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	<title>प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<title>प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>परतापुर बना राजा श्रेयांस की नगरी हस्तिनापुर : अक्षय तृतीया पर उमड़ा श्रद्धा का सैलाब </title>
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		<pubDate>Tue, 21 Apr 2026 08:39:12 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[अक्षय तृतीया पर नगर का वातावरण धार्मिक आयोजनों से धर्ममय हो गया। पर्व का महत्व बताते हुए प्रवक्ता राहुल जैन ने कहा कि यह दिन प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव से जुड़ी उस ऐतिहासिक घटना की स्मृति में मनाया जाता है, जब उन्होंने वर्ष भर के कठोर उपवास के बाद इक्षु रस से पारणा किया था। [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>अक्षय तृतीया पर नगर का वातावरण धार्मिक आयोजनों से धर्ममय हो गया। पर्व का महत्व बताते हुए प्रवक्ता राहुल जैन ने कहा कि यह दिन प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव से जुड़ी उस ऐतिहासिक घटना की स्मृति में मनाया जाता है, जब उन्होंने वर्ष भर के कठोर उपवास के बाद इक्षु रस से पारणा किया था। <span style="color: #ff0000">परतापुर से अजीत कोठिया की रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong> परतापुर</strong>। अक्षय तृतीया पर नगर का वातावरण धार्मिक आयोजनों से धर्ममय हो गया। पर्व का महत्व बताते हुए प्रवक्ता राहुल जैन ने कहा कि यह दिन प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव से जुड़ी उस ऐतिहासिक घटना की स्मृति में मनाया जाता है, जब उन्होंने वर्ष भर के कठोर उपवास के बाद इक्षु रस से पारणा किया था। जैन परंपरा के अनुसार दीक्षा के पश्चात भगवान ऋषभदेव को लंबे समय तक आहार नहीं मिला, क्योंकि उस समय आहार दान की विधि प्रचलित नहीं थी। अंततः राजा श्रेयांस ने हस्तिनापुर में विधिपूर्वक गन्ने का रस अर्पित कर उन्हें आहार ग्रहण कराया। इसी कारण यह दिन अक्षय पुण्य प्रदान करने वाला माना जाता है और नगर में इस बार यह पर्व मानो हस्तिनापुर की झलक प्रस्तुत करता नजर आया। नगर में विराजित आचार्यश्री प्रसन्न सागरजी महाराज के चतुर्विध संघ की आहारचर्या के लिए सैकड़ों श्रद्धालुओं ने आहारदान का पुण्य कमाया। इस दौरान मंदिर परिसर में बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे। नेमिनाथ जैन मंदिर में विशेष पूजा, अभिषेक एवं शांतिधारा के आयोजन हुए। बेड़वा बाबा आदिनाथ भगवान एवं मूलनायक नेमिनाथ भगवान का प्रथम अभिषेक एवं शांतिधारा करने का सौभाग्य कमलकुमार, सुनीलकुमार, जतिन, अनिल दोसी एवं राजीव गादिया परिवार को प्राप्त हुआ। अक्षय तृतीया के पावन अवसर पर परतापुर में आस्था और आध्यात्मिकता का अद्भुत संगम देखने को मिला, जिससे पूरा क्षेत्र धर्ममय वातावरण में रंगा नजर आया। यह जानकारी प्रचार-प्रसार संयोजक नरेंद्र अजमेरा पीयूष कासलीवाल औरंगाबाद ने दी।</p>
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		<title>अक्षय तृतीया पर इक्षु रस किया वितरित मनाया महोत्सव : श्री दिगंबर जैन वात्सल्य ग्रुप, पुलक मंच परिवार ने किया कार्यक्रम  </title>
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		<pubDate>Mon, 20 Apr 2026 06:09:26 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[श्री दिगंबर जैन वात्सल्य ग्रुप और पुलक मंच परिवार के संयुक्त तत्वावधान दिगम्बर जैन मंदिर महारानी फार्म गायत्री नगर के बाहर प्रांगण में रविवार सुबह 7 से 9.30 तक इक्षु (गन्ने )रस पिलाने का कार्यक्रम रखा गया वात्सल्य ग्रुप के अध्यक्ष अनिल टोंग्या के अनुसार इस अवसर पर कार्यक्रम का उद्घाटन राजेंद्र सुमन सोगानी ने [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>श्री दिगंबर जैन वात्सल्य ग्रुप और पुलक मंच परिवार के संयुक्त तत्वावधान दिगम्बर जैन मंदिर महारानी फार्म गायत्री नगर के बाहर प्रांगण में रविवार सुबह 7 से 9.30 तक इक्षु (गन्ने )रस पिलाने का कार्यक्रम रखा गया वात्सल्य ग्रुप के अध्यक्ष अनिल टोंग्या के अनुसार इस अवसर पर कार्यक्रम का उद्घाटन राजेंद्र सुमन सोगानी ने किया। <span style="color: #ff0000">जयपुर से पढ़िए, उदयभान जैन की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>जयपुर।</strong> श्री दिगंबर जैन वात्सल्य ग्रुप और पुलक मंच परिवार के संयुक्त तत्वावधान दिगम्बर जैन मंदिर महारानी फार्म गायत्री नगर के बाहर प्रांगण में रविवार सुबह 7 से 9.30 तक इक्षु (गन्ने )रस पिलाने का कार्यक्रम रखा गया वात्सल्य ग्रुप के अध्यक्ष अनिल टोंग्या के अनुसार इस अवसर पर कार्यक्रम का उद्घाटन राजेंद्र सुमन सोगानी ने किया। कार्यक्रम में वात्सल्य ग्रुप के संस्थापक अध्यक्ष सुरेश राज लुहाडिया, पुलक मंच परिवार की राष्ट्रीय महामंत्री बीना टोंग्या, अध्यक्षा मंजू सेवा वाली, उपाध्यक्षा विमला जैन, महासचिव रेखा अनिल झांझरी, वात्सल्य ग्रुप की उपाध्यक्ष उषा लुहाडिया, उपाध्यक्ष अशोक कासलीवाल एचपी सीएल, कोषाध्यक्ष सुरेश मीनू जैन, सांस्कृतिक सचिव प्रदीप गुड्डी पाटनी, साथ प्रबन्ध समिति के अध्यक्ष कैलाश छाबडा, उपाध्यक्ष अरुण शाह, कोषाध्यक्ष राकेश छाबड़ा, अखिल भारतवर्षीय दिगंबर जैन युवा परिषद् के राष्ट्रीय महामंत्री उदयभान जैन बडजात्या, मंजू सेवा वाली, अशोक जैन, अंजू जैन विधानसभा वाले, अरूण सांघी, प्रवक्ता राकेश राजकुमारी पाटोदी उपस्थित थे,।</p>
<p>इस अवसर पर समाज के लगभग 750 ब्यक्तियों ने गन्ने के रस का आनंद लिया। समाजजनों ने बताया कि शाश्वत तीर्थ अयोध्या में जन्मे जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव का प्रथम पारणा इक्षु रस से वैशाख शुक्ल तृतीया को हस्तिनापुर में राजा श्रेयांस के यहां हुआ था। इसलिए इस दिवस का बहुत महत्व है। महासचिव रेखा झांझरी ने आभार ‌व्यक्त किया।</p>
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		<title>जैन परंपरा में अक्षय तृतीया का विशेष है महत्व : अक्षय तृतीया पर्व 19 अप्रैल को मनाया जाएगा  </title>
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		<pubDate>Sat, 18 Apr 2026 10:58:46 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जैन परंपरा में अक्षय तृतीया का स्थान अत्यंत उच्च, तपप्रधान और शास्त्रीय आधारों से प्रतिष्ठित है। यह पर्व केवल एक ऐतिहासिक घटना का स्मरण नहीं करता, बल्कि त्याग, संयम, आहार-विधि, तपश्चर्या और आत्मशुद्धि के सिद्धांतों को प्रत्यक्ष रूप में अभिव्यक्त करता है। विशेषतः प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव के दीक्षा ग्रहण, दीर्घकालीन उपवास तथा प्रथम आहार [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>जैन परंपरा में अक्षय तृतीया का स्थान अत्यंत उच्च, तपप्रधान और शास्त्रीय आधारों से प्रतिष्ठित है। यह पर्व केवल एक ऐतिहासिक घटना का स्मरण नहीं करता, बल्कि त्याग, संयम, आहार-विधि, तपश्चर्या और आत्मशुद्धि के सिद्धांतों को प्रत्यक्ष रूप में अभिव्यक्त करता है। विशेषतः प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव के दीक्षा ग्रहण, दीर्घकालीन उपवास तथा प्रथम आहार ग्रहण की घटना से यह दिवस गहराई से संबद्ध है। <span style="color: #ff0000">आज पढ़िए, राजेश जैन रागी द्वारा प्रस्तुत डॉ.यतीश जैन का आलेख&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p>जैन परंपरा में अक्षय तृतीया का स्थान अत्यंत उच्च, तपप्रधान और शास्त्रीय आधारों से प्रतिष्ठित है। यह पर्व केवल एक ऐतिहासिक घटना का स्मरण नहीं करता, बल्कि त्याग, संयम, आहार-विधि, तपश्चर्या और आत्मशुद्धि के सिद्धांतों को प्रत्यक्ष रूप में अभिव्यक्त करता है। विशेषतः प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव के दीक्षा ग्रहण, दीर्घकालीन उपवास तथा प्रथम आहार ग्रहण की घटना से यह दिवस गहराई से संबद्ध है। जैन आगमिक परंपरा में वर्णित है कि भगवान ऋषभदेव ने जब राज्य, ऐश्वर्य और समस्त भौतिक संसाधनों का त्याग कर दीक्षा धारण की, तब वे पूर्ण वैराग्य के साथ तप और ध्यान में लीन होकर विहार करने लगे। उनके जीवन का यह चरण पूर्णतः परिग्रह-शून्यता, इन्द्रियनिग्रह और आत्मानुशासन का अद्वितीय उदाहरण है। उन्होंने संसार से विमुख होकर आत्मा की शुद्धि के लिए कठोर साधना का मार्ग अपनाया। दीक्षा के बाद जब वे आहार ग्रहण हेतु निकले, तब उस समय समाज में साधुओं को आहार देने की विधि का अभाव था।</p>
<p>लोग श्रद्धा से प्रेरित होकर उन्हें विभिन्न भौतिक वस्तुएँ-जैसे स्वर्ण, रत्न, वस्त्र आदि अर्पित करते थे, परंतु वे इन्हें स्वीकार नहीं करते थे। कारण यह था कि मुनि जीवन में केवल निर्दाेष, जीवदया से युक्त, मर्यादित और उचित विधि से प्रदान किया गया आहार ही स्वीकार्य होता है। इस प्रकार भगवान ऋषभदेव ने निरंतर तेरह माह तक उपवास किया। यह तप केवल शारीरिक सहनशक्ति का नहीं, बल्कि मन, वचन और काया की पूर्ण शुद्धि का प्रतीक था। इस प्रसंग का अत्यंत विस्तृत वर्णन आदिपुराण तथा महापुराण में प्राप्त होता है। इन ग्रंथों में भगवान ऋषभदेव के इस दीर्घकालीन उपवास को असाधारण तप बताया गया है, जो कर्म-निर्जरा का सशक्त साधन है। तत्त्वार्थ सूत्र में प्रतिपादित सिद्धांत</p>
<p>“तपसा निर्जरा च”</p>
<p>इस तथ्य को प्रमाणित करता है कि तप के द्वारा कर्मों का क्षय होता है और आत्मा शुद्ध होती है।</p>
<p><strong>वर्षीतप एक अत्यंत कठोर साधना है,</strong></p>
<p>तेरह माह के उपवास के पश्चात वह पावन अवसर आया जब हस्तिनापुर में राजा श्रेयांस कुमार को जातिस्मरण ज्ञान की प्राप्ति हुई। इस ज्ञान के प्रभाव से उन्हें यह स्मरण हुआ कि साधुओं को किस प्रकार शुद्ध और विधिपूर्वक आहार प्रदान किया जाता है। उन्होंने भगवान ऋषभदेव को इक्षु रस अर्पित किया, जो पूर्णतः शुद्ध, अहिंसात्मक और मर्यादित आहार था। भगवान ने इसे स्वीकार किया और अपना प्रथम आहार ग्रहण किया। यही घटना इस पावन तिथि पर घटित हुई, जिससे यह दिवस विशेष महत्त्व का हो गया। “अक्षय” का अर्थ है जिसका क्षय न हो, जो अविनाशी हो। इस संदर्भ में यह पर्व केवल बाह्य पुण्य की प्राप्ति का प्रतीक नहीं, बल्कि आत्मा की उस शुद्ध अवस्था का भी संकेत देता है जहाँ कर्मों का क्षय होकर आत्मा अपने शाश्वत स्वरूप को प्राप्त करती है। इस दिन किया गया तप, दान और स्वाध्याय दीर्घकालिक आध्यात्मिक फल प्रदान करता है। इस पर्व का गहरा संबंध वर्षीतप से भी है। वर्षीतप एक अत्यंत कठोर साधना है, जिसमें साधक एक वर्ष तक वैकल्पिक उपवास करता है। एक दिन उपवास और दूसरे दिन मर्यादित आहार। यह साधना भगवान ऋषभदेव के तेरह माह के उपवास की स्मृति में की जाती है। इसका समापन इसी दिन “पारण” के रूप में होता है, जिसमें साधक इक्षु रस या अन्य शुद्ध आहार ग्रहण करता है। यह केवल तप का अंत नहीं, बल्कि आत्मसंयम की दीर्घ यात्रा का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है।</p>
<p><strong>यह घटना आहार-विधि की स्थापना का मूल आधार बनती है</strong></p>
<p>आहार-विधि की दृष्टि से यह घटना अत्यंत महत्वपूर्ण है। जैन परंपरा में आहार को केवल शारीरिक आवश्यकता नहीं माना गया, बल्कि यह आत्मानुशासन और जीवदया से जुड़ा हुआ है। राजा श्रेयांस कुमार द्वारा दिया गया इक्षु रस इस बात का प्रतीक है कि आहार शुद्ध भाव, सम्यक ज्ञान और उचित विधि से ही दिया जाना चाहिए। इस प्रकार यह घटना आहार-विधि की स्थापना का मूल आधार बनती है। दान के संदर्भ में भी यह प्रसंग अत्यंत शिक्षाप्रद है। यहाँ दान केवल वस्तु का नहीं, बल्कि भावना का महत्व दर्शाया गया है। श्रेयांस कुमार का दान इसलिए महान माना गया क्योंकि उसमें श्रद्धा, ज्ञान और करुणा का समन्वय था। जैन सिद्धांतों के अनुसार, सम्यक भाव से किया गया दान ही वास्तविक पुण्य का कारण बनता है। यह पर्व सामाजिक और नैतिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह हमें सादगी, संयम और आत्मनियंत्रण का संदेश देता है। वर्तमान युग में, जहाँ भोग-विलास और उपभोग की प्रवृत्ति बढ़ रही है, यह पर्व हमें संतुलित जीवन जीने की प्रेरणा देता है। यह सिखाता है कि जीवन का वास्तविक उद्देश्य बाहरी सुखों की प्राप्ति नहीं, बल्कि आत्मा की शांति और शुद्धि है।</p>
<p><strong>त्याग, तप, संयम और सम्यक आचरण ही आत्मोन्नति के वास्तविक साधन </strong></p>
<p>जैन दर्शन में आत्मा को अनंत ज्ञान, दर्शन और सुख का भंडार माना गया है, किन्तु कर्मों के बंधन के कारण यह स्वभाव प्रकट नहीं हो पाता। तप, संयम और साधना के माध्यम से इन कर्मों का क्षय किया जा सकता है। यह पर्व उसी मार्ग का स्मरण कराता है और प्रत्येक साधक को प्रेरित करता है कि वह आत्मकल्याण की दिशा में अग्रसर हो। अक्षय तृतीया का यह संदेश अत्यंत स्पष्ट है कि त्याग, तप, संयम और सम्यक आचरण ही आत्मोन्नति के वास्तविक साधन हैं। भगवान ऋषभदेव का आदर्श जीवन और राजा श्रेयांस की सम्यक भावना यह दर्शाती है कि जब ज्ञान, श्रद्धा और आचरण का समन्वय होता है, तभी धर्म का वास्तविक स्वरूप प्रकट होता है। यही इस पावन तिथि का शाश्वत और अक्षय संदेश है, जो प्रत्येक युग में समान रूप से प्रासंगिक और प्रेरणादायक बना रहेगा।</p>
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		<title>प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव का महामस्तकाभिषेक महोत्सव: भक्ति भावना और श्रद्धा के साथ विधियां पूरी हुई  </title>
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		<pubDate>Sat, 11 Apr 2026 14:28:29 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आचार्य प्रज्ञा सागर जी महाराज के 41 वें गृह त्याग दिवस के अवसर पर श्री दिगंबर जैन मंदिर महारानी फार्म गायत्री नगर में शनिवार को प्रातः 7 बजे से आचार्य श्री की प्रेरणा, आशीर्वाद ससंघ सानिध्य में मंदिर प्रबंध समिति के तत्वावधान में मूल नायक प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव जी का 170 कलशों से महामस्तिकाभिषेक [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>आचार्य प्रज्ञा सागर जी महाराज के 41 वें गृह त्याग दिवस के अवसर पर श्री दिगंबर जैन मंदिर महारानी फार्म गायत्री नगर में शनिवार को प्रातः 7 बजे से आचार्य श्री की प्रेरणा, आशीर्वाद ससंघ सानिध्य में मंदिर प्रबंध समिति के तत्वावधान में मूल नायक प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव जी का 170 कलशों से महामस्तिकाभिषेक महोत्सव बडे ही भक्ति के साथ हुआ। <span style="color: #ff0000">जयपुर से पढ़िए, यह खबर&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong> जयपुर।</strong> महावीर तपोभूमि उज्जैन और गोलोक धाम के प्रणेता आचार्य प्रज्ञा सागर जी महाराज के 41 वें गृह त्याग दिवस के अवसर पर श्री दिगंबर जैन मंदिर महारानी फार्म गायत्री नगर में शनिवार को प्रातः 7 बजे से आचार्य श्री की प्रेरणा, आशीर्वाद ससंघ सानिध्य में मंदिर प्रबंध समिति के तत्वावधान में मूल नायक प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव जी का 170 कलशों से महामस्तिकाभिषेक महोत्सव बडे ही भक्ति के साथ हुआ। अखिल भारतवर्षीय दिगंबर जैन युवा परिषद के राष्ट्रीय महामंत्री उदयभान जैन ने बताया कि सर्वप्रथम मंदिर जी में नित्य अभिषेक हुए। मनोज बोहरा परिवार की ओर से गुरुदेव आचार्य श्री का पाद प्रक्षालन किया गया और शास्त्र भेंट किए। प्रथम अभिषेक करने का सौभाग्य सौधर्म इंद्र बनकर अनिल गोधा परिवार को प्राप्त हुआ। शांतिधारा करने का सौभाग्य कैलाश छाबडा परिवार और गुंजन जैन खांदू कॉलोनी बांसवाड़ा वाले परिवार को मिला। आचार्य श्री ने वार्षिकोत्सव पर णमोकार महामंत्र 24 घंटे का अखंड सामूहिक पाठ कराए जाने का आह्वान किया। आचार्य श्री ने कहा कि द्वितीय तीर्थंकर भगवान अजितनाथ के समय कर्म भूमियों में एक साथ 170 तीर्थंकर हुए। आज सर्वार्थ सिद्धि योग है। इस कारण 170 कलशों से इस मंदिर में प्रथम बार महामस्तिकाभिषेक कराया है। अब भगवान ऋषभदेव जी के जन्म कल्याणक चैत्र बदी नवमी को प्रतिवर्ष महामस्तिकाभिषेक कराया जाएगा।</p>
<p><strong> आचार्य श्री के 41 वें गृह त्याग दिवस पर 41 पुरुषों को किया सम्मानित </strong></p>
<p>सभा का संचालन मंदिर प्रबंध समिति के उपाध्यक्ष अरुण शाह ने किया और यह ऐतिहासिक प्रथम बार मूल नायक महामस्तिकाभिषेक महोत्सव आयोजित हुआ उसके लिए आचार्य श्री के उपकारों के लिए कोटि-कोटि नमन किया। इस अवसर पर आचार्य श्री के 41 वें गृह त्याग दिवस पर 41 पुरुषों को, जो नियमित अभिषेक करेंगे गुरु आस्था परिवार गायत्री नगर ने सम्मानित किया। इस अवसर पर गायत्री नगर महारानी फार्म और विभिन्न कॉलोनियों के लगभग 170 से अधिक भक्तों ने अभिषेक किए। मंदिर प्रबंध समिति के अध्यक्ष कैलाश छाबड़ा ने बताया कि भक्ति के साथ भगवान ऋषभदेव ( आदिनाथ जी) की अष्ट द्रव्यों से पूजा की। संचालन उपाध्यक्ष अरुण शाह ने किया। आचार्य श्री संघ सहित 12 अप्रैल को प्रातः 6 बजे जवाहर नगर की ओर मंगल विहार करेंगे।</p>
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		<title>वर्तमान जैन चौबीसी के प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव : 12 मार्च को भगवान ऋषभदेव जन्म कल्याणक मनाया जाएगा </title>
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		<pubDate>Wed, 11 Mar 2026 08:18:09 +0000</pubDate>
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<p><strong>भारतीय संस्कृति में जैन धर्म अनादि निधन धर्म है , जैन धर्म में चौबीस तीर्थंकर होते हैं, भूतकाल में चौबीस तीर्थंकर हुए वर्तमान में है , भविष्य में होंगे। वर्तमान चौबीसी में प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव हुए हैं। <span style="color: #ff0000">जयपुर से पढ़िए, उदयभान जैन का यह आलेख&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong>जयपुर।</strong> भारतीय संस्कृति में जैन धर्म अनादि निधन धर्म है , जैन धर्म में चौबीस तीर्थंकर होते हैं, भूतकाल में चौबीस तीर्थंकर हुए वर्तमान में है , भविष्य में होंगे। वर्तमान चौबीसी में प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव हुए हैं।भगवान ऋषभदेव जैन पुराणो़ के अनुसार 14 कुलकरों में माता रानी मरुदेवी व महाराजा नाभिराय अंतिम कुलकर थे, शाश्वत जन्मभूमि अयोध्या में महाराजा नाभिराय मरु देवी के प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव का जन्म हुआ । भगवान ने ऋषभदेव देव का जन्म इक्ष्वाकुवंशी क्षत्रिय परिवार में हुआ , भगवान ऋषभदेव को वृषभदेव, आदिनाथ , ऋषभदेव , पुरुदेव कहते है। विश्व में प्राचीनतम लिपिबद्ध धर्म ग्रन्थों में से एक ऋग्वेद आदि ग्रंथों में भगवान ऋषभदेव के उल्लेख तथा विश्व की समस्त संस्कृतियों में ऋषभदेव की किसी ने किसी रूप में उपस्थित जैन धर्म की प्राचीनता और भगवान ऋषभदेव की सर्व मान्य शक्ति की स्थिति को‌ व्यक्त करती है। भगवान ऋषभदेव बाल क्रियाओं से धीरे-धीरे बड़े होने लगे उनकी यश कीर्ति बढ़ने लगी ,भगवान ऋषभदेव का विवाह नन्दा और सुनन्दा से हुआ। उनके 101पुत्र और 2 पुत्रियां हुईं।</p>
<p><strong>प्रजा जन को 6 विद्याओं का उपदेश दिया</strong></p>
<p>भरत चक्रवर्ती सबसे बड़े पुत्र थे उनके नाम से भारत का नाम पड़ा , दूसरे पुत्र भगवान बाहुबली थे जो महान राजा एवं कामदेव पद के धारक थे‌। दो पुत्रियां थीं एक ब्राम्ही और दूसरी सुंदरी ,इन पुत्रियों को ऋषभदेव ने युग के प्रारंभ में लिपि विद्या यानी के अक्षर विद्या ( अक्षर विद्या) और दूसरी को अंक विद्या का ज्ञान दिया। महाराज ऋषभदेव का सुशासन चल रहा था। अचानक उस समय कल्प वृक्षों की समाप्ति से उदर पूर्ति की विकट समस्या होने लगी। जनता में त्राहि त्राहि होने लगी प्रजा चिंतित होने लगी। सभी जनता भगवान ऋषभदेव के दरबार में आए और महाराजा से निवेदन किया कि भगवन अब कल्प वृक्षों का प्रभाव कम हो रहा है, अब हम सब की उदर पूर्ति कैसे होगी ? हम अपना जीवन कैसे व्यतीत करेंगे? हे देव रक्षा करो रक्षा करो। हमें उचित मार्गदर्शन प्रदान करो, ये तब भगवान ऋषभदेव ने अपने वैराग्य भाव से प्रेरित होकर दीक्षा से पूर्व प्रजा जन को 6 विद्याओं का उपदेश दिया। जिनमें असि, मसि, कृषि ,विद्या , वाणिज्य एवं शिल्प कला आदि।</p>
<p>असि:- भगवान ऋषभदेवने भारतीय संस्कृति के संरक्षण तथा राजधर्म के पालन हेतु शस्त्र विद्या एवं युद्ध नीति बताई,।</p>
<p>मसि:- मसि की शिक्षा अपनी पुत्री ब्राम्ही एवं सुन्दरी के माध्यम से जनता को दी ,यानी लिपि विद्या और अंक विद्या, आज लिपि ब्राह्मी लिपि मानी जाती है । सुंदरी को दी गई अंक विद्या समस्त गणितीय विकास का मूलाधारहै।</p>
<p>कृषि:- भगवान ऋषभदेव ने प्रजा को सर्वप्रथम शाकाहार का प्रवर्तन करते हुए स्वयं इक्षुदण्डों के ₹ पैदा करने व उनके विभिन्न उपयोगों की विधि बताई। कृषि कार्य का विधिवत पैदा करने के उपाय बताये , धान्य कैसे पैदा होती है, उदर पूर्ति के साथ-साथ अनेकों गतिविधियों व व्यवसाय बढ़ने लगे।</p>
<p>विद्या :- भगवान ने असि, मसि, कृषि के बाद विद्याओं का ज्ञान कराया, जिसमें अंक विद्या और लिपि विद्या का ज्ञान देकर भारतीय संस्कृति का विशेष योगदान दिया ।</p>
<p>वाणिज्य:- भगवान ने जीवन यापन के लिए वाणिज्य कला सिखाई जो आज प्रमुख रूप से ले चुकी है। प्रजाजन को बताया कि आप द्वारा की गई कृषि व अन्य उत्पादों क व्यापार कैसे किया जाए? कैसे क्रय-विक्रय किया जाए , यानि वाणिज्य कला के बारे में बताया ,।</p>
<p>शिल्प कला:- भगवान ने शिल्प कला का ज्ञान दिया, उन्होंने बताया कि जीवन जीने के लिए मकान की आवश्यकता है, व्यापार के लिए गोदाम व ऑफिस आदि की आवश्यकता है ,उन्होंने देव दर्शन के लिए मंदिर आदि कैसे तैयार हों, सभी शिल्प कलाओं की विद्यायें बतायीं।</p>
<p><strong>समाज को विकास का मार्ग बताया</strong></p>
<p>इस प्रकार भगवान ऋषभदेव ने जीवकोपार्जन के साधन बताये जो आज तक चल रहे हैं। भगवान ऋषभदेव ने भारतीय संस्कृति को 6 कार्यों द्वारा जहां समाज को विकास का मार्ग बताया। वहीं अहिंसा, संयम, तथा तप के उपदेशों द्वारा समाज की आन्तरिक व चेतनाओं को भी जगाया। भारतीय संस्कृति का जो योगदान भगवान ऋषभदेव ने दिया। उसकी चर्चायें प्राचीनतम ग्रन्थों में मिलती है। इस प्रकार भगवान ने अपनी प्रतिष्ठित राज सत्ता, संपूर्ण वैभव एवं परिवार का त्याग कर आत्म साधना हेतु मुनि दीक्षा ली और घोर साधना,तपस्चर्या करके इस युग के प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव मोक्षगामी बने।</p>
<p><strong>भारतीय संस्कृति के आद्य प्रणेता भगवान ऋषभदेव हैं</strong></p>
<p>ऐसे जगत पूज्य भगवान ऋषभदेव के जीवन, उनके व्यक्तित्व तथा मानवता का दिए गएअवदान को विश्व समुदाय के सम्मुख सही रूप से प्रस्तुत करने के लिए और यह स्पष्ट करने हेतु कि भारतीय संस्कृति के आद्य प्रणेता भगवान ऋषभदेव हैं। आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज, समाधिस्थ आचार्य श्री ज्ञानसागर जी महाराज, आचार्य श्री सन्मति सागर जी महाराज, गणिनी प्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी की प्रेरणा और आशीर्वाद से भगवान ऋषभदेव के जीवन, अहिंसा सिद्धांतों और 6 जीवन यापन की विद्याओं को जन जन तक पहुंचाने में अहम् भूमिका निभाई। गणिनी प्रमुख श्री ज्ञानमती माता जी की प्रेरणा व आशीर्वाद से, स्वस्ति श्री रवीन्द्र कीर्ति स्वामी जी के मार्गदर्शन में अखिल भारतवर्षीय दिगम्बर जैन युवा परिषद् देश के युवाओं की सर्वोच्च संस्था के माध्यम से व देश की विभिन्न संस्थाओं के द्वारा भगवान ऋषभदेव का जन्म कल्याणक व मोक्ष कल्याणक को संपूर्ण देश व विदेश की जैन समाज मनाती है ।</p>
<p><strong>&#8216;स्टैच्यू ऑफ अहिंसा&#8217; का नाम दिया</strong></p>
<p>गणिनी प्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ने भगवान ऋषभदेव की दीक्षा तपो स्थली इलाहाबाद का विकास करवाया। वहीं मांगीतुंगी में 108 फीट ऊंची प्रतिमा जी का निर्माण करवा कर &#8216;स्टैच्यू ऑफ अहिंसा&#8217; का नाम दिया जो जन जन द्वारा पूजी जाती है, जो देखता है वो हर्षित हो कर भक्ति में भाव विभोर हो जाता है और गुरु मां के इस अदभुत कार्य की भूरि भूरि प्रशंसा करते हैं। वहीं आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज ने कुंडलपुर बड़े बाबा भगवान ऋषभदेव आदिनाथ जी का बडा मंदिर बनवाकर दर्शन कराएं।</p>
<p><strong> क्षेत्र में धार्मिक सामाजिक कार्यक्रम करेंगे</strong></p>
<p>भगवान ऋषभदेव की शिक्षाओं को जन-जन तक पहुंचना चाहिए । उनका जन्म कल्याणक चैत्र बदी नवमी के दिन इस वर्ष आने वाली 12 मार्च को है , संपूर्ण जैन समाज की संस्थायें सभी अपने अपने जैन मन्दिरों में युवा परिषद्, युवा मंडल, महिला मंडल सभी संस्थाएं मिलकर अपने-अपने क्षेत्र में धार्मिक व सामाजिक कार्यक्रम करेंगे। केंद्र सरकार और राज्य सरकारों से निवेदन है कि 12 मार्च को यानि चैत्र बदी नवमी का अवकाश घोषित हो और इस दिवस पर राष्ट्रीय स्तर पर आयोजन हों। तभी हमारी सभी की जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भारतीय संस्कृति के आद्य प्रणेता भगवान ऋषभदेव के उपकारों की सच्ची भक्ति है।</p>
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		<title>चैत्र वदी नवमी को भारतोत्सव मनाया जाए: लेखिका पुष्पा पांड्या ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर अनुरोेध किया  </title>
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		<pubDate>Wed, 11 Feb 2026 12:28:53 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[वरिष्ठ लेखिका और चित्रकार पुष्पा पांड्या ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर निवेदन किया कि प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ और उनके ज्येष्ठ पुत्र भरत चक्रवर्ती जी के जन्म दिवस चैत्र वदी नवमी को भारतोत्सव के रूप में मनाने की घोषणा की जाए। इंदौर से पढ़िए, यह खबर&#8230; इंदौर। वरिष्ठ लेखिका और चित्रकार पुष्पा पांड्या ने प्रधानमंत्री [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>वरिष्ठ लेखिका और चित्रकार पुष्पा पांड्या ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर निवेदन किया कि प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ और उनके ज्येष्ठ पुत्र भरत चक्रवर्ती जी के जन्म दिवस चैत्र वदी नवमी को भारतोत्सव के रूप में मनाने की घोषणा की जाए। <span style="color: #ff0000">इंदौर से पढ़िए, यह खबर&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong>इंदौर।</strong> वरिष्ठ लेखिका और चित्रकार पुष्पा पांड्या ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर निवेदन किया कि प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ और उनके ज्येष्ठ पुत्र भरत चक्रवर्ती जी के जन्म दिवस चैत्र वदी नवमी को भारतोत्सव के रूप में मनाने की घोषणा की जाए। यह दिवस इस बार 12 मार्च को है। इस दिन को भारत दिवस के रूप में मनाए जाने का की घोषणा से समग्र जैन समाज हर्षित होगा। उन्होंने बताया कि प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभ देव और उनके ज्येष्ठ पुत्र प्रथम चक्रवर्ती भरत के नाम पर इस देश का नाम भारत पड़ा है। इसलिए चैत्र वदी नवमी को भारतोत्सव या भारत दिवस के रूप में मनाया जाना श्रेयस्कर होगा। पत्र में उन्होंने मांग की है कि पाठ्य पुस्तकों में उनके पाठ पढ़ाए जाएं। उनकी विश्व की सबसे बड़ी प्रतिमा स्थापित भी होनी चाहिए। साथ ही यह भी अनुरोध किया कि इस दिन पशु वध एवं मांस विक्रय केंद्र बंद रखे जाएं तथा मांसाहारी खाद्य सामग्री हवाईजहाज, रेल, होटल्स, दाबों ठेलों आदि में भी बनाने और परोसने पर पाबंदी लगाई जाए। पुष्पा पांड्या ने बताया कि कर्मयुग के प्रारंभ कर्ता छह कर्मों की शिक्षा द्वारा कौशल की शिक्षा देकर जीवन जीने की कला सिखाने वाले 72 कला के प्रणेता जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव जी और उनके ज्येष्ठ पुत्र प्रथम चक्रवर्ती सम्राट भरत जिनके नाम से देश का नाम ‘भारतवर्ष’ पड़ा। वे छह खंड के अधिपति 9 निधि और चौदह रत्न धारी थे। भरत जी का जन्म भी अयोध्या नगरी में उनके पिता ऋषभ देव जी के जन्म दिन चैत्र वदी नवमी के दिन हुआ था। जो इस वर्ष 12 मार्च को है। इस दिन को भारतोत्सव के रूप में मनाया जाए। भरत जी और ऋषभ देव जी के जीवन, व्यक्तित्व और कृतित्व पर चर्चा हो। उनके जीवन पर आधारित जानकारी पाठ्य पुस्तकों में पढ़ाई जाए। भरत चक्रवर्ती जी की विश्व की सबसे बड़ी प्रतिमा अयोध्या में स्थापित होनी चाहिए। इससे पूर्व भारत देश ऋषभ देव जी के पिता और भरत के दादाजी राजा नाभिराय जी के नाम से अजनाभ वर्ष कहलाता था। शकुंतला पुत्र भरत के नाम से देश का नाम भारत हुआ ये सर्वथा गलत है। इस आशय को पाठ पाठ्य पुस्तकों से हटाए जाए। शकुंतला पुत्र भरत की कहानी महाभारत के समय की है। जो जैन धर्म के 22वें तीर्थंकर नेमिनाथ जी के समय की बात है जबकि, हजारों साल पूर्व से ही हमारे देश का नाम भारत है।</p>
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		<title>चैत्र वदी नवमी को भारतोत्सव मनाया जाए: लेखिका पुष्पा पांड्या ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर अनुरोेध किया  </title>
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		<pubDate>Thu, 05 Feb 2026 12:49:05 +0000</pubDate>
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<p><strong>वरिष्ठ लेखिका और चित्रकार पुष्पा पांड्या ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर निवेदन किया कि प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ और उनके ज्येष्ठ पुत्र भरत चक्रवर्ती जी के जन्म दिवस चैत्र वदी नवमी को भारतोत्सव के रूप में मनाने की घोषणा की जाए। <span style="color: #ff0000">इंदौर से पढ़िए, यह खबर&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong>इंदौर।</strong> वरिष्ठ लेखिका और चित्रकार पुष्पा पांड्या ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर निवेदन किया कि प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ और उनके ज्येष्ठ पुत्र भरत चक्रवर्ती जी के जन्म दिवस चैत्र वदी नवमी को भारतोत्सव के रूप में मनाने की घोषणा की जाए। यह दिवस इस बार 12 मार्च को है। इस दिन को भारत दिवस के रूप में मनाए जाने का की घोषणा से समग्र जैन समाज हर्षित होगा। उन्होंने बताया कि प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभ देव और उनके ज्येष्ठ पुत्र प्रथम चक्रवर्ती भरत के नाम पर इस देश का नाम भारत पड़ा है। इसलिए चैत्र वदी नवमी को भारतोत्सव या भारत दिवस के रूप में मनाया जाना श्रेयस्कर होगा। पत्र में उन्होंने मांग की है कि पाठ्य पुस्तकों में उनके पाठ पढ़ाए जाएं। उनकी विश्व की सबसे बड़ी प्रतिमा स्थापित भी होनी चाहिए। साथ ही यह भी अनुरोध किया कि इस दिन पशु वध एवं मांस विक्रय केंद्र बंद रखे जाएं तथा मांसाहारी खाद्य सामग्री हवाईजहाज, रेल, होटल्स, दाबों ठेलों आदि में भी बनाने और परोसने पर पाबंदी लगाई जाए। पुष्पा पांड्या ने बताया कि कर्मयुग के प्रारंभ कर्ता छह कर्मों की शिक्षा द्वारा कौशल की शिक्षा देकर जीवन जीने की कला सिखाने वाले 72 कला के प्रणेता जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव जी और उनके ज्येष्ठ पुत्र प्रथम चक्रवर्ती सम्राट भरत जिनके नाम से देश का नाम ‘भारतवर्ष’ पड़ा। वे छह खंड के अधिपति 9 निधि और चौदह रत्न धारी थे। भरत जी का जन्म भी अयोध्या नगरी में उनके पिता ऋषभ देव जी के जन्म दिन चैत्र वदी नवमी के दिन हुआ था। जो इस वर्ष 12 मार्च को है। इस दिन को भारतोत्सव के रूप में मनाया जाए। भरत जी और ऋषभ देव जी के जीवन, व्यक्तित्व और कृतित्व पर चर्चा हो। उनके जीवन पर आधारित जानकारी पाठ्य पुस्तकों में पढ़ाई जाए। भरत चक्रवर्ती जी की विश्व की सबसे बड़ी प्रतिमा अयोध्या में स्थापित होनी चाहिए।</p>
<p>इससे पूर्व भारत देश ऋषभ देव जी के पिता और भरत के दादाजी राजा नाभिराय जी के नाम से अजनाभ वर्ष कहलाता था। शकुंतला पुत्र भरत के नाम से देश का नाम भारत हुआ ये सर्वथा गलत है। इस आशय को पाठ पाठ्य पुस्तकों से हटाए जाए। शकुंतला पुत्र भरत की कहानी महाभारत के समय की है। जो जैन धर्म के 22वें तीर्थंकर नेमिनाथ जी के समय की बात है जबकि, हजारों साल पूर्व से ही हमारे देश का नाम भारत है।</p>
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		<title>निर्वाण कल्याणक महोत्सव पर 48 दीपकों से भक्तामर महाअर्चना : सभी जिनालयों में हुए भक्तिपूर्वक धार्मिक, उमड़े श्रद्धालु  </title>
		<link>https://www.shreephaljainnews.com/on_the_occasion_of_nirvana_kalyanak_festival_a_grand_worship_ceremony_was_performed_with_48lamps_and_the_recitation_of_bhaktamar_stotra/</link>
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		<pubDate>Mon, 19 Jan 2026 12:10:43 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव आदिनाथ स्वामी का मोक्ष कल्याणक महोत्सव नगर के सभी जिनालयों में भक्तिपूर्वक विभिन्न धार्मिक आयोजनों के साथ मनाया गया। मुरैना से पढ़िए, मनोज जैन नायक की यह खबर&#8230; मुरैना। जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव आदिनाथ स्वामी का मोक्ष कल्याणक महोत्सव नगर के सभी जिनालयों में भक्तिपूर्वक [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव आदिनाथ स्वामी का मोक्ष कल्याणक महोत्सव नगर के सभी जिनालयों में भक्तिपूर्वक विभिन्न धार्मिक आयोजनों के साथ मनाया गया। <span style="color: #ff0000">मुरैना से पढ़िए, मनोज जैन नायक की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong>मुरैना</strong>। जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव आदिनाथ स्वामी का मोक्ष कल्याणक महोत्सव नगर के सभी जिनालयों में भक्तिपूर्वक विभिन्न धार्मिक आयोजनों के साथ मनाया गया। भगवान ऋषभदेव आदिनाथ स्वामी के निर्वाण कल्याणक के पावन अवसर नगर के सभी जिनालयों में विशेष पूजा-अर्चना की गई। सुबह सभी जिनेंद्र भक्तों द्वारा आदिनाथ भगवान का अभिषेक, शांतिधारा एवं पूजन किया गया। सभी भक्तों ने सामूहिक रूप से निर्वाण कांड का वाचन करते हुए मोक्ष लक्ष्मी की कामना के साथ निर्वाण लड्डू समर्पित किया।</p>
<p><strong> नसिया जिनालय में स्याद्वाद युवा क्लब ने की भक्ति</strong></p>
<p>भगवान आदिनाथ स्वामी के निर्वाण कल्याणक के पावन अवसर पर स्याद्वाद युवा क्लब मुरैना सेगमेंट द्वारा श्री महावीर दिगंबर जैन नसियाजी जैन मंदिर में शाम को 6.30 बजे से 48 दीपकों के साथ भक्तामर पाठ की महाअर्चना की गई। भजन गायक मनीष जैन एंड पार्टी की संगीत लहरी के साथ भक्तामर महाअर्चना में भक्तामर स्त्रोत के एक-एक श्लोक का सामूहिक पाठ किया गया। प्रत्येक श्लोक के वाचन के बाद मंत्रोचार के साथ श्रावक-श्रेष्ठियों ने प्रज्वलित दीप स्थापित किए। इस भव्य धार्मिक अनुष्ठान में स्याद्वाद युवा क्लब मुरैना सेगमेंट के सभी सदस्यों के साथ सकल जैन समाज मुरैना ने भाग लिया। स्याद्वाद युवा क्लब मुरैना सेगमेंट के सभी सदस्यों ने संगीत की स्वर लहरी के साथ भक्ति नृत्य किए।</p>
<p><strong>बड़े जैन मंदिर में विलोकसागर बालिका मंडल ने लिया लाभ </strong></p>
<p>श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन पंचायती बड़ा जैन मंदिर में आदिनाथ स्वामी के मोक्ष कल्याणक के अवसर पर सुबह अभिषेक, शांतिधारा एवं पूजन के बाद निर्वाण लड्डू समर्पित किया गया। विलोकसागर बालिका मंडल की सदस्याओं ने शाम को सभी भक्तों की उपस्थिति में श्री 1008 भक्तामर महाअर्चना की। इसमें सकल जैन समाज के लोग शामिल हुए। भक्तामर महाअर्चना में सामूहिक रूप से 48 श्लोकों का वाचन करते हुए 48 दीप प्रज्वलित किए गए। विलोकसागर बालिका मंडल की बालिकाओं एवं समाज के श्रावक श्रेष्ठियों ने भक्तिमय जैन भजनों पर नृत्य किए। सभी लोग श्री जिनेंद्र प्रभु की भक्ति करते हुए अपने आप को आनंदित महसूस कर रहे थे।</p>
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		<title>आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी के शिष्यों ने मांगीतुंगी के किए दर्शन: नांद्रे के लिए 450 किमी का विहार शेष  </title>
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		<pubDate>Fri, 30 May 2025 09:25:32 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[पट्टाचार्य श्री विशुद्धसागर जी के शिष्य मुनि श्री सारस्वत सागर जी महाराज, मुनिश्री जयंत सागर जी, मुनिश्री सिद्ध सागर जी एवं क्षुल्लक श्रुत सागर जी का मांगीतुंगी में 25 मई को मंगल प्रवेश हुआ। मांगीतुंगी से पढ़िए, अभिषेक पाटील की खबर&#8230; मांगीतुंगी। पट्टाचार्य श्री विशुद्धसागर जी के शिष्य मुनि श्री सारस्वत सागर जी महाराज, मुनिश्री [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>पट्टाचार्य श्री विशुद्धसागर जी के शिष्य मुनि श्री सारस्वत सागर जी महाराज, मुनिश्री जयंत सागर जी, मुनिश्री सिद्ध सागर जी एवं क्षुल्लक श्रुत सागर जी का मांगीतुंगी में 25 मई को मंगल प्रवेश हुआ। <span style="color: #ff0000">मांगीतुंगी से पढ़िए, अभिषेक पाटील की खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>मांगीतुंगी।</strong> पट्टाचार्य श्री विशुद्धसागर जी के शिष्य मुनि श्री सारस्वत सागर जी महाराज, मुनिश्री जयंत सागर जी, मुनिश्री सिद्ध सागर जी एवं क्षुल्लक श्रुत सागर जी का मांगीतुंगी में 25 मई को मंगल प्रवेश हुआ। इस अवसर मुनि संघ की भव्य अगवानी की गई। उन्होंने मांगीतुगी में भगवान के दर्शन किए। मुनिश्री सिद्ध सागर जी महाराज जी ने बताया कि प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव की 108 फीट ऊंची प्रतिमा को ‘गिनीज वर्ल्ड रिकार्डस’ में सबसे विशाल जैन प्रतिमा के रूप में शामिल किया गया है। इस प्रतिमा को एक ही पत्थर को तराशकर बनाया गया है। इस 108 फीट उत्तुंग आदिनाथ भगवान जी प्रतिमा के दर्शन करके हम सभी धन्य हुए। वर्ष 2024 में आचार्य श्री विशुद्ध सागरजी ससंघ ने जम्बूद्वीप हस्तिनापुर के दर्शन किए थे। आर्यिका श्री ज्ञानमती माताजी, जहां उन्होंने संपूर्ण भारत की पदयात्रा कर शताधिक आत्माओं में वैराग्य की ज्योति जगाई है। वहीं हस्तिनापुर में दिगंबर जैन त्रिलोक शोध संस्थान के प्रबंधकों को प्रेरणा देकर जम्बूद्वीप की प्रतिकृति के रूप में न केवल जैन समाज अपितु संपूर्ण विश्व को एक अद्वितीय उपहार दिया है।</p>
<p>खुले आकाश के नीचे वलयाकार लवण समुद्र से वेष्ठित 101 फीट उत्तुंग सुमेरु के चारों ओर बनी जम्बूद्वीप की भव्य रचना को देखकर तिलोयपण्णत्ति, जम्बूद्वीपण्णत्तिसंगहो में निहित भूगोल विषयक सामग्री को सहज ही हृदयंगम किया जा सकता है। वर्तमान में ‘जम्बूद्वीप’ के नाम से विख्यात इस परिसर में स्थित कमलमंदिर, ध्यान मंदिर, त्रिमूर्ति मंदिर, सहस्रकूट जिनालय, ओम मंदिर, भगवान वासुपूज्य मंदिर, तेरह द्वीप जिनालय, जम्बूद्वीप पुस्तकालय, विस्तृत उद्यान समग्र रूप से इसकी शोभा में अभिवृद्धि करते हैं। 800 किमी चलकर मुनि संघ इंदौर से नांद्रे पधारेंगे। अभी 450 किमी विहार शेष है। नांद्रे नगरी का परम सौभाग्य है कि वर्ष 2025 के वर्षायोग के लिए पट्टाचार्य श्री 108 श्री विशुद्धसागर जी शिष्य मुनि श्री सारस्वत सागर जी, मुनि श्री जयंत सागर जी, मुनिश्री सिद्ध सागर जी एवं क्षुल्लक श्री श्रुत सागर जी का विहार इंदौर से नांद्रे (महाराष्ट्र) के लिए जारी है।</p>
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		<title>मंत्रोच्चारण से किया गया ध्वज पूजन:  पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव हुआ आरंभ, 6 मार्च तक चलेगा </title>
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		<pubDate>Sun, 02 Mar 2025 08:29:57 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[अयोध्या में दिगंबर जैन मंदिर रायगंज में शनिवार को साध्वी ज्ञानमती माताजी के सानिध्य में मंत्रोच्चार संग ध्वज पूजन किया गया। सिद्ध भगवंत की 727 जिन प्रतिमाएं विराजमान होंगी। पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव 2 मार्च से 6 मार्च तक राष्ट्रीय स्तर पर मनाया जाएगा। पढ़िए अयोध्या से दीपक प्रधान की यह खबर&#8230; अयोध्या। दिगंबर जैन मंदिर [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>अयोध्या में दिगंबर जैन मंदिर रायगंज में शनिवार को साध्वी ज्ञानमती माताजी के सानिध्य में मंत्रोच्चार संग ध्वज पूजन किया गया। सिद्ध भगवंत की 727 जिन प्रतिमाएं विराजमान होंगी। पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव 2 मार्च से 6 मार्च तक राष्ट्रीय स्तर पर मनाया जाएगा।<span style="color: #ff0000"> पढ़िए अयोध्या से दीपक प्रधान की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong>अयोध्या।</strong> दिगंबर जैन मंदिर रायगंज में शनिवार को साध्वी ज्ञानमती माताजी के सानिध्य में मंत्रोच्चार संग ध्वज पूजन किया गया। गणनानी प्रमुख ज्ञान मति माता ने कहा कि भारतकी प्राचीनतम संस्कृति में यह अयोध्या नगरी प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव आदि पांच भगवंत की भी जन्मभूमि है। ऐसी महान तीर्थ भूमि पर जैन धर्म के अनेक जिन मंदिर अयोध्या के विभिन्न स्थानों पर दर्शनीय एवं वंदनीय हैं। इन जिन मंदिरों में रायगंज स्थित भगवान ऋषभदेव दिगंबर जैन मंदिर बड़ी मूर्ति का परिसर 6 एकड़ विशाल प्रांगण में अपनी आदित्य हवा बिखरता हुआ जैन धर्म की प्राचीनता इसके इतिहास को जग जाहिर कर रहा है। यहां 31 फीट की भगवान ऋषभदेव की प्रतिमा होने से इस तीर्थ को बड़ी मूर्ति के नाम से जन-जन में पहचाना जाता है। कमेटी के अध्यक्ष पीठाधीश स्वस्ति श्री रविंद्र कीर्ति स्वामी ने बताया कि जैन धर्म का यह चिन्ह माना जाने वाला तीन लोग का स्वरूप बनकर प्रकट हुआ।</p>
<p><strong><img fetchpriority="high" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-75671" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/03/WhatsApp-Image-2025-03-02-at-1.48.15-PM.jpeg" alt="" width="1600" height="1064" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/03/WhatsApp-Image-2025-03-02-at-1.48.15-PM.jpeg 1600w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/03/WhatsApp-Image-2025-03-02-at-1.48.15-PM-300x200.jpeg 300w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/03/WhatsApp-Image-2025-03-02-at-1.48.15-PM-1024x681.jpeg 1024w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/03/WhatsApp-Image-2025-03-02-at-1.48.15-PM-768x511.jpeg 768w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/03/WhatsApp-Image-2025-03-02-at-1.48.15-PM-1536x1021.jpeg 1536w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/03/WhatsApp-Image-2025-03-02-at-1.48.15-PM-414x276.jpeg 414w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/03/WhatsApp-Image-2025-03-02-at-1.48.15-PM-470x313.jpeg 470w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/03/WhatsApp-Image-2025-03-02-at-1.48.15-PM-640x426.jpeg 640w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/03/WhatsApp-Image-2025-03-02-at-1.48.15-PM-130x86.jpeg 130w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/03/WhatsApp-Image-2025-03-02-at-1.48.15-PM-187x124.jpeg 187w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/03/WhatsApp-Image-2025-03-02-at-1.48.15-PM-990x658.jpeg 990w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/03/WhatsApp-Image-2025-03-02-at-1.48.15-PM-1320x878.jpeg 1320w" sizes="(max-width: 1600px) 100vw, 1600px" />महोत्सव में जैन साध्वी ज्ञानमती माता का सानिध्य मिलेगा</strong><br />
सिद्ध भगवंत की 727 जिन प्रतिमाएं विराजमान होंगी। भगवत ऋषभदेव से लेकर भगवान महावीर तक की अन्य 1008 प्रतिमाओं का भी पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव 2 मार्च से 6 मार्च तक राष्ट्रीय स्तर पर मनाया जाएगा। महोत्सव में जैन साध्वी गणनानी प्रमुख ज्ञानमती माता के दिव्य सानिध्य में संपन्न होगा। संपूर्ण कार्यक्रम को आर्यिका चंदना मति माताजी का मार्गदर्शन मिलेगा। कमेटी ने आचार्य श्री भद्रबाहु सागर महाराज को ससंघ आमंत्रित किया है। क्षुल्लक ध्यान सागर एवं श्रवणबेल गोला के भट्टारक स्वस्ति श्री चारुकीर्ति महाराज भी अपना सानिध्य प्रदान करेंगे।</p>
<p><strong>इस तरह होंगे समारोह में कल्याणक</strong><br />
एक साथ 1800 प्रतिमाओं के गर्भकल्याणक, जन्म कल्याणक, दीक्षा कल्याणक, केवल ज्ञान कल्याणक और मोक्ष कल्याणक के साथ इन सारी प्रतिमाओं का मंत्र उपचार एवं पूर्ण विधि विधान के साथ 6 मार्च को सुबह भगवान का स्वरूप प्राप्त होगा और 3 मार्च को जन्मकल्याणक मनाया जाएगा। 5 मार्च को भगवान को ज्ञान प्राप्त करने वाले दिव्य आत्माओं के समान भगवान को केवल ज्ञान की प्राप्ति होगी। 6 मार्च को मोक्ष कल्याणक मनाया जाएगा।</p>
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