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	<title>भिलुड़ा &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<description>ताज़ा खबरे हिन्दी में</description>
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	<title>भिलुड़ा &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>जीवन में सु मरण के बिना मोक्ष नहीं मिलता : धर्माचार्य कनक नंदी जी ने जन्म और मरण के रहस्य को गहराई से समझाया </title>
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		<pubDate>Tue, 21 Apr 2026 08:40:16 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[केवली भगवान के बिना कोई आचार्य,उपाध्याय, साधु अनंत को नहीं जान सकते क्योंकि, अनंत को जानने के लिए अनंत नॉलेज चाहिए। अनंतानंत बार इस जीव ने जन्म मरण किया है अतः मरण के नाम से सभी को डर लगता है। यह प्रबोधन धर्माचार्य कनक नंदीजी ने भिलुडा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>केवली भगवान के बिना कोई आचार्य,उपाध्याय, साधु अनंत को नहीं जान सकते क्योंकि, अनंत को जानने के लिए अनंत नॉलेज चाहिए। अनंतानंत बार इस जीव ने जन्म मरण किया है अतः मरण के नाम से सभी को डर लगता है। यह प्रबोधन धर्माचार्य कनक नंदीजी ने भिलुडा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में दिया। <span style="color: #ff0000">डडूका से अजीत कोठिया की रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>डडूका।</strong> केवली भगवान के बिना कोई आचार्य,उपाध्याय, साधु अनंत को नहीं जान सकते क्योंकि, अनंत को जानने के लिए अनंत नॉलेज चाहिए। अनंतानंत बार इस जीव ने जन्म-मरण किया है, अतः मरण के नाम से सभी को डर लगता है। यह प्रबोधन धर्माचार्य कनक नंदीजी ने भिलुडा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में दिया। उन्होंने बताया कि निगोदिया, नित्य निगोदिया जीव अनादि काल से अभी तक कृमि, किट पशु पक्षी मनुष्य नहीं बने हैं। इतर निगोदिया में निगोद से निकलकर कृमि, कीट, पशु, पक्षी और मनुष्य आदि बनते हैं। सभी निगोदिया जीव मिथ्या दृष्टि ही होते हैं। निगोदिया में जीव अनंतानंत बार जन्म-मरण करता है। एक श्वास में 8-10 बार जन्म-मरण करता है। जैन धर्म में ही सुमरण का वर्णन है। सही मरण से मोक्ष मिलेगा। यह पंडित मरण है। सामान्य जीव मरण से भयभीत रहते हैं परंतु, सम्यक दृष्टि मरण से नहीं डरता, वह जानता है कि मरण मेरे शरीर का होगा मेरी आत्मा का नहीं। प्रति समय मरण होता है उसे अविचीमरण कहते हैं। समय से पहले आकस्मिक मरण होना अकाल मरण है। आयु के पूर्ण होने पर मरना सकाल मरण है। मरण का शासन कर्मानुसार है। मृत्यु शरीर की होती है आत्मा की नहीं। जन्म मरण से परे अमृत अवस्था होती है। जिसमें दुबारा जन्म-मरण नहीं होता है। गर्भ में नहीं जाना पड़ता है। उन्होंने आगे कहा कि हर द्रव्य में अनेकांत है अनेकांत वस्तु स्वरूप है।</p>
<p>साधारण आहार एक समान आहार एक साथ उच्श्वास, एक साथ निश्वास। साधारण वनस्पति एक समय में अनंत जीव एक साथ उत्पन्न होते हैं। आचार्यश्री ने बताया कि मनुष्य के शरीर में जितने वायरस बैक्टीरिया है, उतने पूरी पृथ्वी में पशु-पक्षी भी नहीं है। आत्मविश्वास ज्ञान चरित्र समता शांति से मरण को मार सकते हैं। संयमी व ज्ञानी की मृत्यु पंडित मरण तथा अज्ञानी जीवों का मरण बालमरण होता है। कर्मक्षय से ही मृत्यु को जीता जाता है, यह मृत्यु के प्रति निर्भयता दर्शाता है। यह जानकारी विजयलक्ष्मी गोदावत सागवाड़ा ने दी।</p>
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		<title>जीवन में हानि, लाभ, सुख, दुःख सभी के मूल में अच्छे बुरे कर्म : धर्माचार्य कनक नंदी जी ने वेबिनार में कर्म की गति और उसके प्रभाव को समझाया  </title>
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		<pubDate>Sat, 18 Apr 2026 11:48:25 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[धर्माचार्य कनक नंदीजी गुरुदेव ने भिलुडा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में बताया कि संसार में 84 लाख योनिया क्यों? रावण औ विभीषण भाई-भाई थे फिर भी उनके स्वभाव में अंतर क्यों? वृक्ष की सभी पत्तियां अलग-अलग आकार प्रकार की क्यों होती है? इन सब प्रश्नों का उत्तर, हानि लाभ सुख दुख सब [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>धर्माचार्य कनक नंदीजी गुरुदेव ने भिलुडा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में बताया कि संसार में 84 लाख योनिया क्यों? रावण औ विभीषण भाई-भाई थे फिर भी उनके स्वभाव में अंतर क्यों? वृक्ष की सभी पत्तियां अलग-अलग आकार प्रकार की क्यों होती है? इन सब प्रश्नों का उत्तर, हानि लाभ सुख दुख सब का मूल कारण कर्म है। <span style="color: #ff0000">डडूका से पढ़िए, अजीत कोठिया की रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>डडूका।</strong> धर्माचार्य कनक नंदीजी गुरुदेव ने भिलुडा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में बताया कि संसार में 84 लाख योनिया क्यों? रावण औ विभीषण भाई-भाई थे फिर भी उनके स्वभाव में अंतर क्यों? वृक्ष की सभी पत्तियां अलग-अलग आकार प्रकार की क्यों होती है? इन सब प्रश्नों का उत्तर, हानि लाभ सुख दुख सब का मूल कारण कर्म है। तुम पतित से पावन, कंकर से शंकर, आत्मा से परमात्मा केवल आत्मज्ञान से ही बन सकते हो। पूर्व कर्म के तीव्र पाप से कर्म जीव पर हावी हो जाते हैं जिसके कारण गर्भ में ही रोग छोटी उम्र में रोग दादा होते हुए भी पोते की मृत्यु पिता के होते हुए बेटे की मृत्यु हो जाती है। कर्म के गुलाम होने से व्यक्ति की बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है। ज्ञानावरणीय कर्म के उदय से गुरु पढाते हैं वह भी याद नहीं रहता। कर्म व जीव का महासंग्राम अनादिकाल से चल रहा है.। कर्म के कारण ही 84 लाख योनियों में जीव भ्रमण करता है। भस्मक रोग समंत भद्र आचार्य को हुआ था सामान्य लोगों को क्षुधा रोग होता ही है।</p>
<p>हम लोगों का भी पाप कर्मों का उदय था परंतु तीव्र नहीं था आत्मा को नहीं जानते थे। गुरुदेव ने सोचा भद्र जीव है पाप के कारण संसार में डूब जाएंगे अतः हम पर उपकार करके उपदेश दिया। कर्म हम पर हावी थे परंतु गुरु उपदेश से आत्म श्रद्धा बढी, आत्मज्ञान प्राप्त करने की रुचि जागृति हुई। आचार्य श्री परम सत्य के बारे में पढ़ रहे हैं तथा पढा रहे हैं। आत्मा एक अद्वितीय है। उसमें असंख्यात आत्म प्रदेश है एक आत्म प्रदेश में अनंत गुण अनंत पर्याय होती है। एक गुण में अनंत पर्याये होती है। आत्मा अनंत शक्ति संपन्न होते हुए भी कर्म का दास क्यों बना हुआ है?</p>
<p><strong> एक आत्मप्रदेश में अनंतानंत कर्म परमाणु बंधे होते हैं</strong></p>
<p>हाथी शक्तिशाली है उसे सामान्य धागे से नहीं बांध सकते हैं। वैसे ही आत्मा की अनंत शक्ति को बाधने के लिए कर्मों की भी अनंत शक्ति होती है। श्रेयांश वस्तावड़े सांगली तथा मनीष पंचोरी कॉलोनी की जिज्ञासा का समाधान करते हुए आचार्य श्री ने बताया कि सूर्य से रेडिएशन निकलता है वैसे ही जीव के शरीर से भी रेडिएशन निकलता है। एक आत्मप्रदेश में अनंतानंत कर्म परमाणु बंधे होते हैं परंतु कुछ कर्मों का उदय तुरंत हो जाता है कुछ का उदय बाद में होता है।. श्रीपाल राजा ने दिगम्बर साधु को कोडी कोडी कोडी बोलकर साधु की निंदा की थी उनके दोस्तों ने अनुमोदन की थी उसमें समय सेकंड का लगा परंतु इतने कम समय में कर्म परमाणु अधिक गहराई से बंध गए,कर्म का उदय आया। कुछ समय में कर्म बांधा उसी का फल कई वर्षों तक दुख भोगना पड़ा। कर्म उदय से शरीर से बदबू आने लगी पीव निकलने लगा राजपाठ को छोड़कर जंगल में जाना पडा।</p>
<p><strong> सिद्ध भगवान में अगुरुलघु गुण इलास्टिक पावर की तरह होता है</strong></p>
<p>अंजना सती में 22 घड़ी तक मूर्ति छुपाइ उसका फल 22 वर्ष पति वियोग सहना पड़ा।</p>
<p>सिद्ध भगवान एक समय में सिद्ध शिला पर विराजमान हो जाते हैं। सिद्ध भगवान में अधिक परिवर्तन होता है संसारी जीवो में इतना नहीं होता। संसारी जीवो में कर्मों का भार अधिक रहता है। सिद्ध भगवान में अनंत गुण होने से षटगुण हानी वृद्धि सर्वाधिक होती है। जैसे बैलगाड़ी साइकिल ट्रेन एरोप्लेन क्वांटम एटम की गति में अंतर होता है। सिद्ध भगवान की ऊर्ध्व गति सबसे अधिक होती है। तीव्र परिणमन भी अधिक होता है। सिद्ध भगवान में अगुरुलघु गुण इलास्टिक पावर की तरह होता है। जैसे ट्यूब बैलून में हवा। सिद्ध भगवान में अनंतानंत गुण प्रकट हो गए हैं कर्म रहित निकम्मे ज्यादा सक्रिय होते हैं। जितना जितना जीव सिद्ध होता जाता है उतनी उतनी उसमें शक्ति प्रगट होती जाती है। शुद्ध आत्मा के परिणमन को गणधर नहीं देख सकते। मुनि श्री सुविज्ञ सागर जी ने आचार्य श्री द्वारा रचित कविता महासंग्राम महासंग्राम विश्व का सबसे है बड़ा महासंग्राम। अंतरंग शत्रु नाश होने से बहिरंग संग्राम कहां से होगा द्वारा मंगलाचरण किया। यह जानकारी सागवाड़ा निवासी विजयलक्ष्मी गोदावत ने दी।</p>
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		<title>जैन धर्म में जीने की कला है तो मरने की कला भी : धर्माचार्य कनक नंदीजी ने बताए इंद्रियों पर विजय प्राप्त करने के सरल उपाय  </title>
		<link>https://www.shreephaljainnews.com/in_jainism_there_is_an_art_of_living_and_also_an_art_of_dying/</link>
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		<dc:creator><![CDATA[Shree Phal News]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 12 Apr 2026 12:55:27 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[धर्माचार्य कनकनंदी गुरुदेव की भिलुडा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार जारी है। इसमें वे जैन धर्म के विभिन्न पक्षों का रहस्य बता रहे हैं। इसमें उन्होंने बताया कि अनादिकाल से जीव आत्म आचरण नहीं कर पाया। डडूका से पढ़िए, अजीत कोठिया डडूका की रिपोर्ट&#8230; डडूका। धर्माचार्य कनकनंदी गुरुदेव की भिलुडा के पास शिवगौरी [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>धर्माचार्य कनकनंदी गुरुदेव की भिलुडा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार जारी है। इसमें वे जैन धर्म के विभिन्न पक्षों का रहस्य बता रहे हैं। इसमें उन्होंने बताया कि अनादिकाल से जीव आत्म आचरण नहीं कर पाया। <span style="color: #ff0000">डडूका से पढ़िए, अजीत कोठिया डडूका की रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong>डडूका।</strong> धर्माचार्य कनकनंदी गुरुदेव की भिलुडा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार जारी है। इसमें वे जैन धर्म के विभिन्न पक्षों का रहस्य बता रहे हैं। इसमें उन्होंने बताया कि अनादिकाल से जीव आत्म आचरण नहीं कर पाया। हम उन्हीं को मुनि कहते हैं जो सभी कलाओं से युक्त होते हैं। 72 कलाओं में दो श्रेष्ठ कलाएं हैं। पहली जीव की जीविका दूसरी जीव का उद्धार अर्थात आत्मा को परमात्मा बनाना। जैन धर्म में जीने की भी कला है तथा मरने की भी कला है। जो दुष्ट काम अश्लील काम करते हैं, वह साधु नहीं तथा श्रावक भी नहीं। जो स्वयं की आत्मा पर विजय प्राप्त करते हैं। वह वीरों के भी वीर होते हैं। वे पुरुष धीर वीर चमकती हुई क्षमा की तलवार से इंद्रियों का दमन करके कर्मों पर विजय प्राप्त करते हैं। कषाओ रूपी योद्धाओं को वह जीत लेते हैं। वे भगवान धन्य है, जिन्होंने दर्शन ज्ञान रूपी हाथ का सहारा देकर भव्य जीवों का उद्धार किया है।</p>
<p>मोह रूपी लता को ज्ञान रूपी शस्त्रों से मुनिराज नष्ट कर देते हैं। जिस प्रकार आकाश में तारों से गिरा हुआ चंद्रमा सुशोभित होता है। इस प्रकार गुणों रूपी ताराओं के समूह में मुनिराज सुशोभित होते हैं। विशुद्ध भाव से युक्त जीव चक्रवर्ती राजा, महाराजा, देवेंद्र, बलभद्र, राम, केशव, सूर, चारण, रिद्धिधारी मुनि, जिनेंद्र आदि श्रेष्ठ पद प्राप्त करते हैं। यह अष्ट पाहुड़ की 162 नंबर की गाथा से आचार्य श्री ने बताया। गृहस्थ धर्म, मुनि धर्म पालन में भाव प्रमुख है। जिनेंद्र भाव की भावना से सुशोभित जीव उत्तम अनुपम आनंद सहित अतुलनीय पद को प्राप्त करते हैं। मुनि श्री सुविज्ञ सागर जी ने आचार्य श्री द्वारा रचित कविता ‘कब मम अपूर्व अवसर आएगा’ द्वारा मंगलाचरण किया। ये जानकारी विजयलक्ष्मी गोदावत सागवाड़ा ने दी।</p>
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		<title>संसार के बहुभाग जीव आत्मा को नहीं जानते: वैज्ञानिक धर्माचार्य कनकनंदी जी ने समाधि तंत्र श्लोक नंबर 59 और 60 की व्याख्या की  </title>
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		<pubDate>Thu, 09 Apr 2026 09:23:36 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदीजी ने भिलुडा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में समाधि तंत्र श्लोक नंबर 59 और 60 की व्याख्या करते हुए बताया कि अनंतानंत जीव अनंत भवों में भी आत्म स्वरूप सत्य स्वरूप को समझ नहीं पाए। संसार के बहुभाग जीव आत्मा को नहीं जानते। डडूका से पढ़िए, अजीत कोठिया की [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदीजी ने भिलुडा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में समाधि तंत्र श्लोक नंबर 59 और 60 की व्याख्या करते हुए बताया कि अनंतानंत जीव अनंत भवों में भी आत्म स्वरूप सत्य स्वरूप को समझ नहीं पाए। संसार के बहुभाग जीव आत्मा को नहीं जानते। <span style="color: #ff0000">डडूका से पढ़िए, अजीत कोठिया की रिपोर्ट&#8230;&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>डडूका।</strong> वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदीजी ने भिलुडा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में समाधि तंत्र श्लोक नंबर 59 और 60 की व्याख्या करते हुए बताया कि अनंतानंत जीव अनंत भवों में भी आत्म स्वरूप सत्य स्वरूप को समझ नहीं पाए। संसार के बहुभाग जीव आत्मा को नहीं जानते। मूढ़ व्यक्ति ज्ञानी को भी मूढ़ मानता है। रेत में तेल नहीं निकलता कंकर की खीर नहीं बनती और पानी मथने से घी नहीं निकलता है। वैसे ही मिथ्या दृष्टि को आत्मज्ञान नहीं रुचता। ऐसे मूढ़ात्मा को उपदेश करना वृथाश्रम है। बोलना आत्म स्वभाव नहीं सिद्ध भगवान एक शब्द भी नहीं बोलते हैं। उन्होंने कहा कि मेरा शरीर भी मुझे नहीं समझ सकता। निश्चय से मन भी कुछ नहीं जानता। यह यंत्र की तरह है। जब तक भाव मन रहता है तब तक केवल ज्ञान नहीं होता। तुम्हारा मन, तुम्हारा ब्रेन, तुम्हारी इंद्रियां भी तुम्हें नहीं जानती। आत्मा की शक्ति अनंत है। आत्मा के अनुसार चलो मन के अनुसार नहीं। तुम्हारा शरीर भी अनंतकाल तक तुम्हारे साथ नहीं रहेगा।</p>
<p><strong>राग द्वेष दिखावा आडंबर करता है </strong></p>
<p>जो आत्मा को नहीं जानता आत्मा का मनन चिंतन नहीं करता है वह मुढ़ात्मा है। बाह्य मैं ही आनंद मानते हैं वह सब मूढ़ात्मा है। मोह से आच्छादित आत्म ज्योति वाले बाह्य मैं ही संतोष मानते हैं। द्रव्य शुद्धि से भाव शुद्धि अधिक होनी चाहिए। वर्तमान में द्रव्य शुद्धि के कारण ही श्रावक आपस में लड झगड़कर आगे नहीं बढ़ पाते हैं। धर्म में अपशिष्ट गटर डालकर पवित्र धर्म को गंगा नदी की तरह अपवित्र बना दिया है। जो बाह्य मैं ही ममत्व, राग द्वेष दिखावा आडंबर करता है वह मिथ्या दृष्टि है। मोह से जिनकी अंतर्दृष्टि ढंक गई है, वह मिथ्या दृष्टि है।</p>
<p><strong> मोह के कारण स्वयं को नहीं जान पाता</strong></p>
<p>जिनको आध्यात्मिक आनंद आ रहा है, जो आत्मा का ज्ञान प्राप्त करना चाहता है। अतः बाह्य से निवृत होता है, वह प्रबोधात्मा है। वह आत्मा में संतोष प्राप्त करता है। आचार्य श्री ने उदाहरण देते हुए बताया कि जिस प्रकार मध्यान्ह का सूर्य भी बादलों से आच्छादित होने पर प्रकाश नहीं दे सकता। वैसे ही ज्ञान सूर्य अनंत अक्षय ज्ञान का पिंड होते हुए भी मोह के कारण स्वयं को नहीं जान पाता। संताप संक्लेश का कारण तुम स्वयं हो। आत्मा में जितना ज्ञान जितना सुख जितना वैभव जितना बल है उतना किसी में नहीं। प्रबुद्ध प्रकृष्ट, समृद्ध आत्मा बाह्य से निवृत होकर आत्मा में संतोष होते हैं।</p>
<p><strong> भाषा ज्ञान बिना ग्रंथ को नहीं समझ सकते</strong></p>
<p>छोटा बड़ा राग द्वेष आदि का कारण सिंहासन होता है जिसे आचार्य श्री कनक नदी गुरुदेव ने त्याग दिया है। उनके कारण से सभी को सिंहासन त्यागना पड़ेगा इसलिए आचार्य श्री अपने शिष्यों के बुलाने पर भी बड़े-बड़े समारोह में नहीं जाते हैं क्योंकि, अधिकांश शिष्य आचार्य श्री से पढ़े हुए हैं। मुनि श्री सुविज्ञ सागर जी गुरुदेव ने आचार्य श्री द्वारा रचित कविता जहां आत्मविश्वास, ज्ञान चारित्र की धारा वह जैन धर्म है मेरा वह आत्म धर्म है मेरा के माध्यम से मंगलाचरण किया।</p>
<p>यह जानकारियां विजयलक्ष्मी कमल कुमार गोदावत ने दी।</p>
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		<title>धर्माचार्य कनक नंदीजी की अंतरराष्ट्रीय वेबिनार का मिल रहा है धर्मलाभ : समाधि तंत्र ग्रंथ के रहस्य से कराया परिचय  </title>
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		<pubDate>Tue, 07 Apr 2026 12:33:12 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[विश्व धर्म प्रभाकर वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नदी गुरुदेव ने भिलुडा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में समाधि तंत्र ग्रंथ की 61 से लगाकर 67 तक गाथाओं का रहस्य बताते हुए कहा कि जब तक तन मन इंद्रियों को जीव मै मानता है तब तक संसार में दु:ख मिलता रहता है।डडूका से अजीत कुमार [&#8230;]]]></description>
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<p>विश्व धर्म प्रभाकर वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नदी गुरुदेव ने भिलुडा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में समाधि तंत्र ग्रंथ की 61 से लगाकर 67 तक गाथाओं का रहस्य बताते हुए कहा कि जब तक तन मन इंद्रियों को जीव मै मानता है तब तक संसार में दु:ख मिलता रहता है।<span style="color: #ff0000">डडूका से अजीत कुमार कोठिया की रिपोर्ट &#8230;</span></p>
<hr />
<p>डडूका। विश्व धर्म प्रभाकर वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नदी गुरुदेव ने भिलुडा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में समाधि तंत्र ग्रंथ की 61 से लगाकर 67 तक गाथाओं का रहस्य बताते हुए कहा कि जब तक तन मन इंद्रियों को जीव मै मानता है तब तक संसार में दु:ख मिलता रहता है। जब यह ज्ञान होगा कि मैं शरीर नहीं इंद्रियां नहीं सत्ता संपत्ति परिवार आदि नहीं तब मोक्ष होगा। नए कपड़ों से जीव नया नहीं बन जाता फटे कपड़ों से फटा नहीं बन जाता लाल कपड़ों से लाल नहीं बन जाता गंदे कपड़ों से वह गंदा नहीं हो जाता। संपत्ति नष्ट होने से तुम नष्ट नहीं होते। शरीर को हष्टपुष्ट करने से आत्मा हष्टपुष्ट नहीं होता।</p>
<p><strong>दिखावे ढोंग से धर्म होता है, ऐसा मानना भी मूढ़ता</strong></p>
<p>चोला कैसा भी पहनो इसका कोई महत्व नहीं है।हमारा धर्म आध्यात्मिक है परंतु किसी भी पथ मत वाले इसकी आध्यात्मिकता को नहीं जानते। जीव अनादि काल से क्रोध मान, माया लोभ से विवश होकर धर्म राजनीति व्यापार सब करता है। गर्म पानी में दाल या चावल डालने पर ऊपर नीचे ऊपर नीचे होते हैं उसी प्रकार राग द्वेष ईर्षा आदि से जीव ऊपर नीचे ऊपर नीचे अनेक गतियां में भ्रमण करता है। दिखावे ढोंग से धर्म होता है, ऐसा मानना भी मूढ़ता है। शरीर से ही धर्म होता है ऐसा मानना भी मुढता है। शरीर को कष्ट देने से मोक्ष मिलता तो नारकी पहले मोक्ष चले जाते। आहार, भय, मैथुन, परिग्रह चारों संज्ञाओ से मोहित होकर जीव चारों गतियों में दु:ख सह रहा है।</p>
<p>आचार्य श्री यहां पर कहते हैं हे मुनिराज तू भाव से विशुद्ध होकर सभी प्रकार के तप कर। ख्याति पूजा लाभ प्रसिद्ध त्याग करके तप करो। संसार में भ्रमण हो या मोक्ष हो सबका केंद्र बिंदु केवल आत्मा है।</p>
<p>धर्म विचार पूर्वक होता है। भाव प्रथम तत्व है। भावपूर्वक ही आत्मा है। भाव का अभाव होगा नहीं। भाव यदि शुभ नहीं कर रहे तो अशुभ होंगे। चोर डाकू पशु पक्षी आदि मिथ्या दृष्टि अवस्था में अशुभ भाव तथा सम्यक दृष्टि अवस्था में शुभ भाव करते हैं। छह द्रव्यों में केवल पुद्गल द्रव्य को ही विज्ञान आशिक जानता है।</p>
<p>जब तक जीव तत्व की भावना नहीं करता है तब तक रॉबर्ट मशीन की तरह है। भावना ही अमृत है। आत्म स्वरूप है। सुभाव ही मोक्ष, कुभाव ही पतन का कारण है। अनुप्रेक्षा तीर्थ यात्रा पूजा मूर्ति निर्माण मंदिर निर्माण कुछ भी करो परंतु भाव को शुभ रखो। भाव ही परम तत्व है। संपूर्ण पाप अशुभ भाव से, संपूर्ण पुण्य शुभ भाव से होता है इसके लिए ही धर्म है।</p>
<p><strong>शुभ भाव क्यों नहीं करते</strong></p>
<p>शुद्ध भाव पंचम काल में नहीं होते तो भी शुद्ध भाव की भावना भानी चाहिए। शुभभावना करने के लिए धन संपत्ति की कोई आवश्यकता नहीं तो भी शुभ भाव क्यों नहीं करते आचार्य श्री ऐसा कहते हैं। पंचम काल में उत्तम संवहनन नहीं, उत्तम क्षेत्र नहीं श्रेणी आरोहण नहीं हो सकता अतः शुद्ध भाव नहीं हो सकते परंतु शुभभाव ही करने चाहिए। शुभ नहीं करने पर अशुभ भाव आएंगे। भाव को कोई बंदी नहीं बन सकता। भाव की शक्ति से नरक में स्थित श्रेणीक का जीव समता भाव से कष्ट सहन कर रहा है। परिणाम से ही बंध व मोक्ष होता है। पाप करने के कारण रावण कंस आदि भोजन करते समय भी भयभीत रहते थे उन्हें राम,कृष्ण दिखाई देते थे।</p>
<p><strong>अशुभ छोड़ेगा तो शुभ भाव करेगा</strong></p>
<p>मोह से बंधे जीव को साधु भी दुखी दिखाई देते हैं।</p>
<p>पावं हवई अशेषं, पुण्य अशेष हवई परीणाम।</p>
<p>परिणामादो बंध मोक्ख, जिनशासन दिण्ठ।</p>
<p>जिन वचन से विमुख रहने वाला जीव राग द्वैष, कषाओ से पाप ही बांधता है। असंयमी अशुभ लेश्याओं से युक्त होने वाले अशुभ भाव पाप ही करते हैं। शुभ भाव से भी दो प्रकार के कर्म बांधता है। अशुभ छोड़ेगा तो शुभ भाव करेगा। भाव शुद्धि के लिए बाह् निमित्त द्रव्य शुद्धि भी आवश्यक है।</p>
<p><strong>शुभ कर्म भी नष्ट हो जाते हैं जिससे अरिहंत बनते हैं</strong></p>
<p>पशु पक्षी भी अपने शरीर को घोसले को साफ रखते हैं। महलवासी ही नरकवासी है सफाई के लिए अनेक कर्मचारी रखने पड़ते हैं। सुंदर लड़कियां अधिक सुंदर बनने के लिए सुंदर लड़कियों के खून से तथा शराब से स्नान करती थी ऐसी सुंदर विदेशी रानियां अनेक राजाओं को अपना दास बनाती थी। स्व अशुभ भाव राग द्वैष मोह, कषाए आदि अशुभ कर्म को मारने से शुभ कर्म भी नष्ट हो जाते हैं जिससे अरिहंत बनते हैं। अरि अर्थात शत्रु हंत का अर्थ हनन करना कर्म शत्रु को नष्ट करने वाले अरिहंत होते हैं।</p>
<p><strong>सूक्ष्म आध्यात्मिक चिंतन नहीं करते</strong></p>
<p>यहां पर आचार्य श्री कहते हैं हे मुनिराज 18 000 शील के दोषो व 84 लाख उत्तर गुणो का चिंतन करो। साधु जो उत्कृष्ट विचार चिंतन करते हैं वह राजा चक्रवर्ती भी नहीं कर सकते हैं। मरना स्वीकार करते हैं परंतु सूक्ष्म आध्यात्मिक चिंतन नहीं करते हैं। जैन धर्म की हर क्रिया में भाव का महत्व है। मुनि श्री सुविज्ञ सागर जी ने आचार्य श्री द्वारा रचित व्यंगात्मक कविता प्रस्तुत की।</p>
<p>होते महावीर यदि भारत में अनेक समस्याएं उत्पन्न होती। वर्धमान यदि वर्तमान में होते उन्हें पिछड़ा माना जाता। यह जानकारी सागवाड़ा निवासी विजयलक्ष्मी गोदावत ने दी।</p>
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		<title>भाव मन बिना द्रव्य मन कोई काम नहीं करता: धर्माचार्य श्री कनक नंदीजी ने बताए भावना योग के बारे महत्वपूर्ण तत्व </title>
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		<pubDate>Sun, 05 Apr 2026 06:35:03 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[धर्माचार्य कनक नदी गुरुदेव ने भिलुडा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में बताया कि आत्मा की कई धाराएं हैं। जिसमें आत्मविश्वास आत्म श्रद्धा आत्मज्ञान आदि हैं। पढ़िए, अजीत कोठिया की रिपोर्ट&#8230;  डडूका। धर्माचार्य कनक नदी गुरुदेव ने भिलुडा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में बताया कि आत्मा की कई धाराएं हैं। [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>धर्माचार्य कनक नदी गुरुदेव ने भिलुडा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में बताया कि आत्मा की कई धाराएं हैं। जिसमें आत्मविश्वास आत्म श्रद्धा आत्मज्ञान आदि हैं। <span style="color: #ff0000">पढ़िए, अजीत कोठिया की रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong> डडूका।</strong> धर्माचार्य कनक नदी गुरुदेव ने भिलुडा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में बताया कि आत्मा की कई धाराएं हैं। जिसमें आत्मविश्वास आत्म श्रद्धा आत्मज्ञान आदि हैं। भाव मन बिना द्रव्य मन कोई काम नहीं करता। जो स्वयं को शरीर मानता है, मैं काला हूं, मैं गौरा हूं, मैं गरीब हूं मैं धनी हूं मानता है वह मिथ्या दृष्टि है। वचन को मन को भी मैं मानना कुज्ञान है।</p>
<p>सिद्ध अर्थात शुद्ध आत्मा का वर्णन सिद्ध चक्र मंडल विधान में किया गया है। एक बार भी आत्म श्रद्धा होना दुर्लभ है। प्रिय तथा श्रेय में अंतर बताते हुए आचार्य श्री ने कहा की भोग उपभोग प्रिय है श्रेय नहीं।</p>
<p><strong> आत्मा को परमात्मा बनाना श्रेय है।</strong></p>
<p>मोह के कारण अनादि काल से जीव निगोद में सुषुप्त रहता है। मनुष्य पर्याय प्राप्त करके भी मोह के कारण पुत्र आदि में आसक्त रहता है। सबसे महान पाप मोह है। सप्त व्यसन,पंच पाप नहीं करने वाला भी मोह के कारण अनेक पाप करते हैं। जो पाप मिथ्या दृष्टि देव बांधता है वही पाप मिथ्या दृष्टि नारकी बाधँता है तथा मिथ्या दृष्टि पशु पक्षी भी वही पाप बांधते हैं वही पाप मिथ्या दृष्टि मनुष्य भी बाधँता है। अतः आचार्य श्री राजा महाराजा पशु पक्षी देव नारकी सभी को गुणस्थान के अनुसार समान मानते हैं। अतः सन्यक दर्शन आत्मा का श्रेष्ठतम गुण है। पुण्य से भोग भूमि में तो जन्म हो जाता है परंतु सम्यक दर्शन के लिए पुण्य के साथ अनेक कारण चाहिए।</p>
<p><strong>मिथ्या दृष्टि गुरु के हितोपदेश को भी नहीं सुनते</strong></p>
<p>शरीर को मैं मानना मिथ्यात्व है। शरीर को पर रूप अनात्मा माने ऐसे जीव ही आत्मा से परमात्मा बनते हैं। अज्ञानी मोही जीव आत्म तत्व का उपदेश सुनने पर भी सही नहीं मानते हैं। आकाश आग से नहीं जलता, जलाने पर भी नहीं जलता नहीं जलाने पर भी नहीं जलता है। इस प्रकार आत्मा के एक भी प्रदेश को कोई जला नहीं सकता। स्वयं को ज्ञानी मानने वाले मिथ्या दृष्टि गुरु के हितोपदेश को भी नहीं सुनते। गुरु को अज्ञानी मानकर और पाप बाँध देते हैं। गुरुदेव कहते हैं प्रारंभिक अवस्था में मिथ्या दृष्टि अवस्था में ऐसा ही होता है महापुरुषों ने भी मिथ्या्त्व अवस्था में अपने गुरु को अपने हितेषी को गलत ही माना। जैसे मरीचि कुमार। जब पुण्य उदय आता है निकट भव्य होता है तभी गुरु उपदेश समझ में आता है सम्यक आचरण कर पाता है।</p>
<p>छोटे बच्चे भी स्वयं को ज्ञानी मानते हैं हम सीखाते हैं तो मुझे सब आता है ऐसा बोलते हैं यह सब पूर्व संस्कार वश होता है।</p>
<p>आचार्य श्री को ही नहीं सभी महापुरुषों को भी सामान्य लोग गलत ही समझते हैं। क्योंकि साधुओं की अलौकिक वृत्ति होती है। सामान्य लोगो से उनकी क्रियाएं, उनके विचार विपरीत होते हैं बहुत उच्च होते हैं जो सामान्य लोग समझ नहीं पाते हैं।</p>
<p>अच्छे गुणो की कोई हंसी उड़ाएं तो परवाह नहीं करनी चाहिए। चतुर्थ काल में पंचम काल में भी महापुरुषों को सामान्य लोग समझ नहीं पाते हैं। आदिनाथ भगवान को उनके पोते मरीचि कुमार ने उन्हें गलत माना इसमें भगवान का कोई दोष नहीं स्वयं मरीचि कुमार के पाप कर्म का उदय था। अनेको भव कष्ट सहने के बाद पुण्य कर्म के उदय से शेर की पर्याय में भी साधु का उपदेश सुना समझा आचरण में लाया सम्यक दृष्टि बना तथा अगले भव में महावीर बना। मुनिश्री सुदत्त सागर जी की जिज्ञासा थी कि आचार्य श्री छोटे बच्चों से लेकर बड़ों को सामान्य लोगों को भी, पापी लोगों को भी धन्यवाद देते हैं थैंक यू बोलते हैं तो इसमें आचार्य श्री को पाप नहीं लगेगा। ऐसी जिज्ञासा का समाधान करते हुए आचार्य श्री कनक नदी गुरुदेव ने बताया कि हमारे पूर्वआचार्यो ने आगम में मेंढक को भी महानुभाव महात्मा आदि शब्दों से संबोधन किया है।</p>
<p><strong> चांडाल को भी पापक्षयरस्तु, पुण्य वृद्धिरस्तु का आशीर्वाद दिया </strong></p>
<p>पापी लोगों को ही आशीर्वाद की अधिक आवश्यकता होती है। णमो लोए सव्वसाहुणं मे वर्तमान में नरक निगोद आदि में स्थित भव्य आत्माएं जो भविष्य में पंच परमेष्ठी बनेंगे उन सबको नमस्कार किया गया है। जैसे श्रेणिक राजा अभी नरक में है परंतु बाद में तीर्थंकर बनने वाले हैं उन्हें भी इस महामंत्र में नमस्कार किया गया है।</p>
<p>शुद्ध दृष्टि से हर जीव अरिहंत सिद्ध है। थोड़े गुणो को बढ़ाकर के बोलना स्तुति है। गुण प्रशंसा अवश्य करनी चाहिए। व्यक्ति का छोटा गुण भी प्रशंसा प्रोत्साहन से बढ़कर के महान उपलब्धि दे सकता है।</p>
<p>आग के ऊपर राख होने पर भी अंदर आग है वैसे ही सभी जीवो में भगवान आत्मा है।</p>
<p><strong> सभी जीवों के प्रति मैत्री गुणी के प्रति प्रमोद भाव रखना चाहिए</strong></p>
<p>आगम का दूसरा उदाहरण प्रस्तुत करते हुए आचार्य श्री ने बताया कि भरत चक्रवर्ती 32000 राजाओं के राजा थे फिर भी उन्होंने सामान्य राजा श्रेयास के आहार दान की प्रशंसा अनुमोदन की। गुणग्राही बनना चाहिए गुण समर्थन करना चाहिए गुणी की प्रशंसा करनी चाहिए।</p>
<p>भगवान की पूजा भी भगवान के गुणो की प्रशंसा है पहले मैं भी नहीं जानती थी गुरुदेव ने पढ़ाया तब ज्ञात हुआ। पुज्य के गुणानुवाद से हमें भी भगवान के गुण प्राप्त होते हैं वैसे ही सामान्य लोगों के भी गुणो की प्रशंसा करने से हमें भी वह गुण प्राप्त होते हैं.। हजारों दोष हो तो भी उन दोषो को नहीं एक गुण हो तो उसको ही देखना चाहिए।</p>
<p><strong>किसी पापी की निंदा नहीं करना</strong></p>
<p>पापी के पाप की निंदा करके हमें अनेक दुर्गतियो में भ्रमण करना पड़ेगा हो सकता है वह पापी गुरु सानिध्य प्राप्त करके अपने पापों को मिटा कर अपन से पहले भगवान बन जाए अतः किसी पापी की निंदा नहीं करनी,पाप की अनुमोदना भी नहीं करनी चाहिए।</p>
<p>मुनि श्री सुविज्ञ सागर जी ने आचार्य श्री द्वारा रचित कविता बच्चों तुम निर्माता हो भावी भाग्य के स्वयं के विकास के राष्ट्र निर्माण के। द्वारा मंगलाचरण किया। यह जानकारी विजयलक्ष्मी गोदावत सागवाड़ा ने दी।</p>
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		<title>ज्ञानार्जन के लिए विनयवान आत्मज्ञान से युक्त होना चाहिए: आचार्य कनकनंदी ने अंतरराष्ट्रीय वेबिनार से दिया दिव्य प्रबोधन  </title>
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		<pubDate>Tue, 06 Jan 2026 11:50:24 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आचार्य श्री कनकनंदी जी ने भिलुडा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में बताया कि ज्ञानार्जन के लिए विनयवान, विवेक सहित आत्मज्ञान से युक्त होना चाहिए। उन्होंने कहा आत्मज्ञान संयुक्त व्यक्ति हेय उपादेय का विचार करने वाला वस्तु स्वरूप का ज्ञान रखने वाला दूसरों को उपदेश दे सकता है। उन्होंने कहा कि संशय से [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>आचार्य श्री कनकनंदी जी ने भिलुडा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में बताया कि ज्ञानार्जन के लिए विनयवान, विवेक सहित आत्मज्ञान से युक्त होना चाहिए। उन्होंने कहा आत्मज्ञान संयुक्त व्यक्ति हेय उपादेय का विचार करने वाला वस्तु स्वरूप का ज्ञान रखने वाला दूसरों को उपदेश दे सकता है। उन्होंने कहा कि संशय से युक्त सत्य क्या असत्य क्या, नहीं जानने वाले की कोई भी प्रवृत्ति सफल नहीं होती। <span style="color: #ff0000">भिलुड़ा से पढ़िए, अभिषेक जैन लुहाड़िया की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong>भिलुड़ा ।</strong> आचार्य श्री कनकनंदी जी ने भिलुडा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में बताया कि ज्ञानार्जन के लिए विनयवान, विवेक सहित आत्मज्ञान से युक्त होना चाहिए। उन्होंने कहा आत्मज्ञान संयुक्त व्यक्ति हेय उपादेय का विचार करने वाला वस्तु स्वरूप का ज्ञान रखने वाला दूसरों को उपदेश दे सकता है। उन्होंने कहा कि संशय से युक्त सत्य क्या असत्य क्या, नहीं जानने वाले की कोई भी प्रवृत्ति सफल नहीं होती। अविवेकपूर्ण ज्ञान से धर्म को समझ नहीं सकते। सम्यक ज्ञान आत्मज्ञान के बिना स्वदोष को भी स्वीकार नहीं कर सकते। शांति प्राप्त करने के लिए स्वदोष को स्वीकार करना आवश्यक है। धर्म धार्मिक पुरुष के बिना नहीं रह सकता है। धार्मिक जन का अपमान करने वाला धर्म का अपमान करता है। समता धारी साधु का अपमान करने पर वह तो समता में रहते हैं कोई श्राप नहीं देते परंतु वह पुण्य लेकर चले जाते हैं। शांत वीतरागी साधु का अपमान करना सबसे बड़ा पाप है। सत्य से विपरीत बुद्धि होने से नारकी से भी महा पापी है। वह धर्म द्रोही धर्म का हिंसक है। धर्म के नाश होने पर सिद्धांत के को नष्ट होते देखकर बिना पूछे भी बोलना चाहिए।</p>
<p><strong> देव पर्याय में स्वर्ग के इंद्र भी भगवान नहीं बन सकते</strong></p>
<p>महाराज श्री ने कहा जिन पुरुष से धर्म की उत्पत्ति होती है धर्म की वृद्धि होती है वह धर्म का प्रचार प्रसार करते हैं ऐसे साधु का अपमान करना धर्म की हिंसा है। महाराज श्री ने कहा जैन धर्म अहिंसक है कायर नहीं दबू नहीं। धार्मिक लोगों का अनादर करके प्रसन्न होने वाले पापी है। धर्म करके, दान देकर उसका पश्चाताप करने से पुण्य क्षीण हो जाता है। बिस लोड थ्योरी डॉ. एमएम बजाज की है। इसमें सिद्ध किया गया है कि जहां बूचड़खाने होते हैं वहां भूकंप, अतिवृष्टि, अनावृष्टि, ज्वालामुखी, सुनामी आदि प्राकृतिक प्रकोप आते हैं। महाराज श्री ने कहा मानव ही आत्मा से परमात्मा बन सकते हैं। देव पर्याय में स्वर्ग के इंद्र भी भगवान नहीं बन सकते हैं। मानव ही महामानव बनकर पंचम गति को प्राप्त कर सकता है। देवपर्याय में उत्कृष्ट देव की 33 सागर की आयु होने पर भी साधु भी नहीं बन सकते ना ही सिद्ध पद प्राप्त कर सकते हैं भले वहां से सिद्ध शिला की दूरी बहुत कम है। विद्या प्राप्त करके वाद विवाद नहीं करना चाहिए। कुभाव के कारण सत्य तथ्य को नहीं जान सकते।</p>
<p><strong>ग्रंथ की पूर्णता अर्थ की पूर्णता के साथ स्वाध्याय करना चाहिए</strong></p>
<p>आचार्यश्री ने कहा कि विद्यार्थी का प्राचीन नाम विनय है। जो विनय पूर्वक आकर आचार्य के पास अध्ययन करते हैं वह उपाध्याय है। पहले श्रद्धा होनी चाहिए श्रद्धा के बिना सम्यक ज्ञान नहीं होगा। स्वाध्याय का विवेचन,समीक्षा, समन्वय, मंथन होना चाहिए। किसी भी विषय को व्यवस्थित क्रमबद्ध संपादन करना विधान है। अनुष्ठान का अर्थ सम्यक आचरण करना। शिष्य को स्नान आदि से पवित्र होकर विनय से युक्त होकर शरीर की चंचलता से रहित होकर ग्रंथ की पूर्णता अर्थ की पूर्णता के साथ स्वाध्याय करना चाहिए। जिससे श्रेय सुख प्राप्त होगा। बच्चों की चंचलता को गलत नहीं मानना चाहिए यह उनके विकास के लिए बहुत अच्छा है। मुनि श्री सुविज्ञ सागर जी ने आचार्य श्री द्वारा रचित कविता ‘क्या मैं हूं मानव, क्या मैं हूं तिर्यच, क्या मैं हूं नारकी, क्या मैं हूं देव इससे परे मैं हूं सच्चिदानंद’ से मंगलाचरण किया। यह जानकारी विजयलक्ष्मी जैन ने दी।</p>
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