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	<title>दशलक्षण विधान &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>कठिन समय मजबूत बनाता है और कष्ट सहने से निखरता है इंसान: मुनि श्री प्रमाणसागर ने संस्कार शिविर में उत्तम तप को श्रेष्ठ बताया </title>
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		<pubDate>Wed, 03 Sep 2025 12:21:42 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[भोपाल (अवधपुरी) में दशलक्षण पर्व के तहत संस्कार शिविर चल रहा है। इसमें मुनिश्री प्रमाणसागर जी महाराज मंगल देशना देकर धर्म की प्रभावना कर रहे हैं। शिविर में संपूर्ण भारत से शिविरार्थी आए हैं। इन्हें मुनिराज के प्रवचनों का लाभ मिल रहा है। भोपाल अवधपुरी से पढ़िए, राजीव सिंघई मोनू की यह खबर&#8230;  भोपाल(अवधपुरी)। यहां [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>भोपाल (अवधपुरी) में दशलक्षण पर्व के तहत संस्कार शिविर चल रहा है। इसमें मुनिश्री प्रमाणसागर जी महाराज मंगल देशना देकर धर्म की प्रभावना कर रहे हैं। शिविर में संपूर्ण भारत से शिविरार्थी आए हैं। इन्हें मुनिराज के प्रवचनों का लाभ मिल रहा है। <span style="color: #ff0000">भोपाल अवधपुरी से पढ़िए, राजीव सिंघई मोनू की यह खबर&#8230; </span></strong></p>
<hr />
<p><strong>भोपाल(अवधपुरी)।</strong> यहां दशलक्षण पर्व के तहत संस्कार शिविर चल रहा है। इसमें मुनिश्री प्रमाणसागर जी महाराज मंगल देशना देकर धर्म की प्रभावना कर रहे हैं। शिविर में संपूर्ण भारत से शिविरार्थी आए हैं। इन्हें मुनिराज के प्रवचनों का लाभ मिल रहा है। प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया कि सभी शिविरार्थियों ने प्रातः5.30 बजे मुनिश्री के मुखारविंद से लगभग 30 मिनट का भावनायोग किया। इसके बाद भगवान का अभिषेक एवं शांतिधारा हुई। नित्य नियम पूजन के साथ पर्व पूजन एवं दशलक्षण विधान हुआ।</p>
<p>इस अवसर पर मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज ने धर्मसभा में तपस्या का महत्व बताया। उन्होंने कहा कि भोग विलास और मौज मस्ती सभी को अच्छी लगती है और त्याग तपस्या तथा संयम साधना से दूर भागते हैं,जबकि त्याग तपस्या और संयम साधना में ही जीवन की वास्तविकता है। मुनि श्री ने उत्तम तप धर्म पर चार शब्द प्रेय, श्रेय, हेय, ध्येय की व्याख्या करते हुए कहा कि जोअच्छा लगे वह प्रेय है और जो अच्छा बनाए वह श्रेय है। दुनिया प्रेय के पीछे पागल है, उसके पीछे भाग रहे हैं। वह सभी भोगी है,जो श्रैय के पीछे लग जाये वह योगी है।</p>
<p><strong>वह आनंद से भर देता है यह श्रैय है। </strong></p>
<p>मुनि श्री ने कहा कि प्रेय की यात्रा रेत के टीले पर चढ़ने के समान है। जिसमें मखमली अहसास होता है। यह अल्पकालिक ऊंचाई देता है लेकिन, उस पर टिक नहीं पाता, रेत खिसकती है और वह धड़ाम से नीचे आ जाता है। प्रेय क्षणभंगुर, विनाशक तथा मिट जाने वाला है। उन्होंने कहा कि यह सत्य है कि किसी ऊंची पहाड़ी पर चढ़ना, बड़ा कठिन होता है। एक-एक कदम संभल संभल कर चलना पड़ता है। एक कदम भी डगमगाए कि सीधे नीचे। उन्होंने कहा कि चढ़ना भले ही कष्टकारी हो लेकिन, एक बार व्यक्ति पहाड़ के शिखर पर पहुंच जाए तो उसे प्रकृति के रम्य रूप का जो दर्शन होता है वह अदभुत होता है तथा वह आनंद से भर देता है यह श्रैय है।</p>
<p><strong>भोग की इस अंधी दौड़ में आत्मा का सौंदर्य नष्ट होता है </strong></p>
<p>मुनि श्री ने पूछा कि जिसमें कठनाई है लेकिन, अंत अच्छा है तथा जिसमें आराम है अंत बुरा बताइए। आप किसे पसंद करेंगे? मुनि श्री ने कहा कि जीवन में जितना आराम पसंद करोगे,उतने कमजोर बनोगे और जितना कष्ट सहोगे उतने समर्थ बनोगे। एक विचारक ने लिखा कि कठिन समय मजबूत इंसान को जन्म देता है और सरल समय इंसान को कमजोर बनाता है। जितने आराम तलब जीवन को जिओगे उतने कमजोर बनोगे। उत्तम तप धर्म का यही संदेश है। भोग की इस अंधी दौड़ में आत्मा का सौंदर्य धुंधला पड़ता जा रहा है तप का अर्थ केवल उपवास, मौन या शरीर को कष्ट देना नहीं बल्कि वासनाओं की लपटों से अपने आपको बचाए रखना तथा अपनी आत्मा में रमे रहना ही उत्तम तप है। मुनि श्री ने कहा कि सोशल मीडिया से कुछ क्षण का मनोरंजन तो हो सकता है लेकिन, इससे आत्मा की भूख नहीं मिटती। आत्मा के स्थाई आनंद के लिए विलंबित सुख, प्रलोभनों में स्थिर, क्रोध, मोह,राग, द्वेष की स्थिति उत्पन्न होने पर अपने आपको शांत रखना तप है तथा यह मानसिक अनुशासन को सिखाता है। जैसे अग्नि में सोना तप कर कुंदन बनता है वैसे ही संकटों की आंच से आत्मा निखरती है।</p>
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		<title>तारागंज जैन मंदिर में पवित्रता और निर्वाण का संदेश गूंजा : श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन मंदिर में हुआ दशलक्षण विधाना  </title>
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		<pubDate>Mon, 01 Sep 2025 07:51:56 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[ताजगंज के श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन मंदिर में दशलक्षण पर्व के अवसर पर दशलक्षण विधान का भव्य आयोजन चल रहा है। जिसके अंतर्गत रविवार को चौथा दिवस उत्तम शौच धर्म एवं भगवान पुष्पदंत का निर्वाण कल्याणक महोत्सव मनाया गया। आगरा से पढ़िए, शुभम जैन की यह खबर&#8230; आगरा। ताजगंज के श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन मंदिर [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>ताजगंज के श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन मंदिर में दशलक्षण पर्व के अवसर पर दशलक्षण विधान का भव्य आयोजन चल रहा है। जिसके अंतर्गत रविवार को चौथा दिवस उत्तम शौच धर्म एवं भगवान पुष्पदंत का निर्वाण कल्याणक महोत्सव मनाया गया। <span style="color: #ff0000">आगरा से पढ़िए, शुभम जैन की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>आगरा।</strong> ताजगंज के श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन मंदिर में दशलक्षण पर्व के अवसर पर दशलक्षण विधान का भव्य आयोजन चल रहा है। जिसके अंतर्गत रविवार को चौथा दिवस उत्तम शौच धर्म एवं भगवान पुष्पदंत का निर्वाण कल्याणक महोत्सव मनाया गया। प्रातःकाल श्रीजी का अभिषेक शांतिधारा के साथ दिन की शुरुआत हुई। पंडित आदर्श जैन द्वारा उत्तम शौच धर्म की पूजन एवं विधान संपन्न कराया गया। उत्तम शौच धर्म की महिमा का वर्णन करते हुए आत्मा शुद्धि एवं पवित्रता का संदेश दिया। इस अवसर पर भगवान पुष्पदंत के निर्वाण कल्याणक महोत्सव का भी आयोजन हुआ। जिसमें 25 परिवारों ने एक साथ बडे़ निर्वाण लाडू पुष्पदंत भगवान के समक्ष अर्पित कर चरण वंदना की।</p>
<p>इस दौरान पूरे दिन मंदिर परिसर में धर्म भक्ति और उल्लास का दिव्य वातावरण बना रहा। अंत में मंगल पाठ एवं स्वाध्याय के साथ आयोजन का समापन हुआ। इस मौके पर संजयबाबू जैन, विजय जैन, योगेश जैन, विनय जैन, पारस जैन उत्सव जैन, मीना जैन, ऋतु जैन, सपना जैन, रेशी जैन समस्त जैन समाज के लोगों ने बड़ी संख्या में सम्मिलित होकर धर्मलाभ अर्जित किया।</p>
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		<title>मैं न किसी से द्वेष रखूंगा, न अपने भीतर क्रोध पालूंगा: उत्तम क्षमा से कटुता और बदले की भावना का है समाधान -मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज </title>
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		<pubDate>Wed, 27 Aug 2025 10:17:36 +0000</pubDate>
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<p><strong>दशलक्षण पर्व आत्मा की शुद्धि और जागृति का दस दिवसीय महोत्सव है। यह केवल धार्मिक क्रियाओं का क्रम नहीं, बल्कि जीवन के गहन अंतर्द्वंद्वों का समाधान है। यह उद्गार मुनिश्री प्रमाण सागरजी महाराज ने व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि दस धर्मों में प्रथम उत्तम क्षमा सबसे मौलिक, सबसे मानवीय और सबसे प्रासंगिक धर्म है। <span style="color: #ff0000">अवधपुरी भोपाल से पढ़िए, यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>अवधपुरी भोपाल।</strong> दशलक्षण पर्व आत्मा की शुद्धि और जागृति का दस दिवसीय महोत्सव है। यह केवल धार्मिक क्रियाओं का क्रम नहीं, बल्कि जीवन के गहन अंतर्द्वंद्वों का समाधान है। यह उद्गार मुनिश्री प्रमाण सागरजी महाराज ने व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि दस धर्मों में प्रथम उत्तम क्षमा सबसे मौलिक, सबसे मानवीय और सबसे प्रासंगिक धर्म है। यह धर्म उस आग को शांत करता है जो हमारे भीतर क्रोध, अपमान, बदले की भावना और कटु संबंधों के रूप में जलती रहती है। आज का यथार्थ क्षमा क्यों कठिन होती जा रही है क्योंकि, आज के समाज में व्यक्ति की भावनाएं शीघ्र आहत हो जाती हैं। उसने मुझे कुछ कहा था, उसने मेरी उपेक्षा की थी, मैं उसे कभी नहीं माफ करूंगा। ऐसी भावनाएं रिश्तों को विषैला बनाती जा रही हैं। सोशल मीडिया के इस युग में, जहां एक टिप्पणी, एक पोस्ट या एक मैसेज से मन आहत हो जाता है, वहां क्षमा केवल एक धार्मिक शब्द नहीं, बल्कि मानसिक शांति की औषधि बन जाता है। क्षमा धर्म-आत्मा की गरिमा की रक्षा करता है। क्षमा का अर्थ केवल सामने वाले को माफ कर देना नहीं है, बल्कि यह स्वयं को क्रोध, द्वेष और पीड़ा से मुक्त करना है। जब हम क्षमा करते हैं, तो हम अपने भीतर की भारी गांठों को खोलते हैं। क्षमा में ही महानता प्रकट होती है, क्योंकि, दुर्बल व्यक्ति बदला लेता है और महान व्यक्ति क्षमा करता है। उत्तम क्षमा धर्म सिखाता है। स्वयं की भूलों को स्वीकारना, दूसरों की दुर्बलताओं को समझना, बदले की भावना को छोड़कर समभाव में स्थित होना, पारिवारिक और सामाजिक कटुता का इलाज। आज घर-घर में रिश्तों की दीवारें खड़ी हैं-पति-पत्नी, माता-पिता और बच्चों, भाई-बहन, मित्रों-सभी में अहं और अपेक्षाओं की आग लगी है। मैं क्यों झुकूं ? मैं सही हूं-यह भावना रिश्तों को तोड़ रही है। उत्तम क्षमा धर्म हमें सिखाता है कि जो सबसे पहले क्षमा माँगता है, वह कमज़ोर नहीं, सबसे बड़ा होता है। क्षमा मांगना अहंकार की हार नहीं, आत्मा की विजय है। जो क्षमा करता है, वही अपने और समाज दोनों का कल्याण करता है।</p>
<p><strong> मनोवैज्ञानिक दृष्टि-क्षमा से मानसिक स्वास्थ्य</strong></p>
<p>वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि जो लोग क्षमा नहीं करते, उनके भीतर तनाव, अनिद्रा, रक्तचाप और अवसाद की प्रवृत्ति अधिक होती है।</p>
<p>वहीं क्षमाशील व्यक्ति-अधिक शांत, केंद्रित और प्रसन्नचित्त रहते हैं। उनका आत्मविश्वास और जीवन-शक्ति अधिक होती है। वे दूसरों को भी सकारात्मक दृष्टि से देखते हैं। इसलिए उत्तम क्षमा धर्म केवल आध्यात्मिक सिद्धांत नहीं, मनोवैज्ञानिक उपचार भी है। क्षमा और भावना योगरू क्षमा को अभ्यास कैसे बनाएं? भावना योग हमें सिखाता है कि भावनाओं का दमन नहीं, दिशा देना चाहिए। जब हम प्रतिदिन कुछ क्षण ध्यानपूर्वक बैठते हैं और अपने भीतर के क्रोध और पीड़ा को देखते हैं, तो हम क्षमा के बीज बोते हैं।</p>
<p><strong>भावना योग क्षमा चिंतन पंक्तियां-</strong></p>
<p>मैं आत्मा हूं, शुद्ध और शांत। किसी के भी व्यवहार से मेरी आत्मा आहत नहीं हो सकती। मैं सबके प्रति क्षमाशील हूं। क्षमा-एक संकल्प, एक साधना। हम यह क्यों भूल जाते हैं कि हम स्वयं भी गलतियां करते हैं? यदि हम चाहते हैं कि हमें कोई माफ करे तो पहले हमें दूसरों को माफ करना आना चाहिए। तू सदा मेरा रहे, मैं तेरा हो जाऊं। तुझे माफ कर सकूं, इतना बड़ा हो जाऊं। उत्तम क्षमा धर्म केवल एक दिन की परंपरा नहीं, हर दिन की जीवन शैली बननी चाहिए। आज जब समाज में द्वेष, कटुता, बदले की भावना और संवादहीनता बढ़ रही है, तब उत्तम क्षमा धर्म शांति, संबंध और आत्मबल का नव-स्रोत बन सकता है। इस दशलक्षण पर्व पर हम संकल्प लें कि मैं न किसी से द्वेष रखूंगा, न अपने भीतर क्रोध पालूंगा। मैं क्षमा करूंगा क्योंकि, मैं आत्मा हूं, शांत और विशाल।</p>
<p><strong>प्रतिदिन के यह हैं सभी कार्यक्रम, रहेंगे लाइव </strong></p>
<p>प्रवक्ता अविनाश जैन ने बताया कि प्रतिदिन प्रातः5.25 बजे से भगवान का अभिषेक एवं शांतिधारा जिनालय में हो रही है। 5.45 से भावनायोग मंडप उद्घाटन एवं ध्वजारोहण के बाद नित्य नियम पूजन एवं दशलक्षण विधान का शुभारंभ एवं मध्य में 8.30 से 9.30 तक मुनि श्री के प्रवचन तथा मध्यकाल में दोपहर 2.30 बजे से प्रतिदिन तत्वार्थ सूत्र की वाचना एवं सांयकाल 6.20 से शंका समाधान का कार्यक्रम हो रहे हैं। सभी कार्यक्रम प्रमाणिक एप के माध्यम से लाइव रहेंगे। आप सभी इन दस दिनों में घर बैठकर भी लाभ उठा सकते हैं।</p>
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