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	<title>देव शास्त्र गुरु &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<description>ताज़ा खबरे हिन्दी में</description>
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	<title>देव शास्त्र गुरु &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>9वें तीर्थंकर भगवान पुष्पदंत जी का गर्भकल्याणक 10 फरवरी: तिथि के अनुसार फाल्गुन कृष्ण नवमी को मनाया जाएगा  </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shree Phal News]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 09 Feb 2026 06:32:34 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जैन धर्म के तीर्थंकरों के कल्याणकों को लेकर दिगंबर जैन मंदिरों में खासतौर पर विशेष आराधना, भक्ति और पूजन, विधान सहित विभिन्न धार्मिक क्रियाएं होती हैं। कल्याणकों को लेकर समाजजनों में विशेष उत्साह और अपार उल्लास रहता है। अभिषेक, शांतिधारा, अर्घ्य समर्पण, देव-शास्त्र-गुरु के पूजन कर धर्मलाभ अर्जित किया जाता है। श्रीफल जैन न्यूज की [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>जैन धर्म के तीर्थंकरों के कल्याणकों को लेकर दिगंबर जैन मंदिरों में खासतौर पर विशेष आराधना, भक्ति और पूजन, विधान सहित विभिन्न धार्मिक क्रियाएं होती हैं। कल्याणकों को लेकर समाजजनों में विशेष उत्साह और अपार उल्लास रहता है। अभिषेक, शांतिधारा, अर्घ्य समर्पण, देव-शास्त्र-गुरु के पूजन कर धर्मलाभ अर्जित किया जाता है। <span style="color: #ff0000">श्रीफल जैन न्यूज की विशेष शृंखला में आज पढ़िए, उपसंपादक प्रीतम लखवाल की यह संकलित और संपादित प्रस्तुति&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> जैन धर्म के तीर्थंकरों के कल्याणकों को लेकर दिगंबर जैन मंदिरों में खासतौर पर विशेष आराधना, भक्ति और पूजन, विधान सहित विभिन्न धार्मिक क्रियाएं होती हैं। कल्याणकों को लेकर समाजजनों में विशेष उत्साह और अपार उल्लास रहता है। अभिषेक, शांतिधारा, अर्घ्य समर्पण, देव-शास्त्र-गुरु के पूजन कर धर्मलाभ अर्जित किया जाता है। भगवान के गर्भ कल्याणक से लेकर मोक्ष कल्याणक का जैन समाज में बहुत अधिक धार्मिक महत्व है। आराधना के लिए भगवान के कल्याणकों का कोई भी अवसर मंदिरों में छोड़ा नहीं जाता। 10 फरवरी को भगवान पुष्पदंत जी का गर्भ कल्याणक मनाया जाएगा। तिथि के अनुसार गर्भकल्याणक फाल्गुन कृष्ण नवमी को मनाया जाता है। इस बार भी भगवान पुष्पदंत जी का गर्भ कल्याणक शहर सहित देशभर के दिगंबर जैन मंदिरों में मनाया जाएगा और विशेष आराधनाएं होंगी। भगवान पुष्पदंत जी (सुविधिनाथ) जैन धर्म के 9वें तीर्थंकर हैं। जिनका गर्भ कल्याणक फाल्गुन कृष्णा नवमी को हुआ था। माता जयरामा (रानी राम) ने गर्भ में आने के समय स्वप्न में ‘पुष्प’ (फूल) देखे थे। इसलिए नाम पुष्पदंत पड़ा। पिता का नाम राजा सुग्रीव और जन्म स्थान काकंदी (उत्तर प्रदेश) था। भगवान पुष्पदंत जी का जन्म कल्याणक मार्गशीर्ष शुक्ल प्रतिपदा (एकम) को मनाया जाता है। भगवान का चिन्ह मगरमच्छ (मकर) है। उनका वर्ण श्वेत (गोरा) है। भगवान पुष्पदंत जी की जन्म नगरी काकंदी (आधुनिक खुखुंदू, देवरिया, उत्तर प्रदेश) है। भगवान पुष्पदंत जी के माता जयरामा ने गर्भ धारण के समय कई दिव्य स्वप्न देखे थे, जिसमें मुख्य रूप से ‘पुष्प’ की अधिकता थी। इस कारण उनका नाम पुष्पदंत रखा गया। चूँकि उनके गर्भ में आने के बाद से ही राज्य में सभी कार्य सुव्यवस्थित (सुविधि) हो गए थे। इसलिए उन्हें ‘सुविधिनाथ’ के नाम से भी जाना जाता है और पूजा जाता है।</p>
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		<title>बुजुर्गों का बहुमान, जैन मित्र मंडल का अनुकरणीय कार्य : मुनिश्री विलोकसागरजी के सानिध्य में हुआ सामूहिक क्षमावाणी स्नेह मिलन समारोह  </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 22 Sep 2025 15:44:21 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[श्री नसियाजी जिनालय में जैन मित्र मंडल के सामूहिक क्षमावाणी स्नेह मिलन समारोह रखा गया। इसमें मुनिश्री विलोकसागरजी महाराज ने कहा कि बुजुर्गों ने आपको बोलना, चलना सिखाया। जीवन में अच्छे बुरे की पहचान सिखाई। यहां तक कि आपका मल मूत्र भी साफ किया। ऐसे बुजुर्गों का सम्मान करना आप सभी का परम कर्तव्य है। [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>श्री नसियाजी जिनालय में जैन मित्र मंडल के सामूहिक क्षमावाणी स्नेह मिलन समारोह रखा गया। इसमें मुनिश्री विलोकसागरजी महाराज ने कहा कि बुजुर्गों ने आपको बोलना, चलना सिखाया। जीवन में अच्छे बुरे की पहचान सिखाई। यहां तक कि आपका मल मूत्र भी साफ किया। ऐसे बुजुर्गों का सम्मान करना आप सभी का परम कर्तव्य है। <span style="color: #ff0000">मुरैना से पढ़िए, मनोज जैन नायक की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>मुरैना।</strong> बुजुर्गों ने आपको सच्चे देव शास्त्र गुरु से परिचय कराते हुए उनकी उपासना भक्ति और पूजन करना सिखाया। उन्हीं बुजुर्गों ने आपको बोलना, चलना सिखाया। जीवन में अच्छे बुरे की पहचान सिखाई। यहां तक कि आपका मल मूत्र भी साफ किया। ऐसे बुजुर्गों का सम्मान करना आप सभी का परम कर्तव्य है। यह उद्गार मुनिश्री विलोकसागरजी महाराज ने श्री नसियाजी जिनालय में जैन मित्र मंडल के सामूहिक क्षमावाणी स्नेह मिलन समारोह में सभा में व्यक्त किए। सोमवार को वार्षिक कलशाभिषेक के अवसर पर उन्होंने कहा कि सकल जैन समाज के सभी वयोवृद्धों का बहुमान कर जैन मित्र मंडल ने सभी के सामने एक अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किया है। बुजुर्गों का यह सम्मान, उनका यह बहुमान केवल मंच तक सीमित नहीं रहना चाहिए। आज आप सभी को यह शपथ लेना चाहिए कि परिवार में, समाज में, पड़ोस में यानि कि सभी स्थानों पर हम बुजुर्गों के सम्मान और बहुमान के लिए बचनबद्ध रहेंगे। हम सभी बुजुर्गों का कभी भी अपमान नहीं करेंगे, उन्हें कठोर बचन नहीं बोलेंगे। जैन मित्र मण्डल के द्वारा आयोजित श्रद्धेय बुजुर्ग बंधुओं के बहुमान समारोह के लिए सभी बधाई एवं प्रशंसा के पात्र हैं। सभी को बहुत बहुत आशीर्वाद है।</p>
<p>इस अवसर पर मुनिश्री विबोधसागरजी महाराज ने कहा कि संगठन में ही शक्ति निहित होती है। सामंजस्य एकता और सूझबूझ से किया गया हर कार्य सफल होता है। बुजुर्गों के उपकार को, उनके ऋण को हम कभी भी चुका नहीं सकते। फिर भी आपने उनका बहुमान कर ये साबित कर दिया कि वाकई में आप उनके प्रति श्रद्धावान हैं। हमारे बुजुर्गों ने स्वयं कष्ट, परेशानियां झेलते हुए हमारे रास्ते के कांटों को साफ किया है। हमें जीवन पर्यंत उनका बहुमान करते रहना चाहिए। अपने माता-पिता या अन्य किसी भी बुजुर्ग व्यक्ति का दिल नहीं दुखाना चाहिए। उन सभी से सदैव आदर और सम्मान के साथ बर्ताव करना चाहिए। इस नेक कार्य के लिए जैन मित्र मंडल और उनके सहयोगी बधाई के पात्र हैं।</p>
<p><strong>सामूहिक रूप में सभी ने की क्षमायाचना</strong></p>
<p>जैन मित्र मंडल द्वारा आयोजित कार्यक्रम में सभी ने सामूहिक रूप से क्षमा याचना की। कार्यक्रम में प्रतिष्ठाचार्य संजय भैयाजी द्वारा मंगलाचरण, ओमप्रकाश जैन ट्रांसपोर्ट द्वारा ध्वजारोहण एवं विशंभरदयाल अनूप जैन भंडारी द्वारा मंच उदघाटन किया गया। समाज की प्रतिभाओं एवं नन्हें मुन्ने बच्चों द्वारा सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किए गए। कार्यक्रम का संचालन अनूप भंडारी द्वारा किया गया। समारोह में बतौर मुख्य अतिथि जैसवाल जैन सेवा न्यास के मंत्री रविन्द्र जैन (जमूसर वाले) भोपाल, जैसवाल जैन युवाजन दिल्ली के नवीन जैन पिंकी, चौधरी मोहित जैन चीकू, अजय जैन बॉबी, सीए अजय जैन, सुनील जैन, पवन जैन, गौरव जैन इंदौर, स्वागताध्यक्ष उद्यमी पवन जैन मुरैना, स्वागत मंत्री महेश जैन बंगाली मुरैना बाहर से आए हुए सभी अतिथि तथा सभी बुजुर्ग मंच पर विराजमान थे। समारोह की अध्यक्षता वरिष्ठ समाजसेवी राजेंद्र भंडारी (अतिशय क्षेत्र टिकटोली अध्यक्ष) ने की। स्वागताध्यक्ष पवन जैन मुरैना ने स्वागत भाषण दिया एवं एडवोकेट धर्मेंद्र जैन ने जैन मित्र मंडल की प्रगति रिपोर्ट प्रस्तुत की।</p>
<p><strong>’जैन मित्र मंडल ने किया बुजुर्गों का बहुमान</strong></p>
<p>जैन मित्र मण्डल द्वारा आयोजित सामूहिक क्षमावाणी स्नेह मिलन समारोह में 80 वर्ष से अधिक 31 सजातीय बुजुर्ग बंधुओं का बहुमान किया गया। सभी बुजुर्गों को ससम्मान मंचासीन कर सभी को स्वाफा बांधा गया। तिलक, श्रीफल, शाल, मणिमाला, प्रशस्ति पत्र देकर सभी बुजुर्गों का सम्मान किया गया। सम्मान की बेला में बुजुर्ग बंधुओं के चेहरे पर एक अदभुद मुस्कान को देखकर आयोजकगढ़ गदगद हो गए।</p>
<p><strong>लकी ड्रॉ रहा आकर्षण केंद्र, प्रथम पुरस्कार में मिली स्कूटी</strong></p>
<p>समारोह में लकी ड्रॉ आकर्षण का केंद्र रहा। उपहार कूपनों का लकी ड्रॉ किया गया। जिसमें प्रथम पुरस्कार चेरी अनिल जैन भंडारी को इलेक्ट्रिक स्कूटी, रज्जन जैन को द्वितीय पुरस्कार में फ्रिज एवं सूरज जैन को तृतीय पुरस्कार में एंड्रॉयड टीवी उपहार स्वरूप प्रदान की गई। इसके साथ साथ अन्य लोगों को भी विभिन्न पुरस्कारों का वितरण किया गया।</p>
<p><strong> वार्षिक कलशाभिषेक का हुआ </strong></p>
<p>जैन मित्र मण्डल के मुख्य संयोजक सतेंद्र जैन शिक्षक ने बताया कि मुनिश्री विलोकसागरजी एवं मुनिश्री विबोधसागरजी महाराज के सान्निध्य एवं प्रतिष्ठाचार्य बाल ब्रह्मचारी संजय भैयाजी के आचार्यत्व में श्री महावीर दिगंबर जैन नसियाजी जिनालय में वार्षिक कलशाभिषेक हुए। मंचासीन युगल मुनिराजों का पाद प्रक्षालन राजेंद्र भंडारी साकेत निकेत जैन भंडारी परिवार द्वारा किया गया। जिसमें प्रथम कलश से अभिषेक करने का सौभाग्य नीरज जैन मोनू, प्रथम शांतिधारा का सौभाग्य पदमचंद गौरव जैन चौटा परिवार एवं द्वितीय शांतिधारा का सौभाग्य राजेंद्र भंडारी, साकेत जैन भंडारी परिवार को प्राप्त हुआ। मुनिराजों के मुखारविंद से शांतिधारा का वाचन हुआ। समारोह में प्रतिष्ठाचार्य संजय भैयाजी द्वारा सभी कार्यक्रमों को विधिविधान एवं मंत्रोच्चारण के साथ सम्पन्न कराया। कलशाभिषेक के पश्चात सकल जैन समाज के लिए वात्सल्य भोज की व्यवस्था की गई थी।</p>
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		<title>स्वप्न में भी यदि आत्महत्या का भाव आए तो प्रायश्चित लेना आचार्य श्री विनिश्चय सागर जी ने मरण के प्रकारों का कराया ज्ञान  </title>
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		<pubDate>Sun, 14 Sep 2025 05:00:39 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी महाराज ने मरण के प्रकार के विषय में प्रकाश डाला। इच्छा मरण और अनिच्छा मरण के विषय में प्रकाश डालते हुए कहा कि इच्छा में लोग आत्महत्या कर लेते हैं। लोग जिसके आत्महत्या के भाव बन रहे हैं। वह मिथ्या दृष्टि है, सहन शक्ति नहीं होती है। इसलिए ऐसे विपरीत भाव [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी महाराज ने मरण के प्रकार के विषय में प्रकाश डाला। इच्छा मरण और अनिच्छा मरण के विषय में प्रकाश डालते हुए कहा कि इच्छा में लोग आत्महत्या कर लेते हैं। लोग जिसके आत्महत्या के भाव बन रहे हैं। वह मिथ्या दृष्टि है, सहन शक्ति नहीं होती है। इसलिए ऐसे विपरीत भाव बनते हैं। <span style="color: #ff0000">रामगंजमंडी से पढ़िए, अभिषेक जैन लुहाड़िया की खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>रामगंजमंडी।</strong> आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी महाराज ने मरण के प्रकार के विषय में प्रकाश डाला। इच्छा मरण और अनिच्छा मरण के विषय में प्रकाश डालते हुए कहा कि इच्छा में लोग आत्महत्या कर लेते हैं। लोग जिसके आत्महत्या के भाव बन रहे हैं। वह मिथ्या दृष्टि है, सहन शक्ति नहीं होती है। इसलिए ऐसे विपरीत भाव बनते हैं। मुकाबला करने की ताकत नहीं होती, कमजोर होते हैं तो यह भाव बन जाते हैं। मरना किसी समस्या का समाधान नहीं है समस्या को बढ़ाना है क्योंकि, जिस चीज से आपको पीड़ा है तकलीफ है वस्तु का अभाव है। वो कर्म नहीं मरने वाला है वह साथ में जाने वाला है मरने से कोई फायदा नहीं है यहां कर्म कम कष्ट दे रहा था वहां और ज्यादा देगा। उन्होंने कहा स्वप्न में भी यदि आत्महत्या का भाव आ जाए तो प्रायश्चित लेना चाहिए और यदि साक्षात भाव बनाया तो कितने निकृष्ट परिणाम होंगे। जैन दर्शन व अन्य दर्शन भी कहता है कि आत्महत्या महापाप है। आत्महत्या करने की कभी मत सोचना।</p>
<p><strong>कितनी भी परेशानी हो जिनेंद्र भगवान का दामन थाम लो </strong></p>
<p>आचार्य श्री ने कहा आपके जीवन में कितनी भी परेशानी हो जिनेंद्र भगवान का दामन संभाल लो। देव शास्त्र गुरु के पास पहुंच जाओ। सब निपट जाएगा, सब निपटेगा मरने से केवल उलझेगे सुलझेंगे। नहीं मरने से कष्ट बढ़ेंगे कम नहीं होंगे। जीना सीखो और मरने का तरीका सीखो। करने का तरीका सीख जाते हो तो आत्महत्या का भाव कभी नहीं बनेगा। छोटी-छोटी चीजें धन का अभाव किसी ने कुछ कहा कि दिल पर लग गई बच्चा फैल हो गया। व्यापार में सक्सेस नहीं मिली तो क्या मर जाएंगे। मरना किसी समस्या का समाधान नहीं है मरने के अलावा और कई अवसर है कि आप जीवन को सही धारा में ले जाकर सही लक्ष्य तक पहुंचा सकते हैं।</p>
<p><strong>   मरना तो नहीं चाहते लेकिन अकाल मरण हुआ यह अनिच्छा मरण है </strong></p>
<p>अनिच्छा मरण को समझाते हुए गुरुदेव ने कहा कि मरना तो नहीं चाहते लेकिन, अकाल मरण हुआ और अकाल मरण के निमित्त मिल गए है या सकाल मरण उपस्थित हो गया है तो मरना पड़ेगा वर्तमान परिपेक्ष पर गुरुदेव ने कहा कि वर्तमान समय अभी अच्छा नहीं चल रहा है क्योंकि बहुत हिंसाए हो रही है बहुत-बहुत जीव मर रहे हैं। और मनुष्य भी मर रहे हैं। आपको रोज प्रार्थना करनी चाहिए कि यह समय ऐसे निकल जाए जिससे जीवो को कम हानि पहुंचे। गुरुदेव ने कहा इस हेतु सभी को शांति मंत्र का जाप करना चाहिए। हम यही कर सकते हैं कि भावनाएं प्रेषित कर सकते हैं।</p>
<p><strong>   भावनाओं में बहुत ताकत होती है </strong></p>
<p>महाराज श्री ने कहा कि भावना में बहुत ताकत होती है। यदि सच्चे मन से प्रेषित की जाती है तो वह व्यक्ति के कष्ट पीड़ा को समाप्त करने में हेतु बनती है। सामूहिक भावनाएं तो और ज्यादा काम करती हैं बहुत ज्यादा काम करती हैं।</p>
<p><strong> अर्थी की शोभा मत बनो शोभा मोक्षमार्ग की बनो</strong></p>
<p>अर्थी का उदाहरण देकर कहा कि अर्थी का कितना भी श्रृंगार किया जाए। चंदन का श्रृंगार किया जाए। दुनिया भर के साधन जुटा कर अर्थी को सजाया जाए। लोग सिर्फ उसे अर्थी ही कहेंगे। होगा क्या वह मरघट ही जाएगी और अग्नि में ही रखी जाएगी। कोई भी यह नहीं देखेगा कि सोने की अर्थी है। बस यही देखेगा की कौन मर गया। पहले अर्थी लकड़ी की बनती थी। यह इस बात का सूचक थी कि जो कुछ भी है अब सब व्यर्थ है। कितना भी श्रंगार कर दो अर्थी की शोभा मत बनो। शोभा मोक्षमार्ग की बनो। आचार्य श्री ने कहा जब तक हम मरण को नहीं समझेंगे तब तक हम मरण को नहीं सुधार सकते मरण पर मंथन करना मरने का भाव नहीं करना हमारा समय आएगा। आयु पूर्ण होगी तो हम खुशी-खुशी जाएं। महामंत्र को जपते जपते जाएं और भगवान का नाम लेते जाएं तो निगोद से हम बच सकते हैं।</p>
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		<title>देव शास्त्र गुरु शरण में भक्ति से पाप कर्मों की होती है निर्जरा : मुनि श्री पूज्य सागर जी ने कहा- गुरु भक्ति से होती है पुण्य की प्राप्ति  </title>
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		<pubDate>Wed, 06 Aug 2025 10:44:23 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[अंतर्मुखी मुनिश्री 108 श्री पूज्य सागर जी महाराज ने आज अशरण भावना की विवेचना की। मुनिश्री पूज्यसागर जी ने बुधवार को दिगंबर जैन मंदिर परिवहन नगर में कहा कि देव शास्त्र गुरु चार मंगल नव देवता शरण हैं। शरण दाता सही राह दिखाते हैं। इंदौर से पढ़िए, यह खबर&#8230; इंदौर। अंतर्मुखी मुनिश्री 108 श्री पूज्य [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>अंतर्मुखी मुनिश्री 108 श्री पूज्य सागर जी महाराज ने आज अशरण भावना की विवेचना की। मुनिश्री पूज्यसागर जी ने बुधवार को दिगंबर जैन मंदिर परिवहन नगर में कहा कि देव शास्त्र गुरु चार मंगल नव देवता शरण हैं। शरण दाता सही राह दिखाते हैं। <span style="color: #ff0000">इंदौर से पढ़िए, यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर</strong>। अंतर्मुखी मुनिश्री 108 श्री पूज्य सागर जी महाराज ने आज अशरण भावना की विवेचना की। मुनिश्री पूज्यसागर जी ने बुधवार को दिगंबर जैन मंदिर परिवहन नगर में कहा कि देव शास्त्र गुरु चार मंगल नव देवता शरण हैं। शरण दाता सही राह दिखाते हैं। सम्यक दर्शन और मिथ्या दर्शन का अंतर बताते हैं और हितकारी मंगलकारी हैं। शरीर से धर्म साधना, दान, तप, त्याग, संयम धारण किया जाता है। यही समझ सम्यक दर्शन है, समय सार हैं। पूज्य मुनिश्री ने कहा कि काल रूपी शेर ने मृग हिरण रूपी आत्मा को संसार रूपी वन में घेर रखा है।</p>
<p>देव शास्त्र गुरु शरण में भक्ति से पाप कर्मों की निर्जरा होकर पुण्य की प्राप्ति होती है। परिवहननगर द्वारकापुरी में अपना पूज्य वर्षायोग कर रहे अंतर्मुखी मुनिश्री पूज्य सागरजी महाराज की प्रवचन सभा में पोरवाड़ जैन समाज के अध्यक्ष नमिष जैन इंदौर ने उपस्थित होकर मुनि श्री से आशीर्वाद प्राप्त किया। बुधवार की धर्मसभा में बड़ी संख्या में दिगंबर जैन समाज के श्रद्धालु, गुरु भक्त और आस्थावान लोग मौजूद रहे।</p>
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		<title>जीवन में अच्छा चाहते हो तो क्रोध मान माया लोभ छोड़ो: मुनिश्री के प्रवचनों का पुण्य अर्जन कर रहे श्रद्धालु </title>
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		<pubDate>Fri, 25 Apr 2025 11:48:06 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[दिगंबर जैन आदिनाथ जिनालय छत्रपति नगर में इन दिनों मुनिश्री के प्रवचन जारी है। मुनि श्री समत्व सागर जी महाराज ने अपने प्रवचन में कहा कि मंदिरों में शुभ भावों की चर्चा और मंत्रों का वाचन होना चाहिए। मंदिर देव शास्त्र गुरु की आराधना करने और उनके प्रति श्रद्धा प्रकट करने का स्थान है। इंदौर [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>दिगंबर जैन आदिनाथ जिनालय छत्रपति नगर में इन दिनों मुनिश्री के प्रवचन जारी है। मुनि श्री समत्व सागर जी महाराज ने अपने प्रवचन में कहा कि मंदिरों में शुभ भावों की चर्चा और मंत्रों का वाचन होना चाहिए। मंदिर देव शास्त्र गुरु की आराधना करने और उनके प्रति श्रद्धा प्रकट करने का स्थान है। <span style="color: #ff0000">इंदौर से पढ़िए, यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> शुभ विचारों के अभाव में जीव आनंद से वंचित हो दुःखी हो रहा है। चित्त चलायमान है और कर्म बंध प्रतिक्षण हो रहा है। आपके विचारों के अनुसार कर्म बंध होते हैं। बुरे विचार सभी को आते हैं। देव शास्त्र गुरु और अपने माता-पिता के प्रति भी बुरे विचार कर लेते हैं। जीवन में अच्छा चाहते हो तो पहले क्रोध, कषाय, मान, माया लोभ से मुक्त होने का पुरुषार्थ करो और अपनी पांचांे इंद्रियों को नियंत्रित कर संयमी बनो। राजेश जैन दद्दू ने बताया कि यह उद्गार दिगंबर जैन आदिनाथ जिनालय छत्रपति नगर में शुक्रवार को धर्मसभा को संबोधित करते हुए मुनि श्री समत्व सागर जी महाराज ने व्यक्त किए। धर्मसभा को उपाध्याय श्री विश्रुत सागर जी महाराज ने भी संबोधित किया और कि जिनके पुण्य का उदय होता है, उन्हें ही देव शास्त्र गुरु के पाद मूल में बैठने और जिनवाणी श्रवण करने का अवसर मिलता है। आपने कहा कि मंदिरों में शुभ भावों की चर्चा और मंत्रों का वाचन होना चाहिए लेकिन, आजकल लोग मंदिरों में कषायों का वचन और गोष्ठी करते हैं एवं स्वयं की आलोचना करने के बजाय देव शास्त्र गुरु की आलोचना करते हैं, जो शुभ संकेत नहीं है।</p>
<p>आपने कहा कि मंदिर देव शास्त्र गुरु की आराधना करने और उनके प्रति श्रद्धा प्रकट करने का स्थान है। इसलिए मंदिरों की पवित्रता और उसकी गरिमा का ध्यान रखते हुए सच्ची श्रद्धा प्रकट करना चाहिए। राजेश जैन दद्दू ने बताया कि धर्मसभा में मुनि श्री समत्व सागर जी महाराज के गृहस्थ जीवन के माता-पिता डॉ. अभय जैन एवं अनिता जैन ने आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी के चित्र के समक्ष दीप प्रज्वलन कर धर्मसभा का शुभारंभ किया। संचालन डॉ. जैनेंद्र जैन ने किया।</p>
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		<title>देव शास्त्र गुरु के प्रति आस्था कुएं के जल के समान: आस्था अंतर्मन से प्रकट होनी चाहिए-मुनिश्री शुध्द सागर जी  </title>
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		<pubDate>Tue, 01 Apr 2025 06:11:57 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[सुमतिधाम में होने जा रहे पट्टाचार्य महोत्सव में शामिल होने के लिए इंदौर पधारे मुनिश्री शुद्धसागर जी महाराज ने समर्थ सिटी में प्रवचन दिए। वे श्री पारसनाथ जिनालय में धर्मसभा को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने देव शास्त्र गुरु के प्रति आस्था को अहम बताया। इंदौर से पढ़िए ओम पाटोदी की यह खबर&#8230; इंदौर। धर्म [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>सुमतिधाम में होने जा रहे पट्टाचार्य महोत्सव में शामिल होने के लिए इंदौर पधारे मुनिश्री शुद्धसागर जी महाराज ने समर्थ सिटी में प्रवचन दिए। वे श्री पारसनाथ जिनालय में धर्मसभा को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने देव शास्त्र गुरु के प्रति आस्था को अहम बताया। <span style="color: #ff0000">इंदौर से पढ़िए ओम पाटोदी की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> धर्म के प्रति श्रद्धा ऊपर से थोपी हुई नहीं होनी चाहिए। वह अंतर्मन से प्रकट होना चाहिए। वही श्रद्धा सच्ची होती है। जिस प्रकार कुएं का जल ज़मीन के अंदर से निकलता है तो जितना हम उसे निकलते हैं उतना ही बढ़ता जाता है। वहीं टंकी में भरा गया जल ऊपर से डाला जाता है जो कि कुछ समय बाद समाप्त हो जाता है। इसी प्रकार आस्था की स्थिति को भी समझना चाहिए। यह बातें आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी महाराज के शिष्य मुनिश्री शुध्द सागर जी महाराज ने श्री पारसनाथ जिनालय समर्थ सिटी में धर्म सभा में समाजजनों को संबोधित करते हुए कहीं।</p>
<p><img fetchpriority="high" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-78009" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/04/IMG-20250401-WA0013.jpg" alt="" width="847" height="1219" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/04/IMG-20250401-WA0013.jpg 847w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/04/IMG-20250401-WA0013-208x300.jpg 208w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/04/IMG-20250401-WA0013-712x1024.jpg 712w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/04/IMG-20250401-WA0013-768x1105.jpg 768w" sizes="(max-width: 847px) 100vw, 847px" />उन्होंने आगे कहा कि प्रभु के प्रति आस्था टंकी के जल के समान ऊपर से थोपी हुई नहीं होनी चाहिए बल्कि कुएं के जल के सामान मन के अंदर से प्रकट होने चाहिए क्योंकि, अंतर्मन से प्रकट हुई आस्था हमेशा अभिवृद्धि को प्राप्त होती है और सच्चे देव शास्त्र गुरु के प्रति बढ़ती हुई आस्था ही मोक्ष मार्ग का साधन है। मुनि श्री शुध्दसागर एवं क्षुल्लक श्री अकम्पन सागर जी सुमतिधाम में होने जा रहे पट्टाचार्य महोत्सव में शामिल होने के लिए इंदौर पधारे हैं।</p>
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		<title>संयम दीक्षा धारण करने से सच्चा सुख मिलता है-मुनि हितेंद्र सागरजीः आचार्य वर्धमान सागरजी धर्म प्रभावना कर रहे हैं। </title>
		<link>https://www.shreephaljainnews.com/true_happiness_is_only_in_the_soul_true_happiness_is_achieved_by_adopting_sanyam_diksha_muni_hitendra_sagar/</link>
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		<pubDate>Wed, 19 Feb 2025 13:59:04 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[साधुओं की जन्म एवं कर्म भूमि धर्मनगरी मुंगाणा में आचार्य वर्धमान सागरजी ससंघ विराजित है। श्रावक-श्राविकाओं के संस्कार शिविर का आयोजन चल रहा है। जिसमें हितेंद्र सागरजी, आर्यिका महायशमति माताजी सहित साधु की कक्षा में सैकड़ो धर्मावलंबी भाग ले रहे हैं। मुनि हितेंद्र सागरजी के प्रवचन भी चल रहे है। पढ़िए मुंगाणा की यह पूरी [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>साधुओं की जन्म एवं कर्म भूमि धर्मनगरी मुंगाणा में आचार्य वर्धमान सागरजी ससंघ विराजित है। श्रावक-श्राविकाओं के संस्कार शिविर का आयोजन चल रहा है। जिसमें हितेंद्र सागरजी, आर्यिका महायशमति माताजी सहित साधु की कक्षा में सैकड़ो धर्मावलंबी भाग ले रहे हैं। मुनि हितेंद्र सागरजी के प्रवचन भी चल रहे है। <span style="color: #ff0000">पढ़िए मुंगाणा की यह पूरी खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>मुंगाणा।</strong> अनेक साधुओं की जन्म एवं कर्म भूमि धर्मनगरी मुंगाणा में आचार्य वर्धमानसागर संघ सहित विराजित है। आचार्य संघ सानिध्य में प्रतिदिन प्रातः पंचामृत अभिषेक, शास्त्र प्रवचन, दोपहर को स्वाध्याय, शाम को श्रावक-श्राविकाओं संस्कार शिविर का आयोजन चल रहा है। जिसमें हितेंद्र सागरजी, आर्यिका महायशमति माताजी सहित साधु की कक्षा में सैकड़ो धर्मावलंबी भाग ले रहे हैं।</p>
<p><strong>पुण्य से मनुष्य जीवन मिलता है</strong></p>
<p>मुनि हितेंद्र सागरजी ने प्रवचन में बताया कि बहुत पुण्य से मनुष्य जीवन मिलता है। जिसमें जैन कुल में जन्म लेकर आप देव, शास्त्र, गुरु और संत समागम का लाभ मिला है। संत समागम से आपको व्रत, नियम संयम धारण करना चाहिए। मुनिश्री ने बताया कि संयम दीक्षा धारण कर उत्तम समाधि होने पर भव्य जीव को अगले दो भव से आठ भव में सिद्धालय की प्राप्ति होती है। मुनि हितेंद्र सागरजी ने कहानी के माध्यम से समय का सदुपयोग करने की प्रेरणा दी।</p>
<p><strong>जीवन में दीक्षा धारण कर आत्मा का कल्याण करना चाहिए </strong></p>
<p>करणमल अध्यक्ष एवं अनिरुद्ध मैदावत अनुसार मुनिश्री ने बताया कि मनुष्यभव में जीव ने अनेक बार जतन पुरुषार्थ किए पर कभी सुख की प्राप्ति नहीं हुई। चारों गतियो में अनादि काल से भ्रमण कर रहे हैं। कभी अग्नि जलाकर हवन किया कुतप भी किया। किंतु सच्चा सुख नहीं मिला। सच्चा सुख आत्मा में है पीछी कमंडल सहित संयम धारण करने से सच्चा सुख प्राप्त होता है। जीवन में दीक्षा धारण कर आत्मा का कल्याण करना चाहिए। आचार्य वर्धमान सागरजी ने मात्र 18 वर्ष की उम्र में दीक्षा धारण कर कितनी धर्म प्रभावना कर रहे हैं।</p>
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		<title>स्त्रियों में हमेशा प्रमाद विद्यमान रहता है-आचार्यश्री वर्धमान सागरजीः श्री महायशमति ने श्रावक का अर्थ प्रतिपादित किया </title>
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		<pubDate>Fri, 14 Feb 2025 13:15:20 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[प्रमादमय स्त्रियों को प्रमादमय मूर्तियों की उपमा दी गई है, अर्थात स्त्रियों में हमेशा प्रमाद विद्यमान रहता है, जिस प्रकार मिट्टी की मूर्ति में मिट्टी की बहुलता होती है उसी प्रकार स्त्री में प्रमाद की बहुलता के कारण इन्हें प्रमदा की संज्ञा दी गई है। धर्मनगरी मुंगाणा में विराजित आचार्यश्री वर्धमान सागरजी ने यह उद्गार [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>प्रमादमय स्त्रियों को प्रमादमय मूर्तियों की उपमा दी गई है, अर्थात स्त्रियों में हमेशा प्रमाद विद्यमान रहता है, जिस प्रकार मिट्टी की मूर्ति में मिट्टी की बहुलता होती है उसी प्रकार स्त्री में प्रमाद की बहुलता के कारण इन्हें प्रमदा की संज्ञा दी गई है। धर्मनगरी मुंगाणा में विराजित आचार्यश्री वर्धमान सागरजी ने यह उद्गार व्यक्त किए। <span style="color: #ff0000">पढ़िए मुंगाणा से राजेश पंचोलिया की यह पूरी खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>मुंगाणा।</strong> अनेक साधुओं की जन्म एवं कर्म भूमि धर्मनगरी मुंगाणा में आचार्यश्री वर्धमान सागरजी संघ सहित विराजित है। आचार्य संघ सानिध्य में प्रतिदिन प्रातः पंचामृत अभिषेक, शास्त्र प्रवचन, दोपहर को स्वाध्याय, शाम को श्रावक-श्राविकाओं संस्कार शिविर का आयोजन चल रहा है। जिसमें सैकड़ो धर्मावलंबी भाग ले रहे हैं।</p>
<p><strong>आचार्यश्री ने विवेचना की</strong></p>
<p>आचार्यश्री वर्धमान सागरजी ने योगसार ग्रंथ की गाथा 45 एवं 46 की विवेचना में बताया कि गाथा 44 अनुसार स्त्री पर्याय से मुक्ति नहीं होती है। गाथा 45 और 46 में इसका कारण बताया कि प्रमादमय स्त्रियों को प्रमादमय मूर्तियों की उपमा दी गई है, अर्थात स्त्रियों में हमेशा प्रमाद विद्यमान रहता है, ब्रह्मचारी गज्जू भैया व राजेश पंचोलिया अनुसार आचार्यश्री ने आगे बताया कि जिस प्रकार मिट्टी की मूर्ति में मिट्टी की बहुलता होती है उसी प्रकार स्त्री में प्रमाद की बहुलता के कारण इन्हें प्रमदा की संज्ञा दी गई है। क्योंकि उनके चित में सदा प्रमाद, विषाद, ममता, ग्लानि, ईर्ष्या, भय, माया चित्रित रहती है। यह सभी दोष मोह के परिवार हैं, इन्हीं कारणों से स्त्रियों की उसी पर्याय में मुक्ति नहीं होती है। क्योंकि मोह, मुक्ति का विरोधी है। आचार्य संघ के सानिध्य में प्रातःकाल श्रीजी का पंचामृत अभिषेक हुआ।</p>
<p><strong>कहानी के माध्यम से महत्व बताया</strong></p>
<p>इसके बाद आर्यिकाश्री महायशमति और श्री दिव्ययशमति के प्रवचन हुए। आर्यिका श्री दिव्ययशमतिजी ने कहानी के माध्यम से समय का और मानव जीवन का सदुपयोग देव शास्त्र गुरु, तप, संयम, त्याग में करने का महत्व बताया। श्री महायशमति ने श्रावक का अर्थ प्रतिपादित किया।</p>
<p><strong>इनकी उपस्थिति रहीं</strong></p>
<p>करणमल मैदावत अनिरुद्ध ने बताया कि प्रवचन सभा में अजीतमल, वरदीचंद सेठ, रजत पचौरी, निर्मल दोषी, प्रद्युमन मेदावत वीना पचौरी सहित अनेक भक्त उपस्थित रहे। शाम को श्रीजी और आचार्यश्री की आरती के बाद श्रावक संस्कार शिविर की कक्षा मुनिश्री हितेंद्र सागरजी द्वारा तथा बच्चों की कक्षा आर्यिका संघ द्वारा ली जाती है।</p>
<p><strong>दिवंगत श्रुतमति माताजी को विनियांजलि दी गई </strong></p>
<p>दाहोद के पास दिवंगत आर्यिकाश्री श्रुतमति माताजी को समाज के द्वारा विनियांजलि दी गई जिसमें अध्यक्ष करणमल मैदावत ,अनिरुद्ध, ऋषभ, हेमलता, अभिषेक आदि ने अपनी भावांजलि प्रस्तुत की।</p>
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