मंत्र सुनाया सेठ के मुहँ से मंत्र सुनते वह बैल मरण को प्राप्त हो गया, अंतिम समय में धर्म व णमोकार मंत्र का साथ मिलने के प्रभाव से वह बैल मर कर राजा छत्रछाय की रानी श्रीदत्ता के गर्भ से लकडे के रुप में जन्म लिया जिसका नामकरण वृषभध्वज रखा गया,जैसे जैसे समय निकलता गया वह बडा हुआ अनुक्रम से वह राजपद को प्राप्त हुआ,एक दिन वह हाथी की सवारी कर नगर का परिभ्रमण कर रहा था कि वह उस स्थान पर पहुच गया जहाँ पर वह पुर भव में बैल की पर्याय में मरण को प्राप्त हुआ था, उस स्थान को देख कर उसे पूर्व भव की सारी बात का स्मरण आ गया,राजा वृषभध्वज ने यह जानने के लिए की किस व्यक्ति ने बैल को णमोकार मंत्र सुनाया था, उसी स्थान के सामने बैल को णमोकार मंत्र देते हुए सेठ की एक प्रतिमा बनवाई तथा वहा पर एक विद्वान व्यक्ति को रखा,उसे कहा गया की आप यहा पर इस बात का ध्यान रखे की कौन व्यक्ति इस प्रतिमा को देखकर आर्श्चय में पडता है,उस व्यक्ति को समान के साथ राज भवन लेकर आए । एक दिन पद्मरुचि सेठ उसी स्थान पर गया वह प्रतिमा को देखकर आर्श्चय में पड गया यह देख नियुक्त किए विद्वान उसे राज भवन ले गया,वहा पर राजा वृषभध्वज ने पद्मरुचि सेठ से पुछा की आप उस प्रतिमा को देख कर आर्श्चय में क्यों पड गए थे। सेठ में भी वही पूर्व भव की सारी बात दी तब राजा ने सेठ से कहा वह भूतपूर्व बैल में ही हुँ । कालांतर में वह राजा तो सुग्रीव हुआ वह सेठ राम हुआ है इसी के कारण सुग्रीव राम का स्नेही बना है । इस कहानी से हमे यह प्रेरणा मिलती है की णमोकार मंत्र के प्रभाव से एक तिर्यंच बैल ने भी देव व मनुष्य पर्याय में घुमकर उत्तम सुख को प्राप्त किया । जिस हमे भी णमोकार मन्त्र का पाठ व जाप प्रति समय करते रहना चाहिए ।</p></blockquote>
<p style="text-align: left;"><span style="color: #ff6600;"><strong>मुनि और श्रावक की दिनचर्या में</strong></span><br />
मुनि एवं श्रावक अपनी प्रतिदिन की क्रिया का प्रारम्भ णमोकार मंत्र से करते हैं । जैसे समायिक,प्रतिक्रमण, देव वन्दना,भक्ति पाठ,स्वाध्याय शौच,लघुशंका,प्रत्याख्यान,प्रायच्चित,आहार चर्या आदि का प्रारम्भ णमोकार मंत्र से ही होता है । तथा अंतिम समय साधु या श्रावक समाधिमरण करता है तो उसे मात्र णमोकार मंत्र ह्री सुनाया जाता है ।<br />
श्रावक पूजा,उपवास,दान,त्याग,पाठ भोजन आदि कार्य करता है तथा एक इन्द्रिया जीव की हिंसा होने पर णमोकार मंत्र का जाप करता है ।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p><span style="color: #ff6600;"><strong>कब कब जप करना चाहिए</strong></span><br />
णमोकार मंत्र का श्रद्धा व आस्था के साथ हर कार्य के साथ जाप,स्मरण और ध्यान करने से वह कार्य अवश्य ही सफलता को प्राप्त होता है ।<br />
स्वपन् जाग्रत्तिष्ठन्नपि पथि चलन् वेश्मनि सरन्<br />
भ्रमन् क्लिश्यन् माघन् वनगिरिसमुद्रेष्ववतरन् ।<br />
नमस्कारान पंच स्मृतिखनिनिखातानिव सदा,<br />
प्रशस्तैर्विज्ञप्तानिव वहति य: सो1त्र सुकृती ॥<br />
सोते हुये,जागते हुए,ठहरते हुये,मार्ग मे चलते हुये,घर में चलते हुये,घूमते हुये,क्लेश दशा में मद-अवस्था में वन-गिरि और समुद्रों में अवतरण करते हुये,जो व्यक्ति (सुकृती) प्रशस्ति से वोज्ञापित किये गये इन नमस्कार मंत्रों को अपनी स्मृतिरुप खजाने मे रखे हुये के समान धारण करता है,वह बडा भाग्यशाली (सुकृती पुण्यवान् ) है ।</p>
<p><span style="color: #ff6600;"><strong>मंगल रुप णमोकार मंत्र</strong></span><br />
<em>मंगलकारकवस्तूनां दधिदूर्वाक्षतचन्दननालिकेरपूर्ण-कलश-स्वस्तिक-दर्पण-भद्रासन-वर्धमान-मत्स्ययुगल-श्रीवत्सनंघावर्तादीनां मध्ये प्रथमं मुख्यं मगलं मंगलकारको भवति । यतो1स्मिन् पठिते जप्ते स्मृते च सर्वाण्यपि मंगलानि भवतीत्यर्थ:</em><br />
<strong>भावार्थ</strong> दधि,दर्वा,अक्षत,चन्दन,नारियल,पूर्णकलश,स्वस्तिक,दर्पण,भद्रसन,वर्धमान,मत्स्य-युगल,श्रीवत्स,नंघावर्त आदि मंगल वस्तुओं में णमोकार मंत्र सबसे उत्कृष्ट मंगल है । णमोकार मंत्र का स्मरण और जप से अनेक प्रकार की सिद्धियाँ प्राप्त होती है । अमंगल दूर हो जाता है और पुण्य की वृद्धि होती है ।</p>
<p><span style="color: #ff6600;"><strong>शांति को देने वाला</strong></span><br />
ननु उवसग्गे पिडा कूरग्गह दंसणं भओ संका ।<br />
जइ वि न हवंति ए ए,तह वि सगुज्झं भणिज्जासु<br />
उपसर्ग,पीडा,कूरग्रह,दर्शन,भय,शंका आदि न भी हो तो भी शुभ ध्यान पूर्वक णमोकार मंत्र का जाप या पाठ करने से परम शांति प्राप्त होती है। णमोकार मंत्र सभी प्रकार के सुखों को देने वाला है ।</p>
<p><span style="color: #ff6600;"><strong>उपवास का फल</strong></span><br />
<em>विशुद्धया चिंतयस्तस्य शतमष्टोत्तरं मुनि: ।</em><br />
<em>भुंजानो1पि लभेतैव चतुर्थतपस: फलम् ॥</em><br />
हेमचन्द्रचार्य का योगशास्त्र (मंगलमंत्र णमोकार एक अनुचिंतन)</p>
<p>विशुद्धि पूर्वक इस (णमोकारमंत्र) मंत्र का 108 बार ध्यान करने से भोजन करने पर भी चतुर्थोपवास-प्रोषधोपवास का फल प्राप्त होता है।</p>
<p><span style="color: #ff6600;"><strong>जाप विधि</strong></span><br />
णमोकार मंत्र का जाप -1.द्रव्य2.क्षेत्र 3.समय 4.आसन 5.विनय 6.मन 7.वचन 8.काय इन आठ प्रकार की शुद्धि के साथ जाप करने पर फल जल्दी मिलता है ।</p>
<ol>
<li><span style="color: #ff0000;">द्रव्य शुद्धि-</span> द्रव्य शुद्धि का अर्थ है अंतरंग शुद्धि से है । पाँचों इन्द्रिय तथा मन को वश में कर कषायों का कम करना तथा दयालुचित हो कर जाप करना चाहिए ।</li>
<li><span style="color: #ff0000;">क्षेत्र शुद्धि &#8211;</span> ऐसा स्थान जहाँ हल्ला-गुल्ला नही हो, मच्छर,डाँस भी नही हो,मन को आशांत करने के साधन न हो तथा जहाँ पर न तो अधिक उष्ण हो न ही अधिक शीत हो एसे स्थान का चयन कर जाप करने बैठना क्षेत्र शुद्धि है ।</li>
<li><span style="color: #ff0000;">समय शुद्धि</span> -प्रात:मध्याह और सन्ध्या के समय कम से कम 45 मिनट तक जाप करना चाहिए ।</li>
<li><span style="color: #ff0000;">आसन शुद्धि</span>&#8211; काष्ठ,शिला,भूमि,चटाई या शीतल पट्टी पर पूर्वदिशा या उत्तर दिशा में मुख पद्मासन,खड्गासन या अर्धपद्मासन होकर जाप करना चाहिए ।</li>
<li><span style="color: #ff0000;">विनय शुद्धि</span>&#8211; जिस आसन पर बैठक कर जाप करना है उसे ईयापथ शुद्धि के साथ साफ करना चाहिए । जाप करते समय मन में मंत्र के प्रति श्रद्धा, अनुराग और नम्रता का भाव रहना आवश्यक है ।</li>
<li><span style="color: #ff0000;">मन शुद्धि</span>&#8211; अशुभ विचारोँ का त्याग कर शुभ विचार को ग्रहण करना,मन को चंचल होने से रोकना मन शुद्धि है ।</li>
<li><span style="color: #ff0000;">वचन शुद्धि-</span> धीर-धीर अर्थ समझते हुए शुद्ध उच्चारण करना,मन-मन में उच्चारण करना वचन शुद्धि है।</li>
<li><span style="color: #ff0000;">काय शुद्धि</span>-शौचादि जाने के बाद शरीर की यथा योग्य शुद्धि करना तथा शरीर का हलन-चलन नही होने देना काय शुद्धि है।</li>
</ol>
<p><span style="color: #ff6600;"><strong>जाप का फल</strong></span></p>
<ul>
<li>णमोकार मंत्र के एक अक्षर का भाव सहित जाप व स्मरण करने से सात सागर तक भोगा जाने वाला पाप नष्ट हो जाता है।</li>
<li>णमोकार मंत्र के एक पद का भाव सहित जाप व स्मरन करने से पचास सागर तक भोगा जाने वाला पाप कर्म का नाश हो जाता है ।</li>
<li>सम्रग णमोकार मंत्र का भक्ति भाव सहित विधिपूर्वक जाप व स्मरण करने से पाँच सौ सागर तक भोगे जाने वाला पाप कर्म नष्ठ हो जाता है ।</li>
<li>णमोकार मंत्र के आठ करोड,आठ लाख,आठ हजार और आठा सौ आठा बार लगातार जाप करने से शाश्वत सुख अर्थात मोक्ष को प्राप्त करता हैं ।</li>
<li>णमोकार मंत्र के सात लाख लगातार जाप करने से जीव समस्त प्रकार के दु:खों व कष्टों से मुक्ति प्राप्त कर लेता है ।</li>
<li>णमोकार मंत्र का धूप देकर एक लाख जाप करने से मनोकामना पूर्ण होती है ।</li>
<li>णमोकार मंत्र का आनुपूर्वी क्रम से मंत्र का स्मरण और मननकरने से आत्मिक शांति मिलती है ।</li>
</ul>
<p>णमोकार मंत्र का जाप श्रद्धा और आस्था के साथ किया जाने पर ही फल प्राप्त होता है ।</p>
<p><span style="color: #ff6600;"><strong>ग्रह की शांति</strong></span><br />
णमोकार मंत्र का पाठ व जाप नव ग्रह की पीडा को शांत करता है । णमोकार मंत्र अलग-अलग पदो से नव ग्रहों की पीडा शांत होती है ।</p>
<ul>
<li>ऊँ णमो सिद्धाणं का जाप करने से सूर्य ग्रह की पीडा शांत होती है ।</li>
<li>ऊँ णमो अरिहंताणं का जाप करने से चन्द्रग्रह शुक्र ग्रह,की पीडा शांत होती है ।</li>
<li>ऊँ णमो सिद्धाणं का जाप करने से मंगल ग्रह की पीडा शांत होती है ।</li>
<li>ऊँ णमो उवज्झायाणँ का जाप करने से बुध ग्रह की पीडा शांत होती है ।</li>
<li>ऊँ णमो आइरियाणँ का जाप करने से गुरु ग्रह की पीडा शांत होती है ।</li>
<li>ऊँ णमो लोए सव्वसाहूणं का जाप करने से शनि ग्रह की पीडा शांत होती है ।</li>
<li>राहु और केतु ग्रह की पीडा शांत करने के लिए समस्त णमोकार मंत्र का जाप किया जाता है ।</li>
</ul>
<p><span style="color: #ff6600;"><strong>बीज मंत्र की उत्पत्ति</strong></span></p>
<ul>
<li>ऊँ बीज समस्त णमोकार मंत्र से उत्पन्न हुआ है ।</li>
<li>ह्रीं बीज की उत्पत्ति णमोकार मंत्र के प्रथम पद णमो अरिहंताणं से हुई है ।</li>
<li>श्रीं बीज की उत्पति णमोकार मंत्र के द्वितीय पद णमो सिद्धाणं से हुई है।</li>
<li>क्षीं और क्ष्वीं की उत्पति णमोकार मंत्र प्रथम,द्वितीय और तृतीय पदों से हुई है ।</li>
<li>क्लीं बीज की उत्पति प्रथम पद में प्रतिपादित तीर्थंकरों की यक्षिणियों से हुई है।</li>
<li>ह्र्रं की उत्पति णमोकार मंत्र के प्रथम पद से हुई है ।</li>
<li>द्रां द्रीं की उत्पत्ति णमोकार मंत्र के चतुर्थ और पंचम पद से हुई है ।</li>
<li>ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्र: ये बीजाक्षर प्रथम पद से उत्पन्न हुई है ।</li>
<li>क्षां क्षीं क्षूं क्षें क्षैं क्षौं: बीजाक्षर प्रथम,द्वितीय ओर पंच पद पर निष्पन्न है ।</li>
</ul>
<p><span style="color: #ff6600;"><strong>णमोकार व्रत</strong></span><br />
णमोकारपैंतीसीव्रत एक वर्ष छह महीने में पुरा होता है । कुल 35 उपवास होते हैं । इस व्रत का प्रारम्भ प्रथम आषाढ शुक्ला सप्तमी से होता है,फिर श्रावण महिने की दोनों सप्तमी,भाद्रपद की दोनों सप्तमीआश्विन महीने की दोनों सप्तमी,फिर कार्तिक कृष्ण पंचमी से पौष कृष्ण पंचमी तक पाँच उपवास,फिर पौष कृष्ण चतुर्दशी से चैत कृष्ण चतुर्दशी तक सात उपवास फिर चैत्र शुक्ला चतुर्दशी से आषाढ शुक्ला चतुर्दशी तक सात उपवास फिर श्रावण कृष्ण नवमी से अगहन कृष्ण नवमी तक नौ उपवास होते हैं । यह इसी क्रम से ही होते हंै । वर्धमान पुराण में णमोकार मंत्र को 70 दिन में कर सकते हैं ऐसा विधान है अर्थात लगातार 70 दिन तक एकाशन कर के किया जा सकता है ।</p>
<p><span style="color: #ff6600;"><strong>णमोकार मंत्र का फल</strong></span><br />
<em>जे के वि गया मोक्खं गच्छांति य जे के वि कम्ममलमुक्का ।</em><br />
<em>ते सव्वं वि य जाणसु जिणणमोक्कारप्पभावेण ॥ ( तच्चवियारो)</em></p>
<p>जो कोई भी आज तक मोक्ष गये है,कर्ममल से मुक्त हुए है,वह सभी णमोकार मंत्र का प्रभाव जानो है ।</p>
<p><em>एसो मंगल-निलओ मयविलओ सयलसंघसुहजनओ ।</em><br />
<em>नवकारपरममंतो चिंति अमित्तँ सुहँ देई ॥</em><br />
<em>नवकारो अन्नो सारो मंतो न अत्थि तियलोए ।</em><br />
<em>तम्हाहु अणुदिणँ चिय,पठियव्वो परममत्तीए ॥</em><br />
<em>हरइ दुहँ कुणइ सुहँ जणइ जसँ सोसए भवसमुद्दं ।</em><br />
<em>इहलोय-परलोइय-सुहाण मूंल नमोक्कारो ॥</em></p>
<p><strong>अर्थात</strong>&#8211; यह मंत्र मंगल का आगार ,भय को दुर करनेवाला,सम्पूर्ण चतुर्विध संघ को सुख देनेवाला और चिंतनमात्र से अपरिमित शुभ फल को देनेवाला है । तीनों लोकों में णमोकार मंत्र से बढकर कुछ भी सार नहीं, इसलिए प्रतिदिन भक्ति भाव और श्रद्धापूर्वक इस मंत्र को पढना चाहिए । यह दु:खों का नाश करनेवाला,सुखों को देनेवाला,यश को उत्पन्न करने वाला और संसाररुपी समुद्र से पार करनेवाला है। इस मंत्र के समान इहलोक और परलोक में अन्य कुछ भी सुखदायक नहीं है ।</p>
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