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	<title>दिगम्बर जैन मठ &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<description>ताज़ा खबरे हिन्दी में</description>
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		<title>मनुष्य भव में करें क्रोधाग्नि, कामाग्नि और जठराग्नि से मुक्त होने का प्रयास : श्रमण निरंतर अपनी साधना, त्याग और तपस्या से बुझाते हैं इन अग्नियों को </title>
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		<pubDate>Fri, 20 Dec 2024 00:30:25 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[संसार में फंसा मनुष्य क्रोधाग्नि, जठराग्नि के वशीभूत होकर भवभ्रमण करता है और अति संक्लेशों से मरकर नरकादि में गिर जाता है। यह मनुष्य भव और जिनधर्म असीम पुण्योदय से प्राप्त होता है। मनुष्य को इस भव में क्रोधाग्नि, कामाग्नि और जठराग्नि से मुक्त होने का प्रयास करना चाहिए। ये तीन अग्नियां क्या हैं? इस [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>संसार में फंसा मनुष्य क्रोधाग्नि, जठराग्नि के वशीभूत होकर भवभ्रमण करता है और अति संक्लेशों से मरकर नरकादि में गिर जाता है। यह मनुष्य भव और जिनधर्म असीम पुण्योदय से प्राप्त होता है। मनुष्य को इस भव में क्रोधाग्नि, कामाग्नि और जठराग्नि से मुक्त होने का प्रयास करना चाहिए। ये तीन अग्नियां क्या हैं? <span style="color: #ff0000">इस पर पढ़िए परम पूज्य स्वस्ति श्री चारुकीर्ति भट्टारक स्वामीजी, दिगम्बर जैन मठ, श्रवणबेलगोला का यह विशेष आलेख&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p>मोक्षमार्ग को प्रशस्त करने वाली श्रमण परंपरा में श्रमणों का महत्व सर्वविदित है। दिगम्बर जैन श्रमण परंपरा के पथिक त्याग धारण कर अपने कर्मों की निर्जरा करते हैं और स्वयं आत्मकल्याण प्राप्त कर हम सभी को आत्मकल्याण का मार्ग दिखाते हैं। संसार में फंसा मनुष्य क्रोधाग्नि, जठराग्नि के वशीभूत होकर भवभ्रमण करता है और अति संक्लेशों से मरकर नरकादि में गिर जाता है। यह मनुष्य भव और जिनधर्म असीम पुण्योदय से प्राप्त होता है। मनुष्य को इस भव में क्रोधाग्नि, कामाग्नि और जठराग्नि से मुक्त होने का प्रयास करना चाहिए। ये तीन अग्नियां क्या हैं?</p>
<p>1. क्रोधाग्नि:</p>
<p>यह चौखाना होती है, क्रोध चार प्रकार से होता है। आचार्यों ने बताया है कि अनंतानुबंधी, प्रत्याख्यान, अप्रत्याख्यान और संज्वलन—इन प्रकारों से यह क्रोधाग्नि चौखाना होती है। मनुष्य इस अग्नि में जल-जलकर वैर धारण करता है और भवभ्रमण करता रहता है। दिगम्बर श्रमण निरंतर स्वाध्याय, ध्यान और तपस्या में रत होकर इस क्रोधाग्नि को बुझा लेते हैं और क्रोधाग्नि पर विजय प्राप्त करते हैं।</p>
<p>2. कामाग्नि:</p>
<p>यह मनुष्य के जीवन में तीन प्रकार से आती है—भूमि, स्त्री और सोना (स्वर्ण या धन)। इन तीनों कामाग्नियों के पीछे मनुष्य सारा जीवन परेशान रहता है और अंत में पछताते हुए जीवन समाप्त कर लेता है। भूमि (जमीन) के टुकड़ों के पीछे एक-दूसरे को मारना, लड़ना—सारा जीवन इसी में बर्बाद हो जाता है। स्त्री (स्वी) को मिल जाए तो भी वह स्त्री के मोह में उलझा रहता है, और अगर नहीं मिलती, तो वह निरंतर स्त्री से सुख की वांछा रखता है। मनुष्य चाहता है कि स्त्री से पुत्र मिले, फिर पोता और पड़पोता मिले, इस तरह वह संसार के परिभ्रमण का मार्ग प्रशस्त करता जाता है।</p>
<p>इसी प्रकार धन (सोना) प्राप्त करने की तीव्र आकांक्षा भी मनुष्य की होती है। वह जीवन भर धन कमाने के मोह में उलझा रहता है। कहा जाता है कि मनुष्य पेट भरने के लिए रुपया कमाने समुद्री जहाज से विदेश चला जाता है। वहाँ वह रुपया (धन) कमाने में इतना मस्त हो जाता है कि बड़े-बड़े समुद्री जहाज भर-भरकर वापस आ जाते हैं, लेकिन वह वही का वही रह जाता है, क्योंकि यह पेट कभी नहीं भरता।</p>
<p>3. जठराग्नि:</p>
<p>यह गोल (शून्य) होती है, पेट का द्वार ‘मुंह’ गोल होता है, पेट गोल होता है, और इस पेट में जितना डालो, वह सब ‘गोल’ (गायब) हो जाता है। मनुष्य कभी तृप्त नहीं हो पाता। यह पेट ‘मिक्सर’ की तरह सब कुछ पीसकर हजम कर लेता है। पेट में क्या डालना, क्या नहीं—मनुष्य को इसका ज्ञान ही नहीं होता और वह जठराग्नि में जलकर अपना जीवन बर्बाद कर लेता है।</p>
<p>क्रोधाग्नि, कामाग्नि और जठराग्नि को पुष्ट करना वैसे ही है जैसे आग में घी डालना। इन अग्नियों को बुझाकर ही आत्मकल्याण किया जा सकता है। दिगम्बर जैन श्रमण निरंतर अपनी साधना, त्याग और तपस्या से इन अग्नियों को बुझाते हैं और क्रोधाग्नि को क्षमा और वीरत्व से, कामाग्नि को वीतरागत्व से, जठराग्नि को निराहारत्व से जीतते हैं। महापुराण में वर्णित है कि दिगम्बर श्रमण इन तीन अग्नियों पर साधना से विजय प्राप्त करते हैं।</p>
<p>हमें भी दिगम्बर श्रमणों के सान्निध्य में रहकर इन पर विजय प्राप्त करने का उपाय करना चाहिए, क्योंकि दिगम्बर गुरु ही हमें अज्ञानता से उबारकर आत्मज्ञान कराते हैं।</p>
<p>यह हमारा सौभाग्य है कि वर्तमान समय में दिगम्बर आचार्य और मुनिराज उपलब्ध हैं, जो हमें सही मार्ग दिखलाते हैं। उन सभी दिगम्बर श्रमणों को चंदन है, जो क्रोधाग्नि, कामाग्नि और जठराग्नि को बुझाने का प्रयास कर रहे हैं और इस पंचम काल में हमें सहज रूप से उपलब्ध होकर हमारा मार्ग प्रशस्त कर रहे हैं। सभी दिगम्बर श्रमणों को त्रिकाल नमोस्तु!</p>
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