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	<title>पर्यूषण महापर्व &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>उत्तम आकिंचन्य धर्म की गहन व्याख्या का मिला पुण्य लाभ: सखी नाटक के मंचन और प्रश्नमंच के माध्यम से हुआ युवा और बच्चों का जुड़ाव  </title>
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		<pubDate>Fri, 05 Sep 2025 09:43:58 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[पर्यूषण महापर्व के अंतर्गत शुक्रवार को बड़े जैन मंदिर में सांगानेर से पधारे पंडित सौरभ शास्त्री ने उत्तम आकिंचन्य धर्म की गहन व्याख्या की। इस दौरान नगर पालिका अध्यक्ष अंजलि जिनेश जैन कार्यक्रम में उपस्थित थीं। उन्होंने श्रद्धालुओं के साथ आकिंचन्य धर्म की आराधना कर आशीर्वाद लिया। अंबाह से पढ़िए, अजय जैन की यह खबर&#8230; [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>पर्यूषण महापर्व के अंतर्गत शुक्रवार को बड़े जैन मंदिर में सांगानेर से पधारे पंडित सौरभ शास्त्री ने उत्तम आकिंचन्य धर्म की गहन व्याख्या की। इस दौरान नगर पालिका अध्यक्ष अंजलि जिनेश जैन कार्यक्रम में उपस्थित थीं। उन्होंने श्रद्धालुओं के साथ आकिंचन्य धर्म की आराधना कर आशीर्वाद लिया। <span style="color: #ff0000">अंबाह से पढ़िए, अजय जैन की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>अंबाह</strong>। पर्यूषण महापर्व के अंतर्गत शुक्रवार को बड़े जैन मंदिर में सांगानेर से पधारे पंडित सौरभ शास्त्री ने उत्तम आकिंचन्य धर्म की गहन व्याख्या की। इस दौरान नगर पालिका अध्यक्ष अंजलि जिनेश जैन कार्यक्रम में उपस्थित थीं। उन्होंने श्रद्धालुओं के साथ आकिंचन्य धर्म की आराधना कर आशीर्वाद लिया। सौरभ शास्त्री ने अपने प्रवचन में कहा कि आकिंचन्य का अर्थ है-खाली हो जाना। त्याग केवल बाहरी वस्तुओं का ही नहीं, बल्कि ‘मैं’ और ‘मेरा’ की भावना का भी होना चाहिए। यदि त्याग के बाद भी मन में ‘अपना’ शेष रह गया, तो वह त्याग अधूरा है। सच्चा आकिंचन वही है, जिसमें व्यक्ति शरीर, सम्पत्ति, सामग्री और संबंधी-इन चारों के मोह से मुक्त हो जाता है।</p>
<p>उन्होंने आगे कहा कि जीवन का यथार्थ तब ही समझा जा सकता है। जब साधक आत्मा के स्वरूप का अनुभव करे। अध्यात्म की साधना का चरम रूप आकिंचन्य है, जहां साधक को लगता है कि इस जगत में मेरा कुछ भी नहीं है। जब मनुष्य बिल्कुल खाली होकर त्याग की पराकाष्ठा करता है, तभी उसे उन्मुक्त आकाश और सच्चा आध्यात्मिक खुलापन प्राप्त होता है।</p>
<p><strong>सांस्कृतिक कार्यक्रमों से खिला वातावरण</strong></p>
<p>परेड चौराहे स्थित श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन मंदिर में रिटायर्ड शिक्षिका नीलम जैन के मार्गदर्शन में सखी नाटक का मंचन किया गया। नाटक के माध्यम से आपसी प्रेम, सद्भाव, जैन धर्म के संस्कार और भाईचारे से रहने की भावनाओं को जीवंत रूप में प्रस्तुत किया गया। जिस पर दर्शकों ने कलाकारों का उत्साह बढ़ाया। कार्यक्रम के दौरान प्रश्नमंच का भी आयोजन हुआ। गुना से पधारे पंडित आयुष शास्त्री ने बच्चों और युवाओं से धार्मिक प्रश्न पूछे। सही उत्तर देने वाले प्रतिभागियों को पुरस्कार प्रदान किए गए। इस दौरान बच्चों में विशेष उत्साह देखने को मिला।</p>
<p><strong>पुरस्कार वितरण और सम्मान किया </strong></p>
<p>इस मौके पर आयोजित कार्यक्रम के अंतर्गत विजेता प्रतिभागियों को उपहार दिए गए। गुड्डी जैन, कालीचरण जैन, संजीव जैन गली, अंबाह की ओर से बच्चों को प्रोत्साहन स्वरूप उपहार वितरित किए गए। वहीं सांस्कृतिक नाटक में उत्कृष्ट प्रस्तुति देने वाले प्रतिभागियों को भी सम्मानित किया गया। पुरस्कार वितरण प्रकाशचंद जैन, संतोष जैन, मालती जैन और राजकुमार जैन ने किया। कपिल जैन केपी ने बताया कि इनाम और प्रोत्साहन का उद्देश्य युवाओं और बच्चों को धर्म और संस्कृति की ओर आकर्षित करना है।</p>
<p><strong>श्रद्धालुओं में उत्साह और भक्ति का माहौल</strong></p>
<p>दोनों ही मंदिरों में सुबह से लेकर देर रात तक भक्ति गीत, भजन, कीर्तन और ध्यान का क्रम चलता रहा। श्रद्धालुओं ने बड़ी संख्या में शामिल होकर धर्मलाभ लिया। नगर के वरिष्ठ नागरिकों से लेकर बच्चों तक सभी वर्गों में पर्यूषण पर्व के इस चरण को लेकर गहरा उत्साह देखने को मिला। आयोजकों ने बताया कि शनिवार को पर्यूषण महापर्व का समापन होगा। अंतिम दिन श्रद्धालु उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म की आराधना करेंगे। नगर के जैन समाजजन दिनभर का उपवास रखकर भगवान की पूजा-अर्चना और आराधना में शामिल होंगे। समापन दिवस पर भव्य धार्मिक अनुष्ठान, पूजा और विशेष कार्यक्रम होंगे।</p>
<p><strong>धार्मिक और आध्यात्मिक यात्रा पथ पूर्ण होगा</strong></p>
<p>श्रेयांस जैन, आकाश जैन ने बताया कि अंबाह में पर्यूषण महापर्व का प्रत्येक दिन धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियों से सजा हुआ है। एक ओर पंडित सौरभ शास्त्री जैसे विद्वानों के प्रवचन आत्मा की गहराई तक जाने की प्रेरणा दे रहे हैं, वहीं दूसरी ओर नाटक और प्रश्नमंच जैसी गतिविधियां बच्चों और युवाओं को धर्म और संस्कृति से जोड़ रही हैं। नगर पालिका अध्यक्ष अंजलि जैन की उपस्थिति और समाजजनों का सहयोग इस पर्व की भव्यता को ओर बढ़ा रहा है। समापन दिवस पर शनिवार उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म की साधना के साथ पर्यूषण महापर्व 2025 का धार्मिक और आध्यात्मिक यात्रा पथ पूर्ण होगा।</p>
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		<title>अंबाह में पर्यूषण पर्व की शुरुआत, जैन मंदिरों में हुआ कलशाभिषेक : दस दिवसीय धार्मिक कार्यक्रमों से गुंजायमान होगा अंबाह का वातावरण </title>
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		<pubDate>Thu, 28 Aug 2025 16:26:22 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[दिगंबर जैन समाज का प्रमुख पर्व पर्यूषण अंबाह में पंचमी से शुरू हो गया है। जैन मंदिरों में कलशाभिषेक, पूजा-अर्चना और धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन हो रहा है। यह पर्व संयम, आत्मशुद्धि और क्षमा का संदेश लेकर समाज को धर्ममय वातावरण प्रदान करेगा। पढ़िए अजय जैन की ख़ास रिपोर्ट… अंबाह। दिगंबर जैन समाज का प्रमुख [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>दिगंबर जैन समाज का प्रमुख पर्व पर्यूषण अंबाह में पंचमी से शुरू हो गया है। जैन मंदिरों में कलशाभिषेक, पूजा-अर्चना और धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन हो रहा है। यह पर्व संयम, आत्मशुद्धि और क्षमा का संदेश लेकर समाज को धर्ममय वातावरण प्रदान करेगा। <span style="color: #ff0000">पढ़िए अजय जैन की ख़ास रिपोर्ट…</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>अंबाह।</strong> दिगंबर जैन समाज का प्रमुख पर्व पर्यूषण 28 अगस्त को पंचमी से प्रारंभ हुआ। भाद्रपद मास की शुरुआत से ही नगर के बड़े दिगंबर जैन मंदिर और परेड़ जैन मंदिर में धार्मिक कार्यक्रम चल रहे हैं। समाज के कपिल जैन (केपी) ने बताया कि मंदिरों में प्रतिदिन विशेष धार्मिक आयोजन होंगे, जिनमें श्रद्धालु भगवान का कलशाभिषेक कर पूजा-अर्चना, स्वाध्याय और प्रवचन श्रवण करेंगे। भादो मास की शुरुआत के साथ ही समाज के बच्चे और युवा भी नियमित रूप से मंदिर आकर धर्म साधना में सहभागी हो रहे हैं।</p>
<p><strong>संयम, साधना और क्षमा का संदेश</strong></p>
<p>पर्यूषण पर्व को आत्मशुद्धि, संयम और त्याग का पर्व माना जाता है। इस दौरान जैन श्रावक व्रत, उपवास और तपस्या कर अपने जीवन को धर्ममय बनाने का संकल्प लेते हैं। पर्व के पहले दिन उत्तम क्षमा धर्म की विशेष आराधना की गई, जहां श्रद्धालुओं ने आपसी सद्भाव और क्षमा याचना का संदेश दिया। आगामी दस दिनों तक चलने वाले इस पर्व में जैन समाज संयम, साधना और क्षमा का संदेश समाज में फैलाएगा।</p>
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		<title>प. बंगाल झारखंड उड़ीसा सराक क्षेत्र में भी पर्युषण की धूम : प्रतिभा सम्मान एवं क्षमा वाणी के साथ होगा समापन </title>
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		<pubDate>Thu, 28 Aug 2025 10:16:03 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आचार्य श्री ज्ञानसागर जी महाराज की प्रेरणा से आचार्य श्री ज्ञेयसागर जी महाराज, आर्यिका श्री स्वस्ति भूषण माता जी, आर्यिका श्री आर्ष माताजी, आर्यिका श्री सुज्ञानमती माताजी के आशीर्वाद, ब्र.मंजुला दीदी, ब्र.मनीष भैया के निर्देशन में पश्चिम बंगाल, झारखंड, उड़ीसा के विभिन्न स्थानों पर पर्यूषण महापर्व पर धर्म प्रभावना हो रही है। पुरुलिया से पढ़िए, [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>आचार्य श्री ज्ञानसागर जी महाराज की प्रेरणा से आचार्य श्री ज्ञेयसागर जी महाराज, आर्यिका श्री स्वस्ति भूषण माता जी, आर्यिका श्री आर्ष माताजी, आर्यिका श्री सुज्ञानमती माताजी के आशीर्वाद, ब्र.मंजुला दीदी, ब्र.मनीष भैया के निर्देशन में पश्चिम बंगाल, झारखंड, उड़ीसा के विभिन्न स्थानों पर पर्यूषण महापर्व पर धर्म प्रभावना हो रही है। <span style="color: #ff0000">पुरुलिया से पढ़िए, मनीष विद्यार्थी की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>पुरुलिया प. बंगाल।</strong> आचार्य श्री ज्ञानसागर जी महाराज की प्रेरणा से आचार्य श्री ज्ञेयसागर जी महाराज, आर्यिका श्री स्वस्ति भूषण माता जी, आर्यिका श्री आर्ष माताजी, आर्यिका श्री सुज्ञानमती माताजी के आशीर्वाद, ब्र.मंजुला दीदी, ब्र.मनीष भैया के निर्देशन में पश्चिम बंगाल, झारखंड, उड़ीसा के विभिन्न स्थानों पर पर्यूषण महापर्व पर धर्म प्रभावना हो रही है। पर्यूषण पर्व के प्रथम दिन उत्तम क्षमा धर्म पर सभी मंदिरों में नित्य नियम पूजन आरती, प्रवचन, सांस्कृतिक कार्यक्रम हुए। पर्युषण महापर्व 28 अगस्त से 6 सितंबर तक धर्म प्रभावना पूर्वक पश्चिम बंगाल, उड़ीसा,झारखंड के सराक क्षेत्र में होंगे। इस अवसर पर स्यादवाद महाविद्यालय वाराणसी, श्रमण ज्ञान भारती मथुरा, वर्णी संस्थान विकास सभा के विद्वानों द्वारा धर्म प्रभावना हो रही है।</p>
<p><strong>सराक भाइयों के उत्थान के लिए कार्य जारी </strong></p>
<p>भारतीय जैन मिलन क्रमांक10 के क्षेत्रीय अध्यक्ष अरुण चंदेरिया, क्षेत्रीय कार्य अध्यक्ष संजय जैन शक्कर, संयोजक मनीष विद्यार्थी, राकेश जैन बमोरी सागर में रेलवे स्टेशन पर सराक क्षेत्र प्रभावना करने जा रहे विद्वानों को तिलक, टोपी लगाकर सम्मानित किया। सराक क्षेत्र में 1995 से निरंतर शीतकालीन, ग्रीष्मकालीन एवं पर्यूषण पर्व पर आयोजन से सतत हो रहा है। मुख्य संयोजक पं.मनीष शास्त्री विद्यार्थी सागर ने बताया कि आचार्य श्री ज्ञान सागर जी महाराज की प्रेरणा एवं आशीर्वाद से पश्चिम बंगाल झारखंड उड़ीसा के लगभग 8 लाख सराक भाइयों के उत्थान के लिए कार्य चल रहा हैं।</p>
<p><strong>25 विद्वानों द्वारा सभी मंदिर में धर्म प्रभावना hai होगी</strong></p>
<p>कार्यक्रम की निर्देशक ब्र. मंजुला दीदी सम्मेद शिखर ने बताया कि पर्यूषण महापर्व के अवसर पर 25 विद्वानों द्वारा सभी मंदिर में धर्म प्रभावना होगी। सुबह से जिन मंदिरों में सामूहिक पूजन, दोपहर में क्लास, शाम को आरती, प्रवचन एवं अनेक सांस्कृतिक कार्यक्रम संपन्न होंगे। समापन के अवसर पर विद्यभावन छात्र-छात्राओं का सम्मान पाठशाला टीचर विद्वान सम्मान के साथ कार्यक्रम होगा। सहसंयोजक पंडित जयकुमार जैन दुर्ग, पं.राजकुमार जैन सागर स्थानीय संयोजक गौरांग जैन, रामदुलार जैन, सृष्टिधर जैन, डॉ प्रदीप जैन, शक्तिपथ, अनुज सराक जैन कार्यक्रम को सफल बनाने में सक्रिय रूप से कार्य कर रहे हैं। कार्यक्रम में भारतवर्षीय दिगंबर जैन सराक ट्रस्ट दिल्ली एवं पश्चिम बंगाल झारखंड उड़ीसा स्थानीय सराक समिति धर्म प्रभावना कार्य कर रही है।</p>
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		<title>नौगामा में उत्तम क्षमा धर्म पर विशेष पूजा अर्चना : पर्यूषण महापर्व के प्रथम दिन हुआ भव्य आयोजन </title>
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		<pubDate>Thu, 28 Aug 2025 09:55:07 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[बांसवाड़ा जिले के नौगामा में पर्यूषण महापर्व के प्रथम दिन उत्तम क्षमा धर्म पर विशेष पूजा-अर्चना आयोजित की गई। इस अवसर पर अभिषेक, ध्वजारोहण, देव-शास्त्र-गुरु पूजन, भक्ति संगीत, गरबा और प्रवचन के साथ धार्मिक उत्साह का माहौल रहा। पढ़िए सुरेश चन्द्र गांधी रिपोर्ट… बांसवाड़ा जिले के नौगामा स्थित 1008 आदिनाथ भगवान महावीर समवसरण मंदिर, सुखोदय [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>बांसवाड़ा जिले के नौगामा में पर्यूषण महापर्व के प्रथम दिन उत्तम क्षमा धर्म पर विशेष पूजा-अर्चना आयोजित की गई। इस अवसर पर अभिषेक, ध्वजारोहण, देव-शास्त्र-गुरु पूजन, भक्ति संगीत, गरबा और प्रवचन के साथ धार्मिक उत्साह का माहौल रहा। <span style="color: #ff0000">पढ़िए सुरेश चन्द्र गांधी रिपोर्ट…</span></strong></p>
<hr />
<p>बांसवाड़ा जिले के नौगामा स्थित 1008 आदिनाथ भगवान महावीर समवसरण मंदिर, सुखोदय तीर्थ नसिया जी में पर्यूषण महापर्व का प्रथम दिन बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। बीना (मध्यप्रदेश) से संदीप भैया, राकेश भैया तथा विधानाचार्य रमेश चंद्र गांधी के सानिध्य में विशेष शांतिधारा अभिषेक संपन्न हुआ। प्रथम सौभाग्य पिंडारमिया संदीप जयंतीलाल, सुभाष छगनलाल पंचोली, विनोद लक्ष्मी लाल पंचोरी एवं विमल सागरमल को प्राप्त हुआ।</p>
<p>आदिनाथ मंदिर से श्रीजी को गाजे-बाजे के साथ पंडाल में लाकर गनगोटी पर विराजमान कराया गया। मंदिर में साथिया भरा गया और महिला मंडल व बालिका मंडल द्वारा 16 स्वप्न एवं अष्टप्रतिहारी विराजमान किए गए। ध्वजारोहण का सौभाग्य पिंडारमिया सुभाष मगनलाल को प्राप्त हुआ।</p>
<p>आष्टा (मध्यप्रदेश) से पधारे प्रसिद्ध गीतकार पंकज जैन के मधुर भजनों के साथ देव-शास्त्र-गुरु पूजन, सरस्वती पूजन और दशलक्षण पूजन भक्ति भाव से संपन्न हुए। श्रद्धालु गरबा नृत्य में शामिल हुए और धर्मानंद का अनुभव किया।</p>
<p><strong>क्षमा आत्मा का सर्वोत्तम गुण</strong></p>
<p>दोपहर में संदीप भैया ने उत्तम क्षमा धर्म पर मंगल प्रवचन दिए। उन्होंने कहा कि क्षमा आत्मा का सर्वोत्तम गुण है, जो संबंधों में प्रेम और समन्वय लाता है। शाम को मंदिर में मंगल आरती के बाद जैन पाठशाला के छात्रों ने रंगारंग प्रस्तुतियां दीं और प्रश्न मंच के माध्यम से क्षमा धर्म का महत्व बताया। इस अवसर पर बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाएं उपस्थित रहे। आयोजन की जानकारी जैन समाज प्रवक्ता सुरेश चंद्र गांधी ने दी।</p>
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		<title>अहंकार नहीं, विनम्रता ही बनाती है व्यक्ति को सच्चा नेता : विनम्रता में छिपी है नेतृत्व की सच्ची कला – मुनि प्रमाण सागर </title>
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		<pubDate>Thu, 28 Aug 2025 08:58:58 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[भोपाल के अवधपुरी में चल रहे पर्युषण महापर्व पर मुनि श्री प्रमाण सागर जी ने कहा कि विनम्रता ही सच्चे नेतृत्व की आत्मा है। अहंकारी व्यक्ति केवल हुकूमत करता है, पर विनम्र व्यक्ति प्रभाव डालता है। उन्होंने मार्दव धर्म की साधना और विनम्रता अपनाने के उपाय बताए। पढ़िए अविनाश जैन विधावाणी की ख़ास रिपोर्ट… भोपाल [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>भोपाल के अवधपुरी में चल रहे पर्युषण महापर्व पर मुनि श्री प्रमाण सागर जी ने कहा कि विनम्रता ही सच्चे नेतृत्व की आत्मा है। अहंकारी व्यक्ति केवल हुकूमत करता है, पर विनम्र व्यक्ति प्रभाव डालता है। उन्होंने मार्दव धर्म की साधना और विनम्रता अपनाने के उपाय बताए। <span style="color: #ff0000">पढ़िए अविनाश जैन विधावाणी की ख़ास रिपोर्ट…</span></strong></p>
<hr />
<p>भोपाल के अवधपुरी में पर्वराज पर्युषण महापर्व के दूसरे दिन मुनि श्री प्रमाण सागर जी ने उत्तम मार्दव धर्म पर प्रवचन दिया। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय की अंधी दौड़ में मनुष्य ने विनम्रता को भुला दिया है, जबकि यही सच्चे नेतृत्व का आधार है। अहंकारी व्यक्ति केवल हुकूमत करता है, लेकिन विनम्र व्यक्ति अपने प्रभाव से समाज को जोड़ता है।</p>
<p>मुनि श्री ने समाज में बढ़ती असहिष्णुता, आक्रोश और संवादहीनता पर चिंता व्यक्त की और कहा कि परिवारों में पीढ़ियों के बीच अहं का टकराव बड़ा कारण है। कार्यस्थलों पर टीमवर्क की कमी और सोशल मीडिया पर ट्रोलिंग भी इसी का परिणाम है।</p>
<p>उन्होंने बताया कि मार्दव साधना के लिए आवश्यक है – हर परिस्थिति को स्वीकार करना, दूसरों की प्रशंसा करना, क्रोध के क्षणों में मौन साधना और भावनायोग के माध्यम से आत्मनिरीक्षण। उन्होंने सामूहिक नियम दिया कि “आज कोई कुछ भी कहेगा तो मैं छोड़ दूँगा” अर्थात क्रोध पर नियंत्रण रखूँगा।</p>
<p><strong>अभिषेक और शांतिधारा संपन्न </strong></p>
<p>प्रातःकाल भगवान का अभिषेक और शांतिधारा संपन्न हुई। तत्पश्चात संस्कार शिविर का ध्वजारोहण कोलकाता के सरावगी परिवार ने किया। इस अवसर पर देश-विदेश से हजारों श्रद्धालु उपस्थित रहे। दशलक्षण धर्म विधान के बाद मुनि श्री संधान सागर महाराज सहित समस्त संघ मंचासीन रहा और सामूहिक ध्यान कराया गया। मुनि श्री ने अंत में कहा – “विनम्रता कमजोरी नहीं, बल्कि आत्मबल की पहचान है। अहंकार हुकूमत करता है, पर विनम्रता प्रभाव छोड़ती है।”</p>
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		<title>दिगम्बर जैन समाज के दस लक्षण पर्यूषण पर्व 28 अगस्त से प्रारंभ : वागड़ मेवाड़ में श्रद्धा और उमंग के साथ मनाया जाएगा पर्यूषण महापर्व </title>
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		<pubDate>Mon, 25 Aug 2025 14:14:41 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[दिगम्बर जैन समाज का पर्यूषण महापर्व 28 अगस्त से 6 सितम्बर तक पश्चिम बंगाल के चितरंजन मिहिजाम स्थित श्री पारसनाथ दिगम्बर जैन मंदिर में मनाया जाएगा। इस दौरान दस दिवसीय धर्मिक आयोजन, उपवास, अभिषेक, शांतिधारा और रथोत्सव के कार्यक्रम आयोजित होंगे। पढ़िए पूरी रिपोर्ट… दिगम्बर जैन समाज के संयम, तप और त्याग का पर्वाधिराज पर्यूषण [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>दिगम्बर जैन समाज का पर्यूषण महापर्व 28 अगस्त से 6 सितम्बर तक पश्चिम बंगाल के चितरंजन मिहिजाम स्थित श्री पारसनाथ दिगम्बर जैन मंदिर में मनाया जाएगा। इस दौरान दस दिवसीय धर्मिक आयोजन, उपवास, अभिषेक, शांतिधारा और रथोत्सव के कार्यक्रम आयोजित होंगे। <span style="color: #ff0000">पढ़िए पूरी रिपोर्ट…</span></strong></p>
<hr />
<p>दिगम्बर जैन समाज के संयम, तप और त्याग का पर्वाधिराज पर्यूषण महापर्व 28 अगस्त से प्रारंभ हो रहे हैं। प्रतिष्ठाचार्य पंडित विनोद पगारिया ने बताया कि यह दस दिवसीय पर्व 6 सितम्बर तक चलेगा। पश्चिम बंगाल के चितरंजन मिहिजाम स्थित श्री पारसनाथ दिगम्बर जैन मंदिर में उनके तत्वावधान में विविध आयोजन होंगे।</p>
<p><strong>पर्यूषण पर्व के तहत प्रत्येक दिन विशेष धर्मों का पालन किया जाएगा:</strong></p>
<p>• 28 अगस्त: उत्तम क्षमा धर्म</p>
<p>• 29 अगस्त: उत्तम मार्दव धर्म</p>
<p>• 30 अगस्त: आर्जव धर्म</p>
<p>• 31 अगस्त: सत्य धर्म और भगवान पुष्पदन्त जी मोक्ष कल्याणक</p>
<p>• 1 सितम्बर: शौच धर्म</p>
<p>• 2 सितम्बर: संयम धर्म और सुंगध दशमी पर्व</p>
<p>• 3 सितम्बर: उत्तम तप धर्म</p>
<p>• 4 सितम्बर: उत्तम त्याग धर्म</p>
<p>• 5 सितम्बर: उत्तम आकिंचन धर्म</p>
<p>• 6 सितम्बर: उत्तम ब्रह्यचार्य धर्म, अनन्त चतुदर्शी और वासुपूज्य भगवान का मोक्ष कल्याणक</p>
<p>इस अवसर पर नगर के प्राचीन मंदिरों जैसे आदिनाथ दिगम्बर जूना मंदिर, चन्द्रप्रभु मंदिर, गांधियों का मंदिर, सेठों का मंदिर, सोनियों का मंदिर, भगवान ऋषभदेव पगल्याजी जल मंदिर, अतिशय क्षेत्र योगेंद्र गिरी, श्री शांतिनाथ मंदिर सिद्धी रेजीडेन्सी, अजीतनाथ मंदिर गोवाड़ी में प्रतिदिन प्रातः श्रद्धालुओं द्वारा जिनेन्द्र भगवान का अभिषेक और शांतिधारा की जाएगी। इसके बाद नव देवता पूजा, देव शास्त्र गुरु पूजा, मूलनायक भगवान की पूजा, सोलह कारण पर्व पूजा, पंचमेरू पूजा तथा दशलक्षण विधान के बाद तत्वार्थ सूत्र का वांचन किया जाएगा। रात्रि में जिनेन्द्र भगवान की आरती उतारी जाएगी।</p>
<p><strong>8 सितम्बर को एक रथ और 9 सितम्बर को दो रथ निकाले जाएंगे</strong></p>
<p>समाज के सेठ महेश नोगमिया ने बताया कि पर्व के तहत भाद्रपद शुक्ल त्रयोदशी 5 सितम्बर और भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी 6 सितम्बर को रात्रि में जिन प्रतिमा और जिनवाणी को प्राचीन काष्ठ निर्मित पालकी में विराजित कर पालकियाँ निकाली जाएंगी। 7 सितम्बर को पूर्णिमा क्षमावाणी पर्व मनाया जाएगा। इसके पश्चात रथोत्सव पर्व के तहत 8 सितम्बर को एक रथ और 9 सितम्बर को दो रथ निकाले जाएंगे। समूचे वागड़ मेवाड़ क्षेत्र में पर्यूषण पर्व श्रद्धा और उमंग के साथ मनाया जाएगा। इस अवसर पर जैन श्रद्धालु निराहार रहकर उपवास की तप साधना करेंगे।</p>
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		<title>पर्यूषण महापर्व 8 सितम्बर से 17 सितंबर 2024 पर विशेष : दसलक्षण महापर्व : विकारों से मुक्ति के दस उपाय </title>
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		<pubDate>Thu, 05 Sep 2024 06:45:43 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[दसलक्षण महापर्व जैन धर्म का एक महत्वपूर्ण पर्व है, जिसे जैन धर्मावलंबियों द्वारा बड़े उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। यह पर्व दस दिनों तक चलता है और इसमें दस महत्वपूर्ण धर्मों या गुणों का पालन किया जाता है। इन दस धर्मों का पालन करने से आत्मा को शुद्ध किया जाता है और [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>दसलक्षण महापर्व जैन धर्म का एक महत्वपूर्ण पर्व है, जिसे जैन धर्मावलंबियों द्वारा बड़े उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। यह पर्व दस दिनों तक चलता है और इसमें दस महत्वपूर्ण धर्मों या गुणों का पालन किया जाता है। इन दस धर्मों का पालन करने से आत्मा को शुद्ध किया जाता है और मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है। जैन धर्म में इस पर्व का अत्यधिक महत्व है, और इसे अहिंसा, तपस्या, और आत्मसंयम के आदर्शों को पुनः स्मरण करने का अवसर माना जाता है। <span style="color: #ff0000">पढ़िए डॉ. सुनील जैन संचय का विशेष आलेख&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p>जैन धर्म में अहिंसा एवं आत्&#x200d;मा की शुद्धि को सबसे महत्&#x200d;वपूर्ण स्&#x200d;थान दिया जाता है। प्रत्&#x200d;येक समय हमारे द्वारा किये गये अच्&#x200d;छे या बुरे कार्यों से कर्म बंध होता है, जिनका फल हमें अवश्&#x200d;य भोगना पड़ता है। शुभ कर्म जीवन व आत्&#x200d;मा को उच्&#x200d;च स्&#x200d;थान तक ले जाता है, वही अशुभ कर्मों से हमारी आत्&#x200d;मा मलिन होती जाती है।</p>
<p>पर्युषण पर्व के दौरान विभिन्&#x200d;न धार्मिक क्रियाओं से आत्&#x200d;मशुद्धि की जाती व मोक्षमार्ग को प्रशस्त करने का प्रयास किया जाता है, ताकि जनम-मरण के चक्र से मुक्ति पायी जा सके। जब तक अशुभ कर्मों का बंधन नहीं छुटेगा, तब तक आत्मा के सच्&#x200d;चे स्&#x200d;वरूप को हम नहीं पा सकते हैं।<br />
यह पर्व जीवन में नया परिवर्तन लाता है। दश दिवसीय यह पावन पर्व पापों और कषायों को रग -रग से विसर्जन करने का संदेश देता है।<br />
यह एक ऐसा उत्सव या पर्व है जिसमें आत्मरत होकर व्यक्ति आत्मार्थी बनता है व अलौकिक, आध्यात्मिक आनंद के शिखर पर आरोहण करता हुआ मोक्षगामी होने का सद्प्रयास करता है। पर्युषण आत्म जागरण का संदेश देता है और हमारी सोई हुई आत्मा को जगाता है। यह आत्मा द्वारा आत्मा को पहचानने की शक्ति देता है।</p>
<p>यह पर्व जीवमात्र को क्रोध, मान,माया,लोभ, ईर्ष्या, द्वेष, असंयम आदि विकारी भावों से मुक्त होने की प्रेरणा देता है। हमारे विकार या खोटे भाव ही हमारे दु:ख का कारण हैं और ये भाव वाह्य पदार्थों या व्यक्तियों के संसर्ग के निमित्त से उत्पन्न होते हैं। आसक्ति—रहित आत्मावलोकन करने वाला प्राणी ही इनसे बच पाता है। इस पर्व में इसी आत्म दर्शन की साधना की जाती है। यह एक ऐसा अभिनव पर्व है कि जिससे किसी अवतार, युग पुरुष या व्यक्ति विशेष का गुणगान न करके अपने ही भीतर छिपे सद्गुणों को विकसित करने का पुरुषार्थ किया जाता है। अपने व्यक्तित्व को समुन्नत बनाने का यह पर्व एक सर्वोत्तम माध्यम है।</p>
<p>जैनधर्म में विकारों से मुक्ति के दस उपाय बताते गए हैं। उन्हें धर्म के दस लक्षण भी कहा जाता है। उन्हीं दस लक्षणों की चर्चा—वार्ता की प्रधानता होने से इस पर्व को दशलक्षण पर्व कहा जाता है। इन दस लक्षणों को अपने आचरण में उतारने के लिए जो साधना करता है, वह एक दिन निर्विकार हो जाता है। यह हम सबका कर्तव्य है कि विकारों से बचते हुए हम धर्म—मार्ग पर चलें।</p>
<p>मूलत: आत्मा का स्वभाव ज्ञान और दर्शन है। इन्हीं की उपलब्धि के लिए चारित्र की उपयोगिता है । यही मोक्षमार्ग है। इस मोक्षमार्ग की दश सीढ़ी हैं जिन पर चढ़कर भव्य मानव पूर्व ज्ञान और दर्शन को प्राप्त करता है। ये दश सीढ़ियां धर्म के दशलक्षण हैं—<br />
मोक्षशास्त्र में जैनाचार्य उमास्वामी जी ने लिखा है-‘‘उत्तमक्षमामार्दवार्जव -शौच -सत्य संयम -तप -त्यागाकिंचन्य ब्रह्मचर्याणि धर्म:’’ अर्थात उत्तम क्षमा, मार्दव, आर्जव शौच, सत्य, सयंम, तप, त्याग, आकिंचन्य और ब्रह्मचर्य ये दश धर्म हैं।</p>
<p><strong>दस दिन तक इन धर्मों की क्रमशः आराधना की जाती है। आइये संक्षेप में प्रत्येक धर्म के बारे में जानें-</strong><br />
<span style="color: #ff0000">1.क्रोध पर अंकुश लगानें का उपाय &#8216;उत्तम क्षमा धर्म :</span></p>
<p>उत्तम क्षमा धर्म हमारी वैमनस्यता, कलुषता, बैर—दुश्मनी एवं आपस की तमाम प्रकार की टकराहटों को समाप्त कर जीवन में प्रेम, स्नेह, वात्सल्य, प्यार, आत्मीयता की धारा को बहाने का नाम है। हम अपनी कषायों को छोड़ें, अपने बैरों की गांठों को खोलें, बुराइयों को समाप्त करें, बदलें, प्रतिशोध की भावना को नष्ट करें, नफरत—घृणा, द्वेष बंद करें, आपसी झगड़ों, कलह को छोड़ें।<br />
आज का मनुष्य अपने आवेगों से परेशान है। वह हर समय तनाव में जी रहा है। सास और बहू, ननद और भावज, देवरानी और जेठानी तथा भाई और भाई के बीच की अनबन या कलह आज घर—घर की कहानी बन गई है। पूरे देश के लोग जाति, भाषा और समुदाय के नाम पर झगड़ रहे हैं। यह सब आम आदमी के मन में रचे—बसे क्रोध का ही दुष्परिणाम है। क्रोध की दिनों—दन बढ़ती इस लहर पर अंकुश लगा कर ही हम पारिवारिक और सामाजिक शान्ति का मार्ग प्रशस्त कर सकते हैं। जब क्रोध आये तो तुरन्त प्रतिक्रिया व्यक्त करने से बचना चाहिए। समय का अन्तराल क्रोध के आवेग को कम कर देता है। पूरी और गहरी सांस लेने से भी क्रोध पर विजय पाई जा सकती है।</p>
<p><span style="color: #ff0000">2.विनम्रता सिखाता है &#8216;उत्तम मार्दव &#8216;:</span></p>
<p>सब से विनम्र भाव से पेश आएं, सब प्राणियों के प्रति मैत्री भाव रखें । क्योंकि सभी प्राणियों को जीवन जीने का अधिकार है। मृदु परिणामी व्यक्ति कभी किसी का तिरस्कार नहीं करता और यह सृष्टि का नियम है कि यहाँ दूसरों का आदर देने वाला ही स्वयं आदर का पात्र बन सकता है।</p>
<p><span style="color: #ff0000">3.कथनी और करनी एक हो- उत्तम आर्जव :</span><br />
आर्जव धर्म का अर्थ है— मन, वाणी और कर्म की पवित्रता और यह पवित्रता ही किसी व्यक्ति को महान बनाती है। महापुरुष जो कहते हैं, वही करते हैं, किन्तु कुटिल पुरुषों की कथनी और करनी में अन्तर होता है। यह मायाचार है। शास्त्रों में इसे त्याज्य बताया गया है। आज सर्वत्र मायाचार या छल—कपट का साम्राज्य है। आज धर्म के क्षेत्र में भी मायाचार देखा जा सकता है। इस धर्म का ध्येय है कि हम सब को सरल स्वभाव रखना चाहिए, मायाचारी त्यागना चाहिए।</p>
<p><span style="color: #ff0000">4. लोभ त्यागने का संदेश देता है &#8216;उत्तम शौच धर्म &#8216;:</span></p>
<p>भौतिक संसाधनों और धन दौलत में खुशी खोजना यह महज आत्मा का एक भ्रम है।<br />
उत्तम शौच धर्म हमे यही सिखाता है कि शुद्ध मन से जितना मिला है उसी में खुश रहो।लोभ छोड़ने से ही आत्मा में उत्तम शौच धर्म प्रकट होता है।</p>
<p><span style="color: #ff0000">5.वाणी का करें सदुपयोग —</span></p>
<p>उत्तम सत्य धर्म : व्यवहार में वाणी के सदुपयोग को सत्य कहते हैं।दुर्लभ वाणी का सदुपयोग करने वाला ही धर्मात्मा कहला सकता है। हित—मित और प्रिय वचन बोलना ही वाणी का सदुपयोग है। कटु, कर्वश एंव निन्दापरक वचन बाण की तरह होते हैं, जो सुनने वाले के हृदय में घाव कर देते हैं ।</p>
<p><span style="color: #ff0000">6.जीवन की उन्नति के लिये संयम जरूरी-उत्तम संयम धर्म : </span><br />
मन, वचन और शरीर को काबू में रखना।प्राणी-रक्षण और इन्द्रिय दमन करना संयम है। स्पर्शन, रसना, घ्राण, नेत्र, कर्ण और मन पर नियंत्रण (दमन, कन्ट्रोल) करना इन्द्रिय-संयम है। पृथ्वीकाय, जलकाय, अग्निकाय, वायुकाय, वनस्पतिकाय और त्रसकाय जीवों की रक्षा करना प्राणी संयम है। संयम भोजन पान में भक्ष्य के विवेक पर भी जोर देता है। वह जीवन का अनुशासन है। उसका पालन करते हुए ही जीवन को सुखी, निरापद और शानदार बनाया जा सकता है।</p>
<p><span style="color: #ff0000">7. मन की शुद्धि सिखाता है &#8211; उत्तम तप धर्म:</span><br />
मलिन वृत्तियों को दूर करने के लिए जो बल चाहिए, उसके लिए तपस्या करना।तप का मतलब सिर्फ उपवास, भोजन नहीं करना सिर्फ इतना ही नहीं है बल्कि तप का असली मतलब है कि इन सब क्रिया के साथ अपनी इच्छाओं और ख्वाहिशों को वश में रखना।<br />
तप का प्रयोजन है मन की शुद्धि! मन की शुद्धि के बिना काया को तपाना या क्षीण करना व्यर्थ है। तप से ही आध्यात्म की यात्रा का ओंकार होता है।</p>
<p><span style="color: #ff0000">8. उत्तम कार्यों के लिए करें दान, त्यागें बुरी आदत-उत्तम त्याग धर्म:</span></p>
<p>उत्तम पात्र को ज्ञान, अभय, आहार, औषधि आदि दान देना चाहिए। धन की तीन गतियाँ हैं— दान, भोग और नाश। बुद्धिमत्ता इसी में है कि नष्ट होने से पहले उसे परोपकार में लगा दिया जाये। उत्तम कार्यों में दिया या लगाया हुआ धन ही सार्थक है, अन्यथा तो उसे अनर्थों की जड़ कहा गया है।</p>
<p><span style="color: #ff0000">9. अहंकार और ममकार से निवृत्ति- उत्तम आकिंचन धर्म : </span><br />
किसी भी चीज में ममता न रखना। अपरिग्रह स्वीकार करना।आत्मा के अपने गुणों के सिवाय जगत में अपनी अन्य कोई भी वस्तु नहीं है इस दृष्टि से आत्मा अकिंचन है। अकिंचन रूप आत्मा-परिणति को आकिंचन करते हैं।</p>
<p><span style="color: #ff0000">10. ब्रह्मचर्य</span></p>
<p>सद्गुणों का अभ्यास करना और अपने को पवित्र रखना। ब्रह्मचर्य का वास्तविक अर्थ है अन्तर्यात्रा अर्थात् अपनी ज्ञानरूप आत्मा में लीन होना। व्यवहार में मन की वासना या विकारों को जीतने का नाम ब्रह्मचर्य है।</p>
<p>संक्षेप में सार यही है धर्म के दस लक्षण । धर्म तो एक और अखण्ड है, ये दस तो उस तक पहुँचने के रास्ते हैं। कहीं से भी शुरू कीजिए, आप अपनी मंजिल पा जायेगें । इस दशांग धर्म के आचरण से ही आत्मा निर्मल—निर्विकार होता है । व्यवहारिक जीवन की सफलता भी इन्हींके अनुपालन पर निर्भर है। जिसके आचरण में ये उतर जाते हैं वह सुख और आनन्द के वातावरण में विचरण करने लगता है।<br />
जैन धर्म में सबसे उत्तम पर्व है पर्युषण। यह सभी पर्वों का राजा है। इसे आत्मशोधन का पर्व भी कहा गया है, जिसमें तप कर कर्मों की निर्जरा कर अपनी काया को निर्मल बनाया जा सकता है। इन पर्व के दिनों में साधक अपनी आत्मा पर लगे कर्म रूपी मैल की साफ-सफाई करते हैं।<br />
यह आत्मा द्वारा आत्मा को पहचानने की शक्ति देता है। इस दौरान व्यक्ति की संपूर्ण शक्तियां जग जाती हैं। पर्युषण का अर्थ है – ‘ परि ‘ यानी चारों ओर से , ‘ उषण ‘ यानी धर्म की आराधना। वर्ष भर के सांसारिक क्रिया – कलापों के कारण उसमें जो दोष चिपक गया है , उसे दूर करने का प्रयास इस दौरान किया जाता है। शरीर के पोषण में तो हम पूरा वर्ष व्यतीत कर देते हैं। पर पर्व के इन दिनों में आत्म के पोषण के लिए व्रत, नियम, त्याग, संयम को अपनाया जाता है।</p>
<p>सांसारिक मोह-माया से दूर मंदिरों में भगवान की पूजा-आर्चना, अभिषेक, आरती, जाप एवं गुरूओं के समागम में अधिक से अधिक समय को व्&#x200d;यतीत किया जाता है एवं अपनी इंद्रियों को वश में कर विजय प्राप्&#x200d;त करने का प्रयास करते हैं।<br />
सभी के द्वारा मन-वचन-काय से अहिंसक धर्म का पूर्ण रूप से पालन करने का प्रयत्&#x200d;न करते हुए किसी भी प्रकार के अनावश्&#x200d;यक कार्य को करने से परहेज किया जाता है।<br />
शास्&#x200d;त्रों की विवेचना की जाती है व जप के माध्&#x200d;यम से कर्मों को काटने का प्रयत्&#x200d;न करते हैं। व्रत व उपवास करके आत्&#x200d;मकेंद्रित होने का प्रयास व विषय-कसायों से दूर रहा जाता है।<br />
संयम और आत्मशुद्धि के इस पवित्र महापर्व पर श्रद्धालु श्रद्धापूर्वक व्रत-उपवास रखते हैं। मंदिरों को भव्यतापूर्वक सजाते हैं तथा अभिषेक-शांतिधारा, विशेष पूजन, विधान कर विशाल शोभा यात्राएं निकाली जाती हैं। इस दौरान जैन व्रती कठिन नियमों का पालन भी करते हैं ,जैसे बाहर का खाना पूर्णत: वर्जित होता है, दिन में केवल एक समय ही भोजन करना आदि। बड़ी संख्या में साधक दस दिन तक निर्जला उपवास भी रखते हैं।<br />
मानवीय एकता, शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व, मैत्री, शोषणविहीन सामाजिकता, अंतरराष्ट्रीय नैतिक मूल्यों की स्थापना, अहिंसक जीवन आत्मा की उपासना शैली का समर्थन आदि तत्त्व पर्युषण महापर्व के मुख्य आधार हैं।<br />
आज की दौड़-भाग भरी जिंदगी में जहां इंसान को चार पल की फुर्सत अपने घर-परिवार के लिए नहीं है, वहां खुद के निकट पहुंचने के लिए तो पल-दो पल भी मिलना मुश्किल है। इस मुश्किल को आसान और मुमकिन बनाने के लिए जब यह पर्व आता है, तब समूचा वातावरण ही तपोमय हो जाता है।<br />
संक्षेप में पर्यूषण महापर्व (दसलक्षण धर्म) का तात्पर्य है पुरानी दिनचर्या का बदलना, खान-पान और विचारों में परिवर्तन आकर मन सद्भावनाओं से भर जाना। विकृति का विनाश और विशुद्धि का विकास करना ही इस पर्व का ध्येय है।<br />
जैन धर्मावलंबी भाद्रपद मास में भाद्रपद शुक्ल पंचमी से चतुर्दशी तक पर्यूषण पर्व मनाते हैं। श्वेताम्बर जैन संप्रदाय के पर्यूषण 8 दिन चलते हैं। उसके बाद दिगंबर जैन संप्रदाय वाले 10 दिन तक पर्यूषण मनाते हैं। दिगंबर परंपरा में इसकी ‘दशलक्षण पर्व’ के रूप में पहचान है। उनमें इसका प्रारंभिक दिन भाद्र व शुक्ला पंचमी और संपन्नता का दिन चतुर्दशी है। यह सभी पर्वों का राजा है। इसे आत्मशोधन का पर्व भी कहा गया है।</p>
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