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	<title>धर्म देशना &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<description>ताज़ा खबरे हिन्दी में</description>
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	<title>धर्म देशना &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>जीवन में दो ही चीजें उपयोगी है समय और सांस: आचार्य श्री प्रसन्न सागर जी ने धर्म देशना में समय और सांस की बताई अहमियत  </title>
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		<pubDate>Tue, 26 Aug 2025 13:03:57 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महामुनिराज एवं उपाध्याय श्री पियूष सागरजी महाराज ससंघ तरुणसागरम तीर्थ में वर्षायोग के लिए विराजमान हैं। उनके सानिध्य में धार्मिक कार्यक्रम संपन्न हो रहे हैं। अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज ने बताया कि दोनों सीमित हैं क्योंकि जो फ्री है, वही सबसे ज्यादा कीमती है जैसे- हवा, पानी, नींद, समय, [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महामुनिराज एवं उपाध्याय श्री पियूष सागरजी महाराज ससंघ तरुणसागरम तीर्थ में वर्षायोग के लिए विराजमान हैं। उनके सानिध्य में धार्मिक कार्यक्रम संपन्न हो रहे हैं। अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज ने बताया कि दोनों सीमित हैं क्योंकि जो फ्री है, वही सबसे ज्यादा कीमती है जैसे- हवा, पानी, नींद, समय, सांसे, मन की शांति और चेहरे की प्रसन्नता। <span style="color: #ff0000">कोडरमा से पढ़िए, जैन राजकुमार अजमेरा की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>तरुणसागरम तीर्थ कोडरमा।</strong> आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महामुनिराज एवं उपाध्याय श्री पियूष सागरजी महाराज ससंघ तरुणसागरम तीर्थ में वर्षायोग के लिए विराजमान हैं। उनके सानिध्य में विभिन्न धार्मिक कार्यक्रम संपन्न हो रहे हैं। उसी श्रृंखला में उपस्थित गुरु भक्तों को संबोधित करते हुए अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज ने बताया कि दोनों सीमित हैं क्योंकि जो फ्री है, वही सबसे ज्यादा कीमती है जैसे- हवा, पानी, नींद, समय, सांसे, मन की शांति और चेहरे की प्रसन्नता। उन्होंने कहा कि मैं देख रहा हूं कि लोग अपने कल को अच्छा बनाने के लिए आज को गाली दे रहे हैं, आज का अपमान कर रहे हैं और आज को कोस रहे हैं। जो अपने वर्तमान को कोसते हैं और कहते हैं कि आज बहुत बुरा है। आप स्वयं सोचे कि हम अच्छे कल की इमारत बनाना चाहते हैं और आज की यानि वर्तमान की बुराइयां, निंदा तथा आलोचना की नींव खोद रहे हैं।</p>
<p>आचार्यश्री ने कहा कि जिसे हम कोस रहे हैं, ऐसे में भविष्य का निर्माण कैसे और कैसा होगा? जो आज को लेकर दुखी परेशान है। हमारा दिन, हफ्ता, महीना, साल सब खराब हो रहा है क्योंकि, हम लोगों की नजर में बेचारे हैं, बुरे वक्त में फंसे हुए हैं। कोई पूछता है कैसे हो भाई? हम कहते हैं क्या बताऊं बाबू? दिन काट रहे हैं ज़िन्दगी के।</p>
<p><strong>हमारे पास वितृष्णा, असंतोष और गुस्सा के अलावा कुछ नहीं</strong></p>
<p>उन्होंने कहा कि ध्यान रखना, कई वर्तमान मिलकर एक भविष्य का निर्माण करते हैं। भविष्य अचानक से उतर कर नहीं आता। भविष्य का निर्माण हमें रोज सकारात्मकता की सोच के साथ करना है और उसकी शुरुआत होती है मन की शांति से, चेहरे की प्रसन्नता और आत्म संतोष से। अगर हम लगातार अपने वर्तमान को कोसते हैं या नकारते हैं तो हम अपनी ऊर्जा को बहुत आगे बढ़ जाने के मार्ग को अविरुद्ध करते हैं। भविष्य की शुरुआत आज अभी इसी वक्त के दौर से होती है। जब हम अपने आज को ऐसे नकारात्मक माहौल से सजाते हैं तो हमारे पास वितृष्णा, असंतोष और गुस्सा के अलावा कुछ नहीं होता।</p>
<p><strong>आज को धन्यवाद दो, शुक्रिया अदा करो</strong></p>
<p>आपको आज से ही अपने अंदर कुछ ऐसा नया जुनून पैदा करना है, जो भविष्य की मंजिल की ओर ले जाए। जब सुख सौभाग्य, सौहार्द की शुरुआत होगी तो आज अभी इसी वक्त के दौर से ही होगी। आज को धन्यवाद दो, शुक्रिया अदा करो तो वह आपको अपने गले लगाएगा और भविष्य का निर्माण करेगा। इसलिए आज से आज को कोसना बंद करो और धन्यवाद देना शुरू करो। फिर देखो आज का चमत्कार।</p>
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		<title>जो चीज तुम्हें नहीं मिल पाए उसकी कभी बुराई मत करना: मुनिश्री सुधासागर जी महाराज ने प्रवचन में दी धर्म देशना  </title>
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		<pubDate>Fri, 01 Aug 2025 10:27:00 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[मुनिश्री सुधासागर जी महाराज इन दिनों अशोकनगर के सुभाषगंज में विराजित हैं। यहां उनकी नित्य धर्म प्रभावना हो रही है। उनके प्रवचन सुनने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालुजन यहां पहुंच रहे हैं। शुक्रवार को उन्होंने धर्मसभा में संबोधित करते हुए कहा कि तुम्हारे पास क्या नहीं है, वो जिसके पास है, बस उसको जय [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>मुनिश्री सुधासागर जी महाराज इन दिनों अशोकनगर के सुभाषगंज में विराजित हैं। यहां उनकी नित्य धर्म प्रभावना हो रही है। उनके प्रवचन सुनने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालुजन यहां पहुंच रहे हैं। शुक्रवार को उन्होंने धर्मसभा में संबोधित करते हुए कहा कि तुम्हारे पास क्या नहीं है, वो जिसके पास है, बस उसको जय जिनेंद्र करना शुरू कर दीजिए। <span style="color: #ff0000">अशोकनगर से पढ़िए, राजीव सिंघई मोनू की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>अशोकनगर।</strong> मुनिश्री सुधासागर जी महाराज इन दिनों अशोकनगर के सुभाषगंज में विराजित हैं। यहां उनकी नित्य धर्म प्रभावना हो रही है। उनके प्रवचन सुनने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालुजन यहां पहुंच रहे हैं। शुक्रवार को उन्होंने धर्मसभा में संबोधित करते हुए कहा कि तुम्हारे पास क्या नहीं है, वो जिसके पास है, बस उसको जय जिनेंद्र करना शुरू कर दीजिए। उन्होंने आगे कहा कि ये तो भगवान का संदेश है कि आत्मा अजर अमर अविनाशी है, ये तो शास्त्रों में लिखा है कि मैं भगवान बन सकता हूँ, महावीर स्वामी हुए थे, शास्त्रों में लिखी हुई बात को वाचना कोई महानता नहीं है, ये तो बालक भी वाच लेगा। जब तक ये शब्द लगा रहेगा कि भगवान ने कहा है कि मेरा स्वरूप ऐसा है, गुरु का स्वरूप ऐसा है, नहीं ये तो प्रारंभ है। पहली बात तो हमने संसार से कभी ऊपर उठने का भाव नहीं किया, ऐसा भाव आना भी बोधि दुर्लभ भावना है ये। पेड़ भी मरना नहीं चाहता, वह कहता है कि मैं जो हूँ, उसी में संतुष्ट हूँ।</p>
<p>परिणाम भी नहीं बनते कि इससे ऊपर उठने का कोई रास्ता है क्या? इसमें भी मात्र कुछ लोगों के बनते हैं नारकियों के- जब असहनीय दुख होते हैं तब वह छुटकारा पाने का भाव करता है। मनुष्यों में बनते हैं उनके जो दुखी हैं, परेशान हैं, गरीब है, बीमार है। जिनको सब प्रकार के सुख है, उनको कभी भाव आया कि इससे अच्छी भी जिंदगी है क्या? यह परिणाम होना दुर्लभ है क्योंकि जैसे ही सुख का उदय आया वह उसी में मस्त हो जाता है।</p>
<p><strong>जैन दर्शन किसी भी चीज का निषेध नहीं करता</strong></p>
<p>तुम दुखी होकर, परेशान होकर मंदिर आते हो, व्यापार नहीं चल रहा है, बीमार हो, जिंदगी में अंधेरा दिख रहा है तो मंदिर आते हो ये भगोड़े का लक्षण है, ये तो सब कर लेते है। मात्र दुख को दूर करने के लिए मंदिर आए हो तो देव शास्त्र गुरु तुम्हारे गुरु नहीं है मात्र डॉक्टर का रूप है। दुख के दिनों में मंदिर आना है, जैन दर्शन किसी भी चीज का निषेध नहीं करता, बस उसको सापेक्ष करता है। तुम कौन हो, ये सापेक्ष करके तुम तलवार भी चला सकते हो अन्यथा तुम तलवार छूने के भी अधिकारी नहीं। भगवान गुरु और शास्त्र हमेशा मील के पत्थर है, तुम्हें कहां जाना है, ये रास्ते बताते हैं। जो चीज तुम्हें नहीं मिल पाए उसकी कभी बुराई मत करना, नहीं तो जन्म जन्म तक उससे नीचे गिरोगे, कर सको तो प्रशंसा करना, नहीं कर सको तो निंदा मत करना।</p>
<p>अमीर को देखकर ही यदि तुम्हें गालियां देने का, कोसने का मन करता है तो जाओ तुम कभी अमीर नहीं बन पाओगे। इस भव में नहीं और अगले भव में भी नहीं। तुम गरीब हो तो अपने आप को कोसना लेकिन कहना कि मेरा एक पुण्य मेरा है कि मेरे पड़ोस में एक अमीर रहता है और यह जन्म-जन्म का पुण्यात्मा है इसलिए सबसे पहले मैं उसे जय जिनेंद्र करता हूँ, यदि यह भाव तुम्हारे अंदर आ रहा हो तो मैं भविष्यवाणी करता हूँ बहुत जल्दी तुम्हारी गरीबी दूर होने वाली है, 6 महीने के अंदर तुम्हारे दिन बदल जाएंगे।</p>
<p><strong>दूसरों की सराहना से ही पुण्य सार्थक होंगे </strong></p>
<p>तुम्हारा बहुत सिर दर्द हो रहा है और बाजू में कोई खर्राटे लेकर सो रहा है, आपको कैसा लग रहा है यदि दो झापड़ देने का मन कर रहा है, गुस्सा आ रहा है तो जाओ मेरे पास तुम्हारे सिरदर्द की कोई दवाई नहीं है, शांतिधारा में अपना नाम मत लिखाना। भाव लाना कि मैंने तो पाप किया है जो मेरा सर दर्द हो रहा है लेकिन मेरे बाजू में एक पुण्यात्मा सो रहा है, उसने जरूर पूर्वभव में वैयावृत्ति, रोगियों की दवा की होगी, मेरे द्वारा उसकी नींद खराब न हो जाए, आप नौ बार विचार करिए आपको धीरे-धीरे नींद आना शुरू हो जाएगी, एक मुहूर्त मात्र में परिवर्तन हो सकता है, इसी को बोलते हैं हमारे यहां संक्रमण, उत्कर्षण-अपकर्षण, उदीरणा।</p>
<p>यह विचार आप कायम रखिए मेरा विश्वास है कि माइग्रेन जो किसी डॉक्टर की दवाई से ठीक नहीं हुआ, मैं जो दवाई दे रहा हूँ, इससे ठीक हो जाएगा, अधिक होगा तो 6 महीने लग जाएंगे। तुम्हारे पास क्या नहीं है वो जिसके पास है, बस उसको जय जिनेंद्र करना शुरू कर दीजिए, उसके पुण्य की सराहना करना शुरू कर दीजिये, इसी का नाम तो भक्ति है। मैं भगवान नहीं हूँ, बन भी नहीं पा रहा हूँ लेकिन, पक्का है मैं बनूँगा, क्योंकि भगवान को देखकर मुझे खुशी होती है, आनंद आता है। तुम्हारा कोई दुर्गुण नहीं छूट रहा है तो जिसमें वह दुर्गुण नहीं है उसकी प्रशंसा करो, नियम से एकदम तुम्हारा दुर्गुण छूट जाएगा।</p>
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		<title>पुरुषार्थ कर अपने जीवन को उज्ज्वल बनाएं: मुनिश्री जयंत सागर जी महाराज ने दी धर्म देशना  </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 26 Jul 2025 09:04:12 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[स्थानीय भगवान महावीर दिगंबर जैन मंदिर में मुनिराजों के प्रवचन जन-जन के हितकारी हो रहे हैं। यहां प्रतिदिन हो रहे प्रवचनों का स्थानीय समाजजनों के अलावा बाहर से आए श्रद्धालुजन लाभ उठा रहे हैं। मंदिर में मुनिराजों का चातुर्मास जारी है। नांद्रे से पढ़िए, अभिषेक अशोक पाटील की यह खबर&#8230; नांद्रे। स्थानीय भगवान महावीर दिगंबर [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>स्थानीय भगवान महावीर दिगंबर जैन मंदिर में मुनिराजों के प्रवचन जन-जन के हितकारी हो रहे हैं। यहां प्रतिदिन हो रहे प्रवचनों का स्थानीय समाजजनों के अलावा बाहर से आए श्रद्धालुजन लाभ उठा रहे हैं। मंदिर में मुनिराजों का चातुर्मास जारी है। <span style="color: #ff0000">नांद्रे से पढ़िए, अभिषेक अशोक पाटील की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>नांद्रे।</strong> स्थानीय भगवान महावीर दिगंबर जैन मंदिर में मुनिराजों के प्रवचन जन-जन के हितकारी हो रहे हैं। यहां प्रतिदिन हो रहे प्रवचनों का स्थानीय समाजजनों के अलावा बाहर से आए श्रद्धालुजन लाभ उठा रहे हैं। मंदिर में मुनिराजों का चातुर्मास जारी है। पट्टाचार्य विशुद्धसागरजी महाराज के शिष्य मुनि श्री सारस्वत सागर जी महाराज, मुनि श्री जयंत सागर जी महाराज, मुनि श्री सिद्ध सागर जी महाराज और क्षुल्लक श्रुतसागरजी महाराज नांद्रे में विराजमान हैं। शनिवार को धर्मसभा में मुनि श्री जयंत सागरजी महाराज ने अपने प्रवचन में कहा कि आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी के हस्त कमलों से एक विचार नाम की कृति को लिखा है और उस विचार में आचारी भगवन ने अपने स्वयं के विचार, जो आज के समय व्यक्ति सोचता है, व्यापार कैसे करना है, घर में व्यवहार कैसे करें, मित्रों के बीच में मित्रता कैसे करें। आज के युवा-युवती सही विचार क्या करें।</p>
<p>किस इंसान से व्यवहार रखना चाहिए, इसलिए अपने जीवन को श्रेष्ठ और उत्कृष्ट बनाना हैं तो हमें इस विचार पुस्तक को पढ़ना चाहिए और इस पर विचार करके अपने जीवन को विचारवान बनाकर श्रेष्ठ बनना चाहिए तो अपना जीवन अच्छा बनाओ और जीवन में विचारों कें साथ पुरषार्थ भी करो बिना पुरुषार्थ के एक कदम भी आप जीवन को नहीं जी सकते। जीवन में हर चीज की आवश्यकता और हर वस्तु की कीमत है। छोटे से छोटे पौधे के अंकुर की आवश्यकता भी है। अगर वह अंकुरित नहीं होगा तो आप फल को प्राप्त नहीं कर पाओगे। इसलिए जीवन में श्रेष्ठ विचार करो। पुरषार्थ करो और जीवन को उज्जवल बनाओ।</p>
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		<title>हमें हमारे विचारों का थर्मामीटर मापना जरूरी: आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी ने धर्म देशना में भक्तों को दिया मार्गदर्शन  </title>
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		<pubDate>Wed, 23 Jul 2025 07:02:37 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी का यहां चातुर्मास चल रहा है। धर्मसभा में वे धर्म देशना दे रहे हैं। उन्होंने अपने प्रवचन में लेश्या के विषय में बताया। उन्होंने कहा कि मन की अंतस चेतना में आने वाले भाव लेश्या है। यदि शुभ के भाव आते हैं तो वह शुभ लेश्या है। अशुभ के भाव आते [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी का यहां चातुर्मास चल रहा है। धर्मसभा में वे धर्म देशना दे रहे हैं। उन्होंने अपने प्रवचन में लेश्या के विषय में बताया। उन्होंने कहा कि मन की अंतस चेतना में आने वाले भाव लेश्या है। यदि शुभ के भाव आते हैं तो वह शुभ लेश्या है। अशुभ के भाव आते है तो अशुभ लेश्या है। <span style="color: #ff0000">रामगंजमंडी से पढ़िए, अभिषेक जैन लुहाड़िया की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>रामगंजमंडी।</strong> आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी का यहां चातुर्मास चल रहा है। धर्मसभा में वे धर्म देशना दे रहे हैं। उन्होंने अपने प्रवचन में लेश्या के विषय में बताया। उन्होंने कहा कि मन की अंतस चेतना में आने वाले भाव लेश्या है। यदि शुभ के भाव आते हैं तो वह शुभ लेश्या है। अशुभ के भाव आते है तो अशुभ लेश्या है। उन्होंने कहा कि हम अंतस चेतना से अपने बारे में सोचते हैं। दूसरे के बारे में नहीं, लौकिक जीवन कहता है कि दूसरे के बारे में भी सोचें यदि नहीं सोचते हैं तो नुकसान हमारा है। इसे स्वार्थ एवं अज्ञानता कह सकते हैं। हम बुद्धि लेकर आए है लेकिन, हम विद्या का प्रयोग करते हैं।</p>
<p>जीवन कंप्यूटर लैपटॉप गूगल नहीं है। जीवन में बुद्धि का प्रयोग जरूरी है। यदि हम बुद्धि का प्रयोग करेंगे तो अज्ञान का काम नहीं करेंगे। उन्होंने कहा कि ऐसा कोई समय नहीं है। जब हमारे अंतस चेतना में भाव उत्पन्न नहीं होते हैं। हम दुनिया का चक्कर लगा लेते हैं। हमारे पास कंट्रोल पावर नहीं है। हमारे शराब का त्याग है फिर भी हम उसके बारे में सोचते हैं, जो हमें पसंद नहीं, हम वह भी सोच लेते हैं। मन द्वारा हम कहीं भी पहुंच जाते हैं हमारे मन में कंट्रोल नहीं।</p>
<p><strong>आपको अपनी बैलेंस शीट बनाना चाहिए</strong></p>
<p>उन्होंने कहा कि हर चीज का माप होता है दूध आदि कोई भी पदार्थ हो सबका एक माप होता है। जैन दर्शन कहता है कि हमें हमारे विचारों और भावों को मापते रहना चाहिए, समझते रहना चाहिए। सार्थक तब होगा जब हम अपने आप को मापेंगे। हमने कभी अपने आप को मापा नहीं। हमें भी अपना थर्माेमीटर मापना चाहिए की हम कितने पॉजिटिव हैं कितने नेगेटिव है। कितने ज्ञानी है।अच्छा ज्ञानी धर्मात्मा होता है लेकिन हम होते नहीं। अपने आप को मापंे कि हम कितना पॉजिटिव कितना नेगेटिव है और कोशिश करें कि हम कितने सकारात्मक हो सकते हैं। इस विषय पर प्रकाश डालते हुए आचार्यश्री ने कहा कि स्वाध्याय हमारा थर्मामीटर है। उसी से हम समीक्षा कर सकते हैं कि हम कितने सकारात्मक हैं। जैन दर्शन कहता है कि आपको अपनी बैलेंस शीट बनाना चाहिए। ध्यान रखना चाहिए कि व्यापार अर्जन की चीज है विसर्जन की नहीं। हम कितना पापों में सुधार कर सकते हैं। हम कितनी अपने को धार्मिकता दे सकते हैं। ऐसी वस्तुओं को क्या ग्रहण करना जो हमें खराब बनाती है।</p>
<p><strong>हम आधुनिक भौतिकवादी स्टैंडर्ड हो गए</strong></p>
<p>आचार्यश्री ने कहा कि कंट्रोल पावर सबके पास है इंद्रिय विषयों ग्रहण करें बिना जीवन नहीं चलता व्यक्ति अंतस चेतना में जो भाव करता है तो लेश्या उत्पन्न करता है। सोच लिया यह मेरा घर है यह मेरी चीज है तो यह अशुभ लेश्या है और मान लिया कि यह मेरा संयोग है तो यह शुभ लेश्या है। उन्होंने कहा हम आधुनिक भौतिकवादी स्टैंडर्ड हो गए हैं आधुनिकता दुर्गति कराती है। उन्होंने कटाक्ष करते हुए कहा कि ऐसी आधुनिकता किस काम की जो जीवन यापन नहीं कर सके। ऐसी आधुनिकता किस काम की जो सही दिशा देने वाली नहीं है। हम बाहरी दुनिया के ढोल बजा रहे हैं और अच्छा बुरा भाव बना रहे हैं यदि हम माला जप रहे हैं तो माला जैसे भाव होना चाहिए।</p>
<p><strong>आवश्यकता से अधिक धन है तो दान देना जरूरी</strong></p>
<p>उन्होंने दान के विषय में भी प्रकाश डाला यदि आवश्यकता से अधिक धन है तो दान देना जरूरी है। जीवन यापन के अतिरिक्त यदि धन संग्रह है तो दान करना चाहिए। धन की परिभाषा है कि धन जीवन यापन के लिए कमाना चाहिए। दान के लिए नहीं धन कमाओ तो यह नहीं सोचे कि मुझे दान करना है। यह भी नहीं सोचा कि जब कमाऊंगा तो दूंगा ऐसा भाव भी नहीं बनना चाहिए। उन्होंने कहा कि खेल भावों का है क्रिया का नहीं। क्रिया सावधानी से होनी चाहिए की भाव की हानि ना हो इधर-उधर देखकर हम प्रमाद कर रहे हैं इससे शुभ भावों की हानि है। सावधानी रखनी चाहिए कि पानी पीएतो एक बूंद भी जमीन पर नहीं गिरना चाहिए यदि हम दुरुपयोग कर रहे हैं तो क्रिया और भावों में हानि है। उन्होंने कहा कि इतने भी बड़े मत हो की पापों में वृद्धि हो जाए हम हम इतने भी बड़े नहीं हो जाए की पुण्य की हानि हो जाए। धर्म सब कुछ करने के लिए तैयार है सावधानी रखो। भाव क्रिया व्यवस्थित हो भावों में हानि ना हो शुभ काम शुभ भाव शुभ लेश्या है अशुभ भाव है तो अशुभ लेश्या उत्पन्न होगी। उन्होंने कहा दिमाग काम करें लेकिन, समझ काम करनी चाहिए।</p>
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		<title>भगवान राग और द्वेष से रहित वीतरागी हितोपदेशी होते हैं : आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने धर्मसभा में दी देशना </title>
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		<pubDate>Sat, 19 Jul 2025 13:00:47 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[रत्न स्वर्ण के समवशरण में विराजित भगवान के पुण्य प्रताप से पाषाण के मान स्तंभ को देखकर मान-अभिमान गलित नष्ट हो जाता है। यह धर्म देशना संघ सहित विराजित आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने प्रगट की। टोंक से पढ़िए, यह खबर&#8230; टोंक। समवशरण में विराजित भगवान वीतरागी सर्वज्ञ और हितोपदेसी हैं। उन्हें राग द्वेष [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>रत्न स्वर्ण के समवशरण में विराजित भगवान के पुण्य प्रताप से पाषाण के मान स्तंभ को देखकर मान-अभिमान गलित नष्ट हो जाता है। यह धर्म देशना संघ सहित विराजित आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने प्रगट की। <span style="color: #ff0000">टोंक से पढ़िए, यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>टोंक।</strong> समवशरण में विराजित भगवान वीतरागी सर्वज्ञ और हितोपदेसी हैं। उन्हें राग द्वेष नहीं होता है। उनकी दिव्य देशना को तीन गति के जीव 12 कक्ष में बैठकर दिव्य देशना का श्रवण करते हैं। रत्न स्वर्ण के समवशरण में विराजित भगवान के पुण्य प्रताप से पाषाण के मान स्तंभ को देखकर मान-अभिमान गलित नष्ट हो जाता है। यह धर्म देशना संघ सहित विराजित आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने प्रगट की।</p>
<p>राजेश पंचोलिया ने बताया कि आचार्य श्री ने कहा कि संसारी प्राणी राग द्वेष में डूबे हैं। संसार रूपी भव समुद्र से जिनालय में विराजित भगवान सद राह दिखाते हैं क्योंकि, पंच कल्याणक में धार्मिक क्रियाओं सूरी मंत्रों से प्रतिमाओं में भगवान के गुणों का आरोपण कर उन्हे पूज्य बनाया जाता हैं। ज्येष्ठा और श्रेष्ठता मानने से नहीं गुणों से होती है।</p>
<p><strong>मुनिचर्या का आदर्श प्रस्तुत किया</strong></p>
<p>20 वीं सदी में नवरत्न के रूप में प्रथमाचार्य श्री शांतिसागर जी हुए जिन्होंने जिनालय में भी विजातीय प्रवेश के विरोध में 1105 दिनों तक अन्न आहार का त्याग कर अपने प्राणों की बाजी लगा दी थी। महापुरुष हमेशा उपकार करते हैं। आचार्य श्री शांति सागर जी ने मुनिचर्या का निर्दोष पालन कर आदर्श प्रस्तुत किया।आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने सभी को छोटे-छोटे नियम व्रत त्याग से जीवन को उत्कृष्ट और मंगलमय बनाने का आशीर्वाद दिया।</p>
<p><strong><img fetchpriority="high" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-85462" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/07/IMG-20250719-WA0035.jpg" alt="" width="1600" height="1064" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/07/IMG-20250719-WA0035.jpg 1600w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/07/IMG-20250719-WA0035-300x200.jpg 300w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/07/IMG-20250719-WA0035-1024x681.jpg 1024w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/07/IMG-20250719-WA0035-768x511.jpg 768w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/07/IMG-20250719-WA0035-1536x1021.jpg 1536w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/07/IMG-20250719-WA0035-414x276.jpg 414w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/07/IMG-20250719-WA0035-470x313.jpg 470w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/07/IMG-20250719-WA0035-640x426.jpg 640w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/07/IMG-20250719-WA0035-130x86.jpg 130w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/07/IMG-20250719-WA0035-187x124.jpg 187w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/07/IMG-20250719-WA0035-990x658.jpg 990w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/07/IMG-20250719-WA0035-1320x878.jpg 1320w" sizes="(max-width: 1600px) 100vw, 1600px" />भक्ति की शक्ति से मुक्ति मिलती है</strong></p>
<p>आचार्य श्री के प्रवचन के पूर्व मुनि श्री मुमुक्षु सागर जी ने उपदेश में परमात्मा के गुण बताकर कहा कि भक्ति की शक्ति से मुक्ति मिलती है। रमेश काला एवं समाज प्रवक्ता पवन एवं विकास जागीरदार ने बताया कि शनिवार को दीप प्रवज्लन के बाद आचार्य श्री के चरण प्रक्षालन ओर जिनवाणी भेंट के बाद आचार्य श्री वर्धमान सागर जी की विशेष अष्ट मंगल द्रव्य से पूजन करने का सौभाग्य श्री वर्धमान महिला मंडल काफला बाजार टोंक के समस्त श्रावक श्राविकाओं को प्राप्त हुआ।</p>
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		<title>अंधेरी रात के बाद जब प्रकाश मिलता है: मुनिश्री सुधासागर जी के प्रवचनों में धर्मज्ञान का बिखर रहा आलोक  </title>
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		<pubDate>Tue, 08 Jul 2025 13:28:45 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[मुनिश्री सुधासागर जी के विहार के दौरान प्रवचनों का दौर जारी है। मंगलवार को गुना जिले के शाढोरा में मुनिश्री ने धर्म देशना दी। जिसका वहां की धर्मानुरागी जनता ने बड़े मनोभावों से उसे अपने अंतस में ग्रहण की। मुनिश्री के प्रवचन सुनने के लिए बड़ी संख्या में लोग एकत्र होकर पुण्यार्जन कर रहे हैं। [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>मुनिश्री सुधासागर जी के विहार के दौरान प्रवचनों का दौर जारी है। मंगलवार को गुना जिले के शाढोरा में मुनिश्री ने धर्म देशना दी। जिसका वहां की धर्मानुरागी जनता ने बड़े मनोभावों से उसे अपने अंतस में ग्रहण की। मुनिश्री के प्रवचन सुनने के लिए बड़ी संख्या में लोग एकत्र होकर पुण्यार्जन कर रहे हैं। <span style="color: #ff0000">शाढोरा से पढ़िए, राजीव सिंघई की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>शाढोरा,( गुना)।</strong> मुनिश्री सुधासागर जी के विहार के दौरान प्रवचनों का दौर जारी है। मंगलवार को गुना जिले के शाढोरा में मुनिश्री ने धर्म देशना दी। जिसका वहां की धर्मानुरागी जनता ने बड़े मनोभावों से उसे अपने अंतस में ग्रहण की। मुनिश्री के प्रवचन सुनने के लिए बड़ी संख्या में लोग एकत्र होकर पुण्यार्जन कर रहे हैं। इस अवसर पर मुनिराज ने कहा कि यह मत समझना कि जहां तुम्हें कष्ट है, दुख है, वहां तुम्हारा अशुभ दिन है। कष्टों के बीच से भी कई बार शुभ शगुन निकलता है। रात को तुम अंधेरी रात मत मानो, वो रात प्रातः काल की तैयारी है।</p>
<p>जहां रात नहीं होती, वहां प्रातः काल नहीं होता, शगुन नही होता, शुभबेला नहीं होती। कुछ देश ऐसे हैं जहां रात नहीं होती, 6-6 महीने तक दिन ही बना रहता है। ज्योतिष शास्त्रों में लिखा है कि जहां सदा उजेला बना रहता है, वहाँ कभी शगुन, शुभ नहीं होता, उनका जीवन मंगलमय नहीं होता। अंधेरी रात के बाद जब प्रकाश मिलता है, वह प्रत्युषकाल, प्रातःकाल शगुन माना जाता है। उस सूर्य को जो शुभ बनाया है, रात ने बनाया है। इसी प्रकार ये मत समझना तुम्हारा जीवन दुःखमय है, तुम परेशान हो तो तुम्हारा भविष्य अंधकारमय है ऐसा नहीं। अंधकार की रात्रि के समान कई बार जीवन में आये हुए दुःख, कल के लिए शगुन बन जाते है।</p>
<p><strong>भोजन का महत्व नहीं है, परोसने वाले का महत्व है</strong></p>
<p>माँ यह नहीं सोचती है कि बेटे को क्या अच्छा लग रहा है? माँ यह सोचती है कि बेटे का हित किसमें है? बस यही है धर्म और विज्ञान का अंतर, विज्ञान वो वस्तु है जो तुम्हें अच्छा लगता है, हमें कोई लेना-देना नहीं, तुम्हारा भविष्य अच्छा हो या न हो। ऐसी दवाई देता हूँ जिससे पाव भर किलो की लौकी, रात भर में 5 किलों की हो जाएगी। धर्म कहता है कि नहीं, तुम माँ हो, तुम्हें वह उपदेश देना है, जो इनके लिए हितकारी हो। जो चीज तुम्हें अच्छी लग रही है, मन को, इन्द्रियों को, आँखों को, कानों को, मत समझ लेना कि यह तुम्हारे लिए हितकारी होगी। जो वस्तु तुम्हें अच्छी नहीं लग रही है तो यह विचार करना इसको देने वाला कौन है? भोजन किसने बनाया है, यदि पता चले कि माँ ने बनाया है तो आँख बन्द करके खा जाना, इसी में तुम्हारा कल्याण है। हमारे यहाँ भोजन का महत्व नहीं है, परोसने वाले का महत्व है। ठीक दवाई से होना है लेकिन खोज वैद्य करना है। ऐसे ही धर्म को नहीं समझना है, धर्म गुरु को समझ लो।</p>
<p><strong>इंद्रिय के जो विषय अच्छे लगते हैं</strong></p>
<p>तुम्हारा मंदिर जाने का मन नहीं करें तो बस इतना पूछ लेना कि यह मंदिर जाने का आदेश किसने दिया है? यदि तुम्हें पता चले कि ये आदेश मेरे गुरु ने दिया है, मेरे भगवान ने दिया है तो मन न लगे तब भी चले जाना, इसी मैं तुम्हारा कल्याण है। व्रत और धर्म प्रायः संसारी प्राणी के अरुचिकर होते हैं। इंद्रिय के जो विषय होते है वे संसारी व्यक्ति को अच्छे लगते है और धर्म इंद्रियों का विषय है नहीं, इसलिए रुचिकर नहीं लगता, इसलिए वहाँ आदेश दिया कि रुचि-अरुचि मत देखों, सामने कौन है?</p>
<p><strong>हम हवाओं को गंदा नहीं करेंगे तो ऑक्सीजन बन जाएगी</strong></p>
<p>सारे भारत के लोग नियम ले ले कि हम नदियों को गंदा नहीं करेंगे तो नदी तुम्हारे लिए वो जल देगी कि तुम्हारी बीमारियां दूर हो जाएंगी। हमें यह सोचना है कि हम हवाओं को गंदा नहीं करेंगे, हवाएं ऑक्सीजन बन जाएगी। हमें क्या अच्छा लग रहा है हम यह ही नहीं सोचें, यह भी सोचें कि पड़ोसी को क्या अच्छा लगता है। हम यह नहीं सोचें कि हमें क्या अच्छा लगता है, हम यह भी सोचें कि मेरे माँ बाप को क्या अच्छा लगता है, मेरे गुरु को क्या अच्छा लगता है, मेरी पत्नी को क्या अच्छा लगता है और पत्नी सोचें कि मेरे पति को क्या अच्छा लगता है। यदि ऐसा संसार हो जाए तो हर व्यक्ति एक दूसरे की सोच रहा होगा।</p>
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		<title>विनाश मानव पर छाता है, तब विवेक मर जाता है: मुनिश्री विलोकसागर ने कर्म फल और पुण्य की व्याख्या की  </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 27 Jun 2025 14:26:23 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[मुनि श्री विलोक सागर महाराज बड़े जैन मंदिर में इन दिनों विराजित हैं। यहां उनकी धर्म देशना में रोज बढ़ी संख्या में समाजजन एकत्र हो रहे हैं। गुरुवार को मुनिश्री विलोकसागर ने धर्मसभा में कहा कि इस असार संसार में सभी प्राणी अपने पाप पुण्य के अनुसार सुख और दुख भोगते हैं। मुरैना से पढ़िए, [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>मुनि श्री विलोक सागर महाराज बड़े जैन मंदिर में इन दिनों विराजित हैं। यहां उनकी धर्म देशना में रोज बढ़ी संख्या में समाजजन एकत्र हो रहे हैं। गुरुवार को मुनिश्री विलोकसागर ने धर्मसभा में कहा कि इस असार संसार में सभी प्राणी अपने पाप पुण्य के अनुसार सुख और दुख भोगते हैं। <span style="color: #ff0000">मुरैना से पढ़िए, मनोज जैन नायक की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>मुरैना।</strong> मुनि श्री विलोक सागर महाराज बड़े जैन मंदिर में इन दिनों विराजित हैं। यहां उनकी धर्म देशना में रोज बढ़ी संख्या में समाजजन एकत्र हो रहे हैं। गुरुवार को मुनिश्री विलोकसागर ने धर्मसभा में कहा कि इस असार संसार में सभी प्राणी अपने पाप पुण्य के अनुसार सुख और दुख भोगते हैं। जब व्यक्ति का पुण्य कर्म का उदय होता है तो वह मिट्टी उठाता है तो वो सोना हो जाती है लेकिन, यदि उसके पाप कर्म उदय होता है तो सोना भी मिट्टी बन जाता है।</p>
<p><strong>पुण्य के उदय में व्यक्ति ऊपर उठता है</strong></p>
<p>मुनिश्री ने कहा कि पुण्य के उदय में व्यक्ति ऊपर उठता है तो वहीं पाप के उदय में गर्त में चला जाता है। उन्होंने कहा कि विनाश मानव पर छाता है, तब विवेक स्वयं मर जाता है। पाप के उदय में प्राणी हित और अहित भूल जाता है, अपने और पराए की परख नहीं कर पाता। ये कषाय ही हमारे सुख दुख का कारक हैं। कषाय का आवेग जब आता है, तब सबकुछ तहस-नहस हो जाता है। कषाय के आवेग में व्यक्ति की बुद्धि नष्ट हो जाती है, वो अच्छा बुरा सब कुछ भूल जाता है। उन्होंने आगे कहा कि व्यक्ति कितना भी पढ़ा लिखा हो, ज्ञानी हो ऐसे में वह अज्ञानी बन जाता है। वह अपना होश खो बैठता है।</p>
<p><strong>&#8230;अंत में रावण मृत्यु को प्राप्त हुआ</strong></p>
<p>मुनिश्री ने कर्मों की परिभाषा समझाते हुए कहा कि रावण एक प्रकांड विद्वान था, वो तीन खंड का राजा था लेकिन, कर्मों के मार से वो भी नहीं बच सका। कर्म के उदय में आने पर रावण ने सीता का अपहरण किया। कर्माेदय के कारण रावण की मति भ्रष्ट हो गई और वो राम से युद्ध कर बैठा क्योंकि उस समय रावण की मति मारी गई थी, उसके सोचने-समझने, हित और अहित को जानने, अपने और पराए को समझने की शक्ति क्षीर्ण हो चुकी थी, अंत में रावण मृत्यु को प्राप्त हुआ।</p>
<p><strong>पुण्य कर्म से सुख और पाप कर्म से दुख मिलता है</strong></p>
<p>मुनिश्री कहते हैं कि मनुष्य अपने जीवन में अनेक प्रकार से पुण्य का उपार्जन करके मोक्ष के मार्ग की ओर आगे बढ़ सकता है। मनुष्य पर्याय, श्रेष्ठ कुल, बुद्धि, धन, जैन धर्म, साधु-संतों का समागम, उनका चातुर्मास यह सब पूर्व में किए हुए सत्कार्य एवं पुण्य के फल स्वरूप ही हमें प्राप्त होता है। जो हमें पुण्य से प्राप्त हुआ है, उसका सदुपयोग करना चाहिए। हम सभी को अपनी चंचला लक्ष्मी को परोपकारी और धार्मिक कार्यों में खर्च कर अपने लिए और अधिक पुण्य का संचय करना चाहिए। धार्मिक अनुष्ठान, पूजन पाठ, जप, तप करते हुए अपनी आत्मा का कल्याण करना चाहिए क्योंकि, जीवन में अंतिम सांस का कोई ठिकाना नहीं है। कभी भी बुलावा आ सकता है, सब यहीं का यहीं धरा रह जाएगा। यहां से जाना कभी भी हो सकता है। जब व्यक्ति के जीवन में पुण्य का उदय आता है, तो अमंगल ही मंगल होता है। पापों के उदय से अमीर भी दरिद्र और आस्तिक भी नास्तिक हो जाता है। कर्मों की लीला बड़ी विचित्र है, यह राजा को रंक और रंक को राजा बना सकती है।</p>
<p><strong>व्यक्ति नम्रता से जुड़ता है और अहंकार से टूटता है</strong></p>
<p>मानव पर्याय पाकर भी हम अहंकार में सबकुछ नष्ट कर देते हैं। व्यक्ति नम्रता से जुड़ता है और अहंकार से टूटता है। अहंकार रूपी तलवार से जीवन समाप्त हो जाता है, जीवन की शांति, सुख, चौन सब समाप्त हो जाता है। सदैव अच्छाई का रास्ता अपने पास रखो। आज मानव का स्वभाव बुराई को याद रखने का हो गया है, अच्छाई को वह भूलता जा रहा है। जीवन में नकारात्मक सोच विचार मनुष्य को नुकसान पहुंचाते है। अन्य द्वारा किए गए उपकार को याद रखना चाहिए। अन्य के दोष को देखने के पूर्व स्वयं के दोष को देखे। कभी भी पूर्व में की गई गलतियों को दोहराना नहीं चाहिए, बल्कि उनसे सबक सीखना चाहिए। मुनिश्री ने कहा कि हे! भव्य आत्माओं अपने जीवन में अहंकार का त्याग करते हुए नम्रता को धारण कर आत्मीय सुख-शांति के साथ प्रभु का स्मरण करते हुए परोपकार, जीवदया, अहिंसा, मानव सेवा में लीन रहना चाहिए।</p>
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		<title>बुद्धि को निर्मल बना धर्म आलंबन से होती है सुख की प्राप्ति:  आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने दी जहाजपुर में धर्म देशना </title>
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		<pubDate>Thu, 26 Jun 2025 10:26:52 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आचार्य श्री वर्धमान सागर जी जहाजपुर में 36 साधुओं सहित विराजित है। आषाढ़ शुक्ल द्वितीया 27 जून को 36 वां आचार्य पदारोहण भक्ति भाव पूर्वक मनाया जाएगा। गुरुवार को अनेक साधुओं ने केशलोचन किए। शुक्रवार दोपहर को विभिन्न धार्मिक कार्यक्रम होंगे। जहाजपुर से पढ़िए, राजेश पंचोलिया की यह खबर&#8230;. जहाजपुर। आचार्य श्री वर्धमान सागर जी [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>आचार्य श्री वर्धमान सागर जी जहाजपुर में 36 साधुओं सहित विराजित है। आषाढ़ शुक्ल द्वितीया 27 जून को 36 वां आचार्य पदारोहण भक्ति भाव पूर्वक मनाया जाएगा। गुरुवार को अनेक साधुओं ने केशलोचन किए। शुक्रवार दोपहर को विभिन्न धार्मिक कार्यक्रम होंगे। <span style="color: #ff0000">जहाजपुर से पढ़िए, राजेश पंचोलिया की यह खबर&#8230;.</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>जहाजपुर।</strong> आचार्य श्री वर्धमान सागर जी जहाजपुर में 36 साधुओं सहित विराजित है। आषाढ़ शुक्ल द्वितीया 27 जून को 36 वां आचार्य पदारोहण भक्ति भाव पूर्वक मनाया जाएगा। आचार्य श्री ने धर्मसभा में बताया कि संसार का प्राणी दुःख से घबराता है। सुख चाहता है, भगवान से भी सुख की कामना करता है। श्रीमद् में ‘श्री’ का अर्थ ‘लक्ष्मी’ होता है और मद अर्थात भगवान ने केवल ज्ञान लक्ष्मी को प्राप्त किया है। सभी को अपनी बुद्धि धर्म मार्ग पर लगाना चाहिए। बुद्धि का बहुत महत्व है। बुद्धि के प्रयोग से पाप और पुण्य का भेद समझें। समवशरण में भगवान धर्म देशना देते हैं। वर्तमान में जिनालय देव शास्त्र गुरु से धर्म देशना मिलती है। उन्होंने कहा कि संसार के दुखों से छुटकारा पाने के लिए सभी को सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान, सम्यक चारित्र अहिंसामय धर्म से प्राप्त करना होगा। आपकी आत्मा अजर अमर है। आप ने अनेक जन्मों में अनेक गतियों में भ्रमण किया है। आत्मा छोटे से छोटे जीव तथा 500 धनुष से अधिक ऊंचाई के बाहुबली स्वामी सभी के शरीर में आत्मा होती है। यह मंगल देशना आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज ने स्वस्ति धाम जहाजपुर में आयोजित धर्मसभा में प्रकट की। आचार्य श्री ने आगे कहा कि दीक्षा गुरु आचार्य श्री धर्मसागर जी के संस्मरण के माध्यम से बताया कि जब बुद्धि निर्मल होती है तब वह धर्म का अवलंबन लेते हैं। धर्म को समझने वाला चिरंजी सुख को प्राप्त करता है।</p>
<p><strong>आत्मा से परमात्मा बनने के लिए धर्म का सहारा लेना होगा</strong><br />
आचार्यश्री ने कहा कि वैराग्य को निमित्त समझकर तीर्थंकरों ने संयम धारण किया वर्तमान में जिनालय से हमें वैराग्य संयम की प्रेरणा मिलती है इसके लिए आत्मा की शक्ति पहचान कर धर्म का सहारा लेकर परमात्मा बनने का पुरुषार्थ करना चाहिए। पाप छोड़ने से पुण्य मिलता है, इससे बुद्धि में विशुद्धता मिलती है और रत्नत्रयधर्म से शाश्वत सुख मिलता है। इसके पूर्व मुनि श्री हितेंद्रसागर जी ने अपने प्रवचन में बताया कि आत्मा से परमात्मा बनने के लिए धर्म का सहारा लेना होगा। जहाज समुद्र में तैरता है और लोगों को भी तिराता है अर्थात पार लगाता है। अरिहंत भगवान भी जहाज है, वह उन्होंने भी भव संसार रूपी समुद्र को पार किया है और लोगों को भी भव समुद्र से पार कराते हैं। पाप और कषाय से दूर रहना ही धर्म है। छोटे-छोटे नियम का बीजारोपण दीक्षा रूपी वृक्ष बनते हैं।</p>
<p><strong>शुद्ध भाव सिद्ध भगवान के होते हैं</strong><br />
मुनि श्री के प्रवचन के पूर्व गणिनी आर्यिका श्री स्वस्तीभूषण माताजी ने अपने प्रवचन में शरीर और आत्मा के स्वरूप की विवेचना की शरीर और आत्मा को भिन्न समझना जरूरी है, तभी आप रत्नत्रय मार्ग अपना कर 12 तप और 10 धर्म त्याग, संयम, वैराग्य के माध्यम से मोक्ष मार्ग पर अग्रसर हो सकते हैं। आत्मा के तीन भेद बताए शुद्ध भाव सिद्ध भगवान के होते हैं, अशुभ भाव से पाप और शुभ भाव से पुण्य की प्राप्ति होती है। आचार्य श्री संघ सानिध्य में प्रवचन के पूर्व श्री मुनिसुब्रत नाथ भगवान की पूजन भक्ति भाव पूर्वक हुई। आचार्य श्री शांति सागर जी के संघपति मुंबई के जवेरी परिवार के सुनील जवेरी को भगवान की शांतिधारा का सौभाग्य प्राप्त हुआ। गुरुवार को अनेक साधुओं ने केशलोचन किए। 27 जून को दोपहर को विभिन्न धार्मिक कार्यक्रम होंगे।</p>
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		<title>सच्चे रिश्ते केवल आंखों से नहीं, दिल से देखे जाते: मुनिश्री सर्वार्थसागर जी महाराज ने धर्मसभा में दी ‘रिश्तों की पहचान’  </title>
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		<pubDate>Sun, 15 Jun 2025 06:47:05 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[मुनिराजों का यहां की नगरी में विराजमान होना ही पुण्य की बात है। यहां के धर्मप्रेमी समाज को आचार्य और मुनिराजों के धर्म देशना में आशीर्वचन सुनने को मिल रहे हैं। यहां धर्मसभा को संबोधित करते हुए मुनि श्री सर्वार्थ सागर जी ने कहा कि नज़रों में वो ही दिखते हैं, जो दिल में बसते [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>मुनिराजों का यहां की नगरी में विराजमान होना ही पुण्य की बात है। यहां के धर्मप्रेमी समाज को आचार्य और मुनिराजों के धर्म देशना में आशीर्वचन सुनने को मिल रहे हैं। यहां धर्मसभा को संबोधित करते हुए मुनि श्री सर्वार्थ सागर जी ने कहा कि नज़रों में वो ही दिखते हैं, जो दिल में बसते हैं, वरना सामने होकर भी लोग गुमनाम रहते हैं। <span style="color: #ff0000">विदिशा से पढ़िए, यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>विदिशा।</strong> मुनिराजों का यहां की नगरी में विराजमान होना ही पुण्य की बात है। यहां के धर्मप्रेमी समाज को आचार्य और मुनिराजों के धर्म देशना में आशीर्वचन सुनने को मिल रहे हैं। यहां धर्मसभा को संबोधित करते हुए मुनि श्री सर्वार्थ सागर जी ने कहा कि नज़रों में वो ही दिखते हैं, जो दिल में बसते हैं, वरना सामने होकर भी लोग गुमनाम रहते हैं। उन्होंने सभा को संबोधित करते हुए कहा कि यह वाक्य हमें याद दिलाता है कि सच्चे रिश्ते केवल आंखों से नहीं, दिल से देखे जाते हैं। जब कोई हमारे हृदय में स्थान बना लेता है, तब उसकी उपस्थिति हर क्षण महसूस होती है, भले ही वो दूर हो लेकिन, जिनके लिए दिल में जगह नहीं होती।</p>
<p>वे पास होकर भी अजनबी से लगते हैं। मुनिश्री ने कहा कि यह जीवन भी कुछ ऐसा ही है। अगर हम किसी कार्य, लक्ष्य या रिश्ते को दिल से अपनाएंगे, तो वो हमारे लिए महत्वपूर्ण बन जाएगा। वरना लाख कोशिशें करने पर भी वो हमारी नज़रों से ओझल ही रहेगा। इसलिए अपने दिल को पवित्र रखें, उसमें अच्छाई, सच्चाई और प्रेम को स्थान दें क्योंकि, जहां दिल लगेगा, वहीं जीवन की असली पहचान मिलेगी।</p>
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		<title>गणधरों ने अपनी स्मरण शक्ति से शास्त्रों की रचना की: आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने जावद में दी मंगल देशना  </title>
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		<pubDate>Fri, 09 May 2025 13:06:21 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने जावद में विराजित रहकर मंगल देशना दी है। इसमें धर्म, ग्रंथ और ज्ञान का महत्व बताया। देव शास्त्र और गुरु की महिमा का बखान किया है। जावद से पढ़िए, राजेश पंचोलिया की यह खबर&#8230; जावद। आचार्य श्री वर्धमान सागर जी 36 साधुओं सहित जावद विराजित हैं। शुक्रवार को उपदेश [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने जावद में विराजित रहकर मंगल देशना दी है। इसमें धर्म, ग्रंथ और ज्ञान का महत्व बताया। देव शास्त्र और गुरु की महिमा का बखान किया है। <span style="color: #ff0000">जावद से पढ़िए, राजेश पंचोलिया की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>जावद।</strong> आचार्य श्री वर्धमान सागर जी 36 साधुओं सहित जावद विराजित हैं। शुक्रवार को उपदेश में आचार्यश्री ने बताया कि संसारी प्राणी चार प्रकार की संज्ञाओं से ग्रसित होकर शाश्वत ज्ञान से विमुख है। ज्ञान आत्मा का स्वभाव है ,हमारे अरिहंत सिद्ध भगवान ने कर्मों का नाश कर सिद्ध अवस्था प्राप्त कर अनंत दर्शन, अनंत ज्ञान, अनंत सुख, अनंत वीर्य आदि गुण प्रगट किए हैं। हमारे श्री आदिनाथ भगवान से लेकर श्री महावीर स्वामी तक सभी 24 तीर्थंकरों ने समवशरण में धर्म देशना दी। जिसे गणधरों ने ग्रहण कर अपनी स्मरण शक्ति से अनेक शास्त्रों की रचना की है, जो जिनवाणी के रूप में हमें प्राप्त हैं। यह मंगल देशना आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज ने जावद की धर्म सभा में प्रकट की। आचार्य श्री ने उपदेश में आगे बताया कि जिन शासन प्रदत्त जैन धर्म में आत्मा को परमात्मा बनाने का मार्ग बताया गया हैं।</p>
<p>जिस प्रकार अंधकार को प्रकाश के माध्यम से दूर किया जाता हैं। उसी प्रकार मोह रूपी अज्ञान धर्म रूपी प्रकाश से दूर करने का देव शास्त्र एवं गुरु मार्ग दिखाते हैं। श्री जिनेंद्र जैन ने बताया कि आचार्य श्री की धर्म देशना के पूर्व मुनि श्री हितेंद्र सागर जी ने प्रवचन में बताया कि संसार के दुखों ओर विषय भोगों से विरक्त होकर दीक्षा ली जाती हैं। इससे ज्ञान और शाश्वत सुख की प्राप्ति होती है। यही निर्वाण का मार्ग है।</p>
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