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	<title>भगवान अभिनंदननाथ जी &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>भक्ति और उल्लास का महापर्व 22 अप्रैल को मनेगा : चतुर्थ तीर्थंकर भगवान अभिनंदननाथ जी का गर्भ और मोक्ष कल्याणक वैशाख शुक्ल षष्ठी को आता है  </title>
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		<pubDate>Tue, 21 Apr 2026 08:42:53 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जैन धर्म में तीर्थंकरों के पंचकल्याणक पर्वों का विशेष आध्यात्मिक महत्व है। यह वे पावन अवसर होते हैं जब तीर्थंकरों के जीवन की प्रमुख घटनाओं का स्मरण कर श्रावक अपने आत्म-कल्याण की भावना भाते हैं। इसी कड़ी में 22 अप्रैल यानी वैशाख शुक्ल षष्ठी का दिन संपूर्ण जैन समाज के लिए बेहद खास और पवित्र [&#8230;]]]></description>
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<p>जैन धर्म में तीर्थंकरों के पंचकल्याणक पर्वों का विशेष आध्यात्मिक महत्व <strong>है। यह वे पावन अवसर होते हैं जब तीर्थंकरों के जीवन की प्रमुख घटनाओं का स्मरण कर श्रावक अपने आत्म-कल्याण की भावना भाते हैं। इसी कड़ी में 22 अप्रैल यानी वैशाख शुक्ल षष्ठी का दिन संपूर्ण जैन समाज के लिए बेहद खास और पवित्र है। <span style="color: #ff0000">श्रीफल जैन न्यूज की विशेष शृंखला में आज पढ़िए, उपसंपादक प्रीतम लखवाल की यह संकलित और संपादित प्रस्तुति&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> जैन धर्म में तीर्थंकरों के पंचकल्याणक पर्वों का विशेष आध्यात्मिक महत्व है। यह वे पावन अवसर होते हैं जब तीर्थंकरों के जीवन की प्रमुख घटनाओं का स्मरण कर श्रावक अपने आत्म-कल्याण की भावना भाते हैं। इसी कड़ी में 22 अप्रैल यानी वैशाख शुक्ल षष्ठी का दिन संपूर्ण जैन समाज के लिए बेहद खास और पवित्र है। इस पावन तिथि पर जैन धर्म के चतुर्थ तीर्थंकर भगवान अभिनंदननाथ जी का गर्भ कल्याणक और मोक्ष कल्याणक दोनों एक साथ पूर्ण श्रद्धा, भक्ति और पारंपरिक हर्षाेल्लास के साथ मनाए जाएंगे। इंदौर शहर के विभिन्न दिगंबर जैन मंदिरों में भगवान की वेदी पर अभिषेक, शांतिधारा, पूजन, भक्ति, निर्वाण कांड का पाठ और निर्वाण लाडू अर्पित करने सहित कई विधियां और अष्टद्रव्यादि प्रस्तुत किए जाएंगे। पूरे दिन श्रावक-श्राविकाएं भगवान की भक्ति में लीन रहेंगे।</p>
<p><strong>मंदिरों में उमड़ेगा आस्था का सैलाब</strong></p>
<p>इस पावन अवसर पर देशभर के दिगंबर जैन मंदिरों में उत्सव का माहौल रहता है। मध्य प्रदेश के इंदौर शहर के दिगंबर जैन मंदिरों और चैत्यालयों से लेकर देश के विभिन्न राज्यों, अंचलों और तीर्थ क्षेत्रों में अपार उत्साह देखने को मिलता है। सुबह की पहली किरण के साथ ही जिनालयों में श्रावक-श्राविकाओं (महिला और पुरुषों) की भारी भीड़ दर्शन और पूजन के लिए उमड़ पड़ती है। धार्मिक अनुष्ठान की शुरुआत भगवान अभिनंदननाथ जी के प्रातःकालीन मंगल अभिषेक और वृहद शांतिधारा से होती है। इसके पश्चात मंत्रोच्चार और भक्ति संगीत के बीच निर्वाण कांड का पाठ किया जाता है। मोक्ष प्राप्ति की पावन भावना को मन में धारण करते हुए वेदियों पर निर्वाण लाडू (जो कि आत्मा की पूर्णता और मोक्ष का प्रतीक है) चढ़ाया जाता है। इस दिन मंदिरों में विशेष विधान, आरती और प्रवचनों का आयोजन होता है, जिससे संपूर्ण वातावरण जिनेंद्र देव की भक्ति से सुवासित हो उठता है।</p>
<p><strong>भगवान अभिनंदननाथ जी के जन्म की रोचक कथा</strong></p>
<p>भगवान अभिनंदननाथ जी जैन धर्म के 24 तीर्थंकरों में चौथे स्थान पर विराजमान हैं। उनके जन्म और नामकरण से जुड़ी एक बेहद रोचक और अलौकिक कथा है। जैन शास्त्रों के अनुसार जब भगवान अभिनंदननाथ जी की आत्मा ने माता सिद्धार्था के गर्भ में प्रवेश किया (गर्भ कल्याणक) तो उनके पिता राजा संवर की नगरी अयोध्या में एक अद्भुत चमत्कार हुआ। तीर्थंकर के प्रभाव से पूरे राज्य में अचानक सुख, शांति और असीम समृद्धि का संचार हो गया। प्रजा के बीच के सभी आपसी बैर-भाव, ईर्ष्या और द्वेष स्वतः ही समाप्त हो गए। हर तरफ केवल हर्ष, उल्लास और एक-दूसरे के प्रति असीम सम्मान की भावना जागृत हो गई। आकाश से देवों ने पुष्प वर्षा की। चारों ओर हो रहे इस अद्भुत ‘अभिनंदन’ (प्रशंसा, स्वागत और आनंद) के माहौल को देखकर ही जन्म के बाद बालक का नाम ‘अभिनंदननाथ’ रखा गया। उनका लांछन (प्रतीक चिह्न) ‘बंदर’ (वानर) है। यह प्रतीक इस बात का गहरा संदेश देता है कि मनुष्य का मन वानर की भांति अत्यंत चंचल है और आध्यात्मिक उन्नति के लिए इस चंचल मन को वश में करना सबसे पहली सीढ़ी है।</p>
<p><strong>जैन समाज और मानवता को दी गई सीख</strong></p>
<p>भगवान अभिनंदननाथ जी ने अपने जीवन, घोर तपस्या और केवलज्ञान के माध्यम से पूरी मानवता को आत्म-शांति का एक शाश्वत मार्ग दिखाया। सम्मेद शिखरजी (पारसनाथ पर्वत) से मोक्ष प्राप्त करने वाले प्रभु की प्रमुख शिक्षाएं आज भी प्रासंगिक हैं।</p>
<p>मन और इंद्रियों पर विजय- बाहरी शत्रुओं से लड़ने से कहीं अधिक महत्वपूर्ण अपने भीतर के विकारोंकृक्रोध, मान, माया और लोभ तथा चंचल मन पर विजय प्राप्त करना है।</p>
<p>अहिंसा और समभाव- उन्होंने सभी छोटे-बड़े जीवों के प्रति दया, करुणा और ‘जियो और जीने दो’ का मार्ग प्रशस्त किया। उनके अनुसार, सच्ची शांति भौतिक वस्तुओं के संचय में नहीं, बल्कि समता भाव में निवास करती है।</p>
<p>अपरिग्रह और त्याग- संसार की नश्वरता को समझाते हुए उन्होंने बताया कि मोह-माया और परिग्रह (आवश्यकता से अधिक संचय) ही दुःखों का मूल कारण है। त्याग का मार्ग ही आत्मा को मोक्ष यानी सच्चे और स्थायी सुख की ओर ले जाता है। 22 अप्रैल को मनाया जाने वाला यह गर्भ और मोक्ष कल्याणक महज एक पूजा-पाठ का दिन नहीं है, बल्कि भगवान अभिनंदननाथ जी के इन महान आदर्शों को अपने जीवन में उतारने का संकल्प लेने का अवसर है। निर्वाण लाडू चढ़ाते समय हर श्रद्धालु के मन में यही प्रार्थना होती है कि प्रभु के बताए मार्ग पर चलकर वे भी एक दिन जन्म-मरण के चक्र से मुक्त होकर मोक्ष पद को प्राप्त करें। चतुर्थ तीर्थंकर भगवान अभिनंदननाथ जी के चरणों में कोटि-कोटि नमन!</p>
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		<title>भगवान अभिनंदननाथ जी ज्ञान कल्याणक 2 जनवरी को : तिथि के अनुसार पौष शुक्ल चतुर्दशी को है  </title>
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		<pubDate>Thu, 01 Jan 2026 11:37:03 +0000</pubDate>
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<p><strong>जैन धर्म के तीर्थंकर भगवान अभिनंदननाथ जी का ज्ञान कल्याणक 2026 में 2 जनवरी को आ रहा है। इस दिन शहर के विभिन्न दिगंबर जैन मंदिरों में भगवान अभिनंदननाथजी की पूजा, आराधना और अभिषेक आदि विधि विधान से होगी। भगवान का ज्ञान कल्याणक पौष शुक्ल चतुर्दशी को मनाया जाता है। श्रीफल जैन न्यूज की विशेष श्रृंखला में नववर्ष की यह पहली प्रस्तुति। <span style="color: #ff0000">संकलन और संपादन उपसंपादक प्रीतम लखवाल के माध्यम से। </span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर</strong>। जैन धर्म के तीर्थंकर भगवान अभिनंदननाथ जी का ज्ञान कल्याणक 2026 में 2 जनवरी को आ रहा है। इस दिन शहर के विभिन्न दिगंबर जैन मंदिरों में भगवान अभिनंदननाथजी की पूजा, आराधना और अभिषेक आदि विधि विधान से होगी। भगवान का ज्ञान कल्याणक पौष शुक्ल चतुर्दशी को मनाया जाता है। जैन धर्म ग्रंथों में वर्णित है कि अयोध्या नगरी में इक्ष्वाकु वंशीय महाराज संवर राज करते थे। उनकी रानी का नाम सिद्धार्था देवी था। एक रात्रि में महारानी ने 14 स्वपन देखे। भविष्य वेत्ताओ से स्वपन फ़ल प्रच्छा की गई। उन्होने स्पष्ट किया कि महारानी एक ऐसे तेजस्वी पुत्र को जन्म दंेगी, जो या तो चक्रवर्ती सम्राट होगा अथवा धर्मतीर्थ का संस्थापक तीर्थंकर होगा। स्वप्न फ़ल जानने के बाद सभी ओर हर्ष व्याप्त हो गया। एक अन्य विशेष प्रभाव यह हुआ कि राजपरिवार सहित समस्त नागरिकों में पारस्परिक अभिवादन अभिनंदन रूपी सदगुण का अतिशय विकास हुआ। सभी ने इसे महारानी के गर्भस्थ पुण्यशाली जीव का प्रभाव माना। माघ शुक्ल द्वितीया को महारानी ने एक तेजस्वी शिशु को जन्म दिया। देवों और मानवों ने प्रभु का जन्मोत्सव मनाया। नामकरण की वेला में महाराज ने घोषणा की कि हमारे पुत्र के गर्भ मे आते ही सर्वत्र अभिवादन-अभिनंदन के सदगुण का प्रसार हुआ। इसलिए इसका नाम अभिनंदन रखा जाता है।</p>
<p><strong>देवताओं ने कैवल्य महोत्सव मनाया</strong></p>
<p>अभिनंदन कालक्रम से युवा हुए। तदंतर इन्होने राज्य का संचालन भी किया। इनके कुशल शासन में सर्वत्र सुख, सम्रद्धि और न्याय की वृद्धि हुई। कालंतर में पुत्र को राजपद प्रदान कर अभिनंदननाथ ने प्रव्रजया अंगीकार की। 18 वर्षों तक प्रभु छ्दमस्थ अवस्था में रहे। इसके बाद पौष शुक्ल चतुर्दशी के दिन प्रभु ने केवल ज्ञान प्राप्त किया। देवताओं ने उपस्थित हो कैवल्य महोत्सव मनाया एवं समवसरण की रचना की। प्रभु ने धर्माेपदेश दिया। हजारों लोगों ने साधु, साध्वी, श्रावक और श्राविका धर्म को अंगीकार किया। इस प्रकार चतुर्विध तीर्थ की स्थापना हुई। सुदीर्घ काल तक भव्य प्राणियों को धर्मामृत का पान कराने के बाद वैशाख शुक्ल अष्टमी को सम्मेद शिखर से भगवान मोक्ष पधारे।</p>
<p><strong>भगवान के धर्म परिवार का विवरण </strong></p>
<p>वज्रनाभि आदि 116 गणधर, तीन लाख श्रमण, 6 लाख 30 हजार श्रमणियां, 2 लाख 88 हजार श्रावक एवं 5 लाख 27 हजार श्राविकाएं।</p>
<p><strong>भगवान के चिन्ह का महत्व</strong></p>
<p>बंदर-यह भगवान अभिनंदननाथ का चिन्ह है। बंदर का स्वभाव चंचल होता है। मन की चंचलता की तुलना बंदर से की जाती है। हमारा मन जब भगवान के चरणों में लीन हो जाता है तो वह भी संसार में वंदनीय बन जाता है। श्रीराम का परम भक्त हनुमान वानर जाति में जन्म लेता है। अपने चंचल मन को स्थिर करके प्रभु के चरणों में मन लगाने से वह पूजनीय बन गया। इसी प्रकार हम भी तीर्थंकर अभिनंदननाथ जी के चरणों में मन लगाने से अभिनंदनीय वंदनीय बन सकते हैं।</p>
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		<title>भगवान अभिनंदननाथ जी के मोक्ष कल्याणक पर अभिषेक और शांतिधारा: सामूहिक निर्वाण लाडू चढ़ाया  </title>
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		<pubDate>Fri, 02 May 2025 12:01:38 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[भगवान अभिनंदननाथ का मोक्ष कल्याणक वैशाख शुक्ल छठ के दिन शुक्रवार को मनाया गया। इस अवसर पर अभिषेक और शांतिधारा के कार्यक्रम हुए। सामूहिक निर्वाण लाडू चढ़ाया गया। जयपुर से पढ़िए, उदयभान जैन की यह खबर&#8230;  जयपुर। जैन धर्म के चौथे तीर्थंकर भगवान अभिनंदन नाथ जी का मोक्ष कल्याणक वैशाख शुक्ल छठ 2 मई को [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>भगवान अभिनंदननाथ का मोक्ष कल्याणक वैशाख शुक्ल छठ के दिन शुक्रवार को मनाया गया। इस अवसर पर अभिषेक और शांतिधारा के कार्यक्रम हुए। सामूहिक निर्वाण लाडू चढ़ाया गया। <span style="color: #ff0000">जयपुर से पढ़िए, उदयभान जैन की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong> जयपुर।</strong> जैन धर्म के चौथे तीर्थंकर भगवान अभिनंदन नाथ जी का मोक्ष कल्याणक वैशाख शुक्ल छठ 2 मई को प्रातः 7.30 बजे दिगंबर जैन मंदिर गायत्री नगर महारानी फार्म जयपुर में विभिन्न कार्यक्रमों के साथ धूमधाम से मनाया गया। मोक्ष कल्याण के अवसर पर प्रातः प्रथम अभिषेक और शांति धारा करने का सौभाग्य आलोक प्रमिला शाह, अरुण ज्योति शाह, अर्चित स्नेहा, विरल शाह परिवार को प्राप्त हुआ। शांति धारा के बाद मंदिर प्रबंध समिति के तत्वावधान में भक्ति भाव से सामूहिक निर्वाण लाडू शाह परिवार ने चढ़ाया। समस्त मांगलिक क्रियाएं विधानाचार्य पं. अजीत शास्त्री ने कराई।</p>
<p><strong>पुण्यार्जक परिवार का किया सम्मान </strong></p>
<p>मंदिर प्रबंध समिति के अध्यक्ष कैलाश छाबड़ा, मंत्री राजेश बोहरा, कोषाध्यक्ष राकेश छाबड़ा, संतोष गंगवाल, विजय सोगानी आदि पदाधिकारियों ने पुण्यार्जक परिवार आलोक, अरुण शाह,विरल शाह का सम्मान किया। धर्मसभा का संचालन उपाध्यक्ष अरुण शाह ने किया। इस अवसर पर सारसमल झांझरी, अशोक रावका, अशोक कासलीवाल फागी वाले, अशोक कासलीवाल एचपीसीएल, रूपचंद गोदिका, कमल जैन मालपुरा वाले, एडवोकेट विमल जैन, बसंत बाकलीवाल आदि उपस्थित थे। शाह परिवार ने सामूहिक आरती कर समारोह का समापन किया।</p>
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