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	<title>पुस्तक &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<description>ताज़ा खबरे हिन्दी में</description>
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	<title>पुस्तक &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>भगवान महावीर के निर्वाण महोत्सव पर पुरस्कार वितरण समारोह संपन्नः राज्यपाल श्री राधाकृष्णन् को डॉ.कल्याण गंगवाल ने शाकाहार पर पुस्तक भेंट की </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 05 Feb 2025 09:28:02 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[महाराष्ट्र सरकार द्वारा भगवान महावीर स्वामी के 2550 में निर्वाण महोत्सव के अंतर्गत निर्वाण कल्याणक महोत्सव समिति ने भगवान महावीर स्वामी पर आधारित एक निबंध प्रतियोगिता का आयोजन किया। इसमें इसमें 16 लाख बच्चो ने अपनी सहभागिता की। इस कमेटी में सरकार की ओर से शाकाहार प्रचारक डॉक्टर कल्याण गंगवाल दिगंबर समाज के. प्रतिनिधी के [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>महाराष्ट्र सरकार द्वारा भगवान महावीर स्वामी के 2550 में निर्वाण महोत्सव के अंतर्गत निर्वाण कल्याणक महोत्सव समिति ने भगवान महावीर स्वामी पर आधारित एक निबंध प्रतियोगिता का आयोजन किया। इसमें इसमें 16 लाख बच्चो ने अपनी सहभागिता की। इस कमेटी में सरकार की ओर से शाकाहार प्रचारक डॉक्टर कल्याण गंगवाल दिगंबर समाज के. प्रतिनिधी के रुप में सम्मिलित हुए थे। महाराष्ट्र सरकार के राज भवन के दरबार हॉल में एक विशाल समारोह आयोजित किया गया। जिसमें मुख्य अतिथि के रूप में महाराष्ट्र सरकार के राज्यपाल के साथ कैबिनेट मंत्री, विधायक, संयोजक,एवं दिगंबर जैन समाज की ओर से समिति सदस्य मौजूदगी में यह आयोजन हुआ। <span style="color: #ff0000">पढ़िए पंढरपुर से अभिषेक अशोक पाटील की यह पूरी खबर&#8230; </span></strong></p>
<hr />
<p><strong>पंढरपुर (महाराष्ट्र)</strong> महाराष्ट्र सरकार द्वारा भगवान महावीर स्वामी के 2550 में निर्वाण महोत्सव के अंतर्गत भगवान महावीर स्वामी 2550 निर्वाण कल्याणक महोत्सव समिति का गठन कर इसे मनाने का निर्णय लिया गया था। इस हेतु भगवान महावीर स्वामी पर आधारित एक निबंध प्रतियोगिता का आयोजन भी किया गया था। इसमें आश्चर्य की बात यह है कि इसमें 16 लाख बच्चो ने सहभाग लिया। इस कमेटी में सरकार की ओर से शाकाहार प्रचारक डॉ. कल्याण गंगवाल दिगंबर समाज के. प्रतिनिधी के रुप में सम्मिलित हुए थे।</p>
<p><strong>महाराष्ट्र सरकार के राज भवन के दरबार हॉल समारोह हुआ</strong></p>
<p>यह जानकारी देते हुए समिति के डॉक्टर कल्याण गंगवाल ने बताया कि महाराष्ट्र सरकार के राज भवन के दरबार हॉल में एक विशाल समारोह आयोजित किया गया। यह आयोजन 2 फरवरी 2025 रविवार को आयोजित हुआ था। महावीर निर्वाण महोत्सव समिति की ओर से निबंध प्रतियोगिता के पुरस्कार वितरण हेतु यह आयोजन किया गया था। जिसमें मुख्य अतिथि के रूप में महाराष्ट्र सरकार के राज्यपाल श्री राधाकृष्णन् के साथ कैबिनेट मंत्री मंगल प्रभात लोढ़ा, विधायक चैनसुख संचेती, संयोजक हितेंद्र मोटा, श्री ललित गांधी एवं दिगंबर जैन समाज की ओर से समिति सदस्य कल्याण गंगवाल की मौजूदगी में यह आयोजन हुआ।</p>
<p><strong>प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने की थी घोषणा </strong></p>
<p>भगवान महावीर के 2550 वे निर्वाण महोत्सव के अंतर्गत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने घोषणा की थी कि यह आयोजन संपूर्ण भारतवर्ष में मनाया जाए। इस कारण महाराष्ट्र सरकार द्वारा भी आयोजन किया गया। इस आयोजन का उद्देश्य भगवान महावीर के सिद्धांत अहिंसा जीव दया का प्रचार जन-जन तक हो।</p>
<p><strong>मुस्लिम समाज के विद्यालयों की महत्वपूर्ण सहभागिता </strong></p>
<p>इसमें अन्य समाजों से हटकर मुस्लिम समाज के विद्यालयों ने भी सहभागिता की। इस समाज की बेटियों को भी सम्मानित किया गया। उन्होंने कहा कि इस प्रतियोगिता में 90 प्रतिशत से अधिक जैन समाज से हटकर अन्य वर्ग के बच्चों ने ज्यादा भाग लिया। इस प्रतियोगिता में 25 लाख रुपए के इनाम वितरित किए गए।</p>
<p><strong>लाखों के पुरस्कार वितरित किए</strong></p>
<p>डॉ .गंगवाल ने प्रसन्नता जाहिर करते हुए बताया कि इसमें प्रथम पुरस्कार पांच लाख पचपन हजार पांच सौ पचपन दूसरा पुरस्कार, चार लाख चालीस हजार चार सौ चवालीस तीसरा पुरस्कार था। तीन लाख तैंतीस हजार तीन सौ तैंतीस।</p>
<p><strong>राज्यपाल महोदय को पुस्तक भेंट की</strong></p>
<p>इस समिति में डॉक्टर कल्याण गंगवाल ने बहुत बड़ी भूमिका निभाई एवं दिगंबर जैन समाज का प्रतिनिधित्व सुचारू रूप से किया। इस अवसर पर डॉक्टर गंगवाल ने राज्यपाल महोदय को अपनी पुस्तक ‘सुखी जीवन का आधार शाकाहार‘ प्रदान की।</p>
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		<title>पुस्तक समीक्षा :   प्राचीन टीका शैली के पुनर्स्थापन का श्रेष्ठ कार्य है &#8216;समख्याति टीका&#8217;</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 20 Jul 2022 08:05:11 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[समाचार]]></category>
		<category><![CDATA[पुस्तक]]></category>
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					<description><![CDATA[प्रो. श्रीयांश कुमार की अनूठी कृति है समण सुत्तं-&#8216;समख्यातिसंस्कृतटीकोपेतम्&#8217; डॉ. सुनील जैन, ललितपुर  केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, जयपुर के जैनदर्शन विभाग में आचार्य एवं संकाय प्रमुख, संस्कृत-प्राकृत भाषा के वरिष्ठ मनीषी प्रो. श्रीयांश कुमार सिंघई ने &#8216;समख्यातिसंस्कृतटीकोपेतम्&#8217;  टीका लिखकर बहुत ही महत्वपूर्ण कार्य किया है। इस महत्वपूर्ण कृति का विगत दिनों लोकार्पण प्रो. श्रीनिवास जी बरखेड़ी, [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p dir="ltr"><em><strong>प्रो. श्रीयांश कुमार की अनूठी कृति है समण सुत्तं-&#8216;समख्यातिसंस्कृतटीकोपेतम्&#8217;</strong></em></p>
<p dir="ltr"><span style="color: #ff0000;">डॉ. सुनील जैन, ललितपुर </span></p>
<p dir="ltr">केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, जयपुर के जैनदर्शन विभाग में आचार्य एवं संकाय प्रमुख, संस्कृत-प्राकृत भाषा के वरिष्ठ मनीषी प्रो. श्रीयांश कुमार सिंघई ने &#8216;समख्यातिसंस्कृतटीकोपेतम्&#8217;  टीका लिखकर बहुत ही महत्वपूर्ण कार्य किया है। इस महत्वपूर्ण कृति का विगत दिनों लोकार्पण प्रो. श्रीनिवास जी बरखेड़ी, कुलपति केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय दिल्ली ने प्रो.गयाचरण त्रिपाठी, सुरेश जी सोनी, प्रो.बैद्यनाथ लाभ जी कुलपति नालन्दा बिहार विश्वविद्यालय नालंदा, प्रो.एसपी शर्मा एवं प्रो. जितेन्द्र भाई शाह जी के साथ किया है।<br />
कृति का प्रकाशन परमपूज्य 108 आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज के आशीर्वाद से परमपूज्य मुनि श्री प्रणम्यसागरजी महाराज के रजत जयंती वर्ष के अवसर पर किया गया है। कृति के प्रारंभ में परम पूज्य आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी महाराज का शुभाशीष प्रकाशित है। अपने आशीर्वचन में उन्होंने लिखा है- प्रस्तुत टीकाकार आगमों की गहराइयों को स्पर्श करने वाले मनीषी विद्वान्, प्रौढ़ वक्ता, कुशल स्याद्वाद विद्या अध्येता, अल्पवय में तत्त्वनिर्णय में ख्याति प्राप्त पण्डित प्रवर श्रीयांशकुमार जी सिंघई जयपुर ने टीका जगत् में सम्प्रति अभिनव नामांकन कर दिया है। प्राचीन टीका शैली के पुनर्स्थापन का श्रेष्ठ कार्य &#8216;समख्याति टीका&#8217; है।<br />
&#8216;प्ररोचना&#8217; प्रख्यात मनीषी एवं प्रोफेसर दयानंद भार्गव जयपुर ने संस्कृत में लिखी है। प्रस्तावना हिंदी के साथ ही अंग्रेजी में 50 पृष्ठों में लिखी गई है जो इस कृति को और अधिक पठनीय बनाती है। कवर पृष्ठ 2 पर समणसुतं के संकलनकर्ता परम पूज्य क्षुल्लक जिनेन्द्र &#8220;वर्णी&#8221; जी महाराज का परिचय दिया गया है, वहीं कवर पृष्ठ 3 पर कृति के संस्कृत टीकाकार प्रोफेसर श्रीयांशकुमारजी सिंघई का परिचय दिया गया है। प्रो. श्रीयांशकुमार जी ने अनेक पारिवारिक एवं अन्य समस्याओं को पार करते हुए पांच वर्ष में यह महत्वपूर्ण कार्य तत्परता, कर्मठता, निष्ठा के साथ संपादित कर दुनिया को यह अनूठी कृति दी है।<br />
बताते चलें कि &#8216;समणसुतं&#8217; प्राकृत वाङ्मय का एक ऐसा ग्रन्थ है जिसमें अनेक प्राकृत ग्रन्थों से चयनित 756 गाथा सूत्रों के संकलन से विषयवस्तु को प्रस्तुत किया गया है। &#8216;समण सुत्तं&#8217; नामक इस अपूर्व ग्रंथ को किसी ने लिखा नहीं है तथापि इसमें ऋषियों-महर्षियों के उपदेश संकलित होकर जिस असरकारक एवं व्यवस्थित क्रम में प्रस्तुत हुए हैं, उससे ग्रंथ की गरिमा प्रामाणिक परिधि में अपार हो गई है।<br />
लेखक प्रो. श्रीयांश ने ठीक ही लिखा है-दुःख विमुक्ति या आनन्दोपलब्धि के लिए यथार्थ पुरुषार्थ करने की चाह रखने वाले जिज्ञासु साधकों के लिए समणसुत्तं ग्रन्थ एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है ।</p>
<p dir="ltr">परम पूज्य श्री आचार्य विद्यासागरजी ने जैन गीता के रूप में समणसुत्त का हिन्द काव्यानुवाद करके इसके महत्त्व को उजागर किया है तो हिन्दी, अंग्रेजी आदि भाषाओं में अनुवाद के साथ इस ग्रन्थ का प्रकाश में आना भी इसे लोकप्रिय रचना के रूप में प्रस्थापित करता है। हालांकि, यह ग्रन्थ पठन &#8211; पाठन में वह महत्त्व नहीं पा सका है जो इसे मिलना चाहिए था।<br />
समत्व की अवधारणा और साधना को ख्यापित करते हुए समणसुत्तं का सम्पूर्ण उपदेश बीजरूप में है, गाथा सूत्रों में समाहित है। जिसे समझकर हम अपने सम स्वभाव को जान सकते हैं। हमारी चेतना में सत्य- असत्य आदि के विवेक का सूत्रपात हो और हम अपनी आत्मा के शाश्वत सत्य को जानकर अपने समता स्वभाव को जानने के लिए आकर्षित एवं प्रयत्नशील हों- इस भावना से बीजभूत उपदेश के स्रोतस्वरूप समणसुत्तं ग्रन्थ की संस्कृत टीका का नामकरण &#8216;समख्याति&#8217; शीर्षक से द्योतित किया गया है।<br />
प्रस्तावना में प्रो. सिंघई ने यह भी लिखा है-आगम का अभ्यास और अभ्युत्थान की लगन के सहारे ही यह &#8216;समख्याति&#8217; आपके हाथों में पहुंचा पा रहा हूं। मेरे प्रमाद से यदि कुछ अप्रिय लगे तो उसे आगम के आलोक में समझने का श्रम कीजिए और यदि त्रुटि है तो उसके प्रक्षालन हेतु मुझे सचेत करने का अनुग्रह भी अवश्य कीजिए।</p>
<p dir="ltr"><img fetchpriority="high" decoding="async" class="aligncenter wp-image-25499" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2022/07/IMG_20220711_200818-178x300.jpg" alt="" width="450" height="757" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2022/07/IMG_20220711_200818-178x300.jpg 178w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2022/07/IMG_20220711_200818-609x1024.jpg 609w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2022/07/IMG_20220711_200818-scaled.jpg 1522w" sizes="(max-width: 450px) 100vw, 450px" /></p>
<pre style="text-align: center;"><strong><span style="color: #ff0000;">कृति-समणसुतं- समख्यातिसंस्कृतटीकोपेतम्</span></strong>
<strong><span style="color: #ff0000;">टीकाकार एवं सम्पादन प्रो. श्रीयांश कुमार सिंघई</span></strong>
<strong><span style="color: #ff0000;">प्रथम संस्करण 2022  </span></strong>
<strong><span style="color: #ff0000;">ISBN <a style="color: #ff0000;" href="tel:9788195570669">978-81-955706-6-9</a></span></strong>
<strong><span style="color: #ff0000;">मूल्य 700 रुपए, US $ 15</span></strong>
<strong><span style="color: #ff0000;">पृष्ठ-  496  </span></strong>
<strong><span style="color: #ff0000;">प्राप्ति स्थान - बी ब्लॉक, सूर्यनगर, तारों की कूट , टोंक रोड, जयपुर -<a style="color: #ff0000;" href="tel:302029">302029</a></span></strong>
<strong><span style="color: #ff0000;">मोबाइल- <a style="color: #ff0000;" href="tel:9057506919">9057506919</a></span></strong>
<strong><span style="color: #ff0000;">मुद्रक देशना कम्प्यूटर्स, जयपुर</span></strong>
<strong><span style="color: #ff0000;">प्रकाशक: प्राच्यविद्या एवं जैन संस्कृति संरक्षण संस्थान, लाडनूं</span></strong></pre>
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		<title>सत्साहित्य जीवन का आधार है</title>
		<link>https://www.shreephaljainnews.com/sat-sahitya-jivan-ka-aadhar/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 18 Dec 2021 16:35:56 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[समाचार]]></category>
		<category><![CDATA[पुस्तक]]></category>
		<category><![CDATA[विशुद्ध सागर]]></category>
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					<description><![CDATA[• आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी के 50 वे स्वर्णिम जन्म दिवस पर आचार्यश्री पर केंद्रित पुस्तक पुण्यार्जक डॉ. विकास जैन को भेंट • आध्यात्म की ज्योति को जनसामान्य में आचार्यश्री ने प्रवाहित किया ललितपुर। आध्यात्मिक साहित्य सेवन में संयम, स्वास्थ्य मजबूत करने की अथाह शक्ति होती है।जैसा साहित्य हम पढ़ते हैं, वैसे ही विचार [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>• आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी के 50 वे स्वर्णिम जन्म दिवस पर आचार्यश्री पर केंद्रित पुस्तक पुण्यार्जक डॉ. विकास जैन को भेंट</strong></p>
<p><strong>• आध्यात्म की ज्योति को जनसामान्य में आचार्यश्री ने प्रवाहित किया</strong></p>
<p><strong>ललितपुर</strong>। आध्यात्मिक साहित्य सेवन में संयम, स्वास्थ्य मजबूत करने की अथाह शक्ति होती है।जैसा साहित्य हम पढ़ते हैं, वैसे ही विचार मन के भीतर चलते रहते हैं और उन्हीं से हमारा सारा व्यवहार प्रभावित होता है। वर्तमान विषम वातावरण में संत-साहित्य की उपादेयता बहुत है। अतः इस भीषण वर्तमान परिवेश में संतों की पीयूषवाणी जनसाधारण को सबल प्रदान कर सकती है। आज के मानव को परिज्ञान प्रदान कर, उसका पथप्रदर्शन कर, समाज को सशक्त, निर्दोष एवं कल्याणकारी मार्ग पर अग्रसर करना केवल संत साहित्य के सामाजिक आदर्शों के वरण से ही संभव है। &#8216;आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी का व्यक्तित्व-कृतित्व&#8217; महत्वपूर्ण व पठनीय शोध कृति है। आचार्यश्री के अवदान को राष्ट्रीय विद्वानों ने अपने लेखों से रेखांकित किया है।<br />
उक्त विचार नगर के सुप्रसिद्ध नवजात शिशु एवं बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. विकास जैन ने उनके परिवार के पुण्यार्जन से प्रकाशित कृति &#8216; आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी का व्यक्तित्व-कृतित्व&#8217; को कृति के संपादक डॉ. सुनील संचय से आचार्यश्री के 50वे जन्म दिवस पर प्राप्त करते हुए कहीं।<br />
कृति के संपादक डॉ. सुनील संचय ललितपुर ने बताया कि उक्त कृति में पूज्य मुनि श्री सुप्रभसागर जी महाराज एवं परम पूज्य मुनि श्री प्रणतसागर जी महाराज के सान्निध्य में मड़ावरा में आचार्य श्री विशुद्ध सागर महाराज व्यक्तित्व-कृतित्व विषय पर आयोजित राष्ट्रीय विद्वत संगोष्ठी में विद्वानों द्वारा प्रस्तुत शोधालेखों को प्रकाशित किया गया है। उक्त मुनिद्व्य का 2020 में ललितपुर में भी चातुर्मास हुआ था। हाल ही में प्रकाशित उक्त कृति के पुण्यार्जक बनने का सौभाग्य डॉ. विरधीचन्द्र जैन , लक्ष्मी जैन, चंद्रकुमार, हंसराज, दीपक जैन, मड़ावरा, डॉ विकास जैन ललितपुर, डॉ विशाल जैन परिवार ने प्राप्त किया है। आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी के 50वे जन्म दिवस 18 दिसम्बर के प्रसंग पर उक्त कृति -पुण्यार्जक डॉ. विकास जैन को भेंट की गई, जिसका सर्वप्रथम उन्होंने विमोचन किया। उक्त कृति का प्रकाशन उक्त मुनिद्व्य की प्रेरणा से किया गया है।<br />
कृति में मुनि श्री प्रणत सागर जी, डॉ रमेश जैन दिल्ली, प्रोफेसर अशोक वाराणसी , डॉ नरेंद्र गाजियाबाद, प्राचार्य निहालचंद बीना, ब्र. जय निशांत टीकमगढ़, पंडित विनोद रजवांस, डॉ विमल जयपुर, डॉ महेंद्र मनुज इंदौर, डॉ सुशील मैनपुरी, राजेन्द्र महावीर सनावद, डॉ पंकज भोपाल, डॉ सुनील संचय, शीतल चंद्र ललितपुर, संतोष शास्त्री साढूमल, डॉ सुमत उदयपुर, डॉ आशीष वाराणसी, सुनील शास्त्री, डॉ निर्मल जैन, मयंक अलीगढ़ आदि के संगोष्ठी में प्रस्तुत शोधालेख प्रकाशित किए गए हैं। प्रारंभ में आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी व मुनि श्री सुप्रभसागर जी के आशीर्वचन इसके बाद संपादकीय प्रकाशित है।<br />
श्रमण संस्कृति की गौरवशाली परंपरा में परम पूज्य आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी मुनिराज अपनी आगमोक्त चर्या और आध्यात्मिक चिंतन के द्वारा निरंतर आत्मसाधना व प्रभावना में संलग्न हैं। आप श्रमण परंपरा के विलक्षण और तपस्वी संत हैं। आपने समाज और संस्कृति को भी एक नई दिशा दिखाई है। आध्यात्मिक संत आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी महाराज ने आध्यात्म की धारा को जन-जन में प्रवाहित किया</p>
<p><strong>समाचार सौजन्य- डॉ. सुनील संचय,ललितपुर</strong></p>
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