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	<title>मंगल देशना &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<title>मंगल देशना &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>मनुष्य जीवन में धार्मिक कार्य श्री जी के दर्शन से पुण्य अर्जित करें : आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने धर्मसभा में दी मंगल देशना </title>
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		<pubDate>Sun, 31 May 2026 11:14:52 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[गणिनी आर्यिका श्री सुपार्श्वमति जी की समाधि स्थली श्री चन्द्रप्रभ जिनालय में आचार्य श्री वर्धमान सागर जी चंद्रप्रभ जिनालय में 36 साधु सहित ग्रीष्मकालीन वाचना हेतु विराजित है। श्री चंद्र प्रभ जिनालय में आचार्य श्री के सानिध्य में भव्य पंचामृत अभिषेक शांतिधारा हुई। जयपुर से पढ़िए, डॉ. राजेश पंचोलिया की यह रिपोर्ट&#8230; जयपुर। गणिनी आर्यिका [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>गणिनी आर्यिका श्री सुपार्श्वमति जी की समाधि स्थली श्री चन्द्रप्रभ जिनालय में आचार्य श्री वर्धमान सागर जी चंद्रप्रभ जिनालय में 36 साधु सहित ग्रीष्मकालीन वाचना हेतु विराजित है। श्री चंद्र प्रभ जिनालय में आचार्य श्री के सानिध्य में भव्य पंचामृत अभिषेक शांतिधारा हुई। <span style="color: #ff0000">जयपुर से पढ़िए, डॉ. राजेश पंचोलिया की यह रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>जयपुर।</strong> गणिनी आर्यिका श्री सुपार्श्वमति जी की समाधि स्थली श्री चन्द्रप्रभ जिनालय में आचार्य श्री वर्धमान सागर जी चंद्रप्रभ जिनालय में 36 साधु सहित ग्रीष्मकालीन वाचना हेतु विराजित है। श्री चंद्र प्रभ जिनालय में आचार्य श्री के सानिध्य में भव्य पंचामृत अभिषेक शांतिधारा हुई। आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने बताया कि संसार की व्यवस्था कुछ विशेष द्रव्यों से चलती है। जीव,पुद्गल धर्म, अधर्म,आकाश और कालद्रव्य इनको समझे बिना संसार की व्यवस्था को ठीक से नहीं समझा जा सकता।धर्मद्रव्य किसी को चलने के लिए नहीं कहता। जैसे पानी मछली को तैरने में सहायता करता है, वैसे ही धर्मद्रव्य चलने वाले जीव और पुद्गल की सहायता करता है।अधर्मद्रव्य किसी को रोकता नहीं है। जैसे पेड़ की छाया थके हुए यात्री को बैठने में सहायता करती है, वैसे ही अधर्मद्रव्य ठहरने में सहायता करता हैं सुरेश सबलावत, भागचंद चुड़ीवाल के अनुसार आचार्य श्री ने बताया कि आकाश सबको स्थान देता है।</p>
<p>यदि आकाश न हो तो हम, पक्षी,ग्रह-नक्षत्र और अन्य पदार्थ कहीं भी नहीं रह सकते।अनंत जीवों में मनुष्य जन्म अत्यंत दुर्लभ है। इसलिए इस जीवन को केवल खाने-पीने और भोग-विलास में नहीं गंवाना चाहिए। कोई जीव बड़ा हो या छोटा लेकिन महान वह है जिसके विचार अच्छे, पवित्र और करुणामय हैं। बुरे विचार भी पाप का कारण हैं गुरुदेव ने बताया कि हमेशा शुभ और कल्याणकारी विचार रखने चाहिए।आर्तध्यान रौद्र ध्यान से बचना चाहिए इनके कारण तीर्यच ओर नर्क गति मिलती हैं बार-बार चिंता करना, दुखी रहना, मोह में डूबे रहना यह आर्तध्यान है आर्तध्यान आत्मा को कमजोर बनाता है और अशुभ कर्मों का कारण बनता है। इसलिए ध्यान सबसे बड़ा तप है ध्यान मन को शांत करता है, कर्मों की निर्जरा करता है और आत्मा को शुद्ध बनाता है। प्रतिदिन थोड़ा समय ध्यान और स्वाध्याय के लिए अवश्य निकालना चाहिए।कोई बच्चा, कोई युवा या कोई वृद्ध मृत्यु किसी भी समय आ सकती है।इसलिए धर्म और अच्छे उपवास कार्यों को कभी कल पर नहीं टालना चाहिएअच्छा काम आज से अभी से ही प्रारंभ करें दर्शन ,अभिषेक , पूजा ,स्वाध्याय मंदिर जाएँ।धर्म करें।क्योंकि आने वाला समय किसी ने नहीं देखा। धन ही जीवन का लक्ष्य नहीं होना चाहिए है बड़ा घर, बड़ी गाड़ी और अधिक धन होना अच्छी बात है लेकिन, जीवन का अंतिम लक्ष्य आत्मकल्याण और धर्म होना चाहिए।पुण्य से धर्म के अवसर मिलते हैं चौका लगाना,साधु-संतों की सेवा करना, मंदिर सेवा करना, दान देना ये सब पुण्य के उदय से ही संभव होते हैं।बच्चों को धर्म सिखाना, मंदिर ले जाना और गुरुजनों का सम्मान करना सिखाना माता-पिता का महत्वपूर्ण कर्तव्य है।</p>
<p>अपने जीवन में कम से कम एक ऐसा धर्मकार्य अवश्य करें जिससे धर्म की प्रभावना बढ़े और आत्मा को पुण्य का लाभ मिले।आज का मुख्य सूत्र शिक्षाएँ मनुष्य जन्म दुर्लभ है।अच्छे विचार रखो। चिंता छोड़ो, ध्यान करो धर्म को कल पर मत टालो। धन से अधिक महत्वपूर्ण धर्म है। परिवार में धर्म के संस्कार दो।आत्मकल्याण ही जीवन कावास्तविक लक्ष्य है।मनुष्य जन्म बड़ी कठिनाई से मिला है। इसे केवल खाने, कमाने और सोने में मत बिताओ। थोड़ा समय धर्म, ध्यान, स्वाध्याय और आत्मकल्याण के लिए भी निकालो। यही जीवन की सच्ची सफलता है।</p>
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		<title>धार्मिक शिविर से जीवन में धर्म संस्कार का होता है ज्ञान प्राप्त : सभी विषयों के सफल प्रतिभागियों के नाम की घोषणा की </title>
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		<pubDate>Sun, 31 May 2026 11:13:38 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[धर्म संवर्धन संस्कृति शिविर में सभी उम्र के भक्तों द्वारा भाग लेना धर्म के प्रति रुझान दर्शाता है।धार्मिक शिविर में धर्म का कैसे संवर्धन हो,संस्कृति और संस्कार कैसे प्राप्त हो इसका उपदेश साधु परमेष्ठि द्वारा आपको दिया गया। सभी ने धर्म की शिक्षा जीवन में ग्रहण करने की प्रेरणा प्राप्त की। यह धर्म देशना आचार्यश्री [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>धर्म संवर्धन संस्कृति शिविर में सभी उम्र के भक्तों द्वारा भाग लेना धर्म के प्रति रुझान दर्शाता है।धार्मिक शिविर में धर्म का कैसे संवर्धन हो,संस्कृति और संस्कार कैसे प्राप्त हो इसका उपदेश साधु परमेष्ठि द्वारा आपको दिया गया। सभी ने धर्म की शिक्षा जीवन में ग्रहण करने की प्रेरणा प्राप्त की। यह धर्म देशना आचार्यश्री वर्धमान सागर जी ने धर्म संवर्धन ,संस्कृति शिविर के समापन में दी। <span style="color: #ff0000">जयपुर से पढ़िए, यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>जयपुर।</strong> धर्म संवर्धन संस्कृति शिविर में सभी उम्र के भक्तों द्वारा भाग लेना धर्म के प्रति रुझान दर्शाता है।धार्मिक शिविर में धर्म का कैसे संवर्धन हो,संस्कृति और संस्कार कैसे प्राप्त हो इसका उपदेश साधु परमेष्ठि द्वारा आपको दिया गया। सभी ने धर्म की शिक्षा जीवन में ग्रहण करने की प्रेरणा प्राप्त की। यह धर्म देशना आचार्यश्री वर्धमान सागर जी ने धर्म संवर्धन ,संस्कृति शिविर के समापन में दी। उन्होंने कहा कि इसके माध्यम से श्रीजी के दर्शन, अभिषेक ,पूजन, स्वाध्याय ,तप उपवास की प्रक्रिया सरल भाषा में आपको बताई गई शिक्षा के माध्यम से आधुनिक उपकरणों से प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे थे। गणिनी आर्यिका श्री सुपार्श्व मति जी की प्रेरणा से पूर्व गृहस्थ अवस्था के परिजनों द्वारा सुंदर क्षेत्र निर्मित कराया गया है। परिजनों द्वारा आयोजित धार्मिक शिविर से सबके जीवन में उन्नति हो ऐसी मंगल भावना आशीर्वाद देते हैं। डॉ. राजेश पंचोलिया एवं सुनीता, भागचंद चूड़ीवाल के अनुसार आचार्य श्री के उपदेश के पूर्व मुनि श्री हितेंद्र सागर जी महाराज ने अपने उद्बोधन में बताया कि संघ के साधुओं द्वारा धार्मिक विषयों पर शिक्षण दिया गया। सभी विषयों के सफल प्रतिभागियों के नाम की घोषणा की। उन्हें पुण्यार्जक चुड़ीवाल परिवार द्वारा पुरस्कृत किया गया । उल्लेखनीय हैं कि जैन धर्म के शिविर में ब्राह्मण समाज के डॉ. राहुल गौर उप प्राचार्य केंद्रीय विद्यालय गुजरात ने तत्वार्थ सूत्र जैसे सार गर्भित कठिन विषय में भाग लेकर पुरस्कृत हुए।</p>
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		<title>भगवान के जन्म तप कल्याणक पर दीक्षित हुईं मनोरमा जैन: आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने पदमपुरा में दी दीक्षा </title>
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		<pubDate>Mon, 16 Feb 2026 09:41:45 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[दीक्षा का अर्थ है, इच्छाओं का दमन दीक्षा याने लंच और मंच का बदल जाना। दीक्षा मतलब ड्रेस और एड्रेस का परिवर्तन हो जाना। विचारों में क्रांति को दीक्षा कहते हैं, आमूलचूल परिवर्तन को दीक्षा कहते हैं। यह मंगल देशना पदमपुरा में दीक्षा के अवसर पर आचार्यश्री वर्धमान सागर जी ने प्रकट की। पदमपुरा से [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>दीक्षा का अर्थ है, इच्छाओं का दमन दीक्षा याने लंच और मंच का बदल जाना। दीक्षा मतलब ड्रेस और एड्रेस का परिवर्तन हो जाना। विचारों में क्रांति को दीक्षा कहते हैं, आमूलचूल परिवर्तन को दीक्षा कहते हैं। यह मंगल देशना पदमपुरा में दीक्षा के अवसर पर आचार्यश्री वर्धमान सागर जी ने प्रकट की। <span style="color: #ff0000">पदमपुरा से पढ़िए, राजेश पंचोलिया की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>पदमपुरा।</strong> दीक्षा का अर्थ है, इच्छाओं का दमन दीक्षा याने लंच और मंच का बदल जाना। दीक्षा मतलब ड्रेस और एड्रेस का परिवर्तन हो जाना। विचारों में क्रांति को दीक्षा कहते हैं, आमूलचूल परिवर्तन को दीक्षा कहते हैं। यह मंगल देशना पदमपुरा में दीक्षा के अवसर पर आचार्यश्री वर्धमान सागर जी ने प्रकट की। उन्होंने कहा कि जैनियों की दीक्षा रागद्वेष निवृत्ति के लिए होती है। दीक्षा पूर्व संस्कार को तोड़ने का नाम है। दीक्षा संसार से मुख मोड़कर अंतर्मुख दृष्टि हो जाने को कहते हैं। अलौकिकता से दूर आध्यात्मिक नगर के नजदीक रहना दीक्षा है। भगवान श्री वासु पूज्य के जन्म और तप कल्याणक दिवस पर आचार्य श्री ने दीक्षा दी। 72 वर्षीय मनोरमा जैन का मनोरथ पूरा हुआ। दीक्षा के बाद हुईं क्षुल्लिका श्री वासुपूज्य मति। प्रथमाचार्य श्री शांतिसागरजी की अक्षुण्ण मूल बाल ब्रह्मचारी पट्ट परंपरा के आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने सोमवार को अतिशय क्षेत्र पदमपुरा में मनोरमा देवी संपतलाल अजमेरा बूंदी को भी क्षुल्लिका दीक्षा प्रदान की। इनका नूतन नाम क्षुल्लिका श्री वासु पूज्यमति माताजी किया।</p>
<p><strong>दीक्षार्थी ने की आचार्य श्री से दीक्षा की याचना </strong></p>
<p>सौभाग्यशाली परिवार की महिलाओं ने चौक पूरण की क्रिया की। दीक्षार्थी ने आचार्य श्री से दीक्षा की याचना की तथा आचार्य श्री एवं समस्त साधुओं, दीदी, भैया, श्रावक-श्राविकाओं तथा समाज से क्षमायाचना की। इस बेला में आचार्य श्री संघ गणिनी आर्यिका श्रीसरस्वती मति, गणिनी आर्यिका श्री स्वस्तिभूषण माताजी सानिध्य में आचार्य श्री ने दीक्षार्थी के पंच मुष्ठी केशलोच किए तथा दीक्षा संस्कार मस्तक तथा हाथों पर किए इसके बाद आचार्य श्री ने मनोरमा का दीक्षा उपरांत नूतन नाम क्षुल्लिका श्री वासु पूज्यमति किया।</p>
<p><strong>पदमपुरा में पहली बार हुई दीक्षा </strong></p>
<p>पुण्यार्जक अजमेरा परिवार बूंदी द्वारा पिच्छी कमंडल शास्त्र एवं कपड़े भेंट किए गए। आचार्य श्री मुनि श्री हितेंद्रसागर जी एवं अन्य साधुओं ने दीक्षार्थी के केशलोचन किए। परिजनों एवं अन्य भक्त, जिन्हें केशलोच झेलने का अवसर मिला। वह अपने को पुण्यशाली मान रहे थे। इसके पूर्व आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने 42 मुनि, 45 आर्यिका, 2 ऐलक, 16 क्षुल्लक और 13 क्षुल्लिका 118 दीक्षा दी थी। यह 19 वीं दीक्षा है। प्रथमाचार्य श्री शांतिसागर जी की परंपरा में किसी भी पूर्वाचार्य ने पदमपुरा में दीक्षा नहीं दी। पदमपुरा में पहली बार आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने दीक्षा दी।</p>
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		<title>जबलपुर जैन समाज का प्रेरणादायक ऐतिहासिक निर्णय : मुनि श्री प्रमाण सागर जी ने समाज को धर्म संस्कृति सुरक्षा की सीख दी  </title>
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		<pubDate>Sat, 14 Feb 2026 10:58:47 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जबलपुर दिगंबर जैन समाज का भारत वर्षीय जैन समाज के लिए ऐतिहासिक समाजिक निर्णय धर्म संस्कृति की सुरक्षा के लिए अनेक निर्णय समाज हित में लिए गए। इंदौर से पढ़िए, यह खबर&#8230; इंदौर। जबलपुर दिगंबर जैन समाज का भारत वर्षीय जैन समाज के लिए ऐतिहासिक समाजिक निर्णय धर्म संस्कृति की सुरक्षा के लिए अनेक निर्णय [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>जबलपुर दिगंबर जैन समाज का भारत वर्षीय जैन समाज के लिए ऐतिहासिक समाजिक निर्णय धर्म संस्कृति की सुरक्षा के लिए अनेक निर्णय समाज हित में लिए गए। <span style="color: #ff0000">इंदौर से पढ़िए, यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> जबलपुर दिगंबर जैन समाज का भारत वर्षीय जैन समाज के लिए ऐतिहासिक समाजिक निर्णय धर्म संस्कृति की सुरक्षा के लिए अनेक निर्णय समाज हित में लिए गए। राजेश जैन दद्दू ने बताया कि अल्प समय के लिए संस्कार धानी में मुनि श्री प्रमाण सागर जी महाराज ने अपनी मंगल देशना में समाज को संबोधित करते हुए समाज को धर्म संस्कृति की सुरक्षा के लिए समाज जन को सीख दी और प्रतिज्ञा दिलाई। मल्टी कॉशन होटल एवं रात्रि में होने वाली शादियों में समाज सम्मिलित नहीं होगी। मुनि श्री प्रमाण सागर जी की प्रेरणा एवं सानिध्य में श्री दिगंबर जैन पंचायत सभा ने भारत वर्षीय जैन समाज के लिए प्रेरणादायक महत्वपूर्ण प्रस्ताव पारित किया।</p>
<p><strong>श्री दिगंबर जैन पंचायत सभा ने लिए यह प्रस्ताव </strong></p>
<p>जिस स्थान पर मांसाहारी एवं शाकाहारी भोजन एक ही परिसर में बनता हो एवं किचन अलग-अलग हो या बिल्डिंग अलग-अलग हो ऐसे मल्टी कॉशन होटल जैन समाज वैवाहिक पारिवारिक आयोजन नहीं करेगी। संपूर्ण वैवाहिक कार्यक्रम दिन में ही किए जाएंगे, सूर्यास्त के बाद भोज नहीं दिया जाएगा। महिला संगीत के स्थान पर भक्ति संगीत किया जाएगा या पारंपरिक गीतों का कार्यक्रम किया जाएगा। महिला संगीत के लिए कोरियोग्राफर नहीं बुलाए जाएंगे। समाज उन्ही वैवाहिक परिसरों में अपने आयोजन करेगी। जिन्हें श्री दिगंबर जैन पंचायत सभा द्वारा पूर्ण शाकाहारी का प्रमाण पत्र दिया गया हो। इसकी जानकारी विवाह स्थल वालों से अवश्य प्राप्त करें। विशेष- रात्रि शादी एवं मल्टी कॉशन वाले परिसर में होने वाली शादियों में समाज सम्मिलित नहीं होगी।</p>
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		<title>श्रावकों का जीवन मन, वचन और काय के संयम से सफल : आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने मंगल देशना में संलेखना का धार्मिक पक्ष बताया  </title>
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		<pubDate>Fri, 23 Jan 2026 14:44:40 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[अनंतानंत भव्य आत्माये इस मार्ग पर चलकर सिद्ध हुए हैं। प्रथमाचार्य श्री शांतिसागरजी ने भी समीचीन धर्म मार्ग हमें बतलाया है। 20वीं सदी में अनेक दिगंबर साधुओं ने इस मार्ग को अपना कर जीवन सफल किया है। यह मंगल देशना आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने 83 वर्षीय आर्यिका श्री शीतल मति के चारों प्रकार [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>अनंतानंत भव्य आत्माये इस मार्ग पर चलकर सिद्ध हुए हैं। प्रथमाचार्य श्री शांतिसागरजी ने भी समीचीन धर्म मार्ग हमें बतलाया है। 20वीं सदी में अनेक दिगंबर साधुओं ने इस मार्ग को अपना कर जीवन सफल किया है। यह मंगल देशना आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने 83 वर्षीय आर्यिका श्री शीतल मति के चारों प्रकार आहार का त्याग कर यम संलेखना धारण करने के अवसर पर प्रकट की। <span style="color: #ff0000">निवाई से पढ़िए, राजेश पंचोलिया की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>निवाई।</strong> केवल ज्ञान लक्ष्मी से जैन धर्म विभूषित है। जैन धर्म के अंतर्गत सर्वाेच्च सिद्ध अवस्था का मार्ग बतलाया गया है। अनंतानंत भव्य आत्माये इस मार्ग पर चलकर सिद्ध हुए हैं। प्रथमाचार्य श्री शांतिसागरजी ने भी समीचीन धर्म मार्ग हमें बतलाया है। 20वीं सदी में अनेक दिगंबर साधुओं ने इस मार्ग को अपना कर जीवन सफल किया है। यह मंगल देशना आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने 83 वर्षीय आर्यिका श्री शीतल मति के चारों प्रकार आहार का त्याग कर यम संलेखना धारण करने के अवसर पर प्रकट की। उन्होंने कहा कि संयम धारण करने से जीवन सार्थक होता है। जन्म अनेक लेते हैं किंतु, सभी संयम अपनाते नहीं हैं। जन्म के साथ मरण भी लगा हुआ है। जन्म-मरण की सार्थकता सम्यक दर्शन, ज्ञान और सम्यक चारित्र की साधना कर संलेखना से मृत्युंजय मृत्यु पर विजय पाने का पुरुषार्थ से होती हैं।</p>
<p><strong>साधु का दीक्षा दिवस ही उनका जन्म दिवस होता है</strong></p>
<p>आर्यिका श्री शीतलमति माताजी ने 54 वर्ष पूर्ण कर आर्यिका दीक्षा ली। साधु का दीक्षा दिवस ही उनका जन्म दिवस होता है। जन्म वैराग्य संयम के महान कार्यों से सफल होता है। सर्वश्रेष्ठ अवस्था सिद्ध अवस्था होती है। आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने बताया कि श्री शीतलमति जी ने अपने मन को दृढ़ करते हुए वसंत पंचमी के दीक्षा दिन पर संपूर्ण चारों प्रकार के आहार का त्याग कर यम संलेखना धारण की है। संलेखना शरीर और कषाय को क्रश करने से सफल होती है। आज श्रावकों ने गुरुजनों की पूजा की है। पूजन करने वाला भी एक दिन पूज्यता को प्राप्त होता है। इसलिए उत्साह और भक्ति से धर्म पुरुषार्थ करना चाहिए। इससे आत्मा का कल्याण होता है और अन्य को भी संयम धारण करने की प्रेरणा मिलती है।</p>
<p><strong>समाधि देखना सेवा करना तीर्थ यात्रा समान</strong></p>
<p>श्रावक का मानव जीवन मन वचन काय के संयम से सफल होता है। साधु की समाधि देखना सेवा करना तीर्थ यात्रा समान होती हैं। उत्कृष्ट समाधि होने पर क्षपक साधु अगले दो से आठ भव में निश्चित रूप से सिद्ध अवस्था को प्राप्त करते हैं। पवन बोहरा, हेमंत बाबी और सुशील ने बताया कि संत भवन में आचार्य कल्प श्री श्रुतसागर जी एवं आचार्य श्री वर्धमान सागर जी की भक्ति उत्साह और नृत्य के साथ अष्ट द्रव्यों में 36 सामग्री से की। आर्यिका श्री शीतल मति ने श्री जी, आचार्य श्री, सभी साधुओं से क्षमायाचना कर क्षमा भाव धारण किया।</p>
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		<title>भगवान को पूजना सरल है, लेकिन भगवान की मानना कठिन है : मुनि श्री प्रणुत सागर जी महाराज ने दी मंगल देशना  </title>
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		<pubDate>Tue, 30 Dec 2025 13:49:37 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[भगवान को पूजना सरल है किंतु भगवान की मानना कठिन है। यह उदगार बड़वानी नगर में विराजित विराग सागर जी महाराज के शिष्य आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी महा मुनिराज के शिष्य मुनि श्री प्रणुत सागर जी महाराज जी ने दिगंबर जैन मंदिर में धर्म सभा में व्यक्त किए। धामनोद से पढ़िए, दीपक प्रधान की [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>भगवान को पूजना सरल है किंतु भगवान की मानना कठिन है। यह उदगार बड़वानी नगर में विराजित विराग सागर जी महाराज के शिष्य आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी महा मुनिराज के शिष्य मुनि श्री प्रणुत सागर जी महाराज जी ने दिगंबर जैन मंदिर में धर्म सभा में व्यक्त किए। <span style="color: #ff0000">धामनोद से पढ़िए, दीपक प्रधान की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>धामनोद।</strong> भगवान को पूजना सरल है किंतु भगवान की मानना कठिन है। यह उदगार बड़वानी नगर में विराजित विराग सागर जी महाराज के शिष्य आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी महा मुनिराज के शिष्य मुनि श्री प्रणुत सागर जी महाराज जी ने दिगंबर जैन मंदिर में धर्म सभा में व्यक्त किए। मुनिश्री ने आगे बताया कि हम भगवान की पूजा करते हैं लेकिन, हम भगवान पर और हमारी पूजा पर भरोसा नहीं करते हैं। अगर हमने भगवान की पूजा, अर्चना पूर्ण विश्वास, विवेक, श्रद्धा के साथ की है तो हमारे जीवन में कष्ट आ ही नहीं सकता। हमे कष्ट इसलिए आते है कि हम भगवान पर विश्वास ही नहीं करते। मुनिराज ने बताया कि हमें बड़े पुण्य योग से जैन कुल मिला है जो कि बहुत दुर्लभ है हमें पंच परमेष्ठि मिले हैं। उनका सम्मान करो। यथोचित सेवा, पूजा अर्चना करो।</p>
<p>जिससे कि आप के पाप कटेंगे और पुण्य मजबूत होगा। जो कि अगले भव भवांतर तक आपके साथ जाएगा। यदि यहां भी मायाचारी की तो वो कई जन्मों तक तुम्हे तुम्हारे कर्म नहीं छोड़ेंगे। धर्म क्षेत्र में कभी मायाचारी नहीं करना चाहिए। कर्म ने तीर्थंकरों को नहीं छोड़ा भगवान महावीर के जीव को भी नर्क भोगना पड़ा था कर्मों की वजह से। आप मंदिर में आते है तो पूजा अभिषेक आदि क्रियाएं करते हैं पर भाव नहीं होते हैं केवल एक दूसरे के देखने की वजह से करते हैं जिससे आपको आपकी क्रियाओं का लाभ नहीं मिलता। आप पुण्य करने आते है और यहां भी मायाचारी से पाप कर देते हो तो आपको पुण्य नहीं मिलता और कष्ट भोगते हो।</p>
<p>आपके नगर में साधु आते हैं तो पूरे नगर के पाप कटते हैं और आपके पुण्य करने के भाव होते हैं और यदि मेहमान आते हैं तो आप से अनजाने में भी पाप हो ही जाते हैं। अतः जब भी निर्ग्रन्थ साधु संत नगर में आए तो उनकी यथा योग्य आहार,बिहार,निहार, वैया वृत्ति करके पुण्य अर्जन करना साथ ही विनय ,विवेक और विशुद्धि का भी ध्यान रखना ताकि मुनिराज की चर्यानुकूल क्रिया करे। ताकि उनकी साधना में भी कोई दिक्कत ना हो।,प्रवचन पश्चात मुनि संघ की आहार चर्या संपन्न हुई। दोपहर को सामयिक धर्म की क्लास, प्रतिक्रमण हुआ एवं शाम को धर्म आधारित आनंद यात्रा संपन्न हुई। मुनि श्री संघ की आरती संपन्न हुई।</p>
<p><strong>अहिंसा कॉन्सेप्ट जैन भजन संध्या होगी </strong></p>
<p>मुनि संघ का 31 तारीख को बावनगजा सिद्ध क्षेत्र में प्रातः मंगल प्रवेश होगा। जहां मुनि श्री प्रणुत सागर जी ससंघ के सानिध्य में और वहां पूर्व से विराजित उपाध्याय श्री विभंजन सागर जी महाराज के सानिध्य में 31 दिसंबर 2025 की विदाई की रात में और नए वर्ष के आगमन में विश्व के सबसे पहले सबसे बड़े 84 फिट ऊंची भगवान ऋषभ नाथ के चरणों में अहिंसा कॉन्सेप्ट जैन भजन संध्या का भी किया गया है। इस भजन संध्या में देश की प्रसिद्ध भजन गायिका धन्य श्री जादू बिखेरेंगी।</p>
<p>1 जनवरी को प्रातः गुरु संघ सानिध्य में तीर्थ राज की वंदना की जाएगी। साथ ही 84 फिट उत्तुंग भगवान आदिनाथ के चरणाभिषेक और वृहद शांति धारा परम पूज्य मुनि श्री प्रणुत सागर जी महाराज के मुखारविंद से की जाएगी। इस अवसर पर लगभग चार राज्यों से गुरु भक्त आएंगे और धर्म लाभ लेंगे। शाम को मुनि संघ का प्रतिक्रमण गुरु भक्ति, भक्ति से परी पूर्ण आनंद यात्रा भी आयोजित की जाएगी। साथ ही मुनि संघ की और भगवान की आरती की जाएगी। यह जानकारी मनीष जैन द्वारा प्राप्त हुई ।</p>
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		<title>पंच कल्याणक महा महोत्सव इससे होती है पुण्य की प्राप्ति : आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने बोली में मुनियों की जन्म स्थली को पुण्यधरा बताया  </title>
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		<pubDate>Sun, 23 Nov 2025 14:08:10 +0000</pubDate>
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<p><strong>पंच कल्याणक प्रतिष्ठा सामान्य कार्यक्रम नहीं होकर महा महोत्सव होता है। जिसमें नर को नारायण, पाषाण को भगवान बनाया जाता है। पंचकल्याणक कार्यक्रम से संस्कार प्राप्त होते हैं तथा सभी को पुण्य की प्राप्ति होती है। यह मंगल देशना आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज ने मुनि श्री हितेंद्र सागर जी, मुनिश्री भुवनसागर जी की जन्मस्थली बोली नगर में प्रवेश के अवसर दी। <span style="color: #ff0000">बोली से पढ़िए, राजेश पंचोलिया की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>बोली।</strong> पंच कल्याणक प्रतिष्ठा सामान्य कार्यक्रम नहीं होकर महा महोत्सव होता है। जिसमें नर को नारायण, पाषाण को भगवान बनाया जाता है। पंचकल्याणक कार्यक्रम से संस्कार प्राप्त होते हैं तथा सभी को पुण्य की प्राप्ति होती है। यह मंगल देशना आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज ने मुनि श्री हितेंद्र सागर जी, मुनिश्री भुवनसागर जी की जन्मस्थली बोली नगर में प्रवेश के अवसर दी। उन्होंने कहा कि नगर के मूल नायक सिर्फ पारसनाथ भगवान का आशीर्वाद सेवा भक्ति का फल था कि यहां के धर्मात्मा जीव को पारसनाथ भगवान के पंचकल्याणक में साधु परमेष्ठी बनने का सौभाग्य मिला। आपके नगर के सुरेश चंद शाह दीक्षा लेकर मुनि श्री भुवन सागर जी बने। इसके पूर्व इनके गृहस्थ अवस्था के पुत्र महेंद्र भी मुनि श्री हितेंद्र सागर जी होकर संघ में विद्यमान हैं।</p>
<p><strong>पंच कल्याणक प्रतिष्ठा 28 नवंबर से </strong></p>
<p>आचार्यश्री ने कहा कि 3 वर्ष पूर्व दिसंबर माह में संघ का बोली आगमन हुआ था तब अनायास संघ के मुनि श्री श्रेयस सागर जी की समाधि हुई। लोकेश गजराज टोंक के अनुसार आचार्य श्री ने आगे बताया कि 3 वर्ष पूर्व पीपल्दा के प्राचीन मंदिर की स्थिति देखकर बहुत पीड़ा हुई थी। संघ के आशीर्वाद और प्रेरणा से 3 वर्षों में नया मंदिर बनकर तैयार हो गया है। जिसकी पंच कल्याणक प्रतिष्ठा 28 नवंबर से 2 दिसंबर तक होगी। पंच कल्याणक कार्यक्रम संपूर्ण सवाई माधोपुर जिले का हैं सभी को शक्ति और भक्ति अनुसार योगदान देना चाहिए।</p>
<p><strong>मुनि श्री हितेंद्र सागर जी ने बचपन की अनेक यादें साझा की </strong></p>
<p>आचार्यश्री ने कहा कि 900 वर्ष से ज्यादा प्राचीन मंदिर का जीर्णोद्धार कर नवीन मंदिर की प्रतिष्ठा हमारे द्वारा कराई गई। अनेकों प्रतिष्ठा में यह पहली बार होगी। आचार्य श्री के प्रवचन के पूर्व मुनि श्री भुवन सागर जी एवं मुनि श्री हितेंद्र सागर जी के प्रवचन हुए। मुनि श्री हितेंद्र सागर जी ने बचपन की अनेक यादें संस्मरण को साझा कर बताया कि श्री भुवन सागर जी महाराज को वैराग्य का बीजारोपण प्रथम पट्टाचार्य श्री वीरसागर जी के दर्शन से हुआ। वह धरा पुण्यशाली होती है, जहां साधु परमेष्ठी का जन्म होता है। सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान, सम्यक चारित्र को धारण करने से मोक्ष मार्ग मिलता है।</p>
<p><strong>मंगलाचरण महिला मंडल ने किया </strong></p>
<p>समाज अध्यक्ष बाबूलाल शाह सुनीता शाह एवं महेश मित्तल ने बताया कि आचार्य श्री संघ के प्रवचन के पूर्व श्री पारसनाथ भगवान एवं आचार्य श्री शांति सागर जी तथा सभी पूर्वाचार्य के चित्र का अनावरण कर दीप प्रज्वलन का सौभाग्य बाहर से आए अतिथियों एवं मंदिर समिति ने किया। मंगलाचरण महिला मंडल द्वारा प्रस्तुत किया गया। आचार्य श्री के चरण प्रक्षालन और जिनवाणी भेंट का सौभाग्य को प्राप्त हुआ। आहार चर्या के बाद दोपहर को आचार्य श्री संघ का पीपल्दा के लिए 7 किमी मंगल विहार कर रात्रि विश्राम हंसराज मीणा के मकान के पास हुआ। 24 नवंबर को संघ की आहार चर्या यही होगी।</p>
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		<title>संयम उपकरण पिच्छी जिन मुद्रा और अहिंसा करुणा का प्रतीक: पिच्छी परिवर्तन समारोह में भक्ति का अलौकिक संगम दिखा  </title>
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		<pubDate>Mon, 03 Nov 2025 13:59:30 +0000</pubDate>
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<p><strong> दिगंबर जैन साधु का संयम उपकरण पिच्छी और कमंडल है। यह जिन मुद्रा एवं करुणा का प्रतीक है। पिच्छी और कमंडल साधु के स्वालंबन के दो हाथ हैं। इनके बिना अहिंसा मय महाव्रत का पालन नहीं हो सकता। <span style="color: #ff0000">टोंक से पढ़िए, राजेश पंचोलिया की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>टोंक।</strong> दिगंबर जैन साधु का संयम उपकरण पिच्छी और कमंडल है। यह जिन मुद्रा एवं करुणा का प्रतीक है। पिच्छी और कमंडल साधु के स्वालंबन के दो हाथ हैं। इनके बिना अहिंसा मय महाव्रत का पालन नहीं हो सकता। आदान निक्षेपण समिति तथा प्रतिस्थापना समिति का पालन नहीं कर सकते। इस कारण समस्त दिगंबर साधु वर्ष में एक बार पिच्छी का परिवर्तन करते हैं। आचार्य श्री ने पिच्छी के गुण में बताया कि यह धूल ग्रहण नहीं करती, लघुता रहती है। पसीना ग्रहण नहीं करती। सुकुमार झुकने वाली होती है। यहां तक भी देखा गया है कि मोर पंख यदि आंखों में लग जाए तो बहुत चुभता नहीं है। इससे आंसू नहीं आते कष्ट नहीं होता। सबसे बड़ी बात यह है कि मयूर स्वयं पंख छोड़ते हैं। इस कारण कोई हिंसा भी नहीं होती। आज पिच्छी कमंडल रूपी संयम रथ निरंतर चल रहा है। इसका श्रेय प्रथमाचार्य शांति सागर जी महाराज को है। यह मंगल देशना आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने 34 साधुओं के पिच्छी परिवर्तन समारोह के अवसर पर अतिशय क्षेत्र टोंक के श्री आदिनाथ जिनालय परिसर की महती धर्म सभा में प्रगट की।</p>
<p><strong>34 साधुओं की पुरानी पिच्छी पुण्यार्जकों को प्रदान की </strong></p>
<p>गुरु भक्त राजेश पंचोलिया और कमल सराफ ने कहा कि आचार्य श्री ने बताया कि जिन्होंने साधुओं को संयम उपकरण पिच्छी देकर अनुमोदना की है। उन्होंने पुण्य का अर्जन किया है। मयूर पिच्छी से कोमल वस्तु संसार में नहीं है। इस महोत्सव को आपने आंखों से देखा है। साधु एक वर्ष में मयूर पिच्छी से सूक्ष्म से सूक्ष्म जीवों की रक्षा करते हैं। अहिंसा महाव्रत के परिपालन का अन्य कोई उदाहरण देखने में नहीं आता है। आचार्य श्री संघ में सभी 34 साधुओं की पुरानी पिच्छी नियमों व्रत के आधार पर पुण्यशाली परिवारों को दी गई।</p>
<p><strong><img fetchpriority="high" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-93624" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/11/IMG-20251103-WA0023.jpg" alt="" width="1600" height="1081" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/11/IMG-20251103-WA0023.jpg 1600w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/11/IMG-20251103-WA0023-300x203.jpg 300w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/11/IMG-20251103-WA0023-1024x692.jpg 1024w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/11/IMG-20251103-WA0023-768x519.jpg 768w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/11/IMG-20251103-WA0023-1536x1038.jpg 1536w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/11/IMG-20251103-WA0023-990x669.jpg 990w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/11/IMG-20251103-WA0023-1320x892.jpg 1320w" sizes="(max-width: 1600px) 100vw, 1600px" />समाधिस्थ संयम साधना में लीन आर्यिका श्री वत्सलमति माताजी </strong></p>
<p>आचार्य श्री के प्रवचन के पूर्व समाधिस्थ संयम साधना में संलग्न 72 वर्षीय आर्यिका श्री वत्सल मति माताजी ने आचार्य श्री धर्म सागर जी से लेकर आचार्य श्री वर्धमान सागर जी का गुणानुवाद कर आचार्य श्री, सभी मुनिराज, सभी आर्यिका माताजी, समाज परिजनों से क्षमा भाव धारण कर क्षमा याचना की। आपका उपदेश सुनकर सभी के नेत्र सजल हो गए। आर्यिका श्री महायश मति जी की नई पिच्छी आचार्य को देकर आचार्य श्री ने पुरानी पिच्छी गृहस्थ अवस्था के माता-पिता संगीता राजेश पंचोलिया इंदौर, एवं आरती सनत जैन इंदौर ने प्राप्त किया। मुनि श्री मुनि श्री चिंतन सागर जी की पिच्छी गजराज लोकेश कल्ली परिवार को प्राप्त हुई। मुनि श्री हितेंद्रसागर जी की पुरानी पिच्छी प्राप्त करने का सौभाग्य सोनू, नीतू छामुनिया टोंक परिवार तथा आचार्य श्री वर्धमान सागर जी की पुरानी पिच्छी प्राप्त करने का सौभाग्य को धर्मेंद्र कल्लू पासरोटिया टोंक को प्राप्त हुआ।</p>
<p><strong>नीलम जैन ग्रुप ने 24 भगवान स्तुति का नृत्य मंगलाचरण किया</strong></p>
<p>सोमवार को कार्तिक सुदी त्रयोदशी को श्री शांतिनाथ भगवान सहित 23 भगवान भूगर्भ से प्रगट हुए। इस उपलक्ष्य में श्री शांतिनाथ भगवान का भव्य पंचामृत अभिषेक विभिन्न पुण्यार्जक परिवारों द्वारा किया गया। आदर्श नगर में आहार चर्या के बाद आचार्य श्री वर्धमान सागर का श्री पार्श्वनाथ जिनालय आदर्श नगर से नवीन 34 पिच्छी सहित जुलूस आदिनाथ जिनालय नसिया के लिए प्रस्थान किया। आदर्श नगर समाज और चौका आहार व्यवस्था वाले नई पिच्छी मस्तक पर धारण कर चल रहे थे। सर्व प्रथम आस्था और जिया ने आचार्य श्री और पूर्वाचार्यों के चित्र समक्ष चित्र अनावरण कर दीप प्रवज्जलन किया। नीलम जैन ग्रुप ने 24 भगवान स्तुति का नृत्य मंगलाचरण किया।</p>
<p><strong> राष्ट्रीय राजमार्ग का नाम प्रथमाचार्य श्री शांति सागर मार्ग </strong></p>
<p>आचार्य श्री वर्धमान सागर जी के चरण प्रक्षालन निहालचंद बैंगलोर ने परिवार सहित और जिनवाणी राजेश, पारस, संजय, प्रवीण पंड्या परिवार किशनगढ़ ने भेंट कर आशीर्वाद प्राप्त किया। कार्यक्रम के दौरान सरोज जिला प्रमुख टोंक ने जिला प्रशासन का पत्र जिसमें जखीरा से राष्ट्रीय राजमार्ग का नाम प्रथमाचार्य श्री शांति सागर मार्ग करने की स्वीकृति पत्र आचार्य श्री हस्त में दिया। हजारों जन समुदाय ने घोषणा का करतल ध्वनि से स्वागत किया। मंच संचालन मुनि श्री हितेंद्र सागर जी एवं संचालन पंडित मनोज शास्त्री ने किया।</p>
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		<title>आर्यिका शिरोमणि गुरु मां विद्यान्तश्री के दिव्य अवतरण दिवस पर श्रावक समाज में उमड़ा भक्ति भाव : गुरु मां विद्यान्तश्री के दिव्य आभामंडल और अद्वितीय चर्या को नमन — समाज ने किया अवतरण दिवस मनाने का आह्वान </title>
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		<pubDate>Mon, 20 Oct 2025 12:45:48 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[परम तपस्विनी एवं जैन धर्म की आलोकमयी साध्वी आर्यिका विद्यान्तश्री गुरु मां का अवतरण दिवस आगमसम्मत एवं दिव्य भक्ति भाव से मनाए जाने का समाज से आह्वान किया गया है। उनकी दिव्य वाणी और केशलोचन की अलौकिक अनुभूति ने अनगिनत आत्माओं में वैराग्य जाग्रत किया है। पढ़िए सहारनपुर से सोनल जैन की रिपोर्ट… परम पूज्य [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>परम तपस्विनी एवं जैन धर्म की आलोकमयी साध्वी आर्यिका विद्यान्तश्री गुरु मां का अवतरण दिवस आगमसम्मत एवं दिव्य भक्ति भाव से मनाए जाने का समाज से आह्वान किया गया है। उनकी दिव्य वाणी और केशलोचन की अलौकिक अनुभूति ने अनगिनत आत्माओं में वैराग्य जाग्रत किया है। <span style="color: #ff0000">पढ़िए सहारनपुर से सोनल जैन की रिपोर्ट…</span></strong></p>
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<p>परम पूज्य गुरु मां आर्यिका विद्यान्तश्री का आभामंडल अद्वितीय, अद्भुत और अपूर्व है। उनकी मधुर वाणी और दिव्य व्यक्तित्व में ऐसा अलौकिक अतिशय है कि सभी श्रावक एवं श्राविकाएँ सहज भाव से उनकी प्रेरणा को स्वीकार करती हैं। आगमानुगामी चर्या से अलंकृत ऐसी आर्यिका शिरोमणि गुरु मां का अवतरण दिवस अत्यंत भव्यता एवं आगम सम्मत ढंग से सम्पूर्ण जैन समाज द्वारा मनाया जाए — यह भावना समाज में दृढ़ता से प्रतिध्वनित हो रही है।</p>
<p>आर्यिका विद्यान्तश्री द्वारा दीर्घकाल तक प्राणी मात्र के कल्याण हेतु मंगल देशना दी जाती रही है। अखिल भारत जैन समुदाय उनकी दिव्य वाणी के प्रस्फुटन की प्रतीक्षा करता है। श्रद्धाभाव से जिनेंद्र प्रभु से प्रार्थना की जा रही है कि इस परम साधिका, तपस्विनी, आज्ञानुवर्ती, सुसंस्कारित एवं सुयोग्य आर्यिका गणिनी विद्यान्तश्री मां को रत्नत्रय की दिव्य प्राप्ति तथा स्व एवं पर कल्याण हेतु सुदीर्घ, सुयशपूर्ण एवं आरोग्यतापूर्ण श्रमण जीवन का मंगल आशीष प्राप्त होता रहे।</p>
<p>उनके दुर्लभ एवं दिव्य केशलोचन के साक्षात अलौकिक दृश्य ने श्रावक समाज में भेद विज्ञान की अनुभव यात्रा जगाई है तथा अनगिनत हृदयों में वैराग्य को गहनता से प्रज्वलित किया है। समाजजन इस वर्ष उनके अवतरण दिवस को केवल उत्सव नहीं, बल्कि आध्यात्मिक जागरण एवं चरित्र साधना का उत्कृष्ट अवसर मानने की प्रेरणा से ओतप्रोत हैं।</p>
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		<title>संयम, त्याग, संन्यास के मार्ग पर चलना है तो राग द्वेष छोड़े: आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी ने पथरिया में भक्तों को संयम, त्याग को अपनाने की दी सीख  </title>
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		<pubDate>Mon, 22 Sep 2025 13:32:41 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आचार्यश्री विशुद्ध सागर जी ने कहा कि संयम, त्याग, संन्यास के मार्ग पर चलना है, तो राग और द्वेष को छोड़ना चाहिए। यदि आप अपनों से भी राग करोगे और दूसरों से द्वेष करोगे तो लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर सकोगे। पथरिया से पढ़िए, अभिषेक अशोक पाटील की यह खबर&#8230; पथरिया। आचार्यश्री विशुद्ध सागर जी [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>आचार्यश्री विशुद्ध सागर जी ने कहा कि संयम, त्याग, संन्यास के मार्ग पर चलना है, तो राग और द्वेष को छोड़ना चाहिए। यदि आप अपनों से भी राग करोगे और दूसरों से द्वेष करोगे तो लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर सकोगे। <span style="color: #ff0000">पथरिया से पढ़िए, अभिषेक अशोक पाटील की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong>पथरिया।</strong> आचार्यश्री विशुद्ध सागर जी ने कहा कि संयम, त्याग, संन्यास के मार्ग पर चलना है, तो राग और द्वेष को छोड़ना चाहिए। यदि आप अपनों से भी राग करोगे और दूसरों से द्वेष करोगे तो लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर सकोगे। साधना का मार्ग आत्म-कल्याण का मार्ग है। वैभव बडामलहारा ने बताया की विरागोदय तीर्थ पथरिया में में आचार्यश्री ससंघ विराजित हैं। उनका चातुर्मास यहां जारी है। यहां पर नित्य ही प्रवचनों का दौर जारी है। इसमें जैन समाज के भक्तों को आचार्यश्री अपनी मंगल देशना से उपकृत कर रहे हैं। यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालुजन धर्म सभा का लाभ अर्जित कर रहे हैं।</p>
<p><strong>वकार आते ही सर्वनाश प्रारंभ हो जाता है</strong></p>
<p>प्रवचन के दौरान आचार्यश्री विशुद्ध सागर जी महाराज ने कहा कि जीवन के रहस्यों को समझो। व्यर्थ में श्रम मत करो। पहले समझो, संभलो फिर कुछ करो। विचार पूर्वक ही कार्य करना चाहिए। कार्य करने के पूर्व विचार करो। विचारों में विकार आते ही सर्वनाश प्रारंभ हो जाता है। विचारों की पवित्रता आवश्यक है। जब-तक विचार पवित्र नहीं है, तब-तक कार्य भी पवित्र नहीं हो सकता है। वस्तु-स्वरूप को समझो। बुराई को छोड़े बिना, अच्छाई में प्रवेश नहीं हो सकता।</p>
<p><strong>सत्य जानो, सत्यपूर्ण आचरण करो</strong></p>
<p>उन्होंने कहा कि मनुष्य-जीवन अत्यंत दुर्लभ है। इसे व्यर्थ में नष्ट मत करो। पल-पल अनमोल है। हर पल का सदुपयोग करो। जीवन का हर क्षण अपनी उन्नति में लगाओ। भटको मत, भटकन से बचो। धन, जीवन जीने के लिए आवश्यक है, परन्तु धन सब-कुछ नहीं है। धन सर्वस्व नहीं है, धर्म सुख को देने वाला है। व्यर्थ के लोगों के चक्कर में मत पड़ो। आत्म कल्याण करना है, जीवन में सुख प्राप्त करना है तो सत्य जानो, सत्यपूर्ण आचरण करो। जानोगे नहीं तो सुधार कैसे करोगे। चलने के पहले मार्ग का निर्णय करो। भोजन के पहले शोधन करो। बोलने के पूर्व विचार करो।</p>
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