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	<title>भगवान शांतिनाथ &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<description>ताज़ा खबरे हिन्दी में</description>
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	<title>भगवान शांतिनाथ &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>हसमुख जैन गांधी गौरव एवं सुमत जैन लुहाड़िया बने अध्यक्ष: तुकोगंज दिगम्बर जैन समाज के चुनाव सौहार्दपूर्ण वातावरण में सम्पन्न, समाज की एकता और धार्मिक गतिविधियों को मजबूत बनाने पर जोर </title>
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		<pubDate>Mon, 25 May 2026 14:19:17 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[इंदौर के ऐतिहासिक समवशरण दिगम्बर जैन मंदिर में तुकोगंज दिगम्बर जैन समाज के चुनाव सौहार्दपूर्ण वातावरण में सम्पन्न हुए। सर्वसम्मति से हसमुख जैन गांधी गौरव एवं सुमत जैन लुहाड़िया को अध्यक्ष मनोनीत किया गया। पढ़िए इंदौर से यह खबर इन्दौर। सुप्रसिद्ध एवं ऐतिहासिक समवशरण दिगम्बर जैन मंदिर अंतर्गत तुकोगंज दिगम्बर जैन समाज के चुनाव अत्यंत [&#8230;]]]></description>
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<p><strong> इंदौर के ऐतिहासिक समवशरण दिगम्बर जैन मंदिर में तुकोगंज दिगम्बर जैन समाज के चुनाव सौहार्दपूर्ण वातावरण में सम्पन्न हुए। सर्वसम्मति से हसमुख जैन गांधी गौरव एवं सुमत जैन लुहाड़िया को अध्यक्ष मनोनीत किया गया। <span style="color: #ff0000">पढ़िए इंदौर से यह खबर</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इन्दौर</strong>। सुप्रसिद्ध एवं ऐतिहासिक समवशरण दिगम्बर जैन मंदिर अंतर्गत तुकोगंज दिगम्बर जैन समाज के चुनाव अत्यंत सौहार्दपूर्ण एवं गरिमामय वातावरण में सम्पन्न हुए। वर्तमान अध्यक्ष श्रीमती रानी अशोक दोषी के प्रस्ताव पर सर्वानुमति से हसमुख जैन गांधी गौरव एवं सुमत जैन लुहाड़िया को अध्यक्ष मनोनीत किया गया।</p>
<p><strong>समाज की एकता पर दिया गया जोर</strong></p>
<p>वार्षिक साधारण सभा में समाजजन, ट्रस्टीगण एवं पदाधिकारी बड़ी संख्या में उपस्थित रहे। सभा में समाज की एकता, संगठन, धार्मिक संस्कारों एवं सामाजिक गतिविधियों को और अधिक मजबूत बनाने पर विशेष चर्चा की गई। नवमनोनीत पदाधिकारियों का समाजजनों ने आत्मीय स्वागत करते हुए उनके सफल कार्यकाल की शुभकामनाएं दीं।</p>
<p><strong>आध्यात्मिक साधना का प्रमुख केंद्र</strong></p>
<p>समवशरण दिगम्बर जैन मंदिर केवल आस्था का केंद्र ही नहीं, बल्कि साधना, त्याग एवं आध्यात्मिक चेतना का महत्वपूर्ण स्थल भी माना जाता है। मंदिर परिसर में स्थित प्राचीन श्राविकाश्रम में लगभग 60 ब्रह्मचारी बहनें निरंतर साधना, स्वाध्याय एवं आराधना में लीन रहती हैं।</p>
<p><strong>विश्व की सबसे बड़ी स्फटिक प्रतिमा आकर्षण का केंद्र</strong></p>
<p>मंदिर में विश्व की सबसे बड़ी स्फटिक निर्मित भगवान शांतिनाथ की भव्य प्रतिमा विराजमान है, जिसके दर्शन के लिए देशभर से श्रद्धालु पहुंचते हैं। यह स्थान पंडित रतनलाल जी शास्त्री की साधना स्थली के रूप में भी विशेष पहचान रखता है।</p>
<p><strong>धार्मिक एवं सामाजिक गतिविधियों का विस्तार</strong></p>
<p>मंदिर ट्रस्ट की अध्यक्ष श्रीमती पुष्पा प्रदीप कुमार सिंह कासलीवाल के मार्गदर्शन में मंदिर की धार्मिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियां लगातार विस्तार प्राप्त कर रही हैं। सभा के अंत में समाज की निरंतर प्रगति, धार्मिक चेतना एवं संगठनात्मक मजबूती के लिए सामूहिक संकल्प लिया गया।</p>
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		<title>भक्ति और ज्ञान का अनूठा संगम: डडूका में बच्चों ने मनाया भगवान शांतिनाथ का जन्म, तप और मोक्ष कल्याणक पर्व </title>
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		<pubDate>Sun, 17 May 2026 05:47:41 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[अध्यात्म और संस्कारों की पावन भूमि बांसवाड़ा के डडूका क्षेत्र में जैन धर्म के 16वें तीर्थंकर देव, देवाधिदेव भगवान शांतिनाथ स्वामी का जन्म, तप और मोक्ष कल्याणक पर्व अपूर्व श्रद्धा, उल्लास और भक्तिभाव के साथ मनाया गया। बांसवाड़ा से पढ़िए, अजीत कोठिया की यह रिपोर्ट&#8230; बांसवाड़ा (राजस्थान)। अध्यात्म और संस्कारों की पावन भूमि बांसवाड़ा के [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>अध्यात्म और संस्कारों की पावन भूमि बांसवाड़ा के डडूका क्षेत्र में जैन धर्म के 16वें तीर्थंकर देव, देवाधिदेव भगवान शांतिनाथ स्वामी का जन्म, तप और मोक्ष कल्याणक पर्व अपूर्व श्रद्धा, उल्लास और भक्तिभाव के साथ मनाया गया। <span style="color: #ff0000">बांसवाड़ा से पढ़िए, अजीत कोठिया की यह रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>बांसवाड़ा (राजस्थान)।</strong> अध्यात्म और संस्कारों की पावन भूमि बांसवाड़ा के डडूका क्षेत्र में जैन धर्म के 16वें तीर्थंकर देव, देवाधिदेव भगवान शांतिनाथ स्वामी का जन्म, तप और मोक्ष कल्याणक पर्व अपूर्व श्रद्धा, उल्लास और भक्तिभाव के साथ मनाया गया। दिगंबर जैन पाठशाला डडूका के तत्वावधान में आयोजित इस पावन प्रसंग पर संपूर्ण वातावरण जिनेंद्र प्रभु की भक्ति के रंग में सराबोर नजर आया। उत्सव का शुभारंभ प्रातः काल की पावन बेला में हुआ। पाठशाला के नन्हे-मुन्ने बच्चों ने परम विशुद्धि के साथ जिनालय (जैन मंदिर) में प्रवेश किया। बालकों ने पूरी विधि-विधान और पावन मंत्रोच्चार के बीच श्री जी (भगवान शांतिनाथ) का मंगल जलाभिषेक किया। छोटे-छोटे हाथों से भगवान का अभिषेक होते देख उपस्थित श्रावक-श्राविकाओं का हृदय भी अहोभाव और भक्ति से भर उठा। बच्चों की इस क्रिया ने सभी को संस्कारों की महत्ता का अहसास कराया।</p>
<p><strong>सायं काल ज्ञानवर्धन और रोचक प्रश्नमंच</strong></p>
<p>दिनभर के भक्तिमय माहौल के बाद, शाम को पाठशाला परिसर में एक विशेष ज्ञानवर्धक सत्र का आयोजन किया गया। पाठशाला के प्रेरकों के मार्गदर्शन में भगवान शांतिनाथ के तीनों कल्याणकों (जन्म, तप और मोक्ष) पर आधारित एक अत्यंत रोचक प्रश्नमंच (क्विज) प्रतियोगिता हुई। इस प्रतियोगिता में बच्चों ने बड़े ही उत्साह के साथ भाग लिया और अपनी धार्मिक बुद्धिमत्ता का परिचय दिया।</p>
<p><strong>पांच कल्याणकों की मंगलमय देशना</strong></p>
<p>कार्यक्रम के दौरान पाठशाला प्रेरकों ने बच्चों को जैन दर्शन के अनुसार तीर्थंकर भगवंतों के जीवन से जुड़े सभी पांचों कल्याणकों गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान और मोक्ष के बारे में विस्तार से मंगलमय जानकारियां साझा कीं। बच्चों को बताया गया कि किस तरह तीर्थंकर प्रभु का जीवन हमें त्याग, संयम और आत्म-कल्याण का मार्ग दिखाता है। इस पूरे आयोजन में 22 नौनिहालों ने पूरे उत्साह के साथ हिस्सा लेकर धर्म लाभ लिया।</p>
<p><strong>वार्षिक परीक्षा की घोषणा</strong></p>
<p>कार्यक्रम के समापन पर बच्चों के ज्ञान के मूल्यांकन के लिए आगामी धार्मिक गतिविधियों की घोषणा भी की गई। प्रेरकों ने सभी विद्यार्थियों को सूचित किया कि पाठशाला की ग्रीष्मकालीन वार्षिक परीक्षाओं का आयोजन आगामी 1 से 5 जून के मध्य किया जाएगा। सभी बच्चों को इसके लिए अभी से लगन पूर्वक तैयारी करने की प्रेरणा दी गई।</p>
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		<title>श्रद्धा भक्ति आध्यात्मिक उल्लास छाया खंदारजी में : भगवान शांतिनाथ का जन्म तप एवं निर्वाण कल्याणक पर हुए कार्यक्रम </title>
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		<pubDate>Sat, 16 May 2026 05:02:36 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[ दिगंबर जैन अतिशय क्षेत्र खंदारजी में श्रद्धा, भक्ति और वीतरागता के साथ भगवान शांतिनाथ का जन्म तप एवं निर्वाण कल्याणक मनाया गया। खंदारजी से पढ़िए, यह खबर&#8230; खंदारजी। श्री दिगंबर जैन अतिशय क्षेत्र खंदारजी में श्रद्धा, भक्ति और वीतरागता के साथ भगवान शांतिनाथ का जन्म तप एवं निर्वाण कल्याणक मनाया गया। चन्देरी क्षेत्र स्थित श्री [&#8230;]]]></description>
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<p><strong> दिगंबर जैन अतिशय क्षेत्र खंदारजी में श्रद्धा, भक्ति और वीतरागता के साथ भगवान शांतिनाथ का जन्म तप एवं निर्वाण कल्याणक मनाया गया। <span style="color: #ff0000">खंदारजी से पढ़िए, यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>खंदारजी।</strong> श्री दिगंबर जैन अतिशय क्षेत्र खंदारजी में श्रद्धा, भक्ति और वीतरागता के साथ भगवान शांतिनाथ का जन्म तप एवं निर्वाण कल्याणक मनाया गया। चन्देरी क्षेत्र स्थित श्री दिगंबर जैन अतिशय क्षेत्र खंदारजी में भगवान शांतिनाथ का जन्म तप एवं निर्वाण कल्याणक अत्यंत श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक उल्लास के साथ मनाया गया। प्रातः 7 बजे मंगलमय वातावरण में मंगलाष्टक पाठ के साथ कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ। इस अवसर पर समस्त विश्व में सुख, शांति, समृद्धि एवं जीवमात्र के कल्याण की मंगल कामना की गई।</p>
<p>कार्यक्रम में भगवान शांतिनाथ भगवान का पांडूक शिला पर विधिविधानपूर्वक अभिषेक किया गया एवं शांतिधारा हुई। प्रथम पुण्यार्जन का सौभाग्य अनिल कुमार एवं राकेश कुमार बड़घड़िया परिवार को प्राप्त हुआ। राजकुमार, अमन-नमन कठरया, विवेक, मुकेश, जयेन्द्र अविरल अतिशय कठरया, मेधा मनीष एवं अतुल कठरया परिवार सहित अनेक श्रद्धालुओं ने धर्मलाभ प्राप्त किया।</p>
<p><strong>संगीत की मधुर स्वर लहरियों के बीच पूजन</strong></p>
<p>भक्ति और संगीत की मधुर स्वर लहरियों के मध्य भगवान का पूजन एवं भक्तामर विधान बड़घड़िया परिवार तथा समस्त श्रद्धालुओं के सहयोग से अत्यंत गरिमामय वातावरण में संपन्न हुआ। उपस्थित जनसमूह ने भगवान शांतिनाथ के निर्वाण कल्याणक अवसर पर श्रद्धा सहित निर्वाण लाड़ू समर्पित कर वीतराग प्रभु के चरणों में अपनी भक्ति अर्पित की। पूरे आयोजन को खंदार पूजन मंडल के समर्पित प्रयासों ने भव्य महामहोत्सव का स्वरूप प्रदान किया। धर्मसभा में वक्ताओं ने कहा कि जैन दर्शन अहिंसा, संयम और आत्मशुद्धि का मार्ग है तथा तीर्थंकरों के कल्याणक पर्व केवल उत्सव नहीं, बल्कि आत्मकल्याण और मोक्षमार्ग की प्रेरणा हैं। श्रद्धालुओं की उपस्थिति, भक्तिमय वातावरण और जिनेन्द्र भक्ति से संपूर्ण खंदार क्षेत्र धर्ममय हो उठा तथा “णमो अरिहंताणं” की मंगल ध्वनि से वातावरण गुंजायमान रहा।</p>
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		<title>शांतिनाथ भगवान के निर्वाण लाडू के साथ त्रय कल्याणक महोत्सव पूर्ण : शहर धार्मिक आभा से सराबोर रहा </title>
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		<pubDate>Sat, 16 May 2026 04:59:26 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[श्री शांतिनाथ दिगंबर जैन मंदिर, बड़ा तख्ता टोंक में बुधवार से शुरू हुआ त्रय कल्याणक महोत्सव अब अपने धार्मिक शिखर की ओर अग्रसर है। 15 मई को मूलनायक श्री शांतिनाथ भगवान के जन्म, तप और मोक्ष इन तीनों कल्याणक के अवसर पर अनेक धार्मिक आयोजन किए गए। टोंक से पढ़िए, यह खबर&#8230; टोंक। श्री शांतिनाथ [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>श्री शांतिनाथ दिगंबर जैन मंदिर, बड़ा तख्ता टोंक में बुधवार से शुरू हुआ त्रय कल्याणक महोत्सव अब अपने धार्मिक शिखर की ओर अग्रसर है। 15 मई को मूलनायक श्री शांतिनाथ भगवान के जन्म, तप और मोक्ष इन तीनों कल्याणक के अवसर पर अनेक धार्मिक आयोजन किए गए। <span style="color: #ff0000">टोंक से पढ़िए, यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>टोंक।</strong> श्री शांतिनाथ दिगंबर जैन मंदिर, बड़ा तख्ता टोंक में बुधवार से शुरू हुआ त्रय कल्याणक महोत्सव अब अपने धार्मिक शिखर की ओर अग्रसर है। 15 मई को मूलनायक श्री शांतिनाथ भगवान के जन्म, तप और मोक्ष इन तीनों कल्याणक के अवसर पर अनेक धार्मिक आयोजन किए गए। इस आयोजन ने पूरे शहर को धार्मिक आभा से सराबोर कर दिया। इस अवसर पर प्रातः काल में श्रीजी को पाण्डुक शिला पर विराजमान कर इंद्रो द्वारा कलशों से अभिषेक एवं शांतिधारा की गई। इसके बाद शांतिनाथ विधान मंडल का आयोजन किया गया। जिसमे नगर के सभी मंदिरों के लोगों ने विधान में बढ़ चढ़कर भाग लिया एवं विधान मंडल की पूजन की।</p>
<p><strong>भगवान का पालना झुलाया</strong></p>
<p>शाम को आरती और शास्त्रसभा के बाद भगवान को पालना झुलाया गया। इस पावन अवसर पर महिला मंडल, बालिका मंडल, धर्मसागर पाठशाला और शांतिधारा परिवार के सदस्यों की सहभागिता उल्लेखनीय रही। कार्यक्रम की सफलता में समाज के हर वर्ग का योगदान रहा। समाज प्रवक्ता पवन कंटान एवं विकास जागीरदार ने जानकारी देते हुए बताया कि शुक्रवार को श्री शांतिनाथ विधान मंडल का आयोजन पंडित मनोज शास्त्री बागरोही के सानिध्य में भोपाल से पधारे केशव एंड पार्टी के मधुर वाणी से बड़ा तख्ता मंदिर में किया गया। इसमें बड़ी संख्या में समाज के लोगों ने बढ़ चढ़कर भाग लिया एवं अत्यंत भक्ति भाव ओर श्रद्धा के साथ झूमते नाचते हुए भगवान की भक्ति की इसके पश्चात निर्वाण कांड बोलकर भगवान के सम्मुख 16 किलो का निर्वाण लाडू चढ़ाया गया । इस अवसर पर पारस सर्राफ, कमल आंडरा, एंजे दाखिया, कमल सर्राफ, अनिल सर्राफ, अम्मू छामुनिया, विनोद सर्राफ, प्रकाश सेठी, संजय संघी, कन्हैया लाल बरवास, धर्मचंद पतल दोना, ज्ञान संघी सहित समाज के अनेक लोग उपस्थित रहे।</p>
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		<title>सिंहोनिया में 108 कलशों से भगवान शांतिनाथ का हुआ महामस्तकाभिषेक : अंबाह में हुए धार्मिक आयोजन में उमड़े समाज जन। </title>
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		<pubDate>Fri, 15 May 2026 11:46:59 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[अंबाह। प्राचीन दिगंबर जैन अतिशय तीर्थक्षेत्र सिंहोनिया में शुक्रवार को भगवान शांतिनाथ, अरहनाथ एवं कुंथुनाथ की प्राचीन प्रतिमाओं का भव्य महामस्तकाभिषेक श्रद्धा और भक्ति के साथ हुआ। जैन धर्म के 16वें तीर्थंकर भगवान शांतिनाथ के जन्म, तप और मोक्ष कल्याणक अवसर पर आयोजित इस महोत्सव में अंबाह, मुरैना, ग्वालियर, मुरार, आगरा सहित विभिन्न क्षेत्रों से [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>अंबाह</strong>। प्राचीन दिगंबर जैन अतिशय तीर्थक्षेत्र सिंहोनिया में शुक्रवार को भगवान शांतिनाथ, अरहनाथ एवं कुंथुनाथ की प्राचीन प्रतिमाओं का भव्य महामस्तकाभिषेक श्रद्धा और भक्ति के साथ हुआ। जैन धर्म के 16वें तीर्थंकर भगवान शांतिनाथ के जन्म, तप और मोक्ष कल्याणक अवसर पर आयोजित इस महोत्सव में अंबाह, मुरैना, ग्वालियर, मुरार, आगरा सहित विभिन्न क्षेत्रों से सैकड़ों श्रद्धालु पहुंचे। प्रातःकाल पंडित संजय शास्त्री के निर्देशन में नित्य नियम पूजन, शांति विधान, शांतिधारा एवं यज्ञ का आयोजन किया गया। इसके बाद 108 कलशों से भगवान शांतिनाथ की 21 फीट ऊंची प्राचीन प्रतिमा का महामस्तकाभिषेक किया गया। पवित्र जल से हुए अभिषेक के दौरान मंदिर परिसर जयकारों से गूंज उठा। श्रद्धालुओं ने निर्वाण लाडू अर्पित कर पुण्यार्जन किया।</p>
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<p><strong>संयम और वैराग्य का संदेश देने वाला महापर्व</strong></p>
<p>कमेटी प्रमुख जिनेश जैन ने कहा कि महामस्तकाभिषेक आत्मशुद्धि, संयम और वैराग्य का संदेश देने वाला महापर्व है। उन्होंने बताया कि भगवान शांतिनाथ के जीवन से मनुष्य को अहिंसा, क्षमा और आत्मानुशासन की प्रेरणा मिलती है। श्रद्धा से किया गया अभिषेक आत्मा को निर्मल बनाने का प्रतीक है। आयोजन में रविंद्र जैन टिल्लू, संजय जैन, नीलेश जैन, रवि जैन, संजू जैन, डॉबी जैन, पिंटू जैन उपस्थित रहे।</p>
<p><strong>शांतिनाथ भगवान का विशेष अभिषेक</strong></p>
<p>उधर, अंबाह नगर के बड़ा जैन मंदिर में भी भगवान शांतिनाथ का विशेष अभिषेक किया गया। दिगंबर जैन सोशल ग्रुप के सदस्यों ने सामूहिक रूप से भगवान का जलाभिषेक किया। इसके पश्चात शांतिधारा की गई, जिसमें समाजजनों ने विश्वशांति और आत्मकल्याण की कामना की। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे और पूरा मंदिर परिसर भक्तिमय वातावरण से सराबोर रहा।</p>
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		<title>भगवान शांतिनाथ का जन्म तप मोक्ष कल्याणक मनाया : भक्तामर के 48 दीप प्रज्वलन किए गए </title>
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		<pubDate>Fri, 15 May 2026 11:01:50 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[भगवान शांतिनाथ का जन्म तप और मोक्ष कल्याणक के उपलक्ष्य में आदिनाथ मंदिर, भगवान महावीर समवशरण मंदिर में विशेष शांतिधारा अभिषेक किया गया। नौगामा से पढ़िए, यह खबर&#8230;  नौगामा। भगवान शांतिनाथ का जन्म तप और मोक्ष कल्याणक के उपलक्ष्य में आदिनाथ मंदिर, भगवान महावीर समवशरण मंदिर में विशेष शांतिधारा अभिषेक किया गया। अभिषेक करने का [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>भगवान शांतिनाथ का जन्म तप और मोक्ष कल्याणक के उपलक्ष्य में आदिनाथ मंदिर, भगवान महावीर समवशरण मंदिर में विशेष शांतिधारा अभिषेक किया गया। <span style="color: #ff0000">नौगामा से पढ़िए, यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong> नौगामा।</strong> भगवान शांतिनाथ का जन्म तप और मोक्ष कल्याणक के उपलक्ष्य में आदिनाथ मंदिर, भगवान महावीर समवशरण मंदिर में विशेष शांतिधारा अभिषेक किया गया। अभिषेक करने का प्रथम सौभाग्य आदिनाथ मंदिर में पिंडारमियां महिमा राजेश, पिंडारमिया ललित सुखलाल एवं समवशरण मंदिर में अति वीर अतिशय गांधी, राजेंद्र गांधी को प्राप्त हुआ। इस अवसर पर भगवान शांतिनाथ का मोक्ष कल्याणक का निर्वाण लाडू चढ़ाने का सौभाग्य नानावटी सुभाषचंद्र पन्नालाल, गांधी हित दिनेश, गांधी कौशल्या, अनूप हसमुख को प्राप्त हुआ। अभिषेक के बाद महिला मंडल द्वारा सामूहिक रूप से वाद्य यंत्रों के मधुर सुर लहरों के साथ भगवान शांतिनाथ के बड़े भक्ति में भाव से पूजन किया गया। शाम को मंदिर की में भक्तामर के 48 दीप प्रज्वलन किए गए एवं जैन पाठशाला के बच्चों द्वारा सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किए गए। यह जानकारी जैन समाज प्रवक्ता सुरेश चंद्र गांधी ने दी।</p>
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		<title>भगवान शांतिनाथ के तीन कल्याणक का महासंगम : इंदौर सहित देशभर के जिनालयों में 15 मई मनेगा भगवान का जन्म, तप और मोक्ष कल्याणक महोत्सव </title>
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		<pubDate>Thu, 14 May 2026 12:55:44 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जैन धर्म के 16वें तीर्थंकर, पंचम चक्रवर्ती और द्वादश कामदेव भगवान शांतिनाथ स्वामी का त्रिविध कल्याणक (जन्म, तप और मोक्ष) महोत्सव शुक्रवार, 15 मई को देश भर में श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाएगा। श्रीफल जैन न्यूज की विशेष श्रृंखला में आज पढ़िए, उपसंपादक प्रीतम लखवाल की यह संकलित और संपादित रिपोर्ट&#8230; इंदौर। जैन [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>जैन धर्म के 16वें तीर्थंकर, पंचम चक्रवर्ती और द्वादश कामदेव भगवान शांतिनाथ स्वामी का त्रिविध कल्याणक (जन्म, तप और मोक्ष) महोत्सव शुक्रवार, 15 मई को देश भर में श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाएगा। <span style="color: #ff0000">श्रीफल जैन न्यूज की विशेष श्रृंखला में आज पढ़िए, उपसंपादक प्रीतम लखवाल की यह संकलित और संपादित रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> जैन धर्म के 16वें तीर्थंकर, पंचम चक्रवर्ती और द्वादश कामदेव भगवान शांतिनाथ स्वामी का त्रिविध कल्याणक (जन्म, तप और मोक्ष) महोत्सव शुक्रवार, 15 मई को देश भर में श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाएगा। मालवा की पावन धरा इंदौर सहित देशभर के समस्त दिगंबर जैन मंदिरों, जिनालयों और चैत्यालयों में इस पावन अवसर पर विशेष अनुष्ठान, महामस्तकाभिषेक, शांतिधारा और विश्वशांति महायज्ञ विधान आयोजित किए जाएंगे। सकल जैन समाज ने इस त्रिकल्याणक महोत्सव की सभी तैयारियां पूर्ण कर ली हैं।</p>
<p><strong>एक ही पावन तिथि पर तीन कल्याणक का संयोग</strong></p>
<p>जैन पुराणों के अनुसार जेठ कृष्ण चतुर्दशी की पावन तिथि भगवान शांतिनाथ के जीवन में अद्भुत महत्व रखती है। इसी तिथि को उनका दीक्षा (तप) कल्याणक और मोक्ष कल्याणक हुआ था। ज्योतिषीय गणना के अनुसार इस वर्ष उनका जन्म कल्याणक पर्व भी इसी समय के साथ जुड़कर त्रिकल्याणक महामहोत्सव के रूप में मनाया जा रहा है।</p>
<p><strong>भगवान शांतिनाथ का जीवन वृत्त और तीनों कल्याणक </strong></p>
<p>गर्भ एवं जन्म कल्याणक- हस्तिनापुर के इक्ष्वाकु वंशीय राजा विश्वसेन और माता ऐरादेवी (अचिरा) के आंगन में प्रभु का जन्म हुआ था। उनके गर्भ में आते ही पूरे राज्य में शांति की लहर दौड़ गई थी, इसलिए उनका नाम ‘शांतिनाथ’ रखा गया। वे 16वें तीर्थंकर होने के साथ-साथ तीन खंड के अधिपति पंचम चक्रवर्ती और कामदेव भी थे।</p>
<p>दीक्षा (तप) कल्याणक- राजसी वैभव, अटूट संपदा और चक्रवर्ती के सुखों का भोग करने के बाद एक दिन दर्पण में अपना रूप देखते समय भगवान को वैराग्य उत्पन्न हुआ। उन्होंने संसार की असारता को समझा और जेठ कृष्ण चतुर्दशी के दिन हस्तिनापुर के सहस्राम्र वन में दीक्षा धारण कर ली। वे आत्म-साधना और कठिन तपस्या में लीन हो गए।</p>
<p>मोक्ष कल्याणक- कठिन तप और ध्यान के बल पर प्रभु ने केवलज्ञान प्राप्त किया। इसके बाद सम्मेद शिखरजी (पारसनाथ हिल) की पावन टोंक से जेठ कृष्ण चतुर्दशी के दिन ही भगवान शांतिनाथ ने समस्त कर्मों का क्षय कर मोक्ष (निर्वाण) पद प्राप्त किया।</p>
<p><strong>इंदौर सहित देश भर में धार्मिक अनुष्ठानों की धूम</strong></p>
<p>इस महापर्व के अवसर पर इंदौर के कांच मंदिर, गोमटगिरी, दिगंबर जैन उदासीन आश्रम सहित सभी उपनगरीय जिनालयों में सुबह की वेला में देव-शास्त्र-गुरु पूजन होगा।</p>
<p>महामस्तकाभिषेक व शांतिधारा- स्वर्ण और रजत कलशों से भगवान का अभिषेक किया जाएगा। विश्वशांति महायज्ञ-विश्व में सुख, समृद्धि और शांति की कामना के लिए विशेष आहुतियां दी जाएंगी। लाडू समर्पणरू निर्वाण लाडू चढ़ाकर भक्त प्रभु के मोक्ष कल्याणक की खुशियां मनाएंगे। सांस्कृतिक कार्यक्रमरू संध्याकाल में महाआरती, भक्तांबर पाठ और जिनेंद्र भक्ति के सांस्कृतिक कार्यक्रम होंगे। संत समाज और विद्वानों के अनुसार भगवान शांतिनाथ की आराधना करने से जीवन के सभी कष्ट, रोग, शोक और मानसिक अशांति दूर होती है। समस्त जैन समाज इस पावन दिवस पर उपवास, एकासन और सामायिक कर आत्म-कल्याण का मार्ग प्रशस्त करेगा।</p>
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		<title>सिंहोनिया जी में 15 मई को भगवान शांतिनाथ का होगा महामस्तिकाभिषेक: महोत्सव, विश्व शांति के लिए प्रतिदिन हो रही शांतिधारा, चढ़ाया जाएगा निर्वाण लाडू  </title>
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		<pubDate>Tue, 12 May 2026 12:47:25 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[ऐतिहासिक श्री शांतिनाथ दिगंबर जैन अतिशय क्षेत्र सिंहोनिया जी इन दिनों धर्म, भक्ति और आध्यात्मिक आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। यहां प्रतिदिन विश्व शांति, जनकल्याण, आत्मिक सुख-समृद्धि और मानव कल्याण की मंगल कामनाओं के साथ भगवान शांतिनाथ का अभिषेक एवं शांतिधारा श्रद्धापूर्वक की जा रही है। अंबाह से पढ़िए, अजय जैन की यह [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>ऐतिहासिक श्री शांतिनाथ दिगंबर जैन अतिशय क्षेत्र सिंहोनिया जी इन दिनों धर्म, भक्ति और आध्यात्मिक आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। यहां प्रतिदिन विश्व शांति, जनकल्याण, आत्मिक सुख-समृद्धि और मानव कल्याण की मंगल कामनाओं के साथ भगवान शांतिनाथ का अभिषेक एवं शांतिधारा श्रद्धापूर्वक की जा रही है। <span style="color: #ff0000">अंबाह से पढ़िए, अजय जैन की यह रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>अंबाह।</strong> ऐतिहासिक श्री शांतिनाथ दिगंबर जैन अतिशय क्षेत्र सिंहोनिया जी इन दिनों धर्म, भक्ति और आध्यात्मिक आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। यहां प्रतिदिन विश्व शांति, जनकल्याण, आत्मिक सुख-समृद्धि और मानव कल्याण की मंगल कामनाओं के साथ भगवान शांतिनाथ का अभिषेक एवं शांतिधारा श्रद्धापूर्वक की जा रही है। देश के विभिन्न क्षेत्रों से पहुंच रहे जैन श्रद्धालु भगवान की आराधना कर आत्मिक शांति एवं आध्यात्मिक ऊर्जा का अनुभव कर रहे हैं। मंदिर परिसर में सुबह से ही पूजा, अभिषेक, आरती और शांतिधारा का धार्मिक वातावरण श्रद्धालुओं को भक्ति रस में सराबोर कर देता है। सोमवार को भी मौजूद भक्तों ने शांतिधारा कर जगत कल्याण की कामना की। 15 मई को भव्य धार्मिक कार्यक्रम किया जाएगा, जिसकी तैयारियां जारी है। ज्ञात रहे कि जैन तीर्थ सिंहोनिया जी का इतिहास अत्यंत गौरवशाली माना जाता है। यह क्षेत्र प्राचीन काल से जैन धर्म की आस्था और साधना का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। यहां विराजमान भगवान श्री शांतिनाथ की अतिशयकारी प्रतिमा श्रद्धालुओं की विशेष आस्था का केंद्र है। मान्यता है कि यहां सच्चे मन से की गई प्रार्थना और शांतिधारा से मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं तथा मानसिक शांति प्राप्त होती है। वर्षों से यह क्षेत्र जैन संस्कृति, अहिंसा, तप और धर्म साधना का संदेश देता आ रहा है।</p>
<p><strong>भगवान शांतिनाथ की शांतिधारा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं</strong></p>
<p>कमेटी के संरक्षक एवं पूर्व नगर पालिका अध्यक्ष जिनेश जैन ने बताया कि वर्तमान समय में मनुष्य भौतिक सुख-सुविधाओं के बावजूद मानसिक तनाव, चिंता, अशांति और प्रतिस्पर्धा से घिरा हुआ है। ऐसे समय में धर्म और प्रभु भक्ति ही मनुष्य को वास्तविक शांति प्रदान कर सकती है। उन्होंने कहा कि भगवान शांतिनाथ की शांतिधारा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्मा को भीतर से शुद्ध करने का माध्यम है। जब श्रद्धालु शांत मन से प्रभु के चरणों में प्रार्थना करते हैं, तो उनके भीतर सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और जीवन में संयम, धैर्य तथा संतोष की भावना विकसित होती है। जिनेश जैन ने कहा कि आज समाज में तनाव, आपसी मतभेद और मानसिक अशांति लगातार बढ़ रही है। परिवारों में संवाद कम हो रहा है और व्यक्ति अकेलेपन की ओर बढ़ता जा रहा है। ऐसे समय में धार्मिक आयोजन लोगों को एकजुट करने और सकारात्मक दिशा देने का कार्य करते हैं। उन्होंने कहा कि शांतिधारा के दौरान विश्व शांति, राष्ट्र कल्याण, परिवार की सुख-समृद्धि और मानवता के मंगल की कामना की जाती है। यह भावना केवल व्यक्ति तक सीमित नहीं रहती, बल्कि पूरे समाज और विश्व के लिए कल्याणकारी बनती है।</p>
<p><strong>शांतिधारा आत्मशुद्धि और लोककल्याण का अद्भुत माध्यम</strong></p>
<p>मंदिर से जुड़े आशीष जैन सोनू एवं रविंद्र जैन टिल्लू ने बताया कि शांतिधारा आत्मशुद्धि और लोककल्याण का अद्भुत माध्यम है। इससे मन में शांति, प्रेम और सद्भाव की भावना उत्पन्न होती है। उन्होंने कहा कि जब श्रद्धालु प्रभु के समक्ष बैठकर भक्ति करते हैं, तो उनके भीतर का तनाव स्वतः समाप्त होने लगता है और जीवन में सकारात्मकता आती है। वहीं संजय जैन एवं विवेक जैन बंटी ने कहा कि प्रभु भक्ति व्यक्ति को संस्कारवान बनाती है। धार्मिक आयोजनों से नई पीढ़ी को संस्कृति और धर्म से जुड़ने का अवसर मिलता है। उन्होंने कहा कि शांतिधारा एवं अभिषेक से भय, अशांति और नकारात्मकता दूर होती है तथा जीवन आनंदमय बनता है।</p>
<p><strong>मंदिर परिसर में व्यापक तैयारियां चल रही </strong></p>
<p>नीलेश जैन ने बताया कि आगामी 15 मई 2026, शुक्रवार को जेठ वदी चौदस के पावन अवसर पर भगवान श्री 1008 शांतिनाथ का निर्वाण लाडू एवं महामस्तिकाभिषेक महोत्सव भव्य रूप से आयोजित किया जाएगा। आयोजन को लेकर मंदिर परिसर में व्यापक तैयारियां चल रही हैं। सजावट, पूजन व्यवस्था, भोजनशाला, जल व्यवस्था और श्रद्धालुओं के स्वागत की व्यवस्थाओं को अंतिम रूप दिया जा रहा है। कार्यक्रम के अनुसार प्रातः 7 बजे से सामूहिक अभिषेक पूजन होगा। इसके पश्चात प्रातः 8 बजे से श्री शांतिनाथ महामंडल विधान प्रारंभ होगा तथा प्रातः 10 बजे से निर्वाण लाडू एवं महामस्तिकाभिषेक किया जाएगा। आयोजन समिति द्वारा पधारने वाले सभी श्रद्धालुओं के लिए निःशुल्क भोजन व्यवस्था भी की गई है।</p>
<p><strong>आयोजन को लेकर विशेष उत्साह </strong></p>
<p>सकल दिगंबर जैन समाज अंबाह एवं मुरैना सहित आसपास के क्षेत्रों के श्रद्धालुओं में आयोजन को लेकर विशेष उत्साह दिखाई दे रहा है। समिति ने सभी धर्मप्रेमी बंधुओं से सपरिवार उपस्थित होकर धर्म लाभ एवं पुण्यार्जन करने की अपील की है आयोजकों का कहना है कि ऐसे धार्मिक आयोजनों से समाज में आध्यात्मिक चेतना, संस्कार, एकता और मानव कल्याण की भावना को बल मिलता है।</p>
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		<title>अक्षय तृतीया पर खुलता है कुबेर का भंडार : शांति और समृद्धि लाता है यह पर्व </title>
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		<pubDate>Tue, 14 Apr 2026 08:21:05 +0000</pubDate>
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<p><strong>हस्तिनापुर तीर्थ एक प्राचीन नगरी है। यहां पर जैन धर्म के 3 तीर्थंकरों की जन्मभूमि है। भगवान शांतिनाथ, भगवान कुंथुनाथ एवं भगवान अरहनाथ इन तीन तीर्थंकरों के चार-चार कल्याणकों से पावन एवं पवित्र भूमि है। इसी के साथ अनेक ऐतिहासिक घटनाओं के साथ यह भूमि जुड़ी हुई है। <span style="color: #ff0000">अक्षय तृतीया के अवसर पर आज पढ़िए, विजयकुमार जैन का विस्तारित आलेख&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p>हस्तिनापुर तीर्थ एक प्राचीन नगरी है। यहां पर जैन धर्म के 3 तीर्थंकरों की जन्मभूमि है। भगवान शांतिनाथ भगवान कुंथुनाथ एवं भगवान अरहनाथ इन तीन तीर्थंकरों के चार-चार कल्याणकों से पावन एवं पवित्र भूमि है। इसी के साथ अनेक ऐतिहासिक घटनाओं के साथ यह भूमि जुड़ी हुई है। रक्षाबंधन पर्व यही से प्रारंभ हुआ एवं भगवान ऋषभदेव की पारणा भूमि यही है। इसी के साथ भगवान मल्लिनाथ का समवसरण यहां पर आया था। ऐसी अनेक धार्मिक घटनाएं यहां से जुड़ी हुई है। अक्षय तृतीया पर्व का विशेष महत्व है। यहां भगवान ऋषभदेव को एक वर्ष 39 दिन पश्चात् इस हस्तिनापुर नगरी के राजा श्रेयांस ने आहार दे करके दान की प्रथा को प्रारंभ किया। इससे पूर्व लोग ये नहीं जानते थे कि जैन साधु को आहार किस प्रकार दिया जाता है। राजा श्रेयांस एवं उनकी भाई सोमप्रभ को भगवान ऋषभदेव के आने के पूर्व रात्रि में स्वप्न आया, जिस स्वप्न में उन्हें सुमेरूपर्वत का दर्शन किया एवं उस स्वप्न का फल यह था कि ऐसा महापुरुष इस धरती पर आने वाला है। जिसका सुमेरू पर्वत पर इंद्रों द्वार अभिषेक हुआ हो। भगवान ऋषभदेव का दर्शन करते ही उन्हें जाति स्मरण (पूर्वभव की याद) हो गया। जिससे उन्होंने भगवान को नवधा भक्तिपूर्वक पड़गाहन करके इच्छु रस (गन्ने के रस) का आहार दिया। आहार देते ही देवों ने आकाश से पंचाश्चर्य (रत्नों) की वृष्टि की एवं खूब जय-जयकार के साथ भगवान की भक्ति की। भगवान के आहार के प्रताप से वह दिन अक्षय तृतीय के नाम से जाने जाना लगा एवं जिस पात्र से भगवान को आहार दिया गया था। उस दिन उस पात्र में रस समाप्त नहीं हुआ। वह अक्षय हो गया। चक्रवर्ती की पूरी सेना भी उस पात्र से रस पी जाए तब भी रस समाप्त नहीं होता है।</p>
<p><img decoding="async" class="alignnone size-medium wp-image-104747" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2026/04/IMG-20260414-WA0012-300x200.jpg" alt="" width="300" height="200" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2026/04/IMG-20260414-WA0012-300x200.jpg 300w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2026/04/IMG-20260414-WA0012-1024x682.jpg 1024w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2026/04/IMG-20260414-WA0012-768x512.jpg 768w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2026/04/IMG-20260414-WA0012-1536x1023.jpg 1536w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2026/04/IMG-20260414-WA0012-414x276.jpg 414w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2026/04/IMG-20260414-WA0012-470x313.jpg 470w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2026/04/IMG-20260414-WA0012-640x426.jpg 640w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2026/04/IMG-20260414-WA0012-130x86.jpg 130w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2026/04/IMG-20260414-WA0012-187x124.jpg 187w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2026/04/IMG-20260414-WA0012-990x660.jpg 990w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2026/04/IMG-20260414-WA0012-1320x879.jpg 1320w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2026/04/IMG-20260414-WA0012.jpg 1600w" sizes="(max-width: 300px) 100vw, 300px" /></p>
<p><strong>कैसे मनाते है अक्षय तृतीय पर्व </strong></p>
<p>वर्तमान में देश एवं विदेश में जो भी जैन श्रद्धालुगण रहते हैं। वे वर्षीतप एवं वर्ष में उपवास करते हैं। कोई 6 माह का 3 माह का एवं एक माह का या एक वर्ष का। उन सभी श्रद्धालुओं की मान्यता है कि भगवान ऋषभदेव का एक वर्ष पश्चात् यहां पर पराणा हुआ था। इसलिए इस भूमि को वे अत्यंत ही पावन एवं पवित्र मानते हैं और यहां पर आ करके अपने इष्टमित्रों एवं परिजनों के साथ में आकर के उपवास करने वाले तपसी श्रावक या श्राविका को ढोल बाजे के सााथ में इच्छु रस का पारणा करवाते हैं एवं अपने आपको धन्य मानते हैं। अनेक महीनों पूर्व धर्मशालाओं एवं अनेक व्यवस्थाओं की व्यवस्था एवं बुकिंग करते हैं। ऐसे ही जैन साधु इस भूमि पर आकर के उस दिन इच्छु रस का आहार ग्रहण करते है एवं सारे देश में जैन साधु-साध्वियां जहां भी विराजमान है, वहां पर वह इच्छु रस का ही आहार ग्रहण करते हैं। यह परम्परा अनेकों वर्षों से चली आ रही है।</p>
<p><strong>अक्षय तृतीया का इतिहास</strong></p>
<p>जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव से जुड़ा है अक्षय तृतीया पर्व का इतिहास। भगवान ऋषभदेव ने अयोध्या में जन्म लिया एवं प्रयाग की (इलाहाबाद) धरती पर जैनेश्वरी दीक्षा को धारण किया। जो कि इस युग की प्रथम दीक्षा थी क्योंकि, भगवान ऋषभदेव वर्तमान चौबीसी के प्रथम तीर्थंकर हैं। दीक्षा को धारण करते ही ध्यान लगा करके भगवान बैठ गए। भगवान के साथ में 4 हजार राजाओं ने दीक्षा ग्रहण की। 6 माह बाद भगवान ऋषभदेव आहारचर्या बतलाने के लिए कि जैन साधुओं को किस प्रकार आहार करना चाहिए। लोगों को इस विधि का ज्ञान हो सके, इसलिए आहार के लिए निकले लोगों को ज्ञान ही नहीं था कि जैन साधुओं को आहार किस प्रकार से करना चाहिए। महायोगी ऋषभदेव जिस ओर कदम रखते थे वहीं के लोग प्रसन्न होकर के बड़े आदर के साथ उन्हें प्रणाम करते थे और कहते थे कि भगवान प्रसन्न हो जाइए। कहिये क्या काम है, कितने ही लोग भगवान के पीछे-पीछे चलने लगते थे, अन्य कितने ही लोग बहुमूल्य रत्नलाकर भगवान के सामने रखकर कहते थे कि हे देव इन रत्नों ग्रहण कर लीजिए और कितने ही लोग अन्य प्रकार के पदार्थ वस्त्र आभूषण, माला, कन्या, भवन, सवारी आदि दिखाकरके कहते थे कि प्रभु इसे ग्रहण कर लीजिए और हमें कृतार्थ कीजिए। तीर्थंकर भगवन अपनी चर्या में विघ्न मान करके आगे बढ़ जाते थे। लोेग निराश होकर के प्रभु की ओर देखते रह जाते थे और सोचते थे कि किस प्रकार से भगवान को उनकी महचाही वस्तु देकर के हम कृतार्थ हो सकें। इस प्रकार से भगवान को 6 महा व्यतीत हो जाते हैं। कुल मिलाकर के 1 वर्ष पूर्ण हो जाता है और महामुनि कुरूजांगल देश के आभूषण ऐसे हस्तिनापुर नगर के समीप पहुंचते हैं।</p>
<p><strong>जैन श्रद्धालु आहार दान की महिमा का वर्णन करते हैं</strong></p>
<p>अक्षय तृतीया का प्राचीन इतिहास हस्तिनापुर तीर्थ से ही प्रारंभ हुआ है। वैशाख सुदी तीज को अक्षय तृतीय के नाम से जाना जाता है। अक्षय का अर्थ है जिस वस्तु का कभी क्षय न हो अर्थात् वस्तु समाप्त न हो और वह महीना वैशाख का था और तिथि तृतीया थी। इसलिए इसका नाम अक्षय तृतीया पड़ा। लोगों का मानना है कि इस दिवस किया जाने वाला कार्य वृद्धि को प्राप्त होता है। भगवान ऋषभदेव को हुए कोड़ा कोड़ी वर्ष (करोड़ों करोड़ों साल) व्यतीत हो गए लेकिन, आज भी अक्षय तृतीया का पर्व मनाने के लिए देश एवं विदेश से जैन श्रद्धालु हस्तिनापुर की धरती पर आते हैं। जैन श्रद्धालु आहार दान की महिमा का वर्णन करते हुए इस पवित्र धरती पर आते हैं। इस पवित्र दिवस का ये महत्व है कि बिना मुहुर्त के ही हजारों विवाह संपन्न होते हैं। अगणित ग्रह प्रवेश आदि मांगलिक कार्य संपन्न किए जाते हैं और इसे सर्वश्रेष्ठ मुर्हूत माना जाता है।</p>
<p><strong>भगवान ऋषभदेव को प्रथम पारणा का रहस्य</strong></p>
<p>हस्तिनापुर नगरी के शासक राजा सोमप्रभ और उनके भाई श्रेयांस कुमार थे। पिछली रात्रि में राजा श्रेयांस को उत्तम-उत्तम 7 स्वप्न दिखाई देते हैं। प्रातः वह अपने स्वप्नों को अपने भाई सोमप्रभ से उन स्वप्नों को बताकर उनका फल पूछते हैं। प्रथम स्वप्न में मैने सुमेरूपर्वत देखा है, दूसरे में एक कल्पवृक्ष देखा है, जिसकी शाखाओं पर आभूषण लटक रहे हैं, तीसरे में सिंह देखा है, चौथे में बैल, पांचवें में सूर्य और चंदमा, छठे में लहरों से सुशोभित समुद्र तथा सातवें में अष्ट मंगल द्रव्यों को हाथों में धारण किये व्यंतर देवों को देखा है। इन स्वप्नों का उत्तम फल जानकरके अति प्रसन्न चित्त हो करके के चिंतन ही कर रहे होते हैं कि तभी सुनने में आता है कि तीर्थंकर ऋषभदेव हस्तिनापुर में प्रवेश कर चुके हैं। चारों ओर भारी जन समुदाय एकत्र होकर के भगवान का दर्शन करता है। उनके चरणों की पूजन करता है।</p>
<p><strong>प्रभु के चरणों में नम्रता पूर्वक नमस्कार करते हैं</strong></p>
<p>कोई कहता है कि अहो बड़े आश्चर्य की बात है कि ये तीन लोक के स्वामी भगवान ऋषभदेव समस्त राज्य वैभव का त्याग कर पूर्ण दिगंबर होकर आज अकेेले ही इस पृथ्वीतल पर विचरण कर रहे हैं। इतने में ही द्वारपाल द्वारा सूचना प्राप्त होती है कि प्रभु समीप में ही पधार चुके है और इधर ही आ रहे हैं। राजा सोमप्रभ और श्रेयांस महल के बाहर आ जाते हैं प्रभु के चरणों में नम्रता पूर्वक नमस्कार करते हैं। इतने में ही राजकुमार श्रेयांस को पूर्वभव का जाति स्मरण हो जाता है कि जब में राजा बज्रजंघ की रानी श्रीमती की पर्याय में मुनियों को दिए गए आहार दान की सारी विधि स्मरण में आ जाती है।</p>
<p><strong>इच्क्षु रस का हुआ पारण, आखा तीज महान</strong></p>
<p>महाप्रभु ऋषभदेव को देखते ही राजा श्रेयांस एवं सोमप्रभ ने हे भगवन् अत्रो-अत्रो, तिष्ठो-तिष्ठो आहार जल शुद्ध है, मन शुद्धि, वचन शुद्धि, काय शुद्धि आहार-जल शुद्ध है मुद्रा छोडिये आहार ग्रहण करिये नवधा भक्ति पूर्वक पड़गाहन कर लेते हैं एवं अष्ट द्रव्य से पूजन कर नमस्कार करते हैं ऐसे निवेदन कर प्रभु से आहार ग्रहण करने हेतु प्रार्थना करते हैं भगवान ऋषभदेव करपात्र में आहार प्रारंभ कर देते हैं, बड़ी भक्ति के साथ राजा श्रेयांस इच्छुरस (गन्ने) का आहार देते हैं। उसी समय आकाश से देवों द्वारा रत्न वृष्टि होने लग जाती है नाना प्रकार सुगंधित पुष्पों की वृष्टि होने लग जाती है। देवता भी धन्य है यह दान धन्य यह पात्र धन्य ये दाता ऐसे शब्दों से आकाश गुंजायमान कर देते हैं एवं देवों द्वारा पांच अतिशय पंचाश्चर्य कहलाते हैं राजा श्रेयांस प्रभु को आहार देने में मग्न हैं देवतागण हर्ष विभोर होकर के पंचाश्चर्य की वृष्टि कर रहे हैं। प्रभु ऋभषदेव आहार करके वन की ओर प्रस्थान कर जाते हैं। उस दिन सारे नगर में गन्ने के रस का प्रसाद वितरण किया जाता है। लेकिन फिर भी गन्ने का रस समाप्त नहीं होता है। वह अक्षय हो जाता है।</p>
<p>इच्क्षु रस का हुआ पारण, आखा तीज महान।</p>
<p>जय जय ऋषभदेव भगवान, जय जय ऋषभदेव भगवान।।</p>
<p><strong>भरत चक्रवती के द्वारा राजा श्रेयांस को दान तीर्थ की उपाधि</strong></p>
<p>राजा श्रेयांस ने प्रथम आहार दान दिया क्योंकि इस युग के प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव थे। तो यह प्रथम आहार था भरत चक्रवर्ती ने अयोध्या से पूरी सेना के साथ हस्तिनापुर आकर के राजा श्रेयांस व सोमप्रभ का खूब सम्मान किया एवं दान तीर्थ प्रवर्तक की उपाधि से उन्हें अलंकृत किया। इससे पूर्व दान देने की प्रथा इस धरती पर नहीं थी इसका शुभांरभ राजा श्रेयांस के द्वारा ही हुआ। तो यह दानवीर भूमि भी कहलाई।</p>
<p><strong>अक्षय हो गई यह भूमि गन्ने की खेती से</strong></p>
<p>तब से लेकर के आज तक ये हस्तिनापुर की धरती के समीप वर्ती क्षेत्रों में इच्क्षुु (गन्ना) खेती खूब पाई जाती है उस दिन से इस धरती पर गन्ने की खेती भी अक्षय हो गई समीपवर्ती सभी क्षेत्रों में गन्ने की खेती होती है एवं ऐसा मानते है कि जैन साधु जहॉं पर भी विराजमान है उनको आज के दिन गन्ने के रस का आहार करवाया जाता है। जो लोग वर्षीय उपवास करते हैं वे पारणा करने के लिए हस्तिनापुर की धरती पर आकर के अपना उपवास समाप्त करके पारणा इच्क्षु रस से करते है और अपने आप को धन्य मानते हैं यह इस भूमि का असीम पुण्य है। अक्षय तृतीय आखा तीज के नाम से भी जाना जाता है।</p>
<p>हस्तिनापुर जम्बूद्वीप स्थल पर जैन समाज की सर्वाेच्च साध्वी गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी की पावन प्रेरणा से आहार महल का निर्माण किया गया हैै। जिसमें भगवान ऋषभदेव व राजा श्रेयांस की प्रतिमा विराजमान की गई है। प्रत्येक वर्ष इस प्रतिमा के समक्ष इच्क्षुरस का आहार करवाया जाता है एवं आने वाले भक्त भगवान को आहार देने का सौभाग्य प्राप्त करते हैं एवं गन्ने के रस का प्रसाद ग्रहण करते हैं। अक्षय तृतीया का पावन पर्व हस्तिनापुर से ही प्रारंभ हुआ है। इसकी पहचान ही हस्तिनापुर से है। तब से लेकर के आज तक करोड़ों वर्ष बीत गये लेकिन, उसी मान्यता को लेकर भक्तगण आज भी इस धरती पर आ करके अक्षय तृतीया के दिन तीर्थ पर विराजमान साधुओं को आहार देकर के अपने जीवन को धन्य मानते है।</p>
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		<title>राज्यपाल गुलाबचंद कटारिया ने भगवान शांतिनाथ के दर्शन किए : मुनि श्री निष्पक्ष सागर महाराज एवं मुनिश्री निस्पृह सागर महाराज का मंगल आशीर्वाद </title>
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		<pubDate>Sat, 21 Mar 2026 14:11:08 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[शनिवार 21 मार्च की प्रातः बेला में पंजाब सरकार के राज्यपाल गुलाबचंद कटारिया प्रातः रेल द्वारा रामगंजमंडी पहुंचे। रामगंजमंडी पहुंचने के बाद उन्होंने शांतिनाथ दिगंबर जैन मंदिर पहुंचकर मूलनायक शांतिनाथ भगवान के दर्शन किए। रामगंजमंडी से पढ़िए, अभिषेक जैन लुहाड़िया की यह खबर.. रामगंजमंडी। शनिवार 21 मार्च की प्रातः बेला में पंजाब सरकार के राज्यपाल [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>शनिवार 21 मार्च की प्रातः बेला में पंजाब सरकार के राज्यपाल गुलाबचंद कटारिया प्रातः रेल द्वारा रामगंजमंडी पहुंचे। रामगंजमंडी पहुंचने के बाद उन्होंने शांतिनाथ दिगंबर जैन मंदिर पहुंचकर मूलनायक शांतिनाथ भगवान के दर्शन किए। <span style="color: #ff0000">रामगंजमंडी से पढ़िए, अभिषेक जैन लुहाड़िया की यह खबर..</span></strong></p>
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<p><strong>रामगंजमंडी।</strong> शनिवार 21 मार्च की प्रातः बेला में पंजाब सरकार के राज्यपाल गुलाबचंद कटारिया प्रातः रेल द्वारा रामगंजमंडी पहुंचे। रामगंजमंडी पहुंचने के बाद उन्होंने शांतिनाथ दिगंबर जैन मंदिर पहुंचकर मूलनायक शांतिनाथ भगवान के दर्शन किए और प्रभु चरणों में नमन किया। प्रभु चरणों के दर्शन बाद कटारिया ने नगर में विराजमान आचार्य श्री विद्यासागर महाराज के शिष्य एवं आचार्य श्री समयसाग़र महाराज के आज्ञानुव्रती शिष्य मुनि श्री निष्पक्ष सागर महाराज एवं मुनिश्री निस्पृह सागर महाराज का मंगल आशीर्वाद लिया। वे अलसुबह ही गुरु चरणों मे पहुंचे। उनके चरणों में नमन किया। मुनि द्वय ने उन्हें मधुर मुस्कान के साथ मंगल आशीर्वाद प्रदान किया। उनके साथ वरिष्ठ भाजपा नेता वीरेंद्र जैन, अखिलेश मेडतवाल एवं अन्य प्रबुद्धजन मौजूद रहे।</p>
<p><strong>कटारिया धर्मनिष्ठ व्यक्तित्व हैं</strong></p>
<p>कटारिया धर्मनिष्ठ व्यक्तित्व हैं। संतों का मंगल आशीर्वाद लेने एवं उनकी प्रेरणा और मार्गदर्शन लेने सदैव जाते रहते हैं। इससे पूर्व दिगंबर जैन समाज के कार्यक्रम में श्री कटारिया वर्ष 2007 में हुए पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव में भी जन्म कल्याणक महोत्सव की बेला में रामगंजमंडी पधारे थे। तब वे राजस्थान के गृहमंत्री के रूप में थे। उस समय उन्होंने मुनि विमर्श सागर महाराज का मंगल आशीर्वाद लिया था। कटारिया झालावाड़ में होने जा रहे एक कार्यक्रम में जाने हेतु रामगंजमंडी पधारे थे। इस प्रवास के दौरान उन्होंने महाराज श्री संघ के दर्शन किए।</p>
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