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	<title>निर्वाण पाठ &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<description>ताज़ा खबरे हिन्दी में</description>
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		<title>भगवान श्री चंद्रप्रभ जी का ज्ञान एवं मोक्ष कल्याणक 8 फरवरी को: तिथि के अनुसार फाल्गुन कृष्ण सप्तमी के दिन आते हैं </title>
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		<pubDate>Sat, 07 Feb 2026 13:16:22 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[दिगंबर जैन धर्म के 8वें तीर्थंकर भगवान चंद्रप्रभ जी का ज्ञान और मोक्ष कल्याणक एक ही दिन इस बार 8 फरवरी को आ रहा है। तिथि के अनुसार यह दिवस फाल्गुन कृष्ण सप्तमी को है। इस दिन दिगंबर जैन मंदिरों में विशेष आराधना का दौर रहेगा। भगवान श्री चंद्रप्रभ जी का अभिषेक, शांतिधारा, अर्घ्य समर्पित [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>दिगंबर जैन धर्म के 8वें तीर्थंकर भगवान चंद्रप्रभ जी का ज्ञान और मोक्ष कल्याणक एक ही दिन इस बार 8 फरवरी को आ रहा है। तिथि के अनुसार यह दिवस फाल्गुन कृष्ण सप्तमी को है। इस दिन दिगंबर जैन मंदिरों में विशेष आराधना का दौर रहेगा। भगवान श्री चंद्रप्रभ जी का अभिषेक, शांतिधारा, अर्घ्य समर्पित कर निर्वाण पाठ का आयोजन कर लाडु चढ़ाया जाएगा। <span style="color: #ff0000">श्रीफल जैन न्यूज की विशेष शृंखला के तहत आज पढ़िए, उपसंपादक प्रीतम लखवाल की यह संकलित और संपादित प्रस्तुति&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> दिगंबर जैन धर्म के 8वें तीर्थंकर भगवान चंद्रप्रभ जी का ज्ञान और मोक्ष कल्याणक एक ही दिन इस बार 8 फरवरी को आ रहा है। तिथि के अनुसार यह दिवस फाल्गुन कृष्ण सप्तमी को है। इस दिन दिगंबर जैन मंदिरों में विशेष आराधना का दौर रहेगा। भगवान श्री चंद्रप्रभ जी का अभिषेक, शांतिधारा, अर्घ्य समर्पित कर निर्वाण पाठ का आयोजन कर लाडु चढ़ाया जाएगा। ग्रंथों से प्राप्त जानकारी के अनुसार भगवान चंद्रप्रभ जी जैन धर्म के 8वें तीर्थंकर हैं, जिनका ज्ञान और मोक्ष कल्याणक अत्यंत पावन है। उन्होंने फाल्गुन कृष्ण सप्तमी को नागवृक्ष के नीचे केवल ज्ञान प्राप्त किया, और फाल्गुन कृष्ण सप्तमी को ही सम्मेद शिखर से मोक्ष (निर्वाण) प्राप्त किया। भगवान चंद्रप्रभ जी ने दीक्षा के 3 माह के बाद फाल्गुन कृष्ण सप्तमी के दिन नागवृक्ष के नीचे कठोर तपस्या और ध्यान से केवल ज्ञान प्राप्त किया। इस समय इन्द्र द्वारा समवशरण की रचना की गई थी।</p>
<p><strong>कार्याेत्सर्ग मुद्रा में ध्यान लगाकर 8 कर्मों का नाश किया</strong></p>
<p>ज्ञान प्राप्ति के बाद उन्होंने 93 गणधरों और लाखों साधु-साध्वी के साथ धर्म का प्रसार किया। भगवान चंद्रप्रभ जी ने फाल्गुन कृष्ण सप्तमी को सम्मेद शिखरजी (पारसनाथ पर्वत) पर मोक्ष प्राप्त किया। 1000 साधुओं के साथ एक महीने का उपवास (मासक्षमण) और कार्याेत्सर्ग मुद्रा में ध्यान लगाकर उन्होंने 8 कर्मों का नाश किया। इस दिन को निर्वाण महोत्सव के रूप में मनाया जाता है और भक्तजन उनके मोक्ष कल्याणक पर विशेष पूजा-अर्चना, अभिषेक और निर्वाण लाडू चढ़ाते हैं। चंद्रप्रभ भगवान का जीवन और ज्ञान, चंद्रमा के समान शीतलता, शांति और पवित्रता का प्रतीक है। उनके ज्ञान कल्याणक पर आत्मज्ञान की और मोक्ष कल्याणक पर संसार के नश्वर स्वरूप को समझकर कर्मों के नाश की प्रेरणा मिलती है।</p>
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		<title>भगवान विमलनाथ जी का मोक्ष कल्याणक 19 जून को: तिथि के अनुसार आषाढ़ कृष्ण अष्टमी को मनाया जाता है मोक्ष कल्याणक  </title>
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		<pubDate>Wed, 18 Jun 2025 06:20:14 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जैन धर्म के तेरहवें तीर्थंकर भगवान विमलनाथ जी का मोक्ष कल्याणक 19 जून को मनाया जाएगा। तिथि के अनुसार भगवान का मोक्ष कल्याणक आषाढ़ कृष्ण अष्टमी के दिन आता है। इस दिन दिगंबर जैन मंदिरों में भगवान के मोक्ष कल्याण के अवसर पर अभिषेक, शांतिधारा, निर्वाण पाठ, निर्वाण लाडू आदि चढ़ाने के साथ ही विविध [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>जैन धर्म के तेरहवें तीर्थंकर भगवान विमलनाथ जी का मोक्ष कल्याणक 19 जून को मनाया जाएगा। तिथि के अनुसार भगवान का मोक्ष कल्याणक आषाढ़ कृष्ण अष्टमी के दिन आता है। इस दिन दिगंबर जैन मंदिरों में भगवान के मोक्ष कल्याण के अवसर पर अभिषेक, शांतिधारा, निर्वाण पाठ, निर्वाण लाडू आदि चढ़ाने के साथ ही विविध विधानों से पूजन आदि किया जाता है। आराधना के इस दौर में श्रद्धालु भक्ति भाव से प्रभु को स्मरण करते हैं। <span style="color: #ff0000">श्रीफल जैन न्यूज की विशेष श्रृंखला में आज पढ़िए, उप संपादक प्रीतम लखवाल की यह संकलित प्रस्तुति&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> जैन धर्म के तेरहवें तीर्थंकर भगवान विमलनाथ जी का मोक्ष कल्याणक 19 जून को मनाया जाएगा। तिथि के अनुसार भगवान का मोक्ष कल्याणक आषाढ़ कृष्ण अष्टमी के दिन आता है। इस दिन दिगंबर जैन मंदिरों में भगवान के मोक्ष कल्याण के अवसर पर अभिषेक, शांतिधारा, निर्वाण पाठ, निर्वाण लाडू आदि चढ़ाने के साथ ही विविध विधानों से पूजन आदि किया जाता है। आराधना के इस दौर में श्रद्धालु भक्ति भाव से प्रभु को स्मरण करते हैं। भगवान विमलनाथ जी का मोक्ष कल्याणक आषाढ़ कृष्णा अष्टमी को हुआ था। यह दिन उन भक्तों के लिए खास है, जो भगवान के मोक्ष की खुशी मनाते हैं। विमलनाथ जी के मोक्ष कल्याणक तिथि आषाढ़ कृष्णा अष्टमी के दिन मनाया जाता है। भगवान ने श्री सम्मेद शिखर जी से निर्वाण प्राप्त किया था।</p>
<p>इनके समवशरण में 55 गणधर, 5500 केवली, 68,000 मुनि, 1,03,000 आर्यिका, 2 लाख श्रावक और 4 लाख श्राविकायें थीं। भगवान विमलनाथ ने खड्गासन में मोक्ष प्राप्त किया था। जैन धर्म शास्त्रों के अनुसार मोक्ष कल्याणक उस दिन का प्रतीक है, जब भगवान ने जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्ति प्राप्त की थी। यह दिन भक्तों के लिए व्रत रखने, पूजा-अर्चना करने और दान-पुण्य करने का अवसर है। निर्वाण लड्डू चढ़ाना मोक्ष प्राप्ति की खुशी का प्रतीक माना जाता है।</p>
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		<title>भगवान धर्मनाथ जी का मोक्ष कल्याणक 30 मई को: तिथि अनुरूप ज्येष्ठ शुक्ल चतुर्थी को आता है 15वें तीर्थंकर का मोक्ष कल्याणक  </title>
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		<pubDate>Fri, 30 May 2025 07:11:50 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जैन धर्म के 15वें तीर्थंकर भगवान धर्मनाथ जी का मोक्ष कल्याणक इस वर्ष 30 मई को आ रहा है। तिथि के अनुरूप मोक्ष कल्याणक ज्येष्ठ शुक्ल चतुर्थी के दिन मनाया जाता है। इस दिन दिगंबर जैन मंदिरों में श्रीजी का अभिषेक, शांतिधारा, निर्वाण पाठ, निर्वाण लाडू चढ़ाने के कार्यक्रम किए जाते हैं। भगवान धर्मनाथ जी [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>जैन धर्म के 15वें तीर्थंकर भगवान धर्मनाथ जी का मोक्ष कल्याणक इस वर्ष 30 मई को आ रहा है। तिथि के अनुरूप मोक्ष कल्याणक ज्येष्ठ शुक्ल चतुर्थी के दिन मनाया जाता है। इस दिन दिगंबर जैन मंदिरों में श्रीजी का अभिषेक, शांतिधारा, निर्वाण पाठ, निर्वाण लाडू चढ़ाने के कार्यक्रम किए जाते हैं। भगवान धर्मनाथ जी के मोक्ष कल्याणक को लेकर सकल जैन समाज में धार्मिक उल्लास है। <span style="color: #ff0000">श्रीफल जैन न्यूज की विशेष श्रृंखला में आज पढ़िए, उपसंपादक प्रीतम लखवाल की यह संकलित रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> जैन धर्म के 15वें तीर्थंकर भगवान धर्मनाथ जी का मोक्ष कल्याणक इस वर्ष 30 मई को है। तिथि के अनुरूप मोक्ष कल्याणक ज्येष्ठ शुक्ल चतुर्थी के दिन मनाया जाएगा। इस दिन दिगंबर जैन मंदिरों में श्रीजी का अभिषेक, शांतिधारा, निर्वाण पाठ, निर्वाण लाडू चढ़ाने आदि कार्यक्रम किए जाएंगे। नगर सहित देश के विभिन्न दिगंबर जैन मंदिरों में भगवान धर्मनाथ की भव्य भक्ति आराधना का दौर रहेगा। धर्म के प्रकाश से विश्व को दिव्य प्रकाश प्रदान करने वाले 15वें तीर्थंकर श्री धर्मनाथ जी का जन्म माघ शुक्ल तृतीया के दिन रत्नपुर के राजा भानु की पट्टमहिषी सुव्रतादेवी की रत्न कुक्षी से हुआ। प्रभु के जन्म से इस धतरी पर सर्वत्र हर्ष, आनंद और शांति का प्रार्दुभाव हुआ। पुत्र के युवावस्था मंे प्रवेश करने पर माता-पिता ने अनेक राजकन्याओं के साथ उनका विवाह किया। भारी समारोह रचकर पिता ने धर्मनाथ को राजगद्दी पर प्रतिष्ठित किया। भगवान धर्मनाथ जी के धर्म शासन में अधर्म का अंधकार विलुप्त होकर विलीन हो गया। कालांतर में राज पद का परित्याग कर माघ शुक्ल त्रयोदशी के दिन श्री धर्मनाथ जी ने प्रव्रज्या में प्रवेश किया। प्रभु आत्म साधना में निमग्न होकर कर्म रिपुओं का हनन करने लगे। मात्र दो वर्ष की अवधि में कर्म रिपुआंे को परास्त कर पौष शुक्ल पूर्णिमा के दिन प्रभु केवली बने। धर्मतीर्थ की स्थापना कर तीर्थंकर कहलाए। अरिष्ट आदि 43 प्रमुख शिष्य प्रभु के गणधर थे। प्रभु के धर्म परिवार में 64 हजार श्रमण, 62 हजार 400 श्रमणियां, दो लाख 44 हजार श्रावक एवं 4 लाख 13 हजार श्राविकाएं थीं। पांचवे वासुदेव पुरुष सिंह एवं बलदेव सुदर्शन प्रभु के अनन्य उपासक थे। ज्येष्ठ शुक्ल चतुर्थी के दिन सम्मेद शिखर पर्वत से प्रभु ने निर्वाण प्राप्त किया। तीसरे चक्रवर्ती मघवा एवं चौथे चक्रवर्ती सनतकुमार भी प्रभू धर्मनाथ के शासनकाल में ही हुए।</p>
<p><strong>भगवान के चिन्ह का महत्व</strong></p>
<p>वज्र धर्मनाथ तीर्थंकर का चिन्ह वज्र है। वज्र इंद्र देव का शस्त्र है। इसलिए इंद्र को वज्रपाणि कहा जाता है। वज्र कठोरता का प्रतीक है। वज्र से हमें यह शिक्षा मिलती है कि कष्टों में भी वज्र के समान दृढ़ रहना चाहिए। धर्म पालन में दृढ़ रहना चाहिए। अज्ञान, मोह और मिथ्यात्व पर वज्र प्रहार करने से ही सच्चे धर्म की प्राप्ति होती है। धर्मनाथ भगवान का चिन्ह धर्म-मार्ग पर वज्र की तरह दृढ़ होकर अग्रसर होने की प्रेरणा देता है।</p>
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