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	<title>प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ भगवान &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<title>प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ भगवान &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>श्रद्धा भक्ति के साथ मनाया अक्षय तृतीया का महापर्व: समाजजनों ने समाजजनों ने समझा दान दिवस का महत्व  </title>
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		<pubDate>Sun, 19 Apr 2026 18:27:19 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ भगवान का एक वर्ष पूर्ण होने पर राजा श्रेयांश ने इक्षु रस का आहार दान देकर अक्षय पुण्य प्राप्त किया तब से दान की परंपरा के साथ अक्षय तृतीया महापर्व मनाया जाता है। रविवार को प्रातः देवाधिदेव आदिनाथ भगवान की प्रतिमा पर महामस्तकाभिषेक एवं मुनि श्री के मुखारबिंद से [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ भगवान का एक वर्ष पूर्ण होने पर राजा श्रेयांश ने इक्षु रस का आहार दान देकर अक्षय पुण्य प्राप्त किया तब से दान की परंपरा के साथ अक्षय तृतीया महापर्व मनाया जाता है। रविवार को प्रातः देवाधिदेव आदिनाथ भगवान की प्रतिमा पर महामस्तकाभिषेक एवं मुनि श्री के मुखारबिंद से वृहद शांतिधारा की गई। <span style="color: #ff0000">झुमरी तिलैया से पढ़िए, राजकुमार जैन अजमेरा की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>झुमरीतिलैया।</strong> श्री दिगंबर जैन समाज के तत्वावधान में मुनि श्री धर्मसागर जी महाराज और मुनि श्री भाव सागर जी के सानिध्य में अक्षय तृतीया महापर्व श्रद्धा भक्ति के साथ मनाया गया। जिसमें रविवार को प्रातः देवाधिदेव आदिनाथ भगवान की प्रतिमा पर महामस्तकाभिषेक एवं मुनि श्री के मुखारबिंद से वृहद शांतिधारा की गई। अक्षय तृतीया महापर्व की संगीतमय पूजन सुबोध-आशा जैन गंगवाल ने करवाई। इस अवसर पर मुनि श्री कहा कि अक्षय तृतीया जैन धर्मावलम्बियों का महान धार्मिक पर्व है। इस दिन हज़ारों वर्ष पहले जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर श्री ऋषभदेव भगवान ने एक वर्ष की पूर्ण तपस्या करने के बाद इक्षु (गन्ने) रस से आहार किया था। राजा श्रेयांस ने भगवान आदिनाथ को आहारदान देकर अक्षय पुण्य प्राप्त किया था, अतः यह तिथि अक्षय तृतीया के रूप में मानी जाती है। मुनिश्री ने कहा कि जीवन का वास्तविक उद्देश्य बाहरी सुखों की प्राप्ति नहीं, बल्कि आत्मा की शांति और शुद्धि है। अक्षय तृतीया का यह संदेश अत्यंत स्पष्ट है कि त्याग, तप, संयम और सम्यक आचरण ही आत्मोन्नति के वास्तविक साधन और दान हैं। भगवान ऋषभदेव का आदर्श जीवन और राजा श्रेयांस की सम्यक भावना यह दर्शाती है कि जब ज्ञान, श्रद्धा और आचरण का समन्वय होता है, तभी धर्म का वास्तविक स्वरूप प्रकट होता है। यही इस पावन तिथि का शाश्वत और अक्षय संदेश है, जो प्रत्येक युग में समान रूप से प्रासंगिक और प्रेरणादायक बना रहेगा। रविवार को आचार्य विद्यासागर जैन पाठशाला के बच्चों और समाज के लोगों द्वारा मुनि श्री को नवधा भक्ति के साथ आहार दिया और बच्चों ने कई नियम भी लिया। मुनि श्री ने पाठशाला के बच्चों को विशेष आशीर्वाद दिया।</p>
<p>साथ ही जैन समाज द्वारा पूरे नगर की जनता को गन्ने का रस का वितरण किया गया। सिंयोजक मुकेश जैन अजमेरा, आनंद जैन पांड्या ने बताया कि सभी श्रावक गण को भगवान के आहार की खुशी में इक्षुरस वितरण किया गया है। जो अपने आप मे एक अलग और अनूठा कार्यक्रम हुआ। साथ ही जीव दया का ध्यान रखते हुए गो माता को भी चोकड़़ और खीरा खिलाया गया। इन सभी कार्यक्रम में सहयोग देने वाले प्रदीप जैन छाबड़ा, निर्मल जैन छाबड़ा, शेफाली जैन कासलीवाल, शानू-नैनी जैन सेठी के साथ कार्यक्रम को सफल बनाने में समाज के उप मंत्री नरेंद्र जैन झांझरी, सह मंत्री राज जैन छाबड़ा, बिनोद जैन अजमेरा, दिलीप जैन बाकलीवाल, राजीव जैन छाबड़ा, पीयूष जैन कासलीवाल, संजय जैन गंगवाल, प्रिया जैन पांड्या ने योगदान दिया।</p>
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		<title>रत्नात्रयगिरि अतिशय क्षेत्र पावई में हुआ भक्तामर विधान: प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ भगवान के गुणों का किया गुणानुवाद  </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shree Phal News]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 13 Jan 2026 08:28:17 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[रत्नात्रयगिरि अतिशय क्षेत्र पावई पहुंचकर सैकडों भक्तों ने समाज सेवी धर्मेंद्र जैन के अवतरण दिवस पर सपरिवार भक्तामर विधान में भाग लिया। विमर्श जागृति मंच के राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष एवं गोलालारिय समाज अध्यक्ष धर्मेंद्र कुमार जैन पोस्ट ऑफिस के अवतरण दिवस पर परिवार की ओर से यह आयोजन हुआ। पावई से पढ़िए, सोनल जैन की यह [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>रत्नात्रयगिरि अतिशय क्षेत्र पावई पहुंचकर सैकडों भक्तों ने समाज सेवी धर्मेंद्र जैन के अवतरण दिवस पर सपरिवार भक्तामर विधान में भाग लिया। विमर्श जागृति मंच के राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष एवं गोलालारिय समाज अध्यक्ष धर्मेंद्र कुमार जैन पोस्ट ऑफिस के अवतरण दिवस पर परिवार की ओर से यह आयोजन हुआ। <span style="color: #ff0000">पावई से पढ़िए, सोनल जैन की यह रिपोर्ट&#8230;.</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>पावई।</strong> रत्नात्रयगिरि अतिशय क्षेत्र पावई पहुंचकर सैकडों भक्तों ने समाज सेवी धर्मेंद्र जैन के अवतरण दिवस पर सपरिवार भक्तामर विधान में भाग लिया। विमर्श जागृति मंच के राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष एवं गोलालारिय समाज अध्यक्ष धर्मेंद्र कुमार जैन पोस्ट ऑफिस के अवतरण दिवस पर परिवार की ओर से अतिशय क्षेत्र रत्नात्रयगिरि पावई में नववर्ष के अवसर पर भक्तामर विधान किया गया। इस अवसर पर मूलनायक नमिनाथ भगवान के अभिषेक शांतिधारा पूजन के बाद आचार्य मानतुंगाचार्य द्वारा रचित एवं आचार्य सौरभ सागर जी महाराज द्वारा हिंदी में अनुवादित भक्तामर विधान के माध्यम से प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ भगवान के गुणों का गुणानुवाद भव्यता के साथ किया गया। आचार्य, भगवंतों का भी अर्घ्य चढ़ाया गया एवं पांच शिखरों वाले निर्माणाधीन जिनालय पर ध्वजारोहण और पौधरोपण का पुनीत कार्य महिला समिति की ओर से किया गया।</p>
<p><strong>इन सबकी मौजूदगी में हुआ आयोजन </strong></p>
<p>इस अवसर क्षेत्रीय परम संरक्षक, अतिशय क्षेत्र कमेटी, गोलालारिय समाज सेवा समिति, पार्श्वनाथ मंदिर कमेटी अध्यक्ष, मॉडल स्कूल संचालिका, चंद्रप्रभु महिला मंडल, गोलालारे महिला मंडल कार्याध्यक्ष, आईजा जिला प्रभारी सहित अनेकानेक साधर्मी बंधु क्षेत्र पर उपस्थित हुए। विधानोपरांत विधान आयोजक परिवार गुणमाला जैन धर्मेंद्रकुमार जैन पोस्ट ऑफ़िस, कोमल जैन, आस्था जैन, आर्जव जैन परिवार की ओर से क्षेत्र पर पधारे सभी साधर्मी बंधुओं को वात्सल्य भोज कराया गया।</p>
<p><strong>विजय जैन जमसारा का किया सम्मान </strong></p>
<p>विधान प्रस्तुति पंडित महेश जैन, राजीव कुमार जैन, मनोज केशरी की ओर से विशिष्ट भजनों के माध्यम से की गई। विगत 15 दिनों से लगातार क्षेत्र पर रहकर ही देव शास्त्र गुरु की आराधना कर रहे क्षेत्र कार्याध्यक्ष विजय जैन जमसारा का सम्मान गोलालारिय समाज सेवा समिति की ओर से किया गया।</p>
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		<title>कर्म और अध्यात्म के आद्य उपदेष्टा ऋषभदेव : शिक्षा आगे बढ़ाने के लिए अनिवार्य होती हैं </title>
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		<pubDate>Sat, 22 Mar 2025 07:52:09 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ के जन्म कल्याणक पर जगह-जगह कार्यक्रम होंगे। इस अवसर पर विविध जानकारी साझा की जा रही है। ललितपुर से डॉ. सुनील जैन &#8216;संचय&#8217; की यह खबर&#8230; ललितपुर। चैत्र कृष्ण नवमी को तीर्थंकर ऋषभदेव जन्मकल्याणक जैन समुदाय में हर्ष, उल्लास के साथ श्रद्धा पूर्वक मनाया जाता है। इस दिन प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव (आदिनाथ) [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ के जन्म कल्याणक पर जगह-जगह कार्यक्रम होंगे। इस अवसर पर विविध जानकारी साझा की जा रही है। <span style="color: #ff0000">ललितपुर से डॉ. सुनील जैन &#8216;संचय&#8217; की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>ललितपुर।</strong> चैत्र कृष्ण नवमी को तीर्थंकर ऋषभदेव जन्मकल्याणक जैन समुदाय में हर्ष, उल्लास के साथ श्रद्धा पूर्वक मनाया जाता है। इस दिन प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव (आदिनाथ) का जन्म हुआ था। राजा नाभिराय और उनकी पत्नी रानी मरूदेवी से चैत्र कृष्ण नवमी के दिन मति, श्रुत और अवधिज्ञान के धारक पुत्र का जन्म अयोध्या में राजघराने में हुआ था। इंद्रों ने बालक का सुमेरू पर्वत पर अभिषेक महोत्सव करके ‘ऋषभ’ यह नाम रखा। जैन परंपरा में मान्य चौबीस तीर्थंकरों की श्रृंखला में भगवान ऋषभदेव का नाम प्रथम स्थान पर एवं अंतिम तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी हैं। तीर्थंकर ऋषभदेव भारतीय संस्कृति के आद्य प्रणेता माने जाते हैं। वेदों, उपनिषदों और पुराणों में समागत उनके उल्लेख यह कहने के लिए पर्याप्त हैं कि वे ऐसे महापुरूष थे। जिन्होंने मानव समुदाय को कृषि, लेखन, व्यापार, शिल्प, युद्ध और विद्या की शिक्षा दी। किसी भी व्यक्ति और समुदाय के लिए इन प्रकल्पों की शिक्षा आगे बढ़ाने के लिए अनिवार्य होती हैं। विश्व के प्राचीनतम लिपिबद्ध धर्म ग्रंथों में से एक वेद में तथा श्रीमद्भागवत इत्यादि में आए भगवान ऋषभदेव के उल्लेख तथा विश्व की लगभग समस्त संस्कृतियों में ऋषभदेव की किसी न किसी रूप में उपस्थिति जैन धर्म की प्राचीनता और भगवान ऋषभदेव की सर्वमान्य स्थिति को व्यक्त करती है।</p>
<p><strong>भरत के नाम से इस देश का नामकरण</strong></p>
<p>नवीं शती के आचार्य जिनसेन के आदि पुराण में तीर्थकर ऋषभदेव के जीवन चरित्र का विस्तार से वर्णन है। भारतीय संस्कृति के इतिहास में ऋषभदेव ही एक ऐसे आराध्यदेव हैं, जिसे वैदिक संस्कृति तथा श्रमण संस्कृति में समान महत्व प्राप्त है। यह गौरव की बात है कि इन्हीं प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव के ज्येष्ठ पुत्र भरत के नाम से इस देश का नामकरण ‘भारतवर्ष’ हुआ। कुछ विद्वान भी संभवतः इस तथ्य से अपरिचित होंगे कि आर्यखंड रूप इस भारतवर्ष का एक प्राचीन नाम नाभिखंड ‘अजनाभवर्ष’ भी इन्हीं ऋषभदेव के पिता ‘नाभिराय’ के नाम से प्रसिद्ध था।</p>
<p><strong>दुनिया को त्याग का मार्ग बताया</strong></p>
<p>जैन धर्म के प्रवर्तक प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव इस विश्व के लिए उज्जवल प्रकाश हैं। उन्होंने कर्मों पर विजय प्राप्त कर दुनिया को त्याग का मार्ग बताया। भगवान ऋषभदेव की शिक्षाएं मानवता के कल्याण के लिए हैं। उनके उपदेश आज भी समाज के विघटन, शोषण, साम्प्रदायिक विद्वेष एवं पर्यावरण प्रदूषण को रोकने में सक्षम एवं प्रासंगिक हैं। भारतीय संस्कृति के प्रणेता एवं जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव की जनकल्याणकारी शिक्षा द्वारा प्रतिपादित जीवन-शैली, आज के चुनौती भरे माहौल में उनके सामाजिक एवं राजनीतिक विचारों की प्रासंगिकता है।</p>
<p>सामाजिक संरचना में उन्होंने प्रजाजनों को श्रेणियों में विभाजित करते हुए उनको अपने-अपने कर्तव्य अधिकार तथा उपलब्धियों के बारे में प्रथम मार्गदर्शन किया। सर्वांगीण विकास के मूल आधारभूत तत्वों का विवेचन कर वास्तविक समाजवादी व्यवस्था का बोध कराया।</p>
<p><strong>बहत्तर कलाओं का ज्ञान प्रदर्शित किया</strong></p>
<p>प्रत्येक वर्ण व्यवस्था में पूर्ण सामंजस्य निर्मित करने हेतु तथा उनके निर्वाह के लिए आवश्यक मार्गदर्शक सिद्धांत, प्रतिपादन करते हुए स्वयं उसका प्रयोग या निर्माण करके प्रात्याक्षिक भी किया। अश्व परीक्षा, आयुध निर्माण, रत्न परीक्षा, पशु पालन आदि बहत्तर कलाओं का ज्ञान प्रदर्शित किया । उनके द्वारा प्रदत्त शिक्षाओं का वर्गीकरण कुछ इस प्रकार से किया जा सकता है- 1.असि-शस्त्र विद्या, 2. मसि-पशुपालन, 3. कृषि- खेती, वृक्ष, लता वेली, आयुर्वेद, 4.विद्या- पढना, लिखना, 5. वाणिज्य- व्यापार, वाणिज्य, 6.शिल्प- सभी प्रकार के कलाकारी कार्य।</p>
<p><strong>कर्मयोग की रसधारा बही</strong></p>
<p>जैन परंपरा के अनुसार तीर्थंकर ऋषभदेव ने कृषि का सूत्रपात किया। अनेकानेक शिल्पों की अवधारणा की। कृषि और उद्योग में अद्भुत सामंजस्य स्थापित किया कि धरती पर स्वर्ग उतर आया। कर्मयोग की वह रसधारा बही कि उजड़ते और वीरान होते जन जीवन में सब ओर नव बंसत खिल उठा। जनता ने अपना स्वामी उन्हेें माना और धीरे-धीरे बदलते हुए समय के अनुसार वर्ण व्यवस्था, दण्ड व्यवस्था, विवाह आदि सामाजिक व्यवस्था का निर्माण हुआ।</p>
<p><strong>अनेक गुणों के ज्ञान से अलंकृत किया</strong></p>
<p>ऋषभदेव ने महिला साक्षरता तथा स्त्री समानता पर भी महत्वपूर्ण कार्य किया है। अपनी दोनों पुत्रियों को ब्राह्मी को अक्षर ज्ञान के साथ साथ व्याकरण, छंद, अलंकार, रूपक, उपमा आदि के साथ स्त्रियोचित अनेक गुणों के ज्ञान से अलंकृत किया।लिपि विद्या को ऋषभदेव ने विशेष रूप से ब्राह्मी को सिखाया। इसी के आधार पर उस लिपि का नाम ब्राह्मी लिपी पड़ गया। ब्राह्मी लिपी विश्व की आद्य लिपी है। दूसरी पुत्री सुंदरी को अंकगणतीय ज्ञान से पुरस्कृत किया।</p>
<p><strong>क्रांतिकारी परिवर्तन देखने को मिलेगे</strong></p>
<p>आज भी उनके द्वार निर्मित व्याकरणशास्त्र तथा गणितिय सिद्धांतो ने महानतम ग्रंथों में स्थान प्राप्त किया है। आज जब भारत सरकार बेटी पढ़ाओ, बेटी बढ़ाओ का अभियान चला रही है, ऐसी में ऋषभदेव द्वारा अपनी पुत्रियों को दी गई शिक्षा और अधिक प्रासंगिक हो जाती है। उनके द्वारा दी गई बेटियों के शिक्षा संदेश को यदि अमल में लाया जाए तो इस अभियान में क्रांतिकारी परिवर्तन देखने को मिलेगे।</p>
<p>प्रशासनिक कार्य में इस भारत भूमि को उन्होंने राज्य, नगर, खेट, कर्वट, मटम्ब, द्रोण मुख तथा संवाहन में विभाजित कर सुयोग्य प्रशासनिक, न्यायिक अधिकारों से युक्त राजा, माण्डलिक, किलेदार, नगर प्रमुख आदि के सुर्पुद किया। आपने आदर्श दण्ड संहिता का भी प्रावधान कुशलता पूर्वक किया।</p>
<p><strong>निरासक्त व्यक्ति की यह आध्यात्मिक दृष्टि है</strong></p>
<p>तीर्थंकर ऋषभदेव अध्यात्म विद्या के भी जनक रहे हैं। उनके पुत्र भरत और बाहुबली का कथन इस तथ्य का प्रमाण है कि संसारी व्यक्ति कितना रागी-द्वेषी रहता है, जो अपने सहोदर के भी अधिकार को स्वीाकर नहीं कर पाता। दोनों भाईयों के बीच हुआ युद्ध हर परिवार के युद्ध का प्रतिबिम्ब है। बाहुबली का स्वाभिमान हर व्यक्ति के स्वाभिमान का दिग्दर्शक है। निरासक्त व्यक्ति की यह आध्यात्मिक दृष्टि है। तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव की जीवन शैली, दर्शन एवं आर्दर्शों का प्रचार-प्रसार भारतीय युवा पीढ़ी के लिए और भी अधिक प्रासंगिक और महत्वपूर्ण है क्योंकि पाश्चात्य सभ्यता के प्रभाव से इनमें भौतिकवादी विचारों एवं आदर्शों को आगे ले जाने का मार्ग प्रशस्त हो रहा है जिसे पुरजोर प्रयास से साथ रोकना अनिवार्य है।</p>
<p><strong>सामाजिक जीवन की गुणवत्ता को बढ़ा सकते हैं</strong></p>
<p>पाश्चात्य सभ्यता का यह मार्ग निःसंदेह भारतीय संस्कृति और सभ्यता के मार्ग से काफी भिन्न है और संभवतः हमारे मानवीय मूल्यों के विपरीत भी है।</p>
<p>आज मानवता के सम्मुख भौतिकवादी चुनौतियों के कारण नाना प्रकार के सामाजिक एवं मानसिक तनाव तथा संकट व्यक्तिगत, सामाजिक एवं भू-मंडल स्तर पर दृष्टिगोचर हो रहे हैं। भगवान ऋषभदेव द्वारा बताई गई जीवन शैली की हमारी सामाजिक एवं राजनैतिक व्यवस्था में काफी प्रासंगिकता एवं महत्ता है। उनके द्वारा प्रतिपादित ज्ञान-विज्ञान की विभिन्न क्षेत्रों में ऐसी झलकियां मिलती हैं जिन्हें रेखांकित करके हम अपने सामाजिक एवं राजनैतिक जीवन की गुणवत्ता को बढ़ा सकते हैं।</p>
<p><strong>ऋषभदेव ने भारतीय संस्कृति के लिए अवदान दिया</strong></p>
<p>भगवान ऋषभदेव ने एक ऐसी समाज व्यवस्था दी, जो अपने आप में परिपूर्ण तो थी ही साथ ही जिसकी पृष्ठ भूमि में अध्यात्म पर आधारित नैतिकता की नींव भी थी। तीर्थंकर ऋषभदेव ने भारतीय संस्कृति के लिए जो अवदान दिया वह इतना महत्त्वपूर्ण है कि उसे जैन ही नहीं जैनेतर भारतीय परंपरा में आज भी कृतज्ञता पूर्वक स्मरण करती है और युगों तक करती रहेगी। तीर्थंकर ऋषभदेव द्वारा प्रतिपादित सिद्धांत तथा शिक्षाएं आज पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक और उपयोगी हैं तथा भविष्य के विश्व संस्कृति के लिए आधार हैं।</p>
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		<title>आदिनाथ भगवान की निकलेगी रजत पालकी यात्रा : स्वर्ण, रजत कलशों से होंगे अभिषेक   </title>
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		<pubDate>Sat, 22 Mar 2025 06:01:02 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव की जन्म जयंती 23 मार्च रविवार को धूमधाम से मनाएंगे। छत्रपति नगर में मूल नायक भगवान आदिनाथ के अभिषेक के बाद बड़े बाबा आदिनाथ भगवान के स्वर्ण, रजत कलशों से अभिषेक होंगे। शोभायात्रा निकाली जाएगी। इंदौर से पढ़िए यह खबर&#8230; इंदौर। प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव की जन्म जयंती 23 मार्च रविवार [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव की जन्म जयंती 23 मार्च रविवार को धूमधाम से मनाएंगे। छत्रपति नगर में मूल नायक भगवान आदिनाथ के अभिषेक के बाद बड़े बाबा आदिनाथ भगवान के स्वर्ण, रजत कलशों से अभिषेक होंगे। शोभायात्रा निकाली जाएगी। <span style="color: #ff0000">इंदौर से पढ़िए यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव की जन्म जयंती 23 मार्च रविवार को धूमधाम से मनाएंगे। राजेश जैन दद्दू ने बताया कि इस पावन दिवस पर श्री आदिनाथ दिगंबर जैन जिनालय छत्रपति नगर में मूल नायक भगवान आदिनाथ का सुबह नित्य नियम, पूजन, अभिषेक के बाद बड़े बाबा आदिनाथ भगवान के स्वर्ण, रजत कलशों से अभिषेक होंगे। ट्रस्ट अध्यक्ष भूपेंद्र जैन ने बताया कि रजत पालकी में भगवान आदिनाथ स्वामी को विराजमान कर शोभायात्रा में पुरुष वर्ग श्वेत वस्त्र एवं महिलाएं केसरिया साड़ी में मंगल कलश लेकर यात्रा में शामिल होंगी। दिलीप जैन ने कहा कि संध्या काल में संगीतमय आरती के साथ ही आदिनाथ भगवान की स्तुति एवं भक्तामर पाठ किया जाएगा।</p>
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		<title>तीर्थ संरक्षणी महासभा मध्यप्रदेश ने मनाया पुरातत्व दिवस : उठाई मांग पुरातत्व की जैन संपदा के संरक्षण की </title>
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		<pubDate>Wed, 23 Oct 2024 16:50:48 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[अंतरराष्ट्रीय पुरातत्व दिवस के अवसर पर इंदौर केंद्रीय संग्रहालय में पुरातत्व की धरोहरों के बीच जैन संस्कृति के संरक्षण पर चर्चा की गई। इस मौके पर  तीर्थ संरक्षणी महासभा ने उपसंचालक के सामने पुरातत्व की जैन संपदा के संरक्षण की मांग उठाई और उन्हें शॉल दुप्पटा ओढ़ाकर सम्मानित किया। पढ़िए इंदौर  से राजेश जैन दद्दू [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>अंतरराष्ट्रीय पुरातत्व दिवस के अवसर पर इंदौर केंद्रीय संग्रहालय में पुरातत्व की धरोहरों के बीच जैन संस्कृति के संरक्षण पर चर्चा की गई। इस मौके पर  तीर्थ संरक्षणी महासभा ने उपसंचालक के सामने पुरातत्व की जैन संपदा के संरक्षण की मांग उठाई और उन्हें शॉल दुप्पटा ओढ़ाकर सम्मानित किया। <span style="color: #ff0000">पढ़िए इंदौर  से राजेश जैन दद्दू की यह खबर&#8230;.</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर.</strong>अंतरराष्ट्रीय पुरातत्व दिवस के अवसर पर तीर्थ संरक्षणी महासभा मध्य प्रदेश की ओर से इंदौर स्थित केंद्रीय संग्रहालय में पहुंचकर उप संचालक श्री प्रकाश परांजपे से उनके कार्यालय में भेंट की और संस्था की ओर से सभी पदाधिकारियों ने उनका स्वागत-सम्मान किया। महासभा के मीडिया प्रभारी राजेश जैन दद्दू एवं राष्ट्रीय उपाध्यक्ष टी.के. वेद ने उनसे प्रदेश में जैन संस्कृति की सुरक्षा के बारे में चर्चा की।</p>
<p><strong>इन्होंने कही अपनी बात</strong></p>
<p>इस अवसर पर देवेंद्र सेठी ने अपनी बात कही। कैलाश लुहाडिया ने कहा कि हमारे इंदौर जिले के आसपास धार, मांडव, नालछा, शाजापुर के आसपास जैन धरोहर और जैन संस्कृति बिखरी पड़ी है। हर जगह खुदाई में जैन मूर्तियां पाई जाती हैं। हमारा अनुरोध है जैन संस्कृति को सहेजने में, सुरक्षा में सहयोग करें एवं जहां जिस समाज के हक का हो उसे समाज को प्रदान किया जाए। उप संचालक परांजपे ने इस पर सहमति प्रदान की एवं कहा कि मध्यप्रदेश शासन सदैव सहयोग के लिए तत्पर है।</p>
<p><strong>पुरातत्व की संपदा देख हुए आनंदित</strong></p>
<p>उप संचालक परांजपे ने पूर्ण सहयोग करते हुए कहा कि बहुत जगह हमने जैन मूर्तियां को पूर्ण सुरक्षा के साथ रखा हुआ है एवं इंदौर स्थित संग्रहालय में भी उन्होंने नेमिनाथ भगवान एवं प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ भगवान की प्रतिमाओं के दर्शन करवाए, जो उन्होंने संग्रहालय में सुरक्षित रखी हुई है। इसके साथ ही अनेक जैन संस्कृति भी वहां पर पाई गई। जिन्हें समाज शासन ने सुरक्षित रखा हुआ है। इसके लिए शासन का धन्यवाद ज्ञापित किया गया। उप संचालक परांजपे का माला दुपट्टा से स्वागत किया गया।</p>
<p><strong>यह भी रहे मौजूद</strong></p>
<p>इस अवसर पर देवेंद्र अंजू सेठी, राकेश ज्योति पाटनी, नरेश अनिता सेठिया, अमित सीमा जैन आदि सदस्य उपस्थित थे। आभार प्रांतीय अध्यक्ष देवेंद्र सेठी ने माना। प्रांतीय प्रचार प्रमुख राजेश मुक्ता जैन दद्दु और डॉ जैनेंद्र जैन, कैलाश दमयंती लुहाडिया का विशेष सहयोग रहा।</p>
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		<title>आदिनाथ भगवान के जनकल्याणक पर भव्य दीपदान कर मनाया गया उत्सव महिलाओं ने जनकल्याण के उपलक्ष्य में रचाई मेहंदी  </title>
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		<pubDate>Wed, 03 Apr 2024 13:57:34 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[दिगम्बर जैन सोशल ग्रुप के तत्वधान में प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ भगवान के जन्म कल्याणक की पूर्व संध्या पर भक्तमर पाठ के उच्चारण के साथ दीपदान का कार्यक्रम जूना मंदिरजी में बड़े धूमधाम से मनाया गया। पढ़िए रितेश अग्रवाल की रिपोर्ट ……. प्रतापगढ़ । दिगम्बर जैन सोशल ग्रुप के तत्वधान में प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ भगवान के [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>दिगम्बर जैन सोशल ग्रुप के तत्वधान में प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ भगवान के जन्म कल्याणक की पूर्व संध्या पर भक्तमर पाठ के उच्चारण के साथ दीपदान का कार्यक्रम जूना मंदिरजी में बड़े धूमधाम से मनाया गया। <span style="color: #ff0000">पढ़िए रितेश अग्रवाल की रिपोर्ट …….</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>प्रतापगढ़ ।</strong> दिगम्बर जैन सोशल ग्रुप के तत्वधान में प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ भगवान के जन्म कल्याणक की पूर्व संध्या पर भक्तमर पाठ के उच्चारण के साथ दीपदान का कार्यक्रम जूना मंदिरजी में बड़े धूमधाम से मनाया गया। तेजस तलाटी ने बताया की सोशल ग्रुप के 375 सदस्यो ने मुनि 108 श्री सुयंत सागर एवं मुनि 108 सुदत सागर महाराज के सानिध्य ग्रुप के 375 सदस्यो ने दीप दान किया।</p>
<p><iframe title="महिलाओं  ने जनकल्याण के उपलक्ष्य में रचाई  मेहंदी" width="1320" height="743" src="https://www.youtube.com/embed/bHJ143xOXkM?feature=oembed" frameborder="0" allow="accelerometer; autoplay; clipboard-write; encrypted-media; gyroscope; picture-in-picture; web-share" referrerpolicy="strict-origin-when-cross-origin" allowfullscreen></iframe></p>
<p>मीडिया प्रभारी रितेश अग्रवाल ने बताया की जन्म कल्याणक महोत्सव पूर्व संध्या पर आयोजित कार्यक्रम के पूर्व श्रीजी की आरती और पद्म प्रभु चालीसा का पाठ मुनि श्री के मुख से पढ़ाया गया। तत्पश्चात मुनिराज की आरती की गई। कार्यक्रम के पश्चात सभी महिलाओं ने जनकल्याण के उपलक्ष में मेहंदी लगाई</p>
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