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	<title>मंगल प्रवचन &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<title>मंगल प्रवचन &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>मंडी बड़ौत में हुए मंगल प्रवचन में जैन धर्म का संदेश : जीवन के उच्च आदर्शों और आत्म अन्वेषण पर दिया बल  </title>
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		<pubDate>Sat, 31 Jan 2026 14:23:30 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[ उत्तर प्रदेश के बागपत जिले के मंडी-बड़ौत में शुक्रवार को भावलिंगी संत द्वारा मंगल प्रवचन का आयोजन किया गया। यह कार्यक्रम जैन धर्म के उपदेशों पर आधारित था। जिसमें संतश्री ने धर्म, आत्मा, कर्म और साधना जैसे मूल विषयों पर विस्तृत रूप से प्रकाश डाला। बड़ौत से पढ़िए, सोनल जैन की यह खबर&#8230; बडौत। उत्तर [&#8230;]]]></description>
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<p><strong> उत्तर प्रदेश के बागपत जिले के मंडी-बड़ौत में शुक्रवार को भावलिंगी संत द्वारा मंगल प्रवचन का आयोजन किया गया। यह कार्यक्रम जैन धर्म के उपदेशों पर आधारित था। जिसमें संतश्री ने धर्म, आत्मा, कर्म और साधना जैसे मूल विषयों पर विस्तृत रूप से प्रकाश डाला। <span style="color: #ff0000">बड़ौत से पढ़िए, सोनल जैन की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>बडौत</strong>। उत्तर प्रदेश के बागपत जिले के मंडी-बड़ौत में शुक्रवार को भावलिंगी संत द्वारा मंगल प्रवचन का आयोजन किया गया। यह कार्यक्रम जैन धर्म के उपदेशों पर आधारित था। जिसमें संतश्री ने धर्म, आत्मा, कर्म और साधना जैसे मूल विषयों पर विस्तृत रूप से प्रकाश डाला। इस प्रकार के प्रवचन में साधारण जनता को आध्यात्मिक और नैतिक जीवन के मार्ग पर प्रेरित किया जाता है। प्राचीन भारतीय परंपरा में ऐसे प्रवचन का आयोजन लोगों को धार्मिक शिक्षाओं और जीवन मूल्यों से जोड़ने का एक महत्वपूर्ण माध्यम रहा है। इस कार्यक्रम में संतश्री के शब्दों में जीवन के उच्च आदर्शों और आत्म अन्वेषण पर बल दिया गया। उन्होंने बताया कि जैन धर्म में अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह जैसे सिद्धांतों का पालन व्यक्ति के आत्मिक विकास के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। संत ने यह भी समझाया कि ईश्वर की प्राप्ति और मोक्ष की ओर बढ़ने के लिए नियमित ध्यान, आत्मा के अहिंसा-भाव को अपनाना और समाज में सकारात्मक योगदान देना आवश्यक है। प्रवचन के दौरान संत ने श्रोताओं से आग्रह किया कि वे अपने दैनिक जीवन में संयम, करुणा और सदाचार को अपनाएं। यह प्रवचन खासकर युवा पीढ़ी को धर्म के प्रति जागरूक बनाने और समाज में शांति-सहिष्णुता का संदेश फैलाने के उद्देश्य से आयोजित किया गया था।</p>
<p><strong>प्रवचन का उद्देश्य</strong></p>
<p>जैन धर्म के मौलिक शिक्षाओं को समझाना और जीवन में धर्म का पालन करना सिखाना। इसमें अहिंसा (जीवों के प्रति दया), सत्य, संयम और आत्म-अनुशासन जैसे मूल्यों का अभ्यास जीवन को श्रेष्ठ बनाता है। ऐसे आयोजन समुदाय को जोड़ते हैं और सामाजिक सद्भाव, आत्म-विकास एवं नैतिकता को बढ़ावा देते हैं। यह मंगल प्रवचन जैन परंपरा के अन्तर्गत आने वाला एक महत्वपूर्ण साधना कार्यक्रम था, जिसमें संत के उपदेशों ने उपस्थित लोगों को धार्मिक चिंतन और आत्मिक सुधार की ओर प्रेरित किया।</p>
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		<title>हमारी कलम में इतनी ताकत नहीं जो दर्शन को लिख सके : विज्ञमति माताजी ने जिनवाणी के महत्व और प्रभाव का किया विवेचन  </title>
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		<pubDate>Sat, 27 Dec 2025 07:19:23 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आर्यिका श्री विशुद्धमति माताजी संघ सहित तलवंडी दिगंबर जैन मंदिर में विराजमान हैं। शुक्रवार की प्रातः बेला में धर्मसभा की शुरुआत समाज के श्रेष्ठीजन के साथ बाहर से पधारे हुए व्यक्तियों ने श्री जी के चित्र एवं पूर्वाचार्य के चित्रों के समक्ष दीप प्रज्वलन कर की। कोटा से पढ़िए, अभिषेक जैन लुहाड़िया की यह खबर&#8230; [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>आर्यिका श्री विशुद्धमति माताजी संघ सहित तलवंडी दिगंबर जैन मंदिर में विराजमान हैं। शुक्रवार की प्रातः बेला में धर्मसभा की शुरुआत समाज के श्रेष्ठीजन के साथ बाहर से पधारे हुए व्यक्तियों ने श्री जी के चित्र एवं पूर्वाचार्य के चित्रों के समक्ष दीप प्रज्वलन कर की। <span style="color: #ff0000">कोटा से पढ़िए, अभिषेक जैन लुहाड़िया की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>कोटा।</strong> आर्यिका श्री विशुद्धमति माताजी संघ सहित तलवंडी दिगंबर जैन मंदिर में विराजमान हैं। शुक्रवार की प्रातः बेला में धर्मसभा की शुरुआत समाज के श्रेष्ठीजन के साथ बाहर से पधारे हुए व्यक्तियों ने श्री जी के चित्र एवं पूर्वाचार्य के चित्रों के समक्ष दीप प्रज्वलन कर की। माताजी के कर कमलों में शास्त्र भेंट किए गए। इस अवसर पर धर्मसभा में आर्यिका श्री विज्ञमति माताजी ने अपने मंगल प्रवचन की शुरुआत जिनवाणी वंदना से की। माताजी ने जिनवाणी के विषय में कहा कि जिनवाणी का बहुत विस्तृत वर्णन है। हमारी और तुम्हारी कलम में इतनी ताकत नहीं है, जो जैन दर्शन को समझ सके, लिख सके। इसी के साथ उन्होंने कहा कि लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए गुरु चरणों में एवं जिनवाणी के चरणों में जाना होगा। इस चेतन आत्मा के भटकने कारण कोई और नहीं तेरी करनी का फल है, जो तुम्हें भटकाता है। यदि भटकने से बचना चाहते हैं तो कर्मों से छुटकारा पाना होगा और इसको जानना होगा। उन्होंने कहा कि जैन दर्शन कहता है कि मंत्र-तंत्र कोई कार्यकारी नहीं होते, जब आपका पुण्य होगा तभी कार्यकारी होंगे।</p>
<p><strong>जिनवाणी के प्रति श्रद्धान से ही ज्ञानावरणीय कर्म का क्षय संभव </strong></p>
<p>आर्यिका श्री ने ज्ञानावरणीय कर्म के विषय में बताया कि हमारा ज्ञान का क्षयोपशम इसीलिए नहीं हो रहा है क्योंकि, हम जिनवाणी को पढ़ते समय वाक्य को शुद्ध रूप से नहीं पढ़ते। जब तक हमारा जिनवाणी के प्रति श्रद्धान नहीं होगा। तब तक ज्ञानावरणीय कर्म का क्षय नहीं होगा। इसके बंध का कारण बताते हुए गुरु मां ने कहा कि इसका कारण है कि हम हर समय दूसरों की बुराई करते रहते हैं। दूसरे के दोषों को देखते हैं। यदि हम दूसरों के दोषों को देखते हैं तो नीच गोत्र का बंध करते हैं। उन्होंने कहा मात्र गाथाओं को रटने से ज्ञान नहीं होता उन्हें आत्मसात भी करना होगा। धर्मसभा का संचालन राजकुमार लुहाड़िया ने किया।</p>
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		<title>कलश निष्ठापन के साथ सनावद में भगवान महावीर स्वामी का 2552वां निर्वाणोत्सव मनाया : चतुर्मासरत युगल मुनिराज के सान्निध्य में पंचामृत अभिषेक एवं निर्वाण लड्डू अर्पित </title>
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		<pubDate>Wed, 22 Oct 2025 05:04:32 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[सनावद में चतुर्मासरत मुनि श्री विश्वसूर्य सागर जी महाराज के सान्निध्य एवं मंगल कलश निष्ठापन के साथ भगवान महावीर स्वामी का 2552वां निर्वाणोत्सव भक्ति और वैराग्य संदेश के साथ मनाया गया। पढ़िए पूरी रिपोर्ट… सनावद। भगवान महावीर स्वामी के 2552वें निर्वाणोत्सव का आयोजन सनावद दिगंबर जैन समाज द्वारा अत्यंत श्रद्धा और आध्यात्मिक वातावरण में संपन्न [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>सनावद में चतुर्मासरत मुनि श्री विश्वसूर्य सागर जी महाराज के सान्निध्य एवं मंगल कलश निष्ठापन के साथ भगवान महावीर स्वामी का 2552वां निर्वाणोत्सव भक्ति और वैराग्य संदेश के साथ मनाया गया। <span style="color: #ff0000">पढ़िए पूरी रिपोर्ट…</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>सनावद।</strong> भगवान महावीर स्वामी के 2552वें निर्वाणोत्सव का आयोजन सनावद दिगंबर जैन समाज द्वारा अत्यंत श्रद्धा और आध्यात्मिक वातावरण में संपन्न हुआ। मुनि श्री साध्य सागर जी महाराज ने अपने प्रेरक उद्बोधन में कहा कि जैन धर्म धन, यश एवं वैभव लक्ष्मी के स्थान पर वैराग्य लक्ष्मी को प्राप्त करने की प्रेरणा देता है।</p>
<p>इस अवसर पर चतुर्मासरत युगल मुनिराज मुनि श्री विश्वसूर्य सागर जी महाराज ने मंगल कलश निष्ठापन क्रिया संपन्न कर बताया कि कार्तिक कृष्ण अमावस्या के दिन भगवान महावीर को मोक्ष की प्राप्ति हुई थी तथा उसी रात्रि को भगवान गौतम स्वामी को कैवल्यज्ञान प्राप्त हुआ था। देवों ने गंधकुटी की रचना कर दीपों की सजावट से इस दिव्य महोत्सव को दीपोत्सव के रूप में मनाया था।</p>
<p>प्रातः काल दिगंबर जैन बड़ा मंदिर में पंचामृत अभिषेक एवं शांतिधारा के बाद भक्ति भाव से निर्वाण लड्डू अर्पित किए गए। निर्वाण लड्डू समर्पण का सौभाग्य नंदलाल नीरज कुमार जैनी परिवार को प्राप्त हुआ जबकि सुपार्श्वनाथ मंदिर, श्री खंडेलवाल आदिनाथ छोटा जैन मंदिर, श्रीमंदर जिनालय, महावीर जिनालय सहित पोदनपुर, णमोकार धाम, मोरतक्का एवं सिद्धवरकूट जी सहित अन्य तीर्थों में भी विधिवत अर्पण किया गया।</p>
<p><strong><img fetchpriority="high" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-92770" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/10/IMG-20251022-WA0006.jpg" alt="" width="1600" height="720" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/10/IMG-20251022-WA0006.jpg 1600w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/10/IMG-20251022-WA0006-300x135.jpg 300w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/10/IMG-20251022-WA0006-1024x461.jpg 1024w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/10/IMG-20251022-WA0006-768x346.jpg 768w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/10/IMG-20251022-WA0006-1536x691.jpg 1536w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/10/IMG-20251022-WA0006-990x446.jpg 990w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/10/IMG-20251022-WA0006-1320x594.jpg 1320w" sizes="(max-width: 1600px) 100vw, 1600px" />प्रत्येक वर्ष दीपकों की मालिका सजाई </strong></p>
<p>भगवान महावीर के ‘जियो और जीने दो’ के सार्वभौमिक संदेश को जन-जन तक पहुंचाने एवं अहिंसा का दीप प्रज्वलित करने हेतु प्रत्येक वर्ष दीपकों की मालिका सजाई जाती है और निर्वाण लड्डू का नैवेद्य अर्पित किया जाता है।</p>
<p>इस पावन अवसर पर समाजजन एक-दूसरे को गले मिलकर शुभकामनाएं देते हुए आध्यात्मिक उल्लास से सराबोर नजर आए। आयोजकों ने सभी आगंतुकों एवं श्रद्धालुओं के प्रति आभार व्यक्त किया।</p>
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		<title>सम्यक ज्ञान है द्रव्य जैसा है उसे वैसा ही समझें : आचार्य श्री विनिश्चयसागर जी के सानिध्य में दो दिवसीय विद्वत संगोष्ठी जारी </title>
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		<pubDate>Wed, 01 Oct 2025 16:19:20 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आचार्य श्री विनिश्चय सागर जी के सानिध्य में दो दिवसीय विद्वत संगोष्ठी हो रही है। इसमें देशभर के विद्वत भाग लेंगे। यह संगोष्ठी 1 और 2 अक्टूबर को होगी। मंगलवार की बेला में आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज ने मंगल प्रवचन देते हुए कहा कि ज्ञान संसार में जितने जीव है सबके पास है। रामगंजमंडी [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>आचार्य श्री विनिश्चय सागर जी के सानिध्य में दो दिवसीय विद्वत संगोष्ठी हो रही है। इसमें देशभर के विद्वत भाग लेंगे। यह संगोष्ठी 1 और 2 अक्टूबर को होगी। मंगलवार की बेला में आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज ने मंगल प्रवचन देते हुए कहा कि ज्ञान संसार में जितने जीव है सबके पास है। <span style="color: #ff0000">रामगंजमंडी से पढ़िए, अभिषेक जैन लुहाड़िया की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>रामगंजमंडी।</strong> आचार्य श्री विनिश्चय सागर जी के सानिध्य में दो दिवसीय विद्वत संगोष्ठी हो रही है। इसमें देशभर के विद्वत भाग लेंगे। यह संगोष्ठी 1 और 2 अक्टूबर को होगी। मंगलवार की बेला में आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज ने मंगल प्रवचन देते हुए कहा कि ज्ञान संसार में जितने जीव है सबके पास है ज्ञान सबके काम आता है। जानना दो ही चीजे हैं या तो हम अपने आप को जाने या दूसरे को जाने। हम अपने आपको तो नहीं जानते लेकिन, हम दूसरे को जानते हैं। हम दूसरों को जानने का प्रयास करते हैं और अपने आप को नहीं जानते।</p>
<p>उन्होंने कहा कि यदि हमें स्वयं को जानना है तो ज्ञान को सम्यक बनाना पड़ता है। इसका मतलब है कि सत्य जिसको जैसा देखे उसको वैसा ही समझें। सम्यक ज्ञान है द्रव्य जैसा है। उसे वैसा ही समझें। वह सत्य है सम्यक ज्ञान है। यदि इसके विपरीत है तब वह मिथ्या ज्ञान है। यदि अंदर से भाव आता है कि हम अपने आप को जाने तो समझ लेना सम्यक ज्ञान है। ज्ञान सम्यकज्ञान मोक्ष मार्ग में बहुउपयोगी है।</p>
<p><strong>ज्ञान ही हमें जाग्रत करता है</strong></p>
<p>आचार्य श्री ने कहा कि ज्ञान को जाग्रत करो। सम्यक ज्ञान परिश्रम मांगता है। ज्ञान ही हमें जाग्रत करता है जिनवाणी का मतलब है यह सीधे हमें गोद में बिठाकर सिद्धालय में ले जाती है। जिनवाणी में विशेषता है कि यह जीव को संसार से निकलकर अध्यात्म और मोक्ष में प्रवेश कराती है। ज्ञान के बिना कुछ नहीं वह भी सम्यकज्ञान यह ज्ञान ही मोक्ष मार्ग प्रशस्त करता है और कोई नहीं।</p>
<p><strong>सम्यकज्ञान होगा तो सद्गति होगी</strong></p>
<p>सम्यकज्ञान स्पष्ट बताता है कि क्या सत्य है क्या असत्य है क्या स्वीकार करना है क्या नहीं। अंत समय ज्ञान ही काम आएगा सोच पाओगे नहीं पाओगे, यदि सम्यकज्ञान होगा तो सद्गति होगी मिथ्या ज्ञान होगा तो दुर्गति होगी। स्वाध्याय ही हमें जागृत करता है शास्त्र ही निमित्त हैं और इन्हीं से ज्ञान को जाग्रत करो।</p>
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		<title>अनंत चतुर्दशी पर होगा लघु सिद्ध चक्र महामंडल विधान और भव्य शोभायात्रा: आचार्य श्री विनिश्चय सागर जी ने प्रवचन में समझाया आकिंचन धर्म का महत्व </title>
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		<pubDate>Sat, 06 Sep 2025 05:17:49 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[रामगंजमंडी में अनंत चतुर्दशी के अवसर पर दशलक्षण महापर्व का समापन भव्य शोभायात्रा, लघु सिद्ध चक्र महामंडल विधान, अभिषेक और प्रवचनों के साथ होगा। आचार्य श्री विनिश्चय सागर जी ने अपने उपदेश में आकिंचन धर्म की गहराई को समझाते हुए अनासक्त भाव की महत्ता बताई। पढ़िए अभिषेक जैन लुहाड़िया की ख़ास रिपोर्ट… रामगंजमंडी में इस [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>रामगंजमंडी में अनंत चतुर्दशी के अवसर पर दशलक्षण महापर्व का समापन भव्य शोभायात्रा, लघु सिद्ध चक्र महामंडल विधान, अभिषेक और प्रवचनों के साथ होगा। आचार्य श्री विनिश्चय सागर जी ने अपने उपदेश में आकिंचन धर्म की गहराई को समझाते हुए अनासक्त भाव की महत्ता बताई। <span style="color: #ff0000">पढ़िए अभिषेक जैन लुहाड़िया की ख़ास रिपोर्ट…</span></strong></p>
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<p>रामगंजमंडी में इस वर्ष अनंत चतुर्दशी का पर्व विशेष धार्मिक उल्लास और भक्ति भावना के साथ मनाया जाएगा। दस लक्षण महापर्व का यह अंतिम दिन अनेक धार्मिक आयोजनों का साक्षी बनेगा। कार्यक्रम का शुभारंभ श्रीजी के अभिषेक और शांति धारा से होगा। आचार्य श्री 108 विनिश्चय सागर जी महाराज के सानिध्य में प्रवचन भवन में मंगल प्रवचन होंगे, जिसमें गुरुदेव उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म पर प्रकाश डालेंगे।</p>
<p>प्रवचन उपरांत तीन घंटे का लघु सिद्ध चक्र महामंडल विधान संपन्न होगा। विधान की तैयारियां समाज द्वारा पूर्ण कर ली गई हैं। दोपहर की बेला में नगर में भव्य शोभायात्रा निकाली जाएगी जो विभिन्न मार्गों से होकर पुनः मंदिर प्रांगण में पहुंचेगी। संध्या बेला में प्रतिक्रमण और रात्रि प्रवचन के साथ महापर्व का समापन होगा।</p>
<p>समाज के संरक्षक अजीत सेठी, अध्यक्ष दिलीप विनायका, उपाध्यक्ष चेतन बागड़िया एवं कमल लुहाड़िया, महामंत्री राजकुमार गंगवाल तथा मंत्री राजीव बाकलीवाल ने संयुक्त रूप से जानकारी दी कि अनंत चतुर्दशी के अगले दिन 7 सितंबर को तपस्वियों का पारणा आचार्य श्री के सानिध्य में श्री शांतिनाथ दिगंबर जैन धर्मशाला में भव्यता के साथ सम्पन्न होगा।</p>
<p><strong>आकिंचन तक की यात्रा आत्मा को निर्मल और स्वच्छ बनाती</strong></p>
<p>नवम दिवस पर आचार्य श्री विनिश्चय सागर जी ने उत्तम आकिंचन धर्म पर प्रकाश डालते हुए कहा कि जब व्यक्ति के जीवन में अनासक्त भाव होता है तभी वह आकिंचन को प्राप्त करता है। उन्होंने समझाया कि देह और संसार का कोई भी पदार्थ अपना नहीं है। पर्यूषण पर्व आत्मा की सफाई का अभियान है—क्षमा से प्रारंभ होकर आकिंचन तक की यात्रा आत्मा को निर्मल और स्वच्छ बनाती है। गुरुदेव ने कहा कि जैसे कोरोना महामारी में मृत्यु के आंकड़े सुनने के बावजूद वैराग्य जागृत नहीं हुआ, उसी प्रकार जब तक त्याग अनासक्त भाव से नहीं होता, तब तक आकिंचन धर्म की प्राप्ति संभव नहीं है। वस्तु या देह के प्रति मोह जब तक मन और शरीर से पूरी तरह समाप्त नहीं होता, तब तक आकिंचन धर्म आत्मा में प्रवेश नहीं करता।</p>
<p>उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि बनारस, गया और प्रयागराज के घाटों पर मृतकों का अंतिम संस्कार देखना ही सिखा देता है कि इस संसार में किसी भी वस्तु पर अधिकार नहीं है। यही भाव आकिंचन धर्म की आत्मा है।</p>
<p><strong>भक्ति और उत्सव का माहौल</strong></p>
<p>अभिषेक और शांति धारा के दौरान भक्तजन भक्ति नृत्य और स्तुति गीतों में भाव-विभोर दिखाई दिए। आचार्य श्री की आरती और इंद्रध्वज मंडल के आयोजन ने वातावरण को और भी दिव्य बना दिया। रात्रि को सभी तपस्वियों की अनुमोदना के साथ समाजजन ने भक्ति का कार्यक्रम आयोजित किया।</p>
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		<title>स्वतंत्रता का अर्थ स्वतंत्र होना है स्वच्छंद होना नहीं : आचार्य श्री विनिश्चय सागर जी ने पापकारी बताकर बचने की दी सलाह </title>
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		<pubDate>Fri, 15 Aug 2025 14:21:00 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज ने मंगल प्रवचन देते हुए कहा कि आज पूरा देश आजादी मना रहा है। आश्चर्य इस बात का है कि आजादी मनाने वाले आजादी का अर्थ नहीं जानते। रामगंजमंडी से पढ़िए, अभिषेक जैन लुहाड़िया की यह खबर&#8230; रामगंजमंडी। आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज ने मंगल प्रवचन देते हुए कहा कि [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज ने मंगल प्रवचन देते हुए कहा कि आज पूरा देश आजादी मना रहा है। आश्चर्य इस बात का है कि आजादी मनाने वाले आजादी का अर्थ नहीं जानते। <span style="color: #ff0000">रामगंजमंडी से पढ़िए, अभिषेक जैन लुहाड़िया की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong>रामगंजमंडी।</strong> आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज ने मंगल प्रवचन देते हुए कहा कि आज पूरा देश आजादी मना रहा है। आश्चर्य इस बात का है कि आजादी मनाने वाले आजादी का अर्थ नहीं जानते। स्वतंत्र होना अच्छी बात है। उन्होंने कहा-जब हम लोगों के संघ बने गुरु जी ने एक बात कही- हम तुम्हें स्वतंत्र कर रहे हैं स्वच्छंद नहीं कर रहे। उनका कहने का अभिप्राय था कि अब तक तुम संघ में रहते थे, हमारे अंडर में रहते थे। संघ के अनुशासन में रहते थे। अब आपको बाहर जाना है, मैं नहीं रहूंगा। गुरुजी स्वतंत्र तो कर रहे हैं, लेकिन स्वछंद नहीं कर रहे।</p>
<p>आचार्य श्री ने कहा कि किसी भी आजादी का अर्थ स्वच्छंदता नहीं है। श्रावक चर्या मुनि चर्या का संविधान है। इस भारत में रहने वाले नागरिकों का भी संविधान है। आजादी का मतलब होता है एक कायदे कानून एक नियमों में जीवन व्यतीत करना। जहां पर ऐसा नहीं होता वहां पर स्वच्छंदता आ जाती है। स्वच्छंदता सबसे पहले पाप कराती हैं। जिस पर किसी का कंट्रोल नहीं है। ऐसे व्यक्ति को हम देखते है। वह दिन-रात पाप में ही डूबा रहेगा। यदि कंट्रोल है तो दिन रात पाप में नहीं डूब सकता। यदि हम धार्मिक तरीके से आजादी को देखें तो दो धर्मों का प्रतिपादन हुआ, एक मुनि और एक श्रावक और दोनों के कायदे कानून बनाए गए दोनों के कायदे कानून ऐसे बनाए गए कि दोनों पालन कर सकें।</p>
<p><strong>स्वतंत्रता का आनंद संयम साधना में </strong></p>
<p>आचार्य श्री ने स्वतंत्रता के विषय में प्रकाश डालते हुए कहा कि स्वतंत्रता का आनंद स्वच्छंदता में नहीं संयम साधना में है। स्वतंत्रता यह कहती है कि अपने धर्म के अनुसार अपने गुणों के अनुसार जीवन को व्यतीत करे लेकिन, हम ऐसा नहीं करते। उन्होंने कटाक्ष करते हुए कहा कि ऐसी स्वतंत्रता से क्या लाभ जो हमें गर्त में ले जाए। स्वतंत्रता ऐसी होनी चाहिए जो हमारा उत्थान करें, हमें इतने उत्थान पर ले जाए कि हम भी ना सोच पाए। स्वतंत्र भारत के स्वतंत्र नागरिक हैं स्वतंत्र हैं स्वच्छंद नहीं है। आप संविधान के विरुद्ध कुछ काम नहीं कर सकते। यदि स्वच्छंदता की कोशिश कर रहे तो आप पर कैस चलेगा और आपको सजा और जेल हो सकती है।</p>
<p><strong>नर्क में भूखा प्यास रहना पड़ता है</strong></p>
<p>यदि इसे धर्म दृष्टि से देखें श्रावक धर्म के हिसाब से देखे यदि अपने धर्म का संविधान तोड़ा तो वह धर्म के विरुद्ध होगा, स्वच्छंद होगा और आपको नरक निगोद जाना पड़ेगा। यहां जेल जाना पड़ता है, वहां नरक जाना पड़ता है। यहां जेल में भूखा प्यास रहना पड़ता है वहां नर्क में भूखा प्यास रहना पड़ता है।</p>
<p><strong> किसी भी बच्चे ने पुण्य करने की आजादी नहीं मांगी होगी</strong></p>
<p>बच्चे बड़े हो गए कहते हैं कि हमें आजादी चाहिए उन्हें पाप करने की आजादी चाहिए। आज तक किसी के भी बच्चे ने पुण्य करने की आजादी नहीं मांगी होगी लेकिन, पाप करने के लिए पाप कार्यों के लिए आजादी मांगी होगी। सब स्वच्छंद होना चाहते हैं। स्वच्छंद होने में हानि बहुत होती है।</p>
<p><strong>सबसे बड़ी परतंत्रता पांच इंद्रियों के वशीभूत होना </strong></p>
<p>आचार्य श्री ने परतंत्रता के विषय में कहा कि सबसे बड़ी परतंत्रता पांच इंद्रियों के वशीभूत होना है। जीव को इंद्रिया ही नचा रही है। व्यक्ति इंद्रियों से आकर्षित होता है यही परतंत्रता है। पांच इंद्रियों और मन स्वच्छंद होता है। हममें इतनी ताकत ही नहीं है कि हम कंट्रोल कर सकें। कंट्रोल करने का मतलब होता है कि स्वच्छंद समाप्त कर ले। उन्होंने कहा घर की रसोई यदि सही है तो मान के चलना की 99 प्रतिशत यह बात सत्य है कि घर का प्रत्येक व्यक्ति संस्कारी है। स्वतंत्रता का अर्थ होता है इंद्रिय विषयों की पराधीनता को समाप्त करना। उन्होंने कहा हम देश की आजादी मना रहे हैं हम यह सोचे कि हम अपनी आजादी कब मनाएंगे। हमें देश के मौलिक अधिकार मिले। इस देश की नागरिकता मिली। ऐसी स्वतंत्रता कब आएगी कि हम सिद्धालय में विराजमान होंगे। ऐसी स्वतंत्रता वास्तविक स्वतंत्रता है।</p>
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		<title>महरोनी में श्रेयांसनाथ भगवान का मोक्ष कल्याणक व रक्षाबंधन महोत्सव श्रद्धा और भक्ति से संपन्न : श्री यशोदय तीर्थ क्षेत्र पर भव्य धार्मिक आयोजन में शामिल हुए सैकड़ों श्रद्धालु </title>
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		<pubDate>Sat, 09 Aug 2025 13:59:30 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[महरोनी के श्री यशोदय अतिशय क्षेत्र में शनिवार को 11वें तीर्थंकर भगवान श्रेयांसनाथ का मोक्ष कल्याणक एवं रक्षाबंधन महापर्व बड़े धूमधाम से मनाया गया। मुनि श्री 108 गुरूदत्त सागर जी और मुनि श्री 108 मेघदत्त सागर जी के सान्निध्य में हुए इस आयोजन में भक्तों ने अभिषेक, पूजन, विधान और मंगल प्रवचन का लाभ लिया। [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>महरोनी के श्री यशोदय अतिशय क्षेत्र में शनिवार को 11वें तीर्थंकर भगवान श्रेयांसनाथ का मोक्ष कल्याणक एवं रक्षाबंधन महापर्व बड़े धूमधाम से मनाया गया। मुनि श्री 108 गुरूदत्त सागर जी और मुनि श्री 108 मेघदत्त सागर जी के सान्निध्य में हुए इस आयोजन में भक्तों ने अभिषेक, पूजन, विधान और मंगल प्रवचन का लाभ लिया। <span style="color: #ff0000">पढ़िए राजीव सिंघई की पूरी रिपोर्ट…</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>महरोनी।</strong> जगतपूज्य निर्यापक संत सुधा सागर महाराज द्वारा सृजित श्री यशोदय अतिशय क्षेत्र महरोनी में शनिवार को 11वें तीर्थंकर भगवान श्रेयांसनाथ स्वामी का मोक्ष कल्याणक एवं रक्षाबंधन महापर्व हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। इस अवसर पर श्रद्धालुओं ने आचार्यश्री निर्भर सागर जी महाराज के मंगल आशीर्वाद से आयोजित धार्मिक कार्यक्रमों में भाग लेकर पुण्य लाभ अर्जित किया। प्रातः भगवान जिनेन्द्र का अभिषेक एवं श्री पूजा विधान से कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ। इसके बाद मंगलाष्टक व मंगलाचरण के साथ मुनि श्री 108 गुरूदत्त सागर जी महाराज एवं मुनि श्री 108 मेघदत्त सागर जी महाराज के सान्निध्य में धर्मसभा का आयोजन किया गया। प्रवचनों में मुनि श्री ने रक्षाबंधन के वास्तविक आध्यात्मिक स्वरूप पर प्रकाश डालते हुए साधर्मी की रक्षा, आत्मा की सुरक्षा और संयम के महत्व पर बल दिया।</p>
<p>इसके पश्चात श्रद्धालुओं ने विधान, पूजन, मंगल प्रवचन और मुनिसंघ के आशीर्वचन का लाभ लिया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे। आयोजन की व्यवस्था में श्री यशोदय तीर्थ क्षेत्र समिति एवं सकल दिगंबर जैन समाज महरोनी का विशेष योगदान रहा। पं. सनिल जैन के मधुरमय भजनों ने वातावरण को भक्तिमय बना दिया।</p>
<p><strong>कार्यक्रम में यह रहे उपस्थित </strong></p>
<p>इस मौके पर कोमल सिंघई, चक्रेश चौधरी, प्रशांत सिंघई, राजा चौधरी, मुकेश सराफ, आमोद चौधरी, अनिल मिठया, राजू मलैया, ऋषभ सिंघई, पवन मोदी, डॉ. विक्रम जैन, धीरेंद्र सिंघई, जिनेश्वर बुखारिया, महेंद्र खजुरिया, अरविंद बुदनया, संजू बजाज, सुनील, मुकेश जैन, अंकुश, अभिषेक सिंघई, हैप्पी, शानू कठरया, सचिन बड़कुल, प्रियंक बाजा, अंकित चौधरी, तन्मय, सामान्त, अनुभव, पंकज सिंघई, आकाश, पवन घिया सहित बड़ी संख्या में महिलाएं और पुरुष उपस्थित रहे। संचालन नितिन शास्त्री ने किया।</p>
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		<title>आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी के वचन सब कुछ करना मगर शंका मत करना : रामगंजमंडी में धर्म प्रभावना का स्तर बहुत उच्च है  </title>
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		<pubDate>Tue, 05 Aug 2025 12:18:16 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी महाराज नगर में विराजित हैं। उनका पावन वर्षायोग यहां जारी है। नगर में आचायश्री की मंगल देशना से कई दिगंबर जैन समाज के परिवार पुण्यार्जन कर रहे हैं। धर्म प्रभावना का स्तर बहुत उच्च है। लोगों को धर्म, शास्त्र आदि का ज्ञान मिल रहा है। सोमवार को आचार्यश्री ने मंगल प्रवचन [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी महाराज नगर में विराजित हैं। उनका पावन वर्षायोग यहां जारी है। नगर में आचायश्री की मंगल देशना से कई दिगंबर जैन समाज के परिवार पुण्यार्जन कर रहे हैं। धर्म प्रभावना का स्तर बहुत उच्च है। लोगों को धर्म, शास्त्र आदि का ज्ञान मिल रहा है। सोमवार को आचार्यश्री ने मंगल प्रवचन देते हुए कहा की सब कुछ कर लेना मगर शंका मत करना। किसी के प्रति शंका है तो कह दो तुरंत स्पष्ट बात कर लो। <span style="color: #ff0000">रामगंजमंडी से पढ़िए, अभिषेक जैन लुहाड़िया की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>रामगंजमंडी।</strong> आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी महाराज नगर में विराजित हैं। उनका पावन वर्षायोग यहां जारी है। नगर में आचायश्री की मंगल देशना से कई दिगंबर जैन समाज के परिवार पुण्यार्जन कर रहे हैं। धर्म प्रभावना का स्तर बहुत उच्च है। लोगों को धर्म, शास्त्र आदि का ज्ञान मिल रहा है। सोमवार को आचार्यश्री ने मंगल प्रवचन देते हुए कहा की सब कुछ कर लेना मगर शंका मत करना। किसी के प्रति शंका है तो कह दो तुरंत स्पष्ट बात कर लो। मुझे ऐसा लग रहा आप ऐसे हैं यदि वो कह दे मैं ऐसा नहीं हूं तो मान लो क्यों अपना दिमाग खराब करते हो। हम स्वीकार नहीं कर पाते, कहते है कि तुम झूठ बोल रहे हो। दिमाग में फितूर आ जाता है कि व्यक्ति झूठ बोल रहा है। ऐसा करते-करते कई परिवार बिगड़ते चले गए बिगड़ते चले गए और आश्चर्य तब होने लगता है 18 वर्ष के बच्चे हमारे पास आकर कहते हैं कि महाराज श्री पापा मम्मी को समझाओ कि वह शंका न करें। कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा यह कोई अच्छी बात नहीं।</p>
<p>18 साल का बच्चा जिसकी शादी की आप तैयारी कर रहे हैं 25 साल का बच्चा जिसका आप बायोडाटा निकाल रहे हैं। उसके सामने दोनों लड़ रहे हैं यह केवल इसलिए हो रहा है क्योंकि, आपस में दोनों में विश्वास नहीं है। जब बच्चा झूले में झूल रहा था तब तक लड़ाई ठीक है। अब बच्चा झूले में नहीं है अब बच्चा सब समझता है। कम से कम इतनी मर्यादा तो बना लो अपने बच्चों के सामने मत लड़ो। अगर मां बाप आपस में लड़ेंगे तो बच्चे भी शादी होने के बाद आपस में लड़ेंगे। उन्होंने कहा कि आप गृहस्थ जीवन में हो तो उसका भी आनंद उठाओ ऐसा नहीं है कि गृहस्थ जीवन में आनंद नहीं है। गृहस्थ जीवन बड़ा विचित्र है व्यक्ति अर्थ ,सामाजिकता का अभाव होने पर भी आनंद उठा लेता है। हमारी आस्था क्या है हमारी कल्पना क्या है उसी हिसाब से सुकून मिलता है जिंदगी की कीमत होती है मुर्दे की नहीं।</p>
<p>इंसान के पास सब कुछ है लेकिन सुकुन नहीं है। सब कुछ तुम्हारे पास है लेकिन सुकुन तुम्हे अपने पुरुषार्थ से ही पाना होगा। अगर तुम्हारा पुरुषार्थ सही जगह होगा तो सुकुन अनुभव जरूर होगा। घर मकान एवम घर में साम्रगी सबके पास भरपूर है लेकिन सुकुन नहीं है। अच्छा खाना अच्छा भोजन अच्छा आवास होने के बावजूद आपके पास सुकुन नहीं हैं तो आपसे गया बीता कोन है। यह आपकी कमी है। अमृत जिव्हा पर है फ़िर भी आप स्वाद नहीं ले पा रहे हैं। लेकिन हम एहसास नहीं करते अगर एहसास करें तो सुकुन जरूर मिलेगा। विकल्पों में साधनों की असंतुष्टि में जिओगे तो सुकुन कभी मिलने वाला नहीं है।</p>
<p><strong>संसारी जीव की समस्या का समाधान उसी के पास </strong></p>
<p>आचार्य श्री ने कहा सारे जीवन में असंख्यात समस्या आने वाली है जिसके पास पहुंचेंगे। किस किस का समाधान किस-किस के पास जाकर खोजोगे। जिसके पास भी जाओगे क्या वह तुम्हारी समस्या का समाधान कर देगा नहीं कर सकता। आचार्य श्री ने हिरण का उदाहरण देते हुए कहा कि हिरण की नाभि में कस्तूरी होती है लेकिन वह रेगिस्तान में जंगल में खोजती है कि सुगंध कहां से आ रही है इधर-उधर ढूंढती है थक जाती है, और हार कर प्राण खो देती है। इतनी सी बात समझ नहीं पाती कि यह सुगंध मेरी नाभि में से आ रही है। यही बात संसारी जीव को भी समझ में नहीं आ रही है कि मेरी समस्या का समाधान मैं ही हूं। कोई दूसरा नहीं है। न कोई संत, न कोई महंत न कोई देवता, न कोई तंत्र, न कोई मंत्र सिर्फ मात्र जीव अपनी समस्या का समाधान कर सकता है।</p>
<p>या तो वो कर्म निर्जरा करके कर सकता है या फिर शुभ कर्मों को उदय में लाकर कर सकता है या फिर पाप कर्मों को पुण्य के संक्रमण में लाकर कर सकता है किसी के भी सामने झोली फैला ली। इससे कुछ नहीं होगा और कर्म बंधते जाएंगे। समस्या का अंबार लगा देगे लेकिन, उस मृग के समान समाधान हमारे पास होते हुए भी हम समाधान को बाहर खोज रहे हैं। अपने भावों को शुद्ध बनाएंगे विशुद्धि को बढ़ाएंगे पुण्य होगा सब काम अपने आप होंगे।</p>
<p><strong> सभी के प्रति समान दृष्टि रखना अनुकंपा है</strong></p>
<p>आचार्य श्री ने अनुकंपा के विषय पर भी प्रकाश डाला और कहा कि सब जीवो पर समान दृष्टि रखना परिवार का सदस्य हो पड़ोसी हो देश-विदेश में हो सब पर समान दृष्टि रखना कोई भेद नहीं होना अपना पराया नहीं होता। इसे अनुकंपा कहा जाता है। अनुकंपा स्वार्थ अनुकंपा नहीं होना चाहिए। जहां हमें आवश्यक है वहां अनुकंपा दिखाएं जहां नहीं हैं वहां नहीं दिखाएं। समान रूप से अनुकंपा होनी चाहिए। हमारे द्वारा किसी जीव को कष्ट पीड़ा ना हो यह भाव होना चाहिए। अपने आप पर भी और दूसरे पर भी अनुकंपा करें। उन्होंने कहा जहां पर भाव होता है वहीं सच्ची आस्था होती है। जहां पर भाव नहीं होता वहां आस्था नहीं होती। भाव की जरूरत है, भाव होगा तो आस्तिक गुण प्रकट होगा जैसा विश्वास बाहर की चीजों पर है वैसा विश्वास देव शास्त्र गुरु पर करें।</p>
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		<title>सत्य की पहचान के लिए जिनेंद्र भगवान का आलंबन जरूरी: आचार्य श्री विनिश्चय सागर जी ने सत्य को सर्वव्यापक बताया </title>
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		<pubDate>Sat, 02 Aug 2025 11:39:22 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी महाराज ने मंगल प्रवचन देते हुए सत्य के विषय में प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि हमें सत्य को जानना चाहिए। असत्य में केवल भ्रांति ही होगी और भ्रांति से कोई उपलब्धि नहीं होगी। रामगंजमंडी से पढ़िए, अभिषेक जैन लुहाड़िया की यह खबर&#8230; रामगंजमंडी। आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी महाराज ने मंगल प्रवचन [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी महाराज ने मंगल प्रवचन देते हुए सत्य के विषय में प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि हमें सत्य को जानना चाहिए। असत्य में केवल भ्रांति ही होगी और भ्रांति से कोई उपलब्धि नहीं होगी। <span style="color: #ff0000">रामगंजमंडी से पढ़िए, अभिषेक जैन लुहाड़िया की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>रामगंजमंडी।</strong> आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी महाराज ने मंगल प्रवचन देते हुए सत्य के विषय में प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि हमें सत्य को जानना चाहिए। असत्य में केवल भ्रांति ही होगी और भ्रांति से कोई उपलब्धि नहीं होगी। उन्होंने कहा कि हम असत्य का समर्थन सबसे ज्यादा करते हैं। सत्य की पहचान भ्रांति को तोड़ने वाली होती है। सत्य की पहचान करने के लिए लौकिक व्यक्ति नहीं आध्यात्मिक व्यक्ति होना चाहिए। सत्य की पहचान जीवन में करना है तो जिनेंद्र भगवान का आलंबन लेना होगा। उन्होंने कहा कि इस भव का श्रृंगार सजावट सत्य पर होगा। यदि सत्य का श्रद्धान हो जाए तो हम सत्य की सार्थकता को सिद्ध कर सकते हैं। हमें भ्रांतियां को मानने की आदत हो गई है।</p>
<p>शरीर शरीर है आत्मा आत्मा है, यह आस्था पूर्वक निर्णय होता है तो सत्य का समर्थन होता है। जिस व्यक्ति का सत्य पर श्रद्धान होगा। वह व्यर्थ में आंसू नहीं बहाएगा। परिवार में मृत्यु दुख आदि में, क्योंकि वह द्रव्य और पर्याय को जानता है द्रव्य नित्य है और पर्याय अनित्य है क्योंकि, आना संयोग है और जाना वियोग है तो फिर रोने की जरूरत क्या है।</p>
<p><strong>क्रिया से आज तक कोई धर्मात्मा नहीं हुआ </strong></p>
<p>आचार्य श्री ने कहा सुनने की शक्ति धर्मात्मा में होती है। यदि सुनने की शक्ति है तो वह धर्मात्मा है यदि सुनने की शक्ति नहीं है तो वह धर्मात्मा नहीं है। क्रिया में भाव होना चाहिए क्रिया कहीं जा रही है। भाव कही जा रहे हैं, हमें हमारे भाव एक जगह रखने की आदत नहीं बनी। जन्म जरा मृत्यु विनाशनाय बोलते हुए जल समर्पित कर रहे हैं। भाव को पकड़ कर श्रद्धा के साथ भाव लो फिर जल चढ़ाओ। ऐसा करते हैं तो आप सत्य पर श्रद्धान कर रहे है। मंदिर में पूजन करने आए प्रवचन सुनने आए उलझ कर रह जाते हैं। हम संतवाद पंथवाद में उलझ रहे हैं। क्रिया को भाव के साथ करना चाहिए। बिना विश्वास और भाव के बिना कोई भी काम करेंगे तो लाभकारी नहीं होगा। जिनेंद्र भगवान ने जो कहा है वह सत्य है यही सम्यक दर्शन है।</p>
<p><strong>बच्चों को भिखारी नहीं मालिक बनाओ </strong></p>
<p>आचार्य श्री ने कहा कि भगवान को तो मानते हैं लेकिन, उनकी कही हुई बात को मानते नहीं यदि ऐसा नहीं करते तो सम्यक दृष्टि नहीं हो। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि बच्चों को भिखारी नहीं मालिक बनाओ आस्था भक्ति से उपलब्धि होगी मानने से नहीं। हमें जिस रास्ते पर चलना है हम उसे रास्ते को भूल जाते हैं आध्यात्मिक उपलब्धि क्षणिक दुख और बाद में सुख लौकिक उपलब्धि क्षणिक सुख लेकिन, बाद में दुख देती है। विश्वास जरूरी है विश्वास के बिना कोई काम नहीं हो सकते।</p>
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		<title>आत्मविश्वास, मंत्र शक्ति और निर्मल भावों पर दिया ज्ञानवर्धक प्रवचन; निर्मल परिणाम जीवन को भी निर्मल बनाते हैं – आचार्य श्री विनिश्चय सागर जी </title>
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		<pubDate>Fri, 01 Aug 2025 17:13:21 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[रामगंजमंडी में आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज ने मंगल प्रवचन में कहा कि यदि हमारे परिणाम निर्मल होंगे तो जीवन भी निर्मल होगा। उन्होंने आत्मविश्वास, मंत्र जाप और णमोकार मंत्र की सही विधि पर गहराई से प्रकाश डाला। पढ़िए विस्तृत रिपोर्ट… रामगंजमंडी। परम पूज्य आचार्य श्री 108 विनिश्चय सागर जी महाराज ने अपने मंगल प्रवचनों [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>रामगंजमंडी में आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज ने मंगल प्रवचन में कहा कि यदि हमारे परिणाम निर्मल होंगे तो जीवन भी निर्मल होगा। उन्होंने आत्मविश्वास, मंत्र जाप और णमोकार मंत्र की सही विधि पर गहराई से प्रकाश डाला। <span style="color: #ff0000">पढ़िए विस्तृत रिपोर्ट…</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>रामगंजमंडी।</strong> परम पूज्य आचार्य श्री 108 विनिश्चय सागर जी महाराज ने अपने मंगल प्रवचनों में कहा कि यदि परिणाम निर्मल होंगे तो जीवन भी निर्मल होगा। हमारे विचारों की शुद्धता से जीवन में तनाव और अवसाद जैसे मानसिक रोग अपने आप दूर हो जाते हैं। उन्होंने कहा कि दूसरों पर विश्वास करना तो सहज है, लेकिन आत्मविश्वास ही सबसे बड़ा विश्वास है। उन्होंने मंत्र शक्ति के विषय में कहा कि मंत्र की ऊर्जा केवल तब जाग्रत होती है जब हमारे भाव निर्मल हों। दूषित परिणामों में मंत्र की शक्ति फल नहीं देती। उन्होंने कहा कि यदि मंत्र का प्रभाव पाना है तो पहले अपने भीतर के परिणामों को निर्मल करना होगा।</p>
<p>मंत्र जाप करते समय यदि भावना और चेतना शुद्ध हो तो वह मंत्र व्यक्ति को उसकी चाही हुई उपलब्धि दे सकता है।</p>
<p><strong>मंत्र केवल पढ़ना पर्याप्त नहीं है, उसे अंतर्मन से जपना चाहिए</strong></p>
<p>आचार्य श्री ने विशेष रूप से णमोकार मंत्र पर प्रकाश डाला और कहा कि इस मंत्र का सही प्रभाव पाने के लिए केवल उसे पढ़ना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसे अंतर्मन से जपना चाहिए। उन्होंने कहा कि यदि णमोकार मंत्र को निर्मल भावना से जपा जाए, तो व्यंतर और अदृश्य बाधाएं भी दूर हो जाती हैं। लेकिन इस मंत्र की सिद्धि के लिए पात्रता आवश्यक है, बिना पात्रता के लाभ नहीं होता। सभा में बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे और आचार्य श्री के प्रवचनों से प्रेरणा प्राप्त की।</p>
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