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	<title>बर्रो वाले बाबा &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>बर्रो वाले बाबा के नए मंदिर पर शिखर एवं ध्वज स्थापना : प्रथम मस्तकाभिषेक में उमड़ा श्रद्धालुओं का सैलाब </title>
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		<pubDate>Tue, 17 Mar 2026 13:25:29 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव के बाद मुनि श्री संभवसागरजी, मुनि श्री निस्सीम सागरजी एवं मुनि श्री संस्कार सागरजी के सानिध्य में बर्रो वाले बाबा भगवान आदिनाथ के नवनिर्मित मंदिर पर पांच शिखरों की स्थापना एवं मंदिर शिखर पर पीतल के ध्वज दंड की प्रतिष्ठा विधिवत हुई। विदिशा से पढ़िए, यह खबर&#8230; विदिशा। पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव के [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव के बाद मुनि श्री संभवसागरजी, मुनि श्री निस्सीम सागरजी एवं मुनि श्री संस्कार सागरजी के सानिध्य में बर्रो वाले बाबा भगवान आदिनाथ के नवनिर्मित मंदिर पर पांच शिखरों की स्थापना एवं मंदिर शिखर पर पीतल के ध्वज दंड की प्रतिष्ठा विधिवत हुई। <span style="color: #ff0000">विदिशा से पढ़िए, यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>विदिशा।</strong> पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव के बाद मुनि श्री संभवसागरजी, मुनि श्री निस्सीम सागरजी एवं मुनि श्री संस्कार सागरजी के सानिध्य में बर्रो वाले बाबा भगवान आदिनाथ के नवनिर्मित मंदिर पर पांच शिखरों की स्थापना एवं मंदिर शिखर पर पीतल के ध्वज दंड की प्रतिष्ठा विधिवत हुई। इस पावन अवसर पर भगवान आदिनाथ स्वामी का प्रथम मस्तकाभिषेक किया गया तथा विश्व शांति की मंगलभावना से मुनि श्री के मुखारविंद से शांति धारा संपन्न हुई। प्रथम अभिषेक के दर्शन के लिए श्रद्धालुओं की लंबी कतारें लगी रहीं और पूरे परिसर में भक्ति व उत्साह का वातावरण छाया रहा। प्रवक्ता अविनाश जैन (विद्यावाणी) ने बताया कि पंचकल्याणक महोत्सव के पश्चात प्रथम अभिषेक को लेकर श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह देखा गया। मंदिर के ऊपर शिखर एवं ध्वजारोहण का दृश्य अत्यंत भावपूर्ण और श्रद्धामय रहा।</p>
<p><img fetchpriority="high" decoding="async" class="alignnone size-medium wp-image-102237" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG-20260317-WA0030-242x300.jpg" alt="" width="242" height="300" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG-20260317-WA0030-242x300.jpg 242w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2026/03/IMG-20260317-WA0030.jpg 720w" sizes="(max-width: 242px) 100vw, 242px" /></p>
<p><strong>आचार्य श्री का आशीर्वाद था, सब काम हो गए</strong></p>
<p>प्रथम दो कलश स्थापना अशोक सागर एवं अनिरुद्ध सराफ, अभय वैद्य,संतोष गिरनार, पंकज बड़ाघर ने स्थापित किये तथा ध्वजारोहण मोहन नमकीन ने किया इस अवसर पर जैन महाविद्यालय प्रबंधन समिति के अध्यक्ष एवं पंचकल्याणक समिति के स्वागताध्यक्ष संजय सेठ ने मुनिसंघ के प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हुए कहा कि विदिशा भद्दिलपुर भगवान शीतलनाथ स्वामी के चार कल्याणकों से पवित्र भूमि रही है, किन्तु गुरुदेव की कृपा से जैन महाविद्यालय की यह भूमि भी पंचकल्याणक से पावन हो गई है। अपने आशीर्वचन में मुनि श्री संभवसागर महाराज ने कहा कि इन सभी कार्यों के लिये आचार्य गुरुदेव ऊपर से ही हमें प्रेरणा दे रहे थे तथा आचार्य श्री का आशीर्वाद था सभी कार्य निर्विघ्न होते चले गए।</p>
<p><strong>ध्वज समाज की उन्नति एवं विजय के प्रतीक</strong></p>
<p>मुनिश्री ने कहा कि मंदिर कितना ही भव्य क्यों न हो, बिना शिखर के वह अधूरा माना जाता है। इसी प्रकार धर्म और साधना के बिना मनुष्य जीवन भी अधूरा है। उन्होंने कहा कि जैसे मंदिर का शिखर सबसे ऊँचा होता है, वैसे ही जीवन का लक्ष्य आत्मकल्याण और मोक्ष प्राप्ति होना चाहिए। मुनि श्री ने आगे कहा कि मंदिर का शिखर और ध्वज समाज की उन्नति एवं विजय के प्रतीक हैं। जैसे शिखर आकाश की ऊँचाइयों को स्पर्श करता है, वैसे ही हमें अपने विचार, आचरण और आत्मा को भी उच्चतम स्तर तक ले जाने का प्रयास करना चाहिए, कार्यक्रम में शिखर स्थापना एवं ध्वजारोहण करने वाले परिवारों सहित बड़ी संख्या में धर्मप्रेमी बंधु उपस्थित रहे।</p>
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		<title>नीलांजना की आकस्मिक मृत्यु देख हुआ वैराग्य लिया दीक्षा का निर्णय : मुनि श्री संभवसागरजी महाराज ने सुनाई भगवान के वैराग्य की कथा </title>
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		<pubDate>Sat, 14 Mar 2026 12:35:43 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[ नीलांजना का दृश्य देखा, उसकी आकस्मिक मृत्यु और संसार की असारता का भान हुआ, तब प्रभु ने दीक्षा लेकर वन की ओर गमन किया। ये उद्गार निर्यापक श्रमण मुनि श्री संभवसागर महाराज ने पंच कल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव के अंतर्गत दीक्षा कल्याणक के अवसर पर व्यक्त किए। विदिशा से पढ़िए, यह खबर&#8230; विदिशा। नीलांजना का दृश्य [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong> नीलांजना का दृश्य देखा, उसकी आकस्मिक मृत्यु और संसार की असारता का भान हुआ, तब प्रभु ने दीक्षा लेकर वन की ओर गमन किया। ये उद्गार निर्यापक श्रमण मुनि श्री संभवसागर महाराज ने पंच कल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव के अंतर्गत दीक्षा कल्याणक के अवसर पर व्यक्त किए। <span style="color: #ff0000">विदिशा से पढ़िए, यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>विदिशा।</strong> नीलांजना का दृश्य देखा, उसकी आकस्मिक मृत्यु और संसार की असारता का भान हुआ, तब प्रभु ने दीक्षा लेकर वन की ओर गमन किया। ये उद्गार निर्यापक श्रमण मुनि श्री संभवसागर महाराज ने पंच कल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव के अंतर्गत दीक्षा कल्याणक के अवसर पर व्यक्त किए।मुनि श्री ने बर्रो वाले बाबा के नए मंदिर में प्रवेश की घटना को कुंडलपुर के बड़े बाबा मंदिर की ऐतिहासिक घटना से जोड़ते हुए कहा कि जब बर्रो वाले बाबा को क्रेन के माध्यम से उठाने का प्रयास किया जा रहा था, तब दोपहर तीन बजे से लगातार प्रयास किए गए, लेकिन बाबा अपने स्थान से टस से मस नहीं हुए।समय लगभग पाँच बजे का हो रहा था, तभी एक अनजान व्यक्ति ने आकर उनके कान में कहा कि बर्रो वाले बाबा केवल आचार्य विद्यासागर जी की ही बात सुनते हैं, उन्हें स्मरण करो। मुनि श्री ने बताया कि जैसे ही उन्होंने आचार्य गुरुदेव का स्मरण किया, उसी क्षण बाबा अपने आसन से हिल गए और उनका गगन विहार प्रारंभ हो गया। यह दृश्य उसी प्रकार था जैसा कुंडलपुर में बड़े बाबा के गगन विहार के समय देखने को मिला था। इस अद्भुत दृश्य को केवल विदिशा के श्रद्धालुओं ने ही नहीं, बल्कि यूट्यूब चैनलों के माध्यम से हजारों लोगों ने भी देखा।</p>
<p><strong>बाबा की छवि कुछ अलग ही दिखाई दे रही थी</strong></p>
<p>जब सूर्य अस्ताचल की ओर बढ़ रहा था,उसी समय बर्रो वाले बाबा नए मंदिर में प्रवेश कर रहे थे। उस समय बाबा की छवि कुछ अलग ही दिखाई दे रही थी। मुनि श्री ने कहा कि पंचकल्याणक के प्रारंभिक दो दिनों गर्भ कल्याणक और जन्म कल्याणक में भक्ति का उतना सैलाब नहीं आता, लेकिन बर्रो वाले बाबा के गगन विहार के बाद श्रद्धालुओं की भक्ति का सागर उमड़ पड़ा। जिस दृश्य को देखने के लिए लोग वर्षों से उत्सुक थे, वह दृश्य सभी को देखने को मिला और उस भक्ति भाव को सभी ने अपने अंतर्मन में संजो लिया।</p>
<p><strong>अनगिनत अदृश्य भक्त भी वहां उपस्थित थे</strong></p>
<p>उन्होंने कहा कि इतने कम समय में सभी कार्य निरंतर और निर्विघ्न गुरुदेव के आशीर्वाद से आगे बढ़ रहे हैं। गुरुदेव हमेशा कहते थे कि अपना कर्तव्य करते रहो, यह मत सोचो कि हम ही कार्य करने वाले हैं। बड़े बाबा के भक्त केवल मनुष्य ही नहीं, बल्कि देव भी हैं, जो ऐसे आयोजनों को सफल बनाने में अदृश्य रूप से सहयोग करते हैं।मुनि श्री ने कहा कि बर्रो वाले बाबा के भक्त तो दिखाई दे रहे थे, लेकिन उनके अनगिनत अदृश्य भक्त भी वहां उपस्थित थे, जिन्होंने इस कार्य को सफलतापूर्वक संपन्न कराया।</p>
<p><strong>भगवान के दीक्षा कल्याणक की पूजा कराई</strong></p>
<p>मुनि श्री ने बताया कि जब सुबह नए मंदिर में जाकर बर्रो वाले बाबा के दर्शन किए, तो ऐसा लगा मानो बाबा मुस्करा रहे हों। नए मंदिर में उनकी मुस्कान कुछ अलग ही प्रतीत हो रही थी। अभी बाबा अकेले विराजमान हैं, लेकिन पंचकल्याणक प्रतिष्ठा के बाद नव प्रतिष्ठित सभी भगवान भी उनके साथ समवसरण में विराजित होंगे।मुनि श्री ने कहा कि वे यहां केवल पंद्रह दिन के लिए समवसरण मंदिर की &#8216;चाबी&#8217; रखने आए थे लेकिन, गुरुदेव के आशीर्वाद से जो कार्य अधूरे थे, वे सभी पूर्णता की ओर बढ़ रहे हैं और बर्रो वाले बाबा का नए मंदिर में विराजमान होना उनके लिए अत्यंत सुखद अनुभूति है।इस अवसर पर मुनि श्री निस्सीम सागर जी महाराज एवं मुनि श्री संस्कार सागर जी महाराज मंचासीन थे।</p>
<p>प्रतिष्ठाचार्य बाल ब्रह्मचारी विनय भैया एवं तरुण भैया (इंदौर) ने भगवान के दीक्षा कल्याणक की पूजा कराई।</p>
<p><strong> मुनिसंघ के चरणों में श्रीफल अर्पित किया</strong></p>
<p>प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया कि दीक्षा कल्याणक के अवसर पर जबलपुर से श्राविका आश्रम की कई बहनें उपस्थित हुईं। उन्होंने मुनिसंघ के चरणों में श्रीफल अर्पित कर आशीर्वाद प्राप्त किया। दोपहर में आदिकुमार की बारात, राजपाट, राज्य व्यवस्था और प्रजा पालन के दृश्य प्रस्तुत किए गए। इसी दौरान राजदरबार में स्वर्ग की अप्सरा नीलांजना का नृत्य चल रहा था। नृत्य करते-करते अचानक उसकी आयु पूर्ण हो जाती है। देवताओं ने रंग में भंग न हो इसलिए तुरंत दूसरी नर्तकी भेज दी लेकिन, आदिकुमार संसार की असारता समझकर वैराग्य को प्राप्त हो जाते हैं।</p>
<p>वन गमन के दृश्य के पश्चात विधीनायक प्रतिमा पर मुनि श्री द्वारा संस्कार संपन्न किए गए। पंच कल्याणक के पात्र, कलाकारों की टीम और संगीत के साथ इन दृश्यों की प्रस्तुति प्रतिष्ठाचार्य के निर्देशन में की गई, जिसे देखकर उपस्थित दर्शकों ने खूब सराहा।</p>
<p><strong>रविवार को केवल ज्ञान कल्याणक होगा</strong></p>
<p>प्रवक्ता अविनाश जैन ने बताया कि 15 मार्च (रविवार) को केवलज्ञान कल्याणक मनाया जाएगा। प्रातःकाल मुनि आदिकुमार की आहारचर्या संपन्न होगी तथा मध्याह्न में भगवान को केवलज्ञान की प्राप्ति के साथ समवसरण की रचना होगी। समवसरण में मुनिसंघ विराजमान होगा और भगवान की दिव्य वाणी सभी दिशाओं में प्रसारित होगी। पंचकल्याणक समिति के अध्यक्ष राजेश बोहरा, महामंत्री अनिरुद्ध सराफ, कोषाध्यक्ष अभय वैद्य, अनिल हजारी, स्वागताध्यक्ष संजय सेठ, दिगंबर जैन समाज के अध्यक्ष बड़ू चौधरी, शीतलधाम के अध्यक्ष सचिन वसंत जैन, वरिष्ठ उपाध्यक्ष संजय भंडारी एवं महामंत्री मोहन जैन ने विदिशा नगर के सभी श्रद्धालुओं से रविवार को केवल ज्ञान कल्याणक एवं सोमवार को अंतिम दिवस मोक्ष कल्याणक के अवसर पर अधिक से अधिक संख्या में पधारने की अपील की है।</p>
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		<title>बर्रो वाले बाबा भगवान आदिनाथ नए मंदिर में नए आसन पर विराजमान : तीर्थंकर भगवान का जन्म कल्याणक मनाया, शहर में निकली भव्य शोभायात्रा </title>
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		<pubDate>Fri, 13 Mar 2026 17:05:24 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महामहोत्सव के तृतीय दिवस प्रातःकालीन बेला में तीर्थंकर भगवान का जन्म कल्याणक हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। जैसे ही अयोध्या नगरी में राजा नाभिराय की महारानी मरुदेवी के यहां तीर्थंकर बालक का जन्म हुआ, देवराज इंद्र का आसन कम्पायमान हो उठा और तीनों लोकों में आनंद की लहर छा गई। पढ़िए अविनाश जैन [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महामहोत्सव के तृतीय दिवस प्रातःकालीन बेला में तीर्थंकर भगवान का जन्म कल्याणक हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। जैसे ही अयोध्या नगरी में राजा नाभिराय की महारानी मरुदेवी के यहां तीर्थंकर बालक का जन्म हुआ, देवराज इंद्र का आसन कम्पायमान हो उठा और तीनों लोकों में आनंद की लहर छा गई। <span style="color: #ff0000">पढ़िए अविनाश जैन ‘विद्यावाणी’ की विशेष रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>विदिशा।</strong> पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महामहोत्सव के तृतीय दिवस प्रातःकालीन बेला में तीर्थंकर भगवान का जन्म कल्याणक हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। जैसे ही अयोध्या नगरी में राजा नाभिराय की महारानी मरुदेवी के यहां तीर्थंकर बालक का जन्म हुआ, देवराज इंद्र का आसन कम्पायमान हो उठा और तीनों लोकों में आनंद की लहर छा गई। राजा नाभिराय ने अपने राज्य में उत्सव मनाने का आदेश दिया, वहीं स्वर्ग के प्रमुख सौधर्म इंद्र ने कुबेर का खजाना खोल दिया और चारों ओर रत्नों की वर्षा होने लगी। पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महामहोत्सव के तीसरे दिवस प्रातः 6 बजकर 18 मिनट पर जैसे ही तीर्थंकर बालक का जन्म हुआ, अयोध्या नगरी बने पांडाल में उपस्थित प्रमुख पात्रों और इंद्र-इंद्राणियों में खुशी की लहर दौड़ गई। प्रतिष्ठाचार्य बाल ब्रह्मचारी विनय भैया ने इसकी घोषणा की। इस अवसर पर राजा नाभिराय द्वारा किमिच्छिक दान की घोषणा की गई। साथ ही हथकरघा के सभी वस्त्रों पर 25 प्रतिशत छूट देने की घोषणा हुई तथा जीवदया के निमित्त गौशाला के लिए दान की घोषणाएं भी की गईं।</p>
<p><strong>शहर में निकली भव्य शोभायात्रा</strong></p>
<p>कार्यक्रम के अंतर्गत शहर में विशाल शोभायात्रा निकाली गई। इसमें सौधर्म इंद्र बालक आदिकुमार को ऐरावत हाथी पर लेकर गाजे-बाजे के साथ नगर भ्रमण पर निकले। उनके साथ पंचकल्याणक महोत्सव के सभी प्रमुख पात्र अश्व रथों पर अपने परिवार के साथ सवार थे। शोभायात्रा जैन महाविद्यालय से प्रारंभ होकर तिलक चौक, माधवगंज और अस्पताल रोड होते हुए पुनः अयोध्या नगरी पहुँची। यहाँ पांडुक शिला पर बालक आदिकुमार का अभिषेक किया गया।</p>
<p><strong>मुनि श्री ने बताई भगवान आदिनाथ की महिमा</strong></p>
<p>इस अवसर पर निर्यापक श्रमण मुनि श्री संभवसागर महाराज ने कहा कि जब अयोध्या नगरी में भगवान का अवतरण हुआ तो संपूर्ण विदिशा नगरी उल्लास में डूब गई। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार किसी परिवार में बालक के जन्म पर अपार खुशी होती है, उसी प्रकार तीनों लोकों के नाथ आदि प्रभु के जन्म पर हमारा हर्ष भी असीम होना चाहिए। मुनि श्री ने कहा कि यह पंचकल्याणक कार्यक्रम हमारे इष्टदेव बर्रो वाले बाबा भगवान आदिनाथ को समर्पित है। उन्होंने कहा कि भगवान आदिनाथ ने मानव समाज को असि, मसि, कृषि, विद्या, वाणिज्य और शिल्पकला जैसे षट्कर्मों का ज्ञान देकर मानव सभ्यता को दिशा दी। उन्होंने धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष — इन चार पुरुषार्थों की शिक्षा देकर मानव जीवन को पूर्णता प्रदान की। भारतीय संस्कृति के चार आश्रमों — ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास — के महत्व को बताते हुए मुनि श्री ने कहा कि मनुष्य को जीवन के प्रत्येक चरण का संतुलित रूप से पालन करना चाहिए। उन्होंने कहा कि आजकल लोग वानप्रस्थ की भावना को भूल रहे हैं, जिससे परिवारों में तनाव बढ़ रहा है।</p>
<p><strong>बर्रो वाले बाबा का नया जिनालय</strong></p>
<p>मुनि श्री ने बताया कि वर्ष 2008 में गुरुदेव ने बर्रो वाले बाबा की प्रतिमा की अगवानी की थी। प्रतिमा को देखकर उन्होंने कहा था कि यह अत्यंत अतिशयकारी प्रतिमा है और इसके लिए एक भव्य जिनालय बनना चाहिए, जो हजारों वर्षों तक जीवंत रहे। इसी भावना से प्रेरित होकर अशोक जैन (सागर वाले) एवं मोहन जैन नमकीन द्वारा बर्रो वाले बाबा का भव्य पाषाण मंदिर निर्माण कराया गया, जिसमें आज भगवान आदिनाथ नए आसन पर विराजमान हुए। इस अवसर पर मुनि श्री निस्सीम सागर महाराज ने पुण्य की महिमा बताते हुए कहा कि जीवन में मिलने वाली हर सफलता — चाहे वह शिक्षा हो, व्यापार, नौकरी, विवाह या संतान का सुख — सब पुण्य के प्रभाव से ही प्राप्त होते हैं। उन्होंने कहा कि आचार्य गुरुदेव विद्यासागर महाराज के शिष्य बनने का अवसर भी पुण्य का ही फल है।</p>
<p><strong>शनिवार को दिखाए जाएंगे वैराग्य के दृश्य</strong></p>
<p>प्रवक्ता अविनाश जैन ‘विद्यावाणी’ ने बताया कि पंचकल्याणक के चतुर्थ दिवस 14 मार्च को प्रातः राजपाट तथा मध्याह्न में स्वर्ग की अप्सरा नीलांजना के नृत्य के माध्यम से संसार की असारता का दृश्य प्रस्तुत किया जाएगा। इसके बाद राजकुमार आदिकुमार को वैराग्य उत्पन्न होता है और वे दीक्षा लेकर घोर तपस्या के लिए वन की ओर प्रस्थान करते हैं।</p>
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