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	<title>पावन वर्षायोग चातुर्मास &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>ज्ञान का प्रयोग कम और बुद्धि का प्रयोग अधिक हो : आचार्यश्री विनिश्चय सागरजी ने स्थितिकरण अंग पर डाली रोशनी  </title>
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		<pubDate>Tue, 12 Aug 2025 12:27:15 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[यह नगर का परम सौभाग्य है कि आचार्यश्री विनिश्चय सागर जी ससंघ यहां वर्षावास कर चातुर्मास कर रहे हैं। इस दौरान उनकी मंगल देशना से सकल दिगंबर जैन समाज धर्मलाभ ले रहा है। बड़ी संख्या में समाजजन उनके प्रवचनों का धर्मानंद ले रहे हैं। रामगंजमंडी से पढ़िए, अभिषेक जैन लुहाड़िया की यह खबर&#8230; रामगंजमंडी। यह [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>यह नगर का परम सौभाग्य है कि आचार्यश्री विनिश्चय सागर जी ससंघ यहां वर्षावास कर चातुर्मास कर रहे हैं। इस दौरान उनकी मंगल देशना से सकल दिगंबर जैन समाज धर्मलाभ ले रहा है। बड़ी संख्या में समाजजन उनके प्रवचनों का धर्मानंद ले रहे हैं। <span style="color: #ff0000">रामगंजमंडी से पढ़िए, अभिषेक जैन लुहाड़िया की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>रामगंजमंडी।</strong> यह नगर का परम सौभाग्य है कि आचार्यश्री विनिश्चय सागर जी ससंघ यहां वर्षावास कर चातुर्मास कर रहे हैं। इस दौरान उनकी मंगल देशना से सकल दिगंबर जैन समाज धर्मलाभ ले रहा है। बड़ी संख्या में समाजजन उनके प्रवचनों का धर्मानंद ले रहे हैं। मंगलवार को धर्मसभा में आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज ने स्थितिकरण अंग पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा मार्ग पाने के लिए मार्ग की व्यवस्था करनी पड़़ती है। मार्ग बनाना पड़ता है। जब मार्ग बनाने बैठते हैं तो बहुत सारे दृष्टिकोण रखने पड़़ते हैं। एक दृष्टिकोण से मार्ग नहीं बैठ सकता और बनाते-बनाते सभी पहलुओं को लागू करते हैं तब जाकर मार्ग बनता है।</p>
<p><strong>जहां आत्मा को अध्यात्म आनंद आता है</strong></p>
<p>आचार्यश्री ने प्रवचन में कहा कि व्यक्ति भौतिकवाद में इतना लग जाता है कि वो धर्म को बहुत पीछे छोड़ देता है। उन्होंने कहा विज्ञान भी पुदगल को संभालता है। बिगड़े को हुए पुदगल को संभालना विज्ञान का काम है। एक ऐसा विज्ञान भी है जो शरीर को नहीं संभालता धर्म को संभालता है, आत्मा को संभालता है। एक ऐसा विज्ञान है आत्मा को दिलाने वाला है, जहां आत्मा को अध्यात्म आनंद आता है। वह धर्म विज्ञान है, जब हमारे अंदर उतरता है तो उससे हमारी बुद्धि निखरती है, हमारे सोचने की शक्ति है वह बढ़ जाती है और सही दृष्टिकोण पर पहुंच जाती है।</p>
<p><strong>बुद्धि का प्रयोग बड़ी मुश्किल से हो पाता है</strong></p>
<p>बुद्धि बहुत छोटी सी चीज है जिसका काम है ज्ञान को प्रस्तुत करना ज्ञान जीव का विशेष गुण होता है। उन्होंने कहा कि ज्ञान का अकेला प्रयोग है और बुद्धि का प्रयोग नहीं है तो काम ठीक से नहीं होगा। उदाहरण के माध्यम से बताया कि 5 साल का बच्चा ज्ञान का प्रयोग तो करता है लेकिन, बुद्धि का प्रयोग नहीं करता है। अनपढ़ व्यक्ति ज्ञान का प्रयोग ज्यादा करता है बुद्धि का प्रयोग कम करता है। समझदार व्यक्ति यह प्रयास करता है ज्ञान का प्रयोग कम हो और बुद्धि का प्रयोग ज्यादा हो। हमें भी ज्ञान का प्रयोग कम बुद्धि का प्रयोग ज्यादा करना चाहिए।</p>
<p><strong>ऐसी जगह खड़े करना है, जहां से गिरने की संभावना न हो </strong></p>
<p>उन्होंने एक उदाहरण के माध्यम से बताया कि एक पिता ने अपने बेटे से कहा कि घोड़े को पानी दिखा कर लाओ तो बेटे ने ज्ञान का प्रयोग किया। घोड़े को तालाब के पास ले गया और घोड़े को पेड़ से बांध दिया। बेचारा घोड़ा पानी देखता रहा। घर पर लौटा पिता ने कहा पानी पिला दिया बेटे ने जवाब दिया कि आपने कहा था पानी दिखाना पानी पिलाने को नहीं कहा। उस समय ज्ञान का प्रयोग हुआ, बुद्धि का प्रयोग नहीं हुआ। बेटा अगर बुद्धि का प्रयोग करता तो यह समझता घोड़े को पानी नहीं दिखाया जाता पिलाया जाता है। बुद्धि का प्रयोग बड़ी मुश्किल से हो पाता है। बहुत पुण्य चाहिए बुद्धि का प्रयोग गिरते को उठाने के लिए करना लेकिन ऐसी जगह खड़ा नहीं करना की वह पुनः गिर जाए ऐसी जगह खड़े करना है जहां से गिरने की संभावना समाप्त हो जाए।</p>
<p><strong>राग अगर अंदर दधक जाता है तो सारी अच्छाई समाप्त हो जाती है </strong></p>
<p>आचार्य श्री ने राग के विषय में प्रकाश डालते हुए कहा कि राग यदि अंदर दधक जाता है तो सारी अच्छाई समाप्त हो जाती है और दृष्टिकोण में वह राग ही बैठ जाता है। राग की महिमा बड़ी अलग है। अगर गंदगी पर हो जाए तो गंदगी भी अच्छी लगती है। राग यह विचार ही नहीं कर पाता। यह हमारे लिए योग्य है या अयोग्य है। गुरु के कर्तव्य के विषय में कहा कि गुरु का कर्तव्य है की शिष्य को तब तक संभाले तब तक संभाले जब तक गुरु का अहित न हो।</p>
<p><strong>जो तारीफ के योग्य है उसकी तारीफ होगी </strong></p>
<p>गुरु बड़ी टेढ़ी खीर होते हैं तारीफ करते करते डांटने लग जाते हैं। जो तारीफ के योग्य है उसकी तारीफ होगी और जो डांटने योग्य है डांट तो पड़ेगी। ऐसा नहीं हो सकता कि गलती में भी तारीफ करते जाए और अच्छाई में भी तारीफ करते जाए ऐसा नहीं हो सकता। वह समझाते हैं स्थितिकरण करते हैं कि वह धर्म में स्थापित हो। किसी के हृदय में परिवर्तन करा देना यह बहुत बड़ी बात होती है। आपने विचार, भावों और क्रियाओं में परिवर्तन करा दिया है तो आपने बहुत बड़ा काम किया है।</p>
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		<title>किसी की आस्था को ठगना स्वयं को ठगने जैसा : आचार्य श्री विनिश्चय सागर जी ने उपगुहन अंग पर डाला प्रकाश </title>
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		<pubDate>Tue, 12 Aug 2025 06:13:24 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी महाराज के नगर में चल रहे पावन वर्षायोग चातुर्मास में धर्म, संस्कृति, संस्कार, कर्म आदि विषयों पर देशना से धर्मानुरागी धन्य-धन्य हो रहे हैं। उन्होंने प्रवचन के दौरान उपगुहन अंग पर प्रकाश डाला। रामगंजमंडी से पढ़िए, अभिषेक जैन लुहाड़िया की खबर&#8230; रामगंजमंडी। आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी महाराज के नगर में चल [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी महाराज के नगर में चल रहे पावन वर्षायोग चातुर्मास में धर्म, संस्कृति, संस्कार, कर्म आदि विषयों पर देशना से धर्मानुरागी धन्य-धन्य हो रहे हैं। उन्होंने प्रवचन के दौरान उपगुहन अंग पर प्रकाश डाला। <span style="color: #ff0000">रामगंजमंडी से पढ़िए, अभिषेक जैन लुहाड़िया की खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>रामगंजमंडी</strong>। आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी महाराज के नगर में चल रहे पावन वर्षायोग चातुर्मास में धर्म, संस्कृति, संस्कार, कर्म आदि विषयों पर देशना से धर्मानुरागी धन्य-धन्य हो रहे हैं। उन्होंने प्रवचन के दौरान उपगुहन अंग पर प्रकाश डाला। उन्होंने इसका अर्थ बताया ढंकना भावार्थ रूप में समझाते हुए कहा कि किसी अज्ञानता के कारण किसी धर्मात्मा का अवगुण आपकी दृष्टि में आ जाए तो उसे ढंकना चाहिए लेकिन, हमारी आदत तो उसे फैलाने की है, जब तक अवगुण हम लोगों को नहीं कह देते तब तक चैन भी नहीं पड़ता है।</p>
<p><strong>धर्म और धर्मात्मा को परेशान ना करें</strong></p>
<p>आचार्यश्री ने कहा कि लोग दूसरे के दोषों को ऐसे कहते हैं, जैसे उस समय अमृत का पान कर रहे हों। बुराई बहुत जोर-जोर से करेगा, इसके विपरीत कोई व्यक्ति दूसरों के गुणों का गुणगान करेगा तो बहुत धीरे से करेगा। इस बात पर ध्यान दिलाया कि धर्मात्मा का यदि दोष आपके सामने आ जाए तो पहले उसे वहीं का वहीं दबा दो और उसे ढंक दो। उन्होंने कहा कि ऐसा भी सत्य मत बोलो किसी के प्राण संकट में आ जाए और धर्म और धर्मात्मा को परेशान ना करें और उससे धर्म कलंकित हो जाए। लोग धर्म से आस्था घटा ले, ऐसा भी सत्य नहीं बोलना चाहिए और वह झूठ सत्य से भी बड़ा होता है।</p>
<p><strong>धर्मात्मा संरक्षण करना प्रत्येक जैनी का दायित्व</strong></p>
<p>प्राणों से ज्यादा धर्म का संरक्षण करना चाहिए। प्राण चले जाए कोई बात नहीं धर्म नहीं जाना चाहिए। धर्म का संरक्षण धर्मात्मा संरक्षण करना प्रत्येक जैनी का दायित्व है। आचार्य श्री ने आस्था को ठगने के विषय में कहा कि किसी की आस्था को ठगना अपनी आस्था को ठगना है। अपने आप को नरक निगोद भेजना है। अनंत काल के लिए अपने आपको कष्ट पीड़ा में तैयार करना है। धर्मात्मा व्यक्ति किसी को ठग नहीं सकता क्योंकि वह अच्छी तरह से समझता है।</p>
<p><strong>धर्म की रक्षा करना अनिवार्य</strong></p>
<p>ठगने का अर्थ क्या है, ठगने का फल क्या है वह अच्छी तरह से समझता है लेकिन, धर्मात्मा सहज में ठगे जाते हैं, समझ ही नहीं पाते हैं। ठगना अच्छी बात नहीं है। स्वयं को न दूसरों को अगर दूसरे को ठग रहे हो तो समझ लो तो उस समय तुम समझ लो उस समय तुम अपने आप को ठग रहे हो। व्यक्ति की रक्षा करना अनिवार्य नहीं है लेकिन, धर्म की रक्षा करना अनिवार्य है। धर्म की रक्षा से ही हमारा समाज सुरक्षित रहता है।</p>
<p><strong>ऐसा उपक्रम करो कि वह पुनः स्थापित हो</strong></p>
<p>आचार्य श्री ने कहा कि दिमाग मत लगाओ किसी की भूल में किसी की चूक में। आपके सामने किसी ने रात्रि भोजन का त्याग किया। भूल से उसे ध्यान नहीं रहा और आपके सामने रात्रि भोजन करते पाया गया तब चार लोगों को बुलाकर मत कहो। दिमाग मत लगाओ दिल लगाओ हो सकता है भूल गया हो। हो सकता है ध्यान नही रहा हो। हो सकता है भाव बदल गया हो। समझाओ बात करो उससे एकांत में ले जाकर पहले तो ढंक दो उसके बाद ऐसा उपक्रम करो कि वह पुनः स्थापित हो।</p>
<p><strong>उपगुहन अंग को धारण करो</strong></p>
<p>लोग गड्ढा दूसरे के लिए खोदते है लेकिन, बाद में खुद उसी में गिर जाते हैं। अग्नि का गोला किसी को मारने के लिए उठाओगे तो पहले कौन जलेगा, स्वयं जलेंगे। ऐसे ही अगर आपने धर्मात्मा की बात को ढंका नहीं आपको इतनी हानि उठानी पड़ेगी। आप अनंत भवों तक सुलझ नहीं पाओगे। अच्छा तो यह है इसी भव में सुलझने का प्रयास करो और उपगुहन अंग को धारण करो ताकि आत्मा का कल्याण हो सके।</p>
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