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	<title>भगवान श्रेयांसनाथ जी &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<description>ताज़ा खबरे हिन्दी में</description>
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	<title>भगवान श्रेयांसनाथ जी &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>11वें तीर्थंकर भगवान श्रेयांसनाथ जी का जन्म एवं तप कल्याणक 13 फरवरी को : तिथि के अनुसार फाल्गुन कृष्ण एकादशी को मनाया जाता है </title>
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		<pubDate>Fri, 13 Feb 2026 09:34:15 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जैन धर्म के 11वें तीर्थंकर भगवान श्रेयांसनाथ जी का जन्म एवं तप कल्याणक इस बार 13 फरवरी को मनाया जा रहा है। जैन पंचांग में तिथि फाल्गुन कृष्ण एकादशी के दिन दिगंबर जैन मंदिरों में भगवान का जन्म एवं तप कल्याणक महोत्सव के मंगल अवसर पर सकल जैन समाज की ओर से शांतिधारा, अभिषेक, अर्घ्य [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>जैन धर्म के 11वें तीर्थंकर भगवान श्रेयांसनाथ जी का जन्म एवं तप कल्याणक इस बार 13 फरवरी को मनाया जा रहा है। जैन पंचांग में तिथि फाल्गुन कृष्ण एकादशी के दिन दिगंबर जैन मंदिरों में भगवान का जन्म एवं तप कल्याणक महोत्सव के मंगल अवसर पर सकल जैन समाज की ओर से शांतिधारा, अभिषेक, अर्घ्य समर्पण, पूजन सहित अन्य धार्मिक क्रियाएं की जाएंगी। इसमें बड़ी संख्या में समाजजन एकत्रित होकर भगवान की आराधना में लीन रहेंगे। <span style="color: #ff0000">श्रीफल जैन न्यूज की विशेष शृंखला में आज पढ़िए, उपसंपादक प्रीतम लखवाल की संकलित और संपादित प्रस्तुति&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> जैन धर्म के 11वें तीर्थंकर भगवान श्रेयांसनाथ जी का जन्म एवं तप कल्याणक इस बार 13 फरवरी को मनाया जा रहा है। जैन पंचांग में तिथि फाल्गुन कृष्ण एकादशी के दिन दिगंबर जैन मंदिरों में भगवान का जन्म एवं तप कल्याणक महोत्सव के मंगल अवसर पर सकल जैन समाज की ओर से शांतिधारा, अभिषेक, अर्घ्य समर्पण, पूजन सहित अन्य धार्मिक क्रियाएं की जाएंगी। इसमें बड़ी संख्या में समाजजन एकत्रित होकर भगवान की आराधना में लीन रहेंगे। जैन धर्म के ग्रंथों में वर्णित जानकारी के अनुसार भगवान श्रेयांसनाथ वर्तमान युग के ग्यारहवें जैन तीर्थंकर है। जैन मान्यताओं के अनुसार वे सिद्ध हुए थे। एक ऐसी मुक्त आत्मा, जिसने अपने सभी कर्मों का नाश कर दिया था। भगवान श्रेयांसनाथ का जन्म इक्ष्वाकु वंश में सारनाथ के निकट सिंहपुरी में राजा विष्णु और रानी विष्णु के घर हुआ था। उनका जन्म भारतीय पंचांग के फाल्गुन कृष्ण माह के 11वें दिन हुआ था।</p>
<p><strong> श्रेयांसनाथ की शिक्षाओं में निर्जरा, यानी कर्मों के निर्वहन पर जोर </strong></p>
<p>श्रेयांसनाथ की देशना ने कई लोगों को दीक्षा लेने और केवल-ज्ञान और मोक्ष (मुक्ति) प्राप्त करने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने कई साधुओं, साध्वियों, श्रावकों और श्राविकाओं के साथ सम्मेद शिखरजी पर्वत से निर्वाण प्राप्त किया। श्रेयांसनाथ की शिक्षाओं में निर्जरा, यानी कर्मों के निर्वहन पर जोर दिया गया। उन्होंने समझाया कि कर्म संचय और निर्वहन के चरणों में होते हैं, जिनमें निर्जरा निर्वहन का चरण है। उन्होंने अकाम निर्जरा (बिना उद्देश्य के निर्वहन) और सकाम निर्जरा (उद्देश्य सहित निर्वहन) में अंतर बताया। आत्म-साक्षात्कार प्राप्त व्यक्ति के लिए सकाम निर्जरा यह सुनिश्चित करता है कि कोई नया कर्म संचय न हो, क्योंकि वे ज्ञाता और द्रष्टा होने की अपनी जागरूकता में सतर्क रहते हैं। श्रेयंसनाथ ने सकाम निर्जरा प्राप्त करने में तपस्या के महत्व पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने तपस्या को दो प्रकारों में वर्गीकृत किया। बाह्य तप (बाह्य तपस्या) और अभ्यंतर तप (आंतरिक तपस्या)।</p>
<p><strong>बाह्या तापा-</strong></p>
<p>बाह्य तप के छह प्रकार इस प्रकार हैं-</p>
<p>अनशन (उपवास)</p>
<p>कम खाना (उनोडारी)</p>
<p>वृत्ति संकल्प (इच्छाओं को सीमित करना)</p>
<p>रस त्याग (स्वाद से परहेज करना)</p>
<p>कायोत्सर्ग (ध्यान)</p>
<p>सानलिंटा (विनम्रता)</p>
<p>अभ्यंतर तप</p>
<p><strong>अभ्यंतर तप के छह प्रकार इस प्रकार हैं-</strong></p>
<p>प्रायश्चित (पश्चाताप)</p>
<p>वैयवच (संतों की सेवा)</p>
<p>स्वाध्याय (स्वयं का अध्ययन)</p>
<p>विनय (विनम्रता)</p>
<p>व्युत्सर्ग (त्याग)</p>
<p>ध्यान (मेडिटेशन)</p>
<p>अभ्यंतर तप के माध्यम से सच्चे कर्मों का निवारण होता है। प्रायश्चित जैसी साधनाएं पापों को धोने में सहायक होती हैं। साथ ही समभाव बनाए रखना और दूसरों को निर्दाेष समझना मोक्ष प्राप्ति में सहायक होता है।</p>
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		<title>भगवान श्रेयांसनाथ जी का गर्भ कल्याणक 18 मई को: तिथि के अनुसार ज्येष्ठ कृष्ण षष्ठी के दिन आता है गर्भ कल्याणक  </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 17 May 2025 14:01:06 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जैन धर्म के 11वें तीर्थंकर भगवान श्रेयांसनाथ का गर्भ कल्याणक इस वर्ष 18 मई को आ रहा है। इस दिन भगवान के मंदिरों में विशेष पूजन, अभिषेक तथा शांतिधारा आदि के कार्यक्रम किए जाएंगे। भगवान श्रेयांसनाथ का गर्भ कल्याण तिथि के अनुसार ज्येष्ठ कृष्ण षष्ठी के दिन आता है। इस दिन को लेकर जैन समाज [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>जैन धर्म के 11वें तीर्थंकर भगवान श्रेयांसनाथ का गर्भ कल्याणक इस वर्ष 18 मई को आ रहा है। इस दिन भगवान के मंदिरों में विशेष पूजन, अभिषेक तथा शांतिधारा आदि के कार्यक्रम किए जाएंगे। भगवान श्रेयांसनाथ का गर्भ कल्याण तिथि के अनुसार ज्येष्ठ कृष्ण षष्ठी के दिन आता है। इस दिन को लेकर जैन समाज में उत्साह का माहौल है। <span style="color: #ff0000">श्रीफल जैन न्यूज की विशेष श्रृंखला के तहत आज पढ़िए, उपसंपादक प्रीतम लखवाल की यह प्रस्तुति&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> जैन धर्म के 11वें तीर्थंकर भगवान श्रेयांसनाथ का गर्भ कल्याणक इस वर्ष 18 मई को आ रहा है। इस दिन भगवान के मंदिरों में विशेष पूजन, अभिषेक तथा शांतिधारा आदि के कार्यक्रम किए जाएंगे। पुराणों के अनुसार ग्यारहवें तीर्थंकर जंबूद्वीप के भरत क्षेत्र में सिंहपुर नगर के इक्ष्वाकुवंशी राजा विष्णु और रानी नंदा के पुत्र थे। ये ज्येष्ठ कृष्ण षष्ठी श्रवण नक्षत्र में प्रातःकाल रानी नंदा के गर्भ में आए। इस अवसर पर सकल संसार में सुखद अनुभूति हुई। गर्भ में आने के बाद फाल्गुन कृष्ण एकादशी के दिन विष्णुयोग में इनका जन्म हुआ। जन्म के समय रोगी निरोग हो गए थे। चारों निकाय के देवों ने आकर इनका जन्माभिषेक किया था। सौधर्मेंद्र ने जन्माभिषेक के बाद आभूषण आदि पहनाकर इनका श्रेयांस नाम रखा था। इनका जन्म शीतलनाथ के मोक्ष जाने के बाद सौ सागर, छियासठ लाख और छब्बीस हजार वर्ष कम एक करोड़ सागर प्रमाण अंतराल बीत जाने पर हुआ था। इनकी आयु चौरासी लाख वर्ष की थी। शरीर सोने की कांति के समान था।</p>
<p>ऊंचाई अस्सी धनुष थी। कुमारावस्था के इक्कीस लाख वर्ष बीत जाने पर इन्हें राज्य मिला था। इन्होंने 42 वर्ष तक राज्य किया। वसंत के परिवर्तन को देखकर इन्हें वैराग्य जागा। लौकांतिक देवों ने आकर इनकी स्तुति की। इन्होंने राज्य श्रेयस्कर पुत्र को दिया तथा विमलप्रभा पालकी में बैठकर ये मनोहर नामक वन में पहुंच गए। वहां इन्होंने दो दिन के आहार का त्याग कर फाल्गुन कृष्ण एकादशी के दिन प्रातः बेला और श्रवण नक्षत्र में एक हजार राजाओं के साथ संयम धारण किया। इसी समय इन्हें मनरूपर्ययज्ञान हुआ। इन्हें सिद्धार्थ नगर में राजा नंद ने आहार देकर पंचाश्चर्य प्राप्त किए थे। छदमस्थ अवस्था के दो वर्ष बाद ही मनोहर उद्यान में तुंबुर वृक्ष के नीचे माघ कृष्ण अमावस्या के दिन श्रवण नक्षत्र में इन्हें केवलज्ञान हुआ। इनके संघ में कुंथु आदि 77 गणधर 13 सौ पूर्वधारी, 48 हजार 200 शिक्षक, 6 हजार अवधिज्ञानी, 6 हजार 500 केवलज्ञानी, 11 हजार विकियाऋद्धिधारी, 6 हजार मनरूपर्ययज्ञानी और 5 हजार वादी मुनि तथा एक लाख बीस हजार धारणा आदि आर्यिकाएं थीं। सम्मेदशिखर पर इन्होंने एक हजार मुनियों के साथ प्रतिमायोग धारण किया था। श्रावण शुक्ल पौर्णमासी के दिन सायंकाल के समय घनिष्ठा नक्षत्र में शेष कर्मों का क्षय करके येकृ‘अ इ उ ऋ लृ’ इन 5 लघु अक्षरों के उच्चारण में जितना समय लगता है। उतने समय में मुक्त हुए।</p>
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