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	<title>पट्टाभिषेक &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<description>ताज़ा खबरे हिन्दी में</description>
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	<title>पट्टाभिषेक &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>राजस्थान के जैन संत 28 धर्म आराधना के साथ गुरु वंदना कर साहित्य की रचना का दौर: ब्रह्म जयराज ने अपनी रचना में गुरु छंद लिखे </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 25 Mar 2025 00:30:09 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[राजस्थान के जैन संतों ने अपने गुरुओं की कीर्ति का खूब बखान किया है। राजस्थान की धरती पर जैन संतों की स्थापित परंपरा में कई संतों ने अपने लेखन के माध्यम से जैन धर्म को पोषित और पल्लवित किया है। धर्म के प्रति जनजागरण तो वे अपने प्रवचनों में करते ही थे, लेकिन अपनी रचनाओं [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>राजस्थान के जैन संतों ने अपने गुरुओं की कीर्ति का खूब बखान किया है। राजस्थान की धरती पर जैन संतों की स्थापित परंपरा में कई संतों ने अपने लेखन के माध्यम से जैन धर्म को पोषित और पल्लवित किया है। धर्म के प्रति जनजागरण तो वे अपने प्रवचनों में करते ही थे, लेकिन अपनी रचनाओं में जैन गुरुओं के चरित्र को भी बखूबी उकेरा गया। <span style="color: #ff0000">जैन धर्म के राजस्थान के दिगंबर जैन संतों पर एक विशेष शृंखला में 28वीं कड़ी में श्रीफल जैन न्यूज के उप संपादक प्रीतम लखवाल का ब्रह्म जयराज के बारे में पढ़िए विशेष लेख…..</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> राजस्थान में जैन संतों ने बहुत धर्म जागरण किया है। यहां पर उन्होंने साहित्य भी खूब रचा। साथ ही समीपवर्ती राज्यों गुजरात, पंजाब दिल्ली आदि राज्यों में विहार कर धर्म ध्वजा को फहराया। यहां जैन संतों की लंबी सूची है, लेकिन आज हम ब्रह्म जयराज के बारे में जानते हैं। ब्रह्म जयराज जी भट्टारक सुमतिकीर्ति के प्रशिष्य एवं भट्टारक गुणकीर्ति के शिष्य थे। संवत 1632 में भट्टारक गुणकीर्ति का पट्टाभिषेक डूंगरपुर नगर में बड़े उत्साह के साथ किया गया था। गुरु छंद में इसी का वर्णन किया गया है। इनके पट्टाभिषेक में देश के सभी प्रांतों से श्रावकगण शामिल हुए थे, क्योंकि उस समय भट्टारक सुमतिकीर्ति का देश में अच्छा सम्मान था। ब्रह्म जयराज ने अपने गुरु भट्टारक गुणकीर्ति की महिमा का गुणगान अपने छंदो में किया है। देखिए इन छंदों में उन्होंने कितने सुंदर तरीके से वर्णन किया।</p>
<p>संवत सोल बत्रीसमि, वैशाख कृष्णा सुपक्ष।</p>
<p>दशमी सुर गुरु जाणिए,लगन लक्ष सुभ दक्ष।</p>
<p>सिंहांसणरूपा तणि विसारया गुरु संत</p>
<p>श्री सुमति कीर्ति सूरि रिगं भरी, ढाल्या कुभं महंत।</p>
<p>&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;</p>
<p>श्री गुण कीर्ति यतींद्र चरण सेवि नर नारि,</p>
<p>श्री गुणकीर्ति यतींद्र पाप तापादिक हारी।</p>
<p>श्री गुणकीर्ति यतींद्र ज्ञानदानादिक दायक,</p>
<p>श्री गुणकीर्ति यतींद्र चार संघाष्टक नायक।</p>
<p>स्ंकल यतीश्वर मंडणो, श्रीसुमति कीर्ति पट्टोधरण।</p>
<p>ज्यराज ब्रह्म एवं वदति श्री सकलसंघ मंगलकरण।</p>
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		<title>राजस्थान के जैन संत 13 भट्टारक श्री अभयचंद्र आध्यात्मिक जादूगर बन गए:  काव्य वैभव और सौष्ठव प्रयुक्त होने की अपेक्षा प्रचार का लक्ष्य अधिक था </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 10 Mar 2025 00:30:30 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[राजस्थान के संत]]></category>
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					<description><![CDATA[राजस्थान के जैन संतों ने जहां अपनी साधुता से जन-जन में आध्यात्मिक चेतना से जनजागरण किया। वहीं उनकी साहित्य साधना ने हिन्दी साहित्य को उस समय खूब समृद्ध किया। संतों का साहित्य के प्रति समर्पण के कारण जैन धर्म को आगे बढ़ाने में सफलता मिली। जैन धर्म के राजस्थान के दिगंबर जैन संतों पर एक [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>राजस्थान के जैन संतों ने जहां अपनी साधुता से जन-जन में आध्यात्मिक चेतना से जनजागरण किया। वहीं उनकी साहित्य साधना ने हिन्दी साहित्य को उस समय खूब समृद्ध किया। संतों का साहित्य के प्रति समर्पण के कारण जैन धर्म को आगे बढ़ाने में सफलता मिली।<span style="color: #ff0000"> जैन धर्म के राजस्थान के दिगंबर जैन संतों पर एक विशेष शृंखला में 13वीं कड़ी में श्रीफल जैन न्यूज के उप संपादक प्रीतम लखवाल का भट्टारक श्री अभयचंद्रजी के बारे में पढ़िए विशेष लेख…..</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> अभयचंद्र नाम के दो भट्टारक हुए हैं। ‘प्रथम अभयचंद्र’ भट्टारक श्री लक्ष्मीचंद्र के शिष्य थे, जिन्होंने एक स्वतंत्र भट्टारक संस्था को जन्म दिया। उनका समय विक्रम की 16वीं शताब्दी का द्वितीय चरण था। दूसरे अभयचंद्र इन्हीं की परंपरा में होने वाले भट्टारक कुमुदचंद्र के शिष्य थे। यहां इन्हीं दूसरे अभयचंद्र जी का परिचय दिया जा रहा है। अभयचंद्र भट्टारक थे और कुमुदचंद्र की समाधि के बाद भट्टारक गादी पर बैठे थे। यद्यपि अभयचंद्र का गुजरात से काफी निकट का संबंध था, लेकिन राजस्थान में भी इनका बराबर विहार होता था और ये गांव-गांव एवं नगर-नगर में भ्रमण करके जनता से सीधा संपर्क बनाए रखते थे। अभयचंद्र अपने गुरु के योग्यतम शिष्य थे। उन्होंने भट्टारक श्री रत्नकीर्ति एवं भट्टारक श्री कुमुदचंद्र जी का काल देखा था। उनकी साहित्य साधना भी देखी थी। इसलिए जब ये प्रमुख संत बने तो इन्होंने भी उसी परंपरा को बनाए रखा। संवत 1685 की फाल्गुन सुदी 11 सोमवार के दिन बारडोली नगर में इनका पट्टाभिषेक हुआ। इस पद पर संवत 1721 तक रहे।</p>
<p><strong>संस्कृत और प्राकृत ग्रंथों का उच्च अध्ययन किया</strong></p>
<p>अभयचंद्र का जन्म संवत 1640 के लगभग हूंबड वंश में हुआ था। इनके पिता का नाम श्रीपाल और माता का नाम कोडमदे था। बचपन से ही बालक अभयचंद्र को साधुओं की मंडली में रहने का अवसर मिला। हेम जी कुंअर जी इनके भाई थे। ये संपन्न घराने के थे। युवावस्था के पहले ही इन्होंने पांचों महाव्रतों का पालन प्रारंभ कर दिया था। इसी के साथ इन्होंने संस्कृत और प्राकृत ग्रंथों का उच्चाध्ययन किया। न्यायशास्त्र में पारंगतता प्राप्त की। अलंकार शास्त्र एवं नाटकों का गहरा अध्ययन किया। अच्छे वक्ता तो ये प्रारंभ से ही थे। विद्वता होने से सोने पर सुहागा सा समन्वय हो गया। जब उन्होंने युवावस्था में पदार्पण किया तो त्याग एवं तपस्या के प्रभाव से इनकी मुखाकृति स्वयंमेव आकर्षक बन गई। जनता के लिए ये आध्यात्मिक जादूगर बन गए। इनके सैकड़ों शिष्य थे। जो स्थान-स्थान पर ज्ञान दान किया करते थे।</p>
<p><strong>अभयचंद्र जी के प्रमुख शिष्य</strong></p>
<p>इनके प्रमुख शिष्यों में गणेश, दामोदर, धर्मसागर, देवजी व रामदेव के नाम प्रमुख हैं। जितनी अधिक प्रशंसा शिष्यों ने इनकी की है। अन्य भट्टारकों की उतनी प्रशंसा देखने में नहीं आती है। एक बार भट्टारक अभयचंद्र का सूरत नगर में आगमन हुआ। वह संवत 1706 का समय था। सूरत नगर निवासियों ने उस समय इनका भारी स्वागत किया। घर-घर उत्सव किया। कुंकुम छिड़का गया। अंग पूजा का आयोजन किया गया।</p>
<p><strong>भट्टारक श्री अभयचंद प्रचारक के साथ-साथ साहित्य निर्माता भी</strong></p>
<p>भट्टारक श्री अभयचंद प्रचारक के साथ-साथ साहित्य निर्माता भी थे। यद्यपि अभी तक उनकी अधिक रचनाएं उपलब्ध नहीं हो सकी हैं, लेकिन फिर भी उन प्राप्त रचनाओं के आधार पर कहा जा सकता है कि उनकी कोई बड़ी रचना भी मिलनी चाहिए। कवि ने लघु गीत अधिक लिखे हैं। इसका प्रमुख कारण तत्कालीन साहित्यिक वातावरण ही था।</p>
<p><strong>इन कृतियों के माध्यम से फैली कीर्ति</strong></p>
<p>अब तक इनकी ये कृतियां उपलब्ध हो चुकी हैं। वासुपूज्यनी धमाल, चंदागीत, सूखड़ी, चतुर्विशति तीर्थंकर लक्षण गीत, पद्मावती गीत, नेमिश्वरस्तु ज्ञान कल्याणक गीत, आदिश्वरनाथनु पंच कल्याणक गीत, बलभद्र गीत आदि हैं। ये सभी रचनाएं लघु कृतियां हैं। यद्यपि काव्यतत्व, शैली एवं भाषा की दृष्टि से ये उच्चस्तरीय रचनाएं नहीं हैं, लेकिन तत्कालीन समय जनता की मांग पर ये रचनाएं लिखी गईं थी। इसलिए इनमें कवि का काव्य वैभव और सौष्ठव प्रयुक्त होने की अपेक्षा प्रचार का लक्ष्य अधिक था। भाषा की दृष्टि से भी इनका अध्ययन आवश्यक है। राजस्थानी भाषा की ये रचनाएं हैं तथा उसका प्रयोग कवि ने अत्यधिक सावधानी से किया है। गुजराती भाषा का प्रयोग तो स्वभावतः ही हो गया है। इस प्रकार कविवर अभयचंद्र ने अपनी लघु रचनाओं के माध्यम से हिन्दी साहित्य की जो महती सेवा की थी। वह सदा स्मरणीय रहेगी ।</p>
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		<title>22 वर्षीय युवा बने श्रवणबेलगोला के नए भट्टारक : पट्टाभिषेक के बाद चारुकीर्ति भट्टारक की जयकार के साथ निकली पालकी यात्रा </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 01 Apr 2023 17:40:40 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[कर्नाटक राज्य के शिमोगा जिला की सागर तहसील में श्रावक श्रेष्ठी अशोक इन्द्र व अनिता अशोक इन्द्र के घर 26 फरवरी, 2001 को जन्मे ‘आगम इन्द्र’ को पट्टाभिषेक के बाद श्रवणबेलगोला मठ का नया भट्टारक बनाया गया है। इन्हीं के बारे में पढ़िए श्रवणबेलगोला से हाल में लौटे राजेन्द्र जैन ‘महावीर’ की विशेष रिपोर्ट&#8230; श्रवणबेलगोला [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>कर्नाटक राज्य के शिमोगा जिला की सागर तहसील में श्रावक श्रेष्ठी अशोक इन्द्र व अनिता अशोक इन्द्र के घर 26 फरवरी, 2001 को जन्मे ‘आगम इन्द्र’ को पट्टाभिषेक के बाद श्रवणबेलगोला मठ का नया भट्टारक बनाया गया है। <span style="color: #ff0000;">इन्हीं के बारे में पढ़िए श्रवणबेलगोला से हाल में लौटे राजेन्द्र जैन ‘महावीर’ की विशेष रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>श्रवणबेलगोला / सनावद।</strong> दिगम्बर जैन धर्म की यश कीर्ति के साथ 1040 वर्ष से विश्व को दिगम्बत्व के साथ अहिंसा से सुख, त्याग से शांति, मैत्री से प्रगति, ध्यान से सिद्धि का संदेश दे रहे गोम्मटेश्वर भगवान बाहुबली स्वामी के श्री क्षेत्र श्रवणबेलगोला को शून्य से शिखर व विश्व तीर्थ के रूप में स्थापित करने वाले ज्ञान सूर्य, जैन एकता के महानायक, अपूर्व वात्सल्य-प्रेम-स्नेह की त्रिवेणी, रत्नत्रय के मार्ग स्नेही, प्राणी मात्र के प्रति सद्भाव रखने वाले अनुपम व्यक्तित्व जन-जन में आस्था-श्रद्धा-विश्वास के उन्नयक परम पूज्य जगद्गुरु कर्मयोगी स्वस्ति श्री चारुकीर्तिजी महास्वामी के बीते 23 मार्च को हुए महाप्रयाण के बाद हुई शून्यता को कोई नहीं भर सकता, लेकिन उन्हीं की दूरदर्शिता व भविष्य की संभावनाओं के साथ उनकी पारखी नजर से निकले ‘आगम इन्द्र’ को उन्होंने 2 दिसम्बर 2022 के शुभ मुहूर्त में विचार पट्ट क्षुल्लक आगमकीर्ति बनाकर अव्यक्त संदेश दे दिया था कि ये आगमकीर्ति ही भविष्य के चारुकीर्ति होंगे।</p>
<p><img fetchpriority="high" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-41325" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/04/IMG-20230401-WA0054-1.jpg" alt="" width="1040" height="780" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/04/IMG-20230401-WA0054-1.jpg 1040w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/04/IMG-20230401-WA0054-1-300x225.jpg 300w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/04/IMG-20230401-WA0054-1-1024x768.jpg 1024w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/04/IMG-20230401-WA0054-1-768x576.jpg 768w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/04/IMG-20230401-WA0054-1-74x55.jpg 74w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/04/IMG-20230401-WA0054-1-111x83.jpg 111w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/04/IMG-20230401-WA0054-1-215x161.jpg 215w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/04/IMG-20230401-WA0054-1-990x743.jpg 990w" sizes="(max-width: 1040px) 100vw, 1040px" /></p>
<p>&nbsp;</p>
<p><strong>महाप्रयाण के बाद पट्टाभिषेक</strong></p>
<p>जैन दर्शन में शरीर की असारता से ग्रंथ भरे पड़े है लेकिन ‘शरीर माध्यं खलु धर्म साधनम्’ की बात भी हमने सुनी है। पूज्य स्वामीजी इतनी जल्दी महाप्रयाण कर जाएंगे, यह घटना सभी को स्तब्ध करने वाली थी। उनके महाप्रयाण के बाद 27 मार्च, 2023 को पट्टाभिषेक कार्यक्रम संपन्न हुआ।</p>
<p><img decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-41326" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/04/IMG-20230401-WA0052-1.jpg" alt="" width="1080" height="564" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/04/IMG-20230401-WA0052-1.jpg 1080w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/04/IMG-20230401-WA0052-1-300x157.jpg 300w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/04/IMG-20230401-WA0052-1-1024x535.jpg 1024w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/04/IMG-20230401-WA0052-1-768x401.jpg 768w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/04/IMG-20230401-WA0052-1-990x517.jpg 990w" sizes="(max-width: 1080px) 100vw, 1080px" /></p>
<p>&nbsp;</p>
<p><strong>स्वर्ण पिच्छिका, स्वर्ण पादुका की गई भेंट</strong></p>
<p>27 मार्च को प्रातः 5 बजे विचार पट्ट क्षुल्लकजी के मंगल स्नान के बाद भगवान श्री चंद्रप्रभजी की नव कलशाभिषेक पूजा, समस्त मंदिरों में विशेष पूजा के साथ क्षेत्र की अधिष्ठाता देवी माता कुष्मांडिनी की षोढशोपचार पूजा के बाद पट्टाभिषेक विधि, सिहांसन पूजा हुई। प्रातः 9.21 बजे से वृषभ लग्न में सिंहासनारोहण के साथ पट्टाभिषेक महोत्सव प्रारंभ हुआ। शुभ मुहूर्त में ठीक 9.33 मिनिट पर विचार पट्ट क्षुल्लक श्री आगमकीर्तिजी को उस पट्ट पर विराजित कराया गया, जिस पट्ट पर विगत 54 वर्षों से परम् पूज्य कर्मयोगी जगद्गुरु स्वस्तिश्री चारुकीर्तिजी महास्वामी विराजमान थे। पट्ट पर विराजमान होने के बाद उन्हें परम्परागत मुद्रा (अंगूठी) पहनाई गई। फिर स्वर्ण पिच्छिका, स्वर्ण पादुका आदि भेंट के बाद उनकी पाद पूजा की गई। इसके बाद जय-जयकार के साथ उनकी पालकी यात्रा निकाली गई।</p>
<p><img decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-41327" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/04/IMG-20230401-WA0049-1.jpg" alt="" width="468" height="1040" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/04/IMG-20230401-WA0049-1.jpg 468w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/04/IMG-20230401-WA0049-1-135x300.jpg 135w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/04/IMG-20230401-WA0049-1-461x1024.jpg 461w" sizes="(max-width: 468px) 100vw, 468px" /></p>
<p>&nbsp;</p>
<p><strong>12 भट्टारक स्वामी बने पट्टाभिषेक के साक्षी</strong></p>
<p>परम पूज्य जगद्गुरु कर्मयोगी स्वस्तिश्री चारुकीर्तिजी भट्टारक महास्वामी के शिष्यों की एक लंबी परंपरा है। उसी परम्परा के योग्य शिष्य अपने-अपने तीर्थों का समुन्नत विकास कर रहे हैं। पट्टाभिषेक समारोह में स्वस्तिश्री भुवनकीर्तिजी (कनकगिरी), स्वस्तिश्री धवलकीर्तिजी (अरिहंतगिरि), स्वस्तिश्री भानुकीर्तिजी (कम्बदहल्ली), स्वस्तिश्री चारुकीर्ति पंडिताचार्यवर्य (मूडबद्री), स्वस्तिश्री लक्ष्मीसेन (जिनकांची), स्वस्तिश्री धर्मसेनजी (वरुर), स्वस्तिश्री देवेन्द्रकीर्तिजी (हुमचा), स्वस्तिश्री भट्टाकंलकजी (सौन्दा), स्वस्तिश्री लक्ष्मीसेनजी (नरसिंह राजपुर), स्वस्तिश्री वृषभसेनजी (लक्कवल्ली), स्वस्तिश्री जिनसेनजी (नांदिणी), स्वस्तिश्री सिद्धांतकीर्तिजी (आरतीपुरम्), स्वस्तिश्री लक्ष्मीसेनजी (कोल्हापुर) इस भव्य आयोजन के साक्षी बने।</p>
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<p>इन्होंने संपूर्ण क्रियाएं संपन्न कराईं। क्षेत्र परिवार के श्री एस.ए.सुदर्शन, पं.नंदकुमारजी शास्त्री भी सहयोगी बने। इस अवसर पर विशेष रूप से मुनिश्री आदिसागरजी महाराज, आर्यिका माताजी, क्षुल्लक प्रमेयसागरजी (तपोभूमि उज्जैन), क्षुल्लक दर्शनकीर्तिजी भी उपस्थित थे।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-41329" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/04/IMG-20230401-WA0050.jpg" alt="" width="468" height="1040" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/04/IMG-20230401-WA0050.jpg 468w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/04/IMG-20230401-WA0050-135x300.jpg 135w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/04/IMG-20230401-WA0050-461x1024.jpg 461w" sizes="auto, (max-width: 468px) 100vw, 468px" /></p>
<p>&nbsp;</p>
<p><strong>गौरव अभिनंदन सभा में हुआ गुणगान</strong></p>
<p>इस अवसर पर हुए नामकरण में पट्टाभिषेक के बाद विचार पट्ट क्षुल्लक आगमकीर्ति को ‘‘पूज्य जगद्गुरु स्वस्तिश्री चारुकीर्तिजी भट्टारक स्वामी’’ नाम दिया गया। पट्टाभिषेक के बाद चामुण्डराय मण्डप में हुई गौरव अभिनंदन सभा में देशभर से आए श्रावक, श्राविकाओं व अनेकों संस्थाओं के प्रमुखों ने पट्ट पर विराजित स्वामीजी का अभूतपूर्व सम्मान किया। उन्होंने सभी को आशीर्वाद स्वरूप मंत्राक्षत फल भेंट किए।</p>
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<p>&nbsp;</p>
<p>इस अवसर पर धर्मस्थल तीर्थ के जैन गौरव पद्म विभूषण डाॅ.डी.धर्माधिकारी वीरेन्द्र हेगडे़जी का संदेश लेकर आए उनके अनुज सुरेन्द्र हेगड़े, श्रवणबेलगोला विधायक बालकृष्णा, कर्नाटक जैन एसोसिएशन के प्रसन्नैया, पूर्व मंत्री अभयचंद्र (मूडबिद्री), राष्ट्रीय प्राकृत संस्थान के निदेशक प्रो.जयकुमार उपाध्ये, तीर्थक्षेत्र कमेटी के पूर्व अध्यक्ष सुधीर सिंघई, कटनी, पूर्व महापौर सुरेश पाटील सांगली, विनोद दोडडनवार बेलगांवी, सोशल ग्रुप फेडरेशन के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष हसमुख जैन गांधी, कर्नाटक तीर्थ क्षेत्र कमेटी अध्यक्ष विनोद बाकलीवाल मैसूर, भारतवर्षीय दिगम्बर जैन महासभा के राष्ट्रीय कार्याध्यक्ष अशोक सेठी बेंगलुरु, निहालचंद ठोल्या, विमुक्त जैन, वाय.के.जैन, सोनिया-अजय जैन, आशा जैन, विकास-शालू जैन, अजय पाटनी, जैन पत्रकार महासंघ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष व जैन गजट के सह संपादक राजेन्द्र जैन महावीर, प्रमुख ट्रस्टी अशोककुमार एच.पी. व शांतिसागर फाउण्डेशन के पदाधिकारी, गोम्मटवाणी के संपादक अशोक कुमार श्रवणबेलगोला, बाहुबली विद्यापीठ के पूर्व निदेशक जीवंधर होतपेटे, प्रो.शुभचंद्र मैसूर, श्रवणबेलगोला समाज अध्यक्ष पद्मकुमार, जिनेन्द्रवाणी के संपादक शांतिनाथ होतपेटे उपस्थित थे। संचालन वृषभदास शास्त्री व राजेश शास्त्री श्रवणबेलगोला ने किया।</p>
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		<title>जानिए श्रवणबेलगोला मठ के नवनियुक्त भट्टारक श्री चारुकीर्तिजी स्वामी के बारे में : धार्मिक संस्कारों के साथ राष्ट्र की सेवा करने की भावना देखर महास्वामी जी ने दी थी भट्टारक दीक्षा </title>
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		<pubDate>Sat, 01 Apr 2023 17:35:04 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[कर्नाटक राज्य के शिमोगा जिला की सागर तहसील में श्रावक श्रेष्ठी अशोक इन्द्र व अनिता अशोक इन्द्र के घर 26 फरवरी, 2001 को जन्मे ‘आगम इन्द्र’ को पट्टाभिषेक के बाद श्रवणबेलगोला मठ का नया भट्टारक बनाया गया है। इन्हीं के बारे में पढ़िए राजेन्द्र जैन ‘महावीर’ की विशेष रिपोर्ट&#8230; श्रवणबेलगोला / सनावद। कर्नाटक राज्य के [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>कर्नाटक राज्य के शिमोगा जिला की सागर तहसील में श्रावक श्रेष्ठी अशोक इन्द्र व अनिता अशोक इन्द्र के घर 26 फरवरी, 2001 को जन्मे ‘आगम इन्द्र’ को पट्टाभिषेक के बाद श्रवणबेलगोला मठ का नया भट्टारक बनाया गया है। <span style="color: #ff0000;">इन्हीं के बारे में पढ़िए राजेन्द्र जैन ‘महावीर’ की विशेष रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>श्रवणबेलगोला / सनावद।</strong> कर्नाटक राज्य के शिमोगा जिला की सागर तहसील में श्रावक श्रेष्ठी अशोक इन्द्र व अनिता अशोक इन्द्र के घर 26 फरवरी, 2001 को एक प्रतिभा संपन्न बालक का जन्म हुआ, जिसका नाम ‘आगम इन्द्र’ रखा गया । आपके दादाजी श्रावक श्रेष्ठी आदप्प इन्द्र तथा दादी श्राविका श्रेष्ठ नागम्मा हैं, जो सागर तहसील के करुरु ग्राम के निवासी रहे हैं।</p>
<p><strong>गर्भ से ही भक्ति भाव</strong></p>
<p>शरीर व मानसिक बल से परिपूर्ण इस प्रतिभाशाली पुत्र को गर्भ से ही धार्मिक संस्कार व देव-शास्त्र-गुरु के प्रति भक्ति का भाव आरोहित किया गया। सागर में हाईस्कूल तक फिर उजिरे से हायर सेकंडरी के बाद आपने कम्प्यूटर शिक्षा के साथ महाविद्यालय से बेसिक ऑफिस एडमिनिस्ट्रेशन कोर्स सहित कई भाषाओं को सीखा। कन्नड़ के साथ हिन्दी, अंग्रेजी में परिपूर्ण आपने राष्ट्रीय केडेट कोर(एनसीसी) में बी सर्टिफिकेट प्राप्त किया, जो आपकी शारीरिक व मानसिक प्रतिभा का परिचायक है। आप भारतीय सेना में सम्मिलित होकर राष्ट्र भक्ति में अपना जीवन देना चाहते थे। इसके साथ ही बचपन में एक कुशल उद्यमी बनकर अनेकों लोगों को रोजगार देना चाहते थे। आपके बड़े भाई का नाम अक्षर इन्द्र है।</p>
<p><strong>स्वामी जी ने दी भट्टारक दीक्षा</strong></p>
<p>आपका सरल, सहज, मधुर व्यवहार व धार्मिक संस्कारों के साथ राष्ट्र की सेवा करने की भावना व आपकी कुण्डली में दिख रहे उत्कृष्ट भविष्य को देखकर परम् पूज्य जगद्गुरु कर्मयोगी स्वस्तिश्री चारुकीर्तिजी भट्टारक महास्वामी ने 2 दिसम्बर, 2022 को आपको भट्टारक दीक्षा प्रदान कर विचार पट्ट क्षुल्लक आगमकीर्ति नाम दिया। विगत चार माह से स्वामीजी ने आपको क्षेत्र की परम्पराओं से परिचित कराकर परिपूर्ण किया। परिवार में द्वितीय पुत्र आगम इन्द्र अद्वितीय प्रतिभा के साथ कुशल वक्ता व समर्थ व्यक्तित्व के धनी हैं। मात्र 22 वर्ष की आयु में विश्व तीर्थ श्रवणबेलगोला की बागडोर अपने हाथ में लेने वाले आप अब अपने गुरु की गरिमा को बनाये रखकर उनके शेष रहे कार्यों को पूर्ण करने की इच्छा के साथ उत्कृष्ट भाव रखते हैं।</p>
<p><strong>आगमकीर्ति बने चारुकीर्ति</strong></p>
<p>उल्लेखनीय है कि जब परम् पूज्य जगद्गुरु कर्मयोगी स्वस्तिश्री चारुकीर्तिजी भट्टारक महास्वामी ने 12 दिसम्बर, 1969 को दीक्षा ली थी, तब उनकी आयु भी मात्र 20 वर्ष थी। संपूर्ण देश के प्रमुख गणमान्य जन व त्यागी आचार्यों का आशीर्वाद आपको ऊंचाइयां प्रदान करेगा। विचार पट्ट क्षुल्लक श्री आगमकीर्तिजी को परम् पूज्य जगद्गुरु कर्मयोगी स्वस्तिश्री चारुकीर्तिजी भट्टारक महास्वामी के 23 मार्च, 2023 को महाप्रयाण हो जाने से 27 मार्च, 2023 को पट्टाभिषेक कर संपूर्ण विधि विधान के साथ श्रवणबेलगोला के भट्टारक पीठ पर विराजमान किया गया। जिसमें बारह पीठों के भट्टारक महास्वामी सहित संपूर्ण देशभर के हजारों श्रावक-श्राविकाएं सम्मिलित हुए। अब 27 मार्च, 2023 से उनका नाम पूज्य जगद्गुरु स्वस्तिश्री चारुकीर्तिजी भट्टारक स्वामी हो गया है।</p>
<p><strong>व्यक्त की भावनाएं </strong></p>
<p>तीन बार गोम्मटेश भगवान बाहुबली स्वामी के महामस्तकाभिषेक में प्रमुख सान्निध्य प्रदाता प्रथमाचार्य चारित्र चक्रवर्ती श्री शांतिसागरजी महाराज की पट्ट परम्परा के पट्टाधीश आचार्य श्री वर्धमानसागरजी महाराज ससंघ सहित अनेक आचार्यों, मुनिराजों, त्यागीवृन्दों ने भी आपको अपना आशीर्वाद भेजकर क्षेत्र की परम्पराओं के निर्वहन हेतु शुभ भावना व्यक्त की है।</p>
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