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	<title>प्रेरणादायी &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<description>ताज़ा खबरे हिन्दी में</description>
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		<title>भीड़ का संबंध सत्य से नहीं आकर्षण से होता है: स्वस्ति भूषण माताजी पुस्तक ट्रेनिंग पॉइंट के अंश  </title>
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		<pubDate>Mon, 09 Jun 2025 12:46:25 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[स्वस्ति भूषण माताजी द्वारा लिखित पुस्तक ट्रनिंग पॉइंट में उन्होंने ऐसे ज्ञान, जीवन-दर्शन और आदर्शों का चित्र सामने रखा है। जो सभी के लिए प्रेरणादायी है। अनुकरणीय भी। रामगंजमंडी से पढ़िए, इस पुस्तक के संकलित अंश, संकलन किया है अभिषेक जैन लुहाड़िया ने&#8230; रामगंजमंडी। स्वस्ति भूषण माताजी द्वारा लिखित पुस्तक ट्रनिंग पॉइंट में उन्होंने ऐसे [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>स्वस्ति भूषण माताजी द्वारा लिखित पुस्तक ट्रनिंग पॉइंट में उन्होंने ऐसे ज्ञान, जीवन-दर्शन और आदर्शों का चित्र सामने रखा है। जो सभी के लिए प्रेरणादायी है। अनुकरणीय भी। <span style="color: #ff0000">रामगंजमंडी से पढ़िए, इस पुस्तक के संकलित अंश, संकलन किया है अभिषेक जैन लुहाड़िया ने&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>रामगंजमंडी।</strong> स्वस्ति भूषण माताजी द्वारा लिखित पुस्तक ट्रनिंग पॉइंट में उन्होंने ऐसे ज्ञान, जीवन-दर्शन और आदर्शों का चित्र सामने रखा है। जो सभी के लिए प्रेरणादायी है। अनुकरणीय भी। इस पुस्तक के अंश के मुताबिक अक्सर लोग भीड़ से बहुत प्रभावित होते हैं। रास्ते में कहीं जा रहे हैं और रास्ते किनारे भीड़ लगी है तो लोग गाड़ी रोककर उतरकर देखते हैं क्या हुआ? लोगों को लगता है कि भीड़ है तो कुछ ना कुछ जरूर होगा, वरना लोग इकट्ठा क्यों होते ? कहा भी है कि भीड़ भीड़ को खींचती है और पैसा पैसे को खींचता है। उन्होंने आगे कहा है कि कहीं भीड़ दिखे और विचार आए बिना रह जाए, उत्तर खींचे बिना रह जाए ऐसा बहुत मुश्किल है। भीड़ कहीं भी हो सकती है। टॉकिज में देखिए, वहां भी भीड़ मिल जाएगी। डॉक्टर के यहां लाइन लगी मिल जाएगी, ज्योतिषी के यहां भी भीड़ मिल जाएगी। स्कूल कॉलेज भीड़ से भरे पड़े हैं। जिस स्कूल में बच्चे ज्यादा हो आपके हिसाब से वह अच्छा स्कूल है। आपस में चर्चा करते हैं कि उसका बच्चा उस स्कूल में पढ़ता है, फ़लाने का बच्चा उसमें पढ़ता है। इसलिए मैं भी अपने बच्चों को वहीं पर पढ़ाऊंगी। खींचती है भीड़, इंसान को उसके रोम रोम को।</p>
<p><strong>भीड़ में प्रभु के दर्शन का आनंद ?</strong></p>
<p>माताजी ने कहा है कि लोग शिखर जी जाते हैं। एक बार एक व्यक्ति शिखर जी से लौटकर आए बोले पिछले बार शिखरजी गया था तब ज्यादा अच्छा नहीं लगा। बिल्कुल भीड़ नहीं थी मात्र 25-50 लोग पहाड़ पर थे। वंदना करने में मजा ही नहीं आया लेकिन, इस बार तो होली पर गया था। कमरा भी नहीं मिला, बरामदे में सोना पड़ा और भीड़ पहाड़ पर इतनी थी कि चलना मुश्किल हो रहा था लेकिन, बहुत अच्छा लगा। आगे उसने बताया कि माताजी चंदाप्रभु भगवान के दर्शन में लाइन लगानी पड़ी। एक घंटे में नंबर आया और पार्श्वनाथ भगवान के दर्शन में तीन घंटे इंतजार करना पड़ा। बाकी टोक पर भी बड़ी मुश्किल हो रही थी। दर्शन करने में लेकिन, आनंद काफी आया और सोचा कि अब हर साल इन्हीं दौरान जाया करूंगा इस समय भीड़ अच्छी होती है।</p>
<p><strong>लोग बिना समझे बिना भावों के वहां भागते हैं</strong></p>
<p>इस व्यक्ति की बात पर चिंतन करें कि इस व्यक्ति को पहली बार में मेहनत नहीं लगी या सरल भाषा में कहे तो भगवान अकेले में मिल गए तो उस व्यक्ति को मजा नहीं आया। वही दर्शन भीड़ में मिले तो मजा आया। म ैंउन व्यक्ति से कि वह शिखर जी के दर्शन करने गया था कहना चाहिए। वरना कहना तो यही पड़ेगा कि उसे भीड़ के दर्शन में मजा आया। यदि शिखरजी के दर्शन करने गया था तो पहली बार में अच्छा लगना था भीड़ जहां जाती हैं, लोग बिना समझे बिना भावों के वहां भागते हैं। भीड़ का ेदेखते ही लोग उदेदश्य भी भूल जाते हैं और भीड़ के पीछे भागते है। शिखरजी जाना बड़ा पुण्य का काम है, पर वहां जाकर करना क्या है यदि ये नहीं पता तो भीड़ से ही प्रभावित रहोगे। जितने लोग शिखर जी जाते हैं वंदना कैसे करनी है। आधे लोगो को भी नहीं आता। चक्कर लगाकर वापस आ जाते हैं। कोई तीर्थ स्थान हो या पर्यटक स्थल, भीड़ तभी होगी जब भीड़ होगी। आज के प्रचार प्रसार ने इस पर और ज्यादा असर डाला है।</p>
<p><strong>जो सुनाया जा रहा है बस अच्छा लगना चाहिए</strong></p>
<p>बच्चे वहीं चीज खायेंगे जो टी. वी. पर दिखाई जा रही है। भीड़ का संबंध सत्य से नहीं भीड़ ज्ञानियों की नहीं अज्ञानियों की होती है। भीड़ को ये नहीं पता भीड़ का संबंध आकर्षण है। जहां आकर्षण होगा भीड़ वही खिंच जाएगी। भीड़ को यह नहीं पता कि उसे क्या सुनना है, जो सुनाया जा रहा है बस अच्छा लगना चाहिए। प्रभावक से प्रभावित होता है। जितने नये धर्माे का प्रादुर्भाव हुआ है वह सब वाणी के प्रभाव का ही कारण है।</p>
<p><strong>कहानी के सार ने बताया भीड़ किसको चाहती है</strong></p>
<p>एक बार बृहस्पति और लक्ष्मी में विवाद हो गया कि लोग मुझे चाहते हैं। दोनो का विवाद बढ़ गया। विष्णु जी के पास पहुंचे। उनसे निर्णय करने को कहा। उन दोनों को छह माह का समय दिया और कहा जाओ धरती पर अपनी महत्ता सिद्ध करो। पहले बृहस्पति पहुंचे वे बहुत ज्ञानी थे। अतः उन्होने प्रवचन करना प्रारंभ किया। धीरे-धीरे प्रवचन सुनने वालों की संख्या बढ़ने लगी। लोग बृहस्पति के पीछे-पीछे भागने लगे। वे जहां जाते वहां सभी प्रवचन सुनने पहुंच जाते। अपार जन समूह पीछे-पीछे रहने लगा। वृहस्पति को लगा कि ये भीड़ मेरे पीछे है। 6 महीने में कुछ समय बाकी था अपार भीड़ बृहस्पति का प्रवचन सुन रही थी। पीछे एक बुढ़िया, सोने की कटोरे में भीख मांगने आई। लोगों की नजर तब पड़ी जब उसने कहा कि यह कटोरा उसको दूंगी जो मुझे अपनी श्रद्धा से पानी पिलाएगा। भीड़ में 10-20 लोग उठकर उस अम्मा के पीछे पहुंच गए। पीछे की भीड़ देखकर सामने मंच से अध्यक्ष मंत्री भी पहुंच गए। देखें क्या हुआ। बुढ़िया कह रही थी मेरी झोली में बहुत कटोरे हैं सोने के, मैं मंच से बैठकर बाटूंगी। अध्यक्ष मंत्री उसके हाथ जोड़ने लगे कि चलो अम्मा मंच पर चलो। बुढिया बोली पहले उसे बूढ़े को मंच से हटाओ तब मंच पर जाऊंगी। अध्यक्ष मंत्री पहुंच गए बृहस्पति के पास बाबा जी आपके प्रवचन बहुत सुन लिए है। आज प्रवचन रहने दो आज आप आराम करो। बृहस्पति ने कहा आज प्रवचन क्यों छोड़ूं 6 महीने से कर रहा हूं। बुढ़िया के कारण छोड़ दूं। अध्यक्ष मंत्री बोले महाराज आप हाथ जोड़ने से मान जाओ वरना आपका तकता हम उठाकर कमरे में रख देंगे पीछे से बुढ़िया (लक्ष्मी )के बृहस्पति से आंख मटका के बताया देख लिया भीड़ किसको चाहती है।</p>
<p><strong>अज्ञानी की भीड़ स्वार्थ से जुड़ी है</strong></p>
<p>कहानी का सार यह है कि भीड़ का अपना कोई उद्देश्य नहीं, जहां उसके स्वार्थ की पूर्ति होती है वह वही भागने लगती है। उसे मोक्ष आत्म ज्ञान से कुछ लेना-देना नहीं है। अज्ञानी की भीड़ स्वार्थ से जुड़ी है। सबसे पहले स्वार्थ है धन का आकर्षण, जहां विदेश में जाना स्वीकार है। दूसरा आकर्षक रूप अर्थात जिसका रूप दिल को कहा जाए चाहे मिथ्या दृष्टि ही क्यों ना हो। वही भागेगा फिल्मी कलाकारों के पीछे आज के लोग दीवाने हैं। खाना पीना भूल जाए यदि वह हमको मिल जाए तो। शहर में एक तरफ साधु आया हो, दूसरी तरफ फिल्मी कलाकार आया हो तो साधु के पास दो-चार लोग ही मिलेंगे और कलाकार के पास हजारों की भीड़ मिल जाएगी। उस समय साधु संत बाधा प्रतीत होंगे। भीड़ इंसान तो क्या जानवर के पीछे भी मिल सकती है। एक बार हम बिहार कर रहे थे, एक जगह एक कुत्ते के पीछे से करो व्यक्ति भाग रहे थे। हमने पूछा यह क्या हो रहा है तो उन्होंने बताया कि कल यहां चोरी हुई थी यह विशेष कुत्ता है चोरों का पता लगा रहा है। इसका आशय की कुत्ते भी भीड़ की खट्टी कर सकते हैं। घोड़े की रेस देखने बहुत दुनिया जाती है। और लाखों रुपए का जुआ भी खेला जाता है। चिड़ियाघर में भी भीड़ होती है। लाखों लोग जानवरों को देखने लग जाते हैं। इसका आशय है की भीड़ से धर्म का संबंध नहीं।</p>
<p><strong>यह आवश्यक नहीं है कि जहां भीड़ है वहां सत्य होगा</strong></p>
<p>अर्थ समझाते हुए माताजी कहती हैं कि यह आवश्यक नहीं है कि जहां भीड़ है वहां सत्य होगा और यह भी आवश्यक नहीं है कि जहां सत्य है वहां भीड़ जरूरी है। सत्य धर्म एकांत में भी पाया जा सकता है। धर्म को भीड़ की नहीं भाव की जरूरत है। भीड़ का धर्म उन्हें करना पड़ता है जिनसे एकांत में धर्म नहीं होता है। एकांत साधना करने वाले भीड़ से भागते हैं फिर भी भीड़ में रहना पड़े तो भीड़ में रहकर एकांतवास का अनुभव करते हैं। लिखने को तो बहुत लिखा जा सकता है पर इसको पढ़कर आगे का चिंतन आप स्वयं करें तो ज्यादा अच्छा है।</p>
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