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	<title>भगवान ऋषभदेव &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<title>भगवान ऋषभदेव &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>इंद्रिय संयम से आत्मशुद्धि तक : अक्षय तृतीया का जैन स्वरूप, सम्यक् भाव, सम्यक् पात्र और अक्षय पुण्य का त्रिकोण </title>
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		<pubDate>Sun, 19 Apr 2026 18:30:55 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जहाँ एक क्षण का शुद्ध संकल्प भी कालजयी बन जाता है और भीतर का मौन साधन अनंत पुण्य की धारा में बहने लगता है—उसी दिव्य अनुभूति का नाम है अक्षय तृतीया। यह केवल पंचांग की एक तिथि नहीं, बल्कि जैन दर्शन की उस सूक्ष्म चेतना का उत्सव है, जहाँ त्याग, संयम और करुणा मिलकर समय [&#8230;]]]></description>
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<p>जहाँ एक क्षण का शुद्ध संकल्प भी कालजयी बन जाता है और भीतर का मौन साधन अनंत पुण्य की धारा में बहने लगता है—उसी दिव्य अनुभूति का नाम है अक्षय तृतीया। यह केवल पंचांग की एक तिथि नहीं, बल्कि जैन दर्शन की उस सूक्ष्म चेतना का उत्सव है, जहाँ त्याग, संयम और करुणा मिलकर समय को भी आध्यात्मिक आयाम प्रदान कर देते हैं। <span style="color: #ff0000">अक्षय तृतीया पर बड़वानी से प्रो. आरके जैन &#8216;अरिजीत&#8217; का आलेख पढ़िए&#8230;</span></p>
<hr />
<p>जहाँ एक क्षण का शुद्ध संकल्प भी कालजयी बन जाता है और भीतर का मौन साधन अनंत पुण्य की धारा में बहने लगता है—उसी दिव्य अनुभूति का नाम है अक्षय तृतीया। यह केवल पंचांग की एक तिथि नहीं, बल्कि जैन दर्शन की उस सूक्ष्म चेतना का उत्सव है, जहाँ त्याग, संयम और करुणा मिलकर समय को भी आध्यात्मिक आयाम प्रदान कर देते हैं। वैशाख शुक्ल तृतीया का यह दिव्य दिवस केवल परंपरा का स्मरण नहीं, बल्कि उस ऐतिहासिक क्षण की पुनर्स्मृति है जब एक क्षुधा-तपस्वी और एक श्रद्धालु सम्राट ने दान की शाश्वत संस्कृति को जन्म दिया। जैन परंपरा में यह दिन इसलिए अनुपम माना गया है क्योंकि यह साधारण “आरंभ” को “अक्षय अनंतता” में रूपांतरित करने की सामर्थ्य रखता है।</p>
<p>जैन परंपरा के अनुसार, अक्षय तृतीया का सर्वाधिक मार्मिक प्रसंग प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव (आदिनाथ) से जुड़ा है। दीर्घकालीन तपस्या (लगभग 400 दिन) के बाद जब उनका शरीर अत्यंत क्षीण हो गया, तब उन्हें आहार की आवश्यकता हुई। किंतु दीक्षा के बाद वे पूर्ण संयम की अवस्था में थे, इसलिए लोग उन्हें दोषरहित (निर्दोष) आहार नहीं दे पा रहे थे। इसी समय इक्ष्वाकु वंश के युवराज श्रेयांश कुमार को अपनी पूर्व जन्म-स्मृति (जातिस्मरण ज्ञान) से यह समझ प्राप्त हुई कि भगवान ऋषभदेव को इक्षु रस (गन्ने का रस) अर्पित करना ही उचित है। यह क्षण केवल आहार ग्रहण का नहीं, बल्कि “दान-धर्म के शुद्ध स्वरूप” की स्थापना का क्षण था।</p>
<p>इस घटना की सबसे अनूठी विशेषता यह है कि जैन परंपरा में इसे “प्रथम आहार-दान” के रूप में नहीं, बल्कि “सही पात्र, सही समय और सही भावना” के त्रि-संयोग के रूप में देखा जाता है। यहाँ दान केवल वस्तु नहीं, बल्कि आत्मिक समझ का परिणाम बन जाता है। युवराज श्रेयांश का यह दान किसी प्रदर्शन या परंपरा के दबाव में नहीं था, बल्कि सहज करुणा और स्मृति-ज्ञान से उत्पन्न हुआ था। इसी कारण यह घटना जैन धर्म में दान की परिभाषा को स्थायी रूप से स्थापित कर देती है कि दान तभी सार्थक है जब उसमें अहंकार का विलय हो।</p>
<p>अक्षय तृतीया का एक विशिष्ट और अपेक्षाकृत अल्प-चर्चित आयाम यह है कि जैन परंपरा इसे “स्वयं-सिद्ध शुभ मुहूर्त” या “सिद्ध तिथि” के रूप में मानती है। अर्थात इस दिन किसी भी ज्योतिषीय गणना या विशेष मुहूर्त की आवश्यकता नहीं पड़ती। यह अवधारणा जैन दर्शन के उस गहन सिद्धांत पर आधारित है जिसमें समय स्वयं निरपेक्ष माना गया है, और पुण्य-पाप का निर्धारण केवल भाव एवं कर्म से होता है। इसी कारण इस दिन किया गया दान, व्रत और साधना “कालातीत फल” प्रदान करने वाला माना जाता है, जिसका प्रभाव समय की सीमाओं से परे विस्तृत होता है।</p>
<p>इस पर्व की साधना-परंपरा अत्यंत विशिष्ट और अनुशासित मानी जाती है। जैन साधु एवं श्रावक इस दिन उपवास, एकासन अथवा आयंबिल जैसे कठोर व्रतों का पालन करते हैं। आयंबिल में बिना मसाले, बिना स्वाद और अत्यंत सादा भोजन ग्रहण किया जाता है, जिससे इंद्रियों पर संयम और अधिक गहरा होता है। कई स्थानों पर मौन-व्रत भी धारण किया जाता है, ताकि विचारों की निर्मलता और अंतर्मुखता विकसित हो सके। यह साधना केवल शरीर का अनुशासन नहीं, बल्कि मन को अनासक्ति और आत्मशुद्धि की दिशा में अग्रसर करने का माध्यम है।</p>
<p>अक्षय तृतीया पर दान की परंपरा अत्यंत सूक्ष्म, गहन और अर्थपूर्ण मानी जाती है। यहाँ दान केवल धन या भौतिक वस्तुओं तक सीमित नहीं रहता, बल्कि “ज्ञान, सेवा और संरक्षण” के रूप में भी विस्तारित होता है। अनेक जैन समुदाय इस दिन प्राचीन हस्तलिखित ग्रंथों के संरक्षण, मंदिर-ग्रंथालयों के पुनरुद्धार तथा दुर्लभ शास्त्रों के पुनर्लेखन जैसे पुण्य कार्य करते हैं। यह परंपरा स्पष्ट करती है कि जैन समाज में ज्ञान को भी उतनी ही पवित्रता प्राप्त है, जितनी अन्न और वस्त्र के दान को।</p>
<p>इस पर्व का एक विशेष और विशिष्ट आयाम कर्म-संतुलन की चेतना का जागरण है। जैन दर्शन के अनुसार प्रत्येक आत्मा अपने कर्मों के बंधन में जकड़ी होती है, और उनसे मुक्ति का मार्ग तप तथा दान के माध्यम से प्रशस्त होता है। अक्षय तृतीया इस सिद्धांत को व्यवहार में उतारने का सशक्त अवसर प्रदान करती है। इस दिन किए गए छोटे-से-छोटे पुण्य कर्म—जैसे किसी को जल पिलाना, किसी जीव की रक्षा करना या संयम का पालन करना—भी कर्म-निर्वाण की दिशा में महत्वपूर्ण साधन माने जाते हैं।</p>
<p>आज के समय में यह पर्व एक नई और व्यापक दिशा भी ग्रहण कर रहा है, जहाँ परंपरा और आधुनिकता सह-अस्तित्व में आगे बढ़ती हैं। जैन समाज इस दिन पर्यावरण संरक्षण, वृक्षारोपण, जल-संरक्षण तथा जीव-अहिंसा से जुड़े विभिन्न अभियानों की शुरुआत करता है। यह परिवर्तन इस तथ्य का संकेत है कि अक्षय तृतीया केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि वर्तमान की जिम्मेदारी और भविष्य की दिशा निर्धारण का भी माध्यम है। इस प्रकार यह पर्व जैन दर्शन की उस मूल भावना को सजीव रखता है कि शुद्ध भाव से किया गया प्रत्येक कर्म अक्षय फल प्रदान करता है।</p>
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		<title>भगवान ऋषभदेव की स्तुति से भक्तिमय हो गया माहौल: ऋषभदेव पखवाड़े के तहत विद्यालय में हुए आर्यिकाओं के प्रवचन </title>
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		<pubDate>Tue, 14 Apr 2026 13:13:05 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[उपखंड क्षेत्र के राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय कोयला में विद्यालयी शिक्षा विभाग के आदेश की अनुपलना में नवीन शिक्षण सत्र में शुभारंभ ऋषभ पखवाड़े के तहत आचार्य श्री सन्मति महाराज और आचार्य श्री सिद्धांत सागर जी की शिष्या गणिनी आर्यिकारत्न श्री संगममति माताजी ने विद्यार्थियों को प्रवचन के माध्यम से देवाधिदेव भगवान ऋषभदेव के जीवन [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>उपखंड क्षेत्र के राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय कोयला में विद्यालयी शिक्षा विभाग के आदेश की अनुपलना में नवीन शिक्षण सत्र में शुभारंभ ऋषभ पखवाड़े के तहत आचार्य श्री सन्मति महाराज और आचार्य श्री सिद्धांत सागर जी की शिष्या गणिनी आर्यिकारत्न श्री संगममति माताजी ने विद्यार्थियों को प्रवचन के माध्यम से देवाधिदेव भगवान ऋषभदेव के जीवन के बारे में बताया। <span style="color: #ff0000">बामनवास से पढ़िए, यह रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>बामनवास।</strong> उपखंड क्षेत्र के राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय कोयला में विद्यालयी शिक्षा विभाग के आदेश की अनुपलना में नवीन शिक्षण सत्र में शुभारंभ ऋषभ पखवाड़े के तहत आचार्य श्री सन्मति महाराज और आचार्य श्री सिद्धांत सागर जी की शिष्या गणिनी आर्यिकारत्न श्री संगममति माताजी ने विद्यार्थियों को प्रवचन के माध्यम से देवाधिदेव भगवान ऋषभदेव के जीवन के बारे में बताते हुए उनके सिद्धांतों को जीवन में उतरने की सीख दी। कार्यक्रम का शुभारंभ राजकीय विद्यालय की प्रधानाचार्य अनिता मीणा ने देवाधिदेव ऋषभदेव भगवान और मां सरस्वती चित्र के समक्ष दीप प्रज्वलन कर किया। इसके बाद विद्यार्थियों ने ऋषभ देव की स्तुति की। जिससे सम्पूर्ण वातावरण आध्यात्मिक ऊर्जा एवं सकारात्मकता से ओतप्रोत हो गया। इस अवसर पर वर्धमान कोचिंग की निदेशक एकता जैन ने प्रधानाचार्य अनिता मीणा का दुपट्टा पहनाते हुए जय जिनेंद्र का बैज लगाकर उनका स्वागत सम्मान किया।</p>
<p>विद्यालय के शिक्षक बाबूलाल जैन ने देवाधिदेव ऋषभदेव भगवान के बारे में विद्यार्थियों को जानकारी प्रदान की। प्रधानाचार्य अनिता मीणा ने बताया कि शिक्षा विभाग अभिनव पहल पर किया जा रहा ऋषभदेव पखवाड़ा विद्यार्थियों के अंदर छुपी हुई प्रतिभा को सामने ला रहा है। विधार्थी की आयु के अनुसार प्रतियोगिताओं का आयोजन करने से बालक सहज रूप से अपनी प्रतिभा का उत्कृष्ट प्रदर्शन कर रहे है। वर्तमान परिपेक्ष्य में भगवान ऋषभदेव भगवान के संदेश जियो और जीने दो,शान्ति से रहने दो के सिद्धान्त ही विश्व को शान्ति की ओर ले जा सकते हैं।</p>
<p><strong>’विधार्थियों को आर्यिकाओं का विशेष प्रवचन’</strong></p>
<p>आर्यिका श्री संगममति माताजी ने बताया कि भगवान ऋषभदेव युग के शुरुआत जब हुई जब योगभूमि समाप्त हो रही थी तब अयोध्या की पावन धरा पर ऋषभदेव का जन्म हुआ वे बचपन से ही अत्यन्त शांत, तेजस्वी और मानवीय गुणों से भरपूर था स उन्होंने संसार को जीवन जीने की कला सिखाई। समाज को व्यवस्थित करने के लिए वर्णों की स्थापना कि जिससे मनुष्य अनुशासन के साथ रह सकें। आर्यिका 105 संयोमती माताजी ने बताया कि ऋषभदेव के 100 पुत्र थे,जिनमें चक्रवर्ती सम्राट भरत के नाम से अपने देश का नाम भारत पड़ा। उनकी पुत्रीयों ब्राह्मी और सुंदरी ने लिपि और अंक विद्या का ज्ञान दिया। जिसके कारण आज हम लिख पढ़ पा रहे है। क्षुल्लिका सम्पर्कमति माताजी, सानिध्यमति माताजी और समर्पितमति माताजी ने बताया कि भगवान ऋषभदेव भगवान के बताए सिद्धांतों को अपने जीवन उतारते हुए सभी बच्चे उन्नति के पथ पर अग्रसर हो और अपने माता-पिता और गुरुओं का सदा सम्मान करें।</p>
<p><strong>यह अतिथि और नागरिक गण उपस्थित रहे। </strong></p>
<p>इस अवसर पर विद्यालय के शिक्षक मनोज कुमार मीणा,राधेश्याम मीणा,धर्मसिंह मीणा,निलमणि मीणा,पूनम सैनी, नेमीचन्द मीणा,नेतराम मीणा मीणा,गंगाराम मीणा,घनश्याम मीणा,बाबूलाल जैन,अमित कुमार, कमरुद्दीन खांन, मीरा गुप्ता, मोहसीन खान, बनवारी लाल जांगिड़,नीलम सैनी,समयराज गुर्जर और वर्धमान दिगम्बर जैन विकास समिति के सदस्य सुनील कुमार जैन,सुमनलता जैन एवं संयोमति माताजी के संघ के साथ पैदल विहार में सहयोग प्रदान करने वाले विजय जैन,प्रदीप जैन,ममता जैन,मोनिका जैन,अरविन्द कुमार, शुभम कुमार,अनिकेत कुमार, लक्ष्मण कुमार आदि उपस्थित थे।</p>
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		<title>आचार्य श्री प्रज्ञा सागर जी के सानिध्य में अमृत स्नान महोत्सव : गायत्री नगर में तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव का होगा महामस्तिकाभिषेक  </title>
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		<pubDate>Fri, 10 Apr 2026 09:39:15 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[महावीर तपोभूमि उज्जैन और गोलोक धाम के प्रणेता आचार्य प्रज्ञा सागर जी के 41 वें गृह त्याग दिवस के अवसर पर श्री दिगंबर जैन मंदिर महारानी फार्म गायत्री नगर में शुक्रवार को प्रातः 8.30 बजे से आचार्य श्री की प्रेरणा और आशीर्वाद से मंदिर प्रबंध समिति के तत्वावधान में अमृत स्नान महोत्सव हुआ। जयपुर से [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>महावीर तपोभूमि उज्जैन और गोलोक धाम के प्रणेता आचार्य प्रज्ञा सागर जी के 41 वें गृह त्याग दिवस के अवसर पर श्री दिगंबर जैन मंदिर महारानी फार्म गायत्री नगर में शुक्रवार को प्रातः 8.30 बजे से आचार्य श्री की प्रेरणा और आशीर्वाद से मंदिर प्रबंध समिति के तत्वावधान में अमृत स्नान महोत्सव हुआ। <span style="color: #ff0000">जयपुर से पढ़िए, उदयभान जैन की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong> जयपुर</strong>। महावीर तपोभूमि उज्जैन और गोलोक धाम के प्रणेता आचार्य प्रज्ञा सागर जी के 41 वें गृह त्याग दिवस के अवसर पर श्री दिगंबर जैन मंदिर महारानी फार्म गायत्री नगर में शुक्रवार को प्रातः 8.30 बजे से आचार्य श्री की प्रेरणा और आशीर्वाद से मंदिर प्रबंध समिति के तत्वावधान में अमृत स्नान महोत्सव हुआ। सर्वप्रथम धर्म सभा में मंगलाचरण मंजू सेवा वाली ने किया। गजेंद्र प्रीति छाबड़ा परिवार की ओर से आचार्य श्री का पाद प्रक्षालन किया गया और शास्त्र भेंट किए।</p>
<p>मंदिर प्रबंध समिति के अध्यक्ष कैलाश छाबड़ा, उपाध्यक्ष अरुण शाह, संयुक्त मंत्री मुकेश सोगानी ने गुरु आस्था परिवार के प्रांतीय अध्यक्ष देवेंद्र बाकलीवाल निमोडिया वालों और गजेंद्र छाबड़ा का अभिनंदन किया।</p>
<p><strong>1 घंटे तक विभिन्न मुद्राओं में स्नान कराया</strong></p>
<p>आचार्य श्री ने णमोकार दिवस पर णमोकार महामंत्र के संबंध में धर्मसभा में प्रकाश डाला और कहा कि 24 घंटे का अखंड सामूहिक पाठ जरुर कराया जाए। धर्म सभा में अमृत स्नान के अंतर्गत सर्वप्रथम आचार्य श्री ने मंत्रोच्चारण से शुभारंभ किया और उन्होंने ऋद्धि मंत्रों से लगभग 1 घंटे तक विभिन्न मुद्राओं में स्नान कराया। स्नान के संबंध में उपस्थित पुरुष वर्ग सफेद वस्त्रों व महिलाएं पीले वस्त्रों में शोभायमान थे। उनका श्रीफल मंत्रित कराया और रोग शोक और विद्या धन प्राप्ति के लिए अपने-अपने घरों, पूजा स्थलों, रसोई घरों में मंत्रित श्रीफल रखने की विधि बताई।</p>
<p><strong>ऋषभदेव का महामस्तिकाभिषेक 170 कलशों से </strong></p>
<p>सभा का संचालन मंदिर प्रबंध समिति के उपाध्यक्ष अरुण शाह ने किया और यह ऐतिहासिक प्रथम बार अमृत महोत्सव हुआ। उसके लिए आचार्य श्री के उपकारों के लिए कोटि-कोटि नमन किया। 11 अप्रैल को मंदिर में सामूहिक कलश और शांति धारा 7 बजे से होगी और मूलनायक प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव का महामस्तिकाभिषेक 170 कलशों से किया जाएगा। इस अवसर पर आचार्य श्री के 41 वें गृह त्याग दिवस पर 41 पुरुषों को जो नियमित अभिषेक करेंगे गुरु आस्था परिवार गायत्री नगर सम्मानित करेगा। इस अवसर पर विभिन्न कॉलोनी से अनेकों गुरु भक्त चेतन निमोडिया, पवन निमोडिया, मनोज बोहरा, आलोक चौकडियात चाकसू वाले आदि उपस्थित थे।</p>
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		<title>भगवान महावीर के जन्म कल्याणक पर आयोजन : राष्ट्रीय निबंध प्रतियोगिता में 7 छात्रों ने लिया हिस्सा </title>
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		<pubDate>Sat, 28 Mar 2026 12:54:23 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[भारतवर्षीय श्रमण संस्कृति परीक्षा बोर्ड, सांगानेर द्वारा आदि तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव (आदिनाथ) एवं चरम तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी के जन्म कल्याणक पर्व के उपलक्ष्य में आयोजित राष्ट्रीय निबंध प्रतियोगिता में दिगंबर जैन पाठशाला, डडूका के 7 प्रतिभाशाली छात्र-छात्राओं ने उत्साहपूर्वक सहभागिता की। पढ़िए यह विशेष रिपोर्ट&#8230; डडूका। भारतवर्षीय श्रमण संस्कृति परीक्षा बोर्ड, सांगानेर द्वारा आदि [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>भारतवर्षीय श्रमण संस्कृति परीक्षा बोर्ड, सांगानेर द्वारा आदि तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव (आदिनाथ) एवं चरम तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी के जन्म कल्याणक पर्व के उपलक्ष्य में आयोजित राष्ट्रीय निबंध प्रतियोगिता में दिगंबर जैन पाठशाला, डडूका के 7 प्रतिभाशाली छात्र-छात्राओं ने उत्साहपूर्वक सहभागिता की। <span style="color: #ff0000">पढ़िए यह विशेष रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>डडूका।</strong> भारतवर्षीय श्रमण संस्कृति परीक्षा बोर्ड, सांगानेर द्वारा आदि तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव (आदिनाथ) एवं चरम तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी के जन्म कल्याणक पर्व के उपलक्ष्य में आयोजित राष्ट्रीय निबंध प्रतियोगिता में दिगंबर जैन पाठशाला, डडूका के 7 प्रतिभाशाली छात्र-छात्राओं ने उत्साहपूर्वक सहभागिता की।</p>
<p><strong>दो विषयों पर दी गई निबंध प्रविष्टियां</strong></p>
<p>पाठशाला प्रेरक एवं आयोजन संयोजक अजीत कोठिया ने जानकारी देते हुए बताया कि प्रतियोगिता के अंतर्गत दो प्रमुख विषय निर्धारित किए गए थे—</p>
<p>1. भगवान आदिनाथ के षट्कर्म</p>
<p>2. भगवान महावीर की अहिंसा</p>
<p>इन विषयों पर डडूका पाठशाला से निश्चल जैन, मिष्ठी जैन, माही जैन, भाग्य एस. जैन, हर्षल जैन, सिद्धम जैन एवं दीक्षिता सेठ ने लगभग 800 शब्दों में अपने निबंध प्रस्तुत किए।</p>
<p><strong>दो वर्गों में आयोजित हुई प्रतियोगिता</strong></p>
<p>कोठिया ने बताया कि प्रतियोगिता दो वर्गों जूनियर एवं सीनियर में आयोजित की गई। जूनियर वर्ग में 12 वर्ष तक के छात्र-छात्राओं तथा सीनियर वर्ग में 12 वर्ष से अधिक आयु के प्रतिभागियों ने भाग लिया। प्रतियोगिता के विजेताओं को भारतवर्षीय श्रमण संस्कृति परीक्षा बोर्ड, सांगानेर द्वारा अखिल भारतीय स्तर पर सम्मानित किया जाएगा।</p>
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		<title>गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी के सानिध्य में आयोजन: भगवान ऋषभदेव जन्मजयंती हर्षोल्लासपूर्वक सम्पन्न </title>
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		<pubDate>Fri, 20 Mar 2026 08:38:01 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[भगवान ऋषभदेव की जन्मजयंती हर्षोल्लासपूर्वक एवं प्रभावना के साथ सम्पन्न की गई। शाश्वत तीर्थ अयोध्या में गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी के सानिध्य में यह भव्य कार्यक्रम आयोजित हुआ। अयोध्या स्थित श्री दिगम्बर जैन मंदिर, रायगंज में प्रातःकाल ऐरावत हाथी पर सौधर्म इन्द्र के रूप में अध्यात्म जैन, अर्पिता जैन एवं सम्यक जैन (लखनऊ) द्वारा भगवान [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>भगवान ऋषभदेव की जन्मजयंती हर्षोल्लासपूर्वक एवं प्रभावना के साथ सम्पन्न की गई। शाश्वत तीर्थ अयोध्या में गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी के सानिध्य में यह भव्य कार्यक्रम आयोजित हुआ। अयोध्या स्थित श्री दिगम्बर जैन मंदिर, रायगंज में प्रातःकाल ऐरावत हाथी पर सौधर्म इन्द्र के रूप में अध्यात्म जैन, अर्पिता जैन एवं सम्यक जैन (लखनऊ) द्वारा भगवान के जन्मकल्याणक को पाण्डुक शिला पर अभिषेक कर मनाया गया। <span style="color: #ff0000">पढ़िए अभिषेक अशोक पाटील की रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>अयोध्या।</strong> भगवान ऋषभदेव की जन्मजयंती हर्षोल्लासपूर्वक एवं प्रभावना के साथ सम्पन्न की गई। शाश्वत तीर्थ अयोध्या में गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी के सानिध्य में यह भव्य कार्यक्रम आयोजित हुआ। अयोध्या स्थित श्री दिगम्बर जैन मंदिर, रायगंज में प्रातःकाल ऐरावत हाथी पर सौधर्म इन्द्र के रूप में अध्यात्म जैन, अर्पिता जैन एवं सम्यक जैन (लखनऊ) द्वारा भगवान के जन्मकल्याणक को पाण्डुक शिला पर अभिषेक कर मनाया गया। परम पूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ससंघ के सानिध्य एवं आचार्य श्री भद्रबाहू सागर जी महाराज ससंघ के मार्गदर्शन में भगवान ऋषभदेव एवं चक्रवर्ती भरत स्वामी की जन्मजयंती का कार्यक्रम अत्यंत भावनापूर्वक सम्पन्न हुआ।</p>
<p><strong>हुआ भव्य विधान</strong></p>
<p>कार्यक्रम के अंतर्गत प्रातःकाल रायगंज मंदिर स्थित पाण्डुक शिला पर भगवान का पंचामृत अभिषेक एवं भगवान ऋषभदेव विधान सम्पन्न किया गया। इसके पश्चात विशाल रथयात्रा अयोध्या तीर्थ के मुख्य मार्गों से होती हुई भगवान ऋषभदेव की जन्मस्थान टोंक पर पहुँची, जहाँ भगवान का पंचामृत अभिषेक सम्पन्न हुआ। जन्मस्थान पर स्थित भगवान के प्राचीन चरणों का भी अभिषेक किया गया।</p>
<p><strong>निकाली गई रथयात्रा</strong></p>
<p>रथयात्रा में ऐरावत हाथी, अवध प्रांत के विभिन्न जैन मंदिरों से विराजमान भगवंतों की झांकियाँ, रथ-बग्गियाँ, साधुगण, मंगल कलश लिए महिलाएँ एवं पुरुष वर्ग पूजन वेशभूषा में बैंड-बाजों के साथ भगवान के अहिंसामयी सिद्धांतों का शंखनाद करते हुए सम्मिलित हुए। रथयात्रा में भगवान को लेकर बैठने का सौभाग्य श्री सुभाषचंद सुयश जैन (लखनऊ, टिकेटनगर) को प्राप्त हुआ, जबकि सारथी के रूप में श्री विनोद कुमार शकुंतला जैन (उत्तमनगर, दिल्ली) रहे। भगवान भरत को लेकर परमेन्द्र जैन परिवार (टिकेटनगर) ने सहभागिता की। धनकुबेर सिद्धार्थ जैन एवं दीप्ति जैन (लखनऊ) भी रथयात्रा में सम्मिलित हुए।</p>
<p>रथयात्रा रामपथ होते हुए तुलसी उद्यान, स्वर्गद्वार स्थित जन्मस्थान टोंक पहुँची। मार्ग में भगवान के जन्मकल्याणक के उपलक्ष्य में नगरवासियों को लड्डू-मिष्ठान का वितरण किया गया तथा पूजन-अभिषेक सम्पन्न हुआ।</p>
<p><strong>इन्हें मिला सौभाग्य</strong></p>
<p>मध्याह्न में रायगंज दिगम्बर जैन मंदिर में भगवान ऋषभदेव की 31 फुट ऊँची विशाल प्रतिमा का परम्परागत मस्तकाभिषेक अनेक द्रव्यों से किया गया। सर्वप्रथम कलश करने का सौभाग्य सुभाषचंद शुभम जैन (फैजाबाद) को प्राप्त हुआ। द्वितीय कलश डॉ. राधा जैन एवं दिनेश जैन (लखनऊ), तृतीय कलश श्री राजकुमार जैन (पटना) द्वारा सम्पन्न किया गया।</p>
<p><strong> इसके अतिरिक्त विभिन्न द्रव्यों से अभिषेक इस प्रकार सम्पन्न हुआ&#8230;</strong></p>
<p>नारियल जल से नितीश कुमार चौक (लखनऊ), इक्षुरस से श्री पुखराज पाण्डया (गोरखपुर), घी से अभिषेक श्री चन्द्रशेखर कासलीवाल, दूध से अभिषेक श्री नितीश जैन (लखनऊ), दही से अभिषेक प्रदीप कुमार एवं अभिषेक जैन (बहराइच), सर्वोषधि से अभिषेक संजय जैन एवं निधेश जैन (टिकेटनगर), हरिद्रा से अभिषेक अनुज जैन एवं अरिहंत जैन (फैजाबाद), लाल चंदन से अभिषेक भरत जैन एवं वर्धमान जैन (टिकेटनगर), चतुष्कोण कलश से अभिषेक अनुज, सोमिल, नीशू एवं रोमा जैन (लखनऊ), विजय कुमार एवं रश्मि जैन (लखनऊ)। मंगल आरती अनिल शरत बाकलीवाल द्वारा सम्पन्न की गई। केसर से अभिषेक योगेश जैन एवं जितेन्द्र जैन (लल्ला भैया, फतेहपुर महमूदाबाद) द्वारा किया गया। पूर्णकलश का सौभाग्य सुरेशचंद जैन (खंडवा) को प्राप्त हुआ। अंत में शांतिधारा जितेन्द्र जैन एवं वैशाली जैन (लल्ला भैया, फतेहपुर) द्वारा सम्पन्न की गई। इसी क्रम में भगवान भरत स्वामी की 31 फुट ऊँची प्रतिमा का सम्पूर्ण पंचामृत अभिषेक नितीश जैन एवं शालिनी जैन (लखनऊ) द्वारा किया गया। सायंकाल 1008 दीपकों द्वारा आरती सम्पन्न की गई तथा भगवान का पालना झुलाने का सौभाग्य अवध प्रांत से आए सभी भक्तों को प्राप्त हुआ। सम्पूर्ण कार्यक्रम प्रज्ञाश्रमणी आर्यिका श्री चंदनामती के मार्गदर्शन में तथा पीठाधीश स्वस्तिश्री रवीन्द्रकीर्ति स्वामीजी के कुशल नेतृत्व में सम्पन्न हुआ।</p>
<p><strong>ये भी रहे मौजूद</strong></p>
<p>इस अवसर पर श्री अमरचंद जैन, विजय कुमार जैन, डॉ. जीवन प्रकाश जैन, तेजकुमार जैन, अंकुर जैन (बाराबंकी), टिकेटनगर से अतुल जैन, राजन जैन, निधेश जैन, पारस जैन सहित अवध प्रांत, दिल्ली, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, लखनऊ, कानपुर आदि स्थानों से आए अनेक भक्तगण उपस्थित रहे।</p>
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		<title>ऋषभदेव की शिक्षाओं को अपने जीवन में आत्मसात करें : तीर्थंकर दिवस पर मुख्यमंत्री ने जैन समुदाय और प्रदेशवासियों को दी बधाई </title>
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		<pubDate>Fri, 13 Mar 2026 10:38:45 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[भगवान ऋषभदेव के जन्म एवं दीक्षा कल्याणक तीर्थंकर दिवस (ऋषभ नवमी) के पावन अवसर पर मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने उन्हें नमन करते हुए अल्पसंख्यक वर्ग के जैन समुदाय सहित समस्त प्रदेश वासियों को बधाई दी। जयपुर से पढ़िए, यह खबर&#8230; जयपुर। युग के आदि प्रवर्तक एवं जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव के जन्म [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>भगवान ऋषभदेव के जन्म एवं दीक्षा कल्याणक तीर्थंकर दिवस (ऋषभ नवमी) के पावन अवसर पर मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने उन्हें नमन करते हुए अल्पसंख्यक वर्ग के जैन समुदाय सहित समस्त प्रदेश वासियों को बधाई दी। <span style="color: #ff0000">जयपुर से पढ़िए, यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>जयपुर।</strong> युग के आदि प्रवर्तक एवं जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव के जन्म एवं दीक्षा कल्याणक तीर्थंकर दिवस (ऋषभ नवमी) के पावन अवसर पर मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने उन्हें नमन करते हुए अल्पसंख्यक वर्ग के जैन समुदाय सहित समस्त प्रदेश वासियों को बधाई एवं शुभकामनाएं प्रेषित की। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने भगवान ऋषभदेव के बारे में जानकारी देते हुए बताया कि शाश्वत तीर्थ अयोध्या में जन्मे देवाधिदेव भगवान ऋषभदेव सम्पूर्ण भारतीय संस्कृति के आराध्य एवं प्रेरणास्त्रोत है। जैन आगमों के साथ ही श्रीमद्भागवत गीता में भी उनकी महान साधना और लोककल्याणकारी योगदान का अत्यन्त श्रद्धा के साथ उल्लेख मिलता है। वे आदि योगी थे,जिन्होंने भारत वर्ष की जनता को प्रवृति और निवृति के संतुलन की महान आध्यात्मिक शिक्षा प्रदान करते है &#8221; कृषि करो और ऋषि बनो का अमर संदेश दिया। मुख्यमंत्री के साथ अल्पसंख्यक मामलात विभाग के कैबिनेट मंत्री (अतिरिक्त प्रभार) भजनलाल शर्मा ने बताया कि देवाधिदेव भगवान ऋषभदेव का जीवन सत्य,अहिंसा, करुणा,तप और आत्मसंयम जैसे उच्च मानवीय मूल्यों का अनुपम उदाहरण है।</p>
<p><img fetchpriority="high" decoding="async" class="alignnone size-medium wp-image-101847" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG-20260313-WA0031-259x300.jpg" alt="" width="259" height="300" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG-20260313-WA0031-259x300.jpg 259w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG-20260313-WA0031-883x1024.jpg 883w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG-20260313-WA0031-768x890.jpg 768w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG-20260313-WA0031-990x1148.jpg 990w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG-20260313-WA0031.jpg 1079w" sizes="(max-width: 259px) 100vw, 259px" /></p>
<p>उनका आदर्श जीवन हमे नैतिकता,आत्मानुशासन और लोकमंगल के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी। तीर्थंकर दिवस (ऋषभ नवमी) के अवसर पर मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने जैन समुदाय और प्रदेशवासियों से देवाधिदेव भगवान ऋषभदेव की शिक्षाओं को अपने जीवन में आत्मसात करने तथा समाज में सद्भाव,शांति और नैतिक मूल्यों को सुदृढ़ बनाने का संकल्प लेने की अपील की।</p>
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		<title>अवकाश घोषित करने का मुद्दा : भगवान ऋषभदेव के जीवन पर आधारित प्रतियोगिताएं करवाने की मांग </title>
		<link>https://www.shreephaljainnews.com/the_issue_of_declaring_tirthankara_day_as_an_optional_holiday_was_raised_in_the_assembly/</link>
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		<pubDate>Wed, 11 Mar 2026 16:33:32 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[विधायक अशोक कोठारी ने राजस्थान विधानसभा में युग के आदि प्रवर्तक देवाधिदेव ऋषभदेव भगवान के जन्म एवं दीक्षा कल्याणक तीर्थंकर दिवस (ऋषभ नवमी) को अवकाश घोषित करने का महत्वपूर्ण मुद्दा उठाया। जयपुर से पढ़िए, यह खबर&#8230; जयपुर। विधायक अशोक कोठारी ने राजस्थान विधानसभा में युग के आदि प्रवर्तक देवाधिदेव ऋषभदेव भगवान के जन्म एवं दीक्षा [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>विधायक अशोक कोठारी ने राजस्थान विधानसभा में युग के आदि प्रवर्तक देवाधिदेव ऋषभदेव भगवान के जन्म एवं दीक्षा कल्याणक तीर्थंकर दिवस (ऋषभ नवमी) को अवकाश घोषित करने का महत्वपूर्ण मुद्दा उठाया। <span style="color: #ff0000">जयपुर से पढ़िए, यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>जयपुर।</strong> विधायक अशोक कोठारी ने राजस्थान विधानसभा में युग के आदि प्रवर्तक देवाधिदेव ऋषभदेव भगवान के जन्म एवं दीक्षा कल्याणक तीर्थंकर दिवस (ऋषभ नवमी) को अवकाश घोषित करने का महत्वपूर्ण मुद्दा उठाया। उन्होंने सरकार का ध्यान आकर्षित करते अल्पसंख्यक वर्ग के जैन समुदाय के प्रवर्तक भगवान ऋषभदेव के जन्म कल्याणक ऋषभ नवमी का त्योहार 12 मार्च को मनाया जा रहा है। जिस पर सरकार के द्वारा संपूर्ण प्रदेश के विश्वविद्यालय और महाविद्यालयों तथा विद्यालयों,आवासीय विद्यालयों एवं छात्रावासों में भगवान ऋषभदेव के जीवन पर आधारित प्रतियोगिताएं एवं विभिन्न कार्यक्रम आयोजित करवाने,सर्वधर्म संवाद करने की मांग की। विधायक कोठारी ने कहा कि जो स्थान वैदिक संस्कृति में रामनवमी का है उससे बड़ा स्थान श्रमण और वैदिक संस्कृति में ऋषभ नवमी (चैत्र कृष्ण नवमी का है।</p>
<p>श्रमण और वैदिक में तीर्थंकर दिवस के विशिष्ट महत्व को देखते हुए राजस्थान सरकार के द्वारा ऐच्छिक अवकाश घोषित कर इसे उत्सव के रूप में मनाए। जिससे वैदिक और श्रमण संस्कृति का संवर्धन होगा। विधानसभा के बाद विधायक कोठारी ने माननीय मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा का मदरसा बोर्ड के द्वारा तीर्थंकर दिवस पर विभिन्न प्रतियोगिताएं और विभिन्न कार्यक्रम आयोजित करने के निर्णय के लिए जैन समुदाय की तरफ से आभार प्रकट करते हुए धन्यवाद ज्ञापित किया।</p>
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		<title>भगवान ऋषभदेव का जन्म कल्याणक पूरे भारत में मनाएं : जन्म कल्याणक पर देशभर में षट्कर्मों का संदेश गूंजेगा </title>
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		<pubDate>Sat, 07 Mar 2026 06:24:02 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[प्रथम तीर्थंकर भगवान श्री 1008 ऋषभदेव (आदिनाथ भगवान) का पावन जन्म एवं तप कल्याणक महोत्सव इस वर्ष 12 मार्च, गुरुवार को पूरे देश में बड़े ही हर्ष हर्षोल्लास और भक्तिभाव के साथ मनाया जाएगा। इंदौर से पढ़िए, यह खबर&#8230; इंदौर। युग प्रवर्तक भगवान ऋषभदेव के जन्म कल्याणक पर देशभर में षट्कर्मों का संदेश गूंजेगा। सृष्टि [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>प्रथम तीर्थंकर भगवान श्री 1008 ऋषभदेव (आदिनाथ भगवान) का पावन जन्म एवं तप कल्याणक महोत्सव इस वर्ष 12 मार्च, गुरुवार को पूरे देश में बड़े ही हर्ष हर्षोल्लास और भक्तिभाव के साथ मनाया जाएगा। <span style="color: #ff0000">इंदौर से पढ़िए, यह खबर&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong>इंदौर।</strong> युग प्रवर्तक भगवान ऋषभदेव के जन्म कल्याणक पर देशभर में षट्कर्मों का संदेश गूंजेगा।</p>
<p>सृष्टि के आदि पुरुष, षटकर्मों के प्रणेता और प्रथम तीर्थंकर भगवान श्री 1008 ऋषभदेव (आदिनाथ भगवान) का पावन जन्म एवं तप कल्याणक महोत्सव इस वर्ष 12 मार्च, गुरुवार को पूरे देश में बड़े ही हर्ष हर्षोल्लास और भक्तिभाव के साथ मनाया जाएगा। राजेश जैन दद्दू ने बताया कि इस अवसर पर जैन समाज द्वारा विभिन्न सार्वजनिक आयोजनों के माध्यम से भगवान ऋषभदेव के जीवन दर्शन और उनके द्वारा दी गई जीवन-जीने की कला को जन-जन तक पहुँचाने का संकल्प लिया गया है। आदि पुरुष ने दी थी सभ्य समाज की आधारशिला भगवान ऋषभदेव ने ही इस कलिकाल में भटकती मानवता को सभ्य, सुरक्षित और समृद्ध जीवन जीने का मार्ग दिखाया था। उन्होंने ही समाज को असि (रक्षा), मसि (लेखन), कृषि (खेती), वाणिज्य (व्यापार), शिल्प (कला) और विद्या (ज्ञान) जैसे षटकर्मों की शिक्षा दी। उन्होंने न केवल मोक्षमार्ग का उपदेश दिया, बल्कि संसार में स्वावलंबी जीवन जीने की नींव भी रखी।</p>
<p><strong>सार्वजनिक स्थानों पर होंगे भव्य आयोजन</strong></p>
<p>राष्ट्रीय जिन शासन एकता संघ एवं भगवान ऋषभदेव जन्म कल्याणक महोत्सव समिति के मंयक जैन ने भारत वर्षीय सकल जैन समाज से अपील की है कि इस बार यह उत्सव केवल मंदिरों तक सीमित न रहकर जन-मानस के बीच मनाया जाए। महोत्सव के तहत विभिन्न कार्यक्रमों की रूपरेखा तैयार की गई है।</p>
<p>धर्मसभा एवं संगोष्ठी: प्रमुख चौराहों और सार्वजनिक स्थलों पर भगवान ऋषभदेव के जीवन वृत्त पर परिचर्चा।</p>
<p>भक्तामर पाठ एवं महाआरती: रिद्धि-सिद्धि मंत्रों के साथ सामूहिक दीप प्रज्वलन और भक्तामर पाठ।</p>
<p>सर्वधर्म सद्भाव: आयोजनों में जैनेत्तर (अजैन) विद्वानों और गणमान्य नागरिकों को विशेष रूप से आमंत्रित किया जाएगा ताकि भगवान ऋषभदेव का वैश्विक संदेश जन जन तक पहुँच सके।</p>
<p>भारत वर्षीय सकल जैन समाज का आह्वान है एवं राष्ट्रीय जिन शासन एकता संघ के पदाधिकारियों ने बताया कि भगवान ऋषभदेव केवल जैनों के ही नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता के मार्गदर्शक हैं। अतः इस पावन दिवस को &#8216;प्रभावना पर्व&#8217; के रूप में मनाते हुए समाज के हर वर्ग को इससे जोड़ा जाएगा।</p>
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		<title>भगवान ऋषभदेव द्वारा ब्राह्मी सुंदरी का विद्याध्ययन: भारत गौरव गणिनी श्री ज्ञानमती माताजी ने समझाया विद्यादान का महत्व  </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shree Phal News]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 25 Feb 2026 09:36:51 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[गणिनी प्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ने अयोध्या में अपने प्रवचन में कहा कि भगवान ऋषभदेव सिंहासन पर सुख से बैठे हुए थे कि उन्होंने अपना चित्त कला और विद्याओं के उपदेश में लगाया। उसी समय उनकी ब्राह्मी और सुंदरी दोनों पुत्रियां मांगलिक वेशभूषा धारणकर पिता के पास पहुंची और विनय से भगवान को प्रणाम किया। [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>गणिनी प्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ने अयोध्या में अपने प्रवचन में कहा कि भगवान ऋषभदेव सिंहासन पर सुख से बैठे हुए थे कि उन्होंने अपना चित्त कला और विद्याओं के उपदेश में लगाया। उसी समय उनकी ब्राह्मी और सुंदरी दोनों पुत्रियां मांगलिक वेशभूषा धारणकर पिता के पास पहुंची और विनय से भगवान को प्रणाम किया। <span style="color: #ff0000">अयोध्या से पढ़िए, अभिषेक अशोक पाटील की खबर&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong>अयोध्या(उप्र)</strong>। गणिनी प्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ने अयोध्या में अपने प्रवचन में कहा कि भगवान ऋषभदेव सिंहासन पर सुख से बैठे हुए थे कि उन्होंने अपना चित्त कला और विद्याओं के उपदेश में लगाया। उसी समय उनकी ब्राह्मी और सुंदरी दोनों पुत्रियां मांगलिक वेशभूषा धारणकर पिता के पास पहुंची और विनय से भगवान को प्रणाम किया। भगवान ने भी उन दोनों कन्याओं को आशीर्वाद देकर बड़े प्रेम से उन्हें अपनी गोद में बिठा लिया। उनके मस्तक पर हाथ फेरा और पुत्रियों के साथ कुछ विनोद करने लगे, अनंतर बोले-हे पुत्रियों! तुम दोनों विद्या ग्रहण करने में प्रयत्न करो क्योंकि, विद्या ग्रहण करने का यही काल है। ऐसा कहकर बराबर उन्हें आशीर्वाद देकर भगवान ने अपने चित्त में स्थित श्रुतदेवता को आदर पूर्वक सुवर्ण के विस्तृत पट्टे पर स्थापित किया, फिर भगवान ने ‘सिद्धं नमः’ मंगलाचरण पूर्वक अपने दाहिने हाथ से ‘अ आ’ आदि वर्णमाला लिखकर ब्राह्मी को शुद्ध अक्षरावली लिखने का उपदेश दिया। जिसका नाम सिद्ध मातृ का है, जो स्वर व्यंजन के भेद से दो भेद रूप हैं और समस्त विद्याओं में पाई जाती है तथा भगवान ने अपने बायें हाथ से ‘इकाई दहाई’ आदि संख्या को लिखते हुए सुंदरी को अंकगणित लिखने का उपदेश दिया। वांग्मय के बिना न कोई शास्त्र है और न कोई कला है, इसलिए भगवान ने सबसे पहले उन पुत्रियों को वाङ्गय का उपदेश दिया था। व्याकरणशास्त्र, छंदशास्त्र और अलंकारशास्त्र इन तीनों के समूह को वांग्मय कहते हैं। भगवान द्वारा बनाया गया व्याकरणशास्त्र बहुत विस्तृत था। जिसमें सौ से अधिक अध्याय थे। भगवान ने सबसे प्रथम ब्राह्मी कन्या को वर्णमालाएं पढ़ाई थीं। यही कारण है कि आज भी इसे ब्राह्मी लिपि कहते हैं। पिता के अनुग्रह से ये दोनों कन्याएं समस्त विद्याओं को पढ़कर सरस्वती देवी के अवतार लेने के लिए पात्रता को प्राप्त हो गई थीं।</p>
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		<title>श्रेष्ठ एवं ज्येष्ठ आर्यिका माता जी ससंघ का मंगल मिलन हुआ : आर्यिका ससंघ की स्थानीय कमेटी और समाजजनों ने भव्य मंगल अगवानी की  </title>
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		<pubDate>Thu, 12 Feb 2026 12:19:20 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[अयोध्या में श्रेष्ठ गणनी आर्यिका ज्ञानमती माताजी का ज्येष्ठ आर्यिका गुरुमति माताजी, दृणमति माताजी का भव्य मंगल मिलन हुआ। समाजजनों ने भव्य अगवानी कर वंदना की। इंदौर से पढ़िए, यह खबर&#8230; इंदौर। अयोध्या में श्रेष्ठ गणनी आर्यिका ज्ञानमती माताजी का ज्येष्ठ आर्यिका गुरुमति माताजी, दृणमति माताजी का भव्य मंगल मिलन हुआ। आचार्य श्री विद्यासागरजी की [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>अयोध्या में श्रेष्ठ गणनी आर्यिका ज्ञानमती माताजी का ज्येष्ठ आर्यिका गुरुमति माताजी, दृणमति माताजी का भव्य मंगल मिलन हुआ। समाजजनों ने भव्य अगवानी कर वंदना की। <span style="color: #ff0000">इंदौर से पढ़िए, यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर</strong>। अयोध्या में श्रेष्ठ गणनी आर्यिका ज्ञानमती माताजी का ज्येष्ठ आर्यिका गुरुमति माताजी, दृणमति माताजी का भव्य मंगल मिलन हुआ। आचार्य श्री विद्यासागरजी की प्रथम शिष्या आर्यिका गुरुमतिमाताजी, आर्यिका दृणमतिमाताजी, आर्यिका गुणमतिमाताजी ससंघ सहित सभी 54 पिच्छीधारिओं का समूह तीर्थराज श्रीसम्मेदशिखर जी से चातुर्मास के बाद पंचतीर्थों की वंदना करते हुए भगवान श्री पारसनाथ की जन्म नगरी की वंदना करते हुए बनारस से पद विहार कर भगवान ऋषभदेव की जन्म कल्याणक भूमि धर्मनगरी अयोध्या पहुंचा। राजेश जैन दद्दू ने बताया कि आर्यिका ससंघ की स्थानीय कमेटी तथा उपस्थित समाज जनों ने भव्य मंगल अगवानी की।</p>
<p><strong>श्री आदिनाथ दिगंबर जैन पंचायती मंदिर के दर्शन किए</strong></p>
<p>यहां पर विराजमान गणनी आर्यिका ज्ञानमति माताजी की संघस्थ चंदनामति माताजी एवं कर्मयोगी रविंद्र कीर्ति जी तथा संघस्थ बहनों एवं भाइओं ने मंगल अगवानी कर वंदन अभिनंदन किया। इसके बाद आर्यिकासंघ ने श्री आदिनाथ दिगंबर जैन पंचायती मंदिर के दर्शन किए एवं गणनी आर्यिका ज्ञानमति माताजी के दर्शनार्थ पहुंची और सभी का भव्य मंगल मिलन सौहार्दपूर्ण वातावरण में हुआ।</p>
<p><strong>आचार्य श्री विद्यासागरजी को याद करते हुए उनको नमोस्तु किया </strong></p>
<p>आर्यिका संघ ने एक-दूसरे का परिचय दिया तथा धर्म चर्चा हुई। इतने बड़े संघ को देखकर अयोध्या में उपस्थित जनसमुदाय ने भी भक्ति भाव के साथ संपूर्ण आर्यिका संघ एवं ज्येष्ठ आर्यिकाओं की वंदना की। इस अवसर पर गणनी आर्यिका ज्ञानमति माताजी ने आचार्य श्री विद्यासागरजी को याद करते हुए उनको नमोस्तु किया तथा उन पलों को भी याद किया, जो उन्होंने आचार्य गुरुदेव के साथ खुरई नगर में बिताए। राजेश जैन दद्दू ने बताया आर्यिका संघ का बुधवार को अयोध्या नगरी में मंगल प्रवेश हुआ एवं संपूर्ण संघ श्री आदिनाथ दिगंबर जैन पंचायती मंदिर में विराजमान है।</p>
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