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	<title>बीसा हूमड़ भवन &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>बीसा हूमड़ भवन से हुआ विहार :    धर्म जागृति चेतना से होता है तभी पुण्य का बंध होगा -आचार्य श्री वर्धमान सागर जी </title>
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		<pubDate>Mon, 20 Nov 2023 07:07:58 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आचार्य वर्धमान सागर ने बीसा हूमड़ भवन से विहार करते हुए कहा कि देव पूजा, जिन दर्शन, जिन अभिषेक दान श्रावकों का मुख्य धर्म है। आप प्रतिदिन भगवान के दर्शन अभिषेक पूजन करते हैं। अभिषेक आप अति उत्साह पूर्वक करते हैं। एक साथ अनेक व्यक्ति एक ही प्रतिमा पर अभिषेक करते हैं। पढ़िए राजेश पंचोलिया [&#8230;]]]></description>
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<p>आचार्य वर्धमान सागर ने बीसा हूमड़ भवन से विहार करते हुए कहा कि देव पूजा, जिन दर्शन, जिन अभिषेक दान श्रावकों का मुख्य धर्म है। आप प्रतिदिन भगवान के दर्शन अभिषेक पूजन करते हैं। अभिषेक आप अति उत्साह पूर्वक करते हैं। एक साथ अनेक व्यक्ति एक ही प्रतिमा पर अभिषेक करते हैं। <span style="color: #ff0000;">पढ़िए राजेश पंचोलिया की रिपोर्ट&#8230;</span></p>
<hr />
<p>&nbsp;</p>
<p>उदयपुर। देव पूजा, जिन दर्शन, जिन अभिषेक दान श्रावकों का मुख्य धर्म है। आप प्रतिदिन भगवान के दर्शन अभिषेक पूजन करते हैं। अभिषेक आप अति उत्साह पूर्वक करते हैं। एक साथ अनेक व्यक्ति एक ही प्रतिमा पर अभिषेक करते हैं। कलश प्रतिमा से टकराने से भगवान की अविनय होती है। इस कारण भगवान के गुण कम होते हैं, आप यह भूल जाते हैं कि आप तीन लोक के अधिपति जिनेंद्र भगवान का अरिहंत भगवान का अभिषेक कर रहे हैं। यह मंगल देशना आचार्य शिरोमणी श्री वर्धमान सागर जी ने बीसा हूमड़ भवन में नगर से विहार के पूर्व प्रगट की। उन्होंने कहा कि अरिहंत भगवान देवों के देव, परम देव, देवाधि देव हैं। अरिहंत भगवान की 1008 से सौधर्म इंद्र, गणधर स्तुति करते हैं। जिनसेनाचार्य ने भी सहस्त्रनाम से भगवान का स्तवन किया है। अरिहंत देव अनंत चतुष्टय गुणों के धारी हैं, जिनमें अनंत ज्ञान, अनंत दर्शन, अनंत सुख और अनंत वीर्य विद्यमान है। आपको भगवान की भक्ति मन, वचन, काय कृत, कारित, अनुमोदना 9 कोटि करना चाहिए। भक्ति से मंगल होता है, इससे पुण्य की प्राप्ति होती है। गृहस्थ अवस्था के पापों का प्रक्षालन होता है। आजकल मंदिरों, तीर्थ क्षेत्रों पर ऑनलाइन शांतिधारा प्रमाद का उदाहरण हैं। प्रमाद से धर्म नहीं होता, धर्म जागृति से होता है, तभी पुण्य का बंध होता है।</p>
<p><strong>मर्यादित हो व्यवहार</strong></p>
<p>आचार्य श्री ने कहा कि लगभग 8 माह के उदयपुर प्रवास में आपने पंच कल्याणक महोत्सव, पर्युषण पर्व सहित प्रतिदिन संघ के साधुओं से प्राप्त उपदेशों को ग्रहण कर जीवन में अपनाने का प्रयास करें, तभी जीवन मंगल मय होगा। प्राचीन समय में धर्म सभा में पुरुष-महिलाए खुले सिर नहीं आते थे। बड़ी पगड़ी तथा छोटे टोपी पहनते थे। आज यह विचारणीय स्थिति है कि महिलाएं देव, शास्त्र, गुरुओं के समक्ष खुले सिर रहती हैं। वेशभूषा भी कई बार मर्यादित नहीं होती। सकल दिगंबर जैन समाज के शांति लाल वेलावत, पारस चितौड़ा, सुरेश पद्मावत ने बताया कि आचार्य श्री वर्धमान सागर जी सहित 32 साधुओं का दोपहर को विहार उदयपुर के अशोक नगर जिनालय हुआ, जहां पर रात्रि विश्राम कर अगले 8 किलोमीटर विहार कर कानपुर में आहार चर्या होगी। आचार्य श्री का विहार अणिंदा पार्श्वनाथ होते हुए साबला के लिए चल रहा है।</p>
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		<title> 55 दिवसीय वर्षायोग हुआ पूर्ण : आचार्य श्री वर्धमान सागर सहित 32 साधुओं का पिच्छी परिवर्तन </title>
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		<pubDate>Fri, 17 Nov 2023 03:43:17 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[बीसा हूमड़ भवन में 55 दिवसीय वर्षायोग पूर्ण कर 16 नवंबर को पिच्छी परिवर्तन होगा। इसके 19 नवंबर को उदयपुर से साबला की ओर अतिशय क्षेत्र अणिंदा के दर्शन कर विहार होगा। पढ़िए राजेश पंचोलिया की रिपोर्ट&#8230; &#160; उदयपुर। बीसा हूमड़ भवन में 55 दिवसीय वर्षायोग पूर्ण कर 16 नवंबर को पिच्छी परिवर्तन होगा। इसके [&#8230;]]]></description>
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<p>बीसा हूमड़ भवन में 55 दिवसीय वर्षायोग पूर्ण कर 16 नवंबर को पिच्छी परिवर्तन होगा। इसके 19 नवंबर को उदयपुर से साबला की ओर अतिशय क्षेत्र अणिंदा के दर्शन कर विहार होगा। <span style="color: #ff0000;">पढ़िए राजेश पंचोलिया की रिपोर्ट&#8230;</span></p>
<hr />
<p>&nbsp;</p>
<p>उदयपुर। बीसा हूमड़ भवन में 55 दिवसीय वर्षायोग पूर्ण कर 16 नवंबर को पिच्छी परिवर्तन होगा। इसके 19 नवंबर को उदयपुर से साबला की ओर अतिशय क्षेत्र अणिंदा के दर्शन कर विहार होगा। आचार्य श्री वर्धमान सागर जी के संघ में मुनि श्री चिन्मय सागर जी, मुनि श्री हितेंद्र सागर जी, मुनि श्री प्रशम सागर जी, मुनि श्री प्रभव सागर जी, मुनि श्री चिंतन सागर जी, मुनि श्री मुक्ति सागर जी, मुनि श्री प्रबुद्ध सागर जी, मुनि श्री मुमुक्षु सागर जी, आर्यिका श्री शुभमति जी, आर्यिका श्री शीतलमति जी, आर्यिका श्री चैत्यमति जी, आर्यिका श्री वत्सल मति जी, आर्यिका श्री विलोक मति जी, आर्यिका श्री दिव्यांशु मति जी, आर्यिका श्री पूर्णिमा मति जी, आर्यिका श्री मुदित मति जी,आर्यिका श्री विचक्षण मति जी, आर्यिका श्री समर्पित मति जी, आर्यिका श्री निर्मुक्त मति जी, आर्यिका श्री विनम्र मति जी, आर्यिका श्री दर्शना मति जी, आर्यिका श्री देशना मति जी, आर्यिका श्री महायश मति जी, आर्यिका श्री देवर्धि मति जी, आर्यिका श्री प्रणत मति जी, आर्यिका श्री निर्मोह मति जी, आर्यिका श्री पद्मयश मति जी, आर्यिका श्री दिव्ययश मति जी, आर्यिका श्री योगी मति जी, क्षुल्लक श्री विशाल सागर जी, क्षुल्लक श्री महोदय सागर जी, आचार्य श्री 8 मुनिराज, 21 माताजी तथा 2 क्षुल्लक जी कुल 32 साधु हैं। संघ में जहां 80 वर्ष से अधिक के साधु हैं, वही 26 वर्ष के भी साधु हैं। अनेक साधु अत्यधिक संपन्न परिवार से, उच्च शिक्षित ,भाई -भाई, पति -पत्नी, पिता &#8211; बेटी, दादा &#8211; पोती हैं। इसके अलावा भी एक ही परिवार के अनेक साधु हैं।आचार्य श्री के शिष्य मुनि श्री हितेंद्र सागर जी ने बताया कि पिच्छी के 5 गुण होते हैं। धूल ग्रहण नहीं करना, कोमलता, लघुता, पसीना नहीं करना, सुकुमार और झुकने वाली। पिच्छी के बिना अहिंसा महाव्रत का, आदान निक्षेपण समिति नहीं पल सकती है। प्रति लेखन शुद्धि के लिए पिच्छिका अनिवार्य है। मयूर पंख की पिच्छी देने से श्रावक को पुण्य की प्राप्ति होती है। दिगम्बर साधुओं की पहचान मयूर पिच्छी, कमंडल से होती है। दीपावली के बाद कार्तिक कृष्णा अमावस्या के पूर्व चतुर्दशी को भारत के समस्त दिगंबर साधु उपवास करते हैं तथा अमावस्या को चातुर्मास कलश की निष्ठापन क्रिया करते हैं। इसके बाद समाज की अनुकूलता अनुसार पिच्छी परिवर्तन किया जाता है। चातुर्मास निष्ठापन के बाद अनिवार्य रूप से पिच्छी बदली जाती है। अनेक नगरों में पिच्छी बोली लगती हैं अथवा चातुर्मास में विशेष सहयोग देने वाले परिवारों या त्याग संयम व्रत नियम अनुसार भी दी जाती है। वर्तमान में 1700 से अधिक दिगंबर साधु हैं। पिच्छी तैयार करने के लिए मोर पंख की आवश्यकता होती है जो अधिकांश आचार्य आर्यिका संघ में निवाई के गोपाल, संभव, अविनाश, आशु, शुभम अग्रवाल द्वारा निशुल्क स्वयं के साधन और व्यय से उपलब्ध कराए जाते हैं।</p>
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		<title>सर्व ऋतु विलास मंदिर में विराजित में हैं आचार्य श्री : केवल ज्ञान रूपी लक्ष्मी संसार की अनमोल सर्वोपरि लक्ष्मी है &#8211; आचार्य श्री वर्धमान सागर जी </title>
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		<pubDate>Wed, 28 Jun 2023 15:24:56 +0000</pubDate>
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<p><strong>आचार्य श्री वर्धमान सागर महाराज ने प्रवचन में कहा कि केवलज्ञानी परमात्मा के द्वारा जो धर्म हमें प्राप्त हुआ है, उसकी आराधना, भक्ति, स्तुति स्तवन से जो पुण्य अर्जित होता है, उनके सहारे हम संसार रूपी सागर से किनारे लग सकते हैं। <span style="color: #ff0000;">पढ़िए राजेश पंचोलिया की रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>उदयपुर।</strong> वीतरागी, सर्वज्ञ और हितोपदेशी परमात्मा के द्वारा जो जिन धर्म हमें प्राप्त हुआ है, वह केवलज्ञान रूपी लक्ष्मी से युक्त है। यह मंगल देशना आचार्य शिरोमणि आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने सर्व ऋतु विलास दिगंबर जैन समाज की धर्म सभा में प्रगट की। गज्जू भैया और राजेश पंचोलिया अनुसार आचार्य श्री ने बताया कि केवलज्ञान रूपी लक्ष्मी संसार की सर्वोपरि लक्ष्मी है, इस लक्ष्मी के बाद किसी अन्य लक्ष्मी की जरूरत नहीं होती। केवलज्ञानी परमात्मा के द्वारा जो धर्म हमें प्राप्त हुआ है, उसकी आराधना, भक्ति, स्तुति स्तवन से जो पुण्य अर्जित होता है, उनके सहारे हम संसार रूपी सागर से किनारे लग सकते हैं, संसार रूपी सागर से पार हो सकते हैं। भगवान की देशना जिनवाणी को आचार्यों ने शास्त्रों में लिपिबद्ध किया है। जिनवाणी जिनेन्द्र भगवान की वाणी है। प्रथमानुयोग, करूणानुयोग, द्रव्यानुयोग, चरणानुयोग में जैन सिद्धांत महापुरुषों के कथानक अंकित हैं।</p>
<p><strong>बीसा हूमड़ भवन में कलश स्थापना</strong></p>
<p>आचार्य श्री के प्रवचन के पूर्व मुनि श्री प्रभव सागर जी एवम् मुनि श्री चिन्मय सागर जी ने भी उपदेश दिए। शांति लाल वेलावत, सुरेश पद्मावत, पारस चित्तौड़ा के अनुसार पंचम पट्टाधीश आचार्य श्री वर्धमान सागर जी वर्तमान में सर्व ऋतु विलास मंदिर में विराजित हैं। यहां से आचार्य श्री का बीसा हूमड़ भवन के लिए विहार होगा, जहां चातुर्मास मंगल कलश स्थापना होगी।</p>
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