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	<title>पवित्र यात्रा &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<description>ताज़ा खबरे हिन्दी में</description>
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		<title>साधु संतों के पदविहार में आवश्यक सावधानी श्रावकों के कर्तव्य : पद विहार होती है आत्मजागरण, धर्मप्रभावना और लोकमंगल की पवित्र यात्रा </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shree Phal News]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 20 May 2026 13:54:09 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[भारतीय संस्कृति की आत्मा यदि किसी में स्पंदित होती दिखाई देती है, तो वह तपस्वी संतों के चरणों में ही दिखाई देती है। त्याग, संयम, अहिंसा और आत्मशुद्धि की दिव्य परंपरा को जीवित रखने वाले दिगंबर एवं श्वेतांबर जैन साधु-संत केवल किसी समाज विशेष के आध्यात्मिक मार्गदर्शक नहीं हैं, अपितु सम्पूर्ण मानवता के लिए चलती-फिरती [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>भारतीय संस्कृति की आत्मा यदि किसी में स्पंदित होती दिखाई देती है, तो वह तपस्वी संतों के चरणों में ही दिखाई देती है। त्याग, संयम, अहिंसा और आत्मशुद्धि की दिव्य परंपरा को जीवित रखने वाले दिगंबर एवं श्वेतांबर जैन साधु-संत केवल किसी समाज विशेष के आध्यात्मिक मार्गदर्शक नहीं हैं, अपितु सम्पूर्ण मानवता के लिए चलती-फिरती तपोभूमि हैं। <span style="color: #ff0000">आज पढ़िए, सुनील सुधाकर शास्त्री का यह आलेख&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p>भारतीय संस्कृति की आत्मा यदि किसी में स्पंदित होती दिखाई देती है, तो वह तपस्वी संतों के चरणों में ही दिखाई देती है। त्याग, संयम, अहिंसा और आत्मशुद्धि की दिव्य परंपरा को जीवित रखने वाले दिगंबर एवं श्वेतांबर जैन साधु-संत केवल किसी समाज विशेष के आध्यात्मिक मार्गदर्शक नहीं हैं, अपितु सम्पूर्ण मानवता के लिए चलती-फिरती तपोभूमि हैं। उनका पदविहार केवल एक स्थान से दूसरे स्थान तक का गमन नहीं होता, बल्कि वह आत्मजागरण, धर्मप्रभावना और लोकमंगल की पवित्र यात्रा होती है। नंगे पाँव तपती धरा पर चलने वाले ये महापुरुष अपने प्रत्येक चरण से मानो मानवता को संयम और करुणा का संदेश देते हैं। किन्तु अत्यंत दुःख और चिंता का विषय है कि वर्तमान समय में इन संतों के पदविहार के दौरान अनेक प्रकार की दुर्घटनाएँ, दुर्व्यवहार और असुरक्षाएँ निरंतर बढ़ती जा रही हैं।</p>
<p>कभी तीव्र गति से दौड़ते वाहन उनके जीवन के लिए संकट बन जाते हैं, तो कभी असामाजिक एवं विधर्मी तत्व उपहास, अभद्रता अथवा हिंसक व्यवहार करने लगते हैं। कहीं संतों पर पथराव होता है, कहीं उनके साथ धक्का-मुक्की की घटनाएँ सामने आती हैं, तो कहीं माताजी संघ के प्रति अनुचित व्यवहार समाज को पीड़ित कर देता है। यह केवल किसी एक संप्रदाय की समस्या नहीं है; दिगंबर और श्वेतांबर दोनों परंपराओं के संत-संघ समान रूप से इन परिस्थितियों का सामना कर रहे हैं। यह स्थिति केवल धार्मिक असंवेदनशीलता का परिचायक नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना के क्षय का भी संकेत है।</p>
<p>वास्तव में, जैन साधु-संत अपने साथ कोई भौतिक सुरक्षा नहीं रखते। उनका एकमात्र आश्रय समाज की श्रद्धा और प्रशासन की संवेदनशीलता होती है। ऐसे में श्रावक समाज का उत्तरदायित्व अत्यंत बढ़ जाता है। संतों के पदविहार को केवल धार्मिक उत्साह का विषय मान लेना पर्याप्त नहीं है; उसे सुव्यवस्थित और सुरक्षित बनाना भी समाज का अनिवार्य दायित्व है। जब भी कोई संघ पदविहार करे, तब पर्याप्त संख्या में श्रावकों को उनके साथ चलना चाहिए। विशेष रूप से युवाओं को आगे आकर सुरक्षा और व्यवस्था की जिम्मेदारी संभालनी चाहिए। समाज का युवा वर्ग यदि धर्मरक्षा के इस कार्य में सक्रिय हो जाए, तो अनेक दुर्घटनाओं और दुर्व्यवहारों को रोका जा सकता है।</p>
<p>माताजी संघों के पदविहार में महिलाओं की पर्याप्त सहभागिता भी आवश्यक है। इससे मातृशक्ति को सुरक्षा का भाव प्राप्त होगा तथा अनुशासन और मर्यादा का वातावरण निर्मित रहेगा। पदविहार के समय मार्ग के दोनों ओर सुरक्षा-व्यवस्था के रूप में रस्सियाँ अथवा संकेतक लगाए जा सकते हैं, जिससे वाहन नियंत्रित रहें और संतों के मार्ग में अवरोध उत्पन्न न हो। जहाँ यातायात अधिक हो, वहाँ स्वयंसेवकों की टोली मार्गदर्शन और यातायात नियंत्रण का कार्य कर सकती है। अशांत एवं अत्यंत निर्जन मार्गाे पर पदविहार से यथासंभव बचना चाहिए तथा अत्यधिक व्यस्त राजमार्गों के स्थान पर सुरक्षित वैकल्पिक मार्गों का चयन किया जाना चाहिए।</p>
<p>आज आवश्यकता केवल भावनात्मक श्रद्धा की नहीं, बल्कि संगठित जागरूकता की है। समाज को ऐसे प्रशिक्षित स्वयंसेवक तैयार करने चाहिए जो पदविहार के दौरान सुरक्षा, प्राथमिक उपचार, यातायात नियंत्रण और आपातकालीन सहायता का कार्य संभाल सकें। संघ के साथ चलने वाले वाहन केवल आवश्यक सामग्री और आकस्मिक सहायता के लिए हों, न कि प्रदर्शन और भीड़ का माध्यम बनें। पदविहार के पूर्व स्थानीय प्रशासन को सूचित करना, मार्ग का निरीक्षण करना और संभावित संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान करना भी अत्यंत आवश्यक है।</p>
<p>इस विषय में शासन और प्रशासन की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। जिस प्रकार विभिन्न धार्मिक यात्राओं, कांवड़ यात्राओं अथवा पर्वों के अवसर पर प्रशासन सुरक्षा-व्यवस्था सुनिश्चित करता है, उसी प्रकार जैन साधु-संतों के पदविहार को भी आधिकारिक सुरक्षा मिलनी चाहिए। प्रशासन की ओर से पुलिस बल अथवा सुरक्षा कर्मियों की व्यवस्था हो, यातायात को नियंत्रित किया जाए, और संवेदनशील क्षेत्रों में विशेष निगरानी रखी जाएकृतो अनेक अप्रिय घटनाओं को रोका जा सकता है। यह केवल धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा नहीं होगी, बल्कि भारतीय संविधान की उस भावना का सम्मान भी होगा जो प्रत्येक नागरिक को सुरक्षित धार्मिक आचरण का अधिकार प्रदान करती है।</p>
<p>दीर्घकालीन दृष्टि से सरकार को “पदविहार पथ” अथवा “धार्मिक पदयात्रा मार्ग” जैसी योजनाओं पर भी विचार करना चाहिए। जैसे साइकिल ट्रैक अथवा पैदल पथ निर्मित होते हैं, उसी प्रकार प्रमुख धार्मिक मार्गों पर सुरक्षित पदयात्रा पथ बनाए जा सकते हैं। इन मार्गों का उपयोग केवल जैन संत ही नहीं, बल्कि अन्य धार्मिक यात्राएँ और कांवड़ यात्राएँ भी कर सकेंगी। इससे दुर्घटनाओं में उल्लेखनीय कमी आएगी और धार्मिक यात्राओं की गरिमा भी सुरक्षित रहेगी। यह व्यवस्था भारत की आध्यात्मिक परंपराओं के संरक्षण की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम सिद्ध हो सकती है।</p>
<p>संत केवल किसी समाज की धरोहर नहीं होते; वे राष्ट्र की नैतिक चेतना होते हैं। जब तपस्वियों का अपमान होता है, तब वास्तव में समाज की आत्मा आहत होती है। जिन चरणों ने हिंसा के मार्ग को त्यागकर अहिंसा का प्रकाश फैलाया, जिन वचनों ने मनुष्य को आत्मोन्नति का पथ दिखाया, उन चरणों की सुरक्षा करना प्रत्येक संवेदनशील नागरिक का नैतिक दायित्व है। यदि समाज अपने संतों की रक्षा नहीं कर पाएगा, तो आने वाली पीढ़ियाँ केवल ग्रंथों में तप और त्याग की कथाएँ पढ़ेंगी, प्रत्यक्ष जीवन में उनका दर्शन दुर्लभ हो जाएगा।</p>
<p>आज आवश्यकता है कि जैन समाज सम्प्रदायगत सीमाओं से ऊपर उठकर साधु-संतों की सुरक्षा के प्रश्न पर एकजुट हो। दिगंबर हो या श्वेतांबर, तप और संयम की साधना समान रूप से वंदनीय है। समाज को यह समझना होगा कि संतों की सुरक्षा केवल कुछ व्यक्तियों का कार्य नहीं, बल्कि सामूहिक धर्म है। जब श्रावक जागरूक होंगे, युवा संगठित होंगे, महिलाएँ सहभागी बनेंगी और प्रशासन संवेदनशील होगाकृतभी पदविहार वास्तव में निर्भय, अनुशासित और मंगलमय बन सकेगा।</p>
<p>जिनमार्ग की यह तपःपरंपरा केवल इतिहास की स्मृति न बन जाए, इसके लिए आज ही सजग होना होगा। संतों के चरणों की रक्षा करना वास्तव में संस्कृति, संयम और सभ्यता की रक्षा करना है।</p>
<p>संतों पर उपसर्ग अगर हो, धन वैभव का सार नहीं।</p>
<p>संत सड़क पर हम ए.सी.में, समझो धर्म से प्यार नहीं।।</p>
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		<title>गिरनार के जाँबाज़ तीर्थ रक्षकों का इंदौर में भव्य अभिनंदन : विश्व जैन संगठन और समाज जन ने गिरनार यात्रा में योगदान करने वालों का किया सम्मान </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 05 Oct 2025 04:50:57 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[इंदौर में गिरनार तीर्थ रक्षकों के सम्मान समारोह का आयोजन हुआ। इस अवसर पर विश्व जैन संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री संजय जैन जी उपस्थित रहे। समारोह में तीर्थ रक्षकों के समर्पण और संघर्षों की गाथा को सराहा गया। पढ़िए राजेश जैन दद्दू की रिपोर्ट… इंदौर। गिरनार तीर्थ के जाँबाज़ तीर्थ रक्षकों का अभिनंदन समारोह [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>इंदौर में गिरनार तीर्थ रक्षकों के सम्मान समारोह का आयोजन हुआ। इस अवसर पर विश्व जैन संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री संजय जैन जी उपस्थित रहे। समारोह में तीर्थ रक्षकों के समर्पण और संघर्षों की गाथा को सराहा गया। <span style="color: #ff0000">पढ़िए राजेश जैन दद्दू की रिपोर्ट…</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर</strong>। गिरनार तीर्थ के जाँबाज़ तीर्थ रक्षकों का अभिनंदन समारोह समाज के लिए गर्व का अवसर था। विश्व जैन संगठन के प्रचारक एवं इंदौर ईकाई के युवा अध्यक्ष मंयक जैन ने कहा कि “संघर्षों में जो डटे, जीत उन्हीं की होती है। नेमीनाथ की कृपा से, हर बाधा दूर होती है।”</p>
<p>इस अवसर पर उन सभी समाज जनों का सम्मान किया गया, जिन्होंने गिरनार यात्रा को सफल बनाने में अपना बहुमूल्य योगदान दिया। दद्दू ने कहा कि राहों में चुनौतियाँ आईं, पर समाज की एकजुटता और निष्ठा ने हर बाधा को पार किया। यह सम्मान उनके मेहनत और समर्पण को समर्पित है।</p>
<p>समारोह में राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री संजय जैन जी के इंदौर आगमन पर समाज जन ने उन्हें स्वागत किया। उपस्थित लोगों ने तीर्थ रक्षकों और पुण्यर्जको को सम्मानित किया, जिन्होंने गिरनार की पवित्रता को बनाए रखने में आर्थिक और सामाजिक योगदान दिया।</p>
<p><strong>कार्यक्रम विवरण:</strong></p>
<p>• मुख्य अतिथि: श्री संजय जैन जी (राष्ट्रीय अध्यक्ष, विश्व जैन संगठन)</p>
<p>• दिन व दिनांक: सोमवार, 6 अक्टूबर 2025</p>
<p>• समय: शाम 6:30 बजे से 8:15 बजे तक</p>
<p>• स्थान: अभिनव कला समाज, प्रथम तल सभागार (1st Floor Auditorium), स्टेट प्रेस क्लब, एम.जी. रोड, इंदौर</p>
<p>निवेदक: विश्व जैन संगठन और सकल जैन समाज, इंदौर</p>
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