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	<title>भगवान मल्लिनाथ जी &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<title>भगवान मल्लिनाथ जी &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>भगवान मल्लिनाथ जी का मोक्षकल्याणक 22 फरवरी को: तिथि फाल्गुन शुक्ल पंचमी को आता है </title>
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		<pubDate>Sun, 22 Feb 2026 08:48:58 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जैन धर्म के 19वें तीर्थंकर भगवान मल्लिनाथ जी का मोक्ष कल्याणक (निर्वाण) आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने सम्मेद शिखर जी (झारखंड) के पावन पर्वत से मोक्ष प्राप्त किया था। सम्मेद शिखर जी के जिस कूट (पहाड़ी की चोटी) से उन्होंने निर्वाण प्राप्त किया, उसे निर्वाण कूट या मल्लिनाथ कूट भी कहा जाता है। [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>जैन धर्म के 19वें तीर्थंकर भगवान मल्लिनाथ जी का मोक्ष कल्याणक (निर्वाण) आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने सम्मेद शिखर जी (झारखंड) के पावन पर्वत से मोक्ष प्राप्त किया था। सम्मेद शिखर जी के जिस कूट (पहाड़ी की चोटी) से उन्होंने निर्वाण प्राप्त किया, उसे निर्वाण कूट या मल्लिनाथ कूट भी कहा जाता है। उनका मोक्ष कल्याणक इस वर्ष 22 फरवरी को आ रहा है और फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाता है। <span style="color: #ff0000">श्रीफल जैन न्यूज की विशेष शृंखला में आज पढ़िए, उपसंपादक प्रीतम लखवाल की यह प्रस्तुति&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> जैन धर्म के 19वें तीर्थंकर भगवान मल्लिनाथ जी का मोक्ष कल्याणक (निर्वाण) आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। वे इक्ष्वाकु वंश के राजा कुंभ और माता प्रभावती के पुत्र थे। उन्होंने सम्मेद शिखर जी (झारखंड) के पावन पर्वत से मोक्ष प्राप्त किया था। सम्मेद शिखर जी के जिस कूट (पहाड़ी की चोटी) से उन्होंने निर्वाण प्राप्त किया, उसे निर्वाण कूट या मल्लिनाथ कूट भी कहा जाता है। उनका मोक्ष कल्याणक इस वर्ष 22 फरवरी को आ रहा है और फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाता है। भगवान मल्लिनाथ ने संसार की नश्वरता को जानकर दीक्षा ग्रहण की थी। उन्होंने कठोर तपस्या और आत्म-चिंतन के माध्यम से पहले केवलज्ञान (परम ज्ञान) प्राप्त किया और फिर सम्मेद शिखर जी पर एक माह का योग निरोध (उपवास) कर निर्वाण पद प्राप्त किया। श्वेतांबर और दिगंबर परंपराओं में भगवान मल्लिनाथ जी के स्वरूप को लेकर भिन्नता है। श्वेतांबर परंपरा उन्हें स्त्री तीर्थंकर के रूप में मानती है जबकि, दिगंबर परंपरा के अनुसार वे पुरुष तीर्थंकर थे। हालांकि, उनके द्वारा दी गई अहिंसा और अपरिग्रह की शिक्षाएं दोनों ही परंपराओं में समान रूप से पूजनीय हैं।</p>
<p><strong>भगवान के जीवन के रोचक प्रसंग </strong></p>
<p>भगवान मल्लिनाथ जी का जीवन चरित्र जैन पुराणों में अत्यंत प्रेरक और रोचक है। उनके जीवन की सबसे खास बात उनके पूर्व जन्म के मित्र और उनके द्वारा किया गया मायाचार (छल) है। जिसके कारण उन्हें तीर्थंकर प्रकृति के साथ ’स्त्री’ (श्वेतांबर मान्यता अनुसार) या विशिष्ट शारीरिक संरचना प्राप्त हुई। भगवान मल्लिनाथ अपने पूर्व जन्म में महाबल नाम के राजा थे। उनके छह बहुत ही घनिष्ठ मित्र थे। उन सातों मित्रों ने एक साथ वैराग्य धारण किया और कठिन तपस्या करने का संकल्प लिया। सातों मित्रों ने तय किया कि वे जो भी तप या उपवास करेंगे, बिल्कुल एक समान करेंगे ताकि सबको समान फल मिले। महाबल (मल्लिनाथ का जीव) अन्य मित्रों से अधिक आत्मिक शक्ति चाहते थे। उन्होंने अपने मित्रों को बताए बिना, बीमारी या अन्य बहानों से अपने उपवास की अवधि बढ़ा दी।</p>
<p>इस छल (मायाचार) के कारण उन्होंने ‘स्त्री वेद’ का बंध किया, लेकिन अपनी कठिन तपस्या के कारण ‘तीर्थंकर नाम कर्म’ का भी अर्जन कर लिया। राजा महाबल का जीव स्वर्ग से च्युत होकर मिथिला नगरी के राजा कुंभ और माता प्रभावती के यहाँ अवतरित हुआ। उनके जन्म के समय माता को ‘मल्ल’ (फूलों की माला) धारण करने का स्वप्न आया और वे बचपन से ही अत्यंत सुंदर थे, इसलिए उनका नाम मल्लिनाथ रखा गया।</p>
<p><strong>वैराग्य की अनूठी घटना</strong></p>
<p>मल्लिनाथ जी की सुंदरता की चर्चा चारों ओर थी। उनके पूर्व जन्म के वही छह मित्र (जो अब अलग-अलग राज्यों के राजा थे) उनसे विवाह करना चाहते थे या उन्हें पाना चाहते थे। इस स्थिति को देखकर मल्लिनाथ जी ने उन्हें सत्य समझाने के लिए एक युक्ति अपनाई। उन्होंने अपनी एक हूबहू दिखने वाली स्वर्ण प्रतिमा बनवाई, जो अंदर से खोखली थी। वे रोज अपने भोजन का एक ग्रास उस प्रतिमा के अंदर डाल देते और उसे ढंक देते। कुछ समय बाद जब उन छह राजाओं को बुलाया गया और उस प्रतिमा का ढक्कन खोला गया तो उसमें से भयंकर दुर्गंध आई। मल्लिनाथ जी ने समझाया कि ‘जब इस सुंदर दिखने वाली प्रतिमा की यह स्थिति है तो हाड़-मांस के इस शरीर पर कैसा मोह? यह शरीर भीतर से अशुद्धियों से भरा है। यह देख उन छह राजाओं को जाति स्मरण (पिछले जन्म का ज्ञान) हो गया और मल्लिनाथ जी ने दीक्षा लेने का निर्णय लिया। उन्होंने सहेतुक वन में जाकर दीक्षा ग्रहण की। दीक्षा लेने के मात्र 2 दिन बाद ही उन्हें केवलज्ञान (परम ज्ञान) प्राप्त हो गया। यह किसी भी तीर्थंकर के लिए सबसे कम समय की साधना मानी जाती है। उन्होंने सत्य और अहिंसा का उपदेश दिया और अंत में सम्मेद शिखर जी से निर्वाण प्राप्त किया। भगवान मल्लिनाथ का जीवन सिखाता है कि धर्म में भी दिखावा या छल (मायाचार) करना कर्मों के बंधन का कारण बनता है। जहां सरलता होती है, वहीं परमात्मा का वास होता है।</p>
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		<title>भगवान मल्लिनाथ जी का मोक्षकल्याणक 22 फरवरी को: तिथि फाल्गुन शुक्ल पंचमी को आता है </title>
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		<pubDate>Sun, 22 Feb 2026 07:33:49 +0000</pubDate>
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<p><strong>जैन धर्म के 19वें तीर्थंकर भगवान मल्लिनाथ जी का मोक्ष कल्याणक (निर्वाण) आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने सम्मेद शिखर जी (झारखंड) के पावन पर्वत से मोक्ष प्राप्त किया था। सम्मेद शिखर जी के जिस कूट (पहाड़ी की चोटी) से उन्होंने निर्वाण प्राप्त किया, उसे निर्वाण कूट या मल्लिनाथ कूट भी कहा जाता है। उनका मोक्ष कल्याणक इस वर्ष 22 फरवरी को आ रहा है और फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाता है। <span style="color: #ff0000">श्रीफल जैन न्यूज की विशेष शृंखला में आज पढ़िए, उपसंपादक प्रीतम लखवाल की यह प्रस्तुति&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> जैन धर्म के 19वें तीर्थंकर भगवान मल्लिनाथ जी का मोक्ष कल्याणक (निर्वाण) आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। वे इक्ष्वाकु वंश के राजा कुंभ और माता प्रभावती के पुत्र थे। उन्होंने सम्मेद शिखर जी (झारखंड) के पावन पर्वत से मोक्ष प्राप्त किया था। सम्मेद शिखर जी के जिस कूट (पहाड़ी की चोटी) से उन्होंने निर्वाण प्राप्त किया, उसे निर्वाण कूट या मल्लिनाथ कूट भी कहा जाता है। उनका मोक्ष कल्याणक इस वर्ष 22 फरवरी को आ रहा है और फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाता है। भगवान मल्लिनाथ ने संसार की नश्वरता को जानकर दीक्षा ग्रहण की थी। उन्होंने कठोर तपस्या और आत्म-चिंतन के माध्यम से पहले केवलज्ञान (परम ज्ञान) प्राप्त किया और फिर सम्मेद शिखर जी पर एक माह का योग निरोध (उपवास) कर निर्वाण पद प्राप्त किया। श्वेतांबर और दिगंबर परंपराओं में भगवान मल्लिनाथ जी के स्वरूप को लेकर भिन्नता है। श्वेतांबर परंपरा उन्हें स्त्री तीर्थंकर के रूप में मानती है जबकि, दिगंबर परंपरा के अनुसार वे पुरुष तीर्थंकर थे। हालांकि, उनके द्वारा दी गई अहिंसा और अपरिग्रह की शिक्षाएं दोनों ही परंपराओं में समान रूप से पूजनीय हैं।</p>
<p><strong>भगवान के जीवन के रोचक प्रसंग </strong></p>
<p>भगवान मल्लिनाथ जी का जीवन चरित्र जैन पुराणों में अत्यंत प्रेरक और रोचक है। उनके जीवन की सबसे खास बात उनके पूर्व जन्म के मित्र और उनके द्वारा किया गया मायाचार (छल) है। जिसके कारण उन्हें तीर्थंकर प्रकृति के साथ ’स्त्री’ (श्वेतांबर मान्यता अनुसार) या विशिष्ट शारीरिक संरचना प्राप्त हुई। भगवान मल्लिनाथ अपने पूर्व जन्म में महाबल नाम के राजा थे। उनके छह बहुत ही घनिष्ठ मित्र थे। उन सातों मित्रों ने एक साथ वैराग्य धारण किया और कठिन तपस्या करने का संकल्प लिया। सातों मित्रों ने तय किया कि वे जो भी तप या उपवास करेंगे, बिल्कुल एक समान करेंगे ताकि सबको समान फल मिले। महाबल (मल्लिनाथ का जीव) अन्य मित्रों से अधिक आत्मिक शक्ति चाहते थे। उन्होंने अपने मित्रों को बताए बिना, बीमारी या अन्य बहानों से अपने उपवास की अवधि बढ़ा दी।</p>
<p>इस छल (मायाचार) के कारण उन्होंने ‘स्त्री वेद’ का बंध किया, लेकिन अपनी कठिन तपस्या के कारण ‘तीर्थंकर नाम कर्म’ का भी अर्जन कर लिया। राजा महाबल का जीव स्वर्ग से च्युत होकर मिथिला नगरी के राजा कुंभ और माता प्रभावती के यहाँ अवतरित हुआ। उनके जन्म के समय माता को ‘मल्ल’ (फूलों की माला) धारण करने का स्वप्न आया और वे बचपन से ही अत्यंत सुंदर थे, इसलिए उनका नाम मल्लिनाथ रखा गया।</p>
<p><strong>वैराग्य की अनूठी घटना</strong></p>
<p>मल्लिनाथ जी की सुंदरता की चर्चा चारों ओर थी। उनके पूर्व जन्म के वही छह मित्र (जो अब अलग-अलग राज्यों के राजा थे) उनसे विवाह करना चाहते थे या उन्हें पाना चाहते थे। इस स्थिति को देखकर मल्लिनाथ जी ने उन्हें सत्य समझाने के लिए एक युक्ति अपनाई। उन्होंने अपनी एक हूबहू दिखने वाली स्वर्ण प्रतिमा बनवाई, जो अंदर से खोखली थी। वे रोज अपने भोजन का एक ग्रास उस प्रतिमा के अंदर डाल देते और उसे ढंक देते। कुछ समय बाद जब उन छह राजाओं को बुलाया गया और उस प्रतिमा का ढक्कन खोला गया तो उसमें से भयंकर दुर्गंध आई। मल्लिनाथ जी ने समझाया कि ‘जब इस सुंदर दिखने वाली प्रतिमा की यह स्थिति है तो हाड़-मांस के इस शरीर पर कैसा मोह? यह शरीर भीतर से अशुद्धियों से भरा है। यह देख उन छह राजाओं को जाति स्मरण (पिछले जन्म का ज्ञान) हो गया और मल्लिनाथ जी ने दीक्षा लेने का निर्णय लिया। उन्होंने सहेतुक वन में जाकर दीक्षा ग्रहण की। दीक्षा लेने के मात्र 2 दिन बाद ही उन्हें केवलज्ञान (परम ज्ञान) प्राप्त हो गया। यह किसी भी तीर्थंकर के लिए सबसे कम समय की साधना मानी जाती है। उन्होंने सत्य और अहिंसा का उपदेश दिया और अंत में सम्मेद शिखर जी से निर्वाण प्राप्त किया। भगवान मल्लिनाथ का जीवन सिखाता है कि धर्म में भी दिखावा या छल (मायाचार) करना कर्मों के बंधन का कारण बनता है। जहां सरलता होती है, वहीं परमात्मा का वास होता है।</p>
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		<title>दोहों का रहस्य -52 दया अहंकार का विषय नहीं है, बल्कि यह प्रेम का स्वाभाविक रूप है : सच्चा धर्म वही है, जिसमें किसी के प्रति भी निर्दयता न हो </title>
		<link>https://www.shreephaljainnews.com/true_religion_is_that_which_has_no_cruelty_towards_anyone/</link>
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		<pubDate>Thu, 06 Mar 2025 01:30:34 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[दोहे भारतीय साहित्य की एक महत्वपूर्ण विधा हैं, जो संक्षिप्त और सटीक रूप में गहरी बातें कहने के लिए प्रसिद्ध हैं। दोहे में केवल दो पंक्तियां होती हैं, लेकिन इन पंक्तियों में निहित अर्थ और संदेश अत्यंत गहरे होते हैं। एक दोहा छोटा सा होता है, लेकिन उसमें जीवन की बड़ी-बड़ी बातें समाहित होती हैं। [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>दोहे भारतीय साहित्य की एक महत्वपूर्ण विधा हैं, जो संक्षिप्त और सटीक रूप में गहरी बातें कहने के लिए प्रसिद्ध हैं। दोहे में केवल दो पंक्तियां होती हैं, लेकिन इन पंक्तियों में निहित अर्थ और संदेश अत्यंत गहरे होते हैं। एक दोहा छोटा सा होता है, लेकिन उसमें जीवन की बड़ी-बड़ी बातें समाहित होती हैं। यह संक्षिप्तता के साथ गहरे विचारों को व्यक्त करने का एक अद्भुत तरीका है। <span style="color: #ff0000">दोहों का रहस्य कॉलम की 52वीं कड़ी में पढ़ें मंजू अजमेरा का लेख&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><span style="color: #ff0000"><strong>&#8220;दया कौन पर कीजिए, का पर निर्दय होय।</strong></span></p>
<p><span style="color: #ff0000"><strong>साईं के सब जीव हैं, किरी कंजर दोय॥&#8221;</strong></span></p>
<hr />
<p>इस दोहे का गहरा अर्थ यह है कि जब सभी प्राणी ईश्वर के बनाए हुए हैं, तो किसी एक पर दया दिखाना और किसी अन्य के प्रति निर्दयी होना, यह दर्शाता है कि हमारी दया सच्ची नहीं, बल्कि अहंकार से ग्रस्त है। कबीर इस पाखंडपूर्ण दयाभाव को उजागर कर रहे हैं और हमें यह सिखा रहे हैं कि सच्चा प्रेम और करुणा हर जीव के प्रति समान रूप से होना चाहिए। यदि कोई व्यक्ति सच्ची भक्ति और ईश्वर से सच्चा संबंध रखना चाहता है, तो उसे सभी जीवों के प्रति समान प्रेम और करुणा रखना आवश्यक है।</p>
<p>यदि हम किसी व्यक्ति को दया का पात्र मानते हैं, तो इसका अर्थ यह हुआ कि हम उसे अपने से निम्न समझ रहे हैं। जब तक हमारे मन में यह भेदभाव बना रहेगा, तब तक हमारा प्रेम और दया सच्चे नहीं हो सकते। दया अहंकार का विषय नहीं है, बल्कि यह प्रेम का स्वाभाविक रूप है।</p>
<p><strong>&#8220;साईं के सब जीव हैं&#8221;</strong></p>
<p>इस पंक्ति का गहरा अर्थ यह है कि संसार का हर प्राणी—चाहे वह मनुष्य हो, पशु-पक्षी हो, या कीट-पतंगे—सभी ईश्वर के बनाए हुए हैं। जब सभी एक ही स्रोत से आए हैं, तो फिर किसी को तुच्छ और किसी को महान मानने की मानसिकता क्यों? सभी प्राणी एक समान हैं, क्योंकि वे सभी उसी परमात्मा की सृष्टि का हिस्सा हैं।</p>
<p><strong>&#8220;का पर निर्दय होय&#8221;</strong></p>
<p>इसका अर्थ यह है कि यदि आप किसी पर दया कर रहे हैं, लेकिन किसी अन्य के प्रति निर्दयी हैं, तो आपकी दया पाखंड मात्र है। सच्चा धर्म वही है, जिसमें किसी के प्रति भी निर्दयता न हो और सभी के प्रति समान प्रेमभाव हो। यह हमें सिखाता है कि सभी प्राणियों—छोटे से छोटे जीव (कीट-पतंगे) से लेकर बड़े से बड़े प्राणी तक—समान हैं, क्योंकि वे सभी उसी परमात्मा की सृष्टि का हिस्सा हैं।</p>
<p>अगर समाज में यह सोच विकसित हो जाए कि सभी के प्रति समान भाव रखना चाहिए, तो अनेक प्रकार के भेदभाव और अन्याय समाप्त हो सकते हैं। कबीर दास जी इस दोहे में हमें यह गहरी सीख दे रहे हैं कि दया कोई दिखावे की चीज़ नहीं है, न ही यह किसी पर कृपा करने का अहंकार है। सच्ची दया वह है, जो बिना भेदभाव के, बिना अहंकार के, सभी जीवों के प्रति समान रूप से व्यक्त की जाए।</p>
<p>आज के समय में यह दोहा और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है, जब समाज में भेदभाव, अहंकार और पक्षपात बढ़ रहा है। पर्यावरण संरक्षण और पशु अधिकारों के संदर्भ में भी यह दोहा हमें सभी जीवों के प्रति करुणा रखने की प्रेरणा देता है। समाज में समानता और न्याय के सिद्धांत को स्थापित करने के लिए यह दोहा अत्यंत महत्वपूर्ण है। आध्यात्मिक और धार्मिक दृष्टि से यह हमें अहंकार मुक्त प्रेम और सेवा का मार्ग दिखाता है।</p>
<p>अंततः, कबीर हमें यह सिखाते हैं कि दयालु बनो, परंतु यह मत सोचो कि तुम किसी पर दया कर रहे हो। जब सच्चा प्रेम और करुणा मन में होंगे, तो दया अपने आप प्रकट होगी—बिना किसी भेदभाव और बिना किसी अहंकार के। सभी जीवों के प्रति करुणा का भाव रखना ही हम सबका परम कर्तव्य है।</p>
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		<title>गायत्री नगर में मनाया भगवान मल्लिनाथ जी का मोक्ष कल्याणक: मल्लिनाथ जी का सामूहिक निर्वाण लाडू चढ़ाया </title>
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		<pubDate>Tue, 04 Mar 2025 12:45:35 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जयपुर के दिगंबर जैन मंदिर प्रबंध समिति के तत्वावधान में भगवान मल्लिनाथ जी का मोक्ष कल्याणक मनाया गया। सभी ने मंदिर में अभिषेक, शांतिधारा सहित अन्य विधान किए गए। निर्वाण लाडू भी चढ़ाया गया। पढ़िए जयपुर से उदयभान जैन की यह खबर&#8230; जयपुर। दिगंबर जैन मंदिर प्रबंध समिति गायत्री नगर महारानी फार्म के तत्वावधान में [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>जयपुर के दिगंबर जैन मंदिर प्रबंध समिति के तत्वावधान में भगवान मल्लिनाथ जी का मोक्ष कल्याणक मनाया गया। सभी ने मंदिर में अभिषेक, शांतिधारा सहित अन्य विधान किए गए। निर्वाण लाडू भी चढ़ाया गया। <span style="color: #ff0000">पढ़िए जयपुर से उदयभान जैन की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p>जयपुर। दिगंबर जैन मंदिर प्रबंध समिति गायत्री नगर महारानी फार्म के तत्वावधान में मंदिर में मंगलवार को सुबह 7बजे से जैन धर्म के 19 वें तीर्थंकर भगवान मल्लिनाथ जी का मोक्ष कल्याणक श्रद्धा भक्ति से मनाया। इस अवसर पर सुबह श्री जी के प्रथम अभिषेक, शांतिधारा, निर्वाण लाडू चढ़ाने का सौभाग्य प्रदीप-मीता पहाड़िया परिवार ईटानगर वालों को प्राप्त हुआ। निर्वाण कांड बोलकर भगवान मल्लिनाथ जी का सामूहिक निर्वाण लाडू चढ़ाया गया। इस अवसर पर मंदिर प्रबंध समिति के अध्यक्ष कैलाश छाबड़ा, उपाध्यक्ष अरुण शाह, मंत्री राजेश शाह, जैन पत्रकार महासंघ के राष्ट्रीय महामंत्री उदयभान जैन, एडवोकेट विमल जैन, दीपेश छाबड़ा, बसंत बाकलीवाल, संजय ठोलिया, रघु विहार विकास समिति के अध्यक्ष सुरेश जैन, दिगंबर जैन सोशल ग्रुप भारती की अध्यक्षता प्रमिला शाह आदिनाथ महिला मंडल की प्रचार मंत्री अनिता बड़जात्या आदि उपस्थित थे। जिन्होंने सामूहिक निर्वाण लाडू चढ़ाकर सामुहिक आरती की। सभी मांगलिक क्रियाएं विधानाचार्य पं. अजीत शास्त्री ने करवाई। सभा संचालन अरुण शाह ने किया।</p>
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		<title>भगवान मल्लिनाथ जी का मोक्ष कल्याणक 4 मार्च को: तिथि के अनुसार मोक्ष कल्याणक फाल्गुन शुक्ल पंचमी को। इस बार यह 4 मार्च को आ रहा है।  </title>
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		<pubDate>Mon, 03 Mar 2025 14:56:51 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[भगवान मल्लिनाथ जी जैन धर्म के उन्नीसवें तीर्थंकर हैं। इनका मोक्ष कल्याणक 4 मार्च को मनाया जाएगा। फाल्गुुन शुक्ल पंचमी के तिथि को भगवान ने 500 साधुओं के संग सम्मेद शिखर पर निर्वाण (मोक्ष) को प्राप्त किया था। इस दिन देश भर के दिगंबर जैन समाज के मंदिरों, चैत्यालयों में अभिषेक, शांतिधारा, निर्वाण लाडू चढ़ाने [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>भगवान मल्लिनाथ जी जैन धर्म के उन्नीसवें तीर्थंकर हैं। इनका मोक्ष कल्याणक 4 मार्च को मनाया जाएगा। फाल्गुुन शुक्ल पंचमी के तिथि को भगवान ने 500 साधुओं के संग सम्मेद शिखर पर निर्वाण (मोक्ष) को प्राप्त किया था। इस दिन देश भर के दिगंबर जैन समाज के मंदिरों, चैत्यालयों में अभिषेक, शांतिधारा, निर्वाण लाडू चढ़ाने सहित अन्य विधान और पूजन आदि किए जाएंगे। <span style="color: #ff0000">श्रीफल जैन न्यूज की विशेष श्रंखला के तहत आज भगवान मल्लिनाथ जी के मोक्ष कल्याणक पर उपसंपादक प्रीतम लखवाल की यह प्रस्तुति पढ़िए&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> भगवान मल्लिनाथ जी जैन धर्म के उन्नीसवें तीर्थंकर हैं। इनका मोक्ष कल्याणक 4 मार्च को मनाया जाएगा। फाल्गुुन शुक्ल पंचमी के तिथि को भगवान ने 500 साधुओं के संग सम्मेद शिखर पर निर्वाण (मोक्ष) को प्राप्त किया था। इस दिन देश भर के दिगंबर जैन समाज के मंदिरों, चैत्यालयों में अभिषेक, शांतिधारा, निर्वाण लाडू चढ़ाने सहित अन्य विधान और पूजन आदि किए जाएंगे। भगवान श्री मल्लिनाथ जी ने हमेशा सत्य और अहिंसा का अनुसरण किया और अनुयायियों को भी इसी राह पर चलने का संदेश दिया। इससे जैन धर्म की नींव को आधार मिला। जैन धर्म भारत वर्ष का प्राचीन धर्म है। इसी धर्म में तीर्थंकरों की अगली पंक्ति में भगवान श्री मल्लिनाथ जी का स्थान सर्वोपरि है। इनका जन्म मिथिलापुरी के इक्ष्वाकुवंश में मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष एकादशी को अश्विन नक्षत्र में हुआ था। माता का नाम रक्षिता देवी और पिता का नाम राजा कुंभराज था। इनके शरीर का वर्ण नीला था जबकि, इनका चिन्ह कलश था। इनके यक्ष का नाम कुबेर और यक्षिणी का नाम धरणप्रिया देवी था।</p>
<p><strong>भगवान श्री मल्लिनाथ जी स्वामी के गणधरों की संख्या 28 थी</strong></p>
<p>जैन धर्मावलंबियों के अनुसार भगवान श्री मल्लिनाथ जी स्वामी के गणधरों की संख्या 28 थी। जिनमें अभीक्षक स्वामी इनके प्रथम गणधर थे। तीर्थंकर भगवान श्री मल्लिनाथ जी ने मिथिलापुरी में मार्गशीर्ष माह शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को दीक्षा की प्राप्ति की थी और दीक्षा के बाद 2 दिन बाद खीर से इन्होंने प्रथम पारणा किया था। दीक्षा के बाद एक दिन-रात तक कठोर तप करने के बाद भगवान श्री मल्लिनाथ जी को मिथिलापुरी में ही अशोक वृक्ष के नीचे कैवल्यज्ञान की प्राप्ति हुई थी। भगवान श्री मल्लिनाथ जी ने हमेशा सत्य और अहिंसा का अनुसरण किया और अनुयायियों को भी इसी राह पर चलने का संदेश दिया। उनका यह संदेश आज भी प्रासंगिक होकर जैन धर्म अनुयायियों के लिए प्रेरणास्पद है। भगवान मल्लिनाथ जी ने फाल्गुन माह शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को 500 साधुओं के साथ सम्मेद शिखर पर निर्वाण (मोक्ष) को प्राप्त किया था।</p>
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