<?xml version="1.0" encoding="UTF-8"?><rss version="2.0"
	xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/"
	xmlns:wfw="http://wellformedweb.org/CommentAPI/"
	xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"
	xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom"
	xmlns:sy="http://purl.org/rss/1.0/modules/syndication/"
	xmlns:slash="http://purl.org/rss/1.0/modules/slash/"
	>

<channel>
	<title>दसलक्षण &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
	<atom:link href="https://www.shreephaljainnews.com/tag/%E0%A4%A6%E0%A4%B8%E0%A4%B2%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B7%E0%A4%A3/feed/" rel="self" type="application/rss+xml" />
	<link>https://www.shreephaljainnews.com</link>
	<description>ताज़ा खबरे हिन्दी में</description>
	<lastBuildDate>Thu, 04 Sep 2025 12:25:50 +0000</lastBuildDate>
	<language>en-US</language>
	<sy:updatePeriod>
	hourly	</sy:updatePeriod>
	<sy:updateFrequency>
	1	</sy:updateFrequency>
	<generator>https://wordpress.org/?v=6.9.4</generator>

<image>
	<url>https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2022/09/cropped-shri-32x32.png</url>
	<title>दसलक्षण &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
	<link>https://www.shreephaljainnews.com</link>
	<width>32</width>
	<height>32</height>
</image> 
	<item>
		<title>त्याग जीवन का सुख और राग दुख का कारण: आचार्य श्री निर्भय सागरजी ने उत्तम त्याग धर्म को जीवन का मूल बताया  </title>
		<link>https://www.shreephaljainnews.com/sacrifice_is_the_happiness_of_life_and_attachment_is_the_cause_of_sadness/</link>
					<comments>https://www.shreephaljainnews.com/sacrifice_is_the_happiness_of_life_and_attachment_is_the_cause_of_sadness/#respond</comments>
		
		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 04 Sep 2025 12:25:50 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[समाचार]]></category>
		<category><![CDATA[Acharya Shri Nirbhay Sagarji]]></category>
		<category><![CDATA[Acharya Shri Vidyasagarji Maharaj]]></category>
		<category><![CDATA[Acharya Shri Vipul Sagar Ji Maharaj]]></category>
		<category><![CDATA[Acharyashree Abhinandansagar Ji Maharaj]]></category>
		<category><![CDATA[Daslakshan]]></category>
		<category><![CDATA[Digambar Jain]]></category>
		<category><![CDATA[Digambar Sadhu]]></category>
		<category><![CDATA[jain community]]></category>
		<category><![CDATA[Jain muni]]></category>
		<category><![CDATA[jain news]]></category>
		<category><![CDATA[jain sadhvi]]></category>
		<category><![CDATA[Jain Society]]></category>
		<category><![CDATA[Lord Abhishek]]></category>
		<category><![CDATA[Paryushan festival]]></category>
		<category><![CDATA[Shantidhara]]></category>
		<category><![CDATA[Shri Parshvanath Digambar Jain Ata Temple]]></category>
		<category><![CDATA[Shriphal Jain News]]></category>
		<category><![CDATA[आचार्य श्री निर्भय सागरजी महाराज]]></category>
		<category><![CDATA[आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज]]></category>
		<category><![CDATA[आचार्य श्री विपुल सागर जी महाराज]]></category>
		<category><![CDATA[आचार्यश्री अभिनंदनसागर जी महाराज]]></category>
		<category><![CDATA[जैन न्यूज]]></category>
		<category><![CDATA[जैन मुनि]]></category>
		<category><![CDATA[जैन समाचार]]></category>
		<category><![CDATA[जैन समाज]]></category>
		<category><![CDATA[जैन समुदाय]]></category>
		<category><![CDATA[जैन साध्वी]]></category>
		<category><![CDATA[दसलक्षण]]></category>
		<category><![CDATA[दिगंबर जैन]]></category>
		<category><![CDATA[दिगंबर साधु]]></category>
		<category><![CDATA[पर्युषण पर्व]]></category>
		<category><![CDATA[प्रभु अभिषेक]]></category>
		<category><![CDATA[शांतिधारा]]></category>
		<category><![CDATA[श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन मंदिर]]></category>
		<category><![CDATA[श्रीफल जैन न्यूज]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://www.shreephaljainnews.com/?p=89698</guid>

					<description><![CDATA[त्याग के माध्यम से जीवन की उन्नति का मार्ग प्रशस्त होता है। जैसे-जैसे वस्तु का त्याग करते जाते हैं। वैसे-वैसे जीवन की उन्नति होती चली जाती है। त्याग में सुख है। राग में दुख इसलिए हमें त्याग धर्म को स्वीकारना चाहिए। ललितपुर से पढ़िए, यह खबर&#8230; ललितपुर। त्याग के माध्यम से जीवन की उन्नति का [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>त्याग के माध्यम से जीवन की उन्नति का मार्ग प्रशस्त होता है। जैसे-जैसे वस्तु का त्याग करते जाते हैं। वैसे-वैसे जीवन की उन्नति होती चली जाती है। त्याग में सुख है। राग में दुख इसलिए हमें त्याग धर्म को स्वीकारना चाहिए। <span style="color: #ff0000">ललितपुर से पढ़िए, यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>ललितपुर।</strong> त्याग के माध्यम से जीवन की उन्नति का मार्ग प्रशस्त होता है। जैसे-जैसे वस्तु का त्याग करते जाते हैं। वैसे-वैसे जीवन की उन्नति होती चली जाती है। त्याग में सुख है। राग में दुख इसलिए हमें त्याग धर्म को स्वीकारना चाहिए। पर पदार्थ को पूर्ण रूप से त्यागना ही सबसे बड़ा दान बताते हुए आचार्य श्री निर्भय सागर जी ने कहा कि इसे यथा समय करते रहना चाहिए। पर्युषण पर्व पर श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन अटा मंदिर में आचार्य श्री निर्भय सागरजी ने त्याग को मुक्ति का द्वार बताया। उन्हांेने कहा कुछ समय का त्याग भी आपको मुक्ति प्रदान कराने में सहयोगी होता है। उन्होंने कहा त्याग के दिन पूजा अनुष्ठान का जो अवसर मिल रहा है। इसे आप लोग मोह, राग, द्वेष का त्याग कर प्रभु की भक्ति कर रहे हैं। यह त्याग आपको महान बनाएगा।</p>
<p><strong> त्याग हमारी आत्मा को स्वस्थ और सुंदर बनाता है</strong></p>
<p>धर्म सभा का शुभारंभ आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज, आचार्यश्री अभिनंदनसागर जी महाराज, आचार्य श्री विपुल सागर जी महाराज के चित्र के सम्मुख दीप प्रज्जवलित जैन पंचायत अध्यक्ष का अक्षय टड़या ने किया। प्रारंभ में तत्वार्थ सूत्र का वाचन आचार्य संघ के सानिध्य में हुआ। प्रातःकाल आचार्य श्री के सानिध्य में श्रावकों को ध्यान की साधना कराई। संचालन महामंत्री डॉ.आकाश जैन ने किया। अमिनंदनोदय तीर्थ में मुनिश्री सुदत्त सागर महाराज एवं मुनिश्री पद्मदत्त सागर महाराज के सानिध्य में श्रावकों ने पर्वराज पर्यूषण पर्व पर प्रभु अभिषेक शांतिधारा की। इस दौरान उन्होंने कहा कि त्याग हमारी आत्मा को स्वस्थ और सुंदर बनाता है। जिसको धारण करने में सुख मिलता है। उन्हांेने कहा कि त्याग हमें परिग्रह से मुक्ति दिलाता है। त्याग एक ऐसा धर्म है। जिसके बिना हमारा जीवन कष्टमय हो जाता है। उन्होंने प्रेरक प्रसंगों के माध्यम से श्रावकों को त्याग धर्म से जुड़ने के लिए प्रेरित किया।</p>
<p><strong>पूजन, अभिषेक विधान हो रहे</strong></p>
<p>पर्यूषण पर्व पर नगर के प्रमुख मंदिर अभिनंदनोदय तीर्थ, जैन अटामंदिर, आदिनाथ बडा मंदिर, पार्श्व नया मंदिर, आदिनाथ मंदिर गांधीनगर, चंद्रप्रभु मंदिर डोडाघाट, शांतिनगर मंदिर गांधीनगर इलाइट जैन मंदिर, सिविल लाइन बाहुबलिनगर पार्श्वनाथ कॉलोनी एमब्रोशिया कॉलोनी में पहुंचकर प्रातःकाल से पूजन अभिषेक के साथ श्रावक पर्युषण पर्व की पूजन एवं मध्यान्ह में जैन मंदिरों में समवशरण विधान, पंचकल्याणक विधान, पंच परमेष्ठी विधान, कर्मदहन विधान, नवग्रह पूजन विधान, वृत उद्यापन आदि में सम्मलित होकर पुर्याजन कर रहे हैं।</p>
<p><strong>प्रतियोगिताओं के विजेताओं को पुरस्कृत किया </strong></p>
<p>कई जगह मनोहारी झांकियों की रचनाएं बच्चों की टोलियों द्वारा की गई। जिनको श्रद्धालुजन प्रोत्साहित कर रहे हैं। सायंकाल जैन अटामंदिर में अखिल भरतीय दिगंबर जैन महिला परिषद के तत्वावधान में अष्टप्रातिहार्य प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिता हुई। जिसका संयोजन संरक्षक वीणा जैन, अनीता मोदी, डिम्पल जैन ने किया। जैन परिषद के अध्यक्ष अजय जैन साइकिल महामंत्री अक्षय अलया, प्रबंधक मनोज जैन बबीना, अजय जैन गंगचारी, सन्मति सराफ, देवेन्द्र जैन डिस्को, डॉ अजय जैन ने पुरस्कृत किया। प्रतियोगिता अलका जैन, प्रीति मोहनी, सरिता जैन, अंजना बुखारिया, संगीता जैन आदि प्रमुख रहे। अभिनंदनोदय तीर्थ में जिनवाणी सेवा मंडल द्वारा भारतीय परिधान प्रतियोगिता हुई। जबकि पार्श्वनाथ जैन नया मंदिर में पाठशाला परिवार द्वारा भाग्य और पुरुषार्थ विषयक प्रतियोगिता में प्रतिभागी सम्मलित हुए।</p>
]]></content:encoded>
					
					<wfw:commentRss>https://www.shreephaljainnews.com/sacrifice_is_the_happiness_of_life_and_attachment_is_the_cause_of_sadness/feed/</wfw:commentRss>
			<slash:comments>0</slash:comments>
		
		
			</item>
		<item>
		<title>ऊंची सोच से ही मनुष्य की उन्नति संभव है : मुनि श्री प्रमाणसागर जी ने चार प्रकार के दान करने की प्रेरणा दी  </title>
		<link>https://www.shreephaljainnews.com/mans_progress_is_possible_only_with_high_thinking/</link>
					<comments>https://www.shreephaljainnews.com/mans_progress_is_possible_only_with_high_thinking/#respond</comments>
		
		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 04 Sep 2025 11:15:52 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[समाचार]]></category>
		<category><![CDATA[Daslakshan]]></category>
		<category><![CDATA[Digambar Jain]]></category>
		<category><![CDATA[Digambar Sadhu]]></category>
		<category><![CDATA[jain community]]></category>
		<category><![CDATA[Jain muni]]></category>
		<category><![CDATA[jain news]]></category>
		<category><![CDATA[jain sadhvi]]></category>
		<category><![CDATA[Jain Society]]></category>
		<category><![CDATA[Muni Shri Praman Sagar ji]]></category>
		<category><![CDATA[Shriphal Jain News]]></category>
		<category><![CDATA[Uttam Tyag Dharma]]></category>
		<category><![CDATA[उत्तम त्याग धर्म]]></category>
		<category><![CDATA[जैन न्यूज]]></category>
		<category><![CDATA[जैन मुनि]]></category>
		<category><![CDATA[जैन समाचार]]></category>
		<category><![CDATA[जैन समाज]]></category>
		<category><![CDATA[जैन समुदाय]]></category>
		<category><![CDATA[जैन साध्वी]]></category>
		<category><![CDATA[दसलक्षण]]></category>
		<category><![CDATA[दिगंबर जैन]]></category>
		<category><![CDATA[दिगंबर साधु]]></category>
		<category><![CDATA[मुनि श्री प्रमाणसागर जी]]></category>
		<category><![CDATA[श्रीफल जैन न्यूज]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://www.shreephaljainnews.com/?p=89677</guid>

					<description><![CDATA[निःस्वार्थ भाव से दिया गया दान सच्चा और प्रभावी होता है। जिससे दानदाता को व्यक्तिगत संतुष्टि मिलती है। उदारता और करुणा का विकास होता है तथा अहंकार का विनाश होता है। यह उद्गार मुनि श्री प्रमाणसागर जी महाराज ने उत्तम त्याग धर्म पर व्यक्त किए। भोपाल से पढ़िए, अविनाश जैन विद्यावाणी की यह खबर&#8230; भोपाल [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>निःस्वार्थ भाव से दिया गया दान सच्चा और प्रभावी होता है। जिससे दानदाता को व्यक्तिगत संतुष्टि मिलती है। उदारता और करुणा का विकास होता है तथा अहंकार का विनाश होता है। यह उद्गार मुनि श्री प्रमाणसागर जी महाराज ने उत्तम त्याग धर्म पर व्यक्त किए। <span style="color: #ff0000">भोपाल से पढ़िए, अविनाश जैन विद्यावाणी की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>भोपाल (अवधपुरी)।</strong> निःस्वार्थ भाव से दिया गया दान सच्चा और प्रभावी होता है। जिससे दानदाता को व्यक्तिगत संतुष्टि मिलती है। उदारता और करुणा का विकास होता है तथा अहंकार का विनाश होता है। यह उद्गार मुनि श्री प्रमाणसागर जी महाराज ने उत्तम त्याग धर्म पर व्यक्त किए मुनि श्री ने कहा कि दान देय मन हर्ष विशेषे,इह भव पर भव सुख दीसे। अच्छे पुण्य के संयोग रोज-रोज नहीं मिलते जब भी ऐसा अवसर मिले तो कभी अपना मन ओछा मत करना, कुछ नहीं तो जो है उसी में से अपना अंशदान अवश्य करना। धन का सदव्यय करने की समझ जिसके पास होती है। उसके हाथ हमेशा दान देने के लिए ही ऊपर उठते है। पुण्य ही जीवन की प्रगति का आधार है भगवान से प्राथना करो कि मेरे हाथों से रोजाना दान निकलना चाहिये। बड़ी सोच ही जीवन को सार्थक बनाती है। ओछी सोच हमेशा पश्चाताप कराती है।</p>
<p><strong>दान का महत्व असीम है</strong></p>
<p>मुनि श्री ने रविन्द्रनाथ टैगोर की एक कहानी सुनाते हुए कहा कि भिखारी भीख मांगने के लिए अपनी झोली में कुछ चावल के दाने लेकर निकला। सामने से राजा का रथ आता देख उसने सोचा कि आज तो भीख अच्छी मिलेगी। वह झोली फैलाने के भाव से आगे बढ़ा उधर, राजा अपने रथ से नीचे उतरा और उसने भिखारी के सामने अपनी झोली फैला दी और कहा कि राज्य पर आर्थिक संकट है। ज्योतिष के अनुसार जिस पर सबसे पहली नजर पड़े, उसके सामने झोली पसारना और वह जो भी दे उसे लेकर आना। उससे तुम्हारे राज्य का कोष बढ़ जाएगा। राजा ने विनम्रता से उस भिखारी से कहा-जो कुछ भी तुम्हारे पास है उसे दे दो। भिखारी बहूत सकुचाया और उसने अपनी झोली से एक दाना चावल निकाला और उसकी झोली में डाल दिया, लेकिन मन में भारीपन था कि राजा ने उससे गांठ का एक दाना और ले लिया। हालांकि उसे उस दिन बहुत भिक्षा मिली। भारी मन से घर आया। पत्नी ने उसकी झोली उड़ेली तो उसमें एक दाना सोने का चमक रहा था। उसने अपना माथा पकड़ लिया। अरे मैंने यह क्या कर दिया। राजा को यदि पूरी झोली उड़ेल देता तो आज पूरी झोली सोने की होती।</p>
<p><strong>दान अंश का होता है तथा त्याग सर्वस्व का होता है</strong></p>
<p>मुनि श्री ने कहा कि देखा दान का प्रभाव। इसीलिये कहा गया है कि जब भी कोई दान मांगने तुम्हारे द्वार पर आये तो उसे खाली हाथ मत लौटाना। उसको अंश दान अवश्य करना। देने का भाव बनाए रखोगे तो जीवन का रास्ता अवश्य प्रशस्त होगा। मुनि श्री ने कहा कि दान हमेशा अंश का ही होता है। सर्वस्व का दान और संपूर्ण धन का त्याग कभी मत करना। हमेशा अपने लिए बचा कर रखना। दान अंश का होता है तथा त्याग सर्वस्व का होता है।</p>
<p><strong>दान न किया तो धन व्यर्थ जाएगा</strong></p>
<p>मुनि श्री ने कहा कि गरीबी की दशा में दान देने से पुण्य और बढ़ता है। उन्होंने चार बाक्य पाना, खोना, देना, सोना कि चर्चा को आगे बढ़ाते हुए कहा कि मान लीजिये यदि आप पेट में भोजन डालते जाओ और मल विसर्जन न हो तो क्या होगा? बेचैनी होगी। उसी प्रकार आप अपनी कमाई को करते रहोगे और उसे यदि अच्छे कार्यों में नहीं लगाओगे तो वह व्यसन एवं बीमारी, कोर्ट कचहरी आदि में आपका धन जाएगा। इसलिए कहा गया है कि पाना खोना देना और सोना अच्छे कार्यों में दोगे तो आपका जीवन सोने के समान चमकेगा। इस अवसर पर मुनि श्री संघान सागर महाराज एवं क्षुल्लक गण मंचासीन थे। त्याग धर्म के दिवस पर कयी श्रद्धालुओं ने जीवदया के निमित्त से अपने दान की घोषणा की। वही विद्याप्रमाण गुरुकुलम् की योजनाओं में अपने दान की स्वीकृति प्रदान की। संचालन अशोक भैया ने किया।</p>
]]></content:encoded>
					
					<wfw:commentRss>https://www.shreephaljainnews.com/mans_progress_is_possible_only_with_high_thinking/feed/</wfw:commentRss>
			<slash:comments>0</slash:comments>
		
		
			</item>
		<item>
		<title>पर्युषण महापर्व एक सितम्बर से प्रारम्भ : आत्मा की शुद्धि के लिए करेंगे तप व जप </title>
		<link>https://www.shreephaljainnews.com/do_penance_and_chanting_for_purification_of_the_soul/</link>
					<comments>https://www.shreephaljainnews.com/do_penance_and_chanting_for_purification_of_the_soul/#respond</comments>
		
		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 29 Aug 2024 08:51:17 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[आलेख]]></category>
		<category><![CDATA[Chaturmas]]></category>
		<category><![CDATA[Dasallakshana]]></category>
		<category><![CDATA[Digambar Jain]]></category>
		<category><![CDATA[Digambar Sadhu]]></category>
		<category><![CDATA[discourse]]></category>
		<category><![CDATA[jain community]]></category>
		<category><![CDATA[Jain muni]]></category>
		<category><![CDATA[jain news]]></category>
		<category><![CDATA[jain sadhvi]]></category>
		<category><![CDATA[Jain Society]]></category>
		<category><![CDATA[Paryushan Mahaparva]]></category>
		<category><![CDATA[religious meeting]]></category>
		<category><![CDATA[Shraman Dr. Pushpendra  श्रीफल जैन न्यूज]]></category>
		<category><![CDATA[shreephal jain news]]></category>
		<category><![CDATA[चातुर्मास]]></category>
		<category><![CDATA[जैन न्यूज]]></category>
		<category><![CDATA[जैन मुनि]]></category>
		<category><![CDATA[जैन समाचार]]></category>
		<category><![CDATA[जैन समाज]]></category>
		<category><![CDATA[जैन समुदाय]]></category>
		<category><![CDATA[जैन साध्वी]]></category>
		<category><![CDATA[जैन सोसायटी]]></category>
		<category><![CDATA[दसलक्षण]]></category>
		<category><![CDATA[दिगंबर जैन]]></category>
		<category><![CDATA[दिगंबर साधु]]></category>
		<category><![CDATA[धर्मसभा]]></category>
		<category><![CDATA[पर्युषण महापर्व]]></category>
		<category><![CDATA[प्रवचन]]></category>
		<category><![CDATA[श्रमण डॉ पुष्पेन्द्र]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://www.shreephaljainnews.com/?p=65076</guid>

					<description><![CDATA[जैन धर्म के पर्युषण पर्व मनुष्य को उत्तम गुण अपनाने की प्रेरणा हैं। इन दिनों जैन धर्मावलंबी व्रत, तप, साधना कर आत्मा की शुद्धि का प्रयास करते हैं और स्वयं के पापों की आलोचन करते हुए भविष्य में उनसे बचने की प्रतिज्ञा करते हैं। इस पर्व का मुख्य उद्देश्य आत्मा को शुद्ध बनाने के लिए [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>जैन धर्म के पर्युषण पर्व मनुष्य को उत्तम गुण अपनाने की प्रेरणा हैं। इन दिनों जैन धर्मावलंबी व्रत, तप, साधना कर आत्मा की शुद्धि का प्रयास करते हैं और स्वयं के पापों की आलोचन करते हुए भविष्य में उनसे बचने की प्रतिज्ञा करते हैं। इस पर्व का मुख्य उद्देश्य आत्मा को शुद्ध बनाने के लिए आवश्यक उपक्रमों पर ध्यान केंद्रित करना होता है। <span style="color: #ff0000">श्रमण डॉ. पुष्पेन्द्र का विशेष आलेख&#8230;.</span></strong></p>
<hr />
<p>जैन धर्म के पर्युषण पर्व मनुष्य को उत्तम गुण अपनाने की प्रेरणा हैं। इन दिनों जैन धर्मावलंबी व्रत, तप, साधना कर आत्मा की शुद्धि का प्रयास करते हैं और स्वयं के पापों की आलोचन करते हुए भविष्य में उनसे बचने की प्रतिज्ञा करते हैं। इस पर्व का मुख्य उद्देश्य आत्मा को शुद्ध बनाने के लिए आवश्यक उपक्रमों पर ध्यान केंद्रित करना होता है। जैन धर्म में सबसे महत्वपूर्ण त्योहारों में से एक है पर्युषण महापर्व। श्वेतांबर व दिगंबर समुदाय के धर्मावलंबी भाद्रपद मास में “पर्युषण महापर्व” की साधना &#8211; आराधना करते है। श्वेतांबर समुदाय के आठ दिवस को “पर्युषण” के नाम से जाना जाता है जो कि दिनांक 1 सितम्बर से प्रारम्भ होंगें तथा 8 सितम्बर को “संवत्सरी महापर्व” (क्षमापर्व) के दिवस के साथ पूर्ण होंगे। वहीं दिगम्बर समुदाय के दस दिवसों को “दस लक्षण पर्व” के नाम से जाना गया हो जो कि 8 सितंबर से शुरू होकर अनंत चतुर्दशी 17 सितंबर को समाप्त होंगे।</p>
<p>चातुर्मास प्रारम्भ के उनपचास(49) या पचासवें (50) दिवस पर संवत्सरी पर्व की साधना की जाती है। इसी क्रम में देश के विविध अंचलों चातुर्मासरत श्रमण &#8211; श्रमणियों के पावन सान्निध्य में जैन धर्मावलम्बि तप &#8211; त्याग &#8211; साधना &#8211; आराधना पूर्वक इस महापर्व को मनाएगें। इन दिवसों में जैन अनुयायियों के मुख्यतया पांच प्रमुख अंग हैं स्वाध्याय, उपवास, प्रतिक्रमण, क्षमायाचना और दान। पर्युषण पर्व के दौरान प्रतिदिन जैन स्थानकों में स्वाध्याय के रूप में निरंतर धार्मिक प्रवचन होंगे। जो कि प्रातःकाल होगें। इसमें सर्वप्रथम जैन आगम सूत्र “अन्तकृत दशांग सूत्र” का प्रतिदिन मूल व भावार्थ के साथ वाचन पश्चात् स्वाध्याय के विशिष्ट गुणों, सेवा, संयम, साधना, ध्यान, सद् व्यवहार पर प्रवचन होंगे। प्रतिदिन सुबह व सांयकाल प्रतिक्रमण होंगे जो आत्मशुद्धि के लिए नितांत आवश्यक हैं। आठवें दिवस संवत्सरी महापर्व पर विस्तृत स्व आलोचना का पाठ होगा जिसमें जीवन भर के अंदर होने वाली पाप प्रवृत्तियों का उल्लेख करते हुए आत्मालोचना कर “मिच्छामि दुक्कड़म्” किया जाएगा।</p>
<p><strong>सादा भोजन व सादगी पूर्ण जीवन व्यतीत करेंगे &#8211;</strong></p>
<p>पर्युषण महापर्व के दौरान जैन धर्मावलम्बि सादे भोजन पर जोर देते है है जो कि बिना हरी सब्जियों के बनाया जाएगा। इसका मुख्य कारण यह है कि स्वाद आसक्ति का त्याग जैन धर्म में प्रमुख तौर पर बताया गया है उसी के अनुरूप जैन अनुयायी इसका पालन करते है। सूर्यास्त होने के बाद भोजन भी नहीं करेंगे। अधिक से अधिक सादगी &#8211; त्याग पूर्वक जीवन यापन करेगें।</p>
<p><strong>पर्युषण का अर्थ आत्मचिंतन और नवीनीकरण का उत्सव &#8211;</strong></p>
<p>श्रमण डॉ. पुष्पेन्द्र ने बताया कि पर्युषण पर्व जिसे क्षमा पर्व के नाम से भी जाना जाता है, पर्युषण का अर्थ दो शब्दों परि (स्वयं को याद करना) और वासन (स्थान) से लिया गया है. इसका मतलब है कि इस उत्सव के दौरान सभी जैन एक साथ आते हैं और अपने मानसिक और आध्यात्मिक विकास के लिए एक साथ उपवास और ध्यान करते हैं. जैन धर्म में अहिंसा एवं आत्मा की शुद्धि को सर्वोपरि स्थान दिया गया है. मान्यता है कि प्रत्येक समय हमारे द्वारा किये गये अच्छे या बुरे कार्यों से कर्म बंध होता है, जिनका फल हमें भोगना पड़ता है. शुभ कर्म जीवन व आत्मा को उच्च स्थान तक ले जाते हें, वही अशुभ कर्मों से हमारी आत्मा मलिन होती है. जिसको पवित्र व स्वच्छ करने के लिए पर्युषण पर्व की आराधना की जाती है।</p>
<p>उल्लेखनीय है कि श्वेतांबर जैन समुदाय में पर्युषण पर्व का आरंभ भादौ के कृष्ण पक्ष से ही होता है जो भादौ के शुक्ल पक्ष पर संवत्सरी से पूर्ण होता है। यह इस बात का संकेत है कि कृष्ण पक्ष यानी अंधेरे को दूर करते हुए शुक्ल पक्ष यानी उजाले को प्राप्त कर लो। हमारी आत्मा में भी कषायों अर्थात क्रोध &#8211; मान &#8211; माया &#8211; लोभ का अंधेरा छाया हुआ है। इसे पर्युषण के पवित्र प्रकाश से दूर किया जा सकता है।</p>
]]></content:encoded>
					
					<wfw:commentRss>https://www.shreephaljainnews.com/do_penance_and_chanting_for_purification_of_the_soul/feed/</wfw:commentRss>
			<slash:comments>0</slash:comments>
		
		
			</item>
	</channel>
</rss>
