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	<title>भट्टारक श्री रत्नकीर्ति जी &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<description>ताज़ा खबरे हिन्दी में</description>
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	<title>भट्टारक श्री रत्नकीर्ति जी &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>राजस्थान के जैन संत 15 आचार्य श्री चंद्रकीर्ति की रचनाओं में गुरु वंदना का प्रभाव: भट्टारक रत्नकीर्ति जी से दीक्षित थे आचार्य श्री चंद्रकीर्ति जी </title>
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		<pubDate>Wed, 12 Mar 2025 00:30:19 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[राजस्थान की धरती पर जैन संतों ने तत्समय जो हिन्दी साहित्य के माध्यम से धर्म प्रभावना, प्रभु भक्ति के साथ गुरु भक्ति का संदेश दिया है। उनमें से एक संत आचार्यश्री चंद्रकीर्ति जी ने अपने अधिकांश पद्यों में गुरु वंदना को अधिक प्राथमिकता दी है। उन्होंने गुरु के साथ तो राजस्थान और गुजरात में विहार [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>राजस्थान की धरती पर जैन संतों ने तत्समय जो हिन्दी साहित्य के माध्यम से धर्म प्रभावना, प्रभु भक्ति के साथ गुरु भक्ति का संदेश दिया है। उनमें से एक संत आचार्यश्री चंद्रकीर्ति जी ने अपने अधिकांश पद्यों में गुरु वंदना को अधिक प्राथमिकता दी है। उन्होंने गुरु के साथ तो राजस्थान और गुजरात में विहार किया ही बल्कि स्वयं भी अलग से वे इन प्रांतों में विहार कर अपनी तप, साधना और साहित्य सृजन में तल्लीन रहे।<span style="color: #ff0000"> जैन धर्म के राजस्थान के दिगंबर जैन संतों पर एक विशेष शृंखला में 15वीं कड़ी में श्रीफल जैन न्यूज के उप संपादक प्रीतम लखवाल का आचार्य श्री चंद्रकीर्ति जी के बारे में पढ़िए विशेष लेख…..</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> राजस्थान के जैन संतों के बारे में बहुत कुछ लिखा गया है। यहां हम आज आचार्य श्री चंद्रकीर्ति के बारे में जानते हैं। उन्होंने अपने गुरु भट्टारक रत्नकीर्ति जी से दीक्षा ली थी। भट्टारक श्री रत्नकीर्ति ने साहित्य निर्माण का जो वातावरण बनाया था तथा अपने शिष्य-प्रशिष्यों को इस ओर कार्य करने के लिए प्रोत्साहित किया था। इसी के फलस्वरूप ब्रह्म जयसागर, कुमुदचंद्रजी, चंद्रकीर्ति जी, संयमसागर जी, गणेश और धर्म सागर जैसे प्रसिद्ध संत साहित्य रचना की ओर प्रवृत्त हुए। आचार्यश्री चंद्रकीर्ति भट्टारक रत्नकीर्ति के प्रिय शिष्यों में से थे। ये मेधावी और योग्य शिष्य थे। अपने गुरु के हर कार्यों में सहयोग देते थे। चंद्रकीर्ति के गुजरात एवं राजस्थान प्रदेश मुख्य क्षेत्र थे। कभी-कभी ये अपने गुरु के साथ और कभी स्वतंत्र रूप से इन प्रदेशों में विहार करते थे। वैसे बारडोली, भड़ौच, डूंगरपुर, सागवाड़ा आदि नगर इनके साहित्य निर्माण के स्थान थे। अब तक इनकी सोलहकारण रास, जयकुमाराख्यान, चारित्र-चुनड़ी, चौरासी लाख जीवजोनि विनती रचनाओं के अतिरिक्त इनके कुछ हिन्दी पद भी उपलब्ध हैं।</p>
<p><strong>आचार्यश्री चंद्रकीर्ति के सोलहकारण रास रचना के बारे में</strong></p>
<p>यह कवि की लघु कृति है। इसमें पोड़षकारण व्रत का महात्म्य बताया गया है। 46 पद्यों वाले इस रास में राग-गौडो देशी, दूहा, राग देशाख, त्रोटक, चाल राग धन्यासी आदि विभिन्न छंदों का प्रयोग हुआ है। कवि ने रचनाकाल का उल्लेख नहीं किया है, लेकिन रचना स्थान भड़ौच का अवश्य प्रयोग किया गया है। भड़ौच में भगवान शांतिनाथ जी का मंदिर था। वहीं इस रचना का समाप्ति स्थान था। रास के अंत में कवि ने अपना अपने पूर्व गुरुओं का स्मरण किया है।</p>
<p><strong>जयसागर आख्यान को संवत 1655 में समाप्त किया</strong></p>
<p>जयसागर आख्यान को कवि ने संवत 1655 में समाप्त किया था। इसे यदि अंतिम रचना भी माना जाए तो उसका संवत 1660 तक का निश्चित होता है। इसके अलावा कवि ने अपने गुरु के रूप में केवल रत्नकीर्ति का ही उल्लेख किया है। जबकि 1660 तक तो रत्नकीर्ति के बाद भट्टारक कुमुदचंद्रजी हो गए थे। इसलिए यह भी तय सा है कि कवि ने रत्नकीर्ति से ही दीक्षा ली थी और उनकी समाधिमरण के बाद वे संघ से अलग रहने लगे थे। ऐसे समय में कवि का समय 1600 से 1660 तक का माना जाए तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए।</p>
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		<title>राजस्थान के जैन संत 14 ब्रह्म श्री जयसागर जी ने गुरु वंदना को साहित्य का आधार बनाया: राजस्थान के जैन संतों में है अनुपम स्थान </title>
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		<pubDate>Tue, 11 Mar 2025 00:30:10 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[राजस्थान के जैन संतों की श्रंखला में अनेकोनेक संत हुए, लेकिन अपने गुरु के प्रति निष्ठावान शिष्य बिरले ही नजर आए। जिन्होंने जन साधारण के लिए साहित्य तो रचा,लेकिन अपने गुरु की वंदना के पदों को अधिक महत्ता प्रदान की। ऐसे ही जैन संत जिन्होंने राजस्थान में साहित्य के क्षेत्र में कीर्ति स्तंभ स्थापित किया [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>राजस्थान के जैन संतों की श्रंखला में अनेकोनेक संत हुए, लेकिन अपने गुरु के प्रति निष्ठावान शिष्य बिरले ही नजर आए। जिन्होंने जन साधारण के लिए साहित्य तो रचा,लेकिन अपने गुरु की वंदना के पदों को अधिक महत्ता प्रदान की। ऐसे ही जैन संत जिन्होंने राजस्थान में साहित्य के क्षेत्र में कीर्ति स्तंभ स्थापित किया है। वह हैं ब्रह्मचारी श्री जयसागर जी। <span style="color: #ff0000">जैन धर्म के राजस्थान के दिगंबर जैन संतों पर एक विशेष शृंखला में 14वीं कड़ी में श्रीफल जैन न्यूज के उप संपादक प्रीतम लखवाल का ब्रह्मचारी श्री जयसागर जी के बारे में पढ़िए विशेष लेख…..</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> जयसागर भट्टारक रत्नकीर्ति के प्रमुख शिष्यों में से थे। ये ब्रह्मचारी थे और जीवन भर इसी पद पर रहते हुए अपना आत्म विकास करते रहे थे। भट्टारक रत्नकीर्ति जिनका परिचय पूर्व में दिया जा चुका है। साहित्य के अनन्य उपासक थे। इसलिए जयसागर भी अपने गुरु के सामन ही साहित्य आराधना में लग गए। उस समय हिन्दी का विकास हो रहा था। विद्वानों और जन साधारण की रुचि हिन्दी ग्रंथों को पढ़ने में अधिक हो रही थी। इसलिए जय सागर जी ने अपना क्षेत्र हिन्दी रचनाओं तक ही सीमित रखा। जयसागर जी ने अपनी सभी रचनाओं में भट्टारक रत्नकीर्ति का उल्लेख किया है।</p>
<p><strong>गीतों में कवि ने रत्नकीर्ति के जीवन की प्रमुख घटनाओं को छंदोबद्ध</strong></p>
<p>रत्नकीर्ति के बाद होने वाले भट्टारक कुमुदचंद्र का कहीं भी नामोल्लेख नहीं किया है। इससे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि इनका भट्टारक रत्नकीर्ति के काल में ही समाधिमरण हो गया था। रत्नकीर्ति संवत 1656 तक भट्टारक रहे। इसलिए ब्रह्मचारी श्री जयसागर का समय संवत 1580 से 1655 तक का माना जा सकता है। घोघा नगर इनका प्रमुख साहित्यिक केंद्र था। ब्रह्मचारी श्री जय सागर की अब तक जितनी रचनाओं की खोज हो सकी है। उनमें नेमिनाथ गीत, जसोधर गीत, चुनड़ी गीत, पंचकल्याणक गीत, संकट हर पार्श्वजिन गीत, भट्टारक रत्नकीर्ति पूजा गीत, क्षेत्रपाल गीत, संघपति मल्लिदास नी गीत, विभिन्न पद एवं गीत तथा शीतलनाथ नी विनती शामिल हैं। जयसागर जी लघु कृतियां लिखने में विशेष रुचि रखते थे। इनके गुरु रत्नकीर्ति भी रघु रचनाओं को ही अधिक पसंद करते थे। इसलिए इन्होंने भी उसी मार्ग का अनुसरण किया। ब्रह्म श्री जयसागर रत्नकीर्ति के कट्टर समर्थक थे। उनके प्रिय शिष्य तो थे ही, लेकिन एक रूप में उनके प्रचारक भी थे। इन्होंने रत्नकीर्ति के जीवन के बारे में कई गीत लिखे और उनका जनता में प्रचार किया। रत्नकीर्ति जहां भी कहीं जाते उनके अनुयायी जयसागर द्वारा लिखे गीतों को गाते। इसके अलावा इन गीतों में कवि ने रत्नकीर्ति के जीवन की प्रमुख घटनाओं को छंदोबद्ध कर दिया है। यह सभी गीत सरल भाषा में लिखे हुए हैं, जो गुजराती से बहुत दूर एवचं राजस्थानी के अधिक निकट हैं। इस प्रकार जय सागर जी ने जीवन पर्यन्त साहित्य के विकास में जो अपना अपूर्व योगदान दिया है। वह हमेशा याद रखा जाएगा।</p>
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		<title>राजस्थान के जैन संत 11 आध्यात्म और भक्तिपरक पदों के रचियता भट्टारक श्री रत्नकीर्ति जी:  रचनाएं भाषा, भाव और शैली सभी दृष्टियों से श्रेष्ठ </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 08 Mar 2025 00:30:05 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[राजस्थान के जैन संतों ने जहां अपनी साधना से जनमानस को धर्म और आध्यात्म की ओर प्रेरित किया। वहीं मुनियों, साधुओं ने हिन्दी साहित्य में काव्य और भक्ति पदों के जरिये भी धर्म प्रभावना की अलख जगाई। जैन धर्म के राजस्थान के दिगंबर जैन संतों पर एक विशेष शृंखला में 11वीं कड़ी में श्रीफल जैन [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>राजस्थान के जैन संतों ने जहां अपनी साधना से जनमानस को धर्म और आध्यात्म की ओर प्रेरित किया। वहीं मुनियों, साधुओं ने हिन्दी साहित्य में काव्य और भक्ति पदों के जरिये भी धर्म प्रभावना की अलख जगाई। <span style="color: #ff0000">जैन धर्म के राजस्थान के दिगंबर जैन संतों पर एक विशेष शृंखला में 11वीं कड़ी में श्रीफल जैन न्यूज के उप संपादक प्रीतम लखवाल का भट्टारक श्री रत्नकीर्ति जी के बारे में पढ़िए विशेष लेख…..</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> भट्टारक श्री रत्नकीर्ति दिगंबर जैन कवियों में प्रथम कवि हैं। जिन्होंने इतनी अधिक संख्या में हिन्दी पद लिखे हैं। ऐसा मालूम होता है कि उस समय कबीरदास, सूरदास और मीरा के पदों का देश में पर्याप्त प्रचार हो गया था और उन्हें अत्यधिक चाव से गाया जाता था। इन पदों के कारण देश में भगवत भक्ति की ओर लोगों का स्वतः ही झुकाव हो रहा था। ऐसे समय में जैन साहित्य में इस कमी को पूरी करने के लिए भट्टारक श्री रत्नकीर्तिजी ने इस दिशा में प्रयास किया। आध्यात्म और भक्तिपरक पदों के साथ-साथ विरहात्मक पद भी लिखे और पाठकों के समक्ष राजुल के जीवन को एक नए रूप में प्रस्तुत किया। ऐसा लगता है कि कवि राजुल एवं नेमिनाथ की भक्ति में अधिक रुचि रखते हैं। इसलिए उन्होंने अपनी कृतियां इन्हीं दो पर आधारित करके लिखीं।</p>
<p>नेमिनाथ गीत और नेमिनाथ बारहमासा के अतिरिक्त अपने हिन्दी पदों में राजुल नेमि के संबंध को अत्यधिक भावपूर्ण भाषा में प्रस्तुत किया। सर्वप्रथम राजुल को इन्होंने नारी के रूप में प्रस्तुत किया। विवाह होने के पूर्व की नारी की दशा और तोरणद्वार से लौट जाने पर नारी ह्दय को खोलकर अपने पदों में रख दिया। भट्टारक श्री रत्नकीर्ति जी की सभी रचनाएं भाषा, भाव और शैली सभी दृष्टियों से श्रेष्ठ हैं। कवि हिन्दी के जबरदस्त प्रचारक थे। संस्कृत के उत्कृष्ट विद्वान होने पर भी उन्होंने हिन्दी को अधिक प्रश्रय दिया। उन्होंने राजस्थान के अलावा गुजरात में भी हिन्दी रचनाएं लिखीं। भट्टारकश्री रत्नकीर्ति के सभी शिष्य और प्रशिष्यों ने इस भाषा में लेखन जारी रखा। हिन्दी साहित्य को समृद्ध बनाने में योगदान दिया।</p>
<p><strong>भट्टारक श्री रत्नकीर्ति जी का जन्म और उनके कार्य</strong></p>
<p>14वीं शताब्दी में जब भट्टारक बांगड़ प्रदेश में धर्म और साहित्य प्रचार कर रहे थे। उस समय वह लहर चरम पर थी। नए-नए मंदिरों का निर्माण और प्रतिष्ठा विधानों की भरमार थी। भट्टारकों, मुनियों, साधुओं, ब्रह्मचारियों और स्त्री साधुओं का विहार होता रहता था। उनके संदेश और उपदेश जन-जन को पावन किया करते थे। वे जहां भी जाते वहां की जनता पलक-पावड़े बिछा देती। उसी समय घोघानगर में हूंबड जाति के श्रेष्ठी देवीदास के यहां बालक का जन्म हुआ। माता सहजलदे विविध कलाओं से युक्त बालक को पाकर बहुत खुश हो गई। जन्मोत्सव में नगर में कई प्रकार के उत्सव किए गए।</p>
<p>बड़े होने पर वह विद्याध्ययन करने लगा। उसने बहुत कम समय में प्राकृत और संस्कृत ग्रंथों का गहरा अध्ययन कर लिया। एक दिन अचानक भट्टारकश्री अभयनंदी से साक्षात्कार हो गया। वे उसे देखते ही प्रसन्न हुए और उसकी विद्धत्ता और वाक चातुर्यता से प्रभावित होकर उसे अपना शिष्य बना लिया। अभयनंदी ने पहले उसे सिद्धांत, काव्य, व्याकरण, ज्योतिष एवं आयुर्वेद आदि विषयों के ग्रंथों का अध्ययन करवाया। वह व्युत्पन्नमति था इसलिए शीघ्र ही उसने उन पर अधिकार पा लिया। अध्ययन समाप्त होने के बाद अभयनंदी ने उसे अपना पट्ट शिष्य घोषित कर दिया। 32 लक्षण और 72 कलाओं से संपन्न विद्वान युवक को कौन अपना शिष्य बनाना नहीं चाहेगा। संवत 1643 में एक विशेष समारोह में उसका महाभिषेक कर दिया गया और उसका नाम रत्नकीर्ति रखा गया। इस पद पर वे संवत 1656 तक रहे।</p>
<p><strong>भट्टारक श्री रत्नकीर्ति जी का शिष्य परिवार</strong></p>
<p>भट्टारक श्री रत्नकीर्ति के कितने ही शिष्य थे। वे सभी विद्वान और साहित्य प्र्रेमी थे। इनके शिष्यों की कितनी ही कविताएं हैं। इसमें कुमुदचंद, गणेश, जय सागर, राघव के नाम उल्लेखनीय है।</p>
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