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	<title>धर्माचार्य कनक नंदीजी &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>जैन धर्म में जीने की कला है तो मरने की कला भी : धर्माचार्य कनक नंदीजी ने बताए इंद्रियों पर विजय प्राप्त करने के सरल उपाय  </title>
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		<pubDate>Sun, 12 Apr 2026 12:55:27 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[धर्माचार्य कनकनंदी गुरुदेव की भिलुडा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार जारी है। इसमें वे जैन धर्म के विभिन्न पक्षों का रहस्य बता रहे हैं। इसमें उन्होंने बताया कि अनादिकाल से जीव आत्म आचरण नहीं कर पाया। डडूका से पढ़िए, अजीत कोठिया डडूका की रिपोर्ट&#8230; डडूका। धर्माचार्य कनकनंदी गुरुदेव की भिलुडा के पास शिवगौरी [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>धर्माचार्य कनकनंदी गुरुदेव की भिलुडा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार जारी है। इसमें वे जैन धर्म के विभिन्न पक्षों का रहस्य बता रहे हैं। इसमें उन्होंने बताया कि अनादिकाल से जीव आत्म आचरण नहीं कर पाया। <span style="color: #ff0000">डडूका से पढ़िए, अजीत कोठिया डडूका की रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>डडूका।</strong> धर्माचार्य कनकनंदी गुरुदेव की भिलुडा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार जारी है। इसमें वे जैन धर्म के विभिन्न पक्षों का रहस्य बता रहे हैं। इसमें उन्होंने बताया कि अनादिकाल से जीव आत्म आचरण नहीं कर पाया। हम उन्हीं को मुनि कहते हैं जो सभी कलाओं से युक्त होते हैं। 72 कलाओं में दो श्रेष्ठ कलाएं हैं। पहली जीव की जीविका दूसरी जीव का उद्धार अर्थात आत्मा को परमात्मा बनाना। जैन धर्म में जीने की भी कला है तथा मरने की भी कला है। जो दुष्ट काम अश्लील काम करते हैं, वह साधु नहीं तथा श्रावक भी नहीं। जो स्वयं की आत्मा पर विजय प्राप्त करते हैं। वह वीरों के भी वीर होते हैं। वे पुरुष धीर वीर चमकती हुई क्षमा की तलवार से इंद्रियों का दमन करके कर्मों पर विजय प्राप्त करते हैं। कषाओ रूपी योद्धाओं को वह जीत लेते हैं। वे भगवान धन्य है, जिन्होंने दर्शन ज्ञान रूपी हाथ का सहारा देकर भव्य जीवों का उद्धार किया है।</p>
<p>मोह रूपी लता को ज्ञान रूपी शस्त्रों से मुनिराज नष्ट कर देते हैं। जिस प्रकार आकाश में तारों से गिरा हुआ चंद्रमा सुशोभित होता है। इस प्रकार गुणों रूपी ताराओं के समूह में मुनिराज सुशोभित होते हैं। विशुद्ध भाव से युक्त जीव चक्रवर्ती राजा, महाराजा, देवेंद्र, बलभद्र, राम, केशव, सूर, चारण, रिद्धिधारी मुनि, जिनेंद्र आदि श्रेष्ठ पद प्राप्त करते हैं। यह अष्ट पाहुड़ की 162 नंबर की गाथा से आचार्य श्री ने बताया। गृहस्थ धर्म, मुनि धर्म पालन में भाव प्रमुख है। जिनेंद्र भाव की भावना से सुशोभित जीव उत्तम अनुपम आनंद सहित अतुलनीय पद को प्राप्त करते हैं। मुनि श्री सुविज्ञ सागर जी ने आचार्य श्री द्वारा रचित कविता ‘कब मम अपूर्व अवसर आएगा’ द्वारा मंगलाचरण किया। ये जानकारी विजयलक्ष्मी गोदावत सागवाड़ा ने दी।</p>
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		<title>आत्मज्ञान के बिना जीव चलता फिरता शव: धर्माचार्य कनक नंदीजी ने भावपाहुड की गाथा 343 का रहस्य बताया </title>
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		<pubDate>Fri, 10 Apr 2026 11:42:22 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[धर्माचार्य कनक नंदी गुरुदेव ने भिलुडा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में बताया कि आत्मज्ञान बिना यह जीव चलता फिरता शव है। समाधि तंत्र 61 से 66 की गाथाओं को समझाने के लिए भावपाहुड की गाथा 343 का रहस्य बताया। डडूका से पढ़िए, अजीत कोठिया की रिपोर्ट&#8230; डडूका। धर्माचार्य कनक नंदी गुरुदेव ने [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>धर्माचार्य कनक नंदी गुरुदेव ने भिलुडा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में बताया कि आत्मज्ञान बिना यह जीव चलता फिरता शव है। समाधि तंत्र 61 से 66 की गाथाओं को समझाने के लिए भावपाहुड की गाथा 343 का रहस्य बताया। <span style="color: #ff0000">डडूका से पढ़िए, अजीत कोठिया की रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>डडूका</strong>। धर्माचार्य कनक नंदी गुरुदेव ने भिलुडा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में बताया कि आत्मज्ञान बिना यह जीव चलता फिरता शव है। समाधि तंत्र 61 से 66 की गाथाओं को समझाने के लिए भावपाहुड की गाथा 343 का रहस्य बताया। जिस प्रकार वस्त्र नया पुराना पहनने से तुम नए पुराने नहीं बन जाते। जिस प्रकार हम गाड़ी में बैठते हैं, हम गाड़ी नहीं है वैसे ही आत्मा शरीर रूपी गाड़ी में बैठा है। तुम शुद्ध बुद्ध आनंद हो, यह आत्मा शिव है तथा तुम्हारा शरीर शव है। जीव रहित शरीर शव होता है वैसे ही सम्यक दर्शन रहित जीव शव है। इस लोक में शव अपूज्य है वैसे ही तुम्हारा शरीर आत्मज्ञान के बिना चलता फिरता शव है। परम आत्म ज्ञान बिना जीव राजा महाराजा देव भोग भूमि आदि में जन्म ले लिया परंतु शव के समान है। मनुष्य जन्म में ही आत्मा का श्रद्धान ज्ञान आचरण जीव कर सकता है, अन्य जन्म में नहीं। गुरुदेव के पास पढ़ने वाले सभी शिष्यों ने स्वीकार किया कि आचार्य श्री के पास पढ़ने से पहले हम सभी शव थे क्योंकि आत्मा को नहीं जानते थे।</p>
<p><strong>आत्मा कर्म से विमुक्त होने पर परमात्मा बन जाता है</strong></p>
<p>आचार्य श्री कहते हैं गुण दोषो को जानकार सम्यक दर्शन को धारण करो। यह आत्मा कर्ता भोक्ता है। आत्मा कर्म से विमुक्त होने पर परमात्मा बन जाता है जिससे ज्ञानी बुद्ध चतुर्मुख सर्वज्ञ ब्रह्मा शिव बन जाता है। राजा भी युद्ध क्षेत्र में सामायिक प्रतिक्रमण करते थे उन्हें अन्य लोग उस समय कायर समझते थे। परंतु जब युद्ध करते थे तो शत्रु को परास्त कर देते थे। जब व्यक्ति आनंद से मूर्छित हो जाता है तब उसके मुख से वचन नहीं निकलता वैसे ही जब दुख से अधिक दुखी हो जाता है तो भी उसके मुख से वचन नहीं निकलता है। बाल ब्रह्मचारी जी वर्ण भैया ने आचार्य श्री की रचित कविता ‘खाना पीना सोना जागन ही जीव का काम नहीं है। राग, द्वैष, काम, मोह कोई भाव श्रेय नहीं है।’ के माध्यम से मंगलाचरण किया।</p>
<p><strong>कार्यक्रम मेें यह समाजजन उपस्थित रहे</strong></p>
<p>इस अवसर पर मुनि श्री सुविज्ञ सागर जी, अध्यात्म नंदी, सौम्यनंदी, सुवत्सलमती माताजी, भक्ति श्री माताजी, ब्रह्मचारिणी मंजू दीदी, गुणमाला देवी, मनीष भैया, खुशबू, संगीता, विदुषी, ममता, टीना, पीना, प्रतिभा, राजू देवी, श्रीपालजी, अरविंद, धनपालज, कमलेश, ओमप्रकाश, शैलेंद्र, सारिका भट्ट, रामजी भाई का परिवार भीलुड़ा, खोडन, पुनर्वास कॉलोनी आदि अनेक लोग उपस्थित थे। यह जानकारी विजयलक्ष्मी गोदावत सागवाड़ा ने दी।</p>
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		<title>धर्माचार्य कनक नंदीजी की अंतरराष्ट्रीय वेबिनार का मिल रहा है धर्मलाभ : समाधि तंत्र ग्रंथ के रहस्य से कराया परिचय  </title>
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		<pubDate>Tue, 07 Apr 2026 12:33:12 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[विश्व धर्म प्रभाकर वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नदी गुरुदेव ने भिलुडा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में समाधि तंत्र ग्रंथ की 61 से लगाकर 67 तक गाथाओं का रहस्य बताते हुए कहा कि जब तक तन मन इंद्रियों को जीव मै मानता है तब तक संसार में दु:ख मिलता रहता है।डडूका से अजीत कुमार [&#8230;]]]></description>
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<p>विश्व धर्म प्रभाकर वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नदी गुरुदेव ने भिलुडा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में समाधि तंत्र ग्रंथ की 61 से लगाकर 67 तक गाथाओं का रहस्य बताते हुए कहा कि जब तक तन मन इंद्रियों को जीव मै मानता है तब तक संसार में दु:ख मिलता रहता है।<span style="color: #ff0000">डडूका से अजीत कुमार कोठिया की रिपोर्ट &#8230;</span></p>
<hr />
<p>डडूका। विश्व धर्म प्रभाकर वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नदी गुरुदेव ने भिलुडा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में समाधि तंत्र ग्रंथ की 61 से लगाकर 67 तक गाथाओं का रहस्य बताते हुए कहा कि जब तक तन मन इंद्रियों को जीव मै मानता है तब तक संसार में दु:ख मिलता रहता है। जब यह ज्ञान होगा कि मैं शरीर नहीं इंद्रियां नहीं सत्ता संपत्ति परिवार आदि नहीं तब मोक्ष होगा। नए कपड़ों से जीव नया नहीं बन जाता फटे कपड़ों से फटा नहीं बन जाता लाल कपड़ों से लाल नहीं बन जाता गंदे कपड़ों से वह गंदा नहीं हो जाता। संपत्ति नष्ट होने से तुम नष्ट नहीं होते। शरीर को हष्टपुष्ट करने से आत्मा हष्टपुष्ट नहीं होता।</p>
<p><strong>दिखावे ढोंग से धर्म होता है, ऐसा मानना भी मूढ़ता</strong></p>
<p>चोला कैसा भी पहनो इसका कोई महत्व नहीं है।हमारा धर्म आध्यात्मिक है परंतु किसी भी पथ मत वाले इसकी आध्यात्मिकता को नहीं जानते। जीव अनादि काल से क्रोध मान, माया लोभ से विवश होकर धर्म राजनीति व्यापार सब करता है। गर्म पानी में दाल या चावल डालने पर ऊपर नीचे ऊपर नीचे होते हैं उसी प्रकार राग द्वेष ईर्षा आदि से जीव ऊपर नीचे ऊपर नीचे अनेक गतियां में भ्रमण करता है। दिखावे ढोंग से धर्म होता है, ऐसा मानना भी मूढ़ता है। शरीर से ही धर्म होता है ऐसा मानना भी मुढता है। शरीर को कष्ट देने से मोक्ष मिलता तो नारकी पहले मोक्ष चले जाते। आहार, भय, मैथुन, परिग्रह चारों संज्ञाओ से मोहित होकर जीव चारों गतियों में दु:ख सह रहा है।</p>
<p>आचार्य श्री यहां पर कहते हैं हे मुनिराज तू भाव से विशुद्ध होकर सभी प्रकार के तप कर। ख्याति पूजा लाभ प्रसिद्ध त्याग करके तप करो। संसार में भ्रमण हो या मोक्ष हो सबका केंद्र बिंदु केवल आत्मा है।</p>
<p>धर्म विचार पूर्वक होता है। भाव प्रथम तत्व है। भावपूर्वक ही आत्मा है। भाव का अभाव होगा नहीं। भाव यदि शुभ नहीं कर रहे तो अशुभ होंगे। चोर डाकू पशु पक्षी आदि मिथ्या दृष्टि अवस्था में अशुभ भाव तथा सम्यक दृष्टि अवस्था में शुभ भाव करते हैं। छह द्रव्यों में केवल पुद्गल द्रव्य को ही विज्ञान आशिक जानता है।</p>
<p>जब तक जीव तत्व की भावना नहीं करता है तब तक रॉबर्ट मशीन की तरह है। भावना ही अमृत है। आत्म स्वरूप है। सुभाव ही मोक्ष, कुभाव ही पतन का कारण है। अनुप्रेक्षा तीर्थ यात्रा पूजा मूर्ति निर्माण मंदिर निर्माण कुछ भी करो परंतु भाव को शुभ रखो। भाव ही परम तत्व है। संपूर्ण पाप अशुभ भाव से, संपूर्ण पुण्य शुभ भाव से होता है इसके लिए ही धर्म है।</p>
<p><strong>शुभ भाव क्यों नहीं करते</strong></p>
<p>शुद्ध भाव पंचम काल में नहीं होते तो भी शुद्ध भाव की भावना भानी चाहिए। शुभभावना करने के लिए धन संपत्ति की कोई आवश्यकता नहीं तो भी शुभ भाव क्यों नहीं करते आचार्य श्री ऐसा कहते हैं। पंचम काल में उत्तम संवहनन नहीं, उत्तम क्षेत्र नहीं श्रेणी आरोहण नहीं हो सकता अतः शुद्ध भाव नहीं हो सकते परंतु शुभभाव ही करने चाहिए। शुभ नहीं करने पर अशुभ भाव आएंगे। भाव को कोई बंदी नहीं बन सकता। भाव की शक्ति से नरक में स्थित श्रेणीक का जीव समता भाव से कष्ट सहन कर रहा है। परिणाम से ही बंध व मोक्ष होता है। पाप करने के कारण रावण कंस आदि भोजन करते समय भी भयभीत रहते थे उन्हें राम,कृष्ण दिखाई देते थे।</p>
<p><strong>अशुभ छोड़ेगा तो शुभ भाव करेगा</strong></p>
<p>मोह से बंधे जीव को साधु भी दुखी दिखाई देते हैं।</p>
<p>पावं हवई अशेषं, पुण्य अशेष हवई परीणाम।</p>
<p>परिणामादो बंध मोक्ख, जिनशासन दिण्ठ।</p>
<p>जिन वचन से विमुख रहने वाला जीव राग द्वैष, कषाओ से पाप ही बांधता है। असंयमी अशुभ लेश्याओं से युक्त होने वाले अशुभ भाव पाप ही करते हैं। शुभ भाव से भी दो प्रकार के कर्म बांधता है। अशुभ छोड़ेगा तो शुभ भाव करेगा। भाव शुद्धि के लिए बाह् निमित्त द्रव्य शुद्धि भी आवश्यक है।</p>
<p><strong>शुभ कर्म भी नष्ट हो जाते हैं जिससे अरिहंत बनते हैं</strong></p>
<p>पशु पक्षी भी अपने शरीर को घोसले को साफ रखते हैं। महलवासी ही नरकवासी है सफाई के लिए अनेक कर्मचारी रखने पड़ते हैं। सुंदर लड़कियां अधिक सुंदर बनने के लिए सुंदर लड़कियों के खून से तथा शराब से स्नान करती थी ऐसी सुंदर विदेशी रानियां अनेक राजाओं को अपना दास बनाती थी। स्व अशुभ भाव राग द्वैष मोह, कषाए आदि अशुभ कर्म को मारने से शुभ कर्म भी नष्ट हो जाते हैं जिससे अरिहंत बनते हैं। अरि अर्थात शत्रु हंत का अर्थ हनन करना कर्म शत्रु को नष्ट करने वाले अरिहंत होते हैं।</p>
<p><strong>सूक्ष्म आध्यात्मिक चिंतन नहीं करते</strong></p>
<p>यहां पर आचार्य श्री कहते हैं हे मुनिराज 18 000 शील के दोषो व 84 लाख उत्तर गुणो का चिंतन करो। साधु जो उत्कृष्ट विचार चिंतन करते हैं वह राजा चक्रवर्ती भी नहीं कर सकते हैं। मरना स्वीकार करते हैं परंतु सूक्ष्म आध्यात्मिक चिंतन नहीं करते हैं। जैन धर्म की हर क्रिया में भाव का महत्व है। मुनि श्री सुविज्ञ सागर जी ने आचार्य श्री द्वारा रचित व्यंगात्मक कविता प्रस्तुत की।</p>
<p>होते महावीर यदि भारत में अनेक समस्याएं उत्पन्न होती। वर्धमान यदि वर्तमान में होते उन्हें पिछड़ा माना जाता। यह जानकारी सागवाड़ा निवासी विजयलक्ष्मी गोदावत ने दी।</p>
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