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	<title>धर्माचार्य कनक नंदी जी &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<title>धर्माचार्य कनक नंदी जी &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>जीवन में सु मरण के बिना मोक्ष नहीं मिलता : धर्माचार्य कनक नंदी जी ने जन्म और मरण के रहस्य को गहराई से समझाया </title>
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		<pubDate>Tue, 21 Apr 2026 08:40:16 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[केवली भगवान के बिना कोई आचार्य,उपाध्याय, साधु अनंत को नहीं जान सकते क्योंकि, अनंत को जानने के लिए अनंत नॉलेज चाहिए। अनंतानंत बार इस जीव ने जन्म मरण किया है अतः मरण के नाम से सभी को डर लगता है। यह प्रबोधन धर्माचार्य कनक नंदीजी ने भिलुडा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>केवली भगवान के बिना कोई आचार्य,उपाध्याय, साधु अनंत को नहीं जान सकते क्योंकि, अनंत को जानने के लिए अनंत नॉलेज चाहिए। अनंतानंत बार इस जीव ने जन्म मरण किया है अतः मरण के नाम से सभी को डर लगता है। यह प्रबोधन धर्माचार्य कनक नंदीजी ने भिलुडा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में दिया। <span style="color: #ff0000">डडूका से अजीत कोठिया की रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>डडूका।</strong> केवली भगवान के बिना कोई आचार्य,उपाध्याय, साधु अनंत को नहीं जान सकते क्योंकि, अनंत को जानने के लिए अनंत नॉलेज चाहिए। अनंतानंत बार इस जीव ने जन्म-मरण किया है, अतः मरण के नाम से सभी को डर लगता है। यह प्रबोधन धर्माचार्य कनक नंदीजी ने भिलुडा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में दिया। उन्होंने बताया कि निगोदिया, नित्य निगोदिया जीव अनादि काल से अभी तक कृमि, किट पशु पक्षी मनुष्य नहीं बने हैं। इतर निगोदिया में निगोद से निकलकर कृमि, कीट, पशु, पक्षी और मनुष्य आदि बनते हैं। सभी निगोदिया जीव मिथ्या दृष्टि ही होते हैं। निगोदिया में जीव अनंतानंत बार जन्म-मरण करता है। एक श्वास में 8-10 बार जन्म-मरण करता है। जैन धर्म में ही सुमरण का वर्णन है। सही मरण से मोक्ष मिलेगा। यह पंडित मरण है। सामान्य जीव मरण से भयभीत रहते हैं परंतु, सम्यक दृष्टि मरण से नहीं डरता, वह जानता है कि मरण मेरे शरीर का होगा मेरी आत्मा का नहीं। प्रति समय मरण होता है उसे अविचीमरण कहते हैं। समय से पहले आकस्मिक मरण होना अकाल मरण है। आयु के पूर्ण होने पर मरना सकाल मरण है। मरण का शासन कर्मानुसार है। मृत्यु शरीर की होती है आत्मा की नहीं। जन्म मरण से परे अमृत अवस्था होती है। जिसमें दुबारा जन्म-मरण नहीं होता है। गर्भ में नहीं जाना पड़ता है। उन्होंने आगे कहा कि हर द्रव्य में अनेकांत है अनेकांत वस्तु स्वरूप है।</p>
<p>साधारण आहार एक समान आहार एक साथ उच्श्वास, एक साथ निश्वास। साधारण वनस्पति एक समय में अनंत जीव एक साथ उत्पन्न होते हैं। आचार्यश्री ने बताया कि मनुष्य के शरीर में जितने वायरस बैक्टीरिया है, उतने पूरी पृथ्वी में पशु-पक्षी भी नहीं है। आत्मविश्वास ज्ञान चरित्र समता शांति से मरण को मार सकते हैं। संयमी व ज्ञानी की मृत्यु पंडित मरण तथा अज्ञानी जीवों का मरण बालमरण होता है। कर्मक्षय से ही मृत्यु को जीता जाता है, यह मृत्यु के प्रति निर्भयता दर्शाता है। यह जानकारी विजयलक्ष्मी गोदावत सागवाड़ा ने दी।</p>
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		<title>जीवन में हानि, लाभ, सुख, दुःख सभी के मूल में अच्छे बुरे कर्म : धर्माचार्य कनक नंदी जी ने वेबिनार में कर्म की गति और उसके प्रभाव को समझाया  </title>
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		<pubDate>Sat, 18 Apr 2026 11:48:25 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[धर्माचार्य कनक नंदीजी गुरुदेव ने भिलुडा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में बताया कि संसार में 84 लाख योनिया क्यों? रावण औ विभीषण भाई-भाई थे फिर भी उनके स्वभाव में अंतर क्यों? वृक्ष की सभी पत्तियां अलग-अलग आकार प्रकार की क्यों होती है? इन सब प्रश्नों का उत्तर, हानि लाभ सुख दुख सब [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>धर्माचार्य कनक नंदीजी गुरुदेव ने भिलुडा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में बताया कि संसार में 84 लाख योनिया क्यों? रावण औ विभीषण भाई-भाई थे फिर भी उनके स्वभाव में अंतर क्यों? वृक्ष की सभी पत्तियां अलग-अलग आकार प्रकार की क्यों होती है? इन सब प्रश्नों का उत्तर, हानि लाभ सुख दुख सब का मूल कारण कर्म है। <span style="color: #ff0000">डडूका से पढ़िए, अजीत कोठिया की रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>डडूका।</strong> धर्माचार्य कनक नंदीजी गुरुदेव ने भिलुडा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में बताया कि संसार में 84 लाख योनिया क्यों? रावण औ विभीषण भाई-भाई थे फिर भी उनके स्वभाव में अंतर क्यों? वृक्ष की सभी पत्तियां अलग-अलग आकार प्रकार की क्यों होती है? इन सब प्रश्नों का उत्तर, हानि लाभ सुख दुख सब का मूल कारण कर्म है। तुम पतित से पावन, कंकर से शंकर, आत्मा से परमात्मा केवल आत्मज्ञान से ही बन सकते हो। पूर्व कर्म के तीव्र पाप से कर्म जीव पर हावी हो जाते हैं जिसके कारण गर्भ में ही रोग छोटी उम्र में रोग दादा होते हुए भी पोते की मृत्यु पिता के होते हुए बेटे की मृत्यु हो जाती है। कर्म के गुलाम होने से व्यक्ति की बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है। ज्ञानावरणीय कर्म के उदय से गुरु पढाते हैं वह भी याद नहीं रहता। कर्म व जीव का महासंग्राम अनादिकाल से चल रहा है.। कर्म के कारण ही 84 लाख योनियों में जीव भ्रमण करता है। भस्मक रोग समंत भद्र आचार्य को हुआ था सामान्य लोगों को क्षुधा रोग होता ही है।</p>
<p>हम लोगों का भी पाप कर्मों का उदय था परंतु तीव्र नहीं था आत्मा को नहीं जानते थे। गुरुदेव ने सोचा भद्र जीव है पाप के कारण संसार में डूब जाएंगे अतः हम पर उपकार करके उपदेश दिया। कर्म हम पर हावी थे परंतु गुरु उपदेश से आत्म श्रद्धा बढी, आत्मज्ञान प्राप्त करने की रुचि जागृति हुई। आचार्य श्री परम सत्य के बारे में पढ़ रहे हैं तथा पढा रहे हैं। आत्मा एक अद्वितीय है। उसमें असंख्यात आत्म प्रदेश है एक आत्म प्रदेश में अनंत गुण अनंत पर्याय होती है। एक गुण में अनंत पर्याये होती है। आत्मा अनंत शक्ति संपन्न होते हुए भी कर्म का दास क्यों बना हुआ है?</p>
<p><strong> एक आत्मप्रदेश में अनंतानंत कर्म परमाणु बंधे होते हैं</strong></p>
<p>हाथी शक्तिशाली है उसे सामान्य धागे से नहीं बांध सकते हैं। वैसे ही आत्मा की अनंत शक्ति को बाधने के लिए कर्मों की भी अनंत शक्ति होती है। श्रेयांश वस्तावड़े सांगली तथा मनीष पंचोरी कॉलोनी की जिज्ञासा का समाधान करते हुए आचार्य श्री ने बताया कि सूर्य से रेडिएशन निकलता है वैसे ही जीव के शरीर से भी रेडिएशन निकलता है। एक आत्मप्रदेश में अनंतानंत कर्म परमाणु बंधे होते हैं परंतु कुछ कर्मों का उदय तुरंत हो जाता है कुछ का उदय बाद में होता है।. श्रीपाल राजा ने दिगम्बर साधु को कोडी कोडी कोडी बोलकर साधु की निंदा की थी उनके दोस्तों ने अनुमोदन की थी उसमें समय सेकंड का लगा परंतु इतने कम समय में कर्म परमाणु अधिक गहराई से बंध गए,कर्म का उदय आया। कुछ समय में कर्म बांधा उसी का फल कई वर्षों तक दुख भोगना पड़ा। कर्म उदय से शरीर से बदबू आने लगी पीव निकलने लगा राजपाठ को छोड़कर जंगल में जाना पडा।</p>
<p><strong> सिद्ध भगवान में अगुरुलघु गुण इलास्टिक पावर की तरह होता है</strong></p>
<p>अंजना सती में 22 घड़ी तक मूर्ति छुपाइ उसका फल 22 वर्ष पति वियोग सहना पड़ा।</p>
<p>सिद्ध भगवान एक समय में सिद्ध शिला पर विराजमान हो जाते हैं। सिद्ध भगवान में अधिक परिवर्तन होता है संसारी जीवो में इतना नहीं होता। संसारी जीवो में कर्मों का भार अधिक रहता है। सिद्ध भगवान में अनंत गुण होने से षटगुण हानी वृद्धि सर्वाधिक होती है। जैसे बैलगाड़ी साइकिल ट्रेन एरोप्लेन क्वांटम एटम की गति में अंतर होता है। सिद्ध भगवान की ऊर्ध्व गति सबसे अधिक होती है। तीव्र परिणमन भी अधिक होता है। सिद्ध भगवान में अगुरुलघु गुण इलास्टिक पावर की तरह होता है। जैसे ट्यूब बैलून में हवा। सिद्ध भगवान में अनंतानंत गुण प्रकट हो गए हैं कर्म रहित निकम्मे ज्यादा सक्रिय होते हैं। जितना जितना जीव सिद्ध होता जाता है उतनी उतनी उसमें शक्ति प्रगट होती जाती है। शुद्ध आत्मा के परिणमन को गणधर नहीं देख सकते। मुनि श्री सुविज्ञ सागर जी ने आचार्य श्री द्वारा रचित कविता महासंग्राम महासंग्राम विश्व का सबसे है बड़ा महासंग्राम। अंतरंग शत्रु नाश होने से बहिरंग संग्राम कहां से होगा द्वारा मंगलाचरण किया। यह जानकारी सागवाड़ा निवासी विजयलक्ष्मी गोदावत ने दी।</p>
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		<title>समस्त दुःखों और संसार का मूल कारण मोह और मिथ्यात्व है : धर्माचार्य कनक नंदी जी की मंगलवाणी से मिल रहा समाजजनों को अमृत ज्ञान  </title>
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		<pubDate>Fri, 17 Apr 2026 12:59:34 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[धर्माचार्य कनक नंदी जी भीलुड़ा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार को संबोधित कर रहे हैं। इस दौरान उन्होंने वेबिनार में बताया कि अनादिकाल से जीव शरीर को ही स्व स्वरूप समझता है। डडूका से अजीत कोठिया की रिपोर्ट&#8230;     डडूका। धर्माचार्य कनक नंदी जी भीलुड़ा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार को [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>धर्माचार्य कनक नंदी जी भीलुड़ा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार को संबोधित कर रहे हैं। इस दौरान उन्होंने वेबिनार में बताया कि अनादिकाल से जीव शरीर को ही स्व स्वरूप समझता है। <span style="color: #ff0000">डडूका से अजीत कोठिया की रिपोर्ट&#8230;    </span></strong></p>
<hr />
<p><strong>डडूका।</strong> धर्माचार्य कनक नंदी जी भीलुड़ा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार को संबोधित कर रहे हैं। इस दौरान उन्होंने वेबिनार में बताया कि अनादिकाल से जीव शरीर को ही स्व स्वरूप समझता है। इंद्रियों के भोग उपभोग में ही मिथ्या दृष्टि रमण करता है। स्व तत्व आत्म तत्व को नहीं जानता है। इंद्रीय विषय में लीन होकर पाप करता है। जीव स्वयं की आध्यात्मिक स्वरूप अनंत ज्ञान अनंत वीर्य अनंत सुख अनंतबल शुद्ध बुद्ध आनंद को नहीं जानता है। मोही जीव स्व स्वरूप को नहीं जानता है। समस्त दुःखों का तथा संसार का मूल कारण मोह और मिथ्यात्व है। इंद्रियों की प्रवृत्ति बाह्य होती है., आंतरिक नही। स्वयं की आंखों को स्वयं नहीं देख सकते, उसको देखने के लिए दर्पण का सहारा लेना पड़ता है। जो सत्य है वह मेरा है। यह मानना सम्यक दर्शन है। जो मैं कहता हूं वही सत्य है यह मानना मिथ्यात्व है।</p>
<p><strong>कर्मबंध का मुख्य कारण मोह</strong></p>
<p>भोग भूमि में भाव मिथ्या्व होता है द्रव्य मिथ्यात्व नहीं। भाव रूप में हर जीव मिथ्या दृष्टि है। परम सत्य आत्म तत्व को वास्तविक सत्य को नहीं मानना मिथ्यात्व है। मिथ्यात्व के अनेक भेद, प्रभेद हैं। विपरीत, एकांत, विनय, संशय, अज्ञान इस प्रकार मिथ्यात्व के पांच भेद हैं। काल से ही सबकुछ होता है, ऐसा मानना भी मिथ्यात्व है। एक आयाम को मनाना अन्य आयाम को नकार देना भी मिथ्यात्व है। निश्चय को ही मानना व्यवहार को नहीं मानना यह भी मिथ्यात्व है। व्यवहार को ही मानना निश्चय को नहीं मानना, यह भी मिथ्यात्व है। मिथ्यात्व सबसे बड़ा पाप है।</p>
<p>जब तक मोक्ष नहीं होता तब तक कर्म बंध होता रहता है। कर्मबंध का मुख्य कारण मोह तथा मिथ्यात्व है।</p>
<p><strong>मिथ्यात्व से ही संसार भ्रमण होता है</strong></p>
<p>निगोदिया जीव होने का मुख्य कारण मिथ्यात्व है। निगोदिया जीव महापापी है क्योंकि, वह अनंतानुबंधी कषायों से युक्त भाव कलंक से कलंकित होते हैं। दर्शन मोह, चरित्र मोह के तीव्र कर्मबंध के कारण स्वयं को जीव नहीं जान पाता है। मिथ्यात्व गुणस्थान में 100 पाप प्रकृतियों का बंध होता है। मिथ्यात्व से ही संसार भ्रमण होता है। सम्यक दर्शन से मिथ्यात्व रूपी घना वृक्ष कट जाता है। यह जानकारी विजयलक्ष्मी गोदावत सागवाड़ा ने दी।</p>
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		<title>निश्चय से महान कर्ता सिद्ध भगवान है: धर्माचार्य कनक नंदी जी की अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में आत्मा के प्रभाव पर उदबोधन </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shree Phal News]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 12 Apr 2026 09:01:07 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[धर्माचार्य कनक नंदीजी जी ने भिलुडा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में बताया कि यह आत्मा कर्ता है। जो क्रिया का कर्ता है वह कर्ता है.। बिना कर्ता के कोई भी कार्य नहीं होता है जीव अभिन्न षटकारक है। डडूका से अजीत कोठिया की रिपोर्ट&#8230;   डडूका। धर्माचार्य कनक नंदीजी जी ने भिलुडा [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>धर्माचार्य कनक नंदीजी जी ने भिलुडा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में बताया कि यह आत्मा कर्ता है। जो क्रिया का कर्ता है वह कर्ता है.। बिना कर्ता के कोई भी कार्य नहीं होता है जीव अभिन्न षटकारक है। <span style="color: #ff0000">डडूका से अजीत कोठिया की रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong>  डडूका।</strong> धर्माचार्य कनक नंदीजी जी ने भिलुडा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में बताया कि यह आत्मा कर्ता है। जो क्रिया का कर्ता है वह कर्ता है.। बिना कर्ता के कोई भी कार्य नहीं होता है जीव अभिन्न षटकारक है। स्वात्मा में स्वात्मा की आराधना की जाती है। निश्चय से महान कर्ता सिद्ध भगवान है उन्होंने अपने समस्त कर्मों को नष्ट करके अनंत चतुष्टय प्राप्त किया है। सबसे महान भोक्ता भी सिद्ध भगवान है क्योंकि, वह अपने अनंत बल के आधार पर अनंत सुख का भोग कर रहे हैं। सिद्ध भगवान में उत्पाद व्यय धौव्य भी निरंतर हो रहा है। शुद्ध आत्मा में शुद्ध परिणामन हो रहा है। सबसे श्रेष्ठ दृष्टा भी सिद्ध भगवान है। संसार के सभी जीवों को उनके पाप पुण्य को प्रति समय वह देखते हैं परंतु किसी के प्रति राग नहीं होने से ना किसी के सुख से सुखी ना किसी के दुख से दुखी होते हैं। संसार के सभी कार्य उन्होंने कर लिए हैं, उनके लिए कुछ करना बाकी नहीं है इसलिए कृतकृत्य है। वह न किसी को कुछ देते हैं ना किसी से कुछ लेते हैं। उनकी भक्ति आराधना पूजा से भक्तों को स्वयंमेव फल मिलता है।</p>
<p><strong>कर्ता के बिना ना पाप न पुण्य, न स्वर्ग ना मोक्ष</strong></p>
<p>कर्म का फल कर्ता को मिलता है पाप का करता भी तुम स्वयं हो और पुण्य का कर्ता भी तुम स्वयं हो। अभिन्न षटकारक हो। तुम्हारी आत्मा है तो संसार के सभी द्रव्य तुम्हारे काम के हैं यदि जीव द्रव्य ही नहीं तो अन्य द्रव्य कोई कार्यकारी नहीं। व्यवहार से कर्ता हो। भोज्य वस्तु से ही भोजन बनता है पानी फ्रीज के माध्यम से बर्फ बन जाता है। पानी ही पानी द्वारा परिणमन करके बर्फ बनता है। इस प्रकार आत्मा ही आत्मा द्वारा आत्मा के लिए ,आत्मा की साधना करके आत्मा को प्राप्त करता है। कर्ता के बिना ना पाप न पुण्य, न स्वर्ग ना मोक्ष। भाव ही प्रमुख है पुण्य भाव शुभ भाव करने से स्वर्ग मोक्ष मिलेगा तथा पाप भाव अशुभ भाव करने से नरक तिर्यच के दुख प्राप्त होंगे। अच्छा भाव का फल अच्छा स्वयं को ही मिलता है।</p>
<p><strong>सभी जीवों से गुणों में भारी है, अतः गुरु है</strong></p>
<p>जिन भावना से युक्त भव्य जीव ज्ञानावरणीय दर्शनावरणीय मोहनीय अंतराय आदि घाति कर्मों को नष्ट करके अनंत ज्ञान अनंत दर्शन अनंत सुख अनंत वीर्य ऐसे चार चतुष्टय प्रगट करता हैं। मैं ही कर्म, मैं ही कर्ता मैं ही भोक्ता , मैं ही पतित,मैं ही पावन, मैं ही धर्म, मै ही अधर्म। ज्ञानी शिव परमेष्ठी बनते हैं। परम पद पर स्थित होने के कारण परमेष्ठी कहते हैं। समस्त पदार्थों के ज्ञाता होने से सर्वज्ञ है। समस्त विश्व में उनका ज्ञान फैला हुआ है अतः विष्णु है। केवल ज्ञान होने के बाद भगवान का मुख चारों दिशाओं में दिखता है। अतः ब्रह्मा है। सभी जीवों से गुणों में भारी है। अतः गुरु है। उनके सभी कार्य सिद्ध हो गए हैं अतः सिद्ध हैं। मुनि श्री सुविज्ञ सागर जी गुरुदेव ने आचार्य श्री द्वारा रचित कविता &#8216;शरीर रहित यदि मैं होता समस्याओं से मैं रहित होता। राग द्वैष, मोह से रहित होता. सत्य, चित्त आनंद होता।&#8217; से मंगलाचरण किया। यह जानकारी विजयलक्ष्मी कमल कुमार पुनर्वास कॉलोनी सागवाड़ा ने दी।</p>
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