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	<title>धरोहर &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>तेलंगाना में पहाड़ों पर बिखरी है जिन प्रतिमाएं :  धरोहर को सहेजना पूरे समाज की हो जिम्मेदारी </title>
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		<pubDate>Thu, 18 Jan 2024 14:27:56 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[तेलंगाना में जैन मन्दिर बहुत ही भव्य हैं। पहाड़ों पर मंदिर के साथ सन्त वृन्दों के ठहरने के लिए गुफाएं बनी हुई हैं। बहुत से मन्दिरों के इर्द-गिर्द एवं पहाड़ी जगह पर जिन प्रतिमायें इधर-उधर बिखरी पड़ी हैं, जिनकी संभाल जरूरी है। पढ़िए एन. सुगालचंद जैन, चेन्नई का विशेष आलेख, प्रस्तुति राजेश जैन दद्दू&#8230;. तेलंगाना। [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>तेलंगाना में जैन मन्दिर बहुत ही भव्य हैं। पहाड़ों पर मंदिर के साथ सन्त वृन्दों के ठहरने के लिए गुफाएं बनी हुई हैं। बहुत से मन्दिरों के इर्द-गिर्द एवं पहाड़ी जगह पर जिन प्रतिमायें इधर-उधर बिखरी पड़ी हैं, जिनकी संभाल जरूरी है। <span style="color: #ff0000">पढ़िए एन. सुगालचंद जैन, चेन्नई का विशेष आलेख, प्रस्तुति राजेश जैन दद्दू&#8230;.</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>तेलंगाना। </strong>प्रदेश के लगभग सभी जिलों में पहली शताब्दी के जैन मन्दिर, जैन गुफाएं एवं जैनों की बड़ी उपस्थिति के प्रमाण मिलते हैं। विजय कुमार जैन ने अपनी ई- पुस्तक Ancient art &amp; antiquities of Karnataka,Telangana, Andhra,&amp; kerala में लगभग तीस से ज्यादा पुरातन मन्दिरों का विवरण दिया है। तेलंगाना में कुछ पुरातन जैन मंदिरों में वैदिक रीति से सेवा-पूजा होती है। एक या दो मन्दिरों का 14वीं &#8211; 15वीं शताब्दी से मस्जिद के रूप में उपयोग हो रहा हैं। बहुत ही कम मन्दिरों में जैन पद्धति से पूजा एवं अर्चना हो रही है। एक दो गांवों को एवं बड़े शहर जैसे हैदराबाद आदि में मन्दिरों का रख रखाव सुनियोजित तरीके से हो रहा है। तेलंगाना में मन्दिर बहुत ही भव्य हैं। पहाड़ों पर मंदिर के साथ सन्त वृन्दों के ठहरने के लिए गुफाएं बनी हुई हैं। मंदिर शिक्षा के केंद्र भी थे।</p>
<p>जिनमें आयुर्वेद चिकित्सा के साथ शल्य चिकित्सा की भी शिक्षा दी जाती थी। बहुत से मन्दिरों के इर्द-गिर्द एवं पहाड़ी जगह पर जिन प्रतिमायें इधर-उधर बिखरी पड़ी हैं। तेलंगाना में नदियों के पास, पहाडी इलाकों में, गांवों में जहां भी खुदाई होती है, वहां जिन प्रतिमाएं एवं जिन मन्दिर के भग्नावशेष प्राप्त होते हैं। हमें हमारी धरोहर का संज्ञान लेना चाहिए। बिखरी पड़ी प्रतिमा एवं खण्डहर बने मन्दिरों का रखरखाव करने के लिए आगे आना चाहिए। वर्तमान में तेलंगाना में जैनों की संख्या लगभग 50,000 हैं, जिसमें 90 प्रतिशत से ज्यादा प्रवासी जैन हैं जो राजस्थान- गुजरात -मध्यप्रदेश से जा कर बसे हुए हैं।</p>
<p>स्थानीय जैन 5000 से भी कम होंगे। लेकिन तेलुगू साहित्य जैन विद्वानों के योगदान से भरा पड़ा है। साहित्य से हमें बहुत कुछ इतिहास के बारे में जानकारी मिल सकती है। तेलंगाना में मन्दिरों एवं अन्य स्थानों में मिले शिलालेखों से जैन दर्शन कि भव्यता एवं शासन द्वारा दिया गया मान सम्मान का पता लगता है। बहुत से मन्दिरों को उनकी देखभाल एवं रख-रखाव के लिए तत्कालीन शासन ने जमीन एवं बहुत सारी राशि दी थी। मन्दिरों की भव्यता खुदाई आदि उस समय की विकसित वास्तुकला का वर्णन करती है। दक्षिण भारत में स्थित तेलंगाना के मन्दिर में 30 फीट ऊंची 1000 साल पुरानी प्रतिमा है जो दक्षिण भारत की दूसरी सबसे बड़ी प्रतिमा है। धातु की कुछ प्रतिमायें हैदराबाद के म्युजियम में सुरक्षित हैं।</p>
<p>2000 वर्ष पुराने जैन मन्दिर में दुष्यन्त- शकुन्तला पुत्र भरत की प्रतिमा है। कुलपाकजी में हरे पत्थर की प्रतिमा है, जो पन्ना की प्रतिमा हो सकती है। जैन गुफाओं में ध्यान कक्ष बने हुए हैं। वर्तमान में उन तक पहुंचना मुश्किल है। बहुत सी जगह प्रतिमायें खुले में पड़ी हैं। न जैन समाज न पुरात्तव विभाग न वर्तमान शासन संज्ञान ले रहा है। कृपया चिंतन-मनन करें, धरोहर की रक्षा करें।</p>
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		<title>विश्व विरासत दिवस विशेष : शांतिनाथ अतिशय क्षेत्र सिहोनिया को संरक्षण की जरूरत  </title>
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		<pubDate>Tue, 18 Apr 2023 17:28:39 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आज भी बहुत से ऐसे क्षेत्र हैं जहां बहुत सी ऐतिहासिक धरोहर और विरासत मौजूद हैं। जहां सरकार बिल्कुल ध्यान नहीं दे पा रही है। मुरैना जिले के अंबाह तहसील के अंतर्गत सिहोनिया गांव में 11वीं शताब्दी की बनी भगवान शांतिनाथजी (16 फीट), भगवान अरहनाथ जी (10 फीट), भगवान कुंथुनाथजी (10 फीट) की खड्गासन पत्थर [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>आज भी बहुत से ऐसे क्षेत्र हैं जहां बहुत सी ऐतिहासिक धरोहर और विरासत मौजूद हैं। जहां सरकार बिल्कुल ध्यान नहीं दे पा रही है। मुरैना जिले के अंबाह तहसील के अंतर्गत सिहोनिया गांव में 11वीं शताब्दी की बनी भगवान शांतिनाथजी (16 फीट), भगवान अरहनाथ जी (10 फीट), भगवान कुंथुनाथजी (10 फीट) की खड्गासन पत्थर की मूर्तियां यहां स्थापित हैं। इनके भी संरक्षण की आवश्यकता है। <span style="color: #ff0000;">पढ़िए मनोज नायक की यह विशेष रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>अम्बाह।</strong> आज भी बहुत से ऐसे क्षेत्र हैं जहां बहुत से ऐतिहासिक धरोहर और विरासत मौजूद हैं। जहां सरकार बिल्कुल ध्यान नहीं दे पा रही है। जिस पर सरकार को ध्यान देने की जरूरत है। सौरभ जैन वरेह वाले अंबाह वाले के मुताबिक मुरैना जिले के अंबाह तहसील के अंतर्गत सिहोनिया गांव में 11वीं शताब्दी की बनी भगवान शांतिनाथजी (16 फीट), भगवान अरहनाथ जी (10 फीट), भगवान कुंथुनाथजी (10 फीट) की खड्गासन पत्थर की मूर्तियां यहां स्थापित हैं। ये मूर्तियां ब्रह्मचारी गुमानी लाल के स्वप्न में आती थीं। तब उन्होंने यहां खुदाई कराई और अतिशय कारी प्रतिमा प्राप्त हुई। आज वर्तमान में भी गांवों में खुदाई के दौरान मूर्तियां प्राप्त होती रहती हैं। मंदिर में ऐसी मूर्तियों के लिए विशेष संग्रहालय है। हाल ही में पता चला कि चतुर्थ काल में 14 मंदिर थे। इसके अलावा खजुराहो पैटर्न पर बने शिव हनुमान दुर्गा के ककनमठ मंदिर भी हैं। 9 जुलाई 2006 को खुदाई के दौरान शिव मंदिर में जैन मूर्ति मिली थी। वार्षिक मेला क्वार वादी दोज और जेठ वादी 14 निर्वाण दिवस पर लगता है। समवशरण और चौबीसी का भव्य मंदिर है। जबकि मानस्तंभ का निर्माण कार्य प्रगति पर है। नया कमल के आकार का मंदिर बन के तैयार हो चुका है, जो जल्द ही पंचकल्याणक प्रतिष्ठा होने के बाद दर्शन के लिए खोल दिया जाएगा। मंदिरों की संख्या: 05 है। बड़ी धर्मशाला, भोजनशाला है। जहां पर पूजा विधान करने और रुकने की उचित व्यवस्था है।</p>
<p><strong>इसलिए मनाया जाता है विश्व विरासत दिवस</strong></p>
<p>विश्व विरासत दिवस को मनाने का उद्देश्य ग्रह पर सांस्कृतिक विरासत और विविधता के बारे में लोगों के बीच जागरूकता फैलाना है। दुनिया भर में कई ऐसे ऐतिहासिक धरोहरें हैं, जो सालों से अपने अंदर न जाने कितने किस्से और कहानियों को संजोए हुए हैं। इन स्मारकों और स्थलों को देखने के लिए दूर-दूर से लोग पहुंचते हैं। ऐसी विरासतों को संभाले रखने के लिए ही विश्व विरासत दिवस मनाया जाता है। हर साल 18 अप्रैल को आयोजित होने वाला यह एक अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षण है। दुनिया भर में इस दिन को स्मारकों और विरासत स्थलों की यात्रा करके, सम्मेलनों में शामिल होकर, राउंड टेबल और समाचार पत्रों के लेखों समेत कई अलग-अलग तरीकों से मनाया जाता है। यह दिन पहली बार 1983 में संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन (यूनेस्को) द्वारा मनाया गया था। यूनेस्को के 22वें आम सम्मेलन के दौरान इसे विश्व आयोजन के रूप में मान्यता मिली थी। भारत में कुल 3691 ऐसे स्मारक और स्थल हैं, जिसमें से 40 यूनेस्को विश्व धरोहर स्थलों के रूप में नामित हैं। इसमें ताजमहल, अजंता की गुफाएं और एलोरा की गुफाएं शामिल हैं। विश्व धरोहर स्थलों में असम में काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान जैसे प्राकृतिक स्थल भी शामिल हैं।</p>
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		<title>विश्व विरासत दिवस विशेष : सिद्धाचल पर्वत पर प्राचीन जैन प्रतिमा और मंदिर को संरक्षित करने की जरूरत </title>
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		<pubDate>Tue, 18 Apr 2023 11:11:20 +0000</pubDate>
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<p><strong>आज भी बहुत से ऐसे क्षेत्र हैं जहां बहुत सी ऐतिहासिक धरोहर और विरासत मौजूद हैं। जहां सरकार बिल्कुल ध्यान नहीं दे पा रही है। ग्वालियर के कोटेश्वर रोड किला पर सिद्धाचल पर्वत पर प्राचीन अनेक जैन प्रतिमा और मंदिर हैं। इसके भी संरक्षण की आवश्यकता है। <span style="color: #ff0000;">पढ़िए ये विशेष रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>ग्वालियर।</strong> आज भी बहुत से ऐसे क्षेत्र हैं जहां बहुत सी ऐतिहासिक धरोहर और विरासत मौजूद हैं। जहां सरकार बिल्कुल ध्यान नहीं दे पा रही है। जिस पर सरकार को ध्यान देने की जरूरत है। सौरभ जैन वरेह वाले अंबाह ने बताया कि ग्वालियर के कोटेश्वर रोड किला पर सिद्धाचल पर्वत पर प्राचीन अनेक जैन प्रतिमा और मंदिर हैं। जिस मे सिद्धाचल गुफाओं और गोपाचल रॉक कट स्मारकों (ग्वालियर) में सैकड़ों जैन मूर्तियों को इस्लामिक आक्रमणरियों ने नष्ट कर दिया।</p>
<p>अधिकांश जैन मूर्तियां 15 वी शताब्दी के दौरान की हैं, हालांकि कुछ सातवीं शताब्दी की भी हैं। 15 वी शताब्दी के दौरान नक्काशी की गई मूर्तियां तोमर राजा डूंगर सिंह और उनके बेटे कीर्ति सिंह के शासनकाल के दौरान बनाई गई थी। गोपाचल रॉक कट स्मारकों में जैन तीर्थंकरों की लगभग 1500 मूर्तियां हैं और सिद्धाचल गुफाओं में लगभग 31 जैन मंदिर हैं। गोपाचल रॉक कट स्मारकों को सिद्धाचल गुफाओं की तुलना में पहले दिनांकित किया गया है।</p>
<p>स्मारकों के पास पाए गए शिलालेख उन्हें 1440 से 1453 ईस्वी तक तोमर राजाओं को श्रेय देते हैं। 1527 के आसपास बाबर (मुगल सम्राट) ने उनके विनाश का आदेश दिया और इन दोनों स्मारकों को हटा दिया गया। विश्व की सबसे बड़ी अद्वितीय प्रतिमा 21 वे तीर्थंकर भगवान नमिनाथ की अतिशयकारी पद्मासन अवस्था में गुफा नंबर 2 में है। जिसकी अवगाहना लगभग 6 मीटर है।</p>
<p>सिद्धाचल पर्वत ग्वालियर रेलवे स्टेशन से लगभग 5 किलोमीटर दूर और गोपाचल पर्वत (भगवान पार्श्वनाथ की 42 फुट ऊंची प्रतिमा, एक पत्थर की बावडी) फूलबाग से लगभग 3 किलोमीटर दूर है। शिंदे की छावनी होते हुए उरवाई गेट से आगे ढोडापुर गेट की ओर कोटेश्वर रोड पर कोटेश्वर महादेव मंदिर के सामने से रास्ता हैं। उरवाई गेट पर भी त्रिशलागिरी पर्वत है। जिस पर माता त्रिशला और भगवान महावीर के पांच कल्याणक को दर्शाती प्रतिमाएं सहित अनेक तीर्थंकर प्रतिमाएं विराजमान हैं।</p>
<p><strong>इसलिए मनाया जाता है विश्व विरासत दिवस</strong></p>
<p>विश्व विरासत दिवस को मनाने का उद्देश्य ग्रह पर सांस्कृतिक विरासत और विविधता के बारे में लोगों के बीच जागरूकता फैलाना है। दुनिया भर में कई ऐसे ऐतिहासिक धरोहरें हैं, जो सालों से अपने अंदर न जाने कितने किस्से और कहानियों को संजोए हुए हैं। इन स्मारकों और स्थलों को देखने के लिए दूर-दूर से लोग पहुंचते हैं। ऐसी विरासतों को संभाले रखने के लिए ही विश्व विरासत दिवस मनाया जाता है। हर साल 18 अप्रैल को आयोजित होने वाला यह एक अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षण है।</p>
<p>दुनिया भर में इस दिन को स्मारकों और विरासत स्थलों की यात्रा करके, सम्मेलनों में शामिल होकर, राउंड टेबल और समाचार पत्रों के लेखों समेत कई अलग-अलग तरीकों से मनाया जाता है। यह दिन पहली बार 1983 में संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन (यूनेस्को) द्वारा मनाया गया था। यूनेस्को के 22वें आम सम्मेलन के दौरान इसे विश्व आयोजन के रूप में मान्यता मिली थी।</p>
<p>भारत में कुल 3691 ऐसे स्मारक और स्थल हैं, जिसमें से 40 यूनेस्को विश्व धरोहर स्थलों के रूप में नामित हैं। इसमें ताजमहल, अजंता की गुफाएं और एलोरा की गुफाएं शामिल हैं। विश्व धरोहर स्थलों में असम में काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान जैसे प्राकृतिक स्थल भी शामिल हैं।</p>
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