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	<title>पाठ्यक्रम &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<description>ताज़ा खबरे हिन्दी में</description>
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	<title>पाठ्यक्रम &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>नर से नारायण पाषाण से परमात्मा की यात्रा का नाम &#039;मेरी भावना&#039; : शिक्षण संस्थाओं के पाठ्यक्रम में शामिल करने की डिमांड </title>
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		<pubDate>Sat, 28 Jun 2025 16:39:27 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[भारत वर्ष में अनेकानेक दिव्य महापुरुषों ने समय-समय पर जन्म लेकर लोगों में नव चेतना का संचार किया है। जैन धर्म दर्शन के प्रख्यात लेखक विद्वान कवि स्व. जुगल किशोर मुख्तार &#8220;युगवीर&#8221; की कालजयी रचना &#8216;मेरी भावना&#8217; जीवन को जीवंत करने वाला जीवन शास्त्र है। कोटा से पढ़िए, पारस जैन पार्श्वमणि की यह प्रस्तुति&#8230; कोटा। [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>भारत वर्ष में अनेकानेक दिव्य महापुरुषों ने समय-समय पर जन्म लेकर लोगों में नव चेतना का संचार किया है। जैन धर्म दर्शन के प्रख्यात लेखक विद्वान कवि स्व. जुगल किशोर मुख्तार &#8220;युगवीर&#8221; की कालजयी रचना &#8216;मेरी भावना&#8217; जीवन को जीवंत करने वाला जीवन शास्त्र है। <span style="color: #ff0000">कोटा से पढ़िए, पारस जैन पार्श्वमणि की यह प्रस्तुति&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>कोटा।</strong> भारत वर्ष में अनेकानेक दिव्य महापुरुषों ने समय-समय पर जन्म लेकर लोगों में नव चेतना का संचार किया है। जैन धर्म दर्शन के प्रख्यात लेखक विद्वान कवि स्व. जुगल किशोर मुख्तार &#8220;युगवीर&#8221; की कालजयी रचना &#8216;मेरी भावना&#8217; जीवन को जीवंत करने वाला जीवन शास्त्र है। मेरी भावना में &#8216;सर्वे भवन्तु सुखिन सर्वे संतु निरामया&#8217; और मानव कल्याण की भावना निहित है। आज भारत ही नहीं अपितु पूरे विश्व के समस्त विद्यालयों महाविद्यालयों शिक्षण संस्थाओं में &#8216;मेरी भावना&#8217; को प्रार्थना के रूप में बोला जाना चाहिए। मेरी भावना को पाठ्यक्रम में शामिल किया जाना चाहिए। &#8216;मेरी भावना&#8217; का तात्विक विश्लेषण किया जाए तो इसके एक-एक शब्द में गागर में भरा हुआ है। एक-एक शब्द बहुमूल्य है। विद्यार्थियों को इन शब्दों की व्याख्या के इसके महत्व पर प्रकाश डाला जाए। इससे विद्यार्थी अपने अनमोल जीवन के एक एक क्षण का महत्व समझ सकेंगे।&#8217;मेरी भावना&#8217; कृति से जीवदया, जीवरक्षा सामाजिक बुराइयों से दूर रहने की प्रबल इच्छा शक्ति जागृत होगी। उनमें नैतिकता, विश्व बंधुत्व, सहिष्णुता, सामाजिक, परोपकार की भावना जागृत होगी।</p>
<p><strong>मानव से महा मानव की महायात्रा</strong></p>
<p>&#8216;मेरी भावना&#8217; नर से नारायण, पाषाण से परमात्मा, तीतर से तीर्थंकर, फर्श से अर्श की यात्रा का नाम है। यदि सच्ची श्रद्धा से प्रतिदिन &#8216;मेरी भावना&#8217; को बोला जाए तो उससे प्रकृति में एक सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है । &#8216;मेरी भावना&#8217; से जीवन जीवंत हो जाता है। &#8216;मेरी भावना&#8217; सभी जाति देश समाज भाषा की सीमा से उन्मुक्त मानव से महा मानव की महायात्रा है । आज के विश्व युद्ध के अराजकता पूर्ण वातावरण में &#8216;मेरी भावना&#8217; से नकारात्मक ऊर्जा का पर प्रभाव खत्म होगा, सकारात्मक ऊर्जा का संचार होगा।</p>
<p><strong>प्रकृति साथ रहना चाहिए</strong></p>
<p>आज कल के बच्चों का सोशल मीडिया के दुष्प्रभाव से बचना बहुत मुश्किल है। आज फास्ट फूड का जमाना है। इस ओर बच्चे तेजी से अग्रसर हो रहे है। इस फास्ट फूड के सेवन से छोटी सी उम्र में बड़ी-बड़ी बीमारियां के शिकार हो जाते है। प्रकृति की सभी विरासत ये सूर्य, चंद्रमा, वन, उपवन, जंगल, पेड़, पौधे, सागर, नदी सभी हमें देना सिखाती है। प्रकृति साथ रहना चाहिए प्रकृति में यदि विकृति पैदा करेंगे तो फिर उसके दुष्परिणाम अतिवृष्टि, अनावृष्टि, ओलावृष्टि, भुखमरी महामारी, कोरोना, सुनामी, भूकंप, ज्वालामुखी के रूप में भुगतना पड़ेंगे।</p>
<p><strong>नजरे अपनी बदलो नजारे बदल जाएंगे</strong></p>
<p>संसार एक प्रतिक्रिया है। जो दोगे वो मिलेगा जैसी करनी वैसी भरनी वाला सिद्धांत लागू है। मानव पंच तत्वों से मिलकर इस धरती पर आता है और जब अंत समय में मारता है तो भी पंच तत्वों में विलीन हो जाता है। यह सत्य है। इसको नकारा नहीं जा सकता। मानव को अपनी सोच जीवन पर्यंत सकारात्मक रखनी चाहिए। इसका जीवन पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ता है। &#8216;नजरे अपनी बदलो नजारे बदल जाएंगे। सबको अपना मानो सब आपके हो जाएंगे&#8217;। सबसे पहले सोच बदले भगवान महावीर स्वामी ने कहा हैं कि संसार को मत बदलो स्वयं को बदलो संसार को मत सुधारो स्वयं सुधर जाओ।</p>
<p><strong>मेरी भावना अंतर्मन में समा जाएगी</strong></p>
<p>&#8216;मेरी भावना&#8217; पर जितना भी लिखूं कम ही होगा। मेरे शब्द कोश में शब्द नहीं है। जिस दिन इस विश्व के प्रत्येक व्यक्ति में मेरी भावना अंतर्मन में समा जाएगी उस दिन धरती स्वर्ग से भी ज्यादा सुंदर हो जाएगी। अंत में &#8216;मेरी भावना&#8217; कृति की पंक्तियों के साथ। &#8216;मैत्री भाव जगत में मेरा सब जीवों से नित्य रहे दिन दुखी जीवों पर मेरे उर से करुणा स्रोत बहे&#8217;</p>
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		<title>गुणों की पहचान बिना मिट्टी का घड़ा भी नहीं मिलता : मप्र में पढ़ाई जा रही आचार्यश्री की रचनाएं  </title>
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		<pubDate>Tue, 17 Jun 2025 13:05:09 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आचार्य श्री विमर्शसागर जी ने देशभक्ति से ओतप्रोत देश और धर्म के लिए जिओ रचना लिखी, जिसे मध्यप्रदेश शिक्षा बोर्ड के पाठ्यक्रम में शामिल किया गया है। आचार्य श्री की अद्भुत संचना, जो ‘एक सुखद सुखद अनुभूतियों का अहसास- मां’ शीर्षक से कक्षा-8 की मप्र शिक्षा बोर्ड में शामिल है। खतौली से पढ़िए, सोनम जैन [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>आचार्य श्री विमर्शसागर जी ने देशभक्ति से ओतप्रोत देश और धर्म के लिए जिओ रचना लिखी, जिसे मध्यप्रदेश शिक्षा बोर्ड के पाठ्यक्रम में शामिल किया गया है। आचार्य श्री की अद्भुत संचना, जो ‘एक सुखद सुखद अनुभूतियों का अहसास- मां’ शीर्षक से कक्षा-8 की मप्र शिक्षा बोर्ड में शामिल है। <span style="color: #ff0000">खतौली से पढ़िए, सोनम जैन की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>खतौली।</strong> जिनकी लेखनी से सृजित अनेकानेक पद्यात्मक मौलिक रचनाएं समाज एवं राष्ट्र के लिए मार्गदर्शन बनी हैं। ऐसे आदर्श महाकवि आचार्य श्री विमर्शसागर जी ने देशभक्ति से ओतप्रोत देश और धर्म के लिए जिओ रचना लिखी, जिसे मध्यप्रदेश शिक्षा बोर्ड के पाठ्यक्रम में सम्मिलित किया गया है। आचार्य श्री की अद्भुत संरचना, जो ‘एक सुखद सुखद अनुभूतियों का अहसास- मां’ शीर्षक से कक्षा-8 की मध्यप्रदेश शिक्षा बोर्ड में शामिल की गई है। जो आज युवा पीढ़ी के लिए मार्गदर्शक बन रही है। 16 जून की प्रातः बेला में आचार्य श्री ने धर्मनगरी खतौली के सभी दिगंबर जैन मंदिरों की अपने चतुर्विध संघ के साथ पद विहार करते हुए वंदना की। पुनः जिन मंदिर में आकर आचार्य प्रवर ने उपस्थित धर्मसभी को संबोधित करते हुए कहा कि भगवान के गुण गाएंगे, भगवन् सम बन जाएंगे। राग-द्वेष राहत अहा, शुद्ध आत्मा पाएंगे। गुण का पूजक ही, हो-हो, गुणवान कहाए रे (जीवन है पानी की बूंद, कब मिट जाये रे} गुणों की पहचान होते ही हमें उन गुणों से समन्वित द्रव्य-पदार्थ प्राप्ति हो जाती है और गुणों की प्राप्ति होते ही उन गुणों से परिपूर्ण की पहचान हो पूर्ण द्रव्य की भी प्राप्ति हो जाती है।</p>
<p>आप तरबूज खरीदने बाजार जाते हो तो सर्वप्रथम उसमें चाक लगाकर देखते हो कि यह तरबूज कहीं अंदर से खराब तो नहीं है। आप एक मिट्टी का घड़ा लेने जाते हैं तो ठोंक-बजाकर उसकी जांच करते हैं कि यह कहीं से फूटा तो नहीं है। जरा विचार कीजिए कि कुछ नाचीज तरबूज अथवा घड़े को आप बिना गुणवत्ता के ग्रहण नहीं करते किन्तु हमारी सबसे बड़ी खोज ‘जो भगवान की खोज है’ उसमें बिना विचार के ही मात्र भगवान संज्ञा अर्थात् किसी ने कह दिया कि यह भगवान है, आप उसे ही अपना भगवान मान बैठते हैं। कोई जांच, कोई परीक्षा नहीं, यह कैसी आपकी श्रद्धा है कि आज ये भगवान, कल कोई और प्रभावशाली दिखा कल से वहीं भगवान। बंधुओ। यथार्थ में यह श्रद्धा-भक्ति नहीं यह तो घोर अज्ञानता है। हमेशा ध्यान रखो, भगवान शब्द अपने आप ही कह रहा है।</p>
<p><img fetchpriority="high" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-83237" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/06/IMG-20250617-WA0038.jpg" alt="" width="1280" height="853" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/06/IMG-20250617-WA0038.jpg 1280w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/06/IMG-20250617-WA0038-300x200.jpg 300w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/06/IMG-20250617-WA0038-1024x682.jpg 1024w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/06/IMG-20250617-WA0038-768x512.jpg 768w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/06/IMG-20250617-WA0038-414x276.jpg 414w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/06/IMG-20250617-WA0038-470x313.jpg 470w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/06/IMG-20250617-WA0038-640x426.jpg 640w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/06/IMG-20250617-WA0038-130x86.jpg 130w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/06/IMG-20250617-WA0038-187x124.jpg 187w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/06/IMG-20250617-WA0038-990x660.jpg 990w" sizes="(max-width: 1280px) 100vw, 1280px" />भग अर्थात ज्ञान और वान माने वाला अर्थात जो पूर्ण ज्ञान वाला है वही भगवान है। पूर्ण ज्ञानवान एक मात्र ‘सर्वज्ञ और वीतरागी’ ही हैं। स्वर्ग के देवता अवधिज्ञानी हो सकते हैं, पूर्ण ज्ञानी नहीं। गुणों की खोज करो आपको भगवान स्वयमेव मिल जाएंगे।</p>
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		<title>कुंदकुंद ज्ञानपीठ इंदौर: निःशुल्क प्राकृत भाषा पाठ्यक्रम अध्ययन कार्यशाला </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 26 Jul 2023 17:14:41 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जैन धर्म के शास्त्रों को सरलता से समझने के लिए जैन आगमों की मूल भाषा प्राकृत भाषा के अध्ययन व अध्यापन हेतु कुंदकुंद ज्ञानपीठ द्वारा विद्यार्थियों को निशुल्क कार्यशाला उपलब्ध कराई जा रही है। पढ़िए यह विशेष रिपोर्ट श्रीफल जैन न्यूज़ के साथ&#8230; इंदौर:- जैन धर्म के शास्त्रों को सरलता से समझने के लिए जैन [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>जैन धर्म के शास्त्रों को सरलता से समझने के लिए जैन आगमों की मूल भाषा प्राकृत भाषा के अध्ययन व अध्यापन हेतु कुंदकुंद ज्ञानपीठ द्वारा विद्यार्थियों को निशुल्क कार्यशाला उपलब्ध कराई जा रही है। <span style="color: #ff0000;">पढ़िए यह विशेष रिपोर्ट श्रीफल जैन न्यूज़ के साथ&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर:-</strong> जैन धर्म के शास्त्रों को सरलता से समझने के लिए जैन आगमों की मूल भाषा प्राकृत भाषा के अध्ययन व अध्यापन हेतु कुंदकुंद ज्ञानपीठ द्वारा विद्यार्थियों को निशुल्क कार्यशाला उपलब्ध कराई जा रही है। प्राचीन भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति का यथार्थ ज्ञान प्राप्त करने की दृस्टि से प्राकृत भाषा का साहित्य अतयंत उपयोगी रहा है ,भगवान् महावीर स्वामी द्वारा उपदिष्ट जैन आगम साहित्य प्राकृत भाषा की अमूल्य धरोहर है | वैराग्य ,तप, सयम एवं त्याग से ओत प्रोत यह साहित्य आध्यात्मिक सहृदयों को स्वतः ही अपनी और आकृष्ट कर लेता है |अधिकांश जैन ग्रंथो की रचना प्राकृत भाषा में ही हुई है | हमारा मूल महामंत्र णमोकार मंत्र इसी प्राकृत भाषा में है | यह शिलालेखों की भी भाषा रही है | हाथीगुफा शिलालेख, नासिक शिलालेख, अशोक के शिलालेख प्राकृत भाषा में ही हैं |</p>
<p><strong>प्राकृत भाषा जैनो की पहचान है</strong></p>
<p>हमें प्राकृत भाषा को कभी नहीं भूलना चाहिए ,प्राकृत भाषा जैनो की पहचान है | वर्तमान समय में आवश्यकता है की हमअन्य भाषाओ के साथ साथ प्राकृत भाषा को भी सीखे | एक युग में प्राकृत जन भाषा थी और हमारे आचार्यों ने इसी को आधार बना कर ग्रंथो की रचना की है | इस लोक भाषा ‘प्राकृत’ का समृद्ध साहित्य रहा है, जिसके अध्ययन के बिना भारतीय समाज एवं संस्कृति का अध्ययन अपूर्ण रहता है। सभी इच्छुक विद्यार्थी संस्था के उदासीन आश्रम स्थित कार्यालय में संपर्क कर सकते हैं।</p>
<p><strong>कुंदकुंद ज्ञानपीठ द्वारा विद्यार्थियों को निशुल्क उपलब्ध </strong></p>
<p>जैन धर्म के शास्त्रों को सरलता से समझने के लिए जैन आगमों की मूल भाषा के अध्ययन व अध्यापन हेतु कुंदकुंद ज्ञानपीठ द्वारा विद्यार्थियों को निशुल्क उपलब्ध कराई जा रही है। प्राकृत भाषा का यह पाठ्यक्रम श्रवणबेलगोला विश्वविद्यालय से संबद्ध होंगा। जिसमे नियमित उपस्थिति एवं विशेष अंक प्राप्त करने वाले प्रशिक्षणार्थियों को स्वर्गीय डॉ अजीत कुमार सिंह कासलीवाल स्मृति प्रोत्साहन योजना के अंतर्गत प्रमाण पत्र एवं प्रोत्साहन राशि भी सम्मान स्वरूप दी जाएगी।</p>
<p>कुंदकुंद ज्ञानपीठ के अध्यक्ष अमित कासलीवाल एवं समाज के संजीव जैन संजीवनी ने बताया कि प्राकृत भाषा के अध्यापन करवाने हेतु संस्कृत विदुषी प्रोफेसर श्रीमती डॉक्टर संगीता मेहता ने अपनी स्वीकृति प्रदान कर दी है एवं नियमित उपस्थिति एवं विशेष अंक प्राप्त करने वाले प्रशिक्षणार्थियों को स्वर्गीय डॉ अजीत कुमार सिंह कासलीवाल स्मृति प्रोत्साहन योजना के अंतर्गत प्रमाण पत्र एवं प्रोत्साहन राशि भी सम्मान स्वरूप दी जाएगी।</p>
<p><strong>कुंदकुंद ज्ञानपीठ </strong></p>
<p>जैन साहित्य अत्यंत समृद्ध है, किन्तु वैज्ञानिक अभिरुचि सम्पन्न व्यक्तियों द्वारा अब तक उसका सम्यक अनुशीलन नहीं हुआ है । साथ ही देश के कोने &#8211; कोने में विकीर्ण पुरासम्पदा का संरक्षण, अभिलेखीकरण एवं मूल्यांकन किये जाने की तत्काल आवश्यकता है । इन दूरगामी लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु कुन्दकुन्द ज्ञानपीठ की स्थापना दिगम्बर जैन उदासीन आश्रम ट्रस्ट के अन्तर्गत 19.10.87 को की गयी एवं इसकी सभी प्रवृत्तियाँ एतदर्थ समर्पित हैं ।</p>
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