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	<title>धर्मप्रभावना &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>आचार्यश्री विनिश्चय सागरजी महाराज त्याग, तपस्या और आध्यात्मिक चेतना के प्रतीक : गुरु विनिश्चयसागर अवतरण दिवस पर विशेष आलेख </title>
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		<pubDate>Thu, 25 Jun 2026 16:51:21 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जैन संत सान्निध्य, जैन संत समागम, जैन संत वाणी का श्रवण विरले ही व्यक्तियों को मिलता है । यूं तो संसार में हजारों हजारों की संख्या में संत देखे जा सकते हैं लेकिन, संत समाज में भी दिगम्बर जैन संतों की क्रियाएं, चर्या, तपस्या, त्याग, संयम। साधना देखते ही बनती है। आचार्य श्री विनिश्चय सागर [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>जैन संत सान्निध्य, जैन संत समागम, जैन संत वाणी का श्रवण विरले ही व्यक्तियों को मिलता है । यूं तो संसार में हजारों हजारों की संख्या में संत देखे जा सकते हैं लेकिन, संत समाज में भी दिगम्बर जैन संतों की क्रियाएं, चर्या, तपस्या, त्याग, संयम। साधना देखते ही बनती है। <span style="color: #ff0000">आचार्य श्री विनिश्चय सागर जी के अवतरण दिवस पर यह आलेख मनोज जैन नायक ने राजकुमार जैन अजमेरा के आधार पर तैयार किया, पढ़िए&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>मुरैना /कोडरमा।</strong> जैन संत सान्निध्य, जैन संत समागम, जैन संत वाणी का श्रवण विरले ही व्यक्तियों को मिलता है । यूं तो संसार में हजारों हजारों की संख्या में संत देखे जा सकते हैं लेकिन, संत समाज में भी दिगम्बर जैन संतों की क्रियाएं, चर्या, तपस्या, त्याग, संयम। साधना देखते ही बनती है । मम गुरु बाक्केशरी आचार्यश्री विनिश्चय सागरजी महाराज ज्ञान, तप और वैराग्य की साकार प्रतिमूर्ति हैं। पूज्य गुरुदेव के चेहरे का तेज, वात्सल्य, मुख के उच्चारित मंगल वाणी सभी भक्तों का मन मोह लेती है। भारतीय संत परम्परा में अनेक ऐसे महापुरुष हुए हैं, जिन्होंने अपने त्याग, तपस्या और आध्यात्मिक साधना से समाज को नई दिशा प्रदान की। उन्हीं महान विभूतियों में गणाचार्यश्री विराग सागरजी महाराज के परम प्रभावक शिष्य आचार्यश्री विनिश्चय सागरजी महाराज का नाम अत्यंत श्रद्धा और सम्मान के साथ लिया जाता है। उनका संपूर्ण जीवन आत्मकल्याण, धर्मप्रभावना, ज्ञानार्जन और जनजागरण के लिए समर्पित रहा है।</p>
<p><strong>पथरिया गांव में हुआ अवतरण</strong></p>
<p>आचार्यश्री विनिश्चय सागर का पूर्वाश्रम नाम अरुण कुमार जैन था। आपका जन्म 26 जून 1973 को मध्यप्रदेश के दमोह जिले के पथरिया गांव में एक धार्मिक एवं संस्कारवान दिगम्बर जैन परिवार में हुआ। आपकी माताजी का नाम कुसुमदेवी जैन तथा पिताजी का नाम रमेशचंद्र जैन है। बाल्यकाल से ही आपके भीतर धर्म, अध्ययन और वैराग्य के संस्कार विद्यमान थे। आपने अपनी प्रारम्भिक शिक्षा पूर्ण करने के पश्चात आध्यात्मिक जीवन की ओर अग्रसर होने का निश्चय किया।</p>
<p><strong>संयम पथ पर चलने का दृढ़ संकल्प</strong></p>
<p>धर्म के प्रति गहन अनुराग और आत्मकल्याण की तीव्र भावना ने आपको सांसारिक जीवन से विरक्त कर दिया। 29 जनवरी 1995 को अल्प आयु में ही आपने गृह त्याग कर संयम पथिक बनने की ओर कदम बढ़ाया। 26 फरवरी 1995 को अतिशय क्षेत्र आहारजी में आपने ब्रह्मचर्य व्रत धारण कर आध्यात्मिक साधना का शुभारम्भ करते हुए संयम पथ पर चलने का दृढ़ संकल्प लिया। इसके पश्चात 23 फरवरी 1996 को देवेंद्र नगर में ऐलक दीक्षा प्राप्त कर संयम मार्ग को और दृढ़ता से अपनाया।</p>
<p><strong>आध्यात्मिक साधना के माध्यम से व्यक्तित्व निखारा</strong></p>
<p>आत्मोन्नति की इस साधना यात्रा का अगला महत्वपूर्ण चरण 14 दिसंबर 1998 को आया, जब मध्यप्रदेश के बरासो क्षेत्र में आपने गुरुदेव विरागसागरजी महाराज से मुनि दीक्षा ग्रहण की। आपने गुरुदेव के पावन सान्निध्य में आपने कठोर तप, गहन अध्ययन और आध्यात्मिक साधना के माध्यम से अपने व्यक्तित्व को निखारा।</p>
<p><strong>कुंथलगिरि में आचार्य पद से विभूषित</strong></p>
<p>आपकी असाधारण साधना, अनुशासन, विद्वत्ता और संघ संचालन की क्षमता को देखते हुए वर्ष 2005 में महाराष्ट्र के कुंथलगिरि में आपको जैन परम्परा के सर्वोच्च पदों में से एक आचार्य पद से विभूषित घोषित किया गया एवं अतिशय क्षेत्र करगुवांजी झांसी में गुरुदेव विरागसागरजी द्वारा 24 मई 2017 को आचार्य पद के संस्कार किए गए । वर्तमान में आपका नाम दिगम्बर संतों की श्रृंखला में सम्पूर्ण जैन समाज में श्रद्धा और प्रेरणा का केन्द्र है।</p>
<p><strong>महत्वपूर्ण ग्रंथों का गहन अध्ययन मनन किया</strong></p>
<p>आचार्य श्री केवल तपस्वी संत ही नहीं, बल्कि एक उत्कृष्ट विद्वान और गंभीर चिंतक भी हैं। आपने जैन आगम एवं दार्शनिक ग्रंथों का व्यापक अध्ययन किया है। श्रावकाचार, द्रव्यसंग्रह, कातन्त्र-रूपमाला, मोक्षशास्त्र, पुरुषार्थसिद्ध्युपाय, इष्टोपदेश, समयसार, परीक्षामुख, न्यायदीपिका, मूलाचार, गोम्मटसार जीवकाण्ड, सर्वार्थसिद्धि, धवला आदि अनेक महत्वपूर्ण ग्रंथों का आपने गहन अध्ययन एवं मनन किया है।</p>
<p><strong>सच्चा सुख बाह्य भौतिक साधनों में नहीं</strong></p>
<p>आपकी विशेष रुचि अध्ययन, चिंतन, मनन, आत्मविश्लेषण और प्रभावशाली प्रवचनों के माध्यम से धर्मप्रचार में रही है। आपके प्रवचन सरल, तर्कसंगत और जीवनोपयोगी होते हैं, जो श्रोताओं के हृदय को स्पर्श कर आत्मजागरण का संदेश देते हैं। आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी महाराज का जीवन त्याग, संयम, करुणा और आत्मानुशासन का अनुपम उदाहरण है। उन्होंने अपने उपदेशों के माध्यम से असंख्य लोगों को नैतिक जीवन, अहिंसा, सदाचार और आत्मकल्याण के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी है। उनका व्यक्तित्व यह संदेश देता है कि सच्चा सुख बाह्य भौतिक साधनों में नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि और आध्यात्मिक उन्नति में निहित है।</p>
<p>गुरुदेव वाक्केशरी आचार्यश्री विनिश्चय सागरजी महाराज के अवतरण दिवस पर कोडरमा से महावीर कुसुम जैन कासलीवाल, सुरेंद्र-सरिता जैन काला, अंकित जैन, आयुष जैन, राज कुमार जैन अजमेरा की ओर पूज्यश्री के चरणों में कोटि कोटि नमन ।</p>
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		<title>साधु संतों के पदविहार में आवश्यक सावधानी श्रावकों के कर्तव्य : पद विहार होती है आत्मजागरण, धर्मप्रभावना और लोकमंगल की पवित्र यात्रा </title>
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		<pubDate>Wed, 20 May 2026 13:54:09 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[भारतीय संस्कृति की आत्मा यदि किसी में स्पंदित होती दिखाई देती है, तो वह तपस्वी संतों के चरणों में ही दिखाई देती है। त्याग, संयम, अहिंसा और आत्मशुद्धि की दिव्य परंपरा को जीवित रखने वाले दिगंबर एवं श्वेतांबर जैन साधु-संत केवल किसी समाज विशेष के आध्यात्मिक मार्गदर्शक नहीं हैं, अपितु सम्पूर्ण मानवता के लिए चलती-फिरती [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>भारतीय संस्कृति की आत्मा यदि किसी में स्पंदित होती दिखाई देती है, तो वह तपस्वी संतों के चरणों में ही दिखाई देती है। त्याग, संयम, अहिंसा और आत्मशुद्धि की दिव्य परंपरा को जीवित रखने वाले दिगंबर एवं श्वेतांबर जैन साधु-संत केवल किसी समाज विशेष के आध्यात्मिक मार्गदर्शक नहीं हैं, अपितु सम्पूर्ण मानवता के लिए चलती-फिरती तपोभूमि हैं। <span style="color: #ff0000">आज पढ़िए, सुनील सुधाकर शास्त्री का यह आलेख&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p>भारतीय संस्कृति की आत्मा यदि किसी में स्पंदित होती दिखाई देती है, तो वह तपस्वी संतों के चरणों में ही दिखाई देती है। त्याग, संयम, अहिंसा और आत्मशुद्धि की दिव्य परंपरा को जीवित रखने वाले दिगंबर एवं श्वेतांबर जैन साधु-संत केवल किसी समाज विशेष के आध्यात्मिक मार्गदर्शक नहीं हैं, अपितु सम्पूर्ण मानवता के लिए चलती-फिरती तपोभूमि हैं। उनका पदविहार केवल एक स्थान से दूसरे स्थान तक का गमन नहीं होता, बल्कि वह आत्मजागरण, धर्मप्रभावना और लोकमंगल की पवित्र यात्रा होती है। नंगे पाँव तपती धरा पर चलने वाले ये महापुरुष अपने प्रत्येक चरण से मानो मानवता को संयम और करुणा का संदेश देते हैं। किन्तु अत्यंत दुःख और चिंता का विषय है कि वर्तमान समय में इन संतों के पदविहार के दौरान अनेक प्रकार की दुर्घटनाएँ, दुर्व्यवहार और असुरक्षाएँ निरंतर बढ़ती जा रही हैं।</p>
<p>कभी तीव्र गति से दौड़ते वाहन उनके जीवन के लिए संकट बन जाते हैं, तो कभी असामाजिक एवं विधर्मी तत्व उपहास, अभद्रता अथवा हिंसक व्यवहार करने लगते हैं। कहीं संतों पर पथराव होता है, कहीं उनके साथ धक्का-मुक्की की घटनाएँ सामने आती हैं, तो कहीं माताजी संघ के प्रति अनुचित व्यवहार समाज को पीड़ित कर देता है। यह केवल किसी एक संप्रदाय की समस्या नहीं है; दिगंबर और श्वेतांबर दोनों परंपराओं के संत-संघ समान रूप से इन परिस्थितियों का सामना कर रहे हैं। यह स्थिति केवल धार्मिक असंवेदनशीलता का परिचायक नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना के क्षय का भी संकेत है।</p>
<p>वास्तव में, जैन साधु-संत अपने साथ कोई भौतिक सुरक्षा नहीं रखते। उनका एकमात्र आश्रय समाज की श्रद्धा और प्रशासन की संवेदनशीलता होती है। ऐसे में श्रावक समाज का उत्तरदायित्व अत्यंत बढ़ जाता है। संतों के पदविहार को केवल धार्मिक उत्साह का विषय मान लेना पर्याप्त नहीं है; उसे सुव्यवस्थित और सुरक्षित बनाना भी समाज का अनिवार्य दायित्व है। जब भी कोई संघ पदविहार करे, तब पर्याप्त संख्या में श्रावकों को उनके साथ चलना चाहिए। विशेष रूप से युवाओं को आगे आकर सुरक्षा और व्यवस्था की जिम्मेदारी संभालनी चाहिए। समाज का युवा वर्ग यदि धर्मरक्षा के इस कार्य में सक्रिय हो जाए, तो अनेक दुर्घटनाओं और दुर्व्यवहारों को रोका जा सकता है।</p>
<p>माताजी संघों के पदविहार में महिलाओं की पर्याप्त सहभागिता भी आवश्यक है। इससे मातृशक्ति को सुरक्षा का भाव प्राप्त होगा तथा अनुशासन और मर्यादा का वातावरण निर्मित रहेगा। पदविहार के समय मार्ग के दोनों ओर सुरक्षा-व्यवस्था के रूप में रस्सियाँ अथवा संकेतक लगाए जा सकते हैं, जिससे वाहन नियंत्रित रहें और संतों के मार्ग में अवरोध उत्पन्न न हो। जहाँ यातायात अधिक हो, वहाँ स्वयंसेवकों की टोली मार्गदर्शन और यातायात नियंत्रण का कार्य कर सकती है। अशांत एवं अत्यंत निर्जन मार्गाे पर पदविहार से यथासंभव बचना चाहिए तथा अत्यधिक व्यस्त राजमार्गों के स्थान पर सुरक्षित वैकल्पिक मार्गों का चयन किया जाना चाहिए।</p>
<p>आज आवश्यकता केवल भावनात्मक श्रद्धा की नहीं, बल्कि संगठित जागरूकता की है। समाज को ऐसे प्रशिक्षित स्वयंसेवक तैयार करने चाहिए जो पदविहार के दौरान सुरक्षा, प्राथमिक उपचार, यातायात नियंत्रण और आपातकालीन सहायता का कार्य संभाल सकें। संघ के साथ चलने वाले वाहन केवल आवश्यक सामग्री और आकस्मिक सहायता के लिए हों, न कि प्रदर्शन और भीड़ का माध्यम बनें। पदविहार के पूर्व स्थानीय प्रशासन को सूचित करना, मार्ग का निरीक्षण करना और संभावित संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान करना भी अत्यंत आवश्यक है।</p>
<p>इस विषय में शासन और प्रशासन की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। जिस प्रकार विभिन्न धार्मिक यात्राओं, कांवड़ यात्राओं अथवा पर्वों के अवसर पर प्रशासन सुरक्षा-व्यवस्था सुनिश्चित करता है, उसी प्रकार जैन साधु-संतों के पदविहार को भी आधिकारिक सुरक्षा मिलनी चाहिए। प्रशासन की ओर से पुलिस बल अथवा सुरक्षा कर्मियों की व्यवस्था हो, यातायात को नियंत्रित किया जाए, और संवेदनशील क्षेत्रों में विशेष निगरानी रखी जाएकृतो अनेक अप्रिय घटनाओं को रोका जा सकता है। यह केवल धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा नहीं होगी, बल्कि भारतीय संविधान की उस भावना का सम्मान भी होगा जो प्रत्येक नागरिक को सुरक्षित धार्मिक आचरण का अधिकार प्रदान करती है।</p>
<p>दीर्घकालीन दृष्टि से सरकार को “पदविहार पथ” अथवा “धार्मिक पदयात्रा मार्ग” जैसी योजनाओं पर भी विचार करना चाहिए। जैसे साइकिल ट्रैक अथवा पैदल पथ निर्मित होते हैं, उसी प्रकार प्रमुख धार्मिक मार्गों पर सुरक्षित पदयात्रा पथ बनाए जा सकते हैं। इन मार्गों का उपयोग केवल जैन संत ही नहीं, बल्कि अन्य धार्मिक यात्राएँ और कांवड़ यात्राएँ भी कर सकेंगी। इससे दुर्घटनाओं में उल्लेखनीय कमी आएगी और धार्मिक यात्राओं की गरिमा भी सुरक्षित रहेगी। यह व्यवस्था भारत की आध्यात्मिक परंपराओं के संरक्षण की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम सिद्ध हो सकती है।</p>
<p>संत केवल किसी समाज की धरोहर नहीं होते; वे राष्ट्र की नैतिक चेतना होते हैं। जब तपस्वियों का अपमान होता है, तब वास्तव में समाज की आत्मा आहत होती है। जिन चरणों ने हिंसा के मार्ग को त्यागकर अहिंसा का प्रकाश फैलाया, जिन वचनों ने मनुष्य को आत्मोन्नति का पथ दिखाया, उन चरणों की सुरक्षा करना प्रत्येक संवेदनशील नागरिक का नैतिक दायित्व है। यदि समाज अपने संतों की रक्षा नहीं कर पाएगा, तो आने वाली पीढ़ियाँ केवल ग्रंथों में तप और त्याग की कथाएँ पढ़ेंगी, प्रत्यक्ष जीवन में उनका दर्शन दुर्लभ हो जाएगा।</p>
<p>आज आवश्यकता है कि जैन समाज सम्प्रदायगत सीमाओं से ऊपर उठकर साधु-संतों की सुरक्षा के प्रश्न पर एकजुट हो। दिगंबर हो या श्वेतांबर, तप और संयम की साधना समान रूप से वंदनीय है। समाज को यह समझना होगा कि संतों की सुरक्षा केवल कुछ व्यक्तियों का कार्य नहीं, बल्कि सामूहिक धर्म है। जब श्रावक जागरूक होंगे, युवा संगठित होंगे, महिलाएँ सहभागी बनेंगी और प्रशासन संवेदनशील होगाकृतभी पदविहार वास्तव में निर्भय, अनुशासित और मंगलमय बन सकेगा।</p>
<p>जिनमार्ग की यह तपःपरंपरा केवल इतिहास की स्मृति न बन जाए, इसके लिए आज ही सजग होना होगा। संतों के चरणों की रक्षा करना वास्तव में संस्कृति, संयम और सभ्यता की रक्षा करना है।</p>
<p>संतों पर उपसर्ग अगर हो, धन वैभव का सार नहीं।</p>
<p>संत सड़क पर हम ए.सी.में, समझो धर्म से प्यार नहीं।।</p>
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		<title>खुद हम सुधर जाएंगे तो सब सुधरे ही दिखेंगे: मुनिश्री जयंत सागर जी ने नांद्रे में दी स्वयं में बदलाव की सीख  </title>
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		<pubDate>Tue, 19 Aug 2025 15:17:46 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[नगर में मुनिराजों के चातुर्मास के दौरान धर्मप्रभावना खूब बह रही है। नित पूजन, अभिषेक, शांतिधारा, आराधना सहित प्रवचन आदि हो रहे हैं। मंगलवार को मुनिश्री जयंतसागर जी महाराज के प्रवचन हुए। इस अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु और गुरु भक्त मौजूद रहे। नांद्रे से पढ़िए, यह खबर.. नांद्रे। नगर में मुनिराजों के चातुर्मास [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>नगर में मुनिराजों के चातुर्मास के दौरान धर्मप्रभावना खूब बह रही है। नित पूजन, अभिषेक, शांतिधारा, आराधना सहित प्रवचन आदि हो रहे हैं। मंगलवार को मुनिश्री जयंतसागर जी महाराज के प्रवचन हुए। इस अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु और गुरु भक्त मौजूद रहे। <span style="color: #ff0000">नांद्रे से पढ़िए, यह खबर..</span></strong></p>
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<p><strong>नांद्रे।</strong> नगर में मुनिराजों के चातुर्मास के दौरान धर्मप्रभावना खूब बह रही है। नित पूजन, अभिषेक, शांतिधारा, आराधना सहित प्रवचन आदि हो रहे हैं। मंगलवार को मुनिश्री जयंतसागर जी महाराज के प्रवचन हुए। इस अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु और गुरु भक्त मौजूद रहे। अखिल भारतवर्षीय दिगंबर जैन युवा परिषद कोल्हापुर के कार्याध्यक्ष अभिषेक अशोक पाटील ने कहा कि आचार्य श्री विशुद्धसागरजी महाराज के शिष्य मुनि श्री सारस्वत सागर जी महाराज, मुनि श्री जयंत सागर जी महाराज, मुनि श्री सिद्धसागर जी महाराज और क्षुल्लक श्री श्रुतसागर महाराज भगवान महावीर दिगंबर जैन मंदिर में वर्षायोग वास कर रहे हैं। मुनि श्री जयंत सागरजी महाराज ने प्रवचन में कहा कि जीवन में कभी भी किसी को सुधारने का प्रयास मत करो क्योंकि, आप सुधरने को कहोगे सामने वाले ने आपकी बात नहीं मानी तो विकल्प होगा। परिणाम संक्लेशित होंगे और क्रोध भी आ सकता है। भाव भी खराब होंगे।</p>
<p>इसलिए कभी किसी के आप मत बनिए क्योंकि कोई किसी को नहीं सुधार सकता। बडे़ से बडे़ महापुरुष हुए हैं।महान साधु हुए कोई किसी को नहीं सुधार पाया, अधूरा ही छोड़कर जाना पड़ा। अगर परिणाम सही रखना है तो मात्र उपदेश करो, बोल दो सामने वाला माने या न माने वह उसकी मर्जी।</p>
<p>उसकी वजह से अपना जीवन और समय मत खराब करो क्योंकि, समय बहुत कीमती है। सुधारने का नहीं सुधरने का प्रयास करो खुद हम सुधर जाएंगे तो सब सुधरे ही दिखेंगे। आचार्य भगवन विशुद्ध सागर जी ने सूत्र दिया है कि ‘देखो, जानो, जाने दो’जो जैसा कह रहा है, उसको देख लो समझा दो अगर समझे तो ठीक, नहीं तो जाने दो आप मस्त और स्वस्थ्य रहो। जो है सौ है।</p>
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		<title>मुनिश्री विलोक सागर ने किए केशलोच सिर, दाढ़ी मूंछों के बाल हाथों से उखाड़े : केशलोच के समय भक्तों ने महामंत्र नमोकार का जाप श्री जिनेंद्र प्रभु की स्तुति की  </title>
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		<pubDate>Fri, 01 Aug 2025 10:25:08 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जैन संतों साध्वियों की चर्या बहुत ही कठिन और कष्ट साध्य है। यहां तक कि वे अपने सिर, दाढ़ी, मूंछों के वालों को भी हाथ से उखाड़कर फैंकते हैं। नगर में चातुर्मासरत मुनिश्री विलोकसागरजी एवं मुनिश्री विबोधसागरजी महाराज प्रतिदिन बड़े जैन मंदिर में धर्मसभा के दौरान प्रवचनों और कक्षाओं के माध्यम से धर्मप्रभावना कर रहे [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>जैन संतों साध्वियों की चर्या बहुत ही कठिन और कष्ट साध्य है। यहां तक कि वे अपने सिर, दाढ़ी, मूंछों के वालों को भी हाथ से उखाड़कर फैंकते हैं। नगर में चातुर्मासरत मुनिश्री विलोकसागरजी एवं मुनिश्री विबोधसागरजी महाराज प्रतिदिन बड़े जैन मंदिर में धर्मसभा के दौरान प्रवचनों और कक्षाओं के माध्यम से धर्मप्रभावना कर रहे हैं। शुक्रवार को प्रातःकालीन वेला में मुनिश्री विलोकसागरजी महाराज ने केशलोच किए। <span style="color: #ff0000">मुरैना से पढ़िए, मनोज जैन नायक की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong>मुरैना।</strong> जैन संतों साध्वियों की चर्या बहुत ही कठिन और कष्ट साध्य है। यहां तक कि वे अपने सिर, दाढ़ी, मूंछों के वालों को भी हाथ से उखाड़कर फैंकते हैं। नगर में चातुर्मासरत मुनिश्री विलोकसागरजी एवं मुनिश्री विबोधसागरजी महाराज प्रतिदिन बड़े जैन मंदिर में धर्मसभा के दौरान प्रवचनों और कक्षाओं के माध्यम से धर्मप्रभावना कर रहे हैं। शुक्रवार को प्रातःकालीन वेला में मुनिश्री विलोकसागरजी महाराज ने केशलोच किए। केशलोच जैन संतों के चर्या का एक हिस्सा है। वे अपने सिर, दाढ़ी, मूंछ के बाल निकालने के लिए किसी भी प्रकार के उपकरण कैंची, उस्तरा या ब्लैड आदि का उपयोग नहीं करते हैं, बल्कि वे उन वालों को प्रत्येक 45 दिनों अथवा दो माह के अंतराल में अपने हाथों से उखाड़कर साफ करते हैं। बालों को हाथों से उखाड़कर फैंकने की क्रिया को ही केशलोच कहा जाता है। यह उनके तपोबल का ही परिणाम है कि वे इस कठिन कार्य को करने पर भी तनिक विचलित नहीं होते। केशलोच की क्रिया जैन साधु की सबसे कठिन क्रियाओं में मानी जाती है। कभी-कभी केशलोच करते समय बालों के उंगलियों से फिसलने एवं खून के रिसने की भी आशंका रहती है, इसके लिए साधुगण शुद्ध राख का उपयोग करते हैं।</p>
<p><strong>जैन मुनि समस्त परिग्रह से रहित होते हैं       </strong></p>
<p>इस अवसर पर मुनिश्री विबोधसागर महाराज ने बताया कि जैन मुनि समस्त परिग्रह से रहित होते हैं तथा अपने पास केवल एक मयूर पंख से बनी पीछी रखते है। अतः बालों को हटाने के लिए वे उस्तरा, कैंची आदि अपने पास नहीं रख सकते और ना ही इनका प्रयोग कर सकते। जैन मुनि स्वावलंबी होते है और उनकी चर्या सिंह के समान होती है। इस लिए बाल हटाने के लिए किसी का सहारा भी नही लेते। इस लिए वे अपने हाथों से बालों को नोंच कर उखाड़ते हैं। इस क्रिया को केश लोंच कहते हैं। वैसे केशलोच परिषह सहन करने के लिए भी जरूरी होता है। दिगंबर मुनि महाव्रती होते हैं और 22 परिषह को सहज ही सहन करते हैं तथा 28 मूल गुणों का पालन करते हैं जिसमे हाथों से केशलोच करना एक आवश्यक क्रिया है और चूंकि केशलोच करने से भी अनेक परजीवी छोटे जीवों की विराधना होती है, जिसके प्राश्चियत स्वरूप मुनि उस दिन निराहार रह कर उपवास भी रखते हैं। अतः दिगंबर मुनि अहिंसा की जीवंत छवि होते हं,ै जिनसे किसी भी जीव को किसी तरह का कोई भय नही रहता है। मुनि स्वयं भी अभय होते हैं और दूसरों को भी अभय ही प्रदान करते हैं। जिस समय मुनिश्री विलोक सागर महाराज शांत मुद्रा में मधुर मुस्कान के साथ केशलोच कर रहे थे उस समय प्रकाशचंद साहुला, अनूप भंडारी, मनोज जैन नायक, बृजेश जैन दादा, सुनील जैन, दीपक जैन एवं अन्य साधर्मी बंधु मुनिश्री के समक्ष महामंत्र नमोकार का जाप एवं श्री जिनेंद्र प्रभु की स्तुति कर रहे थे।</p>
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