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	<title>बहोरीबंद अतिशय क्षेत्र &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<description>ताज़ा खबरे हिन्दी में</description>
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		<title>गुरु ने कहा तो हो ही नहीं सकता मेरे वश की बात नहीं: बहोरीबंद में मुनिश्री के प्रवचन का पुण्य अर्जित कर रहे श्रद्धालु </title>
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		<pubDate>Tue, 22 Apr 2025 06:45:38 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[ निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज बचैया जनपद के बहोरीबंद में विराजमान है। यहां उनके प्रवचन सुनने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालुगण आ रहे हैं। मुनिश्री के जीवन दर्शन और मार्गदर्शन का भरपूर पुण्य अर्जित किया जा रहा है। बहोरीबंद से पढ़िए राजीव सिंघई की यह खबर&#8230; मुनिश्री सुधासागर जी महाराज ने कहा कि [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong> निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज बचैया जनपद के बहोरीबंद में विराजमान है। यहां उनके प्रवचन सुनने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालुगण आ रहे हैं। मुनिश्री के जीवन दर्शन और मार्गदर्शन का भरपूर पुण्य अर्जित किया जा रहा है। <span style="color: #ff0000">बहोरीबंद से पढ़िए राजीव सिंघई की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p>मुनिश्री सुधासागर जी महाराज ने कहा कि अपनी स्वयं की शक्तियों का जागरण व्यक्ति को स्वयं करना चाहिए क्योंकि अपनी स्वयं की जो शक्ति होती है, उस शक्ति का व्यक्ति उपयोग नहीं करना चाहता। जब व्यक्ति निज शक्ति को छुपाता या भूलता है या उसे निज शक्ति का ज्ञान नहीं होता है, वह व्यक्ति एक दिन इतनी गुलमियत में फंस जाता है कि वो अपनी स्वतंत्रता की श्वास भी नहीं ले पाता, इसलिए जैनाचार्यों ने सबसे पहले अपनी आत्म शक्ति की बात कही। हमें एक चींटी को बचाने में पुण्य लगता है और ये हवा सारे संसार को बचा रही है तो भी उसकों पुण्य नहीं लग रहा क्योंकि उसको मालूम ही नहीं है कि मेरे पास कितनी शक्ति है। होशपूर्वक तुम्हें इसका ज्ञान है कि मैं इसको बचा जा रहा हूँ, तब बचाओगे तो धर्म है। प्याऊँ खोलने वाले को धर्मात्मा जीव कहते हैं और पानी सारे जगत की प्यास बुझा रहा है लेकिन उसे पुण्यबन्ध नहीं क्योकि उसे मालूम ही नहीं कि मैं कितना मूल्यवान हूँ। कितने जीव है दुनिया में जिन्हें अपनी योग्यता मालूम नहीं, इसलिए ये स्थावर है, पापी है, इनका कभी कल्याण होने वाला नहीं उस सीधी पर्याय से। इसी तरह आपको भी अपनी जिंदगी का मूल्य पता नहीं है कि तुम कितने मूल्यवान हो।</p>
<p><strong>अपने अतीत को स्थापित कर दो</strong></p>
<p>जो व्यवहार हम दूसरों के साथ कर रहे हैं, वहीं व्यवहार यदि स्वयं के साथ होवे तो जैसे ही ये भाव आपके मन में आएगा तो आपके अंदर करुणा जाग जाएगी। पेड़ का पत्ता तोड़ो तो तोड़ते समय सोचना तुम कल यहाँ थे, तुम्हे भी किसी ने तोड़ कर फेंका होगा। अपने अतीत को स्थापित कर दो सारे संसार में। चिंतन करो हर चीज में यदि तुमने किसी जीव पर पैर रखा है तो कल मैं भी यहाँ था, किसी ने मेरे ऊपर पैर रखा होगा, उस समय मेरी वेदना क्या होगी। वैरागी को चिंतन करने के लिए पंचपरमेष्ठी की जरूरत नहीं है, वो तो बैठे-बैठे एक पेड़ का, एक चींटी भी चिंतन कर सकता है। वो जहाँ जाएगा, अपना रूप देख लेगा। नरकों का वर्णन पढ़ेगा, अपने आप को देख लेगा।</p>
<p><strong>अपनी शक्ति का भान करो</strong></p>
<p>तुम्हारी कितनी कीमत, शक्ति है, तुम अपनी शक्ति का भान करो, तुम चाहो तो इस जीव को बचा सकते हो, तुम चाहों तो मार सकते हो। हम चींटी को बचा सकते हैं तो हम अपनी जिंदगी में शक्ति नहीं छुपायेंगे, जब भी चींटी मेरे पैरों के पास आएगी, मैं बचाऊँगा क्योंकि मुझे बचाने की शक्ति है। हम किसी की प्यास बुझा सकते हैं इतनी शक्ति है मेरे पास, हुनर है तो बस एक ही नियम लेना है मेरे पास कभी भी कोई आएगा तो हम उसकी प्यास जरूर बुझायेंगे, उसे प्यासा नहीं मरने देंगे। अभी तुम्हारे पास खाने पीने की शक्ति नहीं है तो तुम किसी को पानी नहीं पिलाना क्योंकि तुम खुद ही पानी नही पी पा रहे हो, जैसे ये पेड़ पौधे आदि है क्योंकि ये स्वयं ही पानी को तरसते है। तुम्हारे पास खाने को नहीं है तो बिल्कुल मत खिलाना दूसरे को, दुनिया मरे तो मरने देना, जब है नहीं खिलाने को तो। यदि मेरे पास दो रोटी खिलाने की ताकत है तो जरूर नियम ले लेना कि मैं प्रतिदिन किसी दूसरे को दो रोटी खिलाकर ही सोऊँगा, यदि उस समय तुमने अपनी शक्ति छुपा ली तो अब तुम भूखों मरोगे, ये प्रकृति अब अपनी शक्ति दिखाएगी।</p>
<p><strong>भगवान, जिनवाणी माँ, गुरु ये बहुत दयालु हैं</strong></p>
<p>पैसा तो सबके पास है, पैसे का मूल्य क्या है उसकी शक्ति समझो। चाहे तो उस पैसे से स्वयं को व दुनिया को बर्बाद कर सकते हो। जब तक तुमने धर्म को भार माना, तुम कैमरे की नजर में हो, मां ने कहा अभिषेक करने जाओ, तुमने कहा कि मैं नहीं जा सकता, ये कहने के पहले थोड़ा सा सोच लेना, ये शब्द तुम माँ को बोल रहे हो, वो माँ कैसी जो बेटे की कूबत नहीं जानती है। भगवान, जिनवाणी माँ, गुरु ये बहुत दयालु है, ये उतना ही आदेश देंगे, जितनी अपनी शक्ति हैं लेकिन अपन ने माँ से क्या कह दिया हमारे वश की बात नहीं है। तुम्हारे अंदर परिणाम आना चाहिए कि गुरु ने कहा है तो हो ही नहीं सकता कि मेरे वश की बात नहीं, जिनवाणी माँ शक्ति से ज्यादा आदेश दे ही नहीं सकती। जिनका भविष्य जैसा होता है, उसकी शुरुआत बहुत पहले से हो जाती है, इसलिए गुरु आदेश, जिनवाणी का उपदेश कभी भार नहीं मानना, बस ये कहना शक्ति तो है लेकिन मेरा प्रमाद है।</p>
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		<title>काम पुरुषार्थ का अर्थ वासना से लेना देना नहीं : मुनि श्री सुधा सागर जी बताया मूल्यांकन का महत्व </title>
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		<pubDate>Sun, 20 Apr 2025 07:25:50 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[मुनि श्री सुधासागर जी बहोरीबंद अतिशय क्षेत्र में विराजमान हैं। यहां नित्य प्रवचन हो रहे हैं। समाज जन रोज धर्म लाभ ले रहे हैं। बहोरीबंद से पढ़िए यह खबर&#8230; बहोरीबंद। निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज ने बहोरीबंद अतिशय क्षेत्र में धर्मसभा में प्रवचन देते हुए कहा कि ये दुनिया एक ऐसी अनिर्णीत वस्तु है [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>मुनि श्री सुधासागर जी बहोरीबंद अतिशय क्षेत्र में विराजमान हैं। यहां नित्य प्रवचन हो रहे हैं। समाज जन रोज धर्म लाभ ले रहे हैं। <span style="color: #ff0000">बहोरीबंद से पढ़िए यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>बहोरीबंद।</strong> निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज ने बहोरीबंद अतिशय क्षेत्र में धर्मसभा में प्रवचन देते हुए कहा कि ये दुनिया एक ऐसी अनिर्णीत वस्तु है जिसको निर्णय करके प्रकृति ने कुछ भी नहीं दिया। उसका मूल कारण था कि वस्तु में इतनी योग्यताएं हैं, वस्तु इतनी अनेकांतमयी है कि प्रकृति निर्धारण कर ही नहीं पाती कि हम किस वस्तु का क्या मूल्यांकन करे, वहीं वस्तु किसी के लिए अनमोल है वही वस्तु किसी के लिए निर्मूल है, किसी के लिए सुखदाई है तो किसी को दुखदाई। हम नहीं कह सकते कि प्रातः काल का सूर्य निकलने अच्छा होता है, उल्लू से पूछो उसको कितना बुरा लगता है। हमें भगवान अच्छे लगते हैं लेकिन कई लोगों को भगवान बुरे लगते है। किसी को महाराज को देखकर अहोभाग्य भाव जागता है तो किसी को दुर्भाग्य।</p>
<p><strong>मेरा धर्म जो चाहेगा वो होगा</strong></p>
<p>तुम्हारी किस्मत में जो लिखा है सो होगा, ये नियतवाद है, यह संतोषी का, अहंकार से ऊपर उठने का मंत्र है। हमें धर्म यह नहीं कहता कि तुम्हारी किस्मत में जो लिखा है सो होगा, यदि किस्मत में ही सब कुछ लिखा है तो फिर धर्म करने से क्या होना है, इसलिए अपने धर्म पर विश्वास करो, मेरा धर्म जो चाहेगा वो होगा। नियत कहता है कि अग्नि का काम जलाना है और हमारा काम जलना लेकिन नहीं, होता है चमत्कार जैसे ही सीता अग्नि में कूदी, अग्नि ने जलाना बंद कर दिया, अग्नि नीर का कुंड बन गया, इसको बोलते है चमत्कार, ये है धर्म।</p>
<p><strong>सारी वस्तुओं को हमें जुटाना पड़ता है</strong></p>
<p>अर्थ, धर्म व काम ये तीन पुरुषार्थ हम अपने जीवन में करें। अर्थ का अर्थ क्या है? पैसा, मकान नहीं, हमारे जीवन के उपयोग की जितनी भी वस्तुएं हैं। वे उपयोगी वस्तुये कभी किस्मत से, नियत से, सर्वज्ञ से नहीं मिलती, सारी वस्तुओं को हमें जुटाना पड़ता है। अब जो उपकारी है सब अर्थ पुरुषार्थ में जाएगा। काम पुरुषार्थ का अर्थ वासना से लेना देना नहीं है, जूते मिले है तुम्हे अर्थ पुरुषार्थ से, जूते पहनना काम पुरुषार्थ है, जो-जो चीज आपने उपभोग की, वो सब काम पुरुषार्थ है। गाड़ी लाना अर्थ पुरुषार्थ है और गाड़ी में बैठना काम पुरुषार्थ है।</p>
<p><strong>24 घंटे तीनों पुरुषार्थ एक साथ हों</strong></p>
<p>भगवान की पूजा का नाम ही धर्म पुरुषार्थ नहीं है। आपको व्यापार करते समय ये भाव आ गया कि नहीं, ये धंधा मैं नहीं करूंगा क्योंकि मैं जैनी हूं, इसमें हिंसा है। आप भोजन की थाली कर बैठे हैं, मैं यह नहीं खाऊंगा, ये अभक्ष्य है, भोजन करते हो गया धर्म पुरुषार्थ। आप चमड़े के नहीं, कपड़े के जूते पहन रहे है, अहिंसा परमोधर्म:, जूते पहनते हुए धर्म पुरुषार्थ। 24 घंटे तीनों पुरुषार्थ साथ एक साथ चलना चाहिए।</p>
<p><strong>देश का पैसा देश में</strong></p>
<p>चोर चोरी करके माल को मार्केट में ले जाता है। वह देश की अर्थ व्यवस्था को कायम रखते हैं, घरों में रखे हुए धन को बाजार में लाते हैं, इसलिए अर्थ शास्त्री कभी चोरों को बुरा नहीं मानते। देश का पैसा देश में, ये राज विरुद्ध नहीं कहलाता। राज विरुद्ध वो कहलाता है, जिससे देश में विदेशी वस्तु को कानूनन मना किया है, स्मग्लरपना जितना है, सब राष्ट्रद्रोह में आएगा। अन्य देशों के साथ संबंध बनाना यह राष्ट्रद्रोह में आएगा।</p>
<p><strong>जाति कलंकित नहीं होना चाहिए</strong></p>
<p>तुम जो कुछ भी करते हो करो, बस तुम्हारे कारण से जाति कलंकित नहीं होना चाहिए, यदि आपने यह ध्यान रख लिया कि मैं ऐसा कोई कार्य नहीं करूंगा जिससे मेरी जाति बदनाम हो, जाओ आप जाति वाले कहलाएंगे, आप क्या आचरण पाल रहे है, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। जितनी ज्यादा आप इच्छाएं संसार से पूरी कराने का भाव करोगे, आप असमर्थ होते जाओगे।</p>
<p><strong>पौधा अच्छी खाद, पानी चाहता है</strong></p>
<p>जो-जो वस्तु तुम्हें चाहिए है। जरूरत है, वे वस्तु तुम्हारी कैसे होगी एक आदत बदल दो, तुम्हें अपनी इच्छा पूरी कराना है तो पहले आपको नियम लेना है, इसकी क्या इच्छा है, मैं नियम लेता हूं, इसकी हर इच्छा पूरी करूँगा। एक गमले में पौधा है, वह तुम्हारे काम का है, तुम्हारे काम आएगा, बस तुम्हे एक नियम लेना है, इस पौधे की क्या इच्छा है, वह अच्छी मिट्टी है अच्छी खाद, पानी चाहता है, आप उसकी इच्छा पूरी कर दीजिएगा, तुम्हें कुछ भी नहीं कहना पड़ेगा, वो तुम्हारी इच्छा पूरी कर देगा।</p>
<p><strong>वह कोई नकारात्मक एनर्जी नहीं देगा</strong></p>
<p>वह तुम्हे उसी समय से तुम्हें एनर्जी देना प्रारंभ कर देगा। पेड़ को चाहो, पेड़ से मत चाहो अभी। आप घर से बाहर गए है, आपको चिंता होगी कि आज पेड़ को पानी कौन देगा, उस पेड़ की ऐसी एनर्जी आपके पास जाएगी कि आप जंगल में दबे हो गए वह पेड़ आपकी कुशलता की कामना कर रहा होगा कि मेरा मालिक सुरक्षित आ जाए। आप फल तोड़ोगे तो भी वह कोई नकारात्मक एनर्जी नहीं देगा क्योंकि, इसी ने तो मुझे पाला है।</p>
<p><strong>मां-बाप की हर इच्छा पूरी करूंगा</strong></p>
<p>भगवान से मांगो गुरु से मांगो कि मैं अपने मां-बाप की हर इच्छा पूरी करना चाहता हूँ, तुमने भगवान से आशीर्वाद लिया, णमोकार मंत्र पढा। पुरुषार्थ करना है कि मैं अपनी मां-बाप की हर इच्छा पूरी करूंगा, तुम्हें अपने लिए मांगने की जरूरत नहीं है, उनकी इच्छा की पूर्ति की बाद ऐसा अतिशय होगा कि एक बार वे तुम्हारी तरफ देख लेंगे, तुम्हारी सारी इच्छाएं पूरी हो जाएगी लेकिन, संकल्प लेना है तुम्हे। जिनवाणी माँ जो तुम्हे खिलाएगी, वह मैं खाऊँगा, जाओ तुम्हारी जिंदगी खतरे से बाहर रहेगी, दुर्गति से बचोगे।</p>
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		<title>ऐसा पाप मत करना जिससे राष्ट्र कलंकित हो: मुनिश्री के प्रवचनों में जीवन से जुड़े गुढ़ रहस्य का मिल रहा लाभ  </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 19 Apr 2025 16:43:32 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज इन दिनों बहोरीबंद अतिशय क्षेत्र में विराजमान होकर धर्म प्रभावना कर रहे हैं। उनके उपदेश सुनने के लिए आसपास के क्षेत्र से बड़ी संख्या में श्रद्धालु श्रावक यहां पहुंच रहे हैं। शनिवार को उन्होंने प्रवचन में कई महत्वपूर्ण उपदेश दिए।  कटनी। बहोरीबंद अतिशय क्षेत्र में अपने प्रवचन में मुनिश्री [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज इन दिनों बहोरीबंद अतिशय क्षेत्र में विराजमान होकर धर्म प्रभावना कर रहे हैं। उनके उपदेश सुनने के लिए आसपास के क्षेत्र से बड़ी संख्या में श्रद्धालु श्रावक यहां पहुंच रहे हैं। <span style="color: #ff0000">शनिवार को उन्होंने प्रवचन में कई महत्वपूर्ण उपदेश दिए। </span></strong></p>
<hr />
<p><strong>कटनी।</strong> बहोरीबंद अतिशय क्षेत्र में अपने प्रवचन में मुनिश्री सुधासागर जी महाराज ने कहा कि जीव के अंदर एक चाहत होती है कि सारी दुनिया मेरे लिए हो और जो कुछ भी करता है सब अपने लिए करता है, इसका परिणाम ये निकलता है कि वह कभी भी अपनी इच्छाओं को पूरा नहीं कर पाता, अभी वह सारी दुनिया को अपना नहीं बना पाता और एक दिन ऐसा आता है कि जब अपने भी पराए हो जाते है, यहाँ तक भी अपनी किस्मत, अपना शरीर, ज्ञान, ध्यान और भगवान भी साथ नहीं देते। सारी दुनिया में दवाई कर ली, कोई इलाज ही नहीं लग रहा है, ये ऐसे यक्ष प्रश्न है जिनके समाधान तो है नहीं लेकिन खोजना पड़ेगा। समस्या है तो समाधान भी कंही न कंही है, बीमारी है अर्थात उसका निदान भी है, ये निश्चित समझना। जैसे डाकू है तो इसका अर्थ है दुनिया में साधु भी है, जहाँ पाप है तो पुण्य जरूर दुनिया में है, विपदा आई है तो उसे दूर करने का उपाय जरूर है।</p>
<p><strong>दःख आया है तो घबराओ मत सुख का नंबर आने ही वाला है</strong></p>
<p>ऐसे ही हम अपनी जिंदगी में समझे बुरे दिन आ रहे है तो इसका अर्थ है अच्छा दिन जरूर आएगा ही आएगा। हम अपने अनुभव को अनुमान बनाये और उसका निर्णय करें जो हमारे अनुभव में नहीं आ रहा है, ऐसा ज्ञान जब हमारे अंदर हो जाता है तो हमारी घबराटे खत्म हो जाती है। दुख आया है तो घबराओ मत सुख का नंबर आने ही वाला है। दुख आया है तो ज्यादा अहंकार मत करो, दुख आने में ज्यादा देरी नहीं लगना। जब भी अच्छी कार्य करने की बात आती है तुम तुरंत हा नहीं कहते, आपके मुँह से न निकलता है, यही शब्द बता रहा है कि अभी हमारा कल्याण बहुत दूर है, हम आसन्न भव्य नहीं है। मेरे जीवन में अच्छे दिन कब आएंगे, मैं भगवान कब बनूँगा आदि किसी अच्छी चीज से यदि प्रभावित हो रहे हो कि यह मेरे जीवन में कब आएगा, पहला यदि कोई अच्छी बात कहे तो बिना विचारे आपके मुंह से हां निकालना चाहिए। जितनी अपन भगवान की प्रशंसा करते हैं कि भगवन आप धन्य है, यदि उसका दसवां हिस्सा भी भाव कर ले कि जितनी अपन भगवान की पूजा कर रहे है, उतना स्वयं भगवान बनने का प्रयास कर ले भगवान के स्थान पर तू खुद भगवान बन जाएगा।</p>
<p><strong>तुम गुरु को डाकू समझ रहे हो?</strong></p>
<p>तुम्हें डर लग रहा है कि गुरु के सामने जाऊंगा तो गुरु गुटखा छुड़ा देंगे, मुझे मंदिर जाने का नियम लेना पड़ेगा। इसलिए मैं तो महाराज के पास जाता ही नहीं तो इसका अर्थ है कि तुम गुरु को डाकू समझ रहे हो, क्योंकि डरा तो डाकू से जाता है। कितने ही बड़े पापी हो तुम, कितना ही बड़ा तुम्हे डर लग रहा हो, उस पाप को मत करना जिसको करते हुए तुम्हे मम्मी पापा का डर लगे। यदि तुम्हारे काले कारनामों के कारण मां-बाप की नजर झुक गयी, उनकी आंख में आंसू आ गया, कहां का मैंने ऐसा बेटा पैदा किया, इसने पूर्वजों की सारी इज्जत धूल में मिला दी, एक बार भी यह परिणाम आ गया तो जाओ इससे बड़ा अभिशाप तुम्हारी जिंदगी में नहीं होगा, तुम सैकड़ो भवों तक गंदे मां-बाप के यहां पैदा होंगे, पहली बात तो मां बाप मिलेंगे ही नहीं, अनाथ पैदा होंगे। गर्भ में आओगे ही नहीं, समुर्छनो में पैदा होंगे।</p>
<p><strong>अभिषेक करके गंधोदक लगाओ </strong></p>
<p>कुछ ऐसे कृत्य हैं जहां णमोकार मंत्र की शक्ति भी फेल हो जाती है, जब तुमने ऐसा कृत्य किया और तुम्हारे उपकारी के मन में खेद हो गया, पाप तुमने किया और आंसू मां-बाप के आ गए, नजर उनकी झुक गई, कुल कलंकित हो गया। यदि तुम्हारे कारण से राष्ट्र कलंकित हुआ है तो तुम म्लेच्छ खंड में जन्म लोगे क्योंकि पाप तुमने किया है देश कलंकित हुआ है। आतंकवादी का पाप इसलिए बड़ा है कि आतकंवादी के कारण देश बदनाम होता है कि ये आतंकवादी पैदा करता है। आप जैन है ऐसे पाप मत करना जिससे लोग कहने लगे कि जैनी लोग भी ऐसा पाप करने लगे, करोगे तुम और बदनाम होगी जैन जाति। कोई ऐसा पाप मत करना जिससे तुम्हारा भगवान का अभिषेक करना छूट जाए, गुरुओ को आहारदान देना छूट जाए। आप लिस्ट बनाओ जो पाप तुमने अभिषेक के कारण छोड़ दिए कि मैं भगवान को छूने लायक नहीं रहूंगा, छोड़कर दिखाओ, फिर अभिषेक करके गंधोदक लगाओ तो जाओ कौन सी बीमारी है जो दूर नहीं होगी।</p>
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