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	<title>बड़े जैन मंदिर &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>अच्छे विचार और अच्छी दृष्टि ही करती है आचरण का निर्माण: आचार्य निर्भयसागर’ के बड़े जैन मंदिर में हुए मीठे प्रवचन </title>
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		<pubDate>Tue, 24 Mar 2026 11:30:05 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[भावना भाव नासनी होती है। विचार विचार को पैदा करते हैं, मधुर वाणी मधुर वाणी को पैदा करती है,आचरण आचरण को पैदा करता है,पैसा पैसे को पैदा करता है। इसलिए हमेशा मधुर वाणी बोलना चाहिए। यह उद्गार आचार्यश्री निर्भयसागर जी महाराज ने बड़ा जैन मंदिर मुरैना में धर्मसभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए। मुरैना [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>भावना भाव नासनी होती है। विचार विचार को पैदा करते हैं, मधुर वाणी मधुर वाणी को पैदा करती है,आचरण आचरण को पैदा करता है,पैसा पैसे को पैदा करता है। इसलिए हमेशा मधुर वाणी बोलना चाहिए। यह उद्गार आचार्यश्री निर्भयसागर जी महाराज ने बड़ा जैन मंदिर मुरैना में धर्मसभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए। <span style="color: #ff0000">मुरैना से पढ़िए, मनोज जैन नायक की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>मुरैना।</strong> भावना भाव नासनी होती है। विचार विचार को पैदा करते हैं, मधुर वाणी मधुर वाणी को पैदा करती है,आचरण आचरण को पैदा करता है,पैसा पैसे को पैदा करता है। इसलिए हमेशा मधुर वाणी बोलना चाहिए। यह उद्गार आचार्यश्री निर्भयसागर जी महाराज ने बड़ा जैन मंदिर मुरैना में धर्मसभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि हमें सदैव अच्छा आचरण करना चाहिए और धन अर्जन न्याय नीति से करना चाहिए। गांधी जी ने तीन बंदर बतलाए थे-बुरा मत देखो, बुरा मत सुनो, बुरा मत बोलो लेकिन, भगवान महावीर स्वामी ने दो बातें और कहीं बुरा मत सोचो और बुरा मत करो। यदि इन सिद्धांतों को जीवन में उतार दिया जाए तो नियम से सारे विश्व में शांति हो जाएगी। यदि हमारा देखने का नजरिया खराब हो तो दुनिया का नजारा बदल जाता है। इसलिए हमारी अपनी दृष्टि अच्छी होना चाहिए। विचारों का प्रदूषण उत्पन्न होने पर ही परिवार में समाज में और देश में प्रदूषण फैलता है क्योंकि, विचारों के अनुसार ही हमारा आचरण होता है। अध्यात्म के क्षेत्र में विचारों का विनिमय करना चाहिए। साधु उपदेश के माध्यम से सद विचारों का व्यापार अर्थात विनिमय करते हैं। यह विनिमय आत्मा में शांति प्रदान करता है।</p>
<p><strong>आत्म-ज्ञान के लिए चिंतन रूपी औषधि </strong></p>
<p>आचार्यश्री ने जैन दर्शन में भावना भव नाशिनी के सार को समझाते हुए कहा कि-मन में निरंतर शुभ व वैराग्यपूर्ण विचारों का चिंतन करना, जो जन्म-मरण के चक्र को नष्ट कर मोक्ष प्रदान करता है। यह देहात्म-बुद्धि को कम कर आत्मा को आत्मा में रमाने का मार्ग है। मुख्य रूप से बारह भावनाएं संसार के दुःखों से विरक्ति और आत्म-ज्ञान के लिए चिंतन रूपी औषधि हैं। जिस प्रकार शरीर के लिए औषधि की आवश्यकता होती है, वैसे ही आत्मा के लिए भावनाएं संसार के दुःखों को दूर करने वाली होती हैं। ये भावनाएं मन में छिपे विकारों को नष्ट कर, आत्मा को शुद्ध और निर्मल बनाती हैं। शुभ चिंतन से नए कर्मों का आना रुकता है और पुराने कर्मों का क्षय (निर्जरा) होता है। बाहरी वस्तुओं में सुख खोजने के बजाय, ये भावनाएं आत्मा के निज सुख को पहचानने में सहायक होती हैं।</p>
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		<title>सातवां साप्ताहिक जिनाभिषेक से हुआ भक्तिमय माहौल : आठवां साप्ताहिक अभिषेक 3 फरवरी को किया जाएगा  </title>
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		<pubDate>Tue, 27 Jan 2026 11:42:00 +0000</pubDate>
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<p><strong>आचार्य श्री विमर्श सागर जी महाराज की मंगल भावना और आशीर्वाद एवं आर्यिका श्री विमर्शिता श्री माताजी के मंगल निर्देशन में मंगलवार को बड़े जैन मंदिर में सातवां साप्ताहिक जिनाभिषेक पूरे भक्ति भाव एवं युवा जोश से किया गया। <span style="color: #ff0000">एटा से पढ़िए, सोनल जैन की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>एटा।</strong> आचार्य श्री विमर्श सागर जी महाराज की मंगल भावना और आशीर्वाद एवं आर्यिका श्री विमर्शिता श्री माताजी के मंगल निर्देशन में मंगलवार को बड़े जैन मंदिर में सातवां साप्ताहिक जिनाभिषेक पूरे भक्ति भाव एवं युवा जोश से किया गया। आओ करे सभी समस्याओं का हल प्रभु के मस्तक पर एक कलशा जल अभियान के तहत आठवां साप्ताहिक अभिषेक 3 फरवरी मंगलवार सुबह 6. 30 बजे से श्री दिगंबर जैन बड़ा जैन मंदिर पुरानी बस्ती में किया जाएगा। समाज के सभी युवा भाइयांे से निवेदन है कि अधिक से अधिक संख्या में साप्ताहिक जिनाभिषेक से जुड़कर पुण्य लाभ ले। गुरु विमर्श की भावना होगी साकार, साप्ताहिक जिनाभिषेक लगेगा एटा में त्योहार। कार्यक्रम के आयोजन जिनाग़म पंथी श्रावक संघ एवं गुरु विमर्श परिवार हैं।</p>
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		<title>सातवां साप्ताहिक जिनाभिषेक से हुआ भक्तिमय माहौल : आठवां साप्ताहिक अभिषेक 3 फरवरी को किया जाएगा  </title>
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		<pubDate>Tue, 27 Jan 2026 09:15:18 +0000</pubDate>
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<p><strong>आचार्य श्री विमर्श सागर जी महाराज की मंगल भावना और आशीर्वाद एवं आर्यिका श्री विमर्शिता श्री माताजी के मंगल निर्देशन में मंगलवार को बड़े जैन मंदिर में सातवां साप्ताहिक जिनाभिषेक पूरे भक्ति भाव एवं युवा जोश से किया गया। <span style="color: #ff0000">एटा से पढ़िए, सोनल जैन की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>एटा।</strong> आचार्य श्री विमर्श सागर जी महाराज की मंगल भावना और आशीर्वाद एवं आर्यिका श्री विमर्शिता श्री माताजी के मंगल निर्देशन में मंगलवार को बड़े जैन मंदिर में सातवां साप्ताहिक जिनाभिषेक पूरे भक्ति भाव एवं युवा जोश से किया गया। आओ करे सभी समस्याओं का हल प्रभु के मस्तक पर एक कलशा जल अभियान के तहत आठवां साप्ताहिक अभिषेक 3 फरवरी मंगलवार सुबह 6. 30 बजे से श्री दिगंबर जैन बड़ा जैन मंदिर पुरानी बस्ती में किया जाएगा। समाज के सभी युवा भाइयांे से निवेदन है कि अधिक से अधिक संख्या में साप्ताहिक जिनाभिषेक से जुड़कर पुण्य लाभ ले। गुरु विमर्श की भावना होगी साकार, साप्ताहिक जिनाभिषेक लगेगा एटा में त्योहार। कार्यक्रम के आयोजन जिनाग़म पंथी श्रावक संघ एवं गुरु विमर्श परिवार हैं।</p>
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		<title>बड़े जैन मंदिर में किया छठवां साप्ताहिक जिनाभिषेक : आर्यिका श्री विमर्शिता श्री माताजी के मंगल निर्देशन में हुआ आयोजन  </title>
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		<pubDate>Wed, 21 Jan 2026 12:22:36 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आचार्यश्री विमर्श सागर जी महामुनिराज के मंगल भावना और आशीर्वाद एवं आर्यिका श्री विमर्शिता श्री माताजी के मंगल निर्देशन में मंगलवार को बड़े जैन मंदिर में छठवां साप्ताहिक जिनाभिषेक पूरे भक्ति भाव एवं युवा जोश के साथ हुआ। एटा से पढ़िए, सोनल जैन की यह खबर&#8230; एटा। भावलिंगी संत की मंगल भावना और आशीर्वाद एवं [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>आचार्यश्री विमर्श सागर जी महामुनिराज के मंगल भावना और आशीर्वाद एवं आर्यिका श्री विमर्शिता श्री माताजी के मंगल निर्देशन में मंगलवार को बड़े जैन मंदिर में छठवां साप्ताहिक जिनाभिषेक पूरे भक्ति भाव एवं युवा जोश के साथ हुआ। <span style="color: #ff0000">एटा से पढ़िए, सोनल जैन की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>एटा।</strong> भावलिंगी संत की मंगल भावना और आशीर्वाद एवं आर्यिका श्री विमर्शिता श्री माताजी के मंगल निर्देशन में मंगलवार को छठवां साप्ताहिक जिनाभिषेक हुआ। आचार्यश्री विमर्श सागर जी महामुनिराज के मंगल भावना और आशीर्वाद एवं आर्यिका श्री विमर्शिता श्री माताजी के मंगल निर्देशन में मंगलवार को बड़े जैन मंदिर में छठवां साप्ताहिक जिनाभिषेक पूरे भक्ति भाव एवं युवा जोश के साथ हुआ। आओ करे सभी समस्याओं का हल प्रभु के मस्तक पर एक कलशा जल। हो जाएं तैयार आ रहा है सातवां साप्ताहिक अभिषेक। जनवरी मंगलवार को सुबह 6.30 बजे श्री दिगम्बर जैन बड़ा जैन मंदिर पुरानी बस्ती में इसका आयोजन होगा। भावलिंगी संत गुरु विमर्श की भावना होगी साकार। साप्ताहिक जिनाभिषेक लगेगा एटा में त्योहार। इसके आयोजक जिनाग़म पंथी श्रावक संघ एवं गुरु विमर्श परिवार एटा है।</p>
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		<title>धर्म बुढ़ापे में नहीं यौवनावस्था में अपनाएं : मुनिश्री विहसंत सागर जी महाराज ने बड़े जैन मंदिर में दिया दिव्य प्रबोधन  </title>
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		<pubDate>Mon, 12 Jan 2026 07:30:47 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आचार्यों ने कहा है कि धर्म तो प्रारंभ से ही करना चाहिए। बुढ़ापे में जब आपके अंग शिथिल हो जाएंगे तो धर्म की उपासना कैसे होगी। यह उद्गार आचार्यश्री विराग सागरजी महाराज के शिष्य उपाध्याय विहसंतसागरजी महाराज ने बड़े जैन मंदिर में धर्मसभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए। मुरैना से पढ़िए, मनोज जैन नायक [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>आचार्यों ने कहा है कि धर्म तो प्रारंभ से ही करना चाहिए। बुढ़ापे में जब आपके अंग शिथिल हो जाएंगे तो धर्म की उपासना कैसे होगी। यह उद्गार आचार्यश्री विराग सागरजी महाराज के शिष्य उपाध्याय विहसंतसागरजी महाराज ने बड़े जैन मंदिर में धर्मसभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए। <span style="color: #ff0000">मुरैना से पढ़िए, मनोज जैन नायक की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>मुरैना।</strong> वर्तमान में सांसारिक प्राणी धर्म को भी अपने अनुसार चलाने के लिए प्रयासरत रहता है। आजकल के युवा कहते हैं कि धर्म तो बुढ़ापे में किया जाता है। बाल्यकाल तो खेलने-कूदने और यौवन अवस्था तो मौज-मस्ती के लिए होती है जबकि, आचार्यों ने कहा है कि धर्म तो प्रारंभ से ही करना चाहिए। बुढ़ापे में जब आपके अंग शिथिल हो जाएंगे तो धर्म की उपासना कैसे होगी। यह उद्गार आचार्यश्री विराग सागरजी महाराज के शिष्य उपाध्याय विहसंतसागरजी महाराज ने बड़े जैन मंदिर में धर्मसभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि आपकी आंखों की रोशनी कम हो जाएगी, आपको दिखाई ही नहीं देगा, आपके हाथ पैर कमजोर हो जाएंगे, कानों से सुनाई कम देगा तो धर्म की आराधना कैसे कर पाओगे। इसलिए धर्म को प्रारंभ से ही अपनाना चाहिए।</p>
<p><strong>धार्मिक अनुष्ठान क्रियाकलाप में डूब जाएं</strong></p>
<p>धर्म के अपने सिद्धांत होते हैं, अपनी परंपराएं, रीति होती हैं, नियम होते हैं, उन्हें उन्हीं के अनुसार पालन करना चाहिए लेकिन, वर्तमान में सभी लोग धार्मिक क्रियाकलापों को भूलते जा रहे हैं और अपने-अपने अनुसार धर्म की व्याख्या कर रहे हैं। जब भी हम कोई धार्मिक अनुष्ठान या क्रियाकलाप करें तो हमें उसमें डूब जाना चाहिए। पूरी निष्ठा श्रद्धा और भक्ति के साथ प्रभु की आराधना करते हुए नि:स्वार्थ भावना से क्रियाएं करना चाहिए।</p>
<p><strong> इस संसार में अच्छे कार्य करने चाहिए </strong></p>
<p>संघस्थ मुनिश्री विश्वसाम्य सागरजी महाराज ने भी अपने आशीष वचनों में कहा कि इस संसार में जन्म लिया है तो कुछ अच्छे कार्य करना चाहिए। तभी आपका मानव पर्याय में जन्म लेना सार्थक होगा। जब तक आप जीवित हैं, तब तक भले ही आपके सामने कोई कुछ न बोले, लेकिन आपके इस संसार से विदा होने के बाद आपके अच्छे कार्य ही शेष रह जाएंगे। आपका यश और अपयश ही आपके जीवनकाल की गाथा को लिखेगा। यदि आपने अच्छे कार्य किए होंगे तो आपकी दूसरे जन्म में किसी अन्य पर्याय में भी सुख शांति की प्राप्ति होगी और मानव जीवन प्राप्त करने के बाद भी अपने गलत और अन्याय पूर्ण कार्य किए तो इस लोक के साथ साथ परलोक में भी आपकी दुर्गति होना निश्चित है।</p>
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		<title>प्रभु आराधना निःस्वार्थ भाव से ही करें: मुनिश्री विहसंत सागर का मुरैना नगर में हुआ भव्य आगमन </title>
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		<pubDate>Sat, 10 Jan 2026 12:49:08 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[हमें जीवन में यदि सकारात्मक परिर्वतन चाहिए तो भगवान महावीर, मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम, श्रीकृष्ण एवं अन्य महापुरुषों के आदर्शों पर चलना होगा। जब हममें सकारात्मक परिवर्तन आएगा तो इसका असर देश, धर्म और समाज पर भी पड़ेगा। यह उद्गार उपाध्याय विहसंतसागरजी महाराज ने नगर सीमा में प्रवेश के समय गुरुभक्तों को संबोधित करते हुए व्यक्त [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>हमें जीवन में यदि सकारात्मक परिर्वतन चाहिए तो भगवान महावीर, मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम, श्रीकृष्ण एवं अन्य महापुरुषों के आदर्शों पर चलना होगा। जब हममें सकारात्मक परिवर्तन आएगा तो इसका असर देश, धर्म और समाज पर भी पड़ेगा। यह उद्गार उपाध्याय विहसंतसागरजी महाराज ने नगर सीमा में प्रवेश के समय गुरुभक्तों को संबोधित करते हुए व्यक्त किए। <span style="color: #ff0000">मुरैना से पढ़िए, मनोज जैन नायक की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>मुरैना।</strong> हमें जीवन में यदि सकारात्मक परिर्वतन चाहिए तो भगवान महावीर, मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम, श्रीकृष्ण एवं अन्य महापुरुषों के आदर्शों पर चलना होगा। जब हममें सकारात्मक परिवर्तन आएगा तो इसका असर देश, धर्म और समाज पर भी पड़ेगा। यह उद्गार उपाध्याय विहसंतसागरजी महाराज ने नगर सीमा में प्रवेश के समय गुरुभक्तों को संबोधित करते हुए व्यक्त किए। उपाध्याय श्री ने कहा कि ज्ञान तो मनुष्य को खुद प्राप्त हो जाता है। प्रभु के जिसे दर्शन हो गए उसका मोह भी खत्म हो जाता है। हमें हमेशा अपने भावों में शुद्धि रखना चाहिए। मन को पवित्र करना ही पूजा का भाव होता है। मन को पवित्र करने के लिए हमें प्रभु की आराधना करना चाहिए। आराधना सदैव बिना किसी स्वार्थ के भाव से करना चाहिए, तभी पुण्य प्राप्ति होती है। संसार सागर में जन्म लेने के बाद हमारा लक्ष्य प्रभु स्मरण और उनका ध्यान होना चाहिए। मनुष्य प्रभु का ध्यान लगाकर संसार के आवागमन से मुक्ति पा सकता है। भारत में जन्मे भगवान श्री राम, श्री कृष्ण और भगवान महावीर के आदर्शों को हमें बच्चों को समझाना चाहिए। आदर्श जीवन जीने के लिए हमें प्रभु के बताए मार्ग पर चलना होगा।</p>
<p>आचार्य विरागसागर जी महाराज के शिष्य उपाध्याय विहसंतसागरजी महाराज का नगर में भव्य मंगल प्रवेश हुआ। पूज्यश्री की सामायिक के बाद दोपहर 2 बजे बैरियर चौराहे से नगर के लिए विहार किया। स्थानीय जैन समाज एवं जैन मित्र मंडल के सभी सदस्यों ने सामूहिक रूप से पूज्य मुनिराजों का पाद प्रक्षालन एवं आरती कर भव्य अगवानी की। ढोल ताशे नगाड़ों के साथ भव्य शोभायात्रा के रूप में मुनिराजों को नगर भ्रमण कराते हुए श्री पार्श्वनाथ जैन पंचायती बड़ा जैन मंदिर में प्रवेश कराया गया। बड़े जैन मंदिर में महिलाओं एवं बालिकाओं द्वारा रंगोली एवं चौक आदि बनाया एवं सिर पर मंगल कलश रखकर पूज्य मुनिराजों की अगवानी की।</p>
<p><strong>उपाध्यायश्री पत्रकारों को संबोधित करेंगे</strong></p>
<p>उपाध्याय विहसंतसागरजी महाराज रविवार दोपहर 1 बजे नगर के इलेक्ट्रॉनिक एवं प्रिंट मीडिया के पत्रकार बंधुओं को संबोधित करेंगे। पत्रकार वार्ता में नगर के सभी पत्रकारों को आमंत्रित किया गया है। उपाध्याय विहसंतसागरजी महाराज के नगरागमन पर जैन मित्र मंडल मुरैना के सभी सदस्यों ने सामूहिक रूप से मुनिराजों की अगवानी की। सभी सदस्यों ने युगल मुनिराजों का प्रासुक जल से पाद प्रक्षालन किया, दीपक से आरती उतारकर आशीर्वाद प्राप्त किया।</p>
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		<title>छोटे-छोटे नियम पालने से आत्मबल बढ़ता है: मुनिश्री विलोकसागर ने साधना और संयम को श्रेष्ठ बताया  </title>
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		<pubDate>Sun, 23 Nov 2025 10:32:11 +0000</pubDate>
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<p><strong>बड़े जैन मंदिर में पांच माह तक धर्म प्रभावना करने के बाद रविवार को अंतिम दिन मुनिश्री विलोकसागरजी महाराज ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि सांसारिक प्राणी संसार में रहते हुए, सांसारिक कार्यों में ही लिप्त रहता है। राग द्वेष मान माया लोभ के चक्कर में वह आत्म साधना करना भूल जाता है। <span style="color: #ff0000">मुरैना से पढ़िए, मनोज जैन नायक की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>मुरैना।</strong> बड़े जैन मंदिर में पांच माह तक धर्म प्रभावना करने के बाद रविवार को अंतिम दिन मुनिश्री विलोकसागरजी महाराज ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि सांसारिक प्राणी संसार में रहते हुए, सांसारिक कार्यों में ही लिप्त रहता है। राग द्वेष मान माया लोभ के चक्कर में वह आत्म साधना करना भूल जाता है जबकि, होना यह चाहिए कि संसार में रहते हुए, सांसारिक क्रियाओं के मध्य ही हमें धीरे-धीरे संयम की साधना का अभ्यास करते रहना चाहिए। एक छोटा सा संयम का नियम मनुष्य की जिंदगी बदल सकता है। छोटे-छोटे नियमों का नित्य पालन करने से हमारा आत्मबल मजबूत होता है और हमें संयम पथ पर चलने में मदद मिलती है। बूंद-बूंद से घड़ा भरता है, इसी तरह संयम की साधना के मार्ग पर बढ़ने के लिए शुरू से ही अपनी सामर्थ्य अनुसार शनै-शनै नियम पूर्वक पालन करना चाहिए। संयम की साधना में नियमों का महत्व इसलिए है क्योंकि वे व्यक्ति को अनुशासन, आत्म-नियंत्रण और आत्म-जागरूकता प्रदान करते हैं।</p>
<p><strong>नियम व्यक्ति में अनुशासन की भावना पैदा करते हैं</strong></p>
<p>मुनिश्री ने कहा कि नियम, संयम को आकार देते हैं और जीवन के उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए एक मजबूत आधार प्रदान करते हैं। नियमों के पालन से व्यक्ति काम, क्रोध, लोभ जैसे विकारों को नियंत्रित कर पाता है, जिससे मन शुद्ध होता है, एकाग्रता बढ़ती है और जीवन में सफलता तथा संतुष्टि मिलती है। नियम व्यक्ति में अनुशासन की भावना पैदा करते हैं, जो संयम के लिए आवश्यक है। यह व्यक्ति को अपनी इंद्रियों और इच्छाओं पर नियंत्रण रखने में मदद करते हैं। नियम किसी भी महान उद्देश्य की ओर अग्रसर होने के लिए एक माध्यम और आधार प्रदान करते हैं। नियमों का पालन करने से काम, क्रोध, लोभ और अन्य नकारात्मक विचारों पर विजय प्राप्त करने में मदद मिलती है, जो संयम की साधना का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।</p>
<p><strong>सल्लेखना पूर्वक समाधि मरण का होना चाहिए</strong></p>
<p>इस अवसर पर जैन संत मुनिश्री विबोधसागरजी महाराज ने कहा कि जीवन का मुख्य उद्देश्य सल्लेखना पूर्वक समाधि मरण का होना चाहिए। गृहस्थ हो या महावृती, उसकी भावना हो कि हमारा अंतिम समय रागदेश रहित, समता धारण कर इस नश्वर शरीर को छोड़ समाधि हो। नियम के साथ यदि हम धीरे-धीरे चारों प्रकार के आहार का त्याग करते हुए उत्कृष्ट समाधि की ओर बढ़े। अपने इस शरीर को छोड़ने के पहले समता पूर्वक रागदेश कषाय आदि को छोड़कर समाधि पूर्वक मरण को प्राप्त करना चाहिए।</p>
<p><strong> मुनिराजों ने धौलपुर की ओर किया मंगल विहार</strong></p>
<p>नगर में पांच माह तक धर्म प्रभावना के बाद मुनिराजों ने रविवार को दोपहर 2 बजे धौलपुर की ओर मंगल पद विहार किया। रात्रि विश्राम ज्ञानतीर्थ मुरैना में होगा। सोमवार की आहारचर्या ज्ञानतीर्थ में होगी। दोपहर 2 बजे विहार के बाद रात्रि विश्राम सरायछोला में होने की संभावना है। मंगलवार 25 नवंबर को प्रातःकालीन बेला में धौलपुर नगर में मुनिराजों का भव्य मंगल प्रवेश होगा।</p>
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		<title>हम ऐसे कर्म करें जिससे मनुष्य जन्म लेना सार्थक हो : सिद्ध परमेष्ठियों की भक्ति मय पूजन के साथ समर्पित होंगे 256 अर्घ्य  </title>
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		<pubDate>Mon, 17 Nov 2025 11:54:00 +0000</pubDate>
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<p><strong>सिद्धों की आराधना पूजा भक्ति उपासना के अनुष्ठान के अवसर पर बड़े जैन मंदिर में मुनिश्री विलोकसागरजी महाराज ने धर्मसभा में कहा कि पुण्योदय से ही हम सभी को मनुष्य पर्याय में जन्म मिला है। जब हमें मनुष्य पर्याय मिली है तो हमें ऐसे कर्म करना चाहिए, जिससे हमारा मनुष्य जन्म लेना सार्थक हो जाए। <span style="color: #ff0000">मुरैना से पढ़िए, मनोज जैन नायक की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>मुरैना।</strong> सिद्धों की आराधना पूजा भक्ति उपासना के अनुष्ठान के अवसर पर बड़े जैन मंदिर में मुनिश्री विलोकसागरजी महाराज ने धर्मसभा में कहा कि पुण्योदय से ही हम सभी को मनुष्य पर्याय में जन्म मिला है। जब हमें मनुष्य पर्याय मिली है तो हमें ऐसे कर्म करना चाहिए, जिससे हमारा मनुष्य जन्म लेना सार्थक हो जाए। अच्छे कर्म करोगे तो सुखद परिणाम मिलेगे, बुरे कर्म करोगे तो दुखद परिणाम मिलेंगे। जैन दर्शन के अनुसार मनुष्य के तीन मित्र उसके कर्म, परिवार और धन हैं। कर्म सबसे सच्चा और स्थायी मित्र है। जीवन भर किए गए कर्म ही मृत्यु के बाद आत्मा के साथ जाते हैं। परिवार और प्रियजन केवल जीवन भर साथ देते हैं और मृत्यु के बाद, श्मशान तक ही मित्र बने रहते हैं। मृत्यु के साथ उनकी मित्रता का अंत हो जाता है। धन भी एक क्षणिक मित्र है। श्वासों की लय समाप्त होते ही धन से बनी मित्रता समाप्त हो जाती है। व्यक्ति के कर्म जीवन के हर मोड़ पर उसका साथ देते हैं। अच्छे कर्म व्यक्ति को अच्छे परिणाम देते हैं, जबकि बुरे कर्म उसकी दुर्गति का कारण बनते हैं। इसीलिए धर्म को, मनुष्य के कर्मों को ही सच्चा मित्र कहा गया है। वे हर समय जन्मजन्मांतर तक उसके साथ रहते हैं।</p>
<p><strong>जन्म जन्मांतर के पाप नष्ट हो जाते हैं</strong></p>
<p>प्रतिष्ठाचार्य पंडित राजेंद्र शास्त्री मंगरोनी ने मंत्रोच्चारण के साथ अभिषेक, शांतिधारा के पश्चात विधानकर्ताओं को संबोधित करते हुए कहा कि श्रद्धाभक्ति के साथ विधि विधान एवं शुद्धि सहित सिद्धों की अर्चना करने से जन्म जन्मांतर के पाप नष्ट हो जाते हैं। विधान के पांचवें दिन मंगलवार को 256 अर्घ्य समर्पित किए जाएंगे। पुण्य कर्मों के कारण ही हम सभी धार्मिक अनुष्ठान करने का पावन अवसर प्राप्त होता है। इस पवित्र मौके का हमें पूरा लाभ लेना चाहिए। विधान के चतुर्थ दिन संगीत की मधुर धुन पर पूजा भक्ति करते हुए सभी इंद्र-इंद्राणियों ने अष्टदृव्य अर्घ्य के साथ 128 श्रीफल समर्पित किए। सिद्धों की आराधना करते हुए कुबेर इंद्र ने भक्तिमय भजनों पर भक्ति नृत्य प्रस्तुत करते हुए रत्नों की वर्षा की। विधान की पूजन से पूर्व सौधर्म इंद्र के साथ अन्य सभी इन्द्रो ने श्री जी की प्रतिमा का अभिषेक, शांतिधारा एवं नित्यमह पूजन कर संपूर्ण वातावरण को भक्तिमय बना दिया। विधानाचार्य पंडित राजेंद्र शास्त्री मंगरोनी ने मंत्रोच्चारण करते हुए सभी क्रियाओं को सम्पन्न कराया।</p>
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		<title>आदर्शाे सिद्धांतों का दृढ़ता से पालन करें: मुनिश्री विलोकसागरजी ने करेंगे सिद्धचक्र विधान का शुभारंभ  </title>
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		<pubDate>Thu, 13 Nov 2025 11:30:19 +0000</pubDate>
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<p><strong>आठ दिवसीय श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान के शुभारंभ से पूर्व बड़े जैन मंदिर में मुनिश्री विलोकसागरजी महाराज ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि जीवन में कैसी भी विषम परिस्थितियां निर्मित हों, हमें आदर्शाे और सिद्धांतों को नहीं भूलना चाहिए। हमें अपने आदर्शाे का, अपने सिद्धांतों को दृढ़ता से पालन करना चाहिए। <span style="color: #ff0000">मुरैना से पढ़िए, मनोज जैन नायक की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>मुरैना।</strong> आठ दिवसीय श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान के शुभारंभ से पूर्व बड़े जैन मंदिर में मुनिश्री विलोकसागरजी महाराज ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि जीवन में कैसी भी विषम परिस्थितियां निर्मित हों, हमें आदर्शाे और सिद्धांतों को नहीं भूलना चाहिए। हमें अपने आदर्शाे का, अपने सिद्धांतों को दृढ़ता से पालन करना चाहिए। सांसारिक जीवन में अनेकों प्रकार की विषम परिस्थितियां आती जाती रहती हैं। समय समय पर कभी दुख अथवा कभी सुख का आवागमन होता रहता है। हमने अपने ईष्ट के सदुपदेशों से, अपने गुरुओं से, साधु संतों से, अपने शास्त्र ग्रंथों आदि से जो भी आदर्श, सिद्धांत सीखे हैं या ग्रहण किए हैं। उनके प्रति श्रद्धावान रहते हुए नियमपूर्वक उनका पालन करना चाहिए। यदि हमने अपने आदर्शाे का, सिद्धांतों का, नियमों का दृढ़ता से पालन नहीं किया तो हमारा जीवन नरकमय होने से कोई रोक नहीं सकता।</p>
<p><strong>त्यागी हुई वस्तु को कूड़ा, कचरा, रद्दी समझना चाहिए</strong></p>
<p>यदि कोई व्यक्ति अपने सिद्धांतों से भटक रहा है तो उसे समझाना चाहिए कि ऐसा करना गलत है। त्यागी हुई वस्तु को कूड़ा, कचरा, रद्दी समझना चाहिए। जिस वस्तु को हमने त्याग दिया है, वह हमारे लिए अनुपयोगी है, उसे कूड़ेदान में डाल देना चाहिए। त्यागी हुई वस्तु के उपयोग का हमारे मन में ख्याल भी नहीं आना चाहिए। सामान्य तौर पर भी हम ऐसी कोई भी चीज़ जो बेकार, अनुपयोगी या फेंकी हुई हो, उसका पुनः उपयोग नहीं करते फिर संयम साधना के लिए अपने आदर्शाे का, अपने सिद्धांतों का, अपने नियमों की अवहेलना कैसे कर सकते हैं। यदि आपने अपने आदर्शाे और सिद्धांतों का अक्षरशः पालन नहीं किया तो आप यू ही इस संसार सागर में यू ही भटकते रहेंगे और यदि अपने आदर्शाे। सिद्धांतों पर अडिग रहे तो मोक्ष मार्ग की ओर अग्रसर हो सकते हैं।</p>
<p><strong> त्यागी गई वस्तु वमन के ही समान है</strong></p>
<p>त्याग के संदर्भ में मुनिश्री ने दृष्टांत देते हुए बताया कि एक व्यक्ति ने अपने घर परिवार का त्याग कर दिया और वह साधु बन गया। काफी समय बीतने के बाद उसके मन में ख्याल आया कि मेरे बीबी बच्चे कैसे होगें, मुझे जाकर उन्हें देखना चाहिए। उस व्यक्ति ने अपने गांव पहुंचकर अपनी बीबी को आवाज दी। उस साधु की पत्नी अपने पति को देखते ही समझ गई कि मेरा पति अपने आदर्शाे और सिद्धांतों से भटक रहा है। उस पत्नी ने अपने साधु पति को ससम्मान एक आसन पर बैठाया और अपने बेटे को एक पात्र देकर कहा कि इसमें वमन (उल्टी) कर दो, बेटे ने ऐसा ही किया। फिर उसने अपने पुत्र को उस वमन सामग्री को खाने को कहा। तब साधु बोला क्या तुम पागल हो गई हो, वमन की ही सामग्री को पुनः कैसे ग्रहण किया जा सकता है। तब साधु की पत्नी ने कहा कि पागल मैं नहीं, पागल तो आप हो गए हैं। त्यागी गई वस्तु वमन के ही समान हैं, जब उसे पुनः ग्रहण नहीं किया जा सकता तो आप भी घर परिवार का त्याग कर संन्यासी हो गए थे, फिर पुनः घर परिवार को कैसे स्वीकार कर सकते हो। हे स्वामी आप अपने आदर्शाे और सिद्धांतों को भूल रहे हो। अपनी पत्नी की बात उस साधु की समझ में आ गई और वह तुरंत पुनः घर परिवार को छोड़कर अपने आश्रम चला गया । कहने का तात्पर्य है कि जो हमने त्याग दिया, छोड़ दिया उसे पुनः पाने की लालसा भी मन में नहीं करना चाहिए।</p>
<p><strong>’आज से होगा आठ दिवसीय अनुष्ठान का शुभारंभ</strong></p>
<p>जैन समाज के सुप्रसिद्ध विधान प्रतिष्ठाचार्य पंडित राजेंद्र शास्त्री मंगरोनी ने बताया कि मुनिराजों के पावन सान्निध्य में आठ दिवसीय श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान के शुभारंभ से पूर्व आगम सम्मत विभिन्न क्रियाएं विधिविधान पूर्वक मंत्रोच्चारण के साथ संपन्न कराई जाएंगी। आज प्रातः विभिन्न धार्मिक क्रियाओं के साथ-साथ श्री जिनेंद्र प्रभु का अभिषेक, शांतिधारा, नित्यमह पूजन मंगलाचरण, ध्वजारोहण एवं घटयात्रा का जुलूस निकलेगा। सर्वप्रथम पुण्यार्जक परिवार कैलाशचंद राकेशकुमार जैन (सिखाई का पुरा) पूणारावत परिवार के यहां से बड़े जैन मंदिर जी में गाजे-बाजे के साथ पूजन के लिए द्रव्य सामग्री आएगी।</p>
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		<title>विषम परिस्थितियों में समता भाव रखना भी बड़ी तपस्या: मुनिश्री विलोकसागर जी ने ‘समयसार’ ग्रंथ की वाचना कर बताए जीवन के रहस्य  </title>
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		<pubDate>Wed, 15 Oct 2025 13:35:58 +0000</pubDate>
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<p><strong>मुनिश्री विलोकसागरजी महाराज ने बड़े जैन मंदिर में सिद्धांत ग्रंथ ‘समयसार’ की व्याख्या करते हुए कहा कि विपरीत परिस्थितियों में मन की स्थिति को अनुकूल रखना भी एक साधना है। पूजा पाठ भक्ति अनुष्ठान व्रत उपवास तो कोई भी कर सकता है और करता भी है। <span style="color: #ff0000">मुरैना से पढ़िए, मनोज जैन नायक की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong>मुरैना।</strong> मुनिश्री विलोकसागरजी महाराज ने बड़े जैन मंदिर में सिद्धांत ग्रंथ ‘समयसार’ की व्याख्या करते हुए कहा कि विपरीत परिस्थितियों में मन की स्थिति को अनुकूल रखना भी एक साधना है। पूजा पाठ भक्ति अनुष्ठान व्रत उपवास तो कोई भी कर सकता है और करता भी है। वर्तमान में सांसारिक प्राणी इन्हीं सब को धर्म और तपस्या समझ रहा है लेकिन, सबसे बड़ी तपस्या मन को काबू में रखना है। विषम परिस्थितियों में समता भाव रखना ही सबसे बड़ी तपस्या है। अधिकांशतः प्राणी पाप कर्मों में लिप्त रहता है, दूसरों की निंदा करता है, दूसरों के खोट देखता है, दूसरों का बुरा सोचता है। बुरा सोचते-सोचते वह अच्छे कार्यों से दूर होता चला जाता है। भौतिकवादी चकाचौध में मनुष्य ने पाप कर्मों से डरना छोड़ दिया है लेकिन, यही कर्म जब उदय में आते हैं तो करोड़पति को खाकपति बनने में देर नहीं लगती। कर्मों की मार मनुष्य का कचूमर निकाल देती है।</p>
<p>इसलिए हमें बुरे कर्मों से डरना चाहिए, उनका पूर्णतः त्याग करना चाहिए। हमारे परिणाम बुरे है तो कर्म बुरे फल देगा और आपके परिणाम अच्छे हैं तो कर्म अच्छे फल देगा। कर्म की मार को सभी को झेलना होगा। जिसका भाग्य ही दुर्भाग्य में बदल गया हो उसे कोई क्या मारेगा, उसे तो उसके कर्म ही मारेंगे। मनुष्य अपने अवगुणों को नजरअंदाज करते हुए दूसरों के अवगुणों को देखता है, दूसरों के भावों को देखता है। हमें जो भी परिणाम मिलेगे अपने भावों की परिणीति से मिलेंगे। किसी अन्य के भावों की परिणीति से हमारा कल्याण होने वाला नहीं है। स्वयं के कर्मों को सुधारने से ही इस संसार सागर से मुक्ति मिल सकती है।</p>
<p><strong>जैन धर्म कर्म सिद्धांत पर आधारित है </strong></p>
<p>कर्म सिद्धांत की व्याख्या करते हुए मुनिश्री विबोधसागरजी ने बताया कि जैन दर्शन कर्म सिद्धांत पर आधारित है। कर्म सिद्धांत एक ऐसा सिद्धांत है जो कहता है कि हर व्यक्ति अपने कर्मों (अच्छे या बुरे) के फलों के लिए स्वयं जिम्मेदार है, और इन कर्मों का प्रभाव वर्तमान और भविष्य में उसके जीवन को निर्धारित करता है। इसका मतलब है कि अच्छे कर्म अच्छे परिणाम लाते हैं, जबकि बुरे कर्म दुख का कारण बनते हैं। यह एक ष्जैसा बोओगे वैसा काटोगेष् का सिद्धांत है। जैन धर्म के अनुसार, आत्मा के कर्मों का फल केवल आत्मा को ही भोगना पड़ता है। कोई भी तंत्र मंत्र गुरु भगवान, किसी को उसके कर्मों के फल से नहीं बचा सकता। स्वयं ही कर्मों की निर्जरा करके आत्मा को कर्मों के बंधनों से मुक्त होना पड़ता है। जब तक तेरे पुण्य का, बीता नहीं करार, अवगुण तेरे माफ हैं, चाहे करो हजार। पूर्वाचार्यों ने कहा है कि जब तक मनुष्य के पुण्य कर्मों का उदय चल रहा है, तब तक वह खूब मौज मस्ती करले, सभी सुखों को भोग ले, खूब अनीति, अनाचार और पाप करले, सभी माफ हैं, लेकिन जब पाप कर्मों का उदय आएगा तो तेरा बेड़ा गर्क हो जाएगा। इसीलिए अच्छे समय में भी हमें अच्छे कर्म ही करना चाहिए, ताकि जीवन में, भविष्य में दुखों का सामना न करना पड़े।</p>
<p><strong>कर्मों के अनुरूप ही मिलता है फल</strong></p>
<p>कर्म का फल मुख्य रूप से ईश्वर ही देता है, क्योंकि वही सबसे न्यायप्रिय और सर्वशक्तिमान है। ईश्वर भी अपनी मर्जी से कुछ नहीं करता। वह भी आपको कर्मों के फलस्वरूप ही परिणाम देता है। ईश्वर ही कर्मों का अंतिम और सबसे सच्चा फलदाता है क्योंकि, वह सभी के कर्मों का पल-पल का लेखा जोखा रखता है। वह अदृश्य शक्ति, वह सर्व शक्तिमान बिना किसी भेदभाव व बिना किसी पक्षपात के सभी को उनके कर्मों के अनुरूप उचित फल देता है। अपने अच्छे, बुरे भावों और विचारों से ही जीवन शांत-अशांत और सुख, दुःख का कारण बनता है। परिणामों का खेल बड़ा विचित्र है, क्योंकि स्वर्ग, नरक से लेकर मोक्ष तक की स्थिति में भी परिणामों का प्रतिफल ही एकमात्र कारण है।</p>
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