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	<title>भट्टारक जिनचंद्रजी &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<title>भट्टारक जिनचंद्रजी &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>राजस्थान के जैन संत 23 भट्टारक प्रभाचंद्र साहित्य और पुरातत्व के प्रति जनसाधारण में आकर्षण पैदा किया: राजस्थान में कितने ही मंदिरों में इनके द्वारा प्रतिष्ठित मूर्तियां मिलती हैं </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 20 Mar 2025 00:30:32 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[राजस्थान के संत]]></category>
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					<description><![CDATA[राजस्थान के जैन संत के परिचय में हमें कई ऐसे संतों के बारे में जानने का मौका मिलता है, जिनकी अद्भुत बुद्धिकुशलता के सामने सभी जन नत्मस्तक हुए। भट्टारक प्रभाचंद्र भी ऐसे ही संत थे। जिन्होंने साहित्य के जीर्णोद्धार से लेकर मंदिरों के संरक्षण के प्रति जैन समाज में जनजागरण का बीड़ा उठाया था। जैन [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>राजस्थान के जैन संत के परिचय में हमें कई ऐसे संतों के बारे में जानने का मौका मिलता है, जिनकी अद्भुत बुद्धिकुशलता के सामने सभी जन नत्मस्तक हुए। भट्टारक प्रभाचंद्र भी ऐसे ही संत थे। जिन्होंने साहित्य के जीर्णोद्धार से लेकर मंदिरों के संरक्षण के प्रति जैन समाज में जनजागरण का बीड़ा उठाया था। जैन धर्म के राजस्थान के दिगंबर जैन संतों पर एक विशेष शृंखला में 23वीं कड़ी में <span style="color: #ff0000">श्रीफल जैन न्यूज के उप संपादक प्रीतम लखवाल का भट्टारक प्रभाचंद्र के बारे में पढ़िए विशेष लेख…..</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> प्रभाचंद्र के नाम से चार प्रसिद्ध भट्टारक हुए। प्रथम भट्टारक प्रभाचंद्र बालचंद के शिष्य थे। जो सेनगण के भट्टारक थे तथा 12वीं शताब्दी में हुए थे। दूसरे प्रभाचंद्र भट्टारक रत्नकीर्ति के शिष्य थे, जे गुजारत की बलाल्कारगण उत्तर शाखा के भट्टारक बने थे। ये चमत्कारिक भट्टारक थे और एक बार इन्होंने अमावस्या को पूर्णिमा कर दिखाई थी। देहली में राघो चेतन में जो विवाद हुआ था। उसमें इन्होंने विजय प्राप्त की थी। अपनी मंत्र शक्ति के कारण ये पालकी सहित आकाश में उड़ गए थे। इनकी मंत्र शक्ति के प्रभाव से बादशाह फिरोजशाह की मलिका इतनी प्रभावित हुई कि उन्हें राजमहल में जाकर दर्शन देने पड़े। तीसरे प्रभाचंद्र भट्टारक जिनचंद्र के शिष्य थे और चौथे प्रभाचंद्र भट्टारक ज्ञानभूषण के शिष्य थे। यहां भट्टारक जिनचंद्र के शिष्य प्रभाचंद्र के जीवन पर प्रकाश डाला जाएगा। एक भट्टारक पट्टावली के अनुसार प्रभाचंद्र खंडेलवाल जाति के श्रावक थे और वेद इनका गौत्र था। ये 15 वर्ष तक गृहस्थ रहे।</p>
<p>एक बार भट्टारक जिनचंद्र विहार कर रहे थे कि उनकी दृष्टि प्रभाचंद्र पर पड़ी। इनकी अपूर्व सूझबूझ एवं गंभीर ज्ञान को देखकर जिनचंद्र ने इन्हें अपना शिष्य बना लिया। यह कोई संवत 1551 की घटना होगी। 20 वर्ष तक इन्हें अपने पास रखकर खूब विद्याध्ययन करवाया। अपने से भी अधिक शास्त्रों का ज्ञाता तथा वाद-विवाद में पटु बना दिया।</p>
<p><strong>संवत 1571 में दिल्ली में हुआ पट्टाभिषेक </strong></p>
<p>संवत 1571 की फाल्गुन कृष्ण 2 को इनका दिल्ली में पट्टाभिषेक हुआ। उस समय ये पूर्ण युवा थे और अपनी अलौकिक वाक शक्ति एवं साधु स्वभाव से बरबस ह्रदय को स्वतः ही आकृष्ट कर लेते थे। एक भट्टारक पट्टावली के अनुसार ये 25 वर्ष तक भट्टारक रहे। वीपी जोहरापुरकर ने इन्हें केवल 9 वर्ष तक भट्टारक पद पर रहना लिखा है। भट्टारक बनने के बाद इन्होंने अपनी गद्दी को दिल्ली से चित्तौड़ राजस्थान में स्थानांतरित कर ली। इस प्रकार भट्टारक सकलकीर्ति की शिष्य परंपरा के सामने जा डटे। इन्होंने अपने समय में ही मंडलाचार्यों की नियुक्ति की। इनमें धर्मचंद्र को मंडलाचार्य बनने का सौभाग्य मिला। संवत 1593 में मंडलाचार्य धर्मचंद्र द्वारा प्रतिष्ठित कितनी ही मूर्तियां मिलती है। इन्होंने आवां नगर में अपने तीन गुरुओं की निषेधिकाएं स्थापित की। इससे ज्ञात होता है कि प्रभाचंद्र का इसके पूर्व समाधिमरण हो चुका था। प्रभाचंद्र अपने समय के प्रसिद्ध और समर्थ भट्टारक थे।</p>
<p><strong>प्रभाचंद्र जी का विहार, साहित्य लेखन और प्रतिष्ठाएं </strong></p>
<p>भट्टारक प्रभाचंद्र ने सारे राजस्थान में विहार किया। शास्त्र भंडारों का अवलोकन किया। उनमें नई-नई प्रतियां लिखवाकर प्रतिष्ठापित की। राजस्थान के शास्त्र भंडारों में इनके समय लिखी गई कई प्रतियां संग्रहीत है और इनका यशोगान गाती हैं। संवत 1575 की मार्गशीर्ष शुक्ल 4 को बाई पार्वती ने पुष्पदंत कृत जसहर चरित्र की प्रति लिखवाई और भट्टारक प्रभाचंद्र को भेंट स्वरूप दी। संवत 1579 के मृगशिर मास में इनका टोंक नगर में विहार हुआ। चारों ओर आनंद और उत्साह का वातावरण छा गया। इसी विहार की स्मृति में पंडित नरसेन कृत सिद्धचक्र कथा की प्रतिलिपि खंडेलवाल जाति में उत्पन्न टोंग्या गौत्र वाले साह धरमसी एवं उनकी भार्या खातू ने अपने पुत्र पौत्रादि सहित करवाई और उसे बाई पदमसिरी को स्वाध्याय के लिए भेंट दी। भट्टारक प्रभाचंद्र ने प्रतिष्ठा कार्य में भी पूरी दिलचस्पी ली। भट्टारक गादी पर बैठने के बाद कितनी ही प्रतिष्ठाओं का नेतृत्व किया। जनता को मंदिर निर्माण की ओर आकर्षित किया।</p>
<p>संवत 1571 की ज्येष्ठ शुक्ल 2 को षोडशकारण यंत्र और दशलक्षण यंत्र की स्थापना की। इसके दो साल बाद संवत 1573 की फाल्गुन कृष्ण 3 को एक दशलक्षण यंत्र स्थापित किया। संवत 1578 की फाल्गुन शुक्ल 9 को तीन चौबीसी की मूर्ति प्रतिष्ठा करवाई। इसी तरह 1583 में भी चौबीसी की मूर्ति की प्रतिष्ठा इन्होंने करवाई। राजस्थान में कितने ही मंदिरों में इनके द्वारा प्रतिष्ठित मूर्तियां मिलती हैं। प्रभाचंद्र ने राजस्थान साहित्य और पुरातत्व के प्रति जो जनसाधारण में आकर्षण पैदा किया था। वह इतिहास में सदा चिर स्थायी रहेगा।</p>
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		<title>राजस्थान के जैन संत 22 भट्टारक श्री जिनचंद्र जी साहित्य और संस्कृति का करते थे प्रचार: ऐतिहासिक लेख में है जिनचंद्र की का यशोगान </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 19 Mar 2025 00:30:50 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[राजस्थान के संत]]></category>
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					<description><![CDATA[राजस्थान के जैन संत श्रंखला में श्रीफल जैन न्यूज की ओर से आज भट्टारक जिनचंद्र जी को परिचित करवा रहे हैं। भट्टारक जिनचंद्रजी राजस्थान, उत्तरप्रदेश, पंजाब, देहली प्रदेश विहार करते थे। जनता को वास्तविक धर्म का उपदेश देते थे। प्राचीन ग्रंथों की नई-नई प्रतियां लिखवाकर मंदिरों में विराजमान करवाते थे। नए-नए ग्रंथों का स्वयं निर्माण [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>राजस्थान के जैन संत श्रंखला में श्रीफल जैन न्यूज की ओर से आज भट्टारक जिनचंद्र जी को परिचित करवा रहे हैं। भट्टारक जिनचंद्रजी राजस्थान, उत्तरप्रदेश, पंजाब, देहली प्रदेश विहार करते थे। जनता को वास्तविक धर्म का उपदेश देते थे। प्राचीन ग्रंथों की नई-नई प्रतियां लिखवाकर मंदिरों में विराजमान करवाते थे। नए-नए ग्रंथों का स्वयं निर्माण करते तथा दूसरों को प्रेरित करते। मंदिरों का जीर्णोद्धार तथा जगह-जगह नई-नई प्रतिष्ठाएं करवाकर जैन धर्म एवं संस्कृति का प्रचार करते थे। जैन धर्म के राजस्थान के दिगंबर जैन संतों पर एक विशेष शृंखला में 22वीं कड़ी में <span style="color: #ff0000">श्रीफल जैन न्यूज के उप संपादक प्रीतम लखवाल का भट्टारक श्री जिनचंद्र के बारे में पढ़िए विशेष लेख…..</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> भट्टारक जिनचंद्र जी 16वीं शताब्दी के प्रसिद्ध भट्टारक एवं जैन संत थे। भारत की राजधानी दिल्ली में भट्टारकों की प्रतिष्ठा बढ़ाने में इनका प्रमुख योगदान रहा था। यद्यपि दिल्ली में ही इनकी भट्टारक गादी थी, लेकिन वहां से ही ये पूरे राजस्थान में भ्रमण करते और साहित्य और संस्कृति का प्रचार करते। इनके गुरु का नाम भट्टारक शुभचंद्रजी था और उन्हीं की समाधिमरण के बाद संवत 1507 की ज्येष्ठ कृष्ण पंचमी को इनका पट्टाभिषेक हुआ। एक भट्टारक पट्टावली के अनुसार इन्होंने 12 वर्ष की उम्र में ही घर-बार छोड़ दिया था और भट्टारक शुभचंद्र जी के शिष्य बन गए। 15 वर्ष तक इन्होंने शास्त्रों का खूब अध्ययन किया। भाषण देने और वाद-विवाद करने की कला सीखी तथा 27 वें वर्ष में इन्हें भट्टारक पद पर आरूढ़ कर दिया गया। भट्टारक जिनचंद्र जी 64 वर्ष तक इस महत्वपूर्ण पद पर आसीन रहे। इतने लंब समय तक भट्टारक पद पर रहना बहुत कम संतों को मिल सका। ये जाति से बघेरवाल श्रावक थे। जिनचंद्र जी राजस्थान उत्तरप्रदेश, पंजाब, देहली प्रदेश विहार करते। जनता को वास्तविक धर्म का उपदेश देते। प्राचीन ग्रंथों की नई-नई प्रतियां लिखवाकर मंदिरों में विराजमान करवाते। नए-नए ग्रंथों का स्वयं निर्माण करते तथा दूसरों को भी इस ओर प्रेरित करते। पुराने मंदिरों का जीर्णोद्धार करवाते तथा जगह-जगह पर नई-नई प्र्रतिष्ठाएं करवाकर जैन धर्म एवं संस्कृति का प्रचार करते। आज राजस्थान के प्रत्येक दिगंबर जैन मंदिरों में इनके द्वारा प्रतिष्ठित एक-दो मूर्तियां अवश्य मिलेंगी। संवत 1648 में जीवराज पापड़ीवाल ने जो बड़ी प्रतिष्ठा करवाई थी। वह सब इनके द्वारा ही संपन्न हुई थी। उस प्रतिष्ठा में सैकड़ों ही नहीं हजारों मूर्तियां प्रतिष्ठापित करवाकर क राजस्थान के अधिकांश मंदिरों में विराजमान करवाई गई थीं। आवां टोंक राजस्थान में एक मील पश्चिम की ओर एक छोटी सी पहाड़ी पर नसिया है। इसमें भट्टारक शुभचंद्र, जिनचंद्र और प्रभाचंद्र जी की निषेधकाएं स्थापित हैं। ये तीनों निषेधकाएं संवत 1593 ज्येष्ठ सुदी तृतीया सोमवार के दिन भट्टारक प्रभाचंद्र के शिष्य मंडलाचार्य धर्मचंद्र ने साह कालू एवं उनके चार पुत्र और पोत्रों द्वारा स्थापित करवाई थी। इसी समय आवां में एक बड़ी प्रतिष्ठा भी हुई थी। जिसका ऐतिहासिक लेख वहीं के शांतिनाथ मंदिर में लगा हुआ है। लेख संस्कृत में है और उसमें भट्टारक जिनचंद्र जी का यशोगान है।</p>
<p><strong>भट्टारक जिनचंद्र जी साहित्य में योगदान</strong></p>
<p>जिनचंद्र का प्राचीन ग्रंथों का नवीनीकरण की ओर विशेष ध्यान था। इसलिए इनके द्वारा लिखवाई गई कितनी ही हस्तलिखित प्रतियां जैन शास्त्र भंडारों में उपलब्ध होती हैं। संवत 1512 की आषाढ़ कृष्ण 12 को नेमिनाथ चरित की एक प्रति लिखी गई थी। जिसे इन्हें घोघा बंदरगाह में नयनंदी मुनिश्री ने समर्पित की थी। संवत 1515 में नैणवा नगर में इनके शिष्य अनंतकीर्ति द्वारा नरसेनदेव की सिद्धचक्रकथा अपभ्रंश की प्रतिलिपि श्रावक नारायण के पठनार्थ करवाई। इसी तरह संवत 1521 में ग्वालियर में परमचरित्र की प्रतिलिपि करवाकर नेत्रनंदी मुनि को अर्पण की गई।</p>
<p><strong>साहित्य रचना और जिनचंद्रजी के शिष्य </strong></p>
<p>संवत 1558 की श्रावण शुक्ल 12 को इनकी आम्नाय में ग्वालियर में महाराज मानसिंह के शासन काल में नागकुमार चरित की प्रति लिखवाई गई। इसकी प्रति को संवत 1516 में झुझुनु में साह पार्श्व के पुत्रों ने श्रुत पंचमी उद्यापन पर लिखवाई थी। संवत 1517 में झुझुनु में ही तिलोयपणति की प्रति लिखवाई गई थी। पंडित मेधावी इनका एक प्रमुख शिष्य था, जो साहित्य रचना में विशेष रुचि रखता था। इन्होंने नागौर में धर्म संग्रह श्रावकाचार की संवत 1541 में रचना समाप्त की थी। भट्टारक जिनचंद्र के शिष्यों में रत्नकीर्ति, सिंहकीर्ति, प्रभाचंद्र, जगतकीर्ति, चारूकीर्ति, जयकीर्ति, भीमसेन, मेधावी के नाम उल्लेखनीय है। रत्नकीर्ति ने संवत 1572 में नागौर में भट्टारक गादी स्थापित की तथा सिंह कीर्ति ने अटेर में स्वतंत्र भट्टारक गादी की स्थापना की। इस प्रकार भट्टारक जिनचंद्र ने अपने समय में साहित्य एवं पुरातत्व की जो सेवा की थी। वह सदा ही स्वर्णाक्षरों में लिपिबद्ध रहेगी।</p>
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