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	<title>प्राचीन जिनालय &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<title>प्राचीन जिनालय &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>डूबता बीठला चिंता का सबब : जब विकास की धार में इतिहास दम तोड़ता है </title>
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		<pubDate>Thu, 30 Apr 2026 13:26:31 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[चंदेरी की पहाड़ियों और शांत वादियों के बीच बसा बीठला गांव आज किसी साधारण भू-भाग का नाम नहीं, बल्कि एक ऐसे जीवित इतिहास का प्रतीक है, जो धीरे-धीरे जल की गोद में समाने को विवश दिखाई देता है। आज पढ़िए, डॉ.जयेन्द्र जैन&#8217;निप्पू चन्देरी&#8217; का यह आलेख&#8230;! राजीव सिंघई की प्रस्तुति चंदेरी की पहाड़ियों और शांत [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>चंदेरी की पहाड़ियों और शांत वादियों के बीच बसा बीठला गांव आज किसी साधारण भू-भाग का नाम नहीं, बल्कि एक ऐसे जीवित इतिहास का प्रतीक है, जो धीरे-धीरे जल की गोद में समाने को विवश दिखाई देता है। <span style="color: #ff0000">आज पढ़िए, डॉ.जयेन्द्र जैन&#8217;निप्पू चन्देरी&#8217; का यह आलेख&#8230;! राजीव सिंघई की प्रस्तुति</span></strong></p>
<hr />
<p>चंदेरी की पहाड़ियों और शांत वादियों के बीच बसा बीठला गांव आज किसी साधारण भू-भाग का नाम नहीं, बल्कि एक ऐसे जीवित इतिहास का प्रतीक है, जो धीरे-धीरे जल की गोद में समाने को विवश दिखाई देता है। उर्वशी (ओर) नदी पर निर्मित हो रही लोअर ओर परियोजना, जहाँ एक ओर विकास की नई इबारत लिखने का दावा करती है, वहीं दूसरी ओर सदियों पुरानी सांस्कृतिक, धार्मिक और पुरातात्विक धरोहर को अपने साथ बहा ले जाने का संकट भी खड़ा कर रही है।</p>
<p>अशोकनगर जिले की चंदेरी तहसील के अंतर्गत स्थित बीठला केवल एक गांव नहीं रहा—यह एक प्राचीन आस्था और स्थापत्य का केंद्र रहा है। यहाँ स्थित प्राचीन जिनालय आज भी अपने मूल स्वरूप में खड़ा है, मानो समय के थपेड़ों को चुनौती देता हुआ। उसके आसपास बिखरे जिनालयों के खंडहर और जिन शासन से संबंधित यक्ष-यक्षिणी प्रतिमाएँ इस बात का प्रमाण हैं कि यह स्थल कभी एक समृद्ध दिगंबर जैन धार्मिक केंद्र रहा होगा।</p>
<p><img fetchpriority="high" decoding="async" class="alignnone size-medium wp-image-106031" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2026/04/IMG-20260430-WA0043-300x270.jpg" alt="" width="300" height="270" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2026/04/IMG-20260430-WA0043-300x270.jpg 300w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2026/04/IMG-20260430-WA0043-768x690.jpg 768w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2026/04/IMG-20260430-WA0043.jpg 960w" sizes="(max-width: 300px) 100vw, 300px" /></p>
<p><strong>स्थापत्य शैली उस कालखंड की सजीव झलक</strong></p>
<p>यदि इतिहास और पुरातत्व की दृष्टि से इस क्षेत्र का अध्ययन किया जाए, तो यह स्पष्ट संकेत मिलते हैं कि बीठला और इसका आसपास का क्षेत्र मध्यकालीन भारत में धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक दृष्टि से अत्यंत विकसित रहा होगा। यहाँ की मूर्तियों की शिल्पकला, पत्थरों की बनावट और स्थापत्य शैली उस कालखंड की सजीव झलक प्रस्तुत करती हैं, जब धर्म और कला एक-दूसरे के पूरक थे। चंदेरी स्वयं प्राचीन काल से ही व्यापार, संस्कृति और धर्म का प्रमुख केंद्र रहा है, और बीठला उसी गौरवशाली परंपरा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।</p>
<p><strong>यह एक विशिष्ट शैलेंद्र (पर्वतीय) वन तीर्थ</strong></p>
<p>यह सम्पूर्ण क्षेत्र दिगंबर जैन परंपरा में एक अतिशय क्षेत्र के रूप में प्रतिष्ठित रहा है। “अतिशय” केवल एक धार्मिक शब्द नहीं, बल्कि उस गहरी आस्था और आध्यात्मिक अनुभवों का प्रतीक है, जो इस भूमि से जुड़े रहे हैं। ऐसे क्षेत्रों का महत्व केवल एक धर्म तक सीमित नहीं होता, बल्कि वे भारत की साझा सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा होते हैं। बीठला के समीप स्थित भियादांत जी का प्राचीन तीर्थ इस संदर्भ में और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। यह एक विशिष्ट शैलेंद्र (पर्वतीय) वन तीर्थ है, जहाँ प्राकृतिक गुफाएँ, साधना स्थल और प्राचीन प्रतिमाओं का अद्भुत संगम देखने को मिलता है।</p>
<p><strong>भियादांत तीर्थ पूर्णतः डूब क्षेत्र में नहीं</strong></p>
<p>यहाँ विराजमान भगवान आदिनाथ की प्रतिमा की केश-विन्यास शैली अत्यंत दुर्लभ और विशिष्ट मानी जाती है, जो इसे कला और पुरातत्व की दृष्टि से विशेष महत्व प्रदान करती है। यह प्रतिमा केवल धार्मिक आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि भारतीय मूर्तिकला की उत्कृष्टता का एक जीवंत उदाहरण है। यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि भियादांत तीर्थ पूर्णतः डूब क्षेत्र में नहीं है, परंतु डेम निर्माण के कारण आसपास के गांवों के प्रभावित होने से यहाँ तक पहुँच, संसाधनों की उपलब्धता और संरक्षण कार्यों में गंभीर कठिनाइयाँ उत्पन्न हो रही हैं। यही वह बिंदु है, जहाँ विकास और विरासत के बीच संतुलन की आवश्यकता और भी अधिक स्पष्ट हो जाती है।</p>
<p><strong>क्षेत्र के संरक्षण और विकास हेतु निरंतर प्रयासरत</strong></p>
<p>भियादांत क्षेत्र में चंदेरी की दिगंबर जैन भियादांत समिति स्वयं सीमित संसाधनों में संरक्षण और निर्माण का कार्य कर रही है। यह प्रयास न केवल सराहनीय है, बल्कि यह दर्शाता है कि समाज अपनी धरोहर के प्रति कितना सजग और समर्पित है। भियादांत कमेटी के मंत्री डॉ. जयेन्द्र जैन ‘निप्पू’, चन्देरी सम्पूर्ण कमेटी के साथ मिलकर तन, मन और धन से इस क्षेत्र के संरक्षण और विकास हेतु निरंतर प्रयासरत हैं। विपरीत परिस्थितियों, संसाधनों की कमी और प्रशासनिक सहयोग के अभाव के बावजूद यह सामूहिक प्रयास एक प्रेरणादायक उदाहरण प्रस्तुत करता है परंतु, यह भी उतना ही सत्य है कि केवल सामाजिक प्रयासों के बल पर इतनी बड़ी धरोहर को सुरक्षित रखना संभव नहीं है।</p>
<p><strong>भियादांत तीर्थ के लिए पहुँच मार्ग का उन्नयन हो</strong></p>
<p>जब तक प्रशासन, पर्यटन विभाग और संबंधित संस्थाएँ इस दिशा में सक्रिय सहयोग नहीं देंगी, तब तक ऐसे प्रयास अधूरे ही रहेंगे। विशेष रूप से वर्तमान परिस्थितियों में, जब डेम निर्माण के कारण क्षेत्रीय संरचना बदल रही है, तब समन्वित और योजनाबद्ध प्रयासों की आवश्यकता और भी बढ़ जाती है।</p>
<p>ऐसी स्थिति में एक व्यावहारिक और सकारात्मक पहल यह हो सकती है कि पर्यटन विभाग और स्थानीय प्रशासन के सहयोग से भियादांत तीर्थ के लिए पहुँच मार्ग का उन्नयन किया जाए।</p>
<p><strong>बीठला का डूबना शायद एक प्रशासनिक निर्णय</strong></p>
<p>यदि सड़क, परिवहन और मूलभूत सुविधाओं को विकसित किया जाए, तो न केवल श्रद्धालुओं को सुविधा मिलेगी, बल्कि यह क्षेत्र एक महत्वपूर्ण धार्मिक-पर्यटन केंद्र के रूप में भी विकसित हो सकता है। इससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी बल मिलेगा और संरक्षण कार्यों को नई दिशा प्राप्त होगी। आज आवश्यकता केवल चिंता व्यक्त करने की नहीं, बल्कि ठोस निर्णय लेने की है। विकास और विरासत—दोनों विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हो सकते हैं, यदि उन्हें संतुलन के साथ देखा जाए।</p>
<p><strong>बीठला का डूबना शायद एक प्रशासनिक निर्णय है,</strong></p>
<p>पर उसका इतिहास डूबना—हमारी सामूहिक विफलता होगी। जब आने वाली पीढ़ियाँ हमसे यह प्रश्न करेंगी कि हमने अपनी धरोहर के लिए क्या किया, तब हमारे पास उत्तर होना चाहिए—कि हमने केवल विकास नहीं चुना, बल्कि अपनी पहचान को भी बचाने का प्रयास किया।</p>
<p><strong>अब समय आ गया है कि हम केवल दर्शक न बने रहें,</strong></p>
<p><strong>बल्कि अपनी विरासत के रक्षक बनकर आगे आएँ।</strong></p>
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		<title>पहली बार पति-पत्नी एक साथ जैनेश्वरी दीक्षा लेंगे 29 अप्रैल को : दीक्षार्थियों ने किया विधान का पूजन </title>
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		<pubDate>Tue, 28 Apr 2026 13:52:06 +0000</pubDate>
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<p><strong>सलूंबर जो वीरता, बलिदान,अनेक दीक्षा का प्रतीक है। हाड़ी रानी का बलिदान, दिगंबर जैन समाज में 17 दीक्षा, अनेक पंच कल्याणक, साधुओं की समाधि भव्य प्राचीन जिनालय, जलमंदिर कारण प्रसिद्धि को प्राप्त है। सलूंबर से पढ़िए, राजेश पंचोलिया की यह खबर&#8230;</strong></p>
<hr />
<p><strong>सलूंबर।</strong> सलूंबर जो वीरता, बलिदान,अनेक दीक्षा का प्रतीक है। हाड़ी रानी का बलिदान, दिगंबर जैन समाज में 17 दीक्षा, अनेक पंच कल्याणक, साधुओं की समाधि भव्य प्राचीन जिनालय, जलमंदिर कारण प्रसिद्धि को प्राप्त है। पंडित कमलेश प्रभुलाल ने बताया कि यहां से अभी तक 8 मुनिराज, 6 आर्यिका माताजी, दो क्षुल्लक तथा 1 क्षुल्लिका सहित 17 साधु पूर्व में दीक्षा ले चुके हैं।इसके पूर्व पति और पत्नी पिता और पुत्र ने अलग-अलग वर्षों में दीक्षा ली है। सलूंबर में पहली बार एक साथ पति और पत्नी दीक्षा 29 अप्रैल को लेंगे। इसके लिए समाज ही नहीं अन्य धर्मों के परिचित भी दीक्षा में शामिल होंगे।</p>
<p><strong>मंगल स्नान के बाद श्री जी का पंचामृत अभिषेक होंगे</strong></p>
<p>सुरेश सबलावत के अनुसार 28 अप्रैल को दीक्षार्थी हुकमीचंद एवं कांता देवी ने प्रातः अभिषेक पूजन कर सभी साधुओं को आहार दिया। उसके बाद कर पात्र में भोजन लिया। आचार्य श्री वर्धमान सागर जी संघ सानिध्य में दोपहर को गणधर वलय विधान का पूजन किया गया। दोनों दीक्षार्थियों की समाज द्वारा शोभायात्रा निकाली जाकर श्रीफल, फल, सूखे मेवों से गोद भरकर दीक्षा की अनुमोदना की जा रही है। 29 अप्रैल को मंगलम सिटी जयपुर में प्रातः केशलोचन के बाद मंगल स्नान के बाद श्री जी का पंचामृत अभिषेक किए जाएंगे इसके बाद दीक्षा संस्कार होंगे।</p>
<p><strong>इनकी हुई दीक्षा हुई सलूंबर में</strong></p>
<p>अभी तक सलूंबर ने पूर्व में 17 दीक्षा हुई। जिसमें दिगम्बर मुनि श्री कीर्तिसागर जी, मुनिश्री शिवसागर जी, मुनि श्री सिद्ध सागर जी, मुनि श्री प्रमाणसागर जी, मुनि श्री अचलसागर जी, मुनि श्री आर्जवनंदी जी, मुनि श्री अचलनंदी जी, मुनि श्री श्रुतेशसागर जी,आर्यिका श्री वत्सल मति जी, आर्यिका श्री विलोक मति जी, आर्यिका श्री प्रसादमति जी, आर्यिका श्री मुदितमति जी, आर्यिका श्री प्रशस्तमति जी, आर्यिका श्री समाधिनंदनी, क्षुल्लक श्री तारणसागर जी, क्षुल्लकश्री सन्मतिनंदनी, क्षुल्लिका श्री शांतिमति जी इन महावर्तियों के अतिरित प्रतिमा धारी अणुव्रती भी हुए हैं।</p>
<p><strong>संभवत: नगर के प्रथम दंपति</strong></p>
<p>इनमें उल्लेखनीय यह है कि आर्यिका श्री वत्सलमती, आर्यिका श्री विलोक मति जी, आर्यिका श्री मुदित मति जी, आचार्य श्री वर्धमान सागर जी से दीक्षित होकर श्री विलोक मति एवं श्री मुदित मति जी आचार्य श्री वर्धमान सागर जी संघस्थ है। इन्हीं साधुओं की त्याग वैराग्य से प्रभावित होकर अणुव्रती 8 प्रतिमा धारी हुकमीचंद एवं 7 प्रतिमा धारी कांता देवी वैवाहिक मार्ग की हमसफर अब वैराग्य मार्ग का अनुसरण कर अनुकरणीय मार्ग प्रस्तुत कर रही हैं। संभवत: नगर के प्रथम दंपति होंगे, जो एक साथ दिगम्बरी जैनेश्वरी दीक्षा ले रहे हैं।</p>
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		<title>प्राचीन जिनालयों,संस्कृति,जिनवाणी का संरक्षण हो :  आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने समाजजनों को सौंपी जिम्मेदारी दिलाए संकल्प </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shree Phal News]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 05 Apr 2026 10:57:10 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आचार्य श्री वर्धमान सागर जी का रविवार को पाटोदी लश्कर मंदिर से भट्टारक जी की नसिया के लिए संघ सहित मंगल विहार हुआ। देश के सुप्रसिद्ध भामाशाह अशोक पाटनी किशनगढ़ ने विवेक काला के प्रतिष्ठान पर चरण प्रक्षालन किए। जयपुर से पढ़िए, राजेश पंचोलिया की यह खबर&#8230;  जयपुर । आचार्य श्री वर्धमान सागर जी का [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>आचार्य श्री वर्धमान सागर जी का रविवार को पाटोदी लश्कर मंदिर से भट्टारक जी की नसिया के लिए संघ सहित मंगल विहार हुआ। देश के सुप्रसिद्ध भामाशाह अशोक पाटनी किशनगढ़ ने विवेक काला के प्रतिष्ठान पर चरण प्रक्षालन किए। <span style="color: #ff0000">जयपुर से पढ़िए, राजेश पंचोलिया की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong> जयपुर</strong> । आचार्य श्री वर्धमान सागर जी का रविवार को पाटोदी लश्कर मंदिर से भट्टारक जी की नसिया के लिए संघ सहित मंगल विहार हुआ। देश के सुप्रसिद्ध भामाशाह अशोक पाटनी किशनगढ़ ने विवेक काला के प्रतिष्ठान पर चरण प्रक्षालन किए। अशोक पाटनी नंगे पैर जैन ध्वज लेकर आचार्य श्री के साथ चले। धर्मसभा में आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने उपदेश में कहा कि प्राचीन मंदिरों में संस्कृति होती है। प्राचीन ग्रंथ होते हैं।जयपुर राणा जी के नसिया से संघ का प्रवेश हुआ। चूलगिरी से भट्टारक जी की नसिया आते-आते अनेक प्राचीन जिनालयों प्राचीन दुर्लभ जिनवाणी के संघ ने दर्शन , किए ।नई-नई कॉलोनी में नए मंदिर बन जाते हैं किंतु सभी को प्राचीन मंदिरों के नियमित दर्शन करना चाहिए। आचार्य श्री ने कहा कि देश में नगरों की सभी धार्मिक ,सामाजिक संस्थाओं को जैन संस्कृति जिनवाणी के संरक्षण प्रचार प्रसार के लिए समर्पित होकर धर्म का ऋण चुकाने के लिए संगठित होने की आवश्यकता है।</p>
<p><strong>भगवान के उपदेशों को जीवन में ग्रहण करें</strong></p>
<p>प्रथमाचार्य श्री शांति सागर जी महाराज ने जयपुर में भी काफी धर्म का बीजारोपण किया है। उनकी प्रतिमा महावीर विद्यालय एवं भट्टारक जी की नसिया में लगाने की प्रेरणा दी ।जिनालयों जिनवाणी का संरक्षण संगठित होकर जयपुर नगर देश में आदर्श प्रस्तुत करें। खुद की प्रभावना के बजाय श्रद्धा,भक्ति, समर्पण से भगवान के उपदेशों को जीवन में ग्रहण अपना कर धर्म के प्रचार प्रसार से धर्म प्रभावना कर मनुष्य जीवन ,जैन कुल को सार्थक करें यह मंगल धर्म देशना 76 वर्षीय वात्सल्य वारिधी 108 आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज ने वर्षों बाद भट्टारक जी की नसिया प्रवेश के अवसर पर आयोजित धर्म सभा में प्रकट की। इसके पूर्व महावीर विद्यालय में आशीर्वचन में आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने बताया किजैन विद्यालय में संस्कार रूपी बीज से जीवन का निर्माण होता है हमने भी सनावद में महावीर पाठशाला में अध्ययन से संस्कार प्राप्त कर आज इस संयम मार्ग पर है। महावीर स्वामी अंतिम तीर्थंकर होकर उन्होंने धर्म तीर्थ का प्रवर्तन किया। उनका अनुसरण कर अनेक पंच परमेष्ठी हुए हैं। जिसमें हम भी शामिल हैं।</p>
<p><strong>गौरवशाली आध्यात्मिक संस्कारों का बीजारोपण</strong></p>
<p>विश्व को भगवान महावीर के सिद्धांतों की जरूरत है त्याग से जीवन उन्नत होता है प्रथमाचार्य श्री शांति सागर जी महाराज ने तीर्थंकरों के मार्ग का अनुसरण कर संन्यास धारण किया। उन्होंने जयपुर प्रवास में गौरवशाली आध्यात्मिक संस्कारों का बीजारोपण किया। वर्तमान श्रमण परंपरा उन्हीं की बदौलत है। श्री महावीर स्वामी के संदेशों, उपदेशों को प्रत्येक कक्षा में लगाने का भी सुझाव दिया। श्री महावीर जी कमेटी के सुधांशु कासलीवाल, सुरेश सबलावत, हेमंत सोगानी, रुपिन काला, चंद्र प्रकाश जैन, उमराव मल ने बताया कि शोभायात्रा में जगह-जगह आचार्य श्री की आरती की गई। मंच संचालन कमल बाबू एवं मनीष वेद ने किया।</p>
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