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	<title>भगवान विमलनाथ जी &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<title>भगवान विमलनाथ जी &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>13वें तीर्थंकर भगवान विमलनाथ जी का जन्म और तप कल्याणक 22 जनवरी को: तिथि के अनुसार माघ शुक्ल चतुर्थी को है </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shree Phal News]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 21 Jan 2026 11:20:43 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[13वें तीर्थंकर भगवान विमलनाथ जी का जन्म और तप कल्याणक 22 जनवरी गुरुवार को मनाया जाएगा। तिथि के अनुसार यह कल्याणक माघ शुक्ल चतुर्थी के दिन आते हैं। श्रीफल जैन न्यूज की विशेष शंृखला में आज पढ़िए, उपसंपादक प्रीतम लखवाल की यह संकलित और संपादित प्रस्तुति&#8230; इंदौर। जैन धर्म के धर्मावलंबी 13वें तीर्थंकर भगवान विमलनाथ [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>13वें तीर्थंकर भगवान विमलनाथ जी का जन्म और तप कल्याणक 22 जनवरी गुरुवार को मनाया जाएगा। तिथि के अनुसार यह कल्याणक माघ शुक्ल चतुर्थी के दिन आते हैं। <span style="color: #ff0000">श्रीफल जैन न्यूज की विशेष शंृखला में आज पढ़िए, उपसंपादक प्रीतम लखवाल की यह संकलित और संपादित प्रस्तुति&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> जैन धर्म के धर्मावलंबी 13वें तीर्थंकर भगवान विमलनाथ जी का जन्म और तप कल्याणक 22 जनवरी गुरुवार को मनाएंगे। इस दिन भगवान का जन्म हुआ और इस तिथि पर उन्होंने तप कर वैराग्य की ओर कदम बढ़ाए। तिथि के अनुसार यह कल्याणक माघ शुक्ल चतुर्थी के दिन आते हैं। इस दिन दिगंबर जैन मंदिरों और चैत्यालयों में भगवान के जन्म और तप कल्याणक पर अभिषेक, शांतिधारा, भक्तामर पाठ आदि धार्मिक क्रियाएं संपन्न की जाएंगी।</p>
<p><strong>भगवान विमलनाथ जी का जीवन परिचय</strong></p>
<p>भगवान विमलनाथ जी जैन धर्म के 13वें तीर्थंकर हैं। प्रभु का जन्म माघ शुक्ल चतुर्थी के दिन काम्पिलय नगरी में इक्ष्वाकु कुल में हुआ था। प्रभु विमलनाथ जी के पिता का नाम कृतवर्मन तथा माता का नाम श्यामा था। प्रभु की देह का वर्ण स्वर्ण और इनका प्रतीक चिह्न वाराह था। प्रभु विमलनाथ जी की आयु 60लाख वर्ष थी। प्रभु के देह की ऊंचाई 60 धनुष थी। भगवान विमलनाथ ने माघ शुक्ल चतुर्थी के दिन गृह त्याग कर दीक्षा ग्रहण की। प्रभु का साधना काल तीन वर्ष का था। तीन वर्ष बाद माघ शुक्ल छठ के दिन प्रभु को निर्मल कैवल्य ज्ञान की प्राप्ति हुई। प्रभु पांच ज्ञान के धारक हो गए। इसके पश्चात प्रभु ने साधु, साध्वी, श्रावक और श्राविका नामक चार तीर्थाें को स्थापित किया और चार तीर्थाें की स्थापना करने के कारण स्वयं तीर्थंकर कहलाए। प्रभु विमलनाथ के समसवरण में 55 गणधर थें । प्रभु ने आषाढ़ कृष्ण अष्टमी को सम्मेद शिखरजी से मोक्ष प्राप्त किया। प्रभु का निर्वाण सम्मेद शिखरजी से हुआ।</p>
<p><strong>भगवान का तप कल्याणक </strong></p>
<p>एक दिन भगवान ने हेमंत ऋतु में बर्फ की शोभा को तत्क्षण में विलीन होते हुए देखा। जिससे उन्हें पूर्व जन्म का स्मरण हो गया। तत्क्षण ही भगवान विरक्त हो गए। तदनंतर देवों द्वारा लाई गई ‘देवदत्ता’ पालकी पर बैठकर सहेतुक वन में गए और स्वयं दीक्षित हो गए। उस दिन माघ शुक्ला चतुर्थी थी।</p>
<p><strong>भगवान का पूर्व भव </strong></p>
<p>पश्चिम धातकीखंड द्वीप में मेरू पर्वत से पश्चिम की ओर सीता नदी के दक्षिण तट पर रम्यकावती नाम का एक देश है। उसके महानगर में पद्मसेन राजा राज्य करता था। किसी एक दिन राजा पद्मसेन ने प्रीतिंकर वन में स्वर्गगुप्त केवली के समीप धर्म का स्वरूप जाना और यह भी जाना कि मैं तीसरे भव में तीर्थंकर होऊँगा। उस समय उसने ऐसा उत्सव मनाया कि मानों मैं तीर्थंकर ही हो गया हूं। अनंतर सोलह कारण भावनाओं द्वारा तीर्थंकर प्रकृति का बन्ध कर लिया। अंत में सहस्रार स्वर्ग में सहस्रार इंद्र हो गया।</p>
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		<title>भगवान विमलनाथ जी का मोक्ष कल्याणक 19 जून को: तिथि के अनुसार आषाढ़ कृष्ण अष्टमी को मनाया जाता है मोक्ष कल्याणक  </title>
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		<pubDate>Wed, 18 Jun 2025 06:20:14 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जैन धर्म के तेरहवें तीर्थंकर भगवान विमलनाथ जी का मोक्ष कल्याणक 19 जून को मनाया जाएगा। तिथि के अनुसार भगवान का मोक्ष कल्याणक आषाढ़ कृष्ण अष्टमी के दिन आता है। इस दिन दिगंबर जैन मंदिरों में भगवान के मोक्ष कल्याण के अवसर पर अभिषेक, शांतिधारा, निर्वाण पाठ, निर्वाण लाडू आदि चढ़ाने के साथ ही विविध [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>जैन धर्म के तेरहवें तीर्थंकर भगवान विमलनाथ जी का मोक्ष कल्याणक 19 जून को मनाया जाएगा। तिथि के अनुसार भगवान का मोक्ष कल्याणक आषाढ़ कृष्ण अष्टमी के दिन आता है। इस दिन दिगंबर जैन मंदिरों में भगवान के मोक्ष कल्याण के अवसर पर अभिषेक, शांतिधारा, निर्वाण पाठ, निर्वाण लाडू आदि चढ़ाने के साथ ही विविध विधानों से पूजन आदि किया जाता है। आराधना के इस दौर में श्रद्धालु भक्ति भाव से प्रभु को स्मरण करते हैं। <span style="color: #ff0000">श्रीफल जैन न्यूज की विशेष श्रृंखला में आज पढ़िए, उप संपादक प्रीतम लखवाल की यह संकलित प्रस्तुति&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> जैन धर्म के तेरहवें तीर्थंकर भगवान विमलनाथ जी का मोक्ष कल्याणक 19 जून को मनाया जाएगा। तिथि के अनुसार भगवान का मोक्ष कल्याणक आषाढ़ कृष्ण अष्टमी के दिन आता है। इस दिन दिगंबर जैन मंदिरों में भगवान के मोक्ष कल्याण के अवसर पर अभिषेक, शांतिधारा, निर्वाण पाठ, निर्वाण लाडू आदि चढ़ाने के साथ ही विविध विधानों से पूजन आदि किया जाता है। आराधना के इस दौर में श्रद्धालु भक्ति भाव से प्रभु को स्मरण करते हैं। भगवान विमलनाथ जी का मोक्ष कल्याणक आषाढ़ कृष्णा अष्टमी को हुआ था। यह दिन उन भक्तों के लिए खास है, जो भगवान के मोक्ष की खुशी मनाते हैं। विमलनाथ जी के मोक्ष कल्याणक तिथि आषाढ़ कृष्णा अष्टमी के दिन मनाया जाता है। भगवान ने श्री सम्मेद शिखर जी से निर्वाण प्राप्त किया था।</p>
<p>इनके समवशरण में 55 गणधर, 5500 केवली, 68,000 मुनि, 1,03,000 आर्यिका, 2 लाख श्रावक और 4 लाख श्राविकायें थीं। भगवान विमलनाथ ने खड्गासन में मोक्ष प्राप्त किया था। जैन धर्म शास्त्रों के अनुसार मोक्ष कल्याणक उस दिन का प्रतीक है, जब भगवान ने जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्ति प्राप्त की थी। यह दिन भक्तों के लिए व्रत रखने, पूजा-अर्चना करने और दान-पुण्य करने का अवसर है। निर्वाण लड्डू चढ़ाना मोक्ष प्राप्ति की खुशी का प्रतीक माना जाता है।</p>
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		<title>भगवान विमलनाथ जी का जन्म और तप कल्याणकः देश के विभिन्न तीर्थ स्थलों पर भगवान विमलनाथ जी के हैं अदभुत जिनालय </title>
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		<pubDate>Sat, 01 Feb 2025 10:28:40 +0000</pubDate>
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<p><strong>भगवान विमलनाथ जी का 2 फरवरी को जन्म और तप कल्याणक है। जब भगवान विमलनाथ जी का जन्म हुआ तब माघ महीने के शुल्क पक्ष की तृतीया तिथि थी। इस बार इस तिथि पर यह सुयोग बना है कि एक ओर भगवान विमलनाथ जी का जन्म और तप कल्याणक मनाया जाएगा तो दूसरी ओर वाग्देवी, विद्या की देवी सरस्वती का प्रकटोत्सव भी मनाया जाएगा। यह अद्भुत संयोग तो है ही इसी दिन से दशलक्षण व्रत भी आरंभ हो रहे हैं। भगवान विमलनाथ जी जैन धर्म के तेरहवें तीर्थंकर है और जैन धर्म को सही मार्ग पर ले जाने में उनकी देशनाएं जैन जन-जन तक बहुत गहराई से पहुंची है। <span style="color: #ff0000">श्रीफल जैन न्यूज की विशेष श्रृंखला के तहत भगवान विमलनाथ जी के जन्म और तप कल्याणक पर यह रिपोर्ट उप संपादक प्रीतम लखवाल की कलम से&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> भगवान विमलनाथ जी का 2 फरवरी को जन्म और तप कल्याणक है। जब भगवान विमलनाथ जी का जन्म हुआ, तब माघ महीने के शुल्क पक्ष की तृतीया तिथि थी। भगवान श्री विमलनाथ वर्तमान युग अवसरपिणीद्ध के तेरहवें तीर्थंकर थे। वे सिद्ध बन गए, एक मुक्त आत्मा जिसने अपने सभी कर्मों को नष्ट कर दिया है। भगवान श्री विमलनाथ का जन्म इक्ष्वाकु वंश के काम्पिल्य में राजा कृतवर्मा और रानी श्यामादेवी के यहां हुआ था। उनकी जन्म तिथि भारतीय कैलेंडर के माघ शुक्ल महीने की तीसरी तिथि है। बारहवें तीर्थंकर को मोक्ष पधारे हुए जब बहुत काल व्यतीत हो चुका था। तब माघ शुक्ल तृतीया के दिन तेरहवें तीर्थंकर श्री विमलनाथ जी का जन्म हुआ। कम्पिलपुर के राजा कृतवर्मा एवम उनकी महारानी श्यामादेवी को प्रभु के जनक-जननी होने का परम-सौभाग्य प्राप्त हुआ।</p>
<p><strong>राजपद का दायित्व भी वहन किया</strong></p>
<p>विमलनाथ जी ने यौवन में पदार्पण किया। माता-पिता ने अनेक सुंदर राजकन्याओं से उनका पाणिग्रहण कराया। पिता के बाद उन्होंने राजपद का दायित्व भी वहन किया। अपने विमल शासनकाल में विमलनाथ का विमल सुयश चतुर्दिक प्रशस्त हुआ।</p>
<p><strong>भगवान विमलनाथ जी का तप कल्याणक</strong></p>
<p>माघ शुक्ल चतुर्थी के दिन महाराज विमलनाथ मुनि विमलनाथ बने अर्थात प्रव्रजित हुए। तप और ध्यान की साधना में निमग्न रहते हुए दो वर्ष बाद पौष शुक्ल षष्ठी के दिन प्रभु केवली बने। तीर्थ की रचनाकर तीर्थंकर पद को उपलब्ध हुए। मंदर नामक मुनि प्रभु के ज्ये्ष्ठ शिष्य और प्रमुख गणधर थे। उनके अतिरिक्त चौपन गणधर और भी थे। धर्म-परिवार में 68 हजार साधु ,एक लाख 800 सौ साध्वियां ,दो लाख 8 हजार श्रावक एवं चार लाख 24 हजार श्राविकाए थीं। तृतीय बलदेव भद्र एवं स्वयंभू नामक वासुदेव प्रभु के अनन्य भक्त थे। आषाढ कृष्णा सप्तमी के दिन सम्मेद शिखर पर्वत से मोक्ष प्राप्त किया।</p>
<p><strong>भगवान के चिन्ह का महत्वः शूकर </strong></p>
<p>भगवान विमलनाथ के चरणों में शूकर का प्रतीक पाया जाता है। शूकर प्रायः मलिनता का प्रतीक है। ऐसे मलिन वृत्ति वाला पशु विमलनाथ भगवान के चरणों में जाकर आश्रय लेता है तो वह शुकर ‘वराह‘ कहलाने लगता है। एक समय ऐसा आता है, जब भगवान विष्णु भी वराह का रूप धारण कर दुष्ट राक्षसों का संहार करने लगते हैं। यह प्रभु का रूप स्वयं विष्णु धारण करते हैं। शूकर के जीवन से हमें दृढता एवं सहिष्णुता का गुण ग्रहण करना चाहिए।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>शुकल माघ तुरी तिथि जानिये, जनम मंगल तादिन मानिये।</p>
<p>हरि तबै गिरिराज विषै जजे, हम समर्चत आनन्द को सजे।</p>
<p>ॐ ह्रीं माघशुक्लाचतुर्थ्यां जन्ममंगलप्राप्ताय श्रीविमल अर्घ्यं नि। .</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>तप धरे सित माघ तुरी भली, निज सुधातम ध्यावत हैं रली।</p>
<p>हरि फनेश नरेश जजें तहां, हम जजें नित आनन्द सों इहां।</p>
<p>ॐ ह्रीं माघशुक्लाचतुर्थ्यां तपोमंगल प्राप्ताय श्रीविमल0 अर्घ्यं नि।</p>
<p>-ःविद्या वाचस्पति डॉ. अरविंद प्रेमचंद जैन, संरक्षक, शाकाहार परिषद्</p>
<p><strong>भगवान के प्रसिद्ध मंदिर</strong></p>
<p>काम्पिल्य जैन मंदिर, काम्पिल्य, उत्तरप्रदेश, ये 1800 साल पुराने हैं। जिनमें भगवान विमलनाथ की मूर्ति लगभग 2600 साल पुरानी है। दुबई में जैन देरासर, महाराष्ट्र धुले में श्री विमलनाथ भगवान तीर्थ स्थित हैं।</p>
<p>स्रोतः-इंटरनेट और जैन गजेट</p>
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