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	<title>बेलगांव &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<title>बेलगांव &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>आचार्य श्री शांति सागर जी का 153 वां अवतरण दिवस: आषाढ़ वदी 6 जन्मदिन के अवसर पर महा मुनिराज का परिचय </title>
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		<pubDate>Tue, 17 Jun 2025 08:40:18 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आचार्यश्री शांतिसागर जी महाराज का 153वां जन्म जयंती महोत्सव मंगलवार को पूरे देश में पूर्ण भक्तिभाव से मनाया जा रहा है। आषाढ़ वदी छठ को आपका अवतरण दिवस आता है। जैन समाज के लिए आचार्यश्री शांतिसागर जी ने कई प्रतिमान रचे और उनपर चलने के लिए प्रेरित किया। आपकी संयम यात्रा अनुकरणीय है। इस अवसर [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>आचार्यश्री शांतिसागर जी महाराज का 153वां जन्म जयंती महोत्सव मंगलवार को पूरे देश में पूर्ण भक्तिभाव से मनाया जा रहा है। आषाढ़ वदी छठ को आपका अवतरण दिवस आता है। जैन समाज के लिए आचार्यश्री शांतिसागर जी ने कई प्रतिमान रचे और उनपर चलने के लिए प्रेरित किया। आपकी संयम यात्रा अनुकरणीय है। <span style="color: #ff0000">इस अवसर पर इंदौर से पढ़िए, राजेश पंचोलिया की यह विस्तृत रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> दिगंबर साधु संत परम्परा में वर्तमान युग में अनेक तपस्वी, ज्ञानी ध्यानी संत हुए। उनमें आचार्य शांतिसागरजी महाराज एक ऐसे प्रमुख साधु श्रेष्ठ तपस्वी रत्न हुए हैं। जिनकी अगाध विद्वता, कठोर तपश्चर्या, प्रगाढ़ धर्म श्रद्धा, आदर्श चरित्र और अनुपम त्याग ने धर्म की यथार्थ ज्योति प्रज्वलित की। आपने लुप्तप्राय, शिथिलाचारग्रस्त मुनि परम्परा का पुनरुद्धार कर उसे जीवंत किया, यह निग्रन्थ श्रमण परम्परा आपकी ही कृपा से अनवरत रूप से प्रथम पट्टाचार्य श्री वीरसागर जी, द्वितीय पट्टाचार्य श्री शिवसागर जी, तृतीय पट्टाचार्य श्री धर्मसागर जी, चतुर्थ पट्टाचार्य श्री अजित सागर जी तथा पंचम पट्टाचार्य , आचार्य श्री वर्धमान सागर के रूप मेंआज तक प्रवाहमान है।</p>
<p><strong>जन्म &#8211;</strong></p>
<p>दक्षिण भारत के प्रसिद्ध नगर बेलगांव जिला चिकोड़ी तालुका (तहसील) में भोजग्राम है। भोजग्राम के समीप लगभग चार मील की दूरी पर विद्यमान येलगुल गांव में नाना के घर आषाढ़ कृष्णा 6 विक्रम संवत् 1929 सन् 1872 बुधवार की रात्रि में शुभ लक्षणों से युक्त बालक सातगौड़ा का जन्म हुआ था। गौड़ा शब्द भूमिपति-पाटिल का द्योतक है। पिता भीमगौड़ा और माता सत्यवती के आप तीसरे पुत्र थे इसी से मानो प्रकृति ने आपको रत्नत्रय और तृतीय रत्न सम्यकू चारित्र का अनुपम आराधक बनाया।</p>
<p><strong>बचपन-</strong></p>
<p>सातगौड़ा बचपन से ही वैरागी थे। लौकिक आमोद-प्रमोद से सदा दूर रहते थे। बाल्यकाल से ही वे शांति के सागर थे। छोटी सी उम्र में ही आपके दीक्षा लेने के परिणाम थे परन्तु, माता-पिता ने आग्रह किया कि बेटा जब तक हमारा जीवन है तब तक तुम दीक्षा न लेकर घर में धर्मसाधना करो। इसलिए आप घर में रहे।</p>
<p><strong>व्यवसाय-</strong></p>
<p>मुनियों के प्रति उनकी अटूट भक्ति थी। वे अपने कंधे पर बैठाकर मुनिराज को दूधगंगा तथा वेदगंगा नदियों के संगम के पार ले जाते थे। वे कपड़े की दुकान पर बैठते थे तो ग्राहक आने पर उसी से कहते थे कि-कपड़ा लेना है तो मन से चुन लो, अपने हाथ से नाप कर फाड़ लो और बही में लिख दो। इस प्रकार उनकी निस्पृहता थी। आप कभी भी अपने खेतों में से पक्षियों को नहीं भगाते थे। बल्कि खेतों के पास पीने का पानी रखकर स्वयं पीठ करके बैठ जाते थे। फिर भी आपके खेतों में सबसे अधिक धान्य होता था। वे कुटुंब के झंझटों में नहीं पड़ते थे। उन्होंने माता-पिता की खूब सेवा की और उनका समाधिमरण कराया।</p>
<p><strong>संयम पथ-</strong></p>
<p>माता-पिता के स्वर्गस्थ होते ही आप गृह विरत हो गये एवं मुनिश्री देवप्पा स्वामी से 41 वर्ष की आयु में कर्नाटक के उत्तूर ग्राम में ज्येष्ठ शुक्ला त्रयोदशी सन् 1915को क्षुल्लक के व्रत अंगीकार किए। आपका नाम शांतिसागर रखा गया। क्षुल्लक अवस्था में आपको कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा था, क्योंकि तब मुनिचर्या शिथिलताओं से परिपूर्ण थी। साधु आहार के लिए उपाध्याय द्वारा पूर्व निश्चित गृह में जाते थे। मार्ग में एक चादर लपेटकर जाते थे आहार के समय उस वस्त्र को अलग कर देते थे आहार के समय घण्टा बजता रहता था जिससे कोई विध्न न आए। क्षुल्लक जी ने इस प्रक्रिया को नहीं अपनाया और आगम की आज्ञानुसार चर्या पर निकलना प्रारम्भ किया। गृहस्थों को पड़गाहन की विधि ज्ञात न होने से वे वापस मंदिर में आकर विराज जाते इस प्रकार निराहार 4 दिन व्यतीत होने पर ग्राम में तहलका मच गया तथा ग्राम के प्रमुख पाटील ने कठोर शब्दों में उपाध्याय को कहा-शास्त्रोक्त विधि क्यों नहीं बताते? क्या साधु को निराहार भूखा मार दोगे! तब उपाध्याय ने आगमोक्त विधि बतलाई एवं पड़गाहन हुआ</p>
<p><strong>ऐलक दीक्षा</strong></p>
<p>नेमिनाथ भगवान के निर्माण स्थान गिरनार जी की वंदना के पश्चात् इसकी स्थायी स्मृति रूप अपने ऐलक दीक्षा ग्रहण की। ऐलक रूप में आपने नसलापुर में चतुर्मास किया। वहां से चलकर ऐनापुर ग्राम में रहे।</p>
<p><strong>मुनि दीक्षा</strong></p>
<p>उस समय यरनाल में पंचकल्याणक महोत्सव (सन् 1920) होने वाला था। वहां जिनेन्द्र भगवान के दीक्षा कल्याणक दिवस पर आपने अपने गुरुदेव देवेन्द्रकीर्ति जी से फागुन शुक्ला चतुर्दशी 24 मार्च सन 1920 को मुनि दीक्षा ग्रहण की। सन 2020 में यरनाल मुनि दीक्षा स्थली पर पंचम पट्टाधीश आचार्य श्री वर्धमान सागर जी के सानिध्य में मुनि दीक्षा का शताब्दी वर्ष मनाया गया।</p>
<p><strong>आचार्य पद</strong></p>
<p>समडोली में श्री नेमिसागर जी की ऐलक दीक्षा व श्री वीरसागर जी की मुनि दीक्षा के अवसर पर समस्त संघ ने महाराज को आचार्य पद (सन् 1924) से अलंकृत कर अपने आप को कृतार्थ किया।</p>
<p><strong>चारित्र चक्रवति </strong></p>
<p>गजपंथा में चतुर्मास के बाद सन् (1934) पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव हुआ। इस अवसर पर उपस्थित धार्मिक संघ ने महाराज को चारित्र चक्रवर्ती पद से अलंकृत किया।</p>
<p><strong>संल्लेखना-</strong></p>
<p>जीवन पर्यन्त मुनिचर्या का निर्दाेष पालन करते हुए 84 वर्ष की आयु में दृष्टि मंद होने के कारण संल्लेखना की भावना से आचार्य श्री सिद्धक्षेत्र कुंथलगिरी जी पहुंचे। वहां पर उन्होंने 13 जून को विशाल धर्मसभा के मध्य आपने संल्लेखना धारण करने के विचारों को अभिव्यक्त किया। 15 अगस्त को महाराज ने आठ दिन की नियम-संल्लेखना का व्रत लिया। जिसमें केवल पानी लेने की छूट रखी। 17 अगस्त को उन्होंने यम संल्लेखना या समाधिमरण की घोषणा की तथा 24 अगस्त को अपना आचार्य पद अपने प्रमुख शिष्य श्री वीरसागर जी महाराज को प्रदान कर घोषणा पत्र लिखवाकर जयपुर (जहां मुनिराज विराजमान थे) पहुंचाया। आचार्य श्री ने 36 दिन की सल्लेखना में केवल 12 दिन जल ग्रहण किया।</p>
<p>18 सितम्बर 1955 को प्रातः 6.50 पर ओम सिद्धोऽहं का ध्यान करते हुए युगप्रवर्तक आचार्यं श्री शांतिसागर जी ने नश्वर देह का त्याग कर दिया। संयम-पथ पर कदम रखते ही आपके जीवन में अनके उपसर्ग आये जिन्हें समता पूर्वक सहन करते हुए आपने शांतिसागर नाम को सार्थक किया।</p>
<p>साधु जीवन में सर्प ,शेर आदि के अनेक उपसर्ग हुए। आचार्यश्री का कहना था कि भय किस बात का? यदि वह पूर्व का बैरी न हो और हमारी ओर से कोई बाधा या आक्रमण न हो तो वह क्यों आक्रमण करेगा? बिना किसी भय के आत्मलीन रहते थे। चींटियों का, मकोड़े का, पागल व्यक्ति द्वारा प्रहार सहित अनेक उपसर्ग आपने शांति के सागर बन कर साम्य भाव से सहन किए। आचार्य श्री ने गृहस्थ अवस्था 18 वर्ष में आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत लिया कम उम्र 25 वर्ष में जूते तथा बिस्तर का त्याग कर दिया। 32 वर्ष की आयु में घी-तेल का आजीवन त्याग कर दिया था, उनके नमक, शक्कर, छाछ आदि का भी त्याग था। उन्होंने 35 वर्ष के मुनि जीवन में 27 वर्ष 3 माह 23 दिन उपवास किए। कुल 9938 उपवास किए</p>
<p><strong>अन्नाहार का त्याग</strong></p>
<p>बम्बई सरकार ने हरिजनों के उद्धार के लिए एक हरिजन मंदिर प्रवेश कानून सन् 1947 में बनाया। जिसके बल पर हरिजनों को जबरदस्ती जैन मंदिरों में प्रवेश कराया जाने लगा। जब आचार्य श्री को यह समाचार ज्ञात हुआ तो उन्होंने इसे जैन संस्कृति, जैन धर्म पर आया उपसर्ग जानकर, जब तक यह उपसर्ग दूर नहीं होगा तब तक के लिए अन्नाहार का त्याग कर दिया। आचार्य श्री की श्रद्धा एवं त्याग के परिणाम स्वरूप लगभग तीन वर्ष पश्चात इस कानून को हटा दिया गया। तभी आचार्य श्री ने 1105 दिन के बाद 16 अगस्त 1951 रक्षाबंधन के दिन अन्नाहार को ग्रहण किया। दिल्ली में दिगम्बर मुनियों के उन्मुक्त विहार की सरकारी आज्ञा नहीं थी। अतः 10-20 आदमी हमेशा महाराज के विहार के वक्त साथ ही रहते थे। आचार्य महाराज को चतुर्मास के दो माह व्यतीत होने पर जब यह बात ज्ञात हुई तो महाराज ने स्वयं एक फोटोग्राफर को बुलवाया और ज्ञात समय के पूर्व अकेले ही शहर में निकल गए तथा जामा मस्जिद, लालकिया, इंडिया गेट, संसद भवन आदि प्रमुख स्थानों पर खड़े होकर उन्होंने अपना फोटो खिचवाया। समाज में अपवाद होने लगा कि महाराज को फोटो खिचवाने का शौक है। इस विषय में महाराज से पूछे जाने पर उन्होंने ने कहा-हमारे शरीर की स्थिति तो जीर्ण अधजले काठ के समान है। इसके चित्र की हमें क्या आवश्यकता और वह चित्र हम कहां रखेंगे। श्रावकों का कर्तव्य है कि इन चित्रों को सम्हाल कर रखें। जिससे भविष्य में मुनि विहार की स्वतंत्रता का प्रमाण सिद्ध हो सके। हमारे इस उद्योग से सभी दिगम्बर जैन मुनियों में साहस आएगा, दिगंबर जैनधर्म की प्रभावना होगी। हमारे ऊपर उपसर्ग भी आए तो हमें कोई चिंता नहीं। अच्छे कार्य करते हुए भी यदि अपवाद आये तो उसे सहना मुनि धर्म है न कि उसका प्रतिवाद करना।</p>
<p>आगम ग्रन्थों की सुरक्षा को दृष्टि में रखते हुए आचार्य श्री के आशीर्वाद एवं प्ररेणा से सिद्धांत ग्रंथों को ताम्रपत्र पर उत्कीर्ण कराया गया। अनेकों भव्य आत्माओं ने आचार्य श्री से व्रत-संयम ग्रहण कर अपने जीवन का उद्धार किया।</p>
<p><strong>दीक्षित शिष्य</strong></p>
<p>1 मुनि 26</p>
<p>2 आर्यिका 4</p>
<p>3 ऐलक 16</p>
<p>4 क्षुल्लक 28</p>
<p>5 क्षुल्लिका 14</p>
<p>योग 88</p>
<p><strong>गुरुणा गुरु</strong></p>
<p>श्री सात गोड़ा जी ने सन 1915 में मुनि श्री देवेंद्र कीर्ति जी से क्षुल्लक दीक्षा तथा वर्ष 1920 में मुनि दीक्षा ली थी आप सन 1924 में आपका चतुविद संघ होने से आपको आचार्य बनाया गया आपकी आगम अनुरूप चर्या देख कर दीक्षा गुरु श्री देवेंद्र कीर्ति जी ने आपसे पुनः मुनि दीक्षा ली इस कारण आपको गुरुणा गुरु कहा जाता है। वर्ष 1925 में आप श्री श्रवण बेलगोला महामस्तकाभिषेक में भी शामिल हुए थे।</p>
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		<title>दया और करुणा के सागर आचार्यश्री विद्यासागर जी महाराज: वर्तमान युग के ‘वर्धमान’ का आज है प्रथम समाधि दिवस </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 06 Feb 2025 03:36:17 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[वर्तमान युग के वर्धमान के नाम से विश्व विख्यात संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी इसी श्रेणी में अपना गौरवपूर्ण स्थान रखते हैं। जैन धर्म के धर्मावलंबियों की लंबी फेहरिस्त है, जिन्होंने आचार्य विद्यासागर जी के अमृत वचनों का रसपान किया है और अपने कर्मों की निर्जरा की है। 6 फरवरी यानि माघ शुक्ल 9 [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>वर्तमान युग के वर्धमान के नाम से विश्व विख्यात संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी इसी श्रेणी में अपना गौरवपूर्ण स्थान रखते हैं। जैन धर्म के धर्मावलंबियों की लंबी फेहरिस्त है, जिन्होंने आचार्य विद्यासागर जी के अमृत वचनों का रसपान किया है और अपने कर्मों की निर्जरा की है। 6 फरवरी यानि माघ शुक्ल 9 को आचार्यश्री ने अपनी देह का त्याग किया और समाधिस्थ हो गए। उनके गुणानुवाद के रूप में श्रीफल जैन न्यूज की ओर से यह विनम्र प्रस्तुति उप संपादक प्रीतम लखवाल के संयोजन में&#8230;</strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> जैन धर्म में अपनी सिद्धता से, अपनी देशनाओं के माध्यम से धर्म को आकाश की उंचाईयों से भी उंचाई पर ले जाने के लिए सतत साधना करने वाले संत बिरले ही हुए हैं। वर्तमान युग के वर्धमान के नाम से विश्व विख्यात संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी इसी श्रेणी में अपना गौरवपूर्ण स्थान रखते हैं। जैन धर्म के धर्मावलंबियों की लंबी फेहरिस्त है, जिन्होंने आचार्य विद्यासागर जी के अमृत वचनों का रसपान किया है और अपने कर्मों की निर्जरा की है। जैन धर्म के विशाल सागर में अनमोल रत्न के रूप में विद्यासागर जी का स्थान सर्वाेपरि इसलिए है कि उन्होंने हमेशा शांत रहकर सौम्यता को धारण कर जैन धर्म के अनुयायियों और भगवंत भक्ति में लीन श्रावक-श्राविकाओं को अमूल्य ज्ञान की धरोहर से समृद्ध किया है। आचार्य विद्यासागर दिगंबर आचार्य थे। आचार्य विद्यासागर जी हिन्दी, अंग्रेजी सहित 8 भाषाओं के ज्ञाता थे। माघ शुक्ल नवमी को आचार्य श्री विद्यासागर जी का प्रथम समाधि दिवस है। इस अवसर पर समूचे भारत वर्ष में इसे महोत्सव के रूप में मनाया जाएगा। इंदौर सहित मप्र के विभिन्न शहरों, नगरों और कस्बों में आचार्यश्री के प्रथम समाधि दिवस पर कार्यक्रम आयोजित होने जा रहे हैं।</p>
<p><strong>आचार्यश्री ने कर्नाटक के बेलगांव जिले के सदलगा में लिया जन्म</strong></p>
<p>आचार्य विद्यासागर जी का जन्म 10 अक्टूबर 1946 को विद्याधर के रूप में कर्नाटक के बेलगांव जिले के सदलगा में शरद पूर्णिमा के दिन हुआ था। उनके पिता श्री मल्लप्पा थे, जो बाद में मुनि मल्लिसागर बने। उनकी माता श्रीमंती थीं, जो बाद में आर्यिका समयमति बनीं। विद्यासागर जी को 30 जून 1968 में अजमेर में 22 वर्ष की आयु में आचार्य ज्ञानसागर ने दीक्षा दी, जो आचार्य शांतिसागर के वंश के थे लेकिन, गुरु परंपरा से द्रोहकर अलग एकल विचरण करते थे। आचार्य विद्यासागर को 22 नवंबर 1972 में आचार्यश्री ज्ञानसागर जी ने आचार्य पद दिया था। उनके भाई, सभी घर के लोग संन्यास ले चुके हैं। उनके भाई अनंतनाथ और शांतिनाथ ने आचार्य विद्यासागर से ही दीक्षा ग्रहण की और मुनिश्री योगसागर और मुनिश्री समयसागर कहलाए। उनके बड़े भाई भी उनसे दीक्षा लेकर मुनिश्री उत्कृष्टसागर जी महाराज कहलाए। इनका जीवन दिगंबर समाज के सर्वजन के लिए अनुकरणीय है।</p>
<p><strong>आचार्यश्री के जीवनत्व और व्यक्तित्व पर हुईं पीएचडी</strong></p>
<p>आचार्यश्री विद्यासागर संस्कृत, प्राकृत सहित विभिन्न आधुनिक भाषाओं हिन्दी, मराठी और कन्नड़ में विशेषज्ञ स्तर का ज्ञान रखते हैं। उन्होंने हिन्दी और संस्कृत के विशाल मात्रा में रचनाएं की हैं। विभिन्न शोधार्थियों ने उनके कार्य का मास्टर्स और डॉक्ट्रेट के लिए अध्ययन किया है। उनके कार्य में निरंजना शतक, भावना शतक, परिषह जाया शतक, सुनीति शतक और शरमाना शतक शामिल हैं। उन्होंने काव्य ‘मूक माटी’ की भी रचना की है। विभिन्न संस्थानों में यह स्नातकोत्तर के हिन्दी पाठ्यक्रम में पढ़ाया जाता है। आचार्य श्री विद्यासागर कई धार्मिक कार्यों में प्रेरणास्रोत रहे हैं। आचार्य विद्यासागर के शिष्य मुनिश्री क्षमासागर ने उन पर आत्मान्वेषी नामक जीवनी लिखी है। इस पुस्तक का अंग्रेज़ी अनुवाद भारतीय ज्ञानपीठ की ओर से प्रकाशित हो चुका है। मुनि प्रणम्यसागरजी ने उनके जीवन पर ‘अनासक्त महायोगी’ काव्य की रचना की है।</p>
<p><strong>आचार्यश्री की यह रचनाएं है ज्ञानवर्द्धक</strong></p>
<p>हिन्दी, संस्कृत, अंग्रेजी आदि में एक दर्जन से अधिक मौलिक रचनाएं प्रकाशित-‘नर्मदा का नरम कंकर’, ‘डूबो मत लगाओ डुबकी’, श्तोता रोता क्यों?, ‘मूक माटी’ आदि काव्य कृतियां; गुरुवाणी, प्रवचन परिजात, प्रवचन प्रमेय आदि प्रवचन संग्रह, आचार्य कुंदकुंद के समयासार, नियमसार, प्रवचनसार और जैन गीता आदि ग्रंथों का पद्य अनुवाद।़ यह रचनाएं जैन धर्म और समाज के लिए अनुपम भेंट के रूप में विख्यात हैं।</p>
<p><strong>आचार्यश्री के शिष्य गण</strong></p>
<p>आचार्य श्री ने 130 मुनिराजों, 172 आर्यिकाओं और 20 ऐलक जी, 14 क्षुल्लकगणों को दीक्षित किया है। मुनिश्री समयसागर जी, मुनिश्री योगसागर जी, मुनिश्री चिन्मयसागर (जंगल वाले बाबा जी), मुनिश्री अभयसागर जी, मुनिश्री क्षमासागर जी, क्षुल्लकश्री ध्यान सागर जी का दीक्षित किया है।</p>
<p><strong>आपका समाधिमरण माघ शुक्ल नवमी को </strong></p>
<p>शरीर की अस्वस्थता के चलते आचार्य जी चंद्रगिरी पर ही विराजमान थे, शरीर मे भयंकर व्याधि ने इन्हे घेर लिया था, इनके शरीर पर पीलिया का प्रभाव देखा गया। पर धैर्य से डॉक्टर और वैद्यों की टीम से दिगंबर आगमनुकूल चर्या से इलाज करवाते रहे लेकिन, कोई असर ना पड़ा। इस प्रकार छत्तीसगढ़ के डोंगरगढ़ स्थित चंद्रगिरी दिगंबर तीर्थ में तीन दिन की संलेखना लेकर आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज ने 18 फरवरी 2024 को सुबह 2.35 बजे पर अपनी देह का त्याग किया। गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड ने उन्हें ब्रह्मांड के देवता के रूप में सम्मानित किया।</p>
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		<title>मुनिराज श्री भूतवलि सागर जी हुये समाधिलीन आचार्य श्री विद्यासागर जी के प्रथम ऐलक थे मुनिराज श्री भूतवलि सागर जी  </title>
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		<pubDate>Wed, 27 Mar 2024 17:17:23 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आज 27 मार्च 2024 बुधवार को 2.35 बजे मध्यप्रदेश के सीहोर जिले के आष्टा नगर में मुनिराज संतशिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के परम शिष्य श्री 108 भूतवली सागर जी महाराज का सल्लेखना पूर्वक समाधिमरण हो गया है । पूज्य मुनि श्री आष्टा के किला जैन मंदिर में ससंघ विराजमान थे । पूज्य मुनि [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>आज 27 मार्च 2024 बुधवार को 2.35 बजे मध्यप्रदेश के सीहोर जिले के आष्टा नगर में मुनिराज संतशिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के परम शिष्य श्री 108 भूतवली सागर जी महाराज का सल्लेखना पूर्वक समाधिमरण हो गया है । पूज्य मुनि श्री आष्टा के किला जैन मंदिर में ससंघ विराजमान थे । पूज्य मुनि श्री का दो दिन पूर्व आहारचर्या के उपरांत अचानक स्वास्थ्य खराब हो गया था , तभी से वह मौन होकर सल्लेखना व्रत धारणकर आत्मसाधना में लीन हो गए थे । <span style="color: #ff0000">पढि़ए रत्नेश जैन रागी बकस्वाहा की रिपोर्ट&#8230;   </span></strong></p>
<hr />
<p>आष्टा इस पंचमकाल में भी चतुर्थ काल की चर्या निभाने वाले सबसे पुराने मुनि पद पर विराजमान 46 वर्ष पुराने मुनिराज संतशिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के परम शिष्य श्री 108 भूतवली सागर जी महाराज का आज 27 मार्च 2024 बुधवार को 2.35 बजे मध्यप्रदेश के सीहोर जिले के आष्टा नगर में सल्लेखना पूर्वक समाधिमरण हो गया है । पूज्य मुनि श्री आष्टा के किला जैन मंदिर में ससंघ विराजमान थे । पूज्य मुनि श्री का दो दिन पूर्व आहारचर्या के उपरांत अचानक स्वास्थ्य खराब हो गया था , तभी से वह मौन होकर सल्लेखना व्रत धारणकर आत्मसाधना में लीन हो गए थे । मुनि श्री के बचपन का नाम ब्रह्मचर्य भीमसेन भैया जी था एवं कर्नाटक के बेलगांव जिले में ही आपका जन्म हुआ था। आप क्षुल्लक मणिभद्र महाराज के साथ अध्ययन के लिए आचार्य श्री विद्यासागर जी के पास राजस्थान आए व आचार्य श्री के कर कमलों से प्रथम ब्रह्मचारी व्रत लिया । आपकी क्षुल्लक व ऐलक दीक्षा आचार्य श्री विद्यासागर जी के कर कमलों से हुई , आप आचार्य श्री से दीक्षित प्रथम ऐलक भी थे , उस समय आपका नाम ऐलक दर्शन सागर जी रहा । तात्कालिक कारणों से 31 जनवरी 1980 में आचार्य श्री विमल सागर जी से मुनि दीक्षा ली और दीक्षा गुरु के संकेत पर आचार्य श्री विद्यासागर जी को ही अपना गुरु माना । दीक्षा के बाद आपने उत्तर से दक्षिण भारत तक जैन धर्म का प्रचार प्रचार किया । हजारों लोगों को सम्यक्त्व मार्ग की राह दिखाई । वर्तमान में आपके तीन मुनि शिष्य मुनि श्री मुक्ति सागर जी, मुनि श्री मौन सागर जी , मुनि श्री मुनिसागर जी महाराज तथा बाल ब्रह्मचारिणी मंजू दीदी जी हैं। आष्टा में ही आज आपकी असाध्य रोग के कारण सल्लेखना से समाधि सम्पन्न हुई है।</p>
<p><strong><img fetchpriority="high" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-57777" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/03/IMG-20240327-WA0019.jpg" alt="" width="758" height="934" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/03/IMG-20240327-WA0019.jpg 758w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/03/IMG-20240327-WA0019-243x300.jpg 243w" sizes="(max-width: 758px) 100vw, 758px" />आडम्बरों सदैव दूर रहें, किया सम्यक मार्ग का प्रचार</strong></p>
<p>अपने 46 वर्ष पुराने मुनि होकर भी कहीं पद आदि के लोभ में अन्य स्थान पर नहीं गए और ना ही किसी तरीके से मिथ्यात्व का पोषण किया । आप आडम्बरों सदैव दूर रहें, जहां-जहां भी आपका प्रवास आदि रहा , वहां अपने सम्यक मार्ग का प्रचार ही किया । अपने गुरु आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के अंतिम दर्शनों का सौभाग्य आपको जैन सिद्धक्षेत्र नेमावर में तीन वर्ष पूर्व मिला था । पूज्य मुनिश्री की जन्मभूमि कर्नाटक प्रांत भले ही हो परन्तु उनकी भी आचार्यश्री की भांति कर्मभूमि मध्यप्रदेश बुंदेलखंड में भी रही है , उनका छतरपुर जिले के बड़ामलहरा में वर्ष 2013 तथा वर्ष 2014 तथा वर्ष 2015 में बकस्वाहा में मंगल चातुर्मास का परम सौभाग्य प्राप्त हुआ था , जो समाज को अविस्मरणीय रहेगा। पूज्य गुरुदेव ने अपने भावों की निर्मलता से उत्कृष्ट भव परिवर्तन कर लिया है और आचार्यश्री के चरणों में ठीक सवा महीने बाद आचार्यश्री के समवशरण में विराजमान हो गए हैं । हम सब भावना करते हैं कि आपकी आत्मा अल्पकाल में अपने कर्मों का क्षय कर रत्नात्रय के द्वारा सिद्धदशा प्रकट होवें।</p>
<p><iframe title="आचार्य श्री विद्यासागर जी के प्रथम ऐलक थे मुनिराज श्री भूतवलि सागर जी" width="1320" height="743" src="https://www.youtube.com/embed/2m6T4a06A7o?feature=oembed" frameborder="0" allow="accelerometer; autoplay; clipboard-write; encrypted-media; gyroscope; picture-in-picture; web-share" referrerpolicy="strict-origin-when-cross-origin" allowfullscreen></iframe></p>
<p><strong> समाज को हुई अपूर्णीय क्षति</strong></p>
<p>हम सबके आराध्य गुरुदेव की समतापूर्वक समाधिमरण होने पर सम्पूर्ण देश की समाज को अपूर्णीय क्षति हुई है , आज पूज्य गुरुदेव की आष्टा जैन मंदिर जी में विनयांजलि सभा आयोजित की गई , उसके पश्चात डोला निकाला गया जिसमें देश के हजारों की संख्या में भक्त शामिल हुए। पूज्य गुरुदेव को जैन तीर्थ नैनागिरि ट्रस्ट अध्यक्ष सुरेश जैन आईएएस , प्रबंध मंत्री देवेन्द्र लुहारी ,जैन तीर्थ द्रोणगिरि के अध्यक्ष कपिल मलैया , मंत्री सुनील घुवारा ,सनत कुटोरा , जैन तीर्थ नैनागिरि ट्रस्ट के मंत्री व द्रोणगिरि प्रबंध उपाध्यक्ष व बकस्वाहा समाज अध्यक्ष राजेश जैन रागी, बड़ामलहरा प्रमुख भागचंद्र पीलीदुकान अधिष्ठाता उदासीन आश्रम, पं .शुभम शास्त्री,राजेन्द्र लल्लू मण्डी, महेश डेवडिया,शील मंजुला डेवडिया, लोकेश शाह, बकस्वाहा प्रमुख डॉ जीवन कुमार,डा मुकेश चौधरी,सुकमाल गोल्डी, वीरेंद्र सिंघई, शैलेश शाह,सुमत कुमार नाहर , नाथूराम मलैया , सचिन मझगुवां सहित देश के हजारों महानुभावों ने भावभीनी विनयांजलि दी है।</p>
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