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	<title>नया शोध &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<description>ताज़ा खबरे हिन्दी में</description>
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		<title>मूक पशुओं की कराहें बन सकती हैं भूकम्प का कारण: डॉ. बजाज के इस खास शोध से खुलेंगे कई रहस्य  </title>
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		<pubDate>Sat, 22 Apr 2023 09:33:40 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[एक अनुसंधान यह सामने आया है कि मूक पशुओं का वध भूकम्प का कारण बन सकता है। वध के समय पशुओं की दर्दनाक कराहें, चीखें और आर्तनाद ऐसी तरंगे पैदा करती हैं जो भूकम्प का कारण बन जाती हैं। पढ़िए मनीष गोधा का यह खास रिपोर्ट&#8230; जयपुर। अहिंसा और छोटे से छोटे जीव की रक्षा [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>एक अनुसंधान यह सामने आया है कि मूक पशुओं का वध भूकम्प का कारण बन सकता है। वध के समय पशुओं की दर्दनाक कराहें, चीखें और आर्तनाद ऐसी तरंगे पैदा करती हैं जो भूकम्प का कारण बन जाती हैं। <span style="color: #ff0000;">पढ़िए मनीष गोधा का यह खास रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>जयपुर।</strong> अहिंसा और छोटे से छोटे जीव की रक्षा का जैन धर्म का सिद्धांत हमेशा से प्रासंगिक रहा है और विज्ञान के क्षेत्र में होने वाले नए अनुसंधान और शोध इस सिद्धांत के महत्व और प्रासंगिकता को प्रमाणित करते रहे हैं। इसी बीच एक अनुसंधान यह भी सामने आया है कि मूक पशुओं का वध भूकम्प का कारण बन सकता है। वध के समय पशुओं की दर्दनाक कराहें, चीखें और आर्तनाद ऐसी तरंगे पैदा करती हैं जो भूकम्प का कारण बन जाती हैं। भू वैज्ञानिक हो सकता है कि इससे सहमत ना हों, लेकिन महत्वपूर्ण बात यह है कि सिद्धांत किसी ने भावावेश में आ कर या बिना किसी शोध व अनुसंधान के नहीं दिया है। यह सिद्धांत भौतिकी के विद्वान प्रोफेसरों के अध्ययन के बाद प्रतिपदाति किया गया है और हाल में दुनिया के विभिन्न हिस्सों में आए विनाशकारी भूकम्पों के बाद चर्चा का विषय बना हुआ है।</p>
<p><strong>डॉ. बजाज का शोध कई मायने में महत्वपूर्ण </strong></p>
<p>पूरी दुनिया में मांसाहार और विभिन्न उत्पादों के लिए पशुओ का वध का स्थापित उद्योग है और दुनिया भर में चल रहे कत्लखाने प्रतिक्षण पशुओं के आर्तनाद और दर्द भरी चीखों से गूंजते रहते हैं। इसका कोई ना कोई प्रभाव तो निश्चित तौर पर होता ही होगा। यह ध्वनि तरंगे कोई ना कोई प्रभाव तो डालती ही होंगी। डॉ. मदन मोहन बजाज ने इसी पर अध्ययन किया। डॉ. बजाज इंटरनेशनल साइंटिफिक रिसर्च एंड वेलफेयर ऑर्गनाइजेशन के निदेशक रहे हैं। वे दिल्ली विश्वविद्यालय के फिजिक्स और एस्ट्रोफिजिक्स विभाग के न्यूक्लियर बायो-फिजिक्स तथा बायोमेडिकल फिजिक्स, इम्यूनोफिजिक्स तथा मेडिकल फिजिक्स के भी प्रमुख रहे हैं और 1968 से ही शिक्षक है। डॉक्टर बजाज ने 300 से ज्यादा शोध-पत्र लिखे हैं. वे इंडियन सोसायटी ऑफ जेनेटिक्स, अमेरिकन केमिकल सोसायटी, फिजिक्स सोसायटी ऑफ जापान, जापान सोसायटी फॉर मेडिकल इलेक्ट्रानिक्स एंड बायोमेडिकल इंजीनियरिंग, बांग्लादेश फिजिक्स सोसायटी, फिजिकल सोसायटी ऑफ नेपाल, एशियन फिजिकल सोसायटी, इंडियन सोसायटी फॉर कैंसर कीमियोथेरेपी, इंडियन सोसायटी फॉर कैंसर रिसर्च, मैथेमेटिकल एसोसिएशन ऑफ इंडिया और सोसायटी ऑफ फीजियोलॉजिस्ट एंड फार्माकॉलॉजिस्ट ऑफ इंडिया के फेलो रहे हैं। उन्होंने इंडियन एकेडमी ऑफ मेडिकल फिजिक्स के सचिव का भी पदभार संभाला है और भारत सरकार के डिपार्टमेंट ऑफ एटोमिक एनर्जी की ओर से आयोजित कई सेमिनार के अध्यक्ष रह चुके हैं।</p>
<p><strong>शोध प्रबंध पर आधारित पुस्तक के तथ्य </strong></p>
<p>डॉक्टर बजाज के निर्देशन में 18 पीएच.डी के, 8 एम.फिल के 8 और 2 डी.एससी शोधकर्ता शोध कर चुके हैं। उन्होंने विज्ञान पर 15 पुस्तकों में बतौर सह-लेखक योगदान किया है।</p>
<p>यानी इस नए सिद्धांत की प्रामणिकता पर संदेह की कोई गुंजाइश नहीं है और इस नए सिद्धांत पर उन्होंने ही नहीं दो अन्य भौतिकीवेत्ताओं डॉ. इब्राहिम और विजयराज सिंह ने भी काम किया है। इन तीनों के नाम से एक पुस्तक प्रकाशित हुई है, जिसका नाम है- इटिमॉलॉजी ऑफ अर्थक्वेक्स, ए न्यू अप्रोच। यह पुस्तक एक शोध-प्रबंध पर आधारित है जो रूस के सुदाल में 1995 के जून में हुए वैज्ञानिकों के एक सम्मेलन में प्रस्तुत किया गया था।</p>
<p><strong>क्या कहता है नया सिद्धान्त</strong></p>
<p>माना यही जाता है कि भूकम्प कब आएगा और कितनी तीव्रता का होगा, इसका अनुमान लगाना सम्भव नहीं है। लेकिन किताब के लेखकों का दावा है कि पशु-पक्षी तथा मछलियों के वध से उन्हें जो दुख-दर्द और भय का अनुभव होता है, उसका घनीभूत रूप ही भूकंप का कारण बनता है। पीड़ा का अनुभव भौतिक तरंगों को उत्पन्न करने में सक्षम है।</p>
<p>यह सिद्धांत कहने को एक मजाक जैसा लग सकता है और भूगर्भ वैज्ञानिक तो इसे नहीं ही मानते, लेकिन महत्वपूर्ण बात यह है कि प्रसिद्ध वैज्ञानिक आईंस्टीन ने भी जब गुरूत्वाकर्षण का सिद्धांत प्रतिपादित किया था तो शुरूआत में उसे किसी ने नहीं माना था। इसी तरह आज के स्मार्टफोन में इतने फीचर्स होंगे इसकी कल्पना भी किसी ने नहीं की थी। यानी शोध व अनुसंधान ऐसा बहुत कुछ कर चुके हैं, जो पहले अकल्पनीय लगता था।</p>
<p>कहा जाता है कि स्वामी विवेकानंद जब शिकागो पहुंचे तो उन्होंने बड़ी दूर से ही एक खास इलाके की ओर इशारा करते हुए कहा कि इस इलाके पर उदासी की गहरी छाया है। उस इलाके में अमेरिका का सबसे बड़ा ‘स्लॉटरहाऊस’ यानी कत्लखाना था। यहां जानवरों को काटने के लिए लाया जाता था।</p>
<p>आधुनिक विज्ञान के जनक कहे जाने वाले अल्बर्ट आइंस्टीन ने भी ईपीडब्ल्यू यानी आइंस्टीनियन पेन वेव्ज् सिद्धांत की चर्चा की थी। यह सिद्धांत भूगर्भ विज्ञान से संबंधित है।</p>
<p>डॉ. बजाज, इब्राहिम और विजयराज सिंह की किताब भी ईपीडब्ल्यू यानी आइंस्टीनियन पेन वेव्ज् सिद्धांत का विस्तार है। लेखकों ने जुटाए हुए साक्ष्यों के आधार पर किताब में दावा किया है कि पशुओं के सामूहिक संहार को भूकंप से जोड़ना सम्भव है। अभी तो यही माना जाता है कि भूकम्प के बारे में कोई भविष्यवाणी नहीं की जा सकती, लेकिन बहुत संभव है कि भविष्य में भूकंप-विज्ञानी भी उसी निष्कर्ष पर पहुंचे जिसे हमारे ऋषि-मुनि सदियों से बताते आ रहे हैं कि ‘विश्वात्मा’ का मन दुनिया के तमाम उपकरणों से कहीं ज्यादा ताकतवर है।</p>
<p><strong>पीड़ा तरंगे चरम पर पहुंचती हैं तो टूटती है धरती की परत</strong></p>
<p>इन तीनों वैज्ञानिकों ने दुनिया की उन तमाम जगहों की रिपोर्ट का संकलन किया है जहां भूकंप आए और जहां पशुओं को मारने के कसाईखाने थे। ऐसी भी जगहों से रिपोर्ट संकलित की गई है जहां कसाईखाने भूकंप की आशंका वाले क्षेत्रों के नजदीक बने हुए थे। भूकंपों की तीव्रता रिक्टर स्केल पर मापी जाती है। आइंस्टीन पेन वेव्ज सिद्धांत के मुताबिक प्राथमिक और द्वितीयक तरंगे ज्यादा तेजी से गतिशील होती हैं जबकि पेन वेव्ज यानी पीड़ा के कारण उत्पन्न होने वाली तरंगे एक लंबी अवधि तक दबाव का क्षेत्र बनाती रहती हैं और जब यह दबाव अपने चरम-विन्दु पर पहुंच जाता है तो धरती की परत टूट जाती है और यह हादसा भूकंप का रुप ले लेता है।</p>
<p><strong>नोसिसेप्टिव वेव्ज की भी भूमिका </strong></p>
<p>किताब में नोसिसेप्टिव वेव्ज की जटिल भूमिका के अध्ययन का दावा किया गया है किसी जीवित और चेतन शरीर में तंत्रिका कोशिकाओं के उद्दीप्त होने के कारण तेज रासायनिक जैसे आंख में मिर्ची लगना, यांत्रिक जैसे काटना या कुचलना अथवा तापीय जैसे ठंढा या गर्म संवेदन जाग्रत हो तो वह नोसिसेप्टर्स कहलाता है। नोसिसेप्टर्स से कुछ सिग्नल पैदा होते हैं जो तंत्रिका-तंतुओं के सहारे मेरुदंड यानी रीढ़ की हड्डी होकर मस्तिष्क तक पहुंचते हैं और हमें दर्द का अनुभव होता है। नोसिसेप्टर्स यानी पीड़ा की संवेदना का पर्याप्त ताकतवर होना जरुरी है ताकि संकेत तंत्रिका-तंतुओं के सहारे मस्तिष्क तक पहुंचे। जब पीड़ा की संवेदना इस पर्याप्त स्तर को प्राप्त कर लेती है तो संकेत का शरीर में संचार होता है।</p>
<p><strong>ध्वनि तरंगें चट्टानों पर डालती हैं दबाव </strong></p>
<p>लेखकों का दावा है कि जब जानवरों को काटा जाता है तो उन्हें जिस पीड़ा का अहसास होता है उससे चीख निकलती है, तनाव पैदा होता है और इन तमाम चीजों से भी पेन वेव्ज बनती हैं। ये पेन वेव्ज धरती की परत में एक न एक दिशा में चोट करती और दरार डालती हैं जो ‘सिस्मिक एनीसोट्रोफी’(भूकंपीय चोट) का कारण बनता है। यह एनीसोट्रॉफी यानी ध्वनि से धरती की परत पर लगने वाला धक्का ही भूकंप का कारण बनता है। इन वैज्ञानिकों यह भी दावा भी है कि ध्वनि-तरंगें चट्टानों पर बहुत ज्यादा दबाव डालती हैं। रोजाना बड़ी तादाद में जानवरों को हत्या की जाए और ऐसा बरसों तक हो तो आइंस्टीनियन पेन वेव्ज के जरिए एकॉस्टिक एनिस्ट्रॉफी पैदा होती है। ऐसा मरते हुए जानवरों की पीड़ा के कारण होता है। किताब में दावा भी किया गया है कि ईपीडब्ल्यू कालक्रम में लंबी दूरी तय करते हैं इसलिए किसी एक देश में बने कसाईखानों की वजह से दूसरे देश में भी भूकंप आ सकता है।</p>
<p><strong>दुनिया में आए बड़े भूकंपों का किया जिक्र</strong></p>
<p>इन वैज्ञानिकों ने अपनी किताब में लातूर(खिलारी) के भूकंप, उत्तरकाशी में आए भूकंप तथा असम के भूकंप को प्रमाण के रूप में प्रस्तुत किया है। अमेरिका में आए नार्थरिज (1994), लांग बिच (कैलिफोर्निया दृ 1933), लैंडर्स (कैलिफोर्निया -1992), सैन फ्रांसिस्को (1906), न्यू मैड्रिड (मिसौरी दृ 1811-12) के भूकंप का भी किताब में उदाहरण दिया गया है। रूस के नेफगोर्स्क (1995) के भूकंप पर किताब में विस्तार से चर्चा है। जापान के कांटो (1923), नोबी (1891), किटा टांगो (1927), सांगकिरो सुनामी (1933), शिजुका (1935), टोंनाकल (1944), नानकई (1948), फुकुई (1948), ऑफ टोकाची (1952), किज्ता-मिनो (1961), निगाटा (1964), ऑफ टोकाची (1968), कोबे (1995) भूकंपों भी दर्ज किया गया है। नेपाल में गढ़ीमई में हुए पशु-संहार और वहां आये भूकंप की भी एक पैटर्न के रुप में किताब में चर्चा की गई है। बताते हैं कि अमेरिका का टेकोमा ब्रिज 1940 में गिर पड़ा था। पता चला कि ब्रिज के डिजायन में कमी थी और इस कमी के कारण ब्रिज की स्वाभाविक फ्रीक्वेंसी वायु-प्रवाह की फ्रीक्वेंसी से मेल खा रही थी। इस वजह से ऊपर बहती हवा के साथ कंपायमान होकर पूरा ब्रिज ही गिर पड़ा।</p>
<p><strong>बेवजह जीव को मारना पीड़ा का चरम है </strong></p>
<p>अब सवाल यह है कि खास फ्रीक्वेंसी पर हो रहा हल्का सा कंपन पूरे ब्रिज के गिरने का कारण बन सकता है तो फिर मारे जाते जानवरों की पीड़ा से उत्पन्न पेन वेव्ज से भूकंप क्यों नहीं आ सकते ? मारे जाते पशु को जो कष्ट पहुंचता है यह विशाल मात्रा में प्राण-ऊर्जा का निकलना है और यह एक ऐसी ऊर्जा जिसे हम अभी तक माप नहीं सके हैं। हो सकता है कि एक दिन पशुओं के सामूहिक संहार के कारण उठने वाली पेन वेव्ज तथा इनके महाविनाशकारी कंपन को माप करने का उपकरण तैयार कर लें और तब शायद इन तीनों वैज्ञानिकों का यह सिद्धांत प्रामाणिक सिद्ध हो जाए। वैसे यह सिद्धांत प्रामाणिक सिद्ध ना भी हो तो यह समझना जरूरी है कि किसी भी जीव को बेवजह मारना, पीड़ा का चरम है और यह चरम कुछ ना कुछ विनाशकारी तो करता ही है।</p>
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