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	<title>निरामय सागर &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>जैनधर्म में पांच परमेष्ठियों का है विशेष महत्त्व: 16 अप्रैल को कुंडलपुर में होगा आचार्य पद महोत्सव  </title>
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		<pubDate>Sat, 13 Apr 2024 09:08:08 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जैनधर्म में पांच परमेष्ठियों का विशेष महत्त्व है । पांचों परमेष्ठियों में आचार्य तीसरे नंबर के परमेष्ठी हैं। जो पंचाचार का स्वयं पालन करते हैं और शिष्यों से करवाते हैं, संघ के नायक होते हैं और शिष्यों को दीक्षा एवं प्रायश्चित देते हैं वे आचार्य परमेष्ठी कहलाते हैं। आचार्य परमेष्ठी के 36 मूलगुण होते हैं। [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>जैनधर्म में पांच परमेष्ठियों का विशेष महत्त्व है । पांचों परमेष्ठियों में आचार्य तीसरे नंबर के परमेष्ठी हैं। जो पंचाचार का स्वयं पालन करते हैं और शिष्यों से करवाते हैं, संघ के नायक होते हैं और शिष्यों को दीक्षा एवं प्रायश्चित देते हैं वे आचार्य परमेष्ठी कहलाते हैं। आचार्य परमेष्ठी के 36 मूलगुण होते हैं। 12 तप, 10 धर्म, 5 आचार, 6 आवश्यक एवं 3 गुप्ति। साधुओं को दीक्षा -शिक्षा दायक, उनके दोष निवारक तथा अन्य अनेक गुण विशिष्ट, संघ नायक साधु को आचार्य कहते हैं। वीतराग होने के कारण पंचपरमेष्ठी में उनका स्थान है।<span style="color: #ff0000">पढ़िए डॉ. सुनील जैन संचय की रिपोर्ट …… </span></strong></p>
<hr />
<p>जैनधर्म में पांच परमेष्ठियों का विशेष महत्त्व है । पांचों परमेष्ठियों में आचार्य तीसरे नंबर के परमेष्ठी हैं। जो पंचाचार का स्वयं पालन करते हैं और शिष्यों से करवाते हैं, संघ के नायक होते हैं और शिष्यों को दीक्षा एवं प्रायश्चित देते हैं वे आचार्य परमेष्ठी कहलाते हैं। आचार्य परमेष्ठी के 36 मूलगुण होते हैं। 12 तप, 10 धर्म, 5 आचार, 6 आवश्यक एवं 3 गुप्ति। साधुओं को दीक्षा -शिक्षा दायक, उनके दोष निवारक तथा अन्य अनेक गुण विशिष्ट, संघ नायक साधु को आचार्य कहते हैं। वीतराग होने के कारण पंचपरमेष्ठी में उनका स्थान है।</p>
<p><strong>आयारं पंचविहं चरदि चरावेदि जो णिरदिचारं। उवदिसदि य आयारं एसो आयारवं णाम।।</strong></p>
<p>जो मुनि पाँच प्रकार के आचार निरतिचार स्वयं पालता है और इन पाँच आचारों में दूसरों को भी प्रवृत्त करता है तथा आचार का शिष्यों को भी उपदेश देता है उसे आचार्य कहते हैं।</p>
<p><strong>आचार्य और पट्टाचार्य का है विशेष महत्व</strong></p>
<p>जैन परंपरा में आचार्य और पट्टाचार्य का विशेष महत्व है ऐसे ही महत्वपूर्ण पद पर 18 फरवरी को डोंगरगढ़ में संत शिरोमणि आचार्य विद्यासागर जी महाराज का समाधिमरण होने के बाद उनका आचार्य पद उनके प्रथम शिष्य परम पूज्य निर्यापक श्रमण मुनि समयसागर जी महाराज को 16 अप्रैल 2024 को सिद्धक्षेत्र कुण्डलपुर में विधि विधान के साथ सौंपा जा रहा है। यह भी संयोग है कि मुनि समयसागर महाराज आचार्यश्री के गृहस्थ जीवन के छोटे भाई हैं। मुनि श्री समयसागर जी महाराज छह भाई-बहनों में छठे नंबर पर के हैं। वर्तमान में वे 65 साल के हैं। आचार्यश्री का भी जन्म स्थल कर्नाटक का सदलगा है। मुनिश्री का जन्म 27 अक्टूबर 1958 को हुआ था। मुनिश्री ने ब्रह्मचर्य व्रत 2 मई 1975 को लिया था। 18 दिसंबर 1975 को उनकी छुल्लक दीक्षा हुई थी। 31 अक्टूबर 1978 को एलक दीक्षा नैनागिरी छतरपुर और मुनि दीक्षा 8 मार्च 1980 को जैन सिद्ध क्षेत्र द्रोणगिरी छतरपुर में हुई थी।</p>
<p><strong>हजारों श्रद्धालुओं ने बना दिया इतिहास </strong></p>
<p>आचार्यश्री जैसी छवि और ज्येष्ठ श्रेष्ठ निर्यापक श्रमण व प्रथम शिष्य का गौरव प्राप्त करने वाले निर्यापक मुनि श्री समय सागर जी महाराज में झलकती है। उनकी आचार्य पद प्रतिष्ठा का समाचार सुनकर उनकी आगवानी करने पहुँचे सभी हजारों श्रद्धालुओं ने इतिहास बना दिया ।यह आगवानी अब तक के सबसे पड़े और लंबे जलूस के इतिहास को लिखने में कायम हुई है। मुनि दीक्षा के 44 वर्ष बाद मुनि समयसागर जी महाराज आचार्य पद संभालने जा रहे हैं। कुंडलपुर में 16 अप्रैल को आचार्य पद महोत्सव होगा। इसके लिए समय सागर जी महाराज मंगलवार को दमोह के कुंडलपुर पहुंचे। दमोह के कुंडलपुर में 16 अप्रैल को आयोजित होने जा रहे आचार्य पद महोत्सव में शामिल होने के लिए मुनि संघ कुंडलपुर पहुंच गए हैं। 480 किमी का विहार करते हुए आचार्य पद संभालने मुनि श्री समयसागर जी महाराज भी मंगलवार 9 अप्रैल को दोपहर कुंडलपुर पहुंच गए। सैकड़ों बसें, हजारों चार पहिया वाहन इस अगुवानी में हिस्सा लेने पहुंचे हुए थे। मुनि संघ का जगह-जगह रंगोली सजाकर भक्तों द्वारा एवं कुंडलपुर क्षेत्र कमेटी, कुंडलपुर महोत्सव समिति द्वारा पाद प्रक्षालन किया गया ।</p>
<p><strong>ऐतिहासिक होगा आचार्य पदारोहण महोत्सव</strong></p>
<p>कुंडलपुर की पावन धरा पर पहुंचते ही कुंडलपुर में पूर्व से विराजमान निर्यापक संघ,मुनि संघों एवं आर्यिका संघों ने निर्यापक मुनि समयसागर जी महाराज की भव्य आगवानी की । सभी का भव्य मंगल मिलन हुआ। निर्यापक मुनिश्री योगसागर जी, मुनि श्री नियमसागर जी ,मुनि सुधासागर जी,मुनि समतासागर जी,मुनि श्री प्रसादसागर जी, मुनि श्री अभयसागर जी, मुनि श्री संभवसागर जी, मुनि श्री वीरसागर जी ,मुनि श्री प्रमाणसागर जी, मुनि श्री प्रणम्यसागर जी सहित सभी पूज्य मुनिराज, आर्यिका माता सहित सभी शिष्यों का भव्य मंगल मिलन का दृश्य अद्वितीय था। बड़ी संख्या में ब्रह्मचारी भैया एवं दीदी भी आगवानी में शामिल थीं।जानकारी के मुताबिक इस महोत्सव के लिए कुंडलपुर में 40000 वर्ग फीट का त्रिस्तरीय मंच होगा 12 फीट ऊंचा होगा आचार्य श्री का आसन। कुंडलपुर परिसर में 2,50,000 वर्ग फीट में लगभग 70,000 लोगों को बैठने का इंतजाम किया गया है और यहां पर 7 एकड़ जगह में पंडाल लगाया गया है।निश्चित ही कुण्डलपुर में 16 अप्रैल को आचार्य पदारोहण का यह महोत्सव अपने आपमें एक ऐतिहासिक महोत्सव होगा। पूज्य मुनि श्री समयसागर जी में संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज की प्रतिकृति नजर आती है। अब &#8216;आचार्या: जिनशासनोन्नतिकराः &#8216; को वे गौरवान्वित करने जा रहे हैं। उनके पावन चरणों में कोटिशः नमोस्तु!!</p>
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		<title>प्रदर्शन का नहीं जिनशासन में दर्शन और अंतरदर्शन का महत्व बड़ों के आदेश को टालना नही बल्कि पालना पड़ता है </title>
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		<pubDate>Fri, 12 Apr 2024 15:35:33 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[दमोह जिले का सुप्रसिद्ध जैन तीर्थ कुंडलपुर में निर्यापक श्रमण मुनि श्री समता सागर जी महाराज ने मंगल प्रवचन देते हुए कहा यह बात सच है कि मैं अपने जेष्ठ श्रेष्ठ के प्रवचन सुनने के लिए यहां उपस्थित कल भी हुआ था आज भी हुआ। लेकिन पूज्यवर का आदेश टालने की कोशिश भी की लेकिन [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>दमोह जिले का सुप्रसिद्ध जैन तीर्थ कुंडलपुर में निर्यापक श्रमण मुनि श्री समता सागर जी महाराज ने मंगल प्रवचन देते हुए कहा यह बात सच है कि मैं अपने जेष्ठ श्रेष्ठ के प्रवचन सुनने के लिए यहां उपस्थित कल भी हुआ था आज भी हुआ। लेकिन पूज्यवर का आदेश टालने की कोशिश भी की लेकिन टाल नहीं पाया ।गुरुवर आचार्य श्री ने मूकमाटी में लिखा है बड़ों के आदेश को टालना नहीं पड़ता बल्कि पालना पड़ता है ।पूत के लक्षण पालने में दिखाई देते हैं। <span style="color: #ff0000">पढ़िए रत्नेश जैन बकस्वाहा की रिपोर्ट …… </span></strong></p>
<hr />
<p><strong>कुण्डलपुर ।</strong> दमोह जिले का सुप्रसिद्ध जैन तीर्थ कुंडलपुर में निर्यापक श्रमण मुनि श्री समता सागर जी महाराज ने मंगल प्रवचन देते हुए कहा यह बात सच है कि मैं अपने जेष्ठ श्रेष्ठ के प्रवचन सुनने के लिए यहां उपस्थित कल भी हुआ था आज भी हुआ। लेकिन पूज्यवर का आदेश टालने की कोशिश भी की लेकिन टाल नहीं पाया ।गुरुवर आचार्य श्री ने मूकमाटी में लिखा है बड़ों के आदेश को टालना नहीं पड़ता बल्कि पालना पड़ता है ।पूत के लक्षण पालने में दिखाई देते हैं। हम जिस उद्देश्य से सभी यहां उपस्थित हैं हमारे निर्यापक श्रमण के लक्षण बचपन से उस तरह दिखाई दे रहे हैं, जो आज 55 की उम्र में भी हम सबको एहसास हो रहा है। मैंने एक जगह पढ़ा था अगर कहीं कोई ऊंचा पहाड़ पर्वत हो तो यह निश्चित मानकर चलिए आसपास गहरी नदी जरूर होगी ।क्योंकि गहराई को पाये बगैर कभी कोई ऊंचाई को प्राप्त नहीं कर सकता। कुंडलपुर के बड़े बाबा ऊंचाई पर विराजमान है आद्य शासन नायक हैं उनका सर्वोदयी शासन जो चल रहा है ऊंचाई से चल रहा है। लेकिन उस ऊंचाई का परिचय वर्धमान सागर की गहराई से भी हमें मिल रहा है ।आद्य तीर्थंकर भगवंत और उनका जिन शासन गणधरों और आचार्यों की परंपरा से यहां तक आया है । आचार्यों जिन शासनोन्नतिकरा आचार्य वह होते हैं जिन शासन की उन्नति को करते हैं जिन शासन के विस्तार को करते हैं।</p>
<p><strong>जैन शासन का रथ रुकता नहीं कभी </strong></p>
<p>आचार्य प्रवर को जो विरासत मिली थी अपने गुरुवर ज्ञान सागर महाराज से आचार्य श्री ने उस विरासत का विस्तार किया और अपने कठिन परिश्रम से कठोर साधना से अपनी निस्पृहता से निराभिमानता से उन्होंने जो विरासत में खोज मिली थी उसे समुद्र सागर बनाकर दिखा दिया है ।आज हम सबके बीच में हमारे गुरुवर नहीं है ।देह का परिवर्तन हुआ पर्याय का परिवर्तन हुआ। प्रकृति का नियम है हम और आप उसे चाहे उसे टाल नहीं सकते।लेकिन उन्होंने जो संघ की संयोजना की है संघ का संवर्धन किया है वह विरासत उस रूप में बल्कि उससे ज्यादा विस्तार पाकर यावतचंद्र दिवाकर बढ़ती रहेगी ।जैन शासन का रथ कभी रुकता नहीं है एक सारथी कहीं बदलता है तो दूसरा सारथी उस रथ को आगे बढ़ाता है ।हम सब का सहयोग अपने योग्यतम सारथी के लिए है ।पूर्ण निष्ठा पूरी ईमानदारी से पूरे संघ का है। हम सबके सर्वोच्च सारथी निर्यापक श्रमण मुनि श्री समय सागर जी हैं। सारी समाज सारा देश इस भावना से ओतप्रोत है ।गहराई को पाये बगैर कोई भी ऊंचाई दिखाऊ तो हो सकती है लेकिन टिकाऊ नहीं हो सकती ।हमारे गुरुवर ने यह सिखाया है कि हमें कोई भी कार्य दिखाऊ नहीं करना है टिकाऊ करना है ।बड़े-बड़े झाड़ गगनचुंबी जिनालय भव्यतम मंदिर जितने जितने ऊंचे दिखाई देते इतने उन्हें मजबूत बनाने के लिए नींव की गहराई की जाती है जब बड़े बाबा का मंदिर बन रहा था बनने का प्लान चल रहा था</p>
<p><strong>दर्शन और अंतरदर्शन का महत्व </strong></p>
<p>आचार्य श्री ने सभी को यही निर्देश दिया था ऊंचाई के अनुपात से अंदर पहाड़ी में नींव के रूप में गहराई में बहुत ज्यादा मजबूती तैयार करना चाहिए और आज बड़े बाबा का भव्यतम मंदिर आज सबको दिखाई दे रहा है ।सारांश यह है कि जिन शासन में दिखाने का महत्व नहीं है जिन शासन में प्रदर्शन का महत्व नहीं है जिन शासन में दर्शन और अंतरदर्शन का महत्व है ।पूत के लक्षण पालने में दिखाई देते हैं मूक माटी में गुरुवर ने दो अर्थ निकाले लौकिक एक छोटा सा बच्चा जाता है पालने में पड़ा रहता है तो पालने में उसकी एक्टिविटी गतिविधि देखकर यह अंदाज लगा लिया जाता है कि बच्चा किस स्वभाव का है पूत के लक्षण पालने में दिखाई देते यह भविष्य में क्या करेगा और फिर गुरुवर ने नया दिया सभी को पूत का लक्षण पालने में है और छोटे से शिशु या शिष्य का लक्षण वहीं से दिखाई देने लगता है कि वह गुरु की आज्ञा को कितना पाल रहा है आज्ञा पालन के रूप में जो अर्थ दिया गया वह परमार्थ का अर्थ है हम सभी का अर्थ है जैसे गुरु का स्मरण आप सबको होता है हमें भी बार-बार होता है ।उन क्षणों को कभी भूला नहीं जाता। जिन क्षणों को गुरुवर अपनी सर्वोत्कृष्ट साधना में थे उन क्षणों को जिन क्षणों में प्रतिकूलता होने पर भी समता का भाव उनके चेहरे पर दिखाई दे रहा था ।हमारे योग्य जेष्ठ श्रेष्ठ निर्यापक श्रमण मुनि योग सागर जी महाराज इसके साक्षी रहे हैं मैं स्वयं साक्षी रहा हूं ,प्रसाद सागर महाराज साक्षी रहे हैं, साथ रहने वाले चंद्रप्रभ सागर महाराज ,निरामय सागर ,पूज्यसागर, महासागर आदि महाराज इसके साक्षी रहे हैं। उन क्षणों में मन अधीर हो गया था हृदय कांप रहा था क्योंकि सारी स्थितियां समझ में आने लगी थी।</p>
<p><strong>समाधि का धैर्य रखो</strong></p>
<p>योगसागर जी महाराज ने संकेत किया कहीं किसी को रोना नहीं आखिरी समय समाधि का धैर्य रखो,अपने सभी भावों को संभालकर सभी महाराज जी गुरुवर को क्या संबोधित करेंगे बल्कि एक छोटा बेटा पिता का जो भाव होता कर सकता है वह सभी हम शिष्यों ने किया। हम सब की परम चैतन्यता को लेकर रही है उसके अनेक स्मरण चंद्रगिरी डोंगरगढ़ में मैंने सुनाएं थे। आज भी वह संदर्भ हमारे मानस में घूमते रहते हैं ।ऐसे गुरुवर के प्रति जो प्राणपण से कर्तव्य बना वह किया आप सभी हृदय से जुड़े रहे उस समय तक बड़ा धैर्य रखा जिस समय जेष्ठ श्रेष्ठ निर्यापक श्रमण समयसागर जी का आगमन हुआ ।मुनिवर ने समाधि स्थल की वंदना की भक्ति पाठ संपन्न किया और हम सभी महाराज ,महाराज जी को लेकर आए तब तक बड़ा धैर्य रखा ।जब महाराज जी जाकर के कक्ष में विराजमान हुए और मैंने अपने पूज्यवर के चरणों में माथा रखा मेरी आंखों से आंसुओं की धार वह निकली क्योंकि अब हमारे लिए एक ही तो सहारा है संसार सागर से पार होने यही तो एक किनारा है। मुनि ने बड़ा धैर्य बंधाया और उस समय सारी परिस्थितियां मुनिवर के सामने रखी।</p>
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